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Thursday, 13 August 2020

कांग्रेस की दीवारों की ईंटों से बीजेपी का महल ------ शकीब रहमान

कांगेसी संघियों ने कांग्रेस की दीवारों की ईंटों से बीजेपी का महल बना दिया......
इस पर बात करने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना होगा.....
1925 में ब्राह्मणवादी विचारधारा के पुरोधा केशव राव बलीराम हेडगेवार ने आरएसएस की स्थापना की ......कांग्रेस तब तक इतने बड़े किले में परिवर्तित हो चुकी थी कि हेडगेवार उसको हिला भी नहीं सकते थे....
एक बात गौरतलब है कि कांग्रेस भले एक पार्टी है लेकिन शुरू से ही वो कई विचारधाराओं का संगम रहा है...इसलिए कांग्रेस में  इनकी दाल उस तरह से गल नहीँ रही थीं जैसा कि वे चाहते थें.....
वैसे इसी समय ब्राह्मणवादी विचारों को पोषित करने वाली हिन्दू महासभा भी थी ....लेकिन अन्य लोगों को वो जोड़ नहीं पा रही थीं....
तब आरएसएस राजनीति के शतरंज के बिसात पर एक नई चाल चलती है कि जनसंघ नामक अपना एक स्थायी आवास बनाओ ( जो कि बाद में बीजेपी नामक्रम में  परिवर्तित हो गई ) और जब तक ये घर बन नही जाता है...तब तक कांग्रेस में रह कर उसकी जड़े खोदो...
हुआ भी यही.... संघी कांग्रेस में शामिल होकर कांग्रेस के किले की ईंटें ले जाकर आरएसएस (जनसंघ ) को मज़बूत करते रहें यही कारण है कि कुछ लोग कांग्रेस को आरएसएस की जननी तक कह देते हैं....
ये कांग्रेस से जोंक की तरह चिपककर उसका खून पीकर आरएसएस को रक्तदान करते रहें...
1980 में मण्डल कमिशन की शिफारिशों को कुँए में डलवाने वाला कांग्रेस का यही धड़ा था....क्योंकि इसमे भूखे पिछडो के लिए कुछ निवाला था जो कि ब्राह्मणवादियों की थाली से जाने वाला था....
सोंचिए 1980 में इसे लागू न करने देने से पिछडो का कितना नुकसान हुआ...
1984 में दिल्ली में सिखों के ख़िलाफ़ तांडव भी इन्ही संघियों ने किया था...
इन पर नेहरू जी का नियंत्रण 
इंद्रा पर आकर कमज़ोर हुआ .....और...राजीव तक आते - आते खत्म हो गया.... इसलिए 1987 का हाशिमपुरा नरंसहार और 1989 का भागलपुर दंगा प्रायोजित किया जाता है.....कुछ लोग कहते हैं कि कांग्रेस को मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगा करवाने से उसका खुद का ही नुकसान होगा फिर वो ऐसा क्यों करेगी......क्योंकि ऐसा करवाने वाले समाजवादी कांग्रेसी नहीं बल्कि संघी कांग्रेसी होते थें.....जिनको कांग्रेस को खोखला कर बीजेपी की रीढ़ मज़बूत करना था....यही संघी धड़ा राजीव गांधी से मस्ज़िद का ताला खुलवाता है....
1998 में संघी आवास की इमारत का ढाँचा तो बन गया लेकिन मुकम्मल घर 2014 मे जाकर तैयार हुआ...
अब आप कहेंगे....जब संघियों का स्थायी आवास बीजेपी ( आरएसएस ) बन गया है तो सारे संघी कांग्रेस को छोड़कर वहाँ चले क्यों नही जाते हैं...??
पहली बात ...एक घर मे शामिल होने की एक सीमा भी तो होती है....
दूसरी बात ....ये गोलवलकर की संतानें बहुत चालाक होते है...हमेशा अपने लिए एक विकल्प बनाए रखते हैं...
तीसरी बात ...अगर सारे वहाँ चले जाएँगे तो मोदी विरोध के प्लेटफार्म पर बहुजनों का कब्ज़ा हो जाएगा....फिर ये बहुजन एससी , एसटी ,ओबीसी और अल्पसख्यकों के हक़ की बात उठाने लगेंगे....तो इससे ब्राह्मणवाद का नुकसान होगा न....और बीजेपी भी यही चाहती है कि उसके विरोध के प्लेटफार्म पर भी कांग्रेसी संघी ही काबिज रहें....
इसलिए ये मोदी को गरियाते हुए आपको उन्ही मुद्दों में उलझाए रखते हैं जिससे ब्राह्मणवादी हितों का नुकसान न हो तभी तो कोरोना पर ये भले 100 बातें कर देंगे लेकिन न्यायपालिका में आरक्षण ,  मण्डल कमीशन , एससी- एसटी एक्ट 1989 , सच्चर कमेटी, रंगनाथ मिश्रा आयोग, कुंडू कमेटी.......अनुच्छेद 341 जैसे विषयों पर दो शब्द भी खर्च करना ज़रूरी नहीं समझेंगे....क्योंकि ये सारे विषय इनके ब्राह्मणवादी शहद में कड़वाहट डाल देते हैं....
साभार :

