Friday, 12 December 2014

ऐक्ट्रेस शहनाज ट्रेजरीवाला की नरेंद्र मोदी को खुली चिट्ठी


मॉडल, ट्रैवल राइटर और ऐक्ट्रेस शहनाज ट्रेजरीवाला ने कैब रेप कांड के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर, अभिनेता शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान और बिजनसमैन अनिल अंबानी को एक खुली चिट्ठी लिखी है। उन्होंने इस चिट्ठी में नरेंद्र मोदी से काफी कड़े शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि मोदी को इस बात के लिए शर्म आनी चाहिए कि उनके देश में औरतें सुरक्षित नहीं हैं।

शहनाज ने अपनी चिट्ठी में मोदी पर सवाल उठाते हुए लिखा, नमो, यूएस या जापान या ऑस्ट्रेलिया में दिए गए आपके भाषणों का क्या औचित्य है, अगर आपके देश की राजधानी में कोई औरत दिन के उजाले में भी आजादी से नहीं घूम सकती। यह हमारे देश का पहला मुद्दा है। किसी भी और मुद्दे से पहले इस मुद्दे को सुलझाइए। क्या यह शर्म का विषय नहीं है? शर्म है आप पर। अब आप हमारे लिए जिम्मेदार हैं।




इस चिट्ठी में शहनाज ने न केवल अपना गुस्सा जाहिर किया है, बल्कि कुछ बेहद शर्मनाक वाकयों के बारे में भी बताया है, जो उनके, उनकी बहन, उनकी दोस्त और यहां तक कि उनकी मां के साथ घटे। शहनाज ने बताया कि कैसे उनकी 'डरी हुई' मां ने उनसे कहा कि वह मीटिंग के लिए ऊबर कैब न बुक कराएं। शहनाज ने इन हस्तियों को यह खत इसलिए लिखा है, क्योंकि ये इस देश के सबसे प्रभावशाली लोग हैं, और वह चाहती हैं कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए इन लोगों को आगे आना चाहिए।

शहनाज ने लिखा है कि केवल 13 साल की उम्र में एक आदमी उनको जबरदस्ती छूकर गुजर गया और उनकी मां चीखती रहीं, लेकिन उस आदमी का कुछ बता नहीं चला। उसके बाद से तो ये किस्से आम हो गए और उनकी खुद ही अपनी सुरक्षा के लिए हर संभव उपाय के साथ सफर करने की आदत हो गई। कई बार उन्होंने ऐसी हरकतें करने वालों को थप्पड़ मारे भी और कई बार उन्हें थप्पड़ खाने भी पड़े। कई बार भीड़ उन्हें बचाने आई भी, और कई बार नहीं भी आई।

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे अपने कॉलेज के पहले दिन बस में सफर कर रही उनकी बहन की टीशर्ट के अंदर एक आदमी ने हाथ डाल दिया था। और, उनकी एक दोस्त, जो केवल 16 साल की थी, उसके साथ चलती ट्रेन में एक आदमी ने रेप किया और फिर उसके बालों में बंधे रिबन से खुद को साफ करके ट्रेन से कूदकर भाग गया। उसके बाद उनकी दोस्त लंगड़ाते हुए घर वापस आई। उसे काफी ब्लीडिंग हो रही थी।

शहनाज ने बताया कि एक बार उनकी मां को भी कोई गंदे तरीके से छूकर निकल गया था। उन्होंने लिखा कि इन सारी घटनाओं पर न उनको, न उनकी बहन को, न उनकी दोस्त और न ही उनकी मां को शर्मिंदा होने की जरूरत है। इन सब घटनाओं पर हमारे देश के पुरुषों को शर्मिंदा होने की जरूरत है।
 साभार :

http://navbharattimes.indiatimes.com/movie-masti/news-from-bollywood/shenaz-treasurywala-writes-an-open-letter-asks-for-help-from-modi-tendulkar-sr-bachchan-ambani/articleshow/45478401.cms

Thursday, 11 December 2014

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ तो दे !:दिलीप कुमार-----ध्रुव गुप्त

