Saturday, 25 January 2020

वह सहिष्णु समाज वाले भारत को उग्र राष्ट्रवाद से भरा हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं ------ दि इकोनामिस्ट

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 संकलन-विजय माथुर

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Friday, 24 January 2020

फ़ीरोज गांधी विदेशी पत्रकार की नजर से ------

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 22 January 2020

हम कागज नही बनाएंगे - हम रजिस्ट्रेशन नही कराएंगे: "सत्याग्रह" ------ मनीष सिंह



Manish Singh
16 अगस्त 1908, जोहान्सबर्ग, जगह हमीदा मस्जिद के सामने का मैदान। भारतीय और एशियन समुदाय की भारी भीड़ गांधी के इशारे का इंतजार कर रही थी। गांधी टेलीग्राम पढ़ रहे थे, जो सरकार की ओर से आया था। लिखा था- काला कानून वापस नही लिया जाएगा।

गांधी ने आंदोलन दोबारा शुरू करने की घोषणा की। उस मैदान में हजारों लोगों ने उस मैदान में अपने  NRC सर्टिफिकेट जला दिए। पूरे दक्षिण अफ्रीका में भयंकर बवंडर खड़ा हो गया। दुनिया सत्याग्रह नाम के नए-नए ईजाद हथियार का इस्तेमाल देख रही थी।
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दरअसल 1906 में ट्रांसवाल की सरकार ने एक " ट्रांसवाल एशियाटिक ऑर्डिनेंस" जारी किया। हर भारतीय, अरब, चीनी और दूसरे काले एशियन्स को अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। रजिस्ट्रार के पास जाकर अपना शारीरिक परीक्षण करवाना होगा, अंगुलियों की छाप देनी होगी। एक सर्टिफीकेट लेना होगा, जो सदा साथ रखना होगा। न होने पर फाइन या जेल हो सकती थी। आबाल- वृद्ध , कोई भी अगर बगैर रजिस्ट्रेशन पेपर्स के मिले, उसकी उंगलियों की छाप मैच न करे, तो सीधे जेल, या डिपोर्ट किया जा सकता था।

पहले से ही रंगभेद झेल रहे एशियन समुदाय को, इस कानून से जीना मुश्किल होने के आसार थे। गांधी जो अब तक समुदाय के जाने पहचाने चेहरे हो चुके थे, आगे आये। जोहान्सबर्ग के एम्पायर थिएटर में सारे समुदायों के लीडर्स को इकट्ठा किया। तीन हजार की भीड़ को संबोधित करते गांधी ने इस कानून को "काला कानून" कहा।

उन्होंने कहा- "हम इस कानून को रिजेक्ट करते हैं। हमे मिलकर तय करना होगा कि हममें से कोई रजिस्ट्रेशन न कराए। मैं सबसे पहले अपना वचन देता हूँ। मैं अपना रजिस्ट्रेशन नही कराऊंगा"

एक बूढ़ा मुसलमान उठा। वो सेठ हबीब था। सबसे पहला था वो, जिसने गांधी के सामने शपथ उठाई- " हम कागज नहीं बनाएंगे"...।

ये गूंजता हुआ नारा हो गया। कानून का उल्लंघन, जेल, मारपीट, अपमान और दमन को सहना, लेकिन अड़े रहना, पीछे नही हटना। मजबूती से थमे रहना, अपना आग्रह मुस्कान के साथ बनाये रखना। हम कागज नही बनाएंगे। हम रजिस्ट्रेशन नही कराएंगे।

आंदोलन के इन तरीकों को शुरू में उन्होंने "पैसिव रेजिस्टेंस" कहा। मगर नाम कुछ जंच नही रहा था। उन्होंने साथियों से नाम सुझाने को कहा। एक साथी मगनलाल थे- उन्होंने कहा, " सदाग्रह!!

गांधी ने सुना , सोचा.. फिर एकाएक बोले - " सत्य के प्रति निर्भीक आग्रह.. यही !

"सत्याग्रह"

यह गांधी की दिशा बन गयी। गांधी का हथियार बन गया। वक्त वो था, आज भी वही है। सवा सौ साल से दुनिया का कोई हिस्सा हो, वक्त हो, देश हो..

सत्याग्रह को हर आततायी ख़ौफ़ से देखता है।


https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2698406466910320

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रामचंद्र गुहा को डर का अहसास कराया जा चुका है...... कौशल सिंह / सर्वेश रंजन सिंह

Sarvesh Rajan Singh
10 mins

रामचंद्र गुहा को खोने को बहुत कुछ है.. लेकिन पाने को कुछ भी नहीं क्योकि जो पाना था वो पा लिया अब उसे खोये न, इसका डर का अहसास कराया जा चुका है......
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गाँधी नेहरू पटेल का अनुशरण करना आसान नहीं है . ये वो लोग है जिनको खोने का कोई डर नहीं था क्योकि जो पाए थे उसे वो खो दिए थे. और जो पाना था वो स्वप्न में था इसी ने उनको महान बनाया. ये लोग जब जब अंग्रेज़ो की सत्ता के द्वारा प्रताड़ित हुवे दुबारा मज़बूत और अति उत्साह के साथ आये क्योकि खोने को कुछ था नहीं और हर प्रताड़ना उन्हें उनके स्वप्न को नज़दीक ला देता की सत्ता अब डर रही है. उन लोगो का स्वप्न था भारत की आज़ादी। और ये कब प्राप्त होगी ये नही मालूम था।

रामचंद्र गुहा और रतन टाटा ने जो बयान दिया है उसके मेरे नज़र में दो मायने है. मुझे रतन टाटा के बयान से कोई दुःख नहीं हुवा है क्योकि बिजनेसमैन को सत्ता के साथ हमेशा खड़ा देखा है और न हो तो सत्ता उसे बर्बाद कर सकती है. अनिल अम्बानी इसके सबसे बेहतरीन उदहारण है. मुझे साफ़ साफ़ याद है की कैसे मायावती ने अनिल अम्बानी को बर्बाद कर दिया, अनिल अम्बानी को मुलायम सरकार में बहुत से ठेके मिले और इसके लिए अनिल अम्बानी ने एक समय भारत का सबसे बड़ा IPO लेकर आये थे , ऊर्जा के क्षेत्र में, उम्मीद उत्तर प्रदेश से थी. लेकिन सरकार बदली और मायावती ने उस सारे प्रोजेक्ट को थप किया और वही से अनिल अम्बानी की बर्बादी शुरू हुवी.

कुछ बिजनेसमैन व्यापारी नहीं बल्कि व्यापार करने के लिए आते है . और इनकी सोच केवल कुछ समय के लिए ही होता है और उस समय में जितना दोहन किया जाय उतना कर लेते है . वो केवल एक ही सरकार के पक्ष में होते है. जैसे रामदेव , इनका कोई लॉन्ग टर्म विज़न नहीं था . जनता को स्वदेशी के नाम पर चुना लगाना था, राष्ट्रवाद के नाम पर गाय का अमृत दूध से महँगी गाय का मूत्र बेचना था और ये तभी संभव है जब राष्ट्रवादी सरकार सामने हो और उसकी मदद से अपनी मंशा को प्राप्त किया जाय. ऐसे लोग एक ही सरकार के चट्टे बट्टे होते है. और ये पूरी तैयारी के साथ होते है की दूसरी सत्ता आएगी तो इनको बंद करेगी तो क्यों न अपनी पसंद की सत्ता में ज्यादा से ज्यादा फायदा लेकर भागा जाय.

लेकिन उद्योगपति ऐसे नहीं होते . उन्हें लोग टर्म विज़न के साथ काम करना होता है . और उस लॉन्ग टर्म में कई सरकार आती है तो उन्हें खुद को सरकारों के साथ बैलेंस होकर चलना होता है . रतन टाटा का ब्यान इसी श्रेणी में आता है . अंदर से उन्हें भी पता है की ये देश आर्थिक, सामाजिक,वैज्ञानिक और वैचारिक रूप से बर्बाद हो रहा है और इसका कारण मोदी और शाह और संघ का विज़न है लेकिन सायरस मिस्त्री के कारण उन्हें ये बयान देना पड़ रहा है . जिसके लिए माफ़ है क्योकि रतन टाटा का देश के लिए योगदान सराहनीय है.

लेकिन रामचंद्र गुहा आप तो सत्ता की पहली प्रताड़ना में ही जमीं पर आ गए . और ऐसे लोग ही फासिस्ट सत्ता को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है की सबको अपनी आभा में लाया जा सकता है . चाहे किसी भी निति को अपनाना पड़े . साम दाम दंड भेद निति ही क्यों न हो.

CAA विरोध में जेल जाने के बाद उनके सुर बदले बदले हुवे है. और केरल में जो बयान दिया वो उनकी उसी वैचारिक पतन की ओर इशारा करता है. वो भूल गए की दुनिया की हर पार्टी पर किसी न किसी परिवार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष छत्रछाया रहती है . BJP संघ परिवार के हिस्सा है. दुनिया में क्रान्ति या बदलाव पार्टी संगठन या संघ नहीं लाती बल्कि दुनिया में जितने भी बदलाव हुवे है उसके पीछे किसी व्यक्ति के विचारो से जुड़े हुवे लोगो के कारण हुवा है. NAZI का अस्तित्व हिटलर से है . ROMAN EMPIRE का अस्तित्व जूलियस सीजर से था. जीसस , बुद्ध , नानक ये सारे व्यक्ति थे न की संगठन. रूस की क्रांति के पीछे लेनिन था.

अमेरिका में BUSH FAMILY सबसे बड़ी राजनितिक परिवार है . आज भी 50 प्रतिशत से ज्यादा अमेरिका के राज्यों में BUSH FAMILY का ही शासन है.

और रामचंद्र गुहा जी कांग्रेस की विरासत नेहरू तक थी . नेहरू के बाद कांग्रेस का कोई राजवंश पुत्र प्रधानमंत्री नहीं बना . नेहरू के बाद सत्ता लाल बहादुर शास्त्री को मिली न की उसकी बेटी इंदिरा गाँधी को . और इंदिरा गाँधी को नेहरू वाली कांग्रेस ने निकाल फेका था और इंदिरा ने नयी पार्टी उसी तर्ज पर बनायीं जैसे NCP या TMC है. इस पार्टी ने इंदिरा के छोड़कर केवल राजीव को गद्दी विरासत में दिया वो भी इसीलिए क्योकि इंदिरा की हत्या हो गयी थी. इंदिरा के जीवित रहते तो राजीव भी राजनीती से दूर ही रहे. उनका कोई राजनितिक वजूद नहीं था. जनता भावनात्मक होती है . अखिलेश हो या उद्धव ठाकरे या जगनमोहन रेड्डी ये सारे लोगो को भावनात्मक रूप से सत्ता विरासत में लिया है . लेकिन उसके बाद इस पार्टी ने नरसिंहराव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री दिए जो गाँधी परिवार से हटकर था. अब ये न कह देना की मनमोहन तो सोनिया का पपेट था . तो मनमोहन पार्टी नहीं थे जिन्हें जनता के बीच में जाकर वोट माँगना था. याद रखिये प्रधानमंत्री पद देश से पहले जीती हुवी पार्टी के मैनिफैस्टो को पूरा करने के लिए होता है. क्योकि संसदीय लोकतंत्र में जनता नेता नहीं पार्टी को चुनती है .तो पार्टी अध्यक्ष को कण्ट्रोल करना होता है . देखा नहीं आज मोदी प्रधानमंत्री है . अमित शाह गृहमंत्री होकर भी BJP का अध्यक्ष पद त्याग नहीं रहा क्योकि पार्टी हाथ से निकल न जाय.

इस देश के लोग बलात्कारी को लोकसभा में चुनते है . वो दिक्कत आपको नहीं थी . दिल्ली में ही लोगो ने जिन 7 MP को चुना है उनका क्या राजनितिक क्रेडेंशियल है . हंस राज हंस को ही ले लीजिये . इस देश ने आतंकी प्रज्ञा ठाकुर को चुना है. ये सब आपको विनाशकारी नहीं लगा लेकिन केरल से राहुल गाँधी का चुना जाना विनाशकारी है.

फिर भी मैं यकीन के साथ कह रहा हु की आपका बयान जो आपने केरल में दिया है वो एक फासीवादी ताकतों के सामने झुकाव की ओर इंगित करता है. और ये तभी हो सकता है जब आपको खोने को बहुत कुछ है . क्योकि इस सत्ता में जिस तरह से देश की बर्बादी की गाथा हर क्षेत्र में चाहे वो सामजिक ,आर्थिक ,वैज्ञानिक और वैचारिक में हो रही है, लोगो को पाने की कोई उम्मीद नहीं है. और लोग अब जो उनके पास है उसे खोने से बचाने के लिए झुक रहे है .

आपने शायद सबसे ज्यादा ऑस्कर जीती हुवी फिल्म SCHINDLER LIST नहीं देखी. मैं कहता हु देखिये और खुद को SCHINDLER के स्थान पर पाते है तो आपको ये देश माफ़ कर देगा . क्योकि SCHINDLER ने अपने अंतिम भाषण में यही कहा था की वो यहूदियों को हिटलर के कहर से बचा रहे थे लेकिन फिर भी जब SS सेना का अफसर उनके सामने यहूदी बच्चे और महिला को अपने क्रीड़ा के रूप में गोली मारकर हत्या कर देता तो वो भी उस SHOT पर ताली बजाते क्योकि ऐसा न करने पर और उनके मौत पर दुःख जताने पर आपको हिटलर विरोधी घोसित किया जा सकता था. लेकिन वो अकेले में उनकी पीड़ा में कराहते थे.

समझे रामचंद्र गुहा, गाँधी, नेहरू उस आज़ादी के लिए लड़ रहे थे जो केवल उनके स्वप्न में था . क्या उन्हें पता था की दुनिया पर राज करने वाली सत्ता 1947 में आज़ाद कर देगी भारत को . लेकिन वो प्रताड़ित होते और जेल जाते और निकलकर अपने उस स्वप्न के लिए फिर उससे दुगुनी उत्साह से खड़े हो जाते.
कौशल सिंह ...

https://www.facebook.com/sarvesh.rajansingh/posts/1252761328448460

Tuesday, 21 January 2020

बहनों की बहादुरी को सलाम ------ अरविन्द राज स्वरूप

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 अगर भारत की जनता रौलट एक्ट का और साइमन कमीशन का विरोध कर सकती है तो वह क्यों नहीं सीएए का भी विरोध कर सकती है।
वह विरोध तो गुलामी के काल का था, जिस विरोध में ना तो हिंदू महासभा की कोई भागीदारी थी और ना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ! तो क्यों आजाद भारत में संविधान के विरोध में लाया गया काला कानून वापस नहीं हो सकता ? और क्यों उसकी मुखालफत नहीं हो सकती?
वास्तव में उसकी मुखालफत करना उचित है और यह कार्य बिना किसी भय के करना देशभक्ति का ही काम है।
सीएए कानून दरसल देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के विरुद्ध लाया गया है , वह उसकी मूल आत्मा को , जैसे महात्मा गांधी का कत्ल किया गया , उसी तरह उसका कत्ल करने के लिए लाया गया है। उसका विरोध होना जरूरी है ।

1955 के राष्ट्रीय नागरिकता कानून में कहीं भी किसी धर्म का उल्लेख नहीं है। भारत देश के 1950 के संविधान में एवं भारत की  संविधान सभा ने भारत की नागरिकता के लिए कभी भी किसी धर्म की प्रतिबद्धता नहीं रखी।






Arvind Raj Swarup Cpi
लखनऊ 20 जनवरी 2020.

घंटाघर

आज शाम मुझको लखनऊ के घंटाघर जाने का मौका मिला । 
लगभग 5:45 बजे हुए थे ।लगभग दिन ढल चुका था।रात पसर रही थी।
मैं गिन नहीं सकता था पर हजारों महिलाएं वहां पर थी ।बुर्का नशीन भी और बिना बुर्के की भी।
मैंने पहली बार घंटाघर देखा उसके अगल-बगल भी लैंडस्केप को देखा घंटाघर बहुत पुराना लगता है ।अंग्रेजों के जमाने से भी पहले नवाब नसरुद्दीन हैदर नें बनाया था।घंटाघर के चारों तरफ पक्के पत्थर लगा दिए गए हैं जिससे एक चबूतरा सा बन गया है ।
साफ सुथरा।
उसके सामने की ओर मेन सड़क है और उसके पीछे बहुत बड़ा पार्क ।
वास्तव में बेहद खूबसूरत जगह है।
इतनी सारी महिलाओं को मैंने एक साथ कभी नहीं देखा।
मेरे लिए बात बड़ी तसल्ली की थी।
वहां पर महिलाएं सीएए, एनपीआर और एनआरसी के विरुद्ध धरना दे रही हैं।
मैंने वहां लोगों से पूछा क्या महिलाएं बिना किसी टेंट की छाया के धरना देती हैं ?तो लोगों ने बताया , ऐसा ही है ।
इतनी अधिक सर्दी पड़ रही है और सर पर टेंट लगाने को जगह नहीं है।
बाबा रे।
पर महिलाएं बैठी हुई है।
बहनों की बहादुरी को सलाम।
जहां हजारों की संख्या में महिलाएं धरना दे रही हैं उस स्थल पर एक चौकोर रस्सी खींच दी गई है । मेन सड़क की ओर उस रस्सी पर कुछ स्टिकर्स लगे हैं और उन पर लिखा है इस रस्सी के अंदर सिर्फ लेडीज़ या मीडिया कर्मी ही आ सकते हैं ।उस रस्सी के बाहर हजारों पुरुष भी है जो अपनी माताओं ,बहनों ,बीवियों का समर्थन करने पहुंचे हुए हैं ।
हजारों की तादाद में।
वहां मैंने देखा , दूर से , लखनऊ यूनिवर्सिटी की रिटायर्ड प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा भी मीडिया कर्मियों को कोई इंटरव्यू दे रही है। मैंने अपने साथ गए वहीं के एक निवासी साथी से कहा कि वह फोटो खींचे पर, उनके फोन की उस समय बैटरी चली गई थी और मेरा फोन मेरे पास नहीं था। जिसको वहां जाने की जल्दी में मैं चार्ज करने के लिए अपने निवास पर छोड़ गया था । 
इसलिए उस समय की फोटो मैं ले नहीं पाया।
भारतीय जनता पार्टी के नेता चाहे जो भी बयान दें।वह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री। उनका कोई मतलब नहीं है।
साधारण महिलाओं और उनके मन में, भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने जो कानून लागू किए हैं उसका तिरस्कार है। अगर भारत की जनता रौलट एक्ट का और साइमन कमीशन का विरोध कर सकती है तो वह क्यों नहीं सीएए का भी विरोध कर सकती है।
वह विरोध तो गुलामी के काल का था, जिस विरोध में ना तो हिंदू महासभा की कोई भागीदारी थी और ना ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ! तो क्यों आजाद भारत में संविधान के विरोध में लाया गया काला कानून वापस नहीं हो सकता ? और क्यों उसकी मुखालफत नहीं हो सकती?
वास्तव में उसकी मुखालफत करना उचित है और यह कार्य बिना किसी भय के करना देशभक्ति का ही काम है।
सीएए कानून दरसल देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के विरुद्ध लाया गया है , वह उसकी मूल आत्मा को , जैसे महात्मा गांधी का कत्ल किया गया , उसी तरह उसका कत्ल करने के लिए लाया गया है। उसका विरोध होना जरूरी है ।
1955 के राष्ट्रीय नागरिकता कानून में कहीं भी किसी धर्म का उल्लेख नहीं है। भारत देश के 1950 के संविधान में एवं भारत की संविधान सभा ने भारत की नागरिकता के लिए कभी भी किसी धर्म की प्रतिबद्धता नहीं रखी।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई योगदान नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी तिरंगे का सम्मान नहीं किया।
तत्कालीन हिंदुत्ववादी नें डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के समक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का प्रस्ताव रखा था परंतु अंबेडकर जी नें और देश की संविधान सभा ने उस प्रस्ताव को कभी स्वीकार नहीं किया।
अब देश की मोदी सरकार , बैक डोर से अपने पाश्विक बहुमत के सहारे देश के संविधान की मूल आत्मा को बदलना चाहती है और उसनें देश की नागरिकता को धर्म सापेक्ष करने की हिमाकत की है। देश की 130 करोड़ जनता उसको कभी स्वीकार नहीं करेगी।
देश के प्रधानमंत्री , देश के गृहमंत्री अथवा उनकी पूरी कैबिनेट तथा संपूर्ण भारतीय जनता पार्टी चाहे सीएए का विरोध करने वालों को कितना भी बुरा भला कहें या , उनको गालियां दे और या अपने झूठ का प्रचार झूठे मीडिया चैनलों से करवाएं।
देश में न्याय ही चलेगा।
यह देश सबका है ।
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ।
जो भी धर्म के आधार पर देश को बांटने की चेष्टा करेगा उसका हाल वही होगा जो हिटलर और मुसोलिनी का हुआ था
देश से कभी भी जनवाद खत्म नहीं किया जा सकता ।
देश का नौजवान और देश की महिलाएं और देश की आम जनता आज मोदी सरकार की नीतियों के विरुद्ध उठ खड़ी हुई है और इसका नतीजा विभिन्न असेंबली में हुए चुनाव में भी दिखाई दे रहा है।
वह दिन दूर नहीं है जब दिल्ली के चुनावों में भी मोदी जी की भारतीय जनता पार्टी की बुरी तरह हार होने वाली है । चाहे वह 5000 रैली या 100000 रेलिया करें।रैलियों में अपनी पूरी कैबिनेट को भी लगा दे । 
दिल्ली में मोदी की सरकार भारतीय जनता पार्टी और इनकी नीतियां हारने वाली है।
मैं दूर से तिरंगे के आशिर्वाद के साथ आज़ादी का नारा सुन रहा था।

घंटाघर की बहनों संघर्ष जारी रहे।

आपको सलाम।

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 संकलन-विजय माथुर

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Monday, 20 January 2020

बेटों का मन ------ डॉ मोनिका शर्मा

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 28 December 2019

ऐसे में सभ्य नागरिक समाज चुप कैसे बैठेगा ? ------ नवीन जोशी

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लोकतांत्रिक मर्यादा भी प्रशासन का दायित्व है
नवीन जोशी
भारतीय समाज कठिन दौर से गुजर रहा है। कठिन इस मामले में कि राजनैतिक-सामाजिक विचारों का जो द्वंद्व हमेशा सतह के नीचे रहता था, वह उग्र रूप में सतह के ऊपर निकल आया है। वैचारिक आलोड़न-विलोड़न में क्या दिक्कत थी यदि वह समाज के हिंसक विभाजन तक न पहुंचा होता। विचारों की विभिन्नता व्यक्तिगत-राजनैतिक द्वेष से भी आगे निकली जा रही है। वोटों की रोटी चूंकि इसी आग में सेंकी जा रही है, इसलिए वह शांत होने की बजाय उग्रतर हो रही है।

नागरिकता संशोधन कानून और नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर मतभेद अत्यंत स्वाभाविक हैं लेकिन उसकी अभिव्यक्ति हिंसक और जवाबी दमन में होने लगना बहुत चिंताजनक है। शासन का दायित्व है कि वह हिंसा रोके और हिंसा करने-भड़काने वालों से कानूनन सख्ती से निपटे। इसी में उसका यह गुरुतर दायित्व भी निहित है कि कोई भी निर्दोष उत्पीड़ित न हो।  शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को होने देना भी उसकी जिम्मेदारी है। 

हाल के विरोध–प्रदर्शनों, जिनमें दुर्भाग्य से बड़ी हिंसा भी हुई, के बाद शांति एवं सद्भाव के लिए सक्रिय लोगों के खिलाफ भी प्रशासनिक और पुलिसिया कार्रवाई किए जाने की खबरें मिल रही हैं। ऐसे आरोप भी बहुत लग रहे हैं कि पुलिस बदले की भावना से काम कर रही है। लखनऊ का ही उदाहरण लें तो कुछ मामले चिंता में डालने वाले हैं और पुलिस की भूमिका पर गम्भीर सवाल उठाते हैं।

पूर्व आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी और संस्कृतिकर्मी दीपक कबीर को उपद्रव भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा जाना अफसोसनाक है। और भी होंगे लेकिन कम से कम ये दो नाम ऐसे हैं जिन्हें समाज में शांति, सद्भाव और रचनात्मक जागरूकता का काम करने के लिए जाना जाता है। कोई नहीं मानेगा कि वे हिंसा भड़का रहे थे। बल्कि, हर अशांति के समय ये अमन कायम करने के लिए आगे आते रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों से इनकी रिहाई की लगातार अपीलें भी इसीलिए हो रही हैं।

चूंकि प्रदर्शनकारियों का सबसे पहला सामना पुलिस से होता है, इसलिए वही सत्ता के प्रतीक रूप मे सामने आती है। इसी कारण कई बार वह गुस्से और हिंसा की चपेट में आती है। उपद्रवी जानबूझकर पुलिस पर हमला करके शांति भंग करते हैं। उनकी पहचान और पकड़ जरूरी है। लेकिन इसके जवाब में  पुलिस बदले की भावना से काम करेगी तो निर्दोष ही मारे जाएंगे, जैसा कि अक्सर होता है। सुरक्षा बलों को धैर्य और संयम की परीक्षा देनी ही होती है। उनका बर्बर हो जाना खतरनाक है। 

ध्यान रहे कि कल का विपक्ष आज सत्ता में है तो कल फिर वह विपक्ष में होगा। तब क्या उसे लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन के अधिकार की आवश्यकता नहीं होगी/ यही पुलिसिया दमन तब उसके हिस्से आएगा, तो/ राजनैतिक दमन के लिए पुलिस और कानून का इस्तेमाल कितना खतरनाक होता है, हम पहले देख चुके हैं।

हिंसा फैलाने वालों से सख्ती से निपटने के निर्देशों का अर्थ यह हरगिज नहीं होना चाहिए कि पुलिस को मनमानी करने या शांतिपूर्ण विरोध व्यक्त करने वालों के दमन की छूट दे दी गई है। हिंसा न हो, यह देखना उसका दायित्व अवश्य है। इसके लिए उसके पास पर्याप्त अधिकार और कानूनी आधार हैं। इसकी आड़ में शांतिपूर्ण विरोध भी व्यक्त करने न देना, महिलाओं-बच्चों तक को पीट देना, गिरफ्तार कर लेना, धमकाना और तरह-तरह से आतंकित करना जारी रहेगा तो इसके विरोध में आवाजें उठनी चाहिए। ऐसे में सभ्य नागरिक समाज चुप कैसे बैठेगा, जबकि इसके लिए संविधान उसे संरक्षण और स्वतंत्रता देता है।


समाज को यह आश्वस्ति सरकार से मिलनी ही चाहिए कि उसके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित एवं सम्मानित हैं। 

http://epaper.navbharattimes.com/details/83371-81582-2.html


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 24 December 2019

मोहम्मद रफी साहब ( 24 December 1924 ) : उनकी पुत्रवधू की नज़र से

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Born: 24 December 1924, Kotla Sultan Singh
Died: 31 July 1980, Mumbai







 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 7 December 2019

स्त्री की योग्यता, उसका काम ही उसके चरित्र का पैमाना बने और समाज में उसे भी इंसान की हैसियत से आँका जाए ------ सारिका श्रीवास्तव

राजनेताओं के भद्दे बयान। सोशल मीडिया पर महिलाओं की हंसी उड़ाते चुटकुले-वीडियो-कार्टून। टीवी सीरियल्स और फिल्मों में महिलाओं की खराब छवि वाले चरित्रों की प्रधानता। प्रशासनिक अधिकारियों समेत पुलिस, वकील, डॉक्टर, शिक्षक इत्यादि का महिलाओं के प्रति संकीर्ण नजरिया। इन सबके साथ जहां दुनियाभर में महिला अंगों को इंगित करके दी जाने वाली गालियों की भरमार हो; ऐसे समाज में महिलाओं के और महिलाओं के लिए बेहतर हालात की कैसे उम्मीद की जा सकती है? और उस पर सामाजिक बुनावट पुरुष प्रधान हो तो मतलब— करेला और नीम चढ़ा।

जिस समाज में स्त्रियों का चरित्र उनकी योग्यता या काम के आधार पर न आँका जाता हो, बल्कि उनके चरित्र का पैमाना उनकी यौनिकता हो। उनका पहनावा, समय की पाबन्दी और धूम्रपान एवं नशीले पदार्थों का सेवन स्त्रियों के चरित्र के पैमाने हों उस समाज में महिलाओं की सामाजिक स्थिति बेहतर होगी, यह उम्मीद कैसे की जा सकती है?

जिस देश की करीब 60 फीसदी महिलाएँ केवल गृहिणी हों लेकिन लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में बराबरी का अधिकार रखने के बावजूद उनके द्वारा चुनी गई सरकार द्वारा अपने घरों में उनके द्वारा किए जा रहे काम को देश की आर्थिक व्यवस्था/नीति से बाहर रखा जाता हो, जिससे जीडीपी प्रभावित न हो और विश्व परिदृश्य के बाजार में घूम रहे पूंजीपति देशों को लुभाने के लिए देश की आर्थिक स्थिति का सूचकांक ऊपर दिखे और जब वे देश में इन्वेस्ट करें तो सत्तासीन सरकारें उस इन्वेस्ट का फायदा उठाकर अरबों रुपए डकार सकें। जहाँ प्रत्येक सत्तासीन सरकार का चरित्र भी संदिग्ध हो उस देश की आधी आबादी कही जाने वाली प्रजाति आखिर कैसे बेहतर स्थिति हासिल कर सकती है?

जिस समाज में आशाराम, गुरमीत रामरहीम, चिन्मयानंद, कुलदीप सेंगर, जस्टिस गोगोई जैसे लोग बेख़ौफ़ घूम रहे हों या संरक्षण प्राप्त कर रहे हों उस देश में महिलाओं की स्थिति कमतर या दोयम दर्जे की ही नहीं, बल्कि मापी ही नहीं जाएगी।

जिस देश की सरकार खुद न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा रही हो उस देश में आम जनता कैसे न्यायपालिका और उसकी कार्यप्रणाली पर यकीन कर सकती है?

जिस देश की सरकार सारी प्रशासनिक, सरकारी और स्वायत्त संस्थाओं तक पर काबिज हो, उन्हें अपने नियंत्रण में रख शिकंजा कसना चाहती हो, या उन्हें निजी संस्थाओं को सौंप देने पर आमादा हो, सरकारी संस्थाओं की शाख जानते-बूझते षड्यंत्र कर गिराई जा रही हो, उन्हें जानबूझकर निजी संस्थानों के समक्ष कमजोर किया जा रहा हो उस देश की संस्थाओं पर उस देश की ही जनता कैसे यकीन कर सकती है?

इन हालात में सरकार या सरकारी तंत्र जानबूझकर लोगों को उकसाता है। इस तरह के बयान, खबरों, वीडियो, पोस्ट को बढ़ावा दिया जाता, उन्हें विभिन्न तरीकों से वायरल कर जन-जन तक पहुंचाया जाता है जिससे जनता की भावनाओं को भड़काया जा सके। और जब भड़क जाए तो उसे दूसरी तरफ से हवा देकर हवा का रुख अपने मुताबिक कर आग के हवाले कर दिया जाता।

अभी तक केवल मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ इसका उदाहरण थीं। लेकिन अब प्रशासनिक गुंडे इन कामों को अंजाम देंगे। तेलंगाना के हैदराबाद में बलात्कार के चार आरोपियों का एनकाउंटर इसका पहला उदाहरण है।

आगे इस तरह की खबरें सुनने की आदत अब डाल लेना चाहिए। जब किसी भी घटना के आरोपी का एनकाउंटर आम बात होगी। असंतोष न भड़के और अवाम को बरगलाया जा सके, इसके लिए ऐसे एनकाउंटर होते रहेंगे। जब-जब खुद के स्वार्थ के लिए अवाम का उपयोग करना होगा इसी तरह के एनकाउंटर करके लोगों का ध्यान भटकाया जाएगा। और सबसे बड़ी और जरूरी बात जो भी इस सरकारी या सरकारी तंत्र का विरोध करेगा, या उसके खिलाफ जाएगा, जिससे इस सरकार को खतरा महसूस होगा उसका भी एनकाउंटर करने की घटनाओं का सामने आना भी कोई आश्चर्य न होगा।

बेहतर होता कि बलात्कार के इन चारों आरोपियों को फ़ास्ट ट्रेक के जरिए कानूनन सजायाफ्ता कर एक नज़ीर पेश की जाती। लेकिन ऐसा न हुआ। या यूँ कहा जाए कि जानते-बुझते ऐसा नहीं किया गया जिससे न्यायपालिका जैसी सर्वोच्च संस्था पर से लोगों का यकीन हट जाए। संविधान में दर्ज बात झूठी साबित हो और लोगों का संविधान पर से विश्वास उठ जाए। और ये संविधान को अपने अनुसार तोड़-मरोड़ सकें। जिससे यह फासीवादी सरकार संवैधानिक रूप से गुंडागर्दी करने की हकदार हो जाए।
यह बहुत ही खतरनाक शुरुआत है। इसका आगे अंजाम क्या होगा? यह आगे किस तरह का स्वरूप धारण करेगा? पुलिस इस हथियार का उपयोग किस हद तक करेगी? आम जनता वैसे भी पुलिस से डरती-सहमती थी अब यह ख़ौफ़ और बढ़ जाएगा।

उससे भी ज्यादा खतरनाक है लोगों का इस निंदनीय घटना के पक्ष में उत्साह के साथ आना। इस बहाव में अनेक वे भी बह गए जो बुद्धिजीवी होने के साथ ही साथ प्रगतिशील सोच भी रखते हैं। लेकिन बहुत सारे ऐसे युवा भी हैं जो अपनी दुनिया में रमे होने के बावजूद इस घटना की आग की गर्माहट से अपने को बचा नहीं पाए, आश्चर्यजनक तरीक़े से वे इस एनकाउंटर को गलत मान रहे हैं।

बहरहाल, इस सबसे स्त्रियों की बिगड़ी दशा और स्त्रियों के प्रति समाज की घिनौनी सोच को नहीं बदला जा सकता। हमें मिलकर यह सोचना होगा कि हम समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा किस तरह दिला सकते हैं।

किस तरह हम स्त्री को बाजार का खिलौना बनने या बाजार का माल बनने से बचा सकते हैं।

देश में महिलाओं के श्रम को मानव श्रम में किस तरह परिवर्तित कर सकते हैं जिससे उनका श्रम देश के आर्थिक आंकड़ों में दर्ज हो सके।

किस तरह स्त्री की योग्यता, उसका काम ही उसके चरित्र का पैमाना बने और समाज में उसे भी इंसान की हैसियत से आँका जाए।

जिस दिन हम इतना कर लेंगे बलात्कार या यौन उत्पीड़न जैसी घिनोनी घटनाएँ स्वतः ही कम होने लगेंगी और हम उम्मीद कर पाएंगे कि जल्द ही खत्म भी हो जाएंगी।

सारिका श्रीवास्तव
राज्य सचिव
भारतीय महिला फेडरेशन, मध्य प्रदेश

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