https://www.facebook.com/shakeeb.rahman.786/posts/345550383279126?__cft__[0]=AZW5axvrRl0j5oZ07kzz9Hby979zAXQ3b6gA2iwxm4-JjMqgWw5JUWxQAzgT1X2tLPZn1inc6p7EIIW5oMTYZvTh8FC20pzAzj9zpBL2oNEov2Jh1qqDA_fvr_F-fO9Wk560l3O_oMFJg6pP2l0Rhfzj&__tn__=%2CO%2CP-R

Monday, 3 August 2020

कांग्रेस भाजपा एक समाना ------ बृजेश शुक्ल

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 26 June 2019

सन् 75 से भी ज्यादा ख़राब अघोषित आपातकाल की स्थिति है ------ प्रोबीर पुरकायस्थ

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इमरजेंसी यानी आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास के काले दौर के तौर पर याद किया जाता है। 25 जून की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की थी। यह आपातकाल 26 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक रहा। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे और तमाम तरह के नागरिक अधिकारों को कुचल दिया गया था। ये दौर तो बुरा था ही लेकिन तमाम राजनीतिक दल और नागरिक समाज आज लोकतंत्र को लेकर पहले से भी ज़्यादा चिंतित है। कई लोगों का मानना है कि देश में पिछले करीब 5 साल से एक अघोषित आपातकाल की स्थिति है, जो सन् 75 से भी ज्यादा ख़राब है। और इसका पूरी मजबूती से सामना करने की ज़रूरत है।


* इंदिरा गांधी ने निलम्बित लोकतंत्र को सक्रिय करने का विकल्प चुनने का जो फैसला किया, वह आपातकाल थोपने से कहीं बड़ा फैसला था। शायद उसी फैसले के कारण जनता ने दंडित करने के बाद दोबारा उन्हें मौका दिया।
**गलत तरीके से चुनाव जीतकर आने की वजह से इंदिरा गांधी का चुनाव इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया था जिसके बाद की घटना है आपातकाल। सवाल ये है कि गलत तरीके से चुनाव जीतने की कोशिशें क्या बंद हो गयी हैं? उद्योगपतियों से राजनीतिक चंदे को अपने नाम कर लेने की कोशिशें, मीडिया पर कब्जा जमाए रखना, सूचना और तकनीक के दूसरे साधनों का दुरुपयोग, चुनाव जीतने में बड़े पैमाने पर धन का इस्तेमाल, ईवीएम की हैकिंग और ईवीएम की स्वैपिंग को लेकर आशंकाएं जैसी बातें बताती हैं कि गलत तरीके से चुनाव जीतने के हथकंडे बढ़े हैं। इनकी पुष्टि के लिए किसी अदालत का फैसला आना भर बाकी है। अगर ऐसा होता है तो हुक्मरान आपातकाल से कोई अलग प्रतिक्रिया देगा, यह भी देखने की बात होगी।
***उत्तराखण्ड में गलत तरीके से हरीश रावत की सरकार बर्खास्त की गयी, कर्नाटक में गलत तरीके से वीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी, गोवा में सबसे बड़ी पार्टी के बजाए जोड़-तोड़ करने वाली पार्टी को सरकार बनाने का मौका दे दिया गया, मणिपुर में भी लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली घटनाएं घटीं। यह सिलसिला अगर नहीं रुक रहा है तो समझिए कि आपातकाल की जड़ें देश में मजबूत हैं और मजबूत हो रही हैं। 