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जन्मदिन / दिलीप कुमार (11 दिसंबर)
आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ तो दे !:
भारतीय सिनेमा के महानतम अभिनेता, हिंदी सिनेमा के पहले महानायक दिलीप कुमार उर्फ़ युसूफ खान का उदय भारतीय सिनेमा की शायद सबसे बड़ी घटना थी। बगैर शारीरिक हावभाव के चेहरे और आंखों से भी अभिनय किया जा सकता है, यह साबित करने वाले देश के वे पहले अभिनेता थे। अपनी छह दशक लम्बी अभिनय-यात्रा में उन्होंने अभिनय की जिन ऊचाइयों और गहराईयों को छुआ, वह अद्भुत, असाधारण और अकल्पनीय था। सत्यजीत राय ने उन्हें ' The Ultimate Method Actor ' की संज्ञा दी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि पाकिस्तान सरकार ने वहां उनके पैतृक घर को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया हुआ है। फिल्मों में प्रेम की व्यथा की जीवंत अभिव्यक्ति के कारण उन्हें ' ट्रैजेडी किंग ' कहा गया, लेकिन 'कोहिनूर' 'आज़ाद' और 'राम और श्याम' जैसी फिल्मों में उन्होंने साबित किया कि हास्य भूमिकाओं में भी उनका कोई सानी नहीं है। 1941 में 'ज्वारभाटा' से अपनी फिल्मी पारी शुरू करने वाले दिलीप साहब ने साठ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय के नए-नए प्रतिमान गढ़े। उनकी कुछ यादगार फ़िल्में हैं - मिलन, जुगनू, शहीद, नदिया के पार, हलचल, मेला, अंदाज़, दाग, बाबुल, दीदार, आरज़ू, संगदिल, आन, कोहिनूर, आज़ाद, शिक़स्त, मुसाफिर, फुटपाथ, अमर, उड़न खटोला, देवदास, नया दौर, यहूदी, मधुमती, पैग़ाम, मुग़ल-ए-आज़म, गंगा जमना, आदमी, लीडर, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम, संघर्ष, सगीना महतो, गोपी, मजदूर, सौदागर, मशाल, धर्म अधिकारी, शक्ति, क्रांति और कर्मा। मधुबाला के साथ उनका असफल प्रेम उस दौर की सबसे चर्चित प्रेम कहानियों में एक रही है। हाल में उनकी आत्मकथा ' The Substance And The Shadow' प्रकाशित और चर्चित हुई है जिसमें उन्होंने अपने जीवन के कई अनखुले पहलुओं पर रोशनी डाली है । सिनेमा में अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान 'दादासाहब फाल्के अवार्ड' से नवाज़ा गया।
दिलीप कुमार के जन्मदिन पर उनके लंबे और स्वस्थ जीवन की हार्दिक शुभकामनाएं !

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=774604419282825&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=1&theater
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दिलीप साहब का जन्मदिन मुबारक हो। हम उनके सुंदर,स्वस्थ,सुखद,समृद्ध उज्ज्वल भविष्य एवं दीर्घायुष्य की मंगल कामना करते हैं।:
दिलीप साहब से मुलाक़ात ---
 1981 में मैं पाँच माह के डेपुटेशन पर अन्य लोगों के साथ होटल मुगल शेरेटन,आगरा से होटल हाई लैण्ड्स,कारगिल भेजा गया था। किन्तु एक साथी के साथ मैं जूलाई में बीच में ही वापिस लौट आया था। 
उस समय होटल मुगल में 'विधाता' की शूटिंग सुभाष घई साहब के निर्देशन में चल रही थी। लॉबी में हो रही 'कुणाल महल' की दिलीप साहब शूटिंग मैंने भी देखी थी। स्टाफ केफेटेरिया में पद्मिनी कोल्हापूरे के डायलाग-"मक्के की रोटी"की शूटिंग भी मैंने देखी थी। लेकिन ज़्यादातर मैं आफिस से गायब होकर शूटिंग देखने वालों में शामिल नहीं रहता था। एक रोज़ मेनेजमेंट ने पूरे स्टाफ के साथ फिल्म -टीम को चाय पर गार्डेन में आमंत्रित किया था। जेनरल मेनेजर सरदार नृपजीत सिंह चावला साहब ने वरिष्ठ अभिनेता जनाब यूसुफ खान साहब से मेरा परिचय कराते हुये कहा था -" दिलीप साहब मीट आवर सीनियर मोस्ट एम्प्लाई विजय माथुर" । दिलीप साहब ने बड़े ही उत्साह और आत्मीयता के साथ मुझसे हाथ मिलाया था। हमारे दूसरे साथी मुकेश भटनागर का परिचय जी एम साहब ने शम्मी कपूर साहब से करवाया था। ये दोनों महान अभिनेता जी एम साहब के अगल-बगल चल रहे थे। 
आज दिलीप साहब के जन्मदिन पर उनसे मुलाक़ात की बात पुनः याद आ गई  एक बार पुनः
हम उनके सुंदर,स्वस्थ,सुखद,समृद्ध उज्ज्वल भविष्य एवं दीर्घायुष्य की मंगल कामना करते हैं।
(विजय राजबली माथुर)
 

Monday, 8 December 2014

शुभकामनायें अग्रिम रूप से --- विजय राजबली माथुर

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यदि सिर्फ शुभकामनायें काम आ सकती हैं तो हमारी शुभकामनायें अग्रिम रूप से सम्मेलन की सफलता हेतु हैं। 

आर एस एस नियंत्रित केंद्र सरकार से त्रस्त जनता स्वतः साम्यवाद/वामपंथ की ओर आकर्षित होगी और केंद्र में वामपंथी सरकार को सत्तारूढ़ कर देगी ऐसी सोच लगभग सभी विद्वानों की है। चूंकि मैं विद्वान नहीं हूँ इसलिए व्यवहारिक दृष्टिकोण से सोचता हूँ जो  सैद्धान्तिक कहलाने वाले विद्वानों को अखरता है।

गत वर्ष 30 सितंबर की सफल रैली के बाद मैंने लिखा था :
http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/09/3-30.html


तब से अब तक एक वर्ष से अधिक का समय व्यतीत हो चुका है और उस रैली का कोई लाभ पार्टी को मिला हो ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता। अतः मेरा आंकलन गलत नहीं था। न तो लोकसभा चुनावों में न ही विधानसभा के उप चुनावों में पार्टी को कोई लाभ हो सका है। न ही सांगठनिक रूप से पार्टी को बढ़त मिली है। गत माह सम्पन्न लखनऊ के पार्टी ज़िला सम्मेलन में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार तीन वर्षों में पार्टी से 168 सदस्य कम हुये हैं। यह तब है जबकि लखनऊ के पार्टी इंचार्ज लखनऊ के ही हैं और इस प्रकार जिलामंत्री को प्रभावित करते रहे हैं;बल्कि उनका तो दावा है कि वही अकेले पूरी प्रदेश पार्टी को चला रहे हैं।
यदि इसे संकेत समझा जाये तो अन्य जिलों में भी ऐसा ही हुआ होगा। एक तरफ राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता पर संकट है दूसरी ओर संगठन को कमजोर किया गया है और अपेक्षा है कि जनता स्वतः पार्टी की ओर आकर्षित होगी। महिमामंडित उत्पीड़क पदाधिकारी राज्यसचिव का रैली से पूर्व यह कह कर मज़ाक उड़ाते रहे हैं कि वह रैली के ग्लेमर में फंसे हुये हैं। वह शख्स निजी हितों के कारण पार्टी की बढ़त नहीं होने देना चाहते हैं और जबकि नए लोग आ नहीं रहे हैं पुराने लोगों को भी हटाने के उपक्रम करते रहते हैं। अपने ही एक राष्ट्रीय सचिव के प्रति घृणा भाव रखते हैं। उनके एक बयान को पार्टी के अधिकृत ब्लाग में पोस्ट करने के कारण मुझे ब्लाग आथर व एडमिनशिप से हटा दिया था और अब पूर्व घोषणानुसार ज़िला काउंसिल से ।

जब तक पार्टी का विस्तार करने और जन-समर्थन हासिल करने का प्रयास नहीं होता तब तक कोई भी सम्मेलन पार्टी के लिए लाभप्रद नहीं होगा। देश के अपने प्रतीकों व उदाहरणों से जनता को साम्यवाद/मार्क्स वाद के प्रति आकर्षित किया जा सकता है किन्तु उक्त प्रभावशाली पदाधिकारी इसके पक्ष में नहीं हैं और अन्य लोग उनसे अत्यधिक प्रभावित हैं ।वह मूलतः केजरीवाल और कल्याण सिंह समर्थक हैं । 06 दिसंबर 2014 को एक स्टेटस द्वारा मैंने एक बार पुनः केजरीवाल की असलियत सामने रखी है:

 फिर भी हम अल्लाहाबाद सम्मेलन की सफलता की कामना करते हुये अग्रिम शुभकामनायें देते हैं। 

Friday, 5 December 2014

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां पता नही कब ऐसा कदम उठाएंगी ? ........Roshan Suchan


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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां पता नही कब ऐसा कदम उठाएंगी ?........

भारतीय राजनीत में 16 मई के बाद पैदा हुई स्थितियों के बाद कभी जनता दल परिवार का हिस्सा रहे 6 दलों ने विलय कर नई पार्टी समाज़वादी जनता दल बनाने का फैंसला किया है , जिसमे सपा , जद(यू) , राजद , इनैलो , जद(एस ) ,समाज़वादी जनता पार्टी शामिल हैं …… इसकी शुरुआत आम चुनावों में बुरी तरह हारने पर बिहार और यूपी में हुए उपचुनावों के बाद नितीश , ल
ालू और मुलायम के साथ आने के बाद हुई थी। फिर हरियाणा के चुनावों में चौटाला की पार्टी इनैलो के समर्थन में सपा , जद(यू) , राजद , इनैलो , जद(एस ) के बड़े नेता सक्रिय रूप से शामिल हुए थे. तभी से ये कयास लगाये जा रहे थे की ये तमाम दल एक राष्ट्रीय पार्टी बना सकते हैं। ७ नवम्बर २०१४ के बाद फिर से कल मुलायम के निवास पर हुई बैठक मे इन दलों ने आपस में विलय कर नई पार्टी बनाने की घोषणा की है । हलांकि बीजेपी और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों के विरुद्ध कोई नया कार्यक्रम नहीं है इन दलों का। पिछले एक दशक से वामपंथी पार्टियां भी देश भर में कमजोर हुई हैं , दुनिया भर के मेहनत कशों को एक होने की बात करने वाले हमारे अपने साथियों ने लाल झंडे को भी नहीं बक्शा बीसियों टुकड़े कर उसकी लीरें बनाकर देश की आवाम से गद्दारी की है। अब जब केंद्र और राज्यों में दक्षिणपंथी हावी हो रहे हैं तो सभी वाम भाकपा , माकपा , माले , न्यू डैमोक्रेसी , एस. यु. सी. आई , आर. एस. पी , एफ बी सहित सभी को जनता परिवार की तरह विलय कर एक नई कम्युनिस्ट पार्टी बनानी चाहिए जो आधुनिक भारत की आवाम का नेतृत्व कर सके। सभी कामरेड्स चाहे वो किसी भी दल से हो अपने अपने दल पर इसके लिए भी काम करना होगा। पार्टी कार्यक्रम , नीतियां , रणनीति , कार्यनीति पर बहस होकर नई पार्टी लाइन बनाई जा सकती है. अब वाम एकता नही विलय की जरूरत है . भाकपा और माकपा को इसकी फेल करनी चाहिए और अपने होने वाले राष्ट्रीय महाधिवेशनों से इसकी शुरआत करनी चाहिए …अगर इस पर दोनों सोचें और काम करें तो वह दिन दूर नहीं जब लाल झंडा हिन्दोस्तान की सबसे बड़ी ताकत बनेगा ...................

  • Nasirul Haque Comrade Roshan Such an main 1993 se yeh baat Kah raha hoon lekin yeh log sun nahi rahen hai sabhi vampanthi cader ko netaon per davao banana padega

    • Roshan Suchan Shikha Singh :जनता परिवार (राजद, जदयू , सपा , जदसे, inld) के वापस विलय की संभावना बढ़ने के बाद कई लोग कम्युनिस्ट "परिवार" को सीख दे रहे हैं कि आप भी साथ मिल जाएं और एक हो जाएं l ये विचार मुझे इसीलिए बेहद हास्यास्पद लगता है क्यूंकि ऐसे मशवरे देने वाले न जनता परिवार को सही से समझ पाएं हैं न कम्युनिस्ट विचारधारा को l बुर्जुवा जनता परिवार का जन्म और बिखराव भी बुर्जुवा वर्ग की अवसरवादी राजनीति का नमूना था और उसका पुनर्मिलन भी इसी निम्नस्तरीय बुर्जुवा अवसरवादी राजनीति का नमूना है l पहली बात तो येकि इसे आधार बनाकर कम्युनिस्ट पार्टियों को "इस तरह" के विलय की सीख देना ही हास्यास्पद है l दूसरा, कम्युनिस्ट पार्टियों में एकता उनकी विचारधारा की एकता तय करती है न कि संसद में गोते लगाने की छटपटाहट में जनता परिवार की तरह हरे-नीले बगुलों का अवसरवादी मिलन और एकता l हमारी पार्टी का जन्म ही संशोधनवादी सीपीआई और सीपीएम के ख्रुश्चेवपंथी लाइन के विरुद्ध महान नक्सलबाड़ी आन्दोलन की गर्भ से माओवादी लाइन पर हुआ था l इसीलिए हमारे लिए वामपंथी एकता सिर्फ और सिर्फ ख्रुश्चेवपंथी सीपीआई-सीपीएम सरीखी संशोधनवादी पार्टियों से विचारधारात्मक संघर्ष करके और क्रांतिकारी मार्क्सवादी लेनिनवादी लाइन को तमाम कम्युनिस्ट कतारों में स्थापित करके ही संभव है न कि परस्पर विरोधी लाइनों को ज़बरदस्ती एक दूसरे के साथ चिपकाने में l इसीलिए ऐसी सीख देने वालों से अनुरोध है कि लालू , मुलायम , नितीश , चौटाला , देवेगौड़ा जैसे जोकरों का अनुसरण करने के बजाए विचारधारा का अनुसरण करें तो बेहतर परिणाम आएँगे , विचारधारात्मक स्तर पर भी और ज़मीनी स्तर पर भी // "comrade उनके अनुसरण को किसने बोला है ? यहां जबरन विलय की बात कहाँ हो रही है ? हम भी मार्क्सवादी लेनिनवादी लाइन को तमाम कम्युनिस्ट कतारों में स्थापित करने की ही बात कर रहे हैं ?
    जब नक्सलबाड़ी आंदोलन घटित हुआ था तो वहाँ से कोई आठ मील दूर ही हम लोग सिलीगुड़ी के आश्रम पाड़ा में चौरंगी मिष्ठान भंडार के स्वामी संतोष घोष साहब के मकान के एक कमरे में बतौर किरायेदार रहते थे। न्यू मार्केट में मारवाड़ियों की जली दुकानें भी हमने देखी थीं और इंश्योरेंस से मिले मुआवजे के बाद फिर से बनी भी। नक्सल बाड़ी आंदोलन ने मारवाड़ी व्यापारियों की 'किस्मत' चमका दी थी। नुकसान से कहीं बहुत ज़्यादा मुआवजा उन पीड़ित व्यापारियों ने पा लिया था। लेकिन इस घटना के बाद बंगाली कामगारों को हटा दिया था और बाहर के लोगों को नौकरी पर रखा था। इसका वर्णन पूर्व में ब्लाग पर किया भी था। :
    मैंने 14 मई 2011 को ब्लाग में एक लेख के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि भारत में कम्यूनिज़्म को भारतीय संदर्भों का प्रयोग करके जन-प्रिय बनाया जा सकता है । किन्तु उत्तर प्रदेश भाकपा में प्रभावशाली एक बैंक कारिंदा इसी वजह से मेरा प्रबल विरोध व उत्पीड़न करता है। जबकि इन निष्कर्षों से लाभ उठा कर कम्यूनिज़्म को मजबूत करने की नितांत आवश्यकता है।


Tuesday, 2 December 2014

कम्यूनिस्ट पार्टी के साथ काम नहीं करेगा क्यों भाई? ---Ameeque Jamei


उत्तर प्रदेश का सम्पन्न मुसलमान समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी की गाली और जूठन खा लेगा लात खा लेगा लेकिन साहेब कम्यूनिस्ट पार्टी के साथ काम नहीं करेगा क्यों भाई? कम्युनिस्टो ने इनकी कौनसी भैंस बाँध ली?

  • Masud Javed आप लोग एक विकल्प देने में विशेस कर के हिंदी छेत्र में कभी कामयाब नहीं हुए
    यही कारण है।

  • Ranjeet Kumar हिंदुस्तानी कम्युनिस्टों जिनको अपनी बुद्धि और नेतृत्व का झूठा गुमान है, ने ऐसा किया क्या है जिसके लिए हिंदुस्तानी अवाम (सिर्फ मुस्लिम ही क्यूँ , महिलाओँ , दलितों और तमाम दबे कुचले तबकों ) को इन पे भरोसा हो , कम्युनिस्ट पार्टी के रहनुमा का कोई ठौर ठिकाना नहीं, कल किससे हाथ मिला लेंगे और किसको अपना प्रधानमंत्री घोषित कर देंगे ! अवाम को ये लोग बताएं कि इनके किस काम काम से भरोसे की बू आती है जिसको सूंघने के लिए मुसलमान अपनी नाक खोले. भरोसा पैदा करना होगा अवाम में कि कम्युनिस्ट उनके लिए काम करते हैं , और इस काम में बहुत समय लगेगा , ५ साल , १० साल या शायद उससे भी बहुत ज्यादा। वामपंथी राजनीति की बहुत गुंजाइश और जरुरत है इस देश को लेकिन आज की कमम्युनिस्ट पार्टियों के पास उतना मज़बूत कन्धा नहीं है जिसपे ये
    जिम्मेदारियों का ये बोझ डाला जा सके ! ***

  • Afeef Siddiqui कम्युनिस्टों के शासन में बंगाल ,त्रिपुरा केरला ने तरक़्क़ी की. खासतौर से बंगाल सरकार का आपरेशन "बरगा" तो भाई लोगो को याद होगा , जिसने देहात -कसबे के लोगो को ज़मीन का हिस्सेदार बनाया , जो गरीब लोगो को मुख्यधारा में लेन का सबब बना , इन कम्युनिस्टों के शासन में मुसलमानो-सिक्खो - ईसाइयो -आदिवासी क़त्ल नहीं हुय, इन्ही कम्युनिस्टों ने बराबरी की बात की ,सभी को एक साथ चलने का ईमानदार मौका दिया ,जो नही चलने को तैयार उसके लिय क्या कहा जा सकता है...... हाँ एक बात और साले कम्युनिस्ट बहुत "ईमानदार" होते हैं ,इन्हे भी भाजपाइयों , कोंग्रेसियों की तरह बेईमान होना चाहिए ,इनमे लालू-मुलयम -जयललिता-चौटाला -मायावती-सुखराम- बंगारू- मारन- महतो- क़ाज़ी-पासवान जैसे भी होना चाहिय तब कम्युनिस्टों में सुगंध आयगी........

  • Ameeque Jamei Afeef Siddiqui bhai aapne jawab de diaaa
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    कम्युनिस्ट बहुत "ईमानदार" होते हैं:
     इसमें कोई शक नहीं कि आम कम्युनिस्ट बहुत ईमानदार होते हैं । लेकिन उत्तर प्रदेश में जो लोग निर्णायक नेतृत्व में हैं उनमें से कुछ ने जनता में दोहरे आचरण की छाप छोड़ रखी है और वे लोग ईमानदार लोगों को परिदृश्य से धकेल देते हैं। जनता की निगाह से कुछ भी छिपा हुआ नहीं रहता है। इसलिए ऐसे लोगों की छटनी की जानी चाहिए जिससे जनता की हमदर्दी हासिल की जा सके। 

    पश्चिम बंगाल में माकपा की स्थिति एक मार्क्स वादी पार्टी की नही बल्कि 'बंगाली पार्टी' की छवी जनता के दिमाग में थी। उस दौरान भी 'दुर्गा पूजा' आदि ढोङ्गोत्सव उसी प्रकार होते रहे थे जैसे पहले होते थे। 


    जिम्मेदारियों का ये बोझ डाला जा सके ! ***
    वह शख्स हैं कामरेड अतुल अंजान साहब :


    अवाम की आवाज़ और चेहरा :लखनऊ की शान और उत्तर प्रदेश का सितारा - अतुल अनजान 

    http://communistvijai.blogspot.in/2013/12/blog-post_24.html 

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    Comment on Facebook :02-12-2014

    Comment in Fb AISA group:

      Comm.in fb group-COMMUNIST:


    --- विजय राजबली माथुर 

Monday, 24 November 2014

कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों ने देश के वंचित तबकों का भरोसा क्‍यों खो दिया? ---Pramod Ranjan


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=395487227283466&set=a.169270243238500.1073741825.100004665751431&type=1
आइए, एक उदाहरण के माध्‍यम से इस प्रश्‍न पर विचार करें कि कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों ने देश के वंचित तबकों का भरोसा क्‍यों खो दिया?

बिहार में एक विधायक है अनंत सिंह। जाति है भूमिहार। इन दिनों सत्‍ताधारी जदयू में है। फेसबुक पर अन्‍य राज्‍यों के साथी शायद उन्‍हें नहीं जानते होंगे। अनंत सिंह को 'छोटे सरकार' और बिहार के मोकामा क्षेत्र का आतंक कहा जाता है। इस सामंत के पास अवैध ह‍थियारों का बिहार भर में संभवत: सबसे बडा जखीरा है। दर्जनों हत्‍याओं के आरोप इस पर है, और कम से कम बिहार का हर वशिंदा जानता है कि ये कतई सिर्फ आरोप नहीं हैं।

उपरोक्‍त परिचय तो वह है, जो आपको बिहार के लोग बताएंगे, लेकिन यह जानना रोचक है कि खुद अनंत सिंह अपना परिचय क्‍या देता है। बिहार विधान सभा को दिये गये हलफनामा में उसने बताया है कि मैंने '1980 से ही कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के सक्रिय सदस्‍य के रूप में मजदूरों के लिए लडाई लडी'।

दरअसल, अनंत का यह परिचय सिर्फ इस बहुबली का ही परिचय नहीं है, यह कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों का भी परिचय है कि 'मजदूरों की लडाई' के नाम पर वे किन तबकों के कैसे लोगों को पश्रय देते रहे हैं। लालू और नीतीश ने यूं ही उनकी बोई खेती नहीं काटी!

एक और बात, पिछले दिनों बिहार के दलित मुख्‍यमंत्री का एक बयान आया था, जिसका आशय था कि आर्य/ सवर्ण बाहरी हैं। लेकिन इस बयान के आते ही अनंत सिंह भडक पडा। उसने कहा कि 'मांझी एक दिन के लिए भी मुख्‍यमंत्री बनने लायक नहीं है। उसे कांके (पागलखाना) में भर्ती करवाना चाहिए।' यह बिहार में मीडिया का पसंदीदा बयान बना, इसे खूब छापा और दिखाया गया। गोया अनंत सिंह कोई बौद्धिक हो, इस विषय पर उसकी बात बहुत महत्‍वपूर्ण हो। यहां अटैच अनंत सिंह द्वारा बिहार विधान सभा को सौपा गया बायोडाटा देखिए। उनकी 'शैक्षणिक योग्‍यता' है - 'साक्षर'। वैसे, सच यह है कि वह न लिखना जानता है, न पढना।

यानी, सिर्फ कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों का ही नहीं, मीडिया का रूख भी विचारणीय है। तथ्‍य यह है कि बिहार के मीडिया हाऊसों में अनंत सिंह द्वारा 'बहाल करवाये गये' पत्रकार बडी संख्‍या में है। बिहार के मीडिया का इतना गलीज चेहरा यूं ही नहीं है।

दक्षिण एशिया की शान :बेगम हजरत महल ---कनक मणि दीक्षित

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश