Saturday, 9 May 2015

रेशमी आवाज़ के मालिक तलत महमूद --- Dhruv Gupt




इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा कि मैं एक बादल आवारा !
दिल में उतर जाने वाली भावुक, थरथराती, रेशमी आवाज़ के मालिक तलत महमूद अपने दौर के बेहद अजीम पार्श्वगायक रहे हैं। अपनी अलग-सी मर्मस्पर्शी अदायगी के बूते उन्होंने अपने समकालीन गायकों मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, मन्ना डे और हेमंत कुमार के बरक्स अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। 1939 में आल इंडिया रेडियो, लखनऊ से ग़ज़ल गायक के रूप में अपनी पहचान बनाने के बाद फिल्मों में उन्हें पहला ब्रेक 'शिक़स्त' के गीत 'सपनों की सुहानी दुनिया को' से मिला, लेकिन ख्याति मिली उन्हें 1944 में गाए गीत 'तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी' से। खूबसूरत चेहरे वाले तलत महमूद ने अपने आरंभिक दौर में गायन के साथ कुछ फिल्मों में नायक की भूमिकाएं भी निभाई, लेकिन कई महान अभिनेताओं के उस दौर में अभिनेता के रूप में उनकी कोई पहचान न बन सकी तो उन्होंने अपना सारा ध्यान अपनी गायिकी पर केंद्रित कर दिया। उनके गाए कुछ कालजयी गीत हैं - चल दिया कारवां, हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया, जाएं तो जाएं कहां, ऐ मेरे दिल कहीं और चल, सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया, तस्वीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती, आसमां वाले तेरी दुनिया से जी घबड़ा गया, दिले नादां तुझे हुआ क्या है, ये हवा ये रात ये चांदनी, इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा, आंसू समझ के क्यों मुझे आंख से तूने गिरा दिया, जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीये, मेरी याद में तुम न आंसू बहाना, फिर वही शाम वही गम वही तन्हाई है, मैं तेरी नज़र का सरूर हूं, मैं दिल हूं एक अरमान भरा, अंधे ज़हान के अंधे रास्ते, अश्कों में जो पाया है वो गीतों में दिया है, रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाए, ऐ गमे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं, प्यार पर बस तो नहीं है मेरा, तेरी आंख के आंसू पी जाऊं, होके मज़बूर मुझे उसने भुलाया होगा आदि। इस महान गायक की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि, उनके गाए फिल्म 'जहांआरा' के एक गीत की पंक्तियों के साथ !
जाने अब तुमसे मुलाक़ात कभी हो के न हो
जो अधूरी रही वो बात कभी हो के न हो
मेरी मंज़िल तेरी मंज़िल से बिछड़ आयी है
दिल को बहलाने तेरी याद चली आयी है
फिर वही शाम, वही ग़म, वही तन्हाई है !

Friday, 8 May 2015

वकील आभा सिंह की सलमान को सजा दिलाने में भूमिका --- कृष्णा शुक्ला

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http://www.bhaskar.com/news/MH-MUM-OMC-abha-singh-hit-and-run-case-main-advocate-4985472-PHO.html?seq=1


मुंबई. हिट एंड रन मामले में करीब 13 साल बाद फिल्म अभिनेता सलमान खान को 5 साल की सजा सुनाई गई। बुधवार को ही उन्हें हाईकोर्ट ने दो दिन की अंतरिम जमानत भी दे दी, लेकिन उनकी मुश्किल अभी खत्‍म नहीं हुई है। सलमान को सजा दिलाने में जिन लोगों ने अहम रोल निभाया है। उनमें आभा सिंह का नाम सबसे ऊपर है। पेशे से वकील आभा सिंह ने मुकदमे में देरी के मुद्दे को सार्वजनिक रुप से उठाया था।
उन्होंने पुलिस भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि पुलिस सलमान को बचाने की कोशिश कर रही है। आभा ने कुल पांच याचिकाएं दायर की थीं। आभा सिंह ने कहा था कि जब चर्चित एलिस्टर परेरा के मुकदमे की सुनवाई एक साल में पूरी हो गई। नूरिया हवेलीवाला मामले में फैसला आ गया तो सलमान के मुकदमे में इतना वक्त क्यों लग रहा है?
2012 में उनके सवालों के बाद ही पुलिस सलमान मामले से गायब हुई फाइलें खोज पाई थी। फिर उन पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करने को लेकर गंभीर हुई थी। उन्होंने सवाल उठाया था कि जब कार में सलमान के साथ सवार रहे रवींद्र पाटिल की मौत हो गई थी, तो उनके साथ कार में सवार रहे कमाल खान को चश्मदीद गवाह क्यों नहीं बनाया गया?
अपनी याचिका में आभा सिंह ने घटना के वक्त सलमान के साथ रहे उनके पुलिस बॉडीगार्ड का पक्ष बहुत सशक्त तरीके से रखा था। आभा सिंह ही वह वकील हैं जिन्होंने आरोपी पक्ष द्वारा अशोक सिंह को ड्राइवर के रूप में पेश किए जाने पर सख्त आपत्ति दर्ज कराते हुए अदालत में कहा था कि अशोक को 12 साल तक अपनी गलती का अहसास क्यों नहीं हुआ। लंबे इंतजार के बाद आए इस निर्णय को लेकर भास्कर ने आभा सिंह से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने पुलिस से आग्रह किया है कि वे सेलिब्रिटी और आम आदमी के बीच कोई फर्क न करें। निष्पक्षता से अपना काम करें। 
सलमान को मिली सजा को किस तरह से देखती हैं?:
मुकदमें की सुनवाई निश्चित तौर पर तेजी से होनी चाहिए थी। पर, अब मैं सिर्फ इतना कह सकती हूं कि देर आए दुरुस्त आए । इस फैसले की जो महत्वपूर्ण बात है वह यह कि इससे नशे में गाड़ी चलाने से जुड़े मामले को मजबूती मिलेगी। लोगों में जागरूकता और भय का निर्माण होगा।
भय से क्या मतलब है?:
सिर्फ यह है कि आप ने यदि गलती की है तो कानून आपको उसकी सजा देगा। फिर आप चाहे कितने ही बड़े और उंचे क्यों न हो। कानून की नजर में सब एक समान हैं। सलमान मामले से लोगों को एक बड़ा सबक मिलेगा।
इस मुकदमे में देरी की क्या वजह मानती हैं?
किसी भी मामले की दो महत्वपूर्ण चीजें होती हैं। पहले गवाह और दूसरा आरोपपत्र। यदि पुलिस पहले ही गवाहों के बयान 164 के तहत मैजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कर ले तो गवाहों के न रहने की स्थिति में उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही, गवाह के मुकरने की भी समस्या कम हो जाती है।
इसके साथ ही पुलिस को मजबूत आरोपपत्र दायर करने पर भी जोर देना चाहिए। जहां तक विलंब की बात है तो पहले गवाहों के बयान दर्ज कराने में पुलिस की ओर से देरी की गई। दूसरा पुलिस का केस को लेकर रवैया भी ढुलमुल था।

Thursday, 7 May 2015

यह समाजसेवा नहीं है यह समाज मेनीपुलेशन है--- जगदीश्वर चतुर्वेदी

सलमान,मध्यवर्गीय लंपटता और समाजसेवा:

 

     सलमान के कवरेज ने एकबार फिर से हमें मध्यवर्ग के अपराधी मनोभावों पर सोचने के लिए विवश किया है। भारत का महान मध्यवर्ग का व्यापक अंश मूल्यों की दृष्टि से महान मूल्यों की ओर नहीं जा रहा,बल्कि अ-सामाजिक मूल्यों की ओर इसका स्वाभाविक रुझान देखने में आ रहा है। मध्यवर्ग के इस बड़े समूह की सामान्य विशेषता है अ-सामाजिक मूल्यों को वैधता प्रदान करना,उनका महिमा मंडन करना और उनके लिए सामाजिक समूहों और दवाब ग्रुपों का निर्माण करना ।इसे हम लंपट मध्यवर्ग कहें तो बेहतर होगा।
     स्वभाव से लंपट मध्यवर्ग अविवेकवादी और कानूनभंजक है।  यह हाशिए के लोगों से नफरत करता है,उनको कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं समझता, गायक अभिजीत का कल सलमान प्रसंग में आया बयान इस वर्ग में हाशिए के लोगों के प्रति व्याप्त घृणा का आदर्श नमूना है।
    मीडिया में बार-बार सलमान समर्थक लोग सलमान के सुधार कार्यों का उल्लेख करके मानवीय आबोहवा पैदा कर रहे थे, लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसे समाजसुधार और मानवीय कार्यों का कोई स्वस्थ लक्ष्य नहीं है जो निहित स्वार्थ और सामाजिक जन समर्थन जुटाने के लिए किया जाय।  
     लंपट मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग के  कानूनभंजकों में माफिया और फंडामेंटलिस्ट भी आते हैं और वे लोग तमाम किस्म के असामाजिक,लोकतंत्रविरोधी,न्यायविरोधी कामों के साथ-साथ समाजसुधार के काम भी करते हैं । उनकी समाजसेवा का लक्ष्य है गुनाहों पर परदा डालना। वे चाहते हैं आम जनता उनके गुनाहों की अनदेखी करे और उनके लिए सामाजिक आधार का काम करे।
     लोकतांत्रिक समाज में समाजसुधार का मतलब है न्याय और समानता के भाव का कड़ाई से पालन। मानवाधिकारों के पक्ष में निष्ठा के साथ खड़े रहने की भावना। सलमान के मामले में ये सारी चीजें एकसिरे से नदारत हैं,उलटे सलमान पतंगबाजी के बहाने मानवाधिकार भंजकों के नायक के प्रचारक की भूमिका अदा करते नजर आए हैं।
    समाजसुधार का अर्थ किसी का ऑपरेशन कराना या पैसे देना या आर्थिक मदद कर देना मात्र नहीं है बल्कि इस मदद के साथ दानदाता किस तरह के मूल्यों का आचरण करता है यह भी देखना चाहिए। सामान्य सी बात है कि समाजसुधार का दावा करने वाला दारु पीकर ,बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाता है तो वह कानून तोड़ता है, गाड़ी से कुचलते हुए चला जाता है, लेकिन पीड़ितों को अस्पताल नहीं ले जाता, उनको आर्थिक मदद नहीं देता,बल्कि अदालत में सौदेबाजी करता है,सामाजिक सुधार को मानने का अर्थ है दण्ड को नतमस्तक होकर स्वीकार करना, न कि पैसे के बल पर,तिकड़मों के जरिए अपने पक्ष में करना। 
  सलमान टाइप चैरिटी या दान-पुण्य-मदद का लक्ष्य है अपने लिए जनाधार और जन-समर्थन तैयार करना, इसका लक्ष्य समाजसेवा नहीं है। इसका लक्ष्य है अपने लिए प्रशंसकों की भीड़ जुगाड़ करना, इसका लक्ष्य है सलमान के अमानवीय और कानूनभंजक रुप पर पर्दा डालना। इस तरह की समाजसेवा को लंपट समाज सेवा कहते हैं। जो लोग समाज सेवा करते हैं वे उसके जरिए जन-समर्थन या निजी स्वार्थों की पूर्ति नहीं करते। समाज सेवा का मतलब है कि सेवा करने वाला बदले में अपने लिए कुछनहीं चाहता, लेकिन सलमान के समाजसेवा कार्यों में खर्च हुए 42करोड़ रुपयों का बार-बार हवाला देकर यह मांग की जा रही है कि उसे कानून बरी कर दे, वह मानवीय है ,हत्यारा नहीं है । उसके समाजसेवा के तमगों के नाम पर यह भी कहा जा रहा है कि उसने कितने लोगों के हृदय के ऑपरेशन में मदद की ,कितने जरुरतमंदों के काम आया। यानी सलमान के लिए समाजसेवा का मतलब आम जनता को अपने पीछे गोलबंद करना है और यही वह बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए कि इस तरह की समाजसेवा क्या सच में समाजसेवा है या निजीसेवा है ?
     सलमान मार्का चैरिटी का सारा धंधा या इसी तरह की समाजसेवा करने वाले संगठन जब बदले में वोट मांगते हैं या राजनीतिक तौर पर साथ रहने की मांग करते हैं तो समाजसेवा को कलंकित करके उसे निहितस्वार्थ सेवा में तब्दील कर देते हैं। हमारे देश में अनेक संगठन हैं जो समाजसेवा के नाम पर शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं,साम्प्रदायिक विभाजन और घृणा का काम कर रहे हैं, लेकिन बदले में वोट की राजनीति भी कर रहे हैं या साम्प्रदायिक या फंडामेंटलिस्ट राजनीति कर रहे हैं। देश का सबसे बड़ा संगठन आरएसएस समाजसेवा ही कर रहा है।साथ में अन्य राजनीतिक लक्ष्यों में लगा है। यह समाजसेवा नहीं है यह समाज मेनीपुलेशन है।
     कहने का आशय यह है कि समाजसेवा को तब ही समाजसेवा कहते हैं जब आप अन्य की मदद करें और भूल जाएं,बदले में उससे कुछ न चाहें, समाजसेवा का ढोल बजाकर जिक्र न करें। मसलन् ,समाजसेवा का रामकृष्ण परमहंस मिशन का तरीका देखें तो यह बात सहज ही समझ में आ जाएगी। वह समाजसेवा किसी काम की नहीं है जो बदले में निहितस्वार्थों की पूर्ति की मांग करे, राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति की मांग करे।
      समाजसेवक न्यायप्रिय और सभ्य होता है। सलमान और उनके जैसे सामाजिक संगठन या समाजसेवक इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे न तो न्यायप्रिय हैं और न सभ्य ही हैं। बल्कि स्थिति यह है कि वे लंपटता और मीडियाप्रेशर के जरिए सामाजिक माहौल को अपने अनुकूल बनाने की घृणिततम कोशिश कर रहे हैं. इन लोगों ने बड़े पैमाने पर लंपट मध्यवर्ग को अपने साथ गोलबंद कर लिया है। यह लंपट मध्यवर्ग आए दिन उन सभी नेताओं और अभिनेताओं के पीछे गोलबंद नजर आता है जिनकी नागरिक समाज में कोई आस्था नहीं है,जिनकी भारत के कानून में कोई आस्था नहीं है, वे समूह या भीड़ के दवाब के जरिए कानून से लेकर सरकार तक सबको प्रभावित करना जानते हैं। मीडिया को वे अपने प्रौपेगैण्डा अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।  

Wednesday, 6 May 2015

भारतीय परिप्रेक्ष्‍य को अनदेखा कर दूसरे देशोँ के आधार पर क्राँति जैसी कोई चीज सँभव नहीँ.........Ramendra Jenwar

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क्‍या हमारे वामपँथी मित्र इस पर कुछ जानकारी दे सकते हैँ -
1 - लोकताँत्रिक व्‍यवस्‍था की सँसदीय राजनीतिक प्रणाली को स्‍वीकार कर उसमेँ भागीदार बनने के बाद सर्वहारा वर्ग की सशस्‍त्र क्राँति के द्वारा व्‍यवस्‍था परिवर्तन और सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के बारे मैं इस स्‍थिति मेँ उनकी पार्टी ( पार्टियोँ ) की क्‍या सोच है ?
2 - भारत मेँ वामपँथी पार्टी ( पार्टियाँ ) किसको सर्वहारा मान रही हैँ और प्रशिक्षित कर हरावल दस्‍ते के रूप मेँ तैयार कर रही हैँ ??
3 - या क्‍या वामपँथी पार्टी ( पार्टियोँ ) ने सैद्धाँतिक रूप से यह सुनिश्‍चित कर लिया है कि लोकताँत्रिक व्‍यवस्‍तथा मेँ चुनावोँ के जरिये ही सँसद और विधानसभाओँ मेँ बहुमत हासिल कर ही क्राँति को सँपन्‍न माना जाएगा और क्‍या यह माक्‍र्सवादी - लेनिन वादी क्राँति की अवधारणा के अनुरूप है ???
4 - अँत मेँ एक खास सवाल....भारत मेँ वामपँथी पार्टी ( पार्टियाँ ) इनमेँ से सर्वहारा वर्ग किसे मानती हैँ -
* औद्योगिक मजदूर
* औद्योगिक मजदूर + खेत मजदूर
* किसान ( सँदर्भ चीन मैं माओ के नेतृत्‍व वाली क्राँति 1949 )
* दलित वर्ग ( खास भारतीय परिप्रेक्ष्‍य )
वामपँथी मित्र अपनी पार्टी की सोच और नीति के आधार पर जवाब देँ अ-वामपँथी या निवर्तमान वामपँथी मित्र भी टिप्‍पणी कर सकते है...
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  • Ramendra Jenwar and 21 others like this.
  • Shachindra Trivedi aap ko samjhaana bekaar hai. itni der me ve 15 aadmi ko kraantikaari bana denge
  • Sudhir Ojha aise sawalon ke jabab pane ke liye aapko party journal padhna chahiye.
  • Ramendra Jenwar ओझा जी बहुत जानकारी जर्नल्‍स मेँ भी नहीँ मिलती और अगर उस विचार के मित्रोँ से पूछा जाए तोउनकी सोच भी पता चलती है बाकी यह तो हर सवाल का जवाब हो सकता है कि अमुक किताब/पत्रिका पढ लीजिए...चलिए आप उस जर्नल का नाम और अँक ही बता दीजिए जिसमेँ यह सब जानकारी मिल जाए । और अगर अपना दिमाग पार्टी आफिस मेँ जमाकर लाल किताब लेकर निकलते हैँ...परिपेक्ष्‍य के अनुसार सोच विचार कर अपनी राय नहीँ बनाते तो उनसे बात करना ही बेकार है...
    Like · Reply · 3 · Yesterday at 1:39pm · Edited
  • Ramendra Jenwar त्रिवेदी जी इतनी तेजी से कार्यकर्ता बना रहे हैँ तब तो 2019 मेँ क्राँति पक्‍की है...इतनी तेजी से तो मिसकाल वाले भी नहीँ बना रहे होँगे...उन्‍ही के नक्‍शेकदम पर हैँ क्‍या ?
  • Sudhir Ojha www.cpim.org ke about us me party program section pe ek nazar mar lijiye aapke sare sawal ke answer mil jayenge sambhavtah.

    Out of 133 countries rated on indicators of well-being...
    CPIM.ORG
  • Ramendra Jenwar का. तिवारी आप भी कुछ बताइये ? Anand Prakash Tiwari
  • Ramendra Jenwar ओझा जी क्‍या गाँव गँवई के आदमी को ऎसी कोई जिज्ञासा होगी तो उसे भी आप पार्टी की वेबसाइट पर जाकर अपनी जिज्ञासा शाँत करने को कहेँगे या यह पार्टी भी बस सँचारक्राँति पार्टी बनकर रहा गई है...? आआप की तरह ..??क्‍या सारा सर्वहारा वर्ग नेट पर है ?
  • Sudhir Ojha यह बात अाप पे लागू नही होती अॊर न ही आप वहां से समझने मे अक्षम ही हॆं। बाकी गांव का आदमी जब आयेगा तो उसको बताया जायेगा जो पूछेगा।
  • Anand Prakash Tiwari जो सबसे सब कुछ हार चूका हो (सर्वहारा) उसे ही इन पार्टियो में रहने का हक है ।जिसके पास थोडा सा भी बुद्धि विवेक बचा हुआ दिखाई पड़ेगा ,उसे पार्टी से बाहर कर देगे ।
    समाज से हारे हुओ की कैसी तानाशाही ? अपने अंदर की भेड़ो पर चाहे जैसी शाही लाद दे ।भारतीय समाज
     के किस अंग में इनकी स्वीकृति है ? आज ये आत्मलीन अफीम चाट कर सो रहे हैं । कृपया इन्हें जगाने की कोशिश न करे ।
    &
    रही बात सैद्धांतिक चर्चा की तो फिर कभी बौद्धिक अड़ी पर ।इनके पास कौन सा प्लेटफार्म बचा है जहाँ बहस/चर्चा की गुन्जाय्स हो ?
  • Ramendra Jenwar कृपया आप भी जानकारी देँ गिरीष जी क्या सुधीर ओझा जी ने जो लिँक भेजा है उस पर मुझे मेरे सवालोँ के जो जवाब मिलेँगे उसे मैँ भारतीय परिप्रेक्ष्‍य मेँ समग्र वामपँथ का जवाब या एकीकृत दृष्‍टिकोँण समझ सकता हूँ ?? DrGirish Cpi
  • Ramendra Jenwar राय साहब आप तो अक्षरश: वही जवाब देँगे जो ओझा जी ने कहा...?? Prem Nath Rai
  • Ramendra Jenwar क्राँति जी...क्राँति पर..आप भी..??? Kranti Kumar Singh
  • Ramendra Jenwar विद्रोही जी सिर्फ लाइक से काम नहीँ चलेगा..टिप्‍पणी भी चाहिए.. Vijai Raj Vidrohi
    Unlike · Reply · 3 · 23 hrs
  • Ritika Agarwal सब कामरेडोँ को साँप सूँघ गया लगता है
    Like · Reply · 3 · 21 hrs
  • Zoya Ansari सीपीएम वाले कुछ बोले तो बाकी सबकी बोलती बँद वाह रे वामपँथियोँ बहस बँद कमरोँ मेँ तो पार्टी भी बस उतनी ही...
    Like · Reply · 2 · 18 hrs
  • Choksh Vibhu बणे सीधे खरे सवाल हैं यदि चुनाव बहुमत लोकतात्रिक बहुदलीय व्यवस्था में यकीन है तो प्रजाताँत्रिक समाजवाद से अंतर क्या है
    Like · Reply · 3 · 16 hrs
  • Choksh Vibhu कितने भारतीय कम्यूनिस्ट पैत्रिक सम्पत्ति उत्तराधिकार का त्याग किये है
    Like · Reply · 2 · 15 hrs
  • Vijai Raj Vidrohi (वस्तुतः 'साम्यवाद' को जो कि भारतीय वाङ्ग्मय की देंन है को विदेशी दृष्टिकोण से लागू करवाने की असफल कोशिशें ही इसकी विफलता का हेतु हैं। समय-समय पर इस ओर ध्यानाकर्षण करने का प्रयास करता रहा हूँ परंतु मेरी हैसियत ही क्या है जो उस पर गौर किया जाये?)http://communistvijai.blogspot.in/2015/04/blog-post_15.html
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  • Vijai Raj Vidrohi वैसे अभी भी समय हाथ से निकला नहीं है अब भी संभल जाएँ और वास्तविक धर्म के मर्म को समझ कर जनता को जागरूक करने निकल पड़ें तो जनता लुटेरे अधार्मिकों के चंगुल से निकल सकती है।http://communistvijai.blogspot.in/2015/04/blog-post_11.html
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  • Vijai Raj Vidrohi तो क्या देश की जनता सशस्त्र क्रान्ति का साथ देगी? क्या सशस्त्र क्रान्ति के लिए समय उपयुक्त है और वह सफल हो सकेगी? 1857 का उदाहरण सामने है तभी तो गांधी जी को 'सत्य-अहिंसा' का सहारा लेना पड़ा था। आज मार्कन्डेय काटजू साहब की गांधी-विरोधी लेखनी व गोडसे के महिमा-मंडन के परिप्रेक्ष्य में नीतियाँ निर्धारित करके जनता को जागरूक करने की नितांत आवश्यकता है तभी 'संघ' के कुचक्र को नष्ट किया जा सकेगा। केवल और केवल 'आर्थिक-आंदोलन' जब तक कि 'सामाजिक-जाग्रति' न उत्पन्न हो कोई क्रान्ति नहीं कर सकता है।http://communistvijai.blogspot.in/2015/04/blog-post_4.html
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  • Ramendra Jenwar बहुत धन्‍यवाद विद्रोही जी आज ऎसी ही वैचारिक धार की कसौटी पर साम्‍यवाद को परखने की जरूरत है भारतीय परिप्रेक्ष्‍य को अनदेखा कर दूसरे देशोँ के आधार पर क्राँति जैसी कोई चीज सँभव नहीँ...
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  • Vijai Raj Vidrohi पूंजीवाद के समर्थक नेहरू जी ने बड़ी ही चालाकी से रूस से मित्रता करके भारतीय कम्युनिस्टों को प्रभाव हींन कर दिया। आज कम्युनिस्ट आंदोलन कई पार्टियों मे विभक्त होकर पूरी तरह बिखर गया है। कांग्रेस जहां कमजोर पड़ती है वहाँ RSS समर्थित भाजपा को आगे बढ़ा देती है। दोनों साम्राज्यवादी अमेरिका समर्थक पार्टियां हैं। ऐसे मे साम्यवाद के मजबूत होकर उभरने की आवश्यकता है परंतु सबसे बड़ी बाधा वे 'साम्यवादी विद्वान और नेता' खड़ी करते हैं जो आज भी अनावश्यक और निराधार ज़िद्द पर अड़े हुये हैं कि 'मार्क्स' ने धर्म को अफीम कह कर विरोध किया है अतः साम्यवाद धर्म विरोधी है।http://communistvijai.blogspot.in/2013/10/blog-post_13.html
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  • Vijai Raj Vidrohi http://communistvijai.blogspot.in/2013/09/blog-post.html

    सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में...
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