****संसद भवन में ‘जय़ श्रीराम’ और ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारों का लगना बताता है कि आपातकाल प्रेमी रूप बदलकर न सिर्फ पैदा हो चुके हैं बल्कि खुद को मजबूत कर चुके हैं। मॉब लिंचिंग पर देश की संसद और विधानसभाओं की खामोशी भी यही बात डंके की चोट पर कह रही है। गोरखपुर के बाद मुजफ्फरपुर में बच्चों की लगातार मौत को आपदा मान लेने वाली सोच लोकतांत्रिक नहीं हो सकती। एक ही समय में रांची में प्रधानमंत्री की योग क्रीड़ा और मुजफ्फरपुर में मौत का तांडव बताता है कि देश में लोकतंत्र की संवेदनशीलता सो रही है।
***** बहुत आसान है कि आपातकाल की बरसी पर सारा ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ दिया जाए, उसे लोकतंत्र विरोधी घोषित कर दिया जाए। मगर, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 2014 से पहले जनता पार्टी की सरकार समेत जितनी भी सरकारें बनीं वह कांग्रेस की कोख से निकली हुई सरकारें थीं। यहां तक कि बीजेपी जिस श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानती है वह भी कांग्रेस की सरकार में मंत्री रह चुके थे। कहने का अर्थ ये है कि आपातकाल के बीज राजनीति पर वर्चस्व रखने वाली पार्टी में निहित होती है। वह कांग्रेस भी हो सकती है और कोई दूसरी पार्टी भी। 
(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार )
https://janchowk.com/zaruri-khabar/india-emergency-indira-modi-opposition-constitution/4772?#.XRH3RqAWPxU.facebook




  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Tuesday, 4 June 2019

क्षेत्रीय दलों का खात्मा कारपोरेट हित में ------ स्वामी शशांक आनंद

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* 2019 मई चुनावों से पूर्व भाजपा नेता जो कह रहे थे जिसकी पुष्टि के लिए ABP ने अपने कार्यक्रम में तीन महिला ज्योतिषियों के मुख से जो - जो कहलाया था वही यदि व्यवहार में सामने आ रहा है तो आश्चर्य की कोई बात नहीं ? 
** 18 मार्च 2017 को जारी यू ट्यूब के जरिये स्वामी शशांक आनंद ने स्पष्ट कर दिया था कि, कारपोरेट EVM खेल के जरिये देश की क्षेत्रीय पार्टियों को समाप्त कर दो राष्ट्रीय पार्टियों --- भाजपा / कांग्रेस के हाथों सत्ता देखना चाहता है । 
*** जनसंघ के समय से यही प्रयास चल रहा था और USA की व्यवस्था को लाने की कोशिश भी जो 2019 चुनाव अभियानों द्वारा परिलक्षित भी हुआ। 
**** लेकिन बसपा और सपा तथा राजद आदि क्षेत्रीय दलों ने इन आगाह करने वाली बातों पर कतई ध्यान नहीं दिया और उसी का दुष्परिणाम भोगने जा रहे हैं। 

***** सिर्फ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी EVM के खिलाफ तथा Federal Front के पक्ष में मुहिम चलाती रही हैं लेकिन बाकी क्षेत्रीय पार्टियों ने उनकी अनसुनी कर दी थी। अब आगे से ही सही सभी क्षेत्रीय दलों को मिल कर संघीय मोर्चा / फेडरल फ्रंट बना कर कारपोरेट परस्त भाजपा / कांग्रेस को शिकस्त देने की पहल करनी चाहिए और इसमें सभी वाम दलों को भी शामिल होना चाहिए। ------






















Love Dharma
Published on Mar 18, 2017

How EVM Scam is possible?
What is EVM Scam? 
Who is behind this?                  : 


 







   ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, 19 December 2018

यू पी में कांग्रेसविहीन गठबंधन की संभावना ------ नदीम

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नई दिल्ली: पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा किए गए शानदार प्रदर्शन से हर तरफ यह कयास लगाए जा रहें थे कि उत्तर प्रदेश में बनने वाले महागठबंधन में उसकी दावेदारी मजबूत हो गई है. लेकिन ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है.


बता दें कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए बनने वाले गठबंधन से कांग्रेस को बाहर करने का विचार बना लिया है. ये ही नहीं दोनों ही पार्टी में सीटों के बंटवारे का फ़ॉर्मूला लगभग तय माना जा रहा है. बताया जा रहा है कि इसका औपचारिक ऐलान बसपा सुप्रीमो मायावती के बर्थडे यानी 15 जनवरी के दिन किया जा सकता है.

सीट बंटवारे के इस फ़ॉर्मूले पर दोनों ही पार्टियों के नेताओं में आपसी सहमती :
आपको बता दें कि सीटों के बंटवारे के जिस फ़ॉर्मूले पर हामी बन पाई है उसके अनुसार इस गठबंधन में अजीत सिंह की रालोद को भी शामिल किया जा सकता है. लोकसभा चुनाव में भाजपा सरकार को सत्ता से हटाने के लिए बसपा 38, सपा 37 और रालोद तीन सीटों से चुनावी रण में उतर सकती है. ये ही नहीं सपा अपने कोटे की कुछ सीटें भी अन्य छोटी पार्टी जैसे निषाद पार्टी और पीस पार्टी को दे सकती है. कहा जा रहा है कि सीट बंटवारे के इस फ़ॉर्मूले पर दोनों ही पार्टियों के नेताओं में आपसी सहमती बन गई है.

राहुल के उम्मीदावर पद को लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश की न :

कहा जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को गठबंधन का पीएम चेहरा मानने से अखिलेश यादव ने साफ इंकार कर दिया है. अखिलेश का कहना है कि महागठबंधन को लेकर सिर्फ बात चल रहीं है. शरद पवार, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू जैसे अन्य लोग भी इसकी कोशिश कर चुके है. ये जरूरी नहीं की सभी दलों के लोग एक ही नाम पर सहमत हों. फिलाहल महागठबंधन ने अभी कोई मूर्त रूप नहीं लिया है तो राहुल को पीएम कैंडिडेट बताने का प्रस्ताव  नहीं है.

बसपा सुप्रीमो मायावती का जन्मदिवस होगा खास 
बता दें कि मायावती का जन्मदिन लोकसभा चुनाव के लिहाज से काफी मुख्य साबित हो सकता है. मायावती का जन्मदिन 15 जनवरी को उस दिन गठबंधन का ऐलान किया जा सकता है. बसपा मायावती के जन्मदिवस को कल्याणकारी दिवस के रूप में मना सकती है.



https://news4social.com/no-coalition-for-congress-in-sp-and-bsp-for-seat-sharing-formula/

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 21 November 2018

एक चुनावी चाल है ' अर्बन नक्सल ' का हौव्वा ------ शशिधर खान

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 22 October 2018

एन डी तिवारी ------ राजीव नयन बहुगुणा

Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
21-10-2018 
खूब शुद , असबाबे - ख़ुद बीनी शिकस्त 
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आखिर नारायण दत्त तिवारी समय निकाल कर मर ही गए। इस देश में मरने के बाद मनुष्य देव तुल्य हो जाता है। कोई नहीं कहता कि मर गए। बल्कि कहा जाता है कि स्वर्गवासी हो गए , अथवा दिवंगत हो गए। लेकिन चूँकि मुझे पता है कि तिवारी न तो दिवंगत हुए हैं , न स्वर्ग वासी हुए हैं , बल्कि मर गए , जैसे सब मरते हैं। क्या बिडंबना है कि बस दुर्घटना में लोग मर जाते हैं , और विमान दुर्घटना में हताहत होते हैं। इसी तरह सामान्य मनुष्य मर जाता है , जबकि तिवारी जैसा महाजन दिवंगत होता है। 
चूंकि मैं एक चांडाल प्रवृत्ति वाला क्रूर पत्रकार हूँ , कोई नेता नहीं हूं , अतः मरे मनुष्य की भी कपाल क्रिया करता हूँ ।
मैं तिवारी जी की लीलाओं का पिछले कम से कम ४५ साल से एक जिज्ञासु साक्षी रहा हूँ। एक पत्रकार के रूप में मुझे जब भी मेरी रूचि अथवा विशेषग्यता के क्षेत्र पूछे गए , तो मेरा उत्तर सदैव यही रहा - पर्यावरण , संगीत , देशाटन , सेक्स और नारायण दत्त तिवारी। इन सभी विषयों पर मैं आधा घंटे के नोटिस पर एक हज़ार शब्दों का लेख आनन - फानन लिख सकता हूँ। 
नैनीताल ज़िले के एक सुदूर गांव में , अति सामान्य परिवार में जन्मे तिवारी का मूल सर नेम बमेठा है। उनके पहले चुनाव ( १९५२ ) में नारा लगता था - विधना तेरी लीला न्यारी , बाप बमेठा , च्यला तिवारी। सम्भवतः जब वह स्वाधीनता संग्रामै में जेल से छूट कर आगे की पढ़ाई करने इलाहाबाद ( योगी का प्रयाग ) गए , तो अपना अटपटा सर नेम बमेठा बदल कर तिवारी कर दिएै। । क्योंकि यह उत्तराखंड के अलावा बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश का एक प्रचलित सर नेम है। 
विलक्षण और स्वप्रेरित तिवारी 17 साल की उम्र में ही स्वाधीनता संग्राम में जेल यात्रा कर चुके थे। ख़ास बात यह रही कि बाप - बेटे , अर्थात नारायण दत्त तिवारी और उनके पिता , जिनका मुझे अभी नाम याद नहीं आ ,रहा , दोनों एक साथ जेल गए , और जेल से छूट कर पिता - पुत्र ने साथ साथ दसवीं की परीक्षा दी। ज़ाहिर ै कि पिता भी बिंदास पुरुष रहे होंगे। 
कोई आठ साल पहले , जब तिवारी हैदराबाद के राजभवन से अपने मुंह पर कालिख पुतवा कर देहरादून लौटे , तो उनके घर के पास गुज़रते मुझे प्यास लगी। मैंने अपने सहयोगी से कहा - तिवारी के घर की और गाडी मोड़ो , पानी वहीँ पिएंगे। अकेले बैठे तिवारी को मैंने उनके जीवन की कयी ऎसी घटनाएं सुनायीं , जो उन्हें भी याद न थीं। चकित तिवारी बोले - अरे आपको तो मेरे बारे में सब कुछ पता है। आप पहले कभी मिले नहीं। मैंने कहा श्रीमंत , यह मेरी आपसे 174 वीं मुलाक़ात है. पर आपने कभी मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया , क्योंकि मैं औरत नहीं हूँ। ( जारी )
https://www.facebook.com/rajivnayanbahuguna.bahuguna/posts/2241293479428748


विधना तेरी लीला न्यारी 
बाप बमेटा च्यला तिवारी -2
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नारायण दत्त तिवारी विनम्र अवश्य थे , पर खुंदकी भी अव्वल दर्जे के थे । बात को मन मे रखते थे , और प्रतिद्वंद्वी को धीमी आंच के तंदूर की तरह भीतर तक भून देते थे । यूं मेरे पिता के सम्मुख वह सदैव उनकी अभ्यर्थना करते , पर मन ही मन उनसे खुंदक खाते थे । इसके दो कारण थे । प्रथम तो मेरे पिता हेमवती नन्दन बहुगुणा के अधिक क्लोज़ थे । और दूसर वह इंदिरा गांधी से तिवारी की पर्यावरण विरोधी हरकतों की शिकायत कर उन्हें आयरन लेडी से डंटवाते थे । दोनो का प्रसंग संक्षेप में । 
इमरजंसी लगी , तो इंदिरा जी का उद्दाम बेटा संजय कोंग्रेसी मुख्य मंत्रियों को हांकने लगा । इसी क्रम में वह लखनऊ आया , और मुख्य मंत्री बहुगुणा को निर्देश के अंदाज़ पर देषणा देने लगा । बहुगुणा मेरी ही तरह एक नकचढ़े पुरुष थे । उन्होंने संजय से कहा - ये राजनीतिक मसले तुम्हारी मम्मी और मैं सुलझा देंगे । तुम खाओ , खेलो , और अपनी सेहत पर ध्यान दो । फिर अपने स्टाफ को हांक लगाई - अरे देखो , ये बच्चा आया है । इसे फल , दूध मिठाई दो ।
सांवले पहाड़ी के ये तेवर देख संजय जल भुन गया , और पांव पटकता दिल्ली को फिरा । उसने तत्क्षण बहुगुणा को अपदस्त करने की ठान ली । उत्तर प्रदेश के दो व्यक्ति उसका मोहरा बने । प्रथम राज्यपाल एम चेन्ना रेड्डी , और द्वित्तीय बहुगुणा के सीनियर केबिनेट मिनिस्टर तिवारी । चेन्ना रेड्डी बहुगुणा से रंजिश रखता था , क्योंकि बहुगुणा ने अखिल भारतीय कॉंग्रेस कमेटी का महा सचिव रहते उसकी बजाय पीवी नरसिंहराव को आंध्र का cm बनवाया । राव , बहुगुणा की चमचागिरी करता था , और बहुगुणा को चमचागिरी पसन्द थी । 
ये दोनों व्यक्ति आये दिन दिल्ली जाकर बहुगुणा के खिलाफ संजय के कान भरते थे । 
हेमवती बाबू ने एक बार मुझे बताया - जब मैं दिल्ली से इस्तीफा देकर लखनऊ आया , तो मेरी सारी केबिनेट मुझे रिसीव करने हवाई अड्डे पर मौजूद थी । सिर्फ नारायण दत्त न था । मैं तभी समझ गया था कि उत्तर प्रदेश का अगला cm नारायण दत्त होगा । यह भीषण मित्र घात और गुरु द्रोह था । तिवारी को कांग्रेस में बहुगुणा ही लाये थे , और उन्हें यह कह कर महत्वपूर्ण मंत्रालय दिलाये , कि यह मेरे गांव के पास का लड़का है । (जारी )
https://www.facebook.com/rajivnayanbahuguna.bahuguna/posts/2241874469370649

Thursday, 18 July 2013

लोकसभा भंग हो सकती है---अतुल अंजान

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Wednesday, 13 February 2013

कांग्रेस -कौन सी कांग्रेस?---विजय राजबली माथुर

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 hindustaan,lakhnau ,28 janvaree 2013
उपरोक्त  समाचार मे 'राहुल गांधी' को 'कांग्रेस उपाध्यक्ष' बताया गया है। परंतु प्रश्न यह है कि,यह कांग्रेस कौन सी कांग्रेस है?निश्चय ही राहुल जी की कांग्रेस वह कांग्रेस नहीं है जिसने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व किया था।राहुल जी की कांग्रेस मात्र 44 वर्ष की पार्टी है जिसका जन्म उनकी दादी साहिबा द्वारा स्वतन्त्रता आंदोलन की कांग्रेस के प्रति बगावत का नतीजा है।

सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या 'क्रान्ति' के विफल हो जाने के 18 वर्षों बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती (जिनहोने उस संग्राम मे सक्रिय भाग लिया था) सन 1875 ई .मे चैत्र प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र ) के दिन 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी जिसका मूल उद्देश्य जनता को 'ढोंग-पाखंड-आडंबर'के विरुद्ध जाग्रत करके भारत को स्वाधीन करना था। जहां-जहां ब्रिटिश छावनियाँ थीं वहाँ-वहाँ इसकी शाखाओं का गठन प्राथमिकता के आधार पर किया गया । ब्रिटिश हुकूमत ने स्वामी दयानन्द को क्रांतिकारी संत (Revolutionary Saint) की संज्ञा दी थी। भयभीत अङ्ग्रेज़ी सरकार ने लार्ड डफरिन के इशारे पर अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र बनर्जी की अध्यक्षता मे सन 1885 ई मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना करवाई जिसका उद्देश्य 'औपनिवेशिक राज्य'-Dominiyan State की स्थापना था। अतः स्वामी दयानन्द की प्रेरणा से आर्यसमाजी अधिकांश संख्या मे कांग्रेस मे शामिल हो गए और उसका उद्देश्य 'पूर्ण स्वाधीनता' करवाने मे कामयाब रहे। 'कांग्रेस का इतिहास' के लेखक डॉ पट्टाभि सीता रमेय्या ने लिखा है कि,'स्वाधीनता आंदोलन मे जेल जाने वाले कांग्रेसियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे'।

अतः स्वाधीनता आंदोलन को छीण करने हेतु ब्रिटिश सरकार ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को प्रेरित करके 'मुस्लिम लीग' की स्थापना 1906 मे तथा पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा 1920 मे 'हिन्दू महासभा' की स्थापना करवाई। भारतीयों को 'हिन्दू' और 'मुस्लिम' मे विभाजित करके परस्पर विरोध मे ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया किन्तु हिन्दू महासभा ज़्यादा कामयाब न हो सकी । अतः पूर्व कांग्रेसी डॉ हेडगेवार एवं पूर्व क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को माध्यम बना कर  ब्रिटिश सरकार ने RSS की स्थापना 1925 ई मे करवाई। मुस्लिम लीग और RSS ने देश को 'दंगों' की आग मे झोंक दिया जिसकी अंतिम परिणति 'देश-विभाजन' के रूप मे सामने आई।

1925 ई मे देश-भक्त कांग्रेसियों ने 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य देश के स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करना तथा साम्राज्यवादी विदेशी सरकार की विभाजनकारी नीतियों को विफल करना था। 'गेंदा लाल दीक्षित','स्वामी सहजानन्द सरस्वती' सरीखे कट्टर आर्यसमाजी 'क्रांतिकारी कम्युनिस्ट' बने। 'सत्यार्थ प्रकाश' पढ़ कर ही सरदार भगत सिंह जिनके चाचा कट्टर आर्यसमाजी थे 'क्रांतिकारी कम्युनिस्ट' बने।

क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के प्रभाव को छीण करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी के अहिंसक सत्याग्रह के साथ समझौते करने शुरू किए जिसका जनता पर यह प्रभाव पड़ा कि,जनता ने गांधी जी के पीछे खुद को लामबंद कर लिया और इस प्रकार देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधीजी और उनकी कांग्रेस को दे दिया जबकि क्रांतिकारी कम्युनिस्टों तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की INA-आज़ाद हिन्द फौज,एयर फोर्स व नेवी के विद्रोहों का बड़ा योगदान 15 अगस्त 1947 की आज़ादी के पीछे है।

आज़ादी दिलाने का श्रेय मिलना ही कांग्रेस की 'पूंजी' बना और वह सत्ता प्राप्त  कर सकी। शनैः शनैः कांग्रेस सरकार जनता से कटती गई और 'पूंजीपतियों' को समृद्ध करती गई। 1967 मे सम्पूर्ण उत्तर भारत से कांग्रेस की सत्ता का सफाया हो गया। सत्ता पर अपनी पकड़ को बनाए रखने के उद्देश्य से इंदिरा गांधी जी (राहुल साहब की दादी )ने जनता को ठगने हेतु 'समाजवाद' का नारा लगा कर 1969 मे राष्ट्रपति चुनावों मे कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के विरुद्ध निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा करके मूल कांग्रेस से बगावत कर दी और 'इन्दिरा कांग्रेस' की स्थापना की। यह उपाध्यक्ष राहुल साहब इसी बागी कांग्रेस-इन्दिरा कांग्रेस के नेता हैं जिसका उद्देश्य शोषक/उत्पीड़क 'पूँजीपतियों' व 'उद्योगपतियों' का हितसाधन है और इंनका देश के स्वाधीनता आंदोलन से किसी प्रकार का कोई सरोकार कभी भी नहीं रहा है न ही देश की जनता से । न ही इनको कोई अधिकार है कि वह स्वाधीनता आंदोलन की विरासत का खुद को वारिस बताएं। ऐसा करना सिर्फ गलत बयानी ही होगा।

1971 मे बांग्लादेश के स्वाधीनता आंदोलन को सफल समर्थन देकर इंदिराजी की लोकप्रियता बढ़ गई थी और उसी को भुनाते हुये मध्यावधी चुनाव करा दिये थे। प्रचंड बहुमत का दुरुपयोग करते हुये संविधान मे संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष कर दिया था और खुद इन्दिरा जी का राय बरेली का चुनाव हाई कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर देश मे 'आपात काल' थोप कर प्रभावशाली नेताओं को जेलों मे ठूंस दिया था जिनमे 'लोकनायक जय प्रकाश नारायण''भी शामिल थे। जनता के साथ-साथ सरकारी कर्मचारी/अधिकारी बहुत त्रस्त थे और खुफिया विभाग ने गुमराह करके 1977 मे उनसे मध्यवधी चुनाव करवा दिये जिसमे इन्दिरा जी खुद भी और जहां का प्रतिनिधितित्व राहुल कर रहे हैं वहाँ से संजय गांधी भी चुनाव हार गए थे।

1980 के मध्यवधी चुनावों मे राहुल की दादी साहिबा ने RSS से 'गुप्त समझौता ' करके सांप्रदायिक आधार पर बहुमत हासिल कर लिया था और पूर्व 'जनता सरकार' को परेशान करने हेतु अपने द्वारा खड़े किए गए और 'भस्मासुर' बने भिंडरा वाले का सैन्य कारवाई मे खात्मा करा दिया था। परिणाम स्वरूप अपने ही अंग रक्षकों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी जिसकी सहानुभूति प्राप्त कर उनके उत्तराधिकारी -राहुल के पिता राजीव गांधी ने तीन  चौथाई बहुमत हासिल कर लिया था और पहले 'शाहबानों'को न्याय से वंचित करने हेतु 'मुस्लिम सांप्रदायिकता 'फिर राम मंदिर की आड़ मे 'हिन्दू सांप्रदायिकता' से समझौता करके विद्वेष भड़का कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पुरानी नीतियों को लागू कर दिया था । उनके कार्यकाल मे सरकार को कारपोरेट लाबी मे तब्दील कर दिया गया जो उनकी हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर मे प्रधानमंत्री बने पी वी नरसिंघा राव के वित्त मंत्री जो अब पी एम हैं के द्वारा और परिपुष्ट किया गया।

आज की राहुल कांग्रेस घोर जन-विरोधी एवं शोषक/उत्पीड़क शक्तियों का संरक्षक दल बन गई है। 

 वे कम्युनिस्ट जो प्रथम आम चुनावों के जरिये संसद मे 'मुख्य विपक्षी'दल थे और  जिन्हों ने केरल मे विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार का गठन किया था जनता की नब्ज़ न पकड़ने के कारण पिछड़ गए हैं और अब राहुल जी उनको ही देश से उखाड़ फेंकने की दहाड़ लगा रहे हैं। मैं ढाई वर्षों से अपने ब्लाग के माध्यम ('क्रांतिस्वर'---http://krantiswar.blogspot.in)

से अपने विचारों मे जनता की नब्ज़ पर ध्यान रख कर चलने का निवेदन करता रहा हूँ जिसका संकीर्ण साम्यवादी लगातार विरोध करते रहे हैं। खुशी की बात है कि कभी साम्यवादी दल के प्रशिक्षक  रहे डॉ मोहन श्रोत्रिय साहब ने भी आज ऐसे ही विचारों का समर्थन किया है।
Vijai RajBali Mathur shared Mohan Shrotriya's status.13 फरवरी,2013 
किन्तु 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या और 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' के विरुद्ध मेरे 'क्रांतिस्वर' मे अभियान को बामपंथी साथी पुराणपंथियो के स्वर मे स्वर मिला कर विरोध करके उसी पाखंड को मजबूत कर रहे हैं,क्यों?
***इस ओर भी ध्यान दें***

"विकलांग श्रद्धा" के दौर से उबरे बिना बुनियादी समस्याओं पर लोक की लामबंदी एकदम नामुमकिन है. पौराणिक आख्यानों का लोक-चेतना पर कितना गहरा असर है यह बात इस तथ्य से ही स्पष्ट और सिद्ध हो जाती है कि रोज़मर्रा के जीने-मरने के सवालों पर संगठित होने को अनिच्छुक लोग, कितनी बड़ी संख्या में अपने खर्चे पर "परलोक सुधारने" के अनुष्ठानों से जा जुड़ते हैं. भीषण सर्दी और यात्रा की तमाम असुविधाओं को धता बताते हुए.

इस लोक-मनोविज्ञान का अध्ययन करने के साथ-इसे बदलने के समानांतर कार्यक्रमों को हाथ में लिए बगैर किसी अर्थवान सामाजिक बदलाव की बात बेमानी होगी. वामपंथियों को अपने एजेंडे पर इसे रखना होगा अन्यथा किसी भी सामाजिक बदलाव की लड़ाई के ये स्वाभाविक सहभागी अनंत काल तक ऐसी लड़ाइयों से अपनी दूरी बनाए रखेंगे. यह जूनून जो जान चली जाने की आंखों-देखी घटनाओं से भी कम नहीं होता, मनःस्थितियां बदल जाने पर एक बड़े सामाजिक प्रयोजन की पूर्ति में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा कर सकता है. चाहें तो इसे महज़ क़यास कहकर ख़ारिज भी कर सकते हैं, पर ध्यान रहे कि इह-लोक को सुधारने के किसी भी अभियान से इस विशाल जनशक्ति का बाहर रहना भी चिंताजनक तो है ही. करोड़ों लोगों के कुछ मायने तो होते ही हैं. नहीं?

-मोश्रो
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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Tuesday, 15 November 2011

राहुल कांग्रेस को वोट नहीं दोगे तो यही होगा.....

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )

हिंदुस्तान-लखनऊ-15/11/2011 
'बाल दिवस'पर नेहरू जी के क्षेत्र मे उनकी बिटिया के पौत्र द्वारा चुनाव अभियान शुरू किया गया ,उसकी पहली बानगी इस स्कैन मे देखें।

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर