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Saturday, 25 February 2017

स्वामी सहजानंद सरस्वती ------ राम कृष्ण

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राम कृष्ण .
स्वामी सहजानंद सरस्वती
पूरा नाम स्वामी सहजानंद सरस्वती
जन्म 22 फ़रवरी 1889
जन्म भूमि ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 25 जून, 1950
मृत्यु स्थान पटना, बिहार
अभिभावक पिता- बेनी राय
गुरु आदि शंकराचार्य
मुख्य रचनाएँ भूमिहार-ब्राह्मण परिचय, कर्मकलाप आदि
प्रसिद्धि समाज-सुधारक, क्रान्तिकारी, किसान-नेता
विशेष योगदान भारत में किसान आंदोलन शुरू करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को ही जाता है।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी ब्राह्मणों की एकता और संस्कृत शिक्षा के प्रचार पर उनका ज़ोर रहा। सिमरी में रहते हुए सनातन धर्म के जन्म से मरण तक के संस्कारों पर आधारित 'कर्मकलाप' नामक 1200 पृष्ठों के विशाल ग्रंथ की हिन्दी में रचना की।
स्वामी सहजानन्द सरस्वती (जन्म:22 फ़रवरी 1889 ग़ाज़ीपुर - मृत्यु:25 जून, 1950 पटना) भारत के राष्ट्रवादी नेता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। स्वामी जी भारत में 'किसान आन्दोलन' के जनक थे। वे आदि शंकराचार्य सम्प्रदाय के 'दसनामी सन्न्यासी' अखाड़े के दण्डी सन्न्यासी थे। वे एक बुद्धिजीवी, लेखक, समाज-सुधारक, क्रान्तिकारी, इतिहासकार एवं किसान-नेता थे।

आरंभिक जीवन
ऐसे महान सन्न्यासी, युगद्रष्टा और जननायक का जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले के देवा गांव में महाशिवरात्रि के दिन सन् 1889 ई. में हुआ था। स्वामीजी के बचपन का नाम नौरंग राय था। उनके पिता बेनी राय सामान्य किसान थे। बचपन में हीं मां का साया उठ गया। लालन-पालन चाची ने किया। जलालाबाद के मदरसे में आरंभिक शिक्षा हुई। मेधावी नौरंग राय ने मिडिल परीक्षा में पूरे उत्तर प्रदेश में छठा स्थान प्राप्त किया। सरकार ने छात्रवृत्ति दी। पढ़ाई के दौरान ही उनका मन अध्यात्म में रमने लगा। घरवालों ने बच्चे की स्थिति भांप कर