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Thursday, 12 April 2018
Tuesday, 9 September 2014
प्राकृतिक प्रकोप क्यों?---विजय राजबली माथुर
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इसी
लाल चौक के एक होटल में हम लोगों (होटल मुगल शेरटन,आगरा के स्टाफ ) को
1981 में ठहराया गया था;वहाँ के मशहूर 'हाईलैंड फैशन्स' के मालिक गुलाम
रसूल जान साहब के 'होटल हाईलैंड्स',कारगिल के लिए रवाना होने के क्रम में।
तब डल झील और लाल चौक मनोरम था और स्थानीय लोगों का हम लोगों के साथ
व्यवहार सौहाद्र्पूर्ण। बाद में USA प्रेरित अलगाववाद ने सारी रौनक फीकी कर
दी थी। अब USA द्वारा प्रेरित कार्पोरेट्स से प्रायोजित सरकार बनने के
बाद से 'प्राकृतिक' रूप से एक के बाद एक सारे देश की जनता दंडित हो रही है।
Friday, 23 August 2013
आखिर यूँ त्यौहारों की लकीर पीटने से क्या हासिल होता है ?
ढोंग को धर्म मानने का दुष्परिणाम:तथाकथित राष्ट्र वादी का भद्दा कमेन्ट ---
एक तू ही धनवान हैं गोरी बाकी सब कंगाल — — with Vikash Goyal.
आदरणीय डॉ डंडा लखनवी जी ने यह वाजिब सवाल उठाया है -"आखिर यूँ त्यौहारों की लकीर पीटने से क्या हासिल होता है ?"
एक तरफ तो हर त्यौहार को धर्म के साथ जोड़ा जाता है दूसरी ओर धर्म विरुद्ध आचरण किया जाता है तो उससे स्पष्ट है कि धर्म को 'धर्म' के रूप में नहीं बल्कि 'ढोंग-पाखंड-आडंबर'के रूप में केवल 'मौज -मस्ती' के लिए प्रयोग किया जा रहा है। तभी तो कुत्सित विचारों का प्रदर्शन किया जाता है जिन पर डॉ साहब ने समयोचित-सटीक टिप्पणी की है। ऐसे कुत्सित लोगों को रामदेव-आशा राम सरीखे ढोंगियों से बल मिलता है और समाज में अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रतिक्रिया स्वरूप लोग धर्म को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं क्योंकि ढ़ोंगी जो धर्म के ध्वजा वाहक बन जाते हैं। आवश्यकता है ढोंगियों का पर्दाफाश करने एवं 'धर्म' की वास्तविक मीमांसा जन -जन को समझाने की।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Follow · 3 hours ago
एक तू ही धनवान हैं गोरी बाकी सब कंगाल — — with Vikash Goyal.
![]() |
Danda Lakhnavi: आज
रक्षा-बंधन का दूसरा दिन है| अभी रक्षा -बंधन पर बंधा धागा खुला नहीं
होगा ... एक भाई को एक बहन गोरी दिख रही है. आखिर यूँ त्यौहारों की लकीर
पीटने से क्या हासिल होता है ?
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आदरणीय डॉ डंडा लखनवी जी ने यह वाजिब सवाल उठाया है -"आखिर यूँ त्यौहारों की लकीर पीटने से क्या हासिल होता है ?"
एक तरफ तो हर त्यौहार को धर्म के साथ जोड़ा जाता है दूसरी ओर धर्म विरुद्ध आचरण किया जाता है तो उससे स्पष्ट है कि धर्म को 'धर्म' के रूप में नहीं बल्कि 'ढोंग-पाखंड-आडंबर'के रूप में केवल 'मौज -मस्ती' के लिए प्रयोग किया जा रहा है। तभी तो कुत्सित विचारों का प्रदर्शन किया जाता है जिन पर डॉ साहब ने समयोचित-सटीक टिप्पणी की है। ऐसे कुत्सित लोगों को रामदेव-आशा राम सरीखे ढोंगियों से बल मिलता है और समाज में अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रतिक्रिया स्वरूप लोग धर्म को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं क्योंकि ढ़ोंगी जो धर्म के ध्वजा वाहक बन जाते हैं। आवश्यकता है ढोंगियों का पर्दाफाश करने एवं 'धर्म' की वास्तविक मीमांसा जन -जन को समझाने की।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Monday, 29 April 2013
तर्क-वितर्क-कुतर्क का बोलबाला और यथार्थ की अवहेलना---विजय राजबली माथुर
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
हिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक-28-04-2013 के अंक मे शशि शेखर जी का यह संपादकीय तो 'यथार्थ' का प्रकटीकरण करता है किन्तु 'आज',आगरा के स्थानीय संपादक की हैसियत से तब वह भी 'विहिप' के विद्वेषात्मक आंदोलन को हवा देने में अग्रणी थे। विहिप के उसी आंदोलन की परिणति 'बाबरी मस्जिद/राम मंदिर विध्वंस'के रूप मे हुई थी और मुंबई के दंगे भी उसी का परिणाम थे। जिनको 'धर्म' की संज्ञा दी जाती है वस्तुतः वे धर्म नहीं 'अधर्म' के प्रतीक हैं। चाहें साप्रदायिक विषमता हो चाहे चारित्रिक उच्चश्रंखलता सभी का मूल कारण 'धर्म' के 'मर्म'को न समझना है।
'धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरि ग्रह
और ब्रह्मचर्य'। इनको ठुकरा कर जब 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को
धर्म का नाम दिया जाएगा और शोषकों -लुटेरों -व्यापारियों- उद्योगपतियों के
दलालों को साधू-सन्यासी माना जाएगा एवं पूंजी (धन)को पूजा जाएगा तो समाज
वैसा ही होगा जैसा चल रहा है। आवश्यकता है उत्पीड़नकारी
व्यापारियों/उद्योगपतियों तथा उनके दलाल पुरोहितों/पुरोहित् वादियों का
पर्दाफाश करके जनता को उनसे दूर रह कर वास्तविक 'धर्म' का पालन करने हेतु समझाने की।
'देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष,नदी,समुद्र,आकाश,मेघ -बादल,अग्नि,जल
आदि' और 'भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न
(नीर-जल)'चूंकि ये प्रकृति तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है
इसीलिए ये ही 'खुदा' हैं। इन प्रकृति तत्वों का कार्य
G(जेनरेट-उत्पत्ति)+O(आपरेट-पाल न)+D
(डेसट्राय-संहार)। अतः झगड़ा किस बात का?यदि है तो वह व्यापारिक/आर्थिक
हितों के टकराव का है अतः 'शोषण/उत्पीड़न'को समाप्त कर वास्तविक 'धर्म' के
'मर्म' को समझना और समझाना ही एकमात्र हल है।
आजकल ब्लाग और फेसबुक तथा अखबारों में भी बेवजह खुराफ़ातों को धर्म का सम्बोधन देते हुये आपस मे कलह की बातें करते देखा जा सकता है या फिर प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता की आधारहीन बातों के आधार पर 'धर्म' और 'भगवान' की आलोचना करते। ये पढे-लिखे लोग खुद भी यथार्थ-सत्य को समझने व मानने को तैयार नहीं हैं तब जनता को कौन समझाएगा?
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
हिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक-28-04-2013 के अंक मे शशि शेखर जी का यह संपादकीय तो 'यथार्थ' का प्रकटीकरण करता है किन्तु 'आज',आगरा के स्थानीय संपादक की हैसियत से तब वह भी 'विहिप' के विद्वेषात्मक आंदोलन को हवा देने में अग्रणी थे। विहिप के उसी आंदोलन की परिणति 'बाबरी मस्जिद/राम मंदिर विध्वंस'के रूप मे हुई थी और मुंबई के दंगे भी उसी का परिणाम थे। जिनको 'धर्म' की संज्ञा दी जाती है वस्तुतः वे धर्म नहीं 'अधर्म' के प्रतीक हैं। चाहें साप्रदायिक विषमता हो चाहे चारित्रिक उच्चश्रंखलता सभी का मूल कारण 'धर्म' के 'मर्म'को न समझना है।
'धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरि
'देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष,नदी,समुद्र,आकाश,मेघ
आजकल ब्लाग और फेसबुक तथा अखबारों में भी बेवजह खुराफ़ातों को धर्म का सम्बोधन देते हुये आपस मे कलह की बातें करते देखा जा सकता है या फिर प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता की आधारहीन बातों के आधार पर 'धर्म' और 'भगवान' की आलोचना करते। ये पढे-लिखे लोग खुद भी यथार्थ-सत्य को समझने व मानने को तैयार नहीं हैं तब जनता को कौन समझाएगा?
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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