संकलन-विजय माथुर,
फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Tuesday, 23 March 2021
भगत सिंह की प्रासंगिकता
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Thursday, 10 May 2018
क्रान्तिकारियों की शहादत एक ऐसे मुल्क के सपने के लिए थी जो बराबरी, समानता और शोषण से मुक्त हो ------ जया सिंह
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Jaya Singh
10-05-2018संघ-भाजपा द्वारा जारी ‘देशभक्ति’ के शोर के बीच हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि देश क्या है? और देशभक्ति किसे कहते हैं? देश कोई कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता है, यह बनता है वहाँ के लोगों से, जनता से। और देश भक्ति के असली मायने है जनता से प्यार, इनके दुख तकलीफ़ से वास्ता और इनके संघर्ष में साथ देना। देशभक्ति की बात करते हुए अगर इस देश की आजादी की लड़ाई पर नजर डाली जाय तो आज भी हमारे जेहन में जो नाम आते हैं वे हैं: शहीद भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद, अशफ़ाक-उल्ला, रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। देशभक्ति के लिए देश के अर्थ को समझना बेहद जरूरी है और यह भी जानना जरूरी है कि देश के लिए कुर्बान होने वाले इन शहीदों ने किसके लिए अपनी जान की बाजी लगायी थी? आज यह एक आम आदमी भी समझ सकता है कि देश कागज़ पर बना महज एक नक्शा नहीं होता। न ही केवल जमीन का एक टुकड़ा होता है। देश बनता है वहाँ रहने वाली जनता से। वह जनता जो उस देश की जरूरत का हर एक साजो सामान बनाती है, वह किसान और खेतिहर मजदूर जो अनाज पैदा करते हैं वह जनता जो देश को चलाती है। क्या इस जनता के दुःख-तकलीफ में शामिल हुए बिना, उसके संघर्ष में भागीदारी किये बिना कोई देशभक्त कहला सकता है? भगतसिंह के लिए क्रान्ति और संघर्ष का मलतब क्या था? वह किस तरह के समाज के लिए लड़ रहे थे? 6 जून 1929 को दिल्ली के सेशन जज की अदालत में दिये भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त के बयान से स्पष्ट होता हैः
‘क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है- अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। दुनियाभर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करानेवाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं। यह भयानक असमानता और जबर्दस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल पुथल की तरफ लिए जा रहा है। यह स्थिति बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ढ की कगार पर चल रहे हैं।’(भगतसिंह और उनके साथियों के उपलब्ध सम्पूर्ण दस्तावेज, सं- सत्यम, पृष्ठ- 338)
भगतसिंह के लिए देशभक्ति का मतलब था- जनता के लिए शोषणमुक्त समाज बनाने का संकल्प। आज़ादी की लड़ाई में क्रान्तिकारियों की शहादत एक ऐसे मुल्क के सपने के लिए थी जो बराबरी, समानता और शोषण से मुक्त हो। जहाँ नेता और पूँजीपति घपलों घोटालों से देश की जनता को न लूटें।
मगर भाजपा के ‘देशभक्त’ क्या कर रहे हैं? क्या इस देश की जनता को याद नहीं है कि कारगिल के शहीदों के ताबूत तक के घोटाले में इसी भाजपा के तथाकथित देशभक्त फँसे थे। सेना के लिए खरीद में दलाली और रिश्वत लेते हुए भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण पकड़े गए थे। मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला और उससे जुड़ी हत्याएं देश की जनता भूली नहीं होगी। भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव कैमरे पर रिश्वत लेकर यह बोलते हुए पकड़े गए थे कि ‘पैसा खुदा नहीं तो खुदा से कम भी नहीं’। क्या जब देश की जनता महँगाई की मार से परेशान थी तभी मोदी सरकार ने पूँजीपतियों के कर्ज माफी की घोषणाएँ नहीं की? ऐसे हैं ये ‘राष्ट्रवादी’ और यही है संघ और भाजपा की ‘देशभक्ति’।
आज बात-बात पर देशभक्ति का प्रमाण-पत्र बाँटने वाले संघ-भाजपा गिरोह की असलियत जानने के लिए हमें एक बार स्वतन्त्रता आन्दोलन में इनकी करतूतों के इतिहास पर नजर डाल लेनी चाहिए।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=449748425464644&id=100012884707896
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Saturday, 30 April 2016
बिपन चन्द्र के खिलाफ संघ की साजिश ------ आदित्य मुखर्जी / सौरभ बाजपेयी
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Saurabh Bajpai
April 28 ·
कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि बिपन चन्द्र के खिलाफ संघ की साजिश बेनकाब हो जाए...
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यह बिपन चन्द्र का 1 नवंबर 2007 का स्टेटमेंट है जो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था. इसमें वो साफ़-साफ़ कहते हैं कि यह टर्म पहले इज़्ज़त के साथ प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब आतंकवाद शब्द के साथ बहुत नकारात्मक भाव जुड़ गया है इसलिए वो भविष्य में इस शब्द का हरगिज़ प्रयोग नहीं करेंगे. सोच में इस परिवर्तन को वो क्या समझेंगे जिनकी सोच 1925 से आज तक नहीं बदली है.
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1137293679626220&set=a.181882891833975.38332.100000367971889&type=3&permPage=1
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Saurabh Bajpai
April 28 ·
कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि बिपन चन्द्र के खिलाफ संघ की साजिश बेनकाब हो जाए...
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यह बिपन चन्द्र का 1 नवंबर 2007 का स्टेटमेंट है जो टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुआ था. इसमें वो साफ़-साफ़ कहते हैं कि यह टर्म पहले इज़्ज़त के साथ प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब आतंकवाद शब्द के साथ बहुत नकारात्मक भाव जुड़ गया है इसलिए वो भविष्य में इस शब्द का हरगिज़ प्रयोग नहीं करेंगे. सोच में इस परिवर्तन को वो क्या समझेंगे जिनकी सोच 1925 से आज तक नहीं बदली है.
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1137293679626220&set=a.181882891833975.38332.100000367971889&type=3&permPage=1
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Wednesday, 23 March 2016
Monday, 23 March 2015
भगत सिंह: एक संक्षिप्त परिचय --- K K Bora Comrade
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भगत सिंह: एक संक्षिप्त परिचय :
भगत सिंह पर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बहुत असर पड़ा था भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में चक नंबर 105(अब पाकिस्तान में) नामक जगह पर हुआ था. हालांकि उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवांशहर ज़िले के खट्करकलाँ गाँव में स्थित है. उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था. यह एक सिख परिवार था . दादा गदरी आन्दोलन से जुड़े थे चाचा निर्वासित हो के आजादी आन्दोलन में रहे पिता समेत सभी लोग आजादी की लड़ाई में कई मर्तबा जेल काट चुके थे . अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था. लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए थे. रूस की मजदूर वर्ग क्रांति से प्रभावित हो भगत सिंह ने शोषण विहीन समाज के रूप में भारतीय आजादी की लड़ाई का लक्ष्य रखा. 1930 में उन्होंने अपने संघटन का एक प्रतिनिधि सोवियत संघ में भेजा और क्रांति के लिए लेनिन के विचारो को जरुरी बताया भगत सिंह के लेख नोजवानो के नाम सन्देश में भगत सिंह ने नोजवानो से कम्युनिस्ट पार्टी को तैयार करने को कहा भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी. इस संगठन का उद्देश्य ‘सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले’ नवयुवक तैयार करना था. भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था. इस कार्रवाई में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद ने भी उनकी सहायता की थी.   भगत सिंह ने नई दिल्ली की केंद्रीय एसेंबली में बम फेंका था. क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल, 1929 को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए' बम और पर्चे फेंके थे. बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी. भगत सिंह पर ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का आरोप लगा और उन पर लाहौर षड़यंत्र के तहत मामला बनाया गया. लाहौर षड़यंत्र मामले में भगत सिंह को सुखदेव और राजगुरू के साथ फाँसी की सज़ा सुनाई गई जबकि बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया गया. भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे फाँसी पर लटका दिया गया. इतिहासकार बताते हैं कि फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों के शवों का अंतिम संस्कार फ़िरोज़पुर ज़िले के हुसैनीवाला में कर दिया था. भगत सिंह ने क्रांतिकारी आंदोलन को ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा दिया था.
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Madhuvandutt Chaturvedi :·
"भगत सिंह से यह मेरी पहली मुलाकात थी। मैं जतीन्द्र नाथ दास बगैरहा से भी मिला । भगत सिंह का चेहरा आकर्षक था और उससे बुद्धिमत्ता टपकती थी । वह निहायत शांत और गंभीर था । उसमें गुस्सा नहीं दिखाई देता था । उसकी दृष्टि और बातचीत में बड़ी सुजनता थी ।" - जवाहर लाल नेहरू ( लाहौर सडयंत्र केस के कैदियों की भूख हड़ताल के एक महीने पूरे होने पर लाहौर जेल में नेहरू उनसे मिले थे । उल्लेखनीय है कि भूख हड़ताल के 61 वे दिन जतिन्द्र नाथ दास शहीद हो गए थे जिनकी शहादत पर नेहरू ने लिखा,'मृत्यु से सारे देश में सनसनी फ़ैल गयी थी ।' )
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
भगत सिंह: एक संक्षिप्त परिचय :
भगत सिंह पर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बहुत असर पड़ा था भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में चक नंबर 105(अब पाकिस्तान में) नामक जगह पर हुआ था. हालांकि उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवांशहर ज़िले के खट्करकलाँ गाँव में स्थित है. उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था. यह एक सिख परिवार था . दादा गदरी आन्दोलन से जुड़े थे चाचा निर्वासित हो के आजादी आन्दोलन में रहे पिता समेत सभी लोग आजादी की लड़ाई में कई मर्तबा जेल काट चुके थे . अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था. लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए थे. रूस की मजदूर वर्ग क्रांति से प्रभावित हो भगत सिंह ने शोषण विहीन समाज के रूप में भारतीय आजादी की लड़ाई का लक्ष्य रखा. 1930 में उन्होंने अपने संघटन का एक प्रतिनिधि सोवियत संघ में भेजा और क्रांति के लिए लेनिन के विचारो को जरुरी बताया भगत सिंह के लेख नोजवानो के नाम सन्देश में भगत सिंह ने नोजवानो से कम्युनिस्ट पार्टी को तैयार करने को कहा भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी. इस संगठन का उद्देश्य ‘सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले’ नवयुवक तैयार करना था. भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था. इस कार्रवाई में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद ने भी उनकी सहायता की थी.   भगत सिंह ने नई दिल्ली की केंद्रीय एसेंबली में बम फेंका था. क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली के सभागार में 8 अप्रैल, 1929 को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिए' बम और पर्चे फेंके थे. बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी. भगत सिंह पर ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का आरोप लगा और उन पर लाहौर षड़यंत्र के तहत मामला बनाया गया. लाहौर षड़यंत्र मामले में भगत सिंह को सुखदेव और राजगुरू के साथ फाँसी की सज़ा सुनाई गई जबकि बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया गया. भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे फाँसी पर लटका दिया गया. इतिहासकार बताते हैं कि फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों के शवों का अंतिम संस्कार फ़िरोज़पुर ज़िले के हुसैनीवाला में कर दिया था. भगत सिंह ने क्रांतिकारी आंदोलन को ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा दिया था.
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Madhuvandutt Chaturvedi :·
"भगत सिंह से यह मेरी पहली मुलाकात थी। मैं जतीन्द्र नाथ दास बगैरहा से भी मिला । भगत सिंह का चेहरा आकर्षक था और उससे बुद्धिमत्ता टपकती थी । वह निहायत शांत और गंभीर था । उसमें गुस्सा नहीं दिखाई देता था । उसकी दृष्टि और बातचीत में बड़ी सुजनता थी ।" - जवाहर लाल नेहरू ( लाहौर सडयंत्र केस के कैदियों की भूख हड़ताल के एक महीने पूरे होने पर लाहौर जेल में नेहरू उनसे मिले थे । उल्लेखनीय है कि भूख हड़ताल के 61 वे दिन जतिन्द्र नाथ दास शहीद हो गए थे जिनकी शहादत पर नेहरू ने लिखा,'मृत्यु से सारे देश में सनसनी फ़ैल गयी थी ।' )
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Sunday, 14 December 2014
भगत सिंह , चार्ली चैप्लिन और राज कपूर .....Roshan Suchan
शो मैन को सालगिरह पर याद करते हुए:
भगत सिंह को फिल्में देखना और रसगुल्ले खाना काफी पसंद था। वे राजगुरु और यशपाल के साथ जब भी मौका मिलता था, फिल्म देखने चले जाते थे। चार्ली चैप्लिन की फिल्में बहुत पसंद थीं। इस पर चंद्रशेखर आजाद बहुत गुस्सा होते थे और वो चार्ली को " 4 फुट का अमेरिकन नौटंकीबाज़ कहते थे। गुस्से में आज़ाद बोलते थे उसकी फ़िल्में देख देख के क्रांति लाएंगे … ? जवाब में राजगुरु कहते थे - बहुत बड़ा एक्टर है जी .... इस पर आज़ाद और भी आग बबूला हो जाते थे। भगत सिंह कहीं पीछे से तमाशा देखते थे।
वही चार्ली चैप्लिन भगत सिंह और साथियों के भी हीरो थे जब जर्मनी में हिटलर की तानाशाही से सभी खौफजदा थे तब उस दौर में एक कलाकार लोगों में व्याप्त डर को मिटाकर उनमें सुंदर कल्पना को साकार करने निकल पङा था। राह आसान नही थी पर हौसला बुलंद था। गरीबी और बदहाली की भट्टी में पक कर वो कुंदन बना चुका था। जिसकी चमक ने करोङों लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी। ऐसे हास्य महानायक का जन्म आज से 125 वर्ष पूर्व हुआ था और आज भी उनकी फिल्में पूरे विश्व को हँसा रही हैं। वो कोई और नहीं बल्कि हम सबका प्रिय हास्य कलाकार चार्ली चैप्लिन है. चार्ली की फिल्मों में दुःख, दरिद्रता, अकेलापन तथा बेरोजगारी का चित्रण किया गया है. जिसने फिल्मी हास्य और प्रहसन की दुनिया के इस सिरमौर ने हास्य का ऐसा स्वरूप रचा, जिसमें विनोद के साथ-साथ संवेदनशीलता, विचार, व्यंग्य और क्रूर व्यवस्था पर प्रहार भी था। चार्ली चैप्लीन हास्य की दुनिया के इकलौते ध्रुवतारा हैं जिसका कोई विकल्प नही है। चार्ली को कम्युनिस्ट होने के आरोप में अमेरिका में इस तरह सताया गया कि चालीस साल इस देश में बिताने के बाद उन्हें हार कर स्विटजरलैंड में जाकर बसना पड़ा …।
खेर , ऐसे महान कलाकार की शख्शियत का भारतीय सिनेमा और उसके कलाकारों पर न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। अवाम के दुःख तख़लीफ़ों और अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ कलाकारों का थिएटर इप्टा खड़ा करने वाले और भारतीय सिनमा के भीषम पितामह कहे जाने वाले और पृत्वीराज़ कपूर जो कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़कर अभिनय में आये थे. उनके बेटे राज कपूर भी चार्ली चैपलिन के इतने प्रशंसक थे और उनके अभिनय में चार्ली चैपलिन का पूरा पूरा प्रभाव पाया जाता था| राज कपूर को भारतीय सिनेमा का चार्ली चैपलिन भी कहा जाता है। आज उनका जन्मदिन भी है ......................
भारतीय सिनमा में उनके महान योगदान पर आइये उन्हें याद करते हैं :-
राजकपूर ने अपने सिने करियर की शुरुआत बतौर बाल कलाकार 1935 में, जब उनकी उम्र केवल 11 वर्ष थी फिल्म 'इंकलाब' से की। राज कपूर प्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता एवं निर्देशक थे।पढ़ाई में उनका मन कभी नहीं लगा। यही कारण था कि राज कपूर ने 10वीं कक्षा की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। इस मनमौजी ने अपने विद्यार्थी जीवन में किताबें बेचकर खूब केले, पकोड़े और चाट खाई.हिन्दी फ़िल्मों में राज कपूर को पहला शोमैन माना जाता है क्योंकि उनकी फ़िल्मों में मौज-मस्ती, प्रेम, हिंसा से लेकर अध्यात्म और समाजवाद तक सब कुछ मौजूद रहता था और उनकी फ़िल्में एवं गीत आज तक भारतीय ही नहीं तमाम विदेशी सिने प्रेमियों की पसंदीदा सूची में काफ़ी ऊपर बने रहते हैं नेहरूवादी समाजवाद से प्रेरित अपनी शुरूआती फिल्मों से लेकर प्रेम कहानियों को मादक अंदाज से परदे पर पेश करके उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए जो रास्ता तय किया, इस पर उनके बाद कई फिल्मकार चले। भारत में अपने समय के सबसे बड़े 'शोमैन' थे। सोवियत संघ और मध्य-पूर्व में राज कपूर की लोकप्रियता दंतकथा बन चुकी /सोवियत संघ में भी भारत के इस महान अभिनेता के निधन पर गहरा शोक मनाया गया था। उनकी "आवारा" फिल्म तो इस देश में बेहद लोकप्रिय हुई थी 1953 इसी साल सोवियत संघ में भारतीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया जहां राजकपूर की फिल्म ‘आवारा’ बड़ी हिट साबित हुई।
है। राज कपूर की फिल्मों की कहानियां आमतौर पर उनके जीवन से जुड़ी होती थीं और अपनी ज्यादातर फिल्मों के मुख्य नायक वे खुद होते थे
उनके पिता पृथ्वीराज कपूर को विश्वास नहीं था कि राज कपूर कुछ विशेष कार्य कर पायेगा, इसीलिये उन्होंने उसे सहायक या क्लैपर ब्वाय जैसे छोटे काम में लगवा दिया था| केदार शर्मा ने राज कपूर के भीतर के अभिनय क्षमता और लगन को पहचाना और उन्होंने राज कपूर को सन् 1947 में अपनी फिल्म नीलकमल, जिसकी नायिका (heroine) मधुबाला थी, में नायक (hero) का काम दे दिया| 24 साल की उम्र में ही अर्थात सन् 1948 में उन्होंने अपनी स्टुडिओ, आर.के. फिल्म्स, की स्थापना कर लिया था और उस समय के सबसे कम उम्र के निर्देशक बन गये थे| सन् 1948 में उन्होंने पहली बार फिल्म 'आग' का निर्देशन किया और वह अपने समय की सफलतम फिल्म रही|
राज कपूर और नर्गिस की जोड़ी सफलतम फिल्मी जोड़ियों से एक थी, उन्होंने फिल्म आह, बरसात, आवारा, श्री 420, चोरी चोरी आदि में एक साथ काम किया था|
बॉबी फिल्म की सफलता के बाद राज कपूर ने अपनी अगली फिल्म सत्यं शिवं सुन्दरं बनाई जो कि फिर एक बार हिट हुई| इस फिल्म के के क्लाइमेक्स में बाढ़ का दृश्य था जिसे फिल्माने के लिये अपने खर्च से नदी पर बांध बनवाया और नदी में भरपूर पानी भर जाने के बाद बांध को तुड़वा दिया जिससे कि बाढ़ का स्वाभाविक दृश्य फिल्माया जा सके| इस दृश्य के फिल्मांकन हो जाने के बाद जब उसे राज कपूर को दिखाया गया तो दृश्य उन्हें पसंद नहीं आया और एक बार फिर से लाखों रुपये खर्च करके राज कपूर ने बांध बनवाया तथा उस दृश्य को फिर से शूट किया गया|
सत्यं शिवं सुन्दरं के बाद राज कपूर की अगली सफल फिल्म राम तेरी गंगा मैली रही| राम तेरी गंगा मैली बनाने के बाद वे हिना के निर्माण में लगे थे जिसकी कहानी भारतीय युवक और पाकिस्तानी युवती के प्रेम सम्बंध पर आधारित थी| हिना के निर्माण के दौरान राज कपूर की मृत्यु हो गई और उस फिल्म को उनके बेटे रणधीर कपूर ने पूरा किया|
राज कपूर को सिने प्रेमी दर्शकों के साथ ही साथ फिल्म आलोचकों से भी भरपूर प्रशंसा मिली| वे चार्ली चैपलिन के प्रशंसक थे और उनके अभिनय में चार्ली चैपलिन का पूरा पूरा प्रभाव पाया जाता था| राज कपूर को भारतीय सिनेमा का चार्ली चैपलिन भी कहा जाता है| राज कपूर की फिल्मों ने सोवियत रूस, चीन, आफ्रीका आदि देशों में भी प्रसिद्धि पाई| रूस में तो उनकी फिल्मों के हिंदी गाने भी अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं विशेषकर फिल्म आवारा और श्री 420 के|
उनके बारे में यही कहा जाता था कि वह फिल्म में अपनी हीरोइनों से प्रेम करने लगते थे।
कहते हैं कि एक पार्टी में बैजयंती माला को लेकर राज कपूर, राजेंद्र कुमार से झगड़ भी पड़े थे। कुछ किस्से हैं इस फिल्म के। एक बार बैजयंती माला शूटिंग के लिए समय नहीं निकाल पा रही थी, तब राज ने एक खत उन्हें मद्रास भेजा था, संगम होगा या नहीं। वैसे त्रिकोण प्रेम पर बनी 'संगम' बहुत सराही गई थी.
राज कपूर के बारे में एक और दिलचस्प बात है। कहते हैं कि बचपन में राज कपूर सफेद साड़ी पहने हुई एक स्त्री पर मोहित हो गए थे। उसके बाद से सफेद साड़ी से उनका मोह इतना गहरा गया कि उनकी तमाम फिल्मों की अभिनेत्रियां (नर्गिस, पद्मिनी, वैजयंतीमाला, जीनत अमान, पद्मिनी कोल्हापुरे, मंदाकिनी) पर्दे पर भी सफेद साड़ी पहने नजर आईं। यहां तक कि घर में उनकी पत्नी कृष्णा हमेशा सफेद साड़ी ही पहना करती थीं
'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार', 'सजन रे झूठ मत बोलो', 'मेरा जूता है जापानी', 'दुनिया बनाने वाले', 'सब कुछ सीखा हमने', 'दोस्त दोस्त ना रहा' मुकेश के ऐसे सुपरहिट गाने हैं जो आज भी सबकी जबान पर हैं. ये सब गाने राज कपूर पर फिल्माए गए थे. मुकेश ने राज कपूर की इतनी फिल्मों में गाने गए कि उन्हें राज कपूर की आवाज के नाम से जाना जाने लगा. राज कपूर को जब उनकी मौत की खबर मिली तो उनके मुंह से बरबस निकल गया, "मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा दोनों चली गई."
Sunday, 28 September 2014
‘कौम के नाम सन्देश’-संक्षिप्त रूप: पंकज चतुर्वेदी
‘कौम के नाम सन्देश’ के रूप में प्रसिद्द और ‘नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र ‘ शीर्षक के साथ मिले इस दस्तावेज के कई प्रारूप और हिन्दी अनुवाद उपलब्ध हैं, यह एक संक्षिप्त रूप है। लाहौर के पीपुल्ज़ में 29 जुलाई, 1931 और इलाहाबाद के अभ्युदय में 8 मई, 1931 के अंक में इसके कुछ अंश प्रकाशित हुए थे। यह दस्तावेज अंग्रेज सरकार की एक गुप्त पुस्तक ‘बंगाल में संयुक्त मोर्चा आंदोलन की प्रगति पर नोट’ से प्राप्त हुआ, जिसका लेखक सी आई डी अधिकारी सी ई एस फेयरवेदर था और जो उसने 1936 में लिखी थी, । उसके अनुसार यह लेख भगतसिंह ने लिखा था और 3 अक्तूबर, 1931को श्रीमती विमला प्रभादेवी के घर से तलाशी में हासिल हुआ था। सम्भवत: 2 फरवरी, 1931 को यह दस्तावेज लिखा गया।
नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र
प्रिय साथियो
इस समय हमारा आन्दोलन अत्यन्त महत्वपूर्ण परिस्थितियों में से गुज़र रहा है। एक साल के कठोर संग्राम के बाद गोलमेज़ कान्फ्रेन्स ने हमारे सामने शासन-विधान में परिवर्तन के सम्बन्ध में कुछ निश्चित बातें पेश की हैं और कांग्रेस के नेताओं को निमन्त्रण दिया है कि वे आकर शासन-विधान तैयार करने के कामों में मदद दें। कांग्रेस के नेता इस हालत में आन्दोलन को स्थगित कर देने के लिए तैयार दिखायी देते हैं। वे लोग आन्दोलन स्थगित करने के हक़ में फैसला करेंगे या खि़लाफ़, यह बात हमारे लिये बहुत महत्व नहीं रखती। यह बात निश्चित है कि वर्तमान आन्दोलन का अन्त किसी न किसी प्रकार के समझौते के रूप में होना लाज़िमी है। यह दूसरी बात है कि समझौता ज़ल्दी हो जाये या देरी हो।
वस्तुतः समझौता कोई हेय और निन्दा-योग्य वस्तु नहीं, जैसा कि साधारणतः हम लोग समझते हैं, बल्कि समझौता राजनैतिक संग्रामों का एक अत्यावश्यक अंग है। कोई भी कौम, जो किसी अत्याचारी शासन के विरुद्ध खड़ी होती है, ज़रूरी है कि वह प्रारम्भ में असफल हो और अपनी लम्बी ज़द्दोज़हद के मध्यकाल में इस प्रकार के समझौते के ज़रिये कुछ राजनैतिक सुधार हासिल करती जाये, परन्तु वह अपनी लड़ाई की आख़िरी मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते अपनी ताक़तों को इतना दृढ़ और संगठित कर लेती है और उसका दुश्मन पर आख़िरी हमला ऐसा ज़ोरदार होता है कि शासक लोगों की ताक़तें उस वक्त तक भी यह चाहती हैं कि उसे दुश्मन के साथ कोई समझौता कर लेना पड़े। यह बात रूस के उदाहरण से भली-भाँति स्पष्ट की जा सकती है।
1905 में रूस में क्रान्ति की लहर उठी। क्रान्तिकारी नेताओं को बड़ी भारी आशाएँ थीं, लेनिन उसी समय विदेश से लौट कर आये थे, जहाँ वह पहले चले गये थे। वे सारे आन्दोलन को चला रहे थे। लोगों ने कोई दर्ज़न भर भूस्वामियों को मार डाला और कुछ मकानों को जला डाला, परन्तु वह क्रान्ति सफल न हुई। उसका इतना परिणाम अवश्य हुआ कि सरकार कुछ सुधार करने के लिये बाध्य हुई और द्यूमा (पार्लियामेन्ट) की रचना की गयी। उस समय लेनिन ने द्यूमा में जाने का समर्थन किया, मगर 1906 में उसी का उन्होंने विरोध शुरू कर दिया और 1907 में उन्होंने दूसरी द्यूमा में जाने का समर्थन किया, जिसके अधिकार बहुत कम कर दिये गये थे। इसका कारण था कि वह द्यूमा को अपने आन्दोलन का एक मंच (प्लेटफ़ार्म) बनाना चाहते थे।
इसी प्रकार 1917 के बाद जब जर्मनी के साथ रूस की सन्धि का प्रश्न चला, तो लेनिन के सिवाय बाकी सभी लोग उस सन्धि के ख़िलाफ़ थे। परन्तु लेनिन ने कहा, ‘'शान्ति, शान्ति और फिर शान्ति – किसी भी कीमत पर हो, शान्ति। यहाँ तक कि यदि हमें रूस के कुछ प्रान्त भी जर्मनी के ‘वारलार्ड’ को सौंप देने पड़ें, तो भी शान्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए।'’ जब कुछ बोल्शेविक नेताओं ने भी उनकी इस नीति का विरोध किया, तो उन्होंने साफ़ कहा कि ‘'इस समय बोल्शेविक सरकार को मज़बूत करना है।'’
जिस बात को मैं बताना चाहता हूँ वह यह है कि समझौता भी एक ऐसा हथियार है, जिसे राजनैतिक ज़द्दोज़हद के बीच में पग-पग पर इस्तेमाल करना आवश्यक हो जाता है, जिससे एक कठिन लड़ाई से थकी हुई कौम को थोड़ी देर के लिये आराम मिल सके और वह आगे युद्ध के लिये अधिक ताक़त के साथ तैयार हो सके। परन्तु इन सारे समझौतों के बावज़ूद जिस चीज़ को हमें भूलना नहीं चाहिए, वह हमारा आदर्श है जो हमेशा हमारे सामने रहना चाहिए। जिस लक्ष्य के लिये हम लड़ रहे हैं, उसके सम्बन्ध में हमारे विचार बिलकुल स्पष्ट और दृढ़ होने चाहिए। यदि आप सोलह आने के लिये लड़ रहे हैं और एक आना मिल जाता है, तो वह एक आना ज़ेब में डाल कर बाकी पन्द्रह आने के लिये फिर जंग छेड़ दीजिए। हिन्दुस्तान के माडरेटों की जिस बात से हमें नफ़रत है वह यही है कि उनका आदर्श कुछ नहीं है। वे एक आने के लिये ही लड़ते हैं और उन्हें मिलता कुछ भी नहीं।
भारत की वर्तमान लड़ाई ज़्यादातर मध्य वर्ग के लोगों के बलबूते पर लड़ी जा रही है, जिसका लक्ष्य बहुत सीमित है। कांग्रेस दूकानदारों और पूँजीपतियों के ज़रिये इंग्लैण्ड पर आर्थिक दबाव डाल कर कुछ अधिकार ले लेना चाहती है। परन्तु जहाँ तक देश की करोड़ों मज़दूर और किसान जनता का ताल्लुक है, उनका उद्धार इतने से नहीं हो सकता। यदि देश की लड़ाई लड़नी हो, तो मज़दूरों, किसानों और सामान्य जनता को आगे लाना होगा, उन्हें लड़ाई के लिये संगठित करना होगा। नेता उन्हें आगे लाने के लिये अभी तक कुछ नहीं करते, न कर ही सकते हैं। इन किसानों को विदेशी हुकूमत के साथ-साथ भूमिपतियों और पूँजीपतियों के जुए से भी उद्धार पाना है, परन्तु कांग्रेस का उद्देश्य यह नहीं है।
इसलिये मैं कहता हूँ कि कांग्रेस के लोग सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं चाहते। सरकार पर आर्थिक दबाव डाल कर वे कुछ सुधार और लेना चाहते हैं। भारत के धनी वर्ग के लिये कुछ रियायतें और चाहते हैं और इसलिये मैं यह भी कहता हूँ कि कांग्रेस का आन्दोलन किसी न किसी समझौते या असफलता में ख़त्म हो जायेगा। इस हालत में नौजवानों को समझ लेना चाहिए कि उनके लिये वक्त और भी सख़्त आ रहा है। उन्हें सतर्क हो जाना चाहिए कि कहीं उनकी बुद्धि चकरा न जाये या वे हताश न हो बैठें। महात्मा गाँधी की दो लड़ाइयों का अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद वर्तमान परिस्थितियों और अपने भविष्य के प्रोग्राम के सम्बन्ध में साफ़-साफ़ नीति निर्धारित करना हमारे लिये अब ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।
इतना विचार कर चुकने के बाद मैं अपनी बात अत्यन्त सादे शब्दों में कहना चाहता हूँ। आप लोग इंकलाब-ज़िन्दाबाद (long live revolution) का नारा लगाते हैं। यह नारा हमारे लिये बहुत पवित्र है और इसका इस्तेमाल हमें बहुत ही सोच-समझ कर करना चाहिए। जब आप नारे लगाते हैं, तो मैं समझता हूँ कि आप लोग वस्तुतः जो पुकारते हैं वही करना भी चाहते हैं। असेम्बली बम केस के समय हमने क्रान्ति शब्द की यह व्याख्या की थी – क्रान्ति से हमारा अभिप्राय समाज की वर्तमान प्रणाली और वर्तमान संगठन को पूरी तरह उखाड़ फेंकना है। इस उद्देश्य के लिये हम पहले सरकार की ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। इस समय शासन की मशीन अमीरों के हाथ में है। सामान्य जनता के हितों की रक्षा के लिये तथा अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप देने के लिये – अर्थात् समाज का नये सिरे से संगठन कार्ल माक्र्स के सिद्धान्तों के अनुसार करने के लिये – हम सरकार की मशीन को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। हम इस उद्देश्य के लिये लड़ रहे हैं। परन्तु इसके लिये साधारण जनता को शिक्षित करना चाहिए।
जिन लोगों के सामने इस महान क्रान्ति का लक्ष्य है, उनके लिये नये शासन-सुधारों की कसौटी क्या होनी चाहिए? हमारे लिये निम्नलिखित तीन बातों पर ध्यान रखना किसी भी शासन-विधान की परख के लिये ज़रूरी है -
शासन की ज़िम्मेदारी कहाँ तक भारतीयों को सौंपी जाती है?
शासन-विधान को चलाने के लिये किस प्रकार की सरकार बनायी जाती है और उसमें हिस्सा लेने का आम जनता को कहाँ तक मौका मिलता है?
भविष्य में उससे क्या आशाएँ की जा सकती हैं? उस पर कहाँ तक प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं? सर्व-साधारण को वोट देने का हक़ दिया जाता है या नहीं?
भारत की पार्लियामेन्ट का क्या स्वरूप हो, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। भारत सरकार की कौंसिल आफ़ स्टेट सिर्फ अमीरों का जमघट है और लोगों को फाँसने का एक पिंजरा है, इसलिये उसे हटा कर एक ही सभा, जिसमें जनता के प्रतिनिधि हों, रखनी चाहिए। प्रान्तीय स्वराज्य का जो निश्चय गोलमेज़ कान्फ्रेन्स में हुआ, उसके सम्बन्ध में मेरी राय है कि जिस प्रकार के लोगों को सारी ताकतें दी जा रही हैं, उससे तो यह ‘प्रान्तीय स्वराज्य’ न होकर ‘प्रान्तीय जु़ल्म’ हो जायेगा।
इन सब अवस्थाओं पर विचार करके हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि सबसे पहले हमें सारी अवस्थाओं का चित्र साफ़ तौर पर अपने सामने अंकित कर लेना चाहिए। यद्यपि हम यह मानते हैं कि समझौते का अर्थ कभी भी आत्मसमर्पण या पराजय स्वीकार करना नहीं, किन्तु एक कदम आगे और फिर कुछ आराम है, परन्तु हमें साथ ही यह भी समझ लेना कि समझौता इससे अधिक भी और कुछ नहीं। वह अन्तिम लक्ष्य और हमारे लिये अन्तिम विश्राम का स्थान नहीं।
हमारे दल का अन्तिम लक्ष्य क्या है और उसके साधन क्या हैं – यह भी विचारणीय है। दल का नाम ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी’ है और इसलिए इसका लक्ष्य एक सोशलिस्ट समाज की स्थापना है। कांग्रेस और इस दल के लक्ष्य में यही भेद है कि राजनैतिक क्रान्ति से शासन-शक्ति अंग्रेज़ों के हाथ से निकल हिन्दुस्तानियों के हाथों में आ जायेगी। हमारा लक्ष्य शासन-शक्ति को उन हाथों के सुपुर्द करना है, जिनका लक्ष्य समाजवाद हो। इसके लिये मज़दूरों और किसानों केा संगठित करना आवश्यक होगा, क्योंकि उन लोगों के लिये लार्ड रीडिंग या इरविन की जगह तेजबहादुर या पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास के आ जाने से कोई भारी फ़र्क न पड़ सकेगा।
पूर्ण स्वाधीनता से भी इस दल का यही अभिप्राय है। जब लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास किया, तो हम लोग पूरे दिल से इसे चाहते थे, परन्तु कांग्रेस के उसी अधिवेशन में महात्मा जी ने कहा कि ‘'समझौते का दरवाज़ा अभी खुला है।'’ इसका अर्थ यह था कि वह पहले ही जानते थे कि उनकी लड़ाई का अन्त इसी प्रकार के किसी समझौते में होगा और वे पूरे दिल से स्वाधीनता की घोषणा न कर रहे थे। हम लोग इस बेदिली से घृणा करते हैं।
इस उद्देश्य के लिये नौजवानों को कार्यकर्ता बन कर मैदान में निकलना चाहिए, नेता बनने वाले तो पहले ही बहुत हैं। हमारे दल को नेताओं की आवश्यकता नहीं। अगर आप दुनियादार हैं, बाल-बच्चों और गृहस्थी में फँसे हैं, तो हमारे मार्ग पर मत आइए। आप हमारे उद्देश्य से सहानुभूति रखते हैं, तो और तरीकों से हमें सहायता दीजिए। सख़्त नियन्त्रण में रह सकने वाले कार्यकर्ता ही इस आन्दोलन को आगे ले जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि दल इस उद्देश्य के लिये छिप कर ही काम करे। हमें युवकों के लिये स्वाध्याय-मण्डल (study circle) खोलने चाहिए। पैम्फ़लेटों और लीफ़लेटों, छोटी पुस्तकों, छोटे-छोटे पुस्तकालयों और लेक्चरों, बातचीत आदि से हमें अपने विचारों का सर्वत्र प्रचार करना चाहिए।
हमारे दल का सैनिक विभाग भी संगठित होना चाहिए। कभी-कभी उसकी बड़ी ज़रूरत पड़ जाती है। इस सम्बन्ध में मैं अपनी स्थिति बिलकुल साफ़ कर देना चाहता हूँ। मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसमें गलतफ़हमी की सम्भावना है, पर आप लोग मेरे शब्दों और वाक्यों का कोई गूढ़ अभिप्राय न गढ़ें।
यह बात प्रसिद्ध ही है कि मैं आतंकवादी (terrorist) रहा हूँ, परन्तु मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं एक क्रान्तिकारी हूँ, जिसके कुछ निश्चित विचार और निश्चित आदर्श हैं और जिसके सामने एक लम्बा कार्यक्रम है। मुझे यह दोष दिया जायेगा, जैसा कि लोग राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को भी देते थे कि फाँसी की काल-कोठरी में पड़े रहने से मेरे विचारों में भी कोई परिवर्तन आ गया है। परन्तु ऐसी बात नहीं है। मेरे विचार अब भी वही हैं। मेरे हृदय में अब भी उतना ही और वैसा ही उत्साह है और वही लक्ष्य है जो जेल के बाहर था। पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हम बम से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। यह बात हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास से बहुत आसानी से मालूम हो जाती है। केवल बम फेंकना न सिर्फ़ व्यर्थ है, अपितु बहुत बार हानिकारक भी है। उसकी आवश्यकता किन्हीं ख़ास अवस्थाओं में ही पड़ा करती है। हमारा मुख्य लक्ष्य मज़दूरों और किसानों का संगठन होना चाहिए। सैनिक विभाग युद्ध-सामग्री को किसी ख़ास मौके के लिये केवल संग्रह करता रहे।
यदि हमारे नौजवान इसी प्रकार प्रयत्न करते जायेंगे, तब जाकर एक साल में स्वराज्य तो नहीं, किन्तु भारी कुर्बानी और त्याग की कठिन परीक्षा में से गुज़रने के बाद वे अवश्य ही विजयी होंगे।
इंकलाब-ज़िन्दाबाद!
(2 फरवरी,1931)
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