Tuesday, 20 August 2019

जिस भावनात्मक रौ में लोगों ने उन्हें वोट दिया उसके परिणामों के लिये भी तैयार रहना होगा ------ हेमंत कुमार झा

Hemant Kumar Jha
2 hrs
समस्या यह है कि भाजपा का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिससे पार्टी को प्रेरणा और वैचारिक ऊर्जा मिलती है, अपने आर्थिक चिंतन के लिये नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट सांस्कृतिक चिंतन के लिये जाना जाता है।

1925 में जब संघ की स्थापना हुई थी तो इसके प्रमुख लक्ष्यों में सांस्कृतिक मुद्दे ही थे। वह सांस्कृतिक कोलाहल का दौर भी था और संघ के घोषित लक्ष्य बहुत सारे लोगों को आकर्षित करते थे।

1951 में जब भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई तो इसे आरएसएस का राजनीतिक फ्रंट माना गया। लोगों से संवाद कायम करने में जनसंघ भी सांस्कृतिक पहलुओं पर ही अधिक जोर देता था। इसने संसद से सड़क तक इन मुद्दों के लिये अनेक अभियान चलाए। यद्यपि, बतौर राजनीतिक दल, इसके चिंतन के अपने आर्थिक पक्ष भी थे लेकिन इन मुद्दों पर कभी भी इसने प्रभावी बहसों का सूत्रपात नहीं किया। इसकी आर्थिक सोच की एक स्पष्ट झलक तब मिली जब बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स उन्मूलन का इसने मुखर विरोध किया था। राजे-महाराजाओं और जमींदारों की पार्टी कहे जाने वाले जनसंघ के लिये यह बहुत अस्वाभाविक भी नहीं था।

समान नागरिक संहिता, धारा 370 आदि तो इसके एजेंडा में थे ही, अखंड भारत का स्वप्न, जो संघ की आंखों में तैरता था, जनसंघ के नेताओं के लिये भी एक आकर्षक सपना था। अयोध्या विवाद में भी इसका अपना एक पक्ष था जो बाद के दशकों में इसके उत्थान में प्रभावी साबित हुआ।

अपने सांस्कृतिक पक्ष की वजह से जनसंघ को अन्य राजनीतिक दलों से अक्सर राजनीतिक अछूत का व्यवहार झेलना पड़ता था। यद्यपि, 60 के दशक में कुछेक राज्य सरकारों में इसे शामिल होने का मौका दिया गया था।

पहली बार इसे व्यापक वैधता मिली जयप्रकाश आंदोलन के दौरान, जब खुद जेपी ने इसे सर्टिफिकेट दिया और जनता पार्टी में शामिल किया।

संघ के राजनीतिक फ्रंट की स्वीकार्यता के लिये यह महत्वपूर्ण था कि जेपी ने इसकी अनुशंसा की थी, मोरारजी ने इसके सदस्यों को अपनी सरकार में शामिल किया था और चरण सिंह तथा चंद्रशेखर सरीखे नेता इसके सहयात्री बन गए थे।

अंतर्विरोध सामने आने लगे, जो आने ही थे। अंततः जनता पार्टी टूटी और जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ।

मूलतः सांस्कृतिक उद्देश्यों से परिचालित राजनीतिक दल को न्यूनतम औपचारिकताओं के निर्वहन के लिये अपना आर्थिक पक्ष भी रखना ही था।

तो..."गांधीवादी समाजवाद" के रूप में भाजपा ने अपना आर्थिक चिंतन प्रस्तुत किया। यद्यपि, 1980 के दशक में इस चिंतन की प्रासंगिकता और भाजपा के साथ इसके सामंजस्य पर बहुत सारे लोगों को संदेह था।

लेकिन, अटल जी ने इन विरोधाभासों को अपनी वक्तृता से झांप दिया। इस तरह, गांधी के साथ अपने को जोड़ कर स्वीकार्यता बढाने का यह एक उपक्रम मात्र था और भाजपा कभी अपने इस घोषित आर्थिक दर्शन के प्रति अधिक आग्रही नहीं दिखी।

लोकसभा में 2 सदस्यों से सत्ता तक के भाजपा के सफर में उसके आर्थिक चिंतन का कोई योगदान नहीं था। सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर ही यह जनता के पास गई और इस दौरान इसने जिन बहसों को जन्म दिया उनका लोगों की शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार आदि से कोई संबंध नहीं था।

जैसा कि इतिहास है, अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार पहले 13 दिन, फिर 13 महीने और उसके बाद एक पूरे कार्यकाल के लिये आई।

कैसे आई...इसके पीछे अनेक कारक थे। हिन्दी पट्टी के सवर्ण मध्य वर्ग का भाजपा के प्रति बढ़ते आकर्षण की पृष्ठभूमि में कांग्रेस के क्षय की भूमिका तो थी ही, दुनिया भर में आर्थिक उदारवाद के साथ राइट विंग की जुगलबंदी की भी अपनी भूमिका थी। यह एक समाज शास्त्रीय अध्ययन का विषय है कि हिन्दी पट्टी का सवर्ण मध्य वर्ग किस तरह आर्थिक मुद्दों की उपेक्षा कर सांस्कृतिक मुद्दों के प्रति आग्रही होता गया और इन आग्रहों ने किस तरह इस पूरे क्षेत्र में भाजपा की आधारभूमि को विस्तार दिया।

बहरहाल, सरकार बनी तो वास्तविकताएं सामने थीं। आर्थिक मुद्दों पर भाजपा को क्लियर स्टैंड लेना ही था जो इसने लिया भी।

गांधीवादी समाजवाद कहीं नेपथ्य में रह गया और भाजपा के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने मुक्त आर्थिकी की राह पर पूर्ववर्त्ती कांग्रेस सरकार से भी तीव्र गति से कदम बढ़ाने शुरू किये। पहली बार विनिवेश मंत्रालय का गठन किया गया और सरकारी/सार्वजनिक उपक्रमों की बोलियां लगने लगीं।

कामकाजी वर्ग के लिये लोकप्रिय और कवि हृदय प्रधानमंत्री का सबसे बड़ा तोहफा यह आया कि सरकारी नौकरियों में पेंशन का खात्मा हो गया।

अटल सरकार की आर्थिक नीतियों पर भाजपा के मातृ संगठन की कौन सी वैचारिक छाया थी, यह कभी समझ में नहीं आया।

हां, यह जरूर था कि जब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार विदेशी पूंजी के लिये रास्तों को आसान बनाती जा रही थी तो 'स्वदेशी जागरण मंच' नाम का संघ का एक आनुषंगिक संगठन 'स्वदेशी-स्वदेशी' की रट लगाते हुए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा था।

वैश्वीकरण की पृष्ठभूमि में मुक्त बाजार के अभियान के शोर में स्वदेशी का राग अप्रासंगिक तो था ही, हास्यास्पद भी था।

यही दौर था जब संघ के आर्थिक चिंतन की सीमाएं उजागर होने लगी क्योंकि उसका मानस पुत्र मुक्त बाजार का ध्वजवाहक बन गया था। विकास का 'कारपोरेट मॉडल' ही उसका अभीष्ट था और अपने मातृ संगठन की कोई प्रेरणा उसके साथ नहीं थी।

2004 में एनडीए की हार का एक प्रमुख कारण उनके 'इंडिया शाइनिंग' के नारे का पिटना ही था। यह इस बात का संकेत था कि उनकी आर्थिक नीतियां जनता की कसौटियों पर खरी नहीं उतरीं क्योंकि इसने समाज के विशिष्ट वर्ग की समृद्धि बढाने में तो योगदान दिया किन्तु आमलोगों की बेहतरी के लिये कुछ खास नहीं हो सका।

2014 में भाजपा की जीत की पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी का आकर्षण तो मुख्य था ही, यूपीए सरकार की बदनामियों और नाकामियों की भी इसमें बड़ी भूमिका थी।

पहली बार अपने दम पर सत्ता में आया संघ का राजनीतिक फ्रंट सांस्कृतिक मुद्दों पर तो उससे प्रेरणा पाता रहा, लेकिन आर्थिक नीतियों में कारपोरेट हितैषी बनने के सिवा उसके पास अन्य कोई रास्ता नहीं था। मोदी सरकार के आर्थिक चिंतन में कोई मौलिकता नहीं थी। कारपोरेट ने उन्हें लाने में महती भूमिका निभाई थी और उनके पूरे कार्यकाल में वह अपनी उस भूमिका की कीमत वसूलता रहा।

देश का आर्थिक स्वास्थ्य खराब होना ही था और यह नजर भी आना था, अगर हम देश की कसौटी पर सिर्फ उसके विदेशी मुद्रा भंडार या जीडीपी आदि के प्रायोजित आंकड़ों को न रख कर बेरोजगारों की विशाल संख्या को भी रखें, गरीबों की बड़ी आबादी को भी रखें, उनकी जरूरतों को भी रखें।

इसमें क्या आश्चर्य कि 2019 के आम चुनाव आते-आते देश के तमाम ज्वलंत आर्थिक मुद्दे नेपथ्य में चले गए और वाया पुलवामा, वाया बालाकोट, वाया पाकिस्तान भाजपा का राष्ट्रवाद मुख्य राजनीतिक मुद्दा बन गया।

संघ को और मोदी-शाह की जोड़ी को श्रेय देना होगा कि उन्होंने अपनी सफल रणनीतियों से और अथक परिश्रम से विमर्शों का रुख उस ओर मोड़ने में सफलता हासिल की जहां आर्थिक सवालों की कोई अहमियत नहीं रह गई और बेरोजगारी की त्रासद मार झेलता युवा वर्ग राष्ट्रवाद के बुखार से तपने लगा।

2019 के चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति की पतन गाथा के महत्वपूर्ण अध्यायों में शुमार किये जाएंगे जिनमें अर्थव्यवस्था की ऐसी- तैसी कर चुका प्रधानमंत्री पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट मांगते देखा गया, सत्ताधारी दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष बालाकोट की उस घटना के हताहतों के नाम पर वोट मांगते देखा गया जिस घटना के परिणामों की विश्वसनीयता ही संदिग्ध थी। यूपी-बिहार जैसे मैदानों में विपक्ष इतना कल्पनाशून्य और नाकारा नजर आया जिसके लिये जातीय समीकरण ही मुक्ति का एकमात्र मार्ग था।

बहरहाल, पहले से भी प्रचंड बहुमत से भाजपा जीती। यह संघ की दीर्घकालीन योजनाओं का सुचिंतित परिणाम तो था ही, मोदी-शाह की जोड़ी के उत्साह भरे राजनीतिक अभियान और अथक परिश्रम का नतीजा भी था। इस श्रेय से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता।

लेकिन, अर्थव्यवस्था तो व्यावहारिक चीज है और ठोस यथार्थ पर ही इसकी चुनौतियों से जुझा जा सकता है। तो...यथार्थ की इस भूमि पर सरकार की असफलता अब बड़े संकट का रूप ले चुकी है।

जब भारत के गृह मंत्री कश्मीर के लिए जान देने की बात कर रहे हैं, रक्षा मंत्री पीओके के सिवा कुछ और सुनने के मूड में अब नहीं रहने की घोषणाएं कर रहे हैं, प्रधानमंत्री कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को साधने में व्यस्त हैं, खबरें आ रही हैं कि ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल उद्योग से लेकर विनिर्माण सहित तमाम ऐसे क्षेत्रों में मंदी पांव पसार रही है जो बड़ी संख्या में रोजगार देते हैं। बैंकिंग सेक्टर में न सिर्फ रोजगार के अवसर सिकुड़ रहे हैं बल्कि यह स्वयं भी रुग्ण हो चुका है। दुनिया के अनेक बड़े अर्थशास्त्रियों के भारत संबंधी बयान डराने वाले हैं और हालात के निरंतर बदतर होते जाने की खबरों से सोशल मीडिया गूंज रहा है।

लेकिन, इस देश के सिर्फ कूढ़मगज लोग ही नहीं, पढ़े-लिखे लोगों का एक बड़ा वर्ग भी इन सच्चाइयों से मुंह मोड़ कर कश्मीर में मिली 'जीत' को सेलिब्रेट कर रहे हैं और अब उनकी आंखें अयोध्या की ओर देख रही हैं।

भाजपा ने कश्मीर और अयोध्या या ऐसे ही अन्य मुद्दों पर सदैव अपनी स्पष्ट राय रखी और आज अपनी सत्ता की दोपहरी में वह जो कर रही है उसका उसे पूरा राजनीतिक हक है।

लेकिन, सरकारों का मुख्य काम जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को हल करना है, उनके जीवन स्तर में बेहतरी लाना है, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में प्रभावी भूमिकाएं निभाना है।

लेकिन, लोगों ने इन सब कामों के लिये तो मोदी जी को वोट दिया ही नहीं था। जिस भावनात्मक रौ में लोगों ने उन्हें वोट दिया उसके परिणामों के लिये भी तैयार रहना होगा।

पता नहीं, पाकिस्तान को मोदी जी कितने सबक सिखा पाएंगे, लेकिन जो सबक इस देश के बेरोजगारों को अब सीखना है, बड़ी संख्या में रोजगार गंवा रहे कामगारों को सीखना है वह बहुत मार्मिक है। 
नौकरी गंवा कर घर लौट रहे लाखों पिताओं के छोटे-छोटे बच्चों को तो यह भी पता नहीं कि कितनी बड़ी विभीषिका से उनका परिवार दो चार होने वाला है और यह क्यों हो रहा है। वे जब बड़े होंगे तो इस दौर का बेहतर विश्लेषण कर सकेंगे कि उनके पिता की पीढ़ी ने ऐसी शक्तियों को सत्ता सौंपी थी जिनके पास कोई सार्थक आर्थिक चिंतन था ही नहीं जो उनके बचपन को और उनके भविष्य को संवार सकता।

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Sunday, 18 August 2019

सब ध्वस्त हैं : लूटतंत्र और तानाशाही के आगे ------ राजेश द्वारा जया सिंह

Jaya Singh
20 hrs

बनिया- बीजेपी और ईवीएम
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लंबा लेख हैं ,मेरे विचार हैं केवल जो सोच पे आधारित हैं
आपको संशोधन करने का हक है पढ़कर ।
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बात थोड़ी पुरानी हैं 
हम यहां छोड़ देते हैं हिंदू महासभा और जनसंघ को ..
बचपन था ,वो संयुक्त परिवार का दौर भी रहा..
अपने रूवाब ,अपने इलाके अपनी ही शोहरतें ,हर दो चार किलोमीटर दूर ऐसे परिवार अक्सर लगभग-लगभग सवर्ण समाज में होते ही थे लेकिन बैकवर्ड क्लास में भी होते थे ।
हमें याद है मेरे संसदीय क्षेत्र से बाबू जगजीवन राम जी कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ें थें ,हार जीत हम नहीं जानते न पढ़ना चाहते हैं ।
लेकिन बड़े बाबूजी मुखिया जी और उनके मझोले भाई यानि हम-सब जिन्हें छोटका बाबूजी कहते थे ,बूथ पे वोट देने गये थे,
मैं भी पीछे पीछे चला गया , चुनाव तो पता नहीं था लेकिन खेलने-कूदने ही गये थे ,
जब ये लोग वापस आ रहें थे तो हम भी चलें पीछे पीछे ।
ये लोग बात कर रहे थे 
अरे वो शुद्ध बनियों की पार्टी है ।
ये पूर्वजों की बातें थीं ।
हम शायद बीजेपी नाम नहीं जानते थे ।
हां इंदिरा कांग्रेस का नाम सुना था ,
वो दौर को कुछ दिनों बाद हम पढ़े , देखें या कहें तो समझें ।
सारे सवर्ण खासकर कांग्रेसी ही थे , और तो और दलित और मुस्लिम भी सोलह आने थे ।
या कहें तो अन्य सभी जातियां भी , कांग्रेस का ही वोटर होता था या प्रतिनिधि ।
यानि मेरे समझ से सभी जातियां कांग्रेस की थी ,
अगर पूरे देश में अगर वामपंथी को छोड़ दिया जाये तो बदलाव कांग्रेस के वोट में पहली दफा इंदिरा जी के आपातकाल से आया होगा,यानि कांग्रेस का वोट बिखराव हुआ होगा या कांग्रेस को चोट दिया होगा अपने वोटों से,
इस दौर में अपने अपने इलाके के अपना नेता पैदा हुआ होंगे ,या हुए ही ।
जब जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के रूप में बनी ,
कांग्रेस की एकरूपता ध्वस्त हुई थी एकाधिकार पे चोट लगे होंगे , फिर बहुत नेता निकले कांग्रेस से ,गये भी तो आये भी ।

फिर पूर्ण बहुमत से इंदिरा गांधी आती है , और 84 में मारी जाती है ।
देश की गद्दी पे राजीव गांधी आते हैं बहुत कुछ बदलाव कर जाते हैं ,
उसके बाद बोफोर्स तोप वाली माहौल लेकर वीपी सिंह आते हैं 
मंडल कमीशन लागू , और बीजेपी की कमंडल की बात ।
सरकार गिराई जाती है ।
फिर चंद्रशेखर जी .
आपातकाल से लेकर यहां तक जनता कांग्रेस से बंट चुकी थी 
या मोहभंग हो चुका था,
कांग्रेस को घृणित निगाहों से देखने लगे थे लोग ।
या कह सकते हैं आप धीरे-धीरे ही सही कुछ % जनता कांग्रेस से बिदकने लगे थे ।
खैर चुनाव के दौर थे राजीव जी मारे जाते हैं फिर कांग्रेस.
तबतक जनता दल के दौर ने कई क्षत्रप नेता तैयार किए ।
जिसका असर हरियाणा बिहार यूपी झारखंड पे पड़ा , उड़ीसा और पूर्वोत्तर के साथ दक्षिण में भी दमदार क्षत्रपो ने अपनी अपनी राज्यों की जमीनें पकड़ ली थी ।
खैर मेरी तहकीकात यूपी बिहार पे ही केंद्रीत है ।
यहां बिल्कुल नये ढंग से राजनीति परोसी गई जो जातिवादी थी ,
जातिवादी केंद्र की कांग्रेस सरकार भी थी तभी नकल इन यूपी बिहार के नेताओं ने किया ,
मैं सवाल दागना चाहता हूं यूपी बिहार के सत्ता पे काबिज नायकों से ..
क्या बिहार में लालूजी ने समाजिक न्याय के अनुरूप सत्ता चलाई ?
उनके दौर में साधु सुभाष कौन थे ?
ऐसे-ऐसे दो दर्जन जातिय नेता थे जो जहां थे समानांतर सरकार चला रहे थे अपनी अपनी,उनके सामने कानून और न्याय वही थे ।
क्या क्या तांडव नही किया गया ?
वगैरह-वगैरह...अनवरत ।
माननीय मुलायम सिंह जी ,क्या आपकी पार्टी समाजवाद ला सकी ?
एक ही घर से कितने सांसद मंत्री और अध्यक्ष बनाये 
पैसे के खेल नहीं हुए ,
लूट नहीं मचा, कमीशनखोरी नहीं चला ?
इनके दौर मे नंगा नाच हुए हैं 
फिल्मी दुनिया की सभी हिरोइनें सैफई में था था थैय्या करती थी ..
कौन था यूपी में इन सभी के सामने ।
क्या दोनों राज्यों में जातीय खेल नंगा नहीं खेला गया ?
लेकिन अब बड़ा गुंडा मिला दिल्ली में तो हाजिर हूं हूजूर ।
खैर समय हैं ।
हम सब (यानि सवर्ण )खुद पहले से मौजूदा जातिवादी थे वो भी घर घर से ,
हम तो कभी मान नहीं सकते कि फलां फलां जाति हमपे शासन करें ।
क्योंकि अपने अपने इलाके के हमसभी जातिवादी ही थे या कह सकते हैं वर्चस्ववादी ।
और अब कोई वश भी नहीं चलनेवाला था,
तो का करें ,वर्षो बीतते गए और हम कुंठित होते गए उदासीन होते गए ।
इसमें 89 से 2014 तक आप मान सकते हो कि हम उपेक्षित महसूस किए होंगे ,यही सभी ने सोचा होगा ।
अपने में हीनता भरते गये ,नौकरी,जाब पेशा,शिक्षा की अव्यवस्था हमें सीधे-सीधे चोट करती कि क्या ऐसा भी सरकारें प्रदेश में होनी चाहिए , नहीं नहीं ।
लेकिन आप नोट यह भी करो कि आपका वश नहीं चलता रहा ,
और हम लोकतंत्र में तो थे लेकिन खुद को ही हर जगह लोकतंत्र का ठेकेदार समझते रहें ।
धीरे-धीरे दबे कुचलो ने लोकतंत्र का मायने समझा ,जबकि पहले हम 35-40% वोट अपने लोगों का लेकर दिलवाते थे
व्यवहार वश या एक दूसरा रूप भी था इलाके का सौदागर थे वोट का दबंगई का ।
एक इशारे पे वोट खाने में गिर जाते थे ।
अपहरण, बलात्कार और लूट की घटनाएं, दिनदहाड़े हत्या या गैंग वार की घटनाएं बढ़ती रही ।
सरकारें निष्पक्ष नहीं रही , और तो और इन सरकारों ने कोई और वर्ग को जोड़ने की कोशिश नहीं की,
कोशिश की तो उस जाति के मनपसंद नेता को टिकट पकड़ा दिया और काम हो गया,ऐसे नहीं चलता कभी ,यह समझ मेरी हैं ,
अगर आप नेतृत्वकर्ता हैं तो जनता के बीच जाना होगा,समझना होगा और सहानुभूति बटोरने होंगे , लेकिन यह काम आज भी नहीं हैं यह दुखद है ।
आप जनसमस्याओं के सामूहिक मुद्दों को हो सके तो निदान करें ,
आपका कोई खास तो खास किसी तरह समझाकर बनाएं रहें ,
लेकिन अपने खास को खुश करने के लिए आम जनता से क्यो दूरी बनाते हों,ये तो राजनीति भी नहीं कहती ।
शायद यह यूपी बिहार हरियाणा झारखंड के अलग-अलग काबिज सत्ता पे नेता समझ नहीं पाये कि ऐसा आज 👈दौर भी आयेगा ।
इस दयनीय स्थिति में सवर्ण समाज मध्यमवर्गीय और सत्ता से वंचित वर्ग हताश निराश था ,उसे भी बोलने की जगह चाहिए थी भले वो दरवाजे के बाहर बोले ,सड़क पर बोले,बाजार में बोले जिले और राजधानी में बोले 
बोलने के लिए बीजेपी की बैनर सही लगी और सब समाहित हुए बीजेपी में ,
यह मुख्य कारण रहा बीजेपी स्वीकार करने की 🤳
लेकिन खोया कितना इसकी कल्पना ये सभी वर्ग आज भी वही कर सकते न मान सकते हैं ❗
आप विश्वास करोगे तो लोकतंत्र में तूम नहीं हो 👈
आप विश्वास करोगे तो संवैधानिक व्यवस्था में नहीं हो 👈
आप विश्वास करोगे तो मौलिक अधिकार तेरे छिन लिया 👈
आप विश्वास करोगे तो देश की अर्थव्यवस्था चौपट है👈
आप विश्वास करोगे तो न्यायालय भी पंगु हैं 👈
आप विश्वास करोगे तो चौथे स्तंभ गिरवी है 👈
आप विश्वास करोगे तो तेरे मत लूट लिया गया 👈
यह भी नोट करो कि भले तूम भाजपा के भक्त या फिर अंधभक्त ही हो सत्ता तेरे लिए नहीं है ,
जिसे तूम अपने अपने कौम का नेता मानते थे 
यहां तो आपकी आवाज दबी थी न, दिल्ली ने आपके नेताओं की आवाज दबा दी ❗
आप याद करो 84 में दो सीट वाले बीजेपी जनतदल के समय 82 पे आ टीका था ।
और अटल आडवाणी की बीजेपी में खुद का भविष्य या देश का भविष्य ।

फिर अपने बलबूते बीजेपी सरकार बनाती है अटल पीएम बनते हैं , अविश्वास प्रस्ताव में हारते हैं फिर चुनाव और पांच साल गुजारते हैं ।
यह क्रम चला ।
अटल जी ब्राह्मण समाज से थे और बुजुर्ग ब्राह्मण भी अटल में भविष्य देखता था तो उनके नौजवान क्यो न अपना भविष्य देखें ?
यह था सवर्ण समाज का झुकाव ..
फिर तो सभी झुकें.. 
आपको नोट करा दूं बनिया तो पहले से थे ही लेकिन ब्राह्मण, कायस्थ ,राजपूत यानि सभी सवर्ण जातियां भाजपा का मुरीद हो चुकी थी और हैं भी ❗
सवर्ण जाति का पैमाना मेरे समझ से कलम और दिमाग ही होता है ,
इसमे राजपूत चौथे स्थान पर आते हैं, 
फिर भी लठैत होने के नाते ई खुद को एक मान लेते हैं कि हम ही नंबर वन हैं ,या फिर बना दिया जाता हैं, फिर धीरे से उस्तरा चला कर इनका काम तमाम कर दिया जाता हैं ❗
पढ़ोगे समझोगे तो उतर यही मिलेगा हर जगह ❗
लेकिन हूं तो हूं ,ई ऐंठन अभी हैं ही ।
फिर भी सभी कुंठित लोगों ने भाजपा में अपना भविष्य सुरक्षित समझा और शामिल हुए गाहे-बगाहे ही सही लेकिन हुए ।
ई सब भी बोलने लगे ,नहीं अटल जी अच्छे हैं वगैरह-वगैरह
अरे मियां बीजेपी अटल जी की आज नहीं है ।
और संघ जैसे बड़े संगठन साथ हो और हिंदुत्व संबंधी सारी देश की दर्जनों संगठने साथ हो तो ...!
अटल जी के समय ही उपेक्षित , कुंठित सवर्ण बीजेपी से 
जुड़ गया था ।
बुरा न मानना क्योंकि अपने को उपेक्षित और कुंठित कह रहा हूं ।
हमें यह खेद हैं बिखरी कांग्रेस नरसिंह राव के दौर में और अभी मनमोहन सिंह जी के दौर में जनता पे पकड़ क्यो नही बना पाई ?
समय तो बहुत मिला , कांग्रेस सोनिया गांधी तक अटक गई
और अंदरूनी कांट छांट चलती रही ।
गुटबाजी और गिरोहबाजी चलती रही ।
कांग्रेस क्यो नही उन क्षत्रप नेताओं को पकड़ी या उन्हें आजादी देकर जनता-जनार्दन को कांग्रेस के खेमे में जोड़ने का काम दिया ?
इससे खुद कांग्रेस को क्या मिला ।
राव हो या मनमोहन सिंह ,इन दोनों के समय कांग्रेस पूर्ण बहुमत में भी नहीं रहा 
यूपीए वन यूपीए टू तो हमें याद ही है ।
तो संगठन में मजबूती क्यों नहीं ?
कांग्रेस में बड़े बड़े नेता बन चुके थे बिल्कुल राजा महाराजाओं जैसे..
जो जनता-जनार्दन के बीच में बैठना पसंद नहीं करते हों , केवल जनता ही उनके दरबार पे जाये और दरबार के लठैतो चमचो की दया हो तो भेंट हो अन्यथा नहीं ।
इससे आज पता चला होगा कांग्रेस को कि क्या खोया क्या पाया ।
मनमोहन सिंह की सरकार ने बहुत ही दमदार और जानदार कार्ययोजना चलाई देश के लिए देश की जनता के लिए , 
देश की अर्थव्यवस्था मजबूत किया जबकि विश्व में आर्थिक मंदी थी ।
फिर भी कांग्रेस जनता को पकड़ नहीं पाई 
और जनता समझ नहीं पाई ।
अब दौर रहा टीवी न्यूज चैनल, अखबार का जो रोज घोटाले रंग रोज रहें थे याह ओह वगैरह-वगैरह ।
दुनिया की सबसे अधिक आबादी युवाओं की यहां बन चुकी थी ,
सबके पेट भरने लगे थे ..!
शोशल मिडिया हाथ लग चुकी थी 
उसमें व्हाटसप ऐसा था जो सीधे-सीधे विष्णु भगवान लिखकर भेज रहें थें ब्रह्मा जी का आदेश ।
आकाशवाणी का दौर आप देखो हो या सुने हो 
रेडियो का युग , गांवों-कस्बों में इक्का दुक्का होता था और अगल बगल के लोग चिपककर सुनने के आ जाते थे 
फिर टीवी हुए कितने-कितने घरो में थे अरे रामायण महाभारत की सिरीयल . 
ठस ठस दरवाजा भर जाते थे गांवों में 
कनिया बहुरिया भी आ जाती थी देखने ..
यह सच माने लोग अधिक व्हाटसप पे ,जो लिखा हैं वो ब्रह्मा का लेख ही हैं ।
और हमने तो देखा है 
काफी पढ़े-लिखे लोगो को आज भी वही सच मानते हैं ।
संघ और बीजेपी ने मोदी को परोसा 
मोदी में हिंदुओं का आकर्षण क्यों ...
क्योंकि मोदी ही देश का एक ऐसा नेता हैं जो हिंदुओं के लिए हजारों हज़ार मुश्लिमों को गुजरात में कटवा कर फेंक दिया जला दिया ...
जबकि गोधरा में हिंदू जले पहले तो कौन जलाया,सीधा सा अर्थ हैं मुश्लिम
अरे भाई राजनीति में सत्ता के लिए कुछ भी संभव हैं ,
यहां तो घर के लोगों की भी बलि दी जाती है इतिहास नहीं पढ़े कभी का ?
यह मोदी की गुण हिंदुओं को आकर्षित करने का केंद्र बिंदु रही 
यही सच हैं न या कुछ और बताइयेगा ?
राम मंदिर,370 , रोजगार,कृषि लाभ ,शिक्षा स्वास्थ्य और और भ्रष्टाचार मुक्त भारत, काला धन हर गांव को मिलेगा वगैरह-वगैरह हर एक जरूरी वादों की फेहरिस्त लंबी फेंकी गई, पैसे के विज्ञापन होर्डिंग लगाए गए , हजारों हजार गाडियां ,टी शर्ट,टोपी झंडे बैनर पहनाएं गये ,
दिन-रात अच्छे दिन आयेंगे , और हर हर मोदी घर घर मोदी के बिगुल बजाए गये ।
सैकड़ों हेलीकॉप्टर आकाश से जमीन तक खड़खडाए गये,
लगभग-लगभग पचासों हजार करोड़ रुपए 14 की सत्ता आने के लिए कारपोरेट से चंदे और कर्ज लिए गए । 
और हम अपनी स्वविवेक ही सम्मान ही स्थिरता ही खो बैठे ।
यही नहीं इंसानियत भी भूल गए भगवा राज्य बनायेंगे
मुश्लिमो को पाकिस्तान भेजेंगे ।
ई मुल्ला वो मुल्ला .....!
मेरे समझ से लगभग सभी वर्गों के लोगों ने 14 के चुनाव में बीजेपी को वोट दिया है जाति व्यवस्था से ऊपर उठकर,
उसमें मुश्लिम बंधु भी कुछ अवश्य वोट दिये है .
यह एक जनता की आशा थी कि कुछ बदलेगा अबकी बार देश ..
क्या दौर था आप देखें ही होंगे ,मोदी की बुराई करने पे लगता था लोग मार देंगे आपको वो भी दर्जन भी इकट्ठा होकर हर चौक और चौराहे पर ।
शोशल मिडिया पे तो अच्छे से अच्छे लेखकों को गालियां भद्दी भद्दी दी जाती थी ,हमने भी पढ़ा है देखा हैं ये सब ।
आज कम तो हुआ हैं लेकिन फिर भी हैं 
लाखों लाख फेंक आईडी है 
जो इन सरकारों के इशारों पे वेतनमान युक्त आईटी सेल चल रही है ।
टीवी न्यूज चैनल मैनेज है 
कितने लेखक विचारक मारे गए 
फिर भी आज अनवरत हैं .
युवा तो होश में नही हैं आज भी जबकि उनका कीमती पांच साल इसी सरकार में गुजर गया 
पांच साल और में वे बीड़ी सिगरेट चाय पीना शुरू करेंगे 
फिर दारू ,जुऐ वगैरह-वगैरह।
देश की जनता को जो आज मिला हैं ,सवर्ण समाज और गरीब दलित को क्या मिला है , नौजवान को क्या मिला हैं 
जगजाहिर हैं नही तो वो खुद बतायेंगे ।
बसर्ते बीजेपी को सत्ता चाहिए थी वो मिल गई हैं
लेकिन वो सत्ता आम आवाम की नही है 
मात्र पूंजीपतियों की सरकार है
उनकी नीतियों पे काम करनेवाली सरकार हैं ।
यूपी बिहार की क्षेत्रिय पार्टियां टुट और बिखर चुकी है
अभी लालू यादव जी ने कहा हैं कि सभी को लेकर ही राजनीति की जा सकती है
लेकिन समय तो गुजर गया ..
तत्काल में सामने कांग्रेस ही हैं मात्र.
लेकिन कांग्रेस को अपना रवैया बिल्कुल बदलना होगा और नये शिरे से कांग्रेस का निर्माण करना होगा , क्योंकि आज देश बदल चुका है अब जातिवाद की समीकरण नहीं चलेगी सच्चे समाजवाद के तरफ आना ही होगा नहीं तो खैर नहीं रहेगी कांग्रेस की भी , वैसे वैसे नेता को कांग्रेस दायित्व दे जो जनमानस को साथ ले और जोड़े ।
जैसे पहले कांग्रेस देश को चला लिया वैसे अब देश कदापि नहीं चल सकता ,
माहौल और जनता दोनों बदल चुके हैं ।
आगे देखना यह है कि
जनता कब सड़कों पे आंदोलित होती हैं
अपना दल चुनती हैं अपना नेता चुनती है 
यह समय की बात होगी, फिलहाल कोई एक ऐसा नेता नहीं हैं विपक्ष में जो जनता का नेतृत्व करें या आंदोलित करें ।
हमारी मौलिक अधिकारों की हनन रोंके , लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की काम करें,
संवैधानिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने देने के लिए ही आवाज दे आवाज उठाएं...!
फिलहाल पुलवामा कराकर ईवीएम पर भारत सरकार इतरा रही है ।
अब नागालैंड और काश्मीर भी वोट है 
क्योंकि पांच राज्यों में चुनाव हैं ।
बाकिए सब ध्वस्त हैं ।
लूटतंत्र और तानाशाही के आगे ।
जय हिन्द जय भारत
राजेश ®️✍️
Rajesh Rajesh


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Wednesday, 14 August 2019

कश्मीर में आखिरकार पराजित हुआ लोकतंत्र ------ अनिल सिन्हा

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Anil Sinha
1 hr ( 14-08-2019 )
अगस्त, 1947 में जब पूरा भारतीय उपमहाद्वीप सांप्रदायिक नफरत की आग में जल रहा था, महात्मा गांधी कश्मीर गए तो उन्हें वहां रोशनी दिखाई पड़ी। 
लोगों की राय लिए बगैर विशेष तो क्या आम राज्य का दर्जा भी छीन लेना उनके अधिकारों पर आघात है। 
भारतीय लोकतंत्र की पराजय है, साथ ही उन कश्मीरियों की भी पराजय है जिन्हें लोकतंत्र में भरोसा रहा है।

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा अब इतिहास का हिस्सा हो चुका है। अनुच्छेद 370 को कमजोर करने और 35-ए को समाप्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर बाकी राज्यों से दर्जे में हर तरह से छोटा हो गया है। उसे केंद्र शासित राज्य बना कर सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि जम्मू-कश्मीर को भारत के एक सामान्य प्रदेश की हैसियत पाने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ेगा। सवाल है कि यह राजनीतिक घटना किसकी जीत और किसकी हार बताती है/ अगर निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो साफ हो जाएगा कि यह

कश्मीर का भारत में विलय धर्म आधारित द्वि-राष्ट्रवाद का नकार है। यह मुस्लिम लीग का सिद्धांत था और कांग्रेस ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। हिंदू और मुसलमान अलग कौमें हैं और मजहब राष्ट्र का आधार है, यह मान्यता हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों की थी। कश्मीरियों ने मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा, दोनों की बातों को खारिज कर दिया। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में चलने वाली मुस्लिम कांफ्रेंस तीस के उत्तरार्ध में नेशनल कांफ्रेंस में बदल गई थी। वह मुस्लिम लीग तथा हिंदू महासभा की सांप्रदायिक राजनीति के विपरीत सेक्युलर राजनीति को आगे बढ़ाने लगी। उसके आदर्श महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू थे। अगस्त, 1947 में जब पूरा भारतीय उपमहाद्वीप सांप्रदायिक नफरत की आग में जल रहा था, महात्मा गांधी कश्मीर गए तो उन्हें वहां रोशनी दिखाई दे रही थी। उनके प्रयासों से ही महाराजा हरि सिंह भारत से अपने संबंध मजबूत करने पर राजी हुए।

महाराजा हरि सिंह अंत-अंत तक जम्मू-कश्मीर को आजाद मुल्क बनाने के प्रयासों में लगे थे। वह भारत और पाकिस्तान दोनों से यथास्थिति बनाए रखने का समझौता करना चाहते थे। पाकिस्तान ने तो उनसे समझौता कर लिया लेकिन पंडित नेहरू ने ऐसा करने से मना कर दिया। भारत में विलय का फैसला महाराजा ने पाकिस्तान की ओर से कबायलियों के हमले के बाद ही किया। महाराजा के कारण ही कश्मीर का विलय बाकी रियासतों की तरह नहीं हो पाया और अनुच्छेद 370 जैसा प्रावधान इसमें जोड़ना पड़ा। अपने राज्य को स्वायत्तता मिले, इसके पक्ष में शेख अब्दुल्ला भी थे। सवाल उठता है कि सांप्रदायिक राजनीति से दूर रहने और एक सच्ची सेक्युलर संस्कृति होने के बावजूद कश्मीर की घाटी एक ऐसे दुष्चक्र में कैसे फंस गई कि वह उपमहाद्वीप का सबसे अशांत इलाका बन गई/ सच पूछा जाए तो यह भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास की दास्तान है।

कश्मीर में शेख अब्दुल्ला लोकतांत्रिक और सेक्युलर राजनीति के प्रतीक थे तो महाराजा हरि सिंह सामंती और सांप्रदायिक राजनीति के पोषक थे। उन्हें राज्य की महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति का लाभ मिला और पाकिस्तान की ओर जाने का भय दिखा कर वह बाकी रियासतों के मुकाबले अधिक अधिकार पाने में सफल रहे। उनके उत्तराधिकारी कर्ण सिंह कश्मीर के सदर-ए-रियासत बन गए। उन्हें सिर्फ कुछ मामलों में भारत सरकार के आदेशों का पालन करना होता था। राजपरिवार अपने अधिकारों के लिए भारत सरकार और कश्मीर सरकार, दोनों से सदैव सौदेबाजी करता रहा। कर्ण सिंह ने सदर-ए-रियासत का पद आजीवन अपने पास रखने के लिए भी कहा था। उन्होंने यह मांग भी रखी थी कि यह रायशुमारी हो जाए कि लोग डोगरा शासन चाहते हैं या नहीं।

राजपरिवार के संरक्षण में चलने वाले हिंदुत्ववादी संगठन प्रजा परिषद ने पाकिस्तान के साथ यथास्थिति के समझौते का समर्थन किया था। राजपरिवार को हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन हासिल था। नेशनल कांफ्रेंस की लोकतांत्रिक राजनीति से इस राजनीति का सीधा टकराव था। नेशनल कांफ्रेंस उपमहाद्वीप में हद दर्जे की प्रगतिशील राजनीति कर रही थी। धारा 370 से मिली स्वायत्तता के बल पर उसने जमींदारी उन्मूलन किया। कश्मीर ही भारत का अकेला राज्य है जहां हर किसान भूमि का मालिक है और कोई भूमिहीन नहीं है। अनुच्छेद 35-ए भी सरदार पटेल के प्रयास से अमल में आया ताकि कश्मीरी पाकिस्तान पलायन का रास्ता न अपनाएं और उनकी जमीन कोई और न ले सके।

लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति को आगे बढ़ाने में न तो भारत सरकार सफल हो पाई, न ही नेशनल कांफ्रेंस इसमें कामयाब रही। अपनी राजनीतिक आकांक्षाएं पूरी न होते देख कश्मीरी भारत में विलय को संदेह से देखने लगे। पार्टी तथा जनता के दबावों के सामने शेख के पास भी स्वायत्तता की मांग को समर्थन देने के सिवा कोई चारा नहीं था। नेहरू ने इस स्थिति का सामना लोकतांत्रिक राजनीति से करने के बजाय केंद्रीकरण और सरकारी दमन का सहारा लिया। शेख गिरफ्तार किए गए और फिर वहां एक के बाद एक ऐसी सरकारें बिठाई गईं जिन्हें जन-समर्थन नहीं प्राप्त था। वहां लंबे समय तक निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए। नतीजा यह हुआ कि प्रदेश की राजनीति में लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने और आतंकवाद तथा इस्लामिक कट्टरपंथ की ओर जा रहे युवाओं को रोकने की ताकत नहीं बची।


कश्मीरियत की सबसे बड़ी पराजय 1990 में हुई जब कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया और उन्हें अपने घर छोड़ने पड़े। मुद्दे का राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिकीकरण हुआ और इसका इस्तेमाल कश्मीरी मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए किया गया। कश्मीर की समस्या अनुच्छेद 370 और 35-ए नहीं थी। एक अर्से से वहां सरकारें रहीं पर कोई संवाद नहीं रहा। इन कानूनों को खारिज करने का काम भी बिना बातचीत के हुआ है। असल में इनमें परिवर्तन की इजाजत संवैधानिक प्रक्रिया में नहीं है। भारतीय संविधान पर कश्मीर के लोगों का भरोसा तभी वापस लाया जा सकता है जब देश में सांप्रदायिक सौहार्द का माहौल हो, कश्मीरियों के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल हों और उनकी राय को वजन दिया जाए।

https://www.facebook.com/anil.sinha.503/posts/10220197901043746



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 13 August 2019

नवउदारवादी शक्तियां मन्दिरवादी शक्तियों द्वारा अपना खेल खेल रही हैं ------- हेमंत कुमार झा

Hemant Kumar Jha
18 hrs
क्या 90 के दशक से शुरू हुआ मंडल आंदोलन अपनी मौत मर चुका है? क्या इस आंदोलन में वह ऊर्जा बाकी नहीं रही जो नए दौर के युवाओं को खुद से जोड़ सके? क्या इसके बरक्स खड़ा हुआ मंदिर आंदोलन इसे लील गया?

कभी राजनीति को गतिशीलता देने वाला मंडल आंदोलन आखिर स्वयं ही गतिहीन क्यों लग रहा?

ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढने की कोशिश में हमें उत्तर भारत की राजनीति की पतन गाथा के अनेक सूत्र मिलते हैं।

दरअसल, नेतृत्व का चरित्र आंदोलन की दशा और दिशा के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नेतृत्व के चरित्र का दोहरापन और उसकी वैचारिक दिशाहीनता आंदोलन को न सिर्फ कमजोर करती है बल्कि किसी घुन की तरह उसे खोखला कर देती है।

वरना...यह एक ऐसा आंदोलन था जिसकी वैचारिकता में भारतीय राजनीति, समाज और संस्कृति के प्रतिगामी मूल्यों से जूझने की ऊर्जा तो थी ही, सर्वग्रासी नवउदारवाद की नकारात्मकताओं से संघर्ष करने की क्षमता भी थी।

यद्यपि, इसकी शुरुआत मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद हुए राजनीतिक-सामाजिक उथल-पुथल से हुई, लेकिन अपनी व्यापकता में यह आंदोलन उन सिफारिशों से भी आगे की चीज था।

एक दौर आया...जब राजनीतिक और सांस्कृतिक उपेक्षा झेल रहे लोग मुखर होने लगे। वे अपनी मुखरता के साथ सड़कों पर निकलने लगे और सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उनके पास इस बार ऐसा आत्मविश्वास था जो अतीत में कभी नहीं था। जातीय पूर्वाग्रहों, समाज और राजनीति पर सामंती जकड़ के खिलाफ इतना मजबूत विरोध अतीत में कब सामने आया था यह इतिहासकार ही बता सकते हैं, सामान्य जन की स्मृति में तो ऐसा कोई अन्य उदाहरण शायद ही हो।

यद्यपि प्रत्यक्ष मुद्दा यही था, लेकिन यह आंदोलन महज सरकारी नौकरियों या आरक्षण तक सीमित नहीं रह गया था। यह सामाजिक रूप से वंचित जमातों का उस द्वंद्व में उतरना था जिसमें सामने ऐसी शक्तियां थीं जिनके साथ श्रेष्ठता बोध का अहंकार था, जो अवसरों पर अपने एकाधिकार को अपने श्रेष्ठता बोध से वैधता देते थे और जिनके साथ पारंपरिक रूप से संरचनात्मक शक्ति थी।

इतिहास 90 के दशक के इस द्वंद्व को भविष्य में बहुत गरिमा की नजर से देखने वाला है, भले ही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से शिक्षा ले रहे आज के युवा इसे समझने को भी तैयार न हों।

जो पीढ़ी स्वतंत्रता संघर्ष के बारे में नहीं जानती, उससे जुड़े मूल्यों को नहीं जानती वह मंडल आंदोलन के मूल्यों को समझने से इन्कार करे तो इसमें आश्चर्य कैसा?

मंदिर आंदोलन, जैसा कि अक्सर कहा जाता है, हिन्दू समुदाय को एकजुट करने का एक उपक्रम था क्योंकि, जैसा कि वे कहते हैं, मंडल आंदोलन के कारण समाज में जातीय विभाजन और विद्वेष बढ़ता जा रहा था।

जातीय आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ जब लोग आवाज उठाएंगे, अपने नैसर्गिक अधिकारों के लिये एकजुट होंगे और परंपरा से शक्तिसम्पन्न समुदायों से उनका द्वंद्व सतह पर आएगा तो माहौल में शहनाई की मधुर ध्वनि तो नहीं ही गूंजेगी। जो कोलाहल मचेगा उसमें कर्कशता की उपस्थिति स्वाभाविक है।

मंदिर आंदोलन को न सिर्फ सामंती शक्तियों का पुरजोर समर्थन मिला, जो इस उत्तर औद्योगिक दौर में भी खास कर गांवों में प्रभावी रही हैं, बल्कि उनके साथ वे नवउदारवादी शक्तियां भी एकजुट हो गईं जिनके व्यापक उद्देश्यों में मंदिर आदि का कोई अस्तित्व नहीं था।

नवउदारवाद के ध्वजवाहकों के लिये सांस्कृतिक श्रेष्ठता और हीनता की भावनाओं से भरा विभाजित समाज बेहद मुफीद रहता है जबकि समानता के लिये संघर्ष करने वाली शक्तियां उन्हें अपना दुश्मन नजर आती हैं।

समानता के लिये संघर्ष जब आगे बढ़ता है तो यह सामाजिक सीमाओं का अतिक्रमण कर आर्थिक मुद्दों पर भी अपनी राय व्यक्त करने लगता है। जाहिर है, मुक्त आर्थिकी के गलियारे से आती शोषक शक्तियां और उभरते नव ब्राह्मणों के लिये मंडल आंदोलन एक कांटा था जिसे निकालना ही था। तो...इनके लिये मंदिर आंदोलन एक नाव बन गया और अन्य सामाजिक-आर्थिक आंदोलन उस नाव में छेद के समान थे जिन्हें हर हाल में बंद करना था।

'डायनेस्टी' राजतंत्र की अनिवार्यता रही हो, लेकिन आंदोलन से निकल कर आकार लेती राजनीतिक पार्टियों के लिये यह अभिशाप साबित हो सकती है क्योंकि यह आंदोलन की ऊर्जा को कुंद करती है, उसके तेज को हर लेती है।

आंदोलनों की विचार यात्रा पारिवारिक विरासतों के नीचे दब कर जब अपना सैद्धांतिक तेज खो देती है तो बच जाते हैं बाढ़ के रेला के गुजरने के बाद सिर्फ रेत के निष्प्राण ढूह... जो भले ही कितने भी ऊंचे हों, उनमें वह प्रेरक शक्ति नहीं होती जो मार्गों को आलोकित कर सके, नए मार्गों का अन्वेषण कर सके।

मंडल आंदोलन, जिसे महज संयोगवश यह नाम मिला क्योंकि मंडल आयोग के लागू होने के बाद कोलाहल भरे माहौल में ही यह परवान चढ़ा था, बाहरी तौर पर जातीयता से ग्रस्त नजर आता था। लेकिन, अगर यह अपनी नैसर्गिक विचार यात्रा पर चलता रहता तो समय के साथ इस पर से जातीयता का रंग उतर जाता और गरीब सवर्ण युवाओं का साथ और समर्थन भी इसे मिलता।

उत्तर भारत में वामपंथी दलों की जमीन इस आंदोलन के कारण यूं ही नहीं खिसक गई। यह कहना मुद्दे को सरलीकृत करना होगा कि महज जातीय विभाजन के कारण वामदलों के वोट मंडल आधारित पार्टियों को मिलने लगे।

दरअसल, अपने प्रारंभिक दौर में मंडलवादी पार्टियों की वैचारिकी में नवउदारवाद के खिलाफ संघर्ष की चेतना के दर्शन होते थे। यह उत्तर भारत के वामपंथ से आगे की राजनीतिक यात्रा थी जिसमें जाति का नाम लेकर सत्य से जूझने का मनोबल था। कोई कृत्रिमता नहीं, कोई छद्म नहीं। यही सहजता एक दिन उन्हें तमाम वंचित समुदायों का नेतृत्व प्रदान कर सकती थीं क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण युवाओं का बड़ा वर्ग तब भी नेतृत्व विहीन था, आज भी नेतृत्व विहीन है।

लेकिन, विचार सम्पन्न आंदोलन से निकली पार्टियों ने सबसे पहले जो चीज खोई वह थी वैचारिकी...जो उनकी स्वीकार्यता को व्यापकता और गहराई दे सकती थी।

मन्दिरवादी शक्तियां आज राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हैं और उनकी आड़ में नवउदारवादी शक्तियां खुल कर अपना खेल खेल रही हैं। जिनके हाथों की तख्तियों पर शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार के नारे लिखे होने थे, उन वंचित समुदाय के युवाओं के हाथों में त्रिशूल और तलवार हैं जिसका प्रदर्शन रामनवमी और शिवरात्रि के जुलूसों में करके वे मुदित हैं। जिनके कंधों पर प्रतिगामी सांस्कृतिक मूल्यों की लाशें होनी थी, जिन्हें किसी बियाबान में फेंक कर उन्हें उनसे मुक्त होना था, उनके कंधों पर कांवड़ हैं और भांग, गांजा आदि के नशे में धुत हो वे कल्पित परलोक सुधारने को व्यग्र हैं...इहलोक की आपराधिक उपेक्षा करते हुए।

https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2298788580229042

Wednesday, 7 August 2019

संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार गंवा कर अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे ------ हेमंत झा

Hemant Kumar Jha
इस देश के 18 से 35 वर्ष के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है? क्या कश्मीर? या राम मंदिर? या पाकिस्तान...?
या...उच्च शिक्षा में वंचित समुदाय के युवाओं के लिये घटते अवसर? रोजगार के घटते अवसर? अंध निजीकरण? श्रमिक अधिकारों पर लगातार हो रहे सुनियोजित हमले?

जाहिर है, सैद्धांतिक जवाब तो यही होगा कि शिक्षा और रोजगार युवाओं के लिये सबसे बड़ी समस्या हैं जो हाल के दिनों में और गम्भीर हुई हैं।

लेकिन...गौर करने वाली बात यह है कि इस देश की सरकार ही नहीं, स्वयं युवा वर्ग इन समस्याओं को लेकर कितने संवेदनशील हैं।

बीते एकाध महीने में कई मुद्दे सतह पर आए हैं। नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित प्रारूप, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, तीन तलाक, रेलवे का निजीकरण, कश्मीर में धारा 370...आदि।

अपने आप में हर मुद्दा अहमियत रखता है। लेकिन, मायने यह रखता है कि किस मुद्दे पर लोगों की कैसी प्रतिक्रिया रही। किस मुद्दे पर बहस कोलाहल में बदल गया और किस मुद्दे की कोई खास चर्चा तक नहीं हुई?

सड़कों, चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक तीन तलाक पर जितनी बहसें हुईं, पाकिस्तान पर जितनी बातें होती हैं, अभी धारा 370 पर जितनी बहसें हो रही हैं, उनकी तुलना में नई शिक्षा नीति, नेशनल मेडिकल कमीशन, निजीकरण आदि पर कितनी बहसें हुईं?

अभी, जब लोग कश्मीर मुद्दे को लेकर इस तरह उछल रहे हैं जैसे कोई जीत मिली हो ठीक उसी वक्त सूचनाएं आ रही हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2 लाख नौकरियां खत्म हो गई हैं, रेलवे के निजीकरण वाया निगमीकरण के विरोध में रेलवे कर्मचारियों के संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल में ग्रामीण क्षत्रों को झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे करने की बातें हो रही हैं, मेडिकल शिक्षा को निम्न आय वर्ग तो क्या, मध्य वर्ग के प्रतिभाशाली युवाओं से दूर किया जा रहा है।

लेकिन, जीवन से जुड़े मुद्दों की कहीं कोई खास चर्चा नहीं।

जब अपने कॅरिअर, अपने भविष्य को लेकर युवा ही संवेदनशील नहीं हैं तो व्यवस्था क्यों संवेदनशील हो? सत्ता के लिये युवा वर्ग ही सबसे बड़ी चुनौती होता है इसलिये इस वर्ग को दिग्भ्रमित बनाए रखने के लिये सत्ता-संरचना हर सम्भव कोशिश करती है।

अंध निजीकरण युवाओं के भविष्य पर सबसे बड़ा आघात है। उच्च शिक्षा का कारपोरेटीकरण निम्न आय वर्ग के युवाओं के भविष्य को अंधेरों में धकेल देगा, इकोनॉमिक स्लोडाउन के कारण नौकरियां तो खत्म हो ही रही हैं, नई नौकरियों का सृजन भी नहीं हो रहा। इस आर्थिक दुर्व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार युवा वर्ग ही है।

वास्तविकता यह है कि रोजगार के क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मची हुई है।

लेकिन, आश्चर्य है कि इन मुद्दों को लेकर कहीं बहस नहीं, जबकि कोलाहल होना चाहिये था, आंदोलन होना चाहिये था।

फिलहाल, कश्मीर का झुनझुना है। पहले मंदिर झुनझुना था। ऐसे ही कई तरह के झुनझुने हैं। झुनझुने बदलते रहते हैं लेकिन उनकी आवाज वैसी ही रहती है। ऐसी आवाज...जिसमें अजीब सा नशा है। ऐसा नशा...जिसमें न अपना जीवन सूझता है, न अपना भविष्य सूझता है, न बाल बच्चों का भविष्य सूझता है।

इन संदर्भों में हम बीते सौ वर्षों की सबसे अभिशप्त पीढ़ी हैं...जो अपने बाप-दादों के अथक संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार तो गंवाते जा ही रहे हैं, अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे हैं।
साभार : 
https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2290223617752205

Friday, 26 July 2019

जनतान्त्रिक संस्थाओं के ह्रास का दुख अधिसंख्य जनता को नहीं ------ कनुप्रिया

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कनुप्रिया
8 hrs
संघर्ष से प्राप्त RTI का संशोधन बिल राज्यसभा में भी पास हो गया.

दरअसल बरसो की ग़ुलामी से आप छुटकारा भी पा लें तब भी ग़ुलाम मानसिकता ख़त्म नही होती. भारत मे लोकतंत्र राज्यशाही से लड़कर लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई करके नही आया, बल्कि अंग्रेज़ो की सत्ता से लड़ाई के बाद ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की नक़ल की तरह आया, हमे संविधान सभा का शुक्र गुज़ार होना चाहिये कि भारत के लिये जरूरी लोकतांत्रिक मूल्यों को उसने संविधान में समाहित कर लिया और देश की ग़ुलाम जनता जो चाहे अंग्रेज़ो की ग़ुलाम थी, चाहे हिन्दू मुग़ल राजाओं की, उसे लोकतांत्रिक अधिकारो का अहसास कराया.

मगर क्या जनता वाक़ई बिना संघर्ष के पाए इन लोकतांत्रिक अधिकारो के लिये तैयार थी?

मोदी की बढ़त बताती है कि हम आज भी एक राजा, एक शासक ढूँढते हैं जिसके भीतर सारी शासकीय शक्तियाँ केंद्रित हों, वो राजा अच्छा है या बुरा जिरह इस बात की है, तर्क इस बात पर हैं कि मोदी कैसे हैं, देश मे किस तरह लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास होकर जनता प्रजा होती जा रही है इस बारे में नही. मोदीभक्त एक मित्र ने कहा था आज हमें एक अच्छे तानाशाह की ज़रूरत है, उसके बाद सारी बहस इस बात की रह गयी कि मोदी नही तो कौन. देश को एक बेहतर लोकतांत्रिक राज्य होना चाहिये ये बात ही नही रह गई.

तब सवाल उठता है कि क्या बिना ज़रूरी संघर्ष के पाए इन लोकतांत्रिक अधिकारों को वाक़ई भारतीय जनता समझ नही पाई, जैसा चर्चिल ने अपने अपमानजनक बयान में भारतीयों के लिये कहा था? अलग अलग राजशाहियों से निकले हम लोग क्या हम वाक़ई एक डेमोक्रेटिक स्टेट के लिए तैयार नही थे?

चर्चिल की भविष्यवाणी आज कुछ हद तक ठीक होते देख रही हूँ, लोकतांत्रिक संस्थाओ के केंद्र सरकार के अधीन होते जाने से जिस प्रकार की राजशाही जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है उसका दुःख अधिसंख्य जनता में कमोबेश कहीं नजर नही आता तो मन मे यही बात आती है कि जनता में लोकतांत्रिक अधिकार सत्ताहस्तांतरण के स्वाधीनता संघर्ष के साथ मिले हुए संविधान सभा का तोहफ़ा भर थे, जिसे शुरू के लीडरों ने अपने तईं सम्भालने की भरसक कोशिश की, मगर बतौर जनता बिना उन अधिकारो के प्रति जागरूकता, समझ और संघर्ष के हम उन्हें सहेज नही पाए, राजशाही और सामंतवाद की ग़ुलामी अब भी रोगाणुओं की तरह हमारे भीतर पड़ी है जो कभी भी बड़ी बीमारी बनने की क्षमता रखती है.

महज वोट देना लोकतंत्र है तो हम वाक़ई सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, इससे अधिक कुछ नही.

https://www.facebook.com/kpg236/posts/2937134212979740









 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

वैचारिक असहमति कैसे देशद्रोह हो सकती है ------ महुआ मोएत्रा

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 24 July 2019

चाँद के अज्ञात क्षेत्र की ओर चंद्रयान -2 ------ राहुल लाल

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 23 July 2019

राज्यपाल द्वारा आतंकियों को संदेश

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21-07-2019 





जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, ''यह शख्स जो एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं, एक संवैधानिक पद पर हैं, आतंकियों से कह रहे हैं कि जो भ्रष्ट नेता हैं उसे मार डालो. ऐसे शख्स को गैरकानूनी हत्याओं और कंगारू अदालतों के बारे में बात करने से पहले पता होना चाहिए कि उनके बारे में दिल्ली में क्या राय है.''


(वह ऐसे ही बोलते रहे हैं । 23 जनवरी को मनाए जाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर मेरठ के कार्यक्रम में बोलते हुये प्रतिवर्ष वह कहते थे --- ' अब तक के तीनों प्रधानमंत्रियों पर नेताजी की उपेक्षा के लिए मुकदमा चलाना चाहिए । ' मतलब नेहरू, शास्त्री और इंदिरा गांधी पर। एक वर्ष आयोजकों ने ललिता शास्त्री जी को भी बुला लिया था उनके सामने सिर्फ नेहरू जी व इन्दिरा जी का नाम लिया और ललिता जी को माताजी कह कर संबोधित किया था। फिर अगले वर्ष से तीनों प्रधानमंत्रियों का नाम लेने लगे।) 











 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश