Wednesday, 31 October 2018

सीने में जलन - ज़हरीली हवा : शर्म या गर्व

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 28 October 2018

टीपू सुल्तान का त्रावणकोर पर आक्रमण अन्याय समाप्ती के लिए था ------ अनीता संजीव

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 27 October 2018

हाशिये पर औरत - मर्द की बराबरी का मुद्दा ------ अनिल सिन्हा

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 22 October 2018

रावण - दहन प्रथा खत्म करें राष्ट्रपति ------ स्वामी अधोक्षजानन्द देव,पुरी शंकराचार्य

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 राष्ट्रपति महोदय से  स्वामी अधोक्षजानन्द देव,पुरी शंकराचार्य द्वारा रावण - दहन प्रथा खत्म करने की मांग सर्वथा उचित , सराहनीय व समर्थनीय है। 
रावण प्रकांड विद्वान और प्रवासी आर्य शासक था। उसे दसों दिशाओं यथा --- पूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण,ईशान ( उत्तर - पूर्व ),आग्नेय (दक्षिण -पूर्व ),वावव्य ( उत्तर -पश्चिम ),नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम ),आकाश (अन्तरिक्ष )और पाताल (भू- गर्भ ) का विस्तृत ज्ञान रखने के कारण दशानन कहा गया था । रावण का पुतला दहन करने वाले दस सिर लगा कर अपने अज्ञान का ही प्रदर्शन करते हैं , हाँ ऐसे मेले - तमाशों द्वारा व्यापारियों और ढ़ोंगी पुजारियों का अर्थ - लाभ जरूर हो जाता है। 
रावण ने प्रवासी आर्यों ऐरावण और कुंभकरण के सहयोग से मूल आर्य देश भारत को घेरने का जो प्रयास किया था उसे ध्वस्त करने हेतु राम को वनवास के माध्यम लंका के शासक रावण से युद्ध करना पड़ा था। कूटनीति के द्वारा सीता को लंका में पहले ही प्रविष्ट करा दिया था जो रिंग ट्रांस मीटर के जरिये वहाँ की सूचनाएँ राम के पास भेजती रहती थीं। एयर मार्शल ( वायु - नर  जिसका अपभ्रंश वानर हो गया ) हनुमान लंका की फौज और खजाना उन सूचनाओं के आधार पर ही अग्नि बमों द्वारा नष्ट करके लौटते मे  वह रिंग ट्रांसमीटर  सीता से लेते आए थे। 
राम - रावण युद्ध साम्राज्यवाद के विरुद्ध जन - संघर्ष था लेकिन आज राम के नाम का दुरुपयोग साम्राज्यवाद को शक्तिशाली बनाने के लिए किया जा रहा है। 
दशहरा पर्व राम द्वारा पंपापुर की राजधानी किष्किंधा से लंका की ओर प्रस्थान करने की यादगार के रूप में था इस दिन रावण - दहन की प्रथा ही अप्रासांगिक है। अतः स्वामी अधोक्षजानन्द देव जी द्वारा रावण - दहन बंद करने की मांग बिलकुल जायज है। 




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 21 October 2018

दशहरा ट्रेन हादसा : कारण टाप लाईट का बंद होना ------ अभिसार शर्मा

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 20 October 2018

फिल्मी गीतों ने बढ़ाया है - मर्दवाद ------ मुकुल श्रीवास्तव

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 14 October 2018

Sorry, Malika Dua, your father is also one who belongs to the hall of shame. #MeToo ------ Nishtha Jain

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Nishtha Jain
14-10-2018 

It was June 1989. I still remember the day because it was my birthday. There was extended family at home and mom was preparing for a little celebration in the evening. I was a recent graduate from Jamia Mass Communication Centre. I put on my favourite saree and left home with a fair amount of confidence for a job interview with a famous TV personality who had had a very popular show called Janvani. He was starting a new gig. It was supposed to be a political satire and I was interested. I was greeted with his typical sardonic smile. Before I could settle down he began telling a lewd sexual joke in that soft voice, barely opening his mouth. I don't remember the joke but it wasn't worth a laugh, just dirty. I felt hot in my face and I sat there most probably with an angry look. He explained the job and asked me what my expectations were and I quoted an amount that most graduates were getting at the time - 5,000 rupees. He looked at me and said, 'Tumhari aukat kya hai?' I dont know what had hit me. I was stunned. What was this about? I had faced sexual harassment early in life but this sort of humiliation was a new experience. By the time I reached home I was in tears. My birthday was ruined. I did tell my brother and friends about it. Soon after, I got a job as a video editor in Newstrack. I don't know how this man learnt about it. He had friends in my office who would inform him when I would be working late. One night as I came down to the parking, he was there. He said, he wanted to talk to me and asked me to enter his car - a black SUV/Jeep, I don't remember the make as I'm not into automobiles. Assuming that he wanted to apologise for his behaviour, I entered the car but before I could even settle down he began slobbering all over my face. I managed to get out and get into my office car and leave. I spotted him again in the parking in the coming nights and would go right back and wait till someone was ready to leave along with me in the office car. After a few days he stopped stalking me. The man was Vinod Dua. When I read about his outrage against Akshay Kumar's sexist words to his daughter Malika Dua, I said to myself he's obviously forgotten that he was no less sexist, no less misogynist, no less creepy a sexual harasser, potential rapist. If he did to me, I'm sure he would have done it to other women. Today, he does programmes explaining the world what constitutes sexual harassment. He should stop everything and look into his own shady past. I saw him on a thread which was expressing outrage the false accusations against Varun Grover. I could see what his mind was cooking up when stories against him spill out. I won't be surprised if he denies. He's always been an opportunist. Sorry, Malika Dua, your father is also one who belongs to the hall of shame. #MeToo.
https://www.facebook.com/nishthajain.216/posts/10156830464504680


   



संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 10 October 2018

समाज को तनु श्री की बात गंभीरता से सुननी चाहिए ------ शिवानी त्रिवेदी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 6 October 2018

गौरव गुलाटी, एडवोकेट ने महिला आयोग में नाना पाटेकर की की शिकायत

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   संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 4 October 2018

पत्रकार होने का मतलब गलती करके धमकाना नहीं होता ------ रौशन झा

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 3 October 2018

क्या नैतिकता और वैधानिकता परस्पर विरोधी खेमा हुए ? ------ वी एन राय

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03 10 2018 09:13:42 AM



योगी शासन में यह घालमेल सरकारी नीति के झीने परदे से संचालित किया जा रहा था जिसे विवेक तिवारी हत्याकांड की ‘विशिष्टता’ ने अब ऐन खुले में नंगा कर दिया

पूर्व आई पी एस वी एन राय का विश्लेषण :

अरसे से उत्तर प्रदेश की राजनीति में बिगड़ी हुयी कानून व्यवस्था की स्थिति लाचार पवित्र गाय वाली रही है। हाल के मुख्यमंत्रियों में मायावती ने इसे दुहा, अखिलेश यादव ने इसे चारा खिलाया और अब योगी आदित्यनाथ इसे ‘विधर्मियों’ से बचाने के संकल्प में जुटे हैं। यानी जिसकी जैसी राजनीति उसकी वैसी ही कानून व्यवस्था के नाम पर रणनीति!

इस क्रम में, लखनऊ के विवेक तिवारी प्रकरण ने रोजमर्रा के दो सम्बंधित मुद्दों को और ज्वलंत करने का काम अंजाम दिया है- एक मुद्दा है, पुलिस की औपनिवेशिक जड़ों का और दूसरा, सत्ता राजनीति के जातिवादी मंचन का।

न ये मुद्दे नये हैं न समाज के लिए इनका घातक होना। लेकिन योगी के राज में इनमें नये मारक आयाम जुड़ गये हैं। सत्ता के जातिवादी प्रोफाइल का पुलिस के सामंती चरित्र से अघोषित घालमेल तमाम सरकारों में कमोबेश दिखता रहा है; योगी शासन में यह घालमेल सरकारी नीति के झीने परदे से संचालित किया जा रहा था जिसे विवेक तिवारी हत्याकांड की ‘विशिष्टता’ ने अब ऐन खुले में नंगा कर दिया।

प्रदेश में सत्ता सम्हालते ही घोषित हो गया था कि योगी ने कानून व्यवस्था में सुधार के प्रश्न को, एकमात्र पुलिस की सामंती दबंगई से जोड़ने का रास्ता चुना है- एनकाउंटर प्रणाली को, वह भी पिछड़ो के एनकाउंटर को, इसकी स्वाभाविक प्रशाखा कहा जाएगा। उत्तर प्रदेश, अस्सी के दशक में, वीपी सिंह के मुख्यमंत्रित्व में भी एनकाउंटर के खुले खेल का एक सीमित दौर देख चुका है और उसकी असफल परिणति को भी।

ताज्जुब नहीं कि योगी की शातिर राजनीतिक बनावट में इस असफलता से सबक लेने की जरूरत नहीं रही हो। भाजपा का मुसलमानों, यादवों और चमारों का राजनीतिक बहिष्कार, सहज ही योगी के ‘ठोक दो’ का भी चेहरा बनता गया है। ऐसे में राजनीतिक विरोधी, नागरिक संगठन, मानवाधिकार आयोग और न्यायपालिका भी योगी सरकार के एनकाउंटर सैलाब के सामने विवश लग रहे थे कि अचानक विनीत तिवारी हत्याकांड का भस्मासुर उसके सामने आ खड़ा हुआ।

भस्मासुर को कैसे छलावे से रोकते हैं, इस पौराणिक पहेली को हल करना एक महंत मुख्यमंत्री और सवर्णवादी भाजपा से बेहतर कौन जानेगा। लिहाजा, पीड़ित परिवार को अप्रत्याशित रूप से भारी मुआवजा और उनकी जातीय-वर्गीय घेरेबंदी की कवायद देखने को मिली! डीजीपी का हत्या-पीड़ित परिवार को संबोधित ताबड़तोड़ माफीनामा भी!

दुर्भाग्य से राज्य शासन और पुलिस प्रशासन ने, स्वयं उनके मानदंडों पर भी उन्हें शर्मसार करने वाले इस प्रकरण से कुछ नहीं सीखा है। आजमगढ़ से अलीगढ़ तक अपराध की रोकथाम के नाम पर करीब सौ लोगों की हत्या, योगी के डेढ़ साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश पुलिस कर चुकी है जबकि इनमें से एक भी मामले में स्वतंत्र जांच नहीं की गयी।

यहां तक कि विनीत तिवारी मामले में भी, जहां वे गलती स्वीकारने का ढोंग कर रहे थे, अपराध की छानबीन से छेड़छाड़ की गयी। डीजीपी का माफीनामा भी, जो पुलिस को नैतिक उपदेश देने तक सीमित है, पूर्णतया गैरकानूनी एनकाउंटर संस्कृति के चलन पर एकदम खामोश है। क्या नैतिकता और वैधानिकता परस्पर विरोधी खेमा हुए?

दरअसल, औपनिवेशिक निर्मिति से संवैधानिक निर्मिति की यात्रा का पहला निर्णायक कदम उठाने से भी हमारी पुलिस अभी कोसों दूर है। विवेक तिवारी हत्याकांड पर अपनी पहली टिप्पणी में मैंने कहा था-

Our police leaders refuse to appreciate a simple crucial factor that it is the integrity of their law and order protocols that matters and not just the individual integrity of police persons alone. When your professional orientations are flawed any amount of moral lecturing will have little impact on the outcome.

To start with, blatant authorisation of checking, questioning and arrest by police without quantifiable basis needs to be curbed urgently. They do not require any constitutional amendment to adapt to this absolute minimum standard of accountability. They do need serious training in Constitutional Conditioning and commitment in Community Policing though.

Stop immediately the ongoing drive of moral policing the society, under the guise of controlling anti-social elements. Police’s cause will be best served when their working protocols strengthen the society!


पुलिस के अपराधीकरण के रास्ते से अपराध सफाये की योगी मुहिम एक दिवा स्वप्न से अधिक कुछ नहीं। लेकिन विवेक तिवारी हत्याकांड को जातिवादी राजनीति का आईना मत बन जाने दीजिये। हाँ, यह विवेक का वह प्रशासनिक आईना जरूर हो सकता है जिसमें हर पुलिस एनकाउंटर को देखा जाना चाहिये।
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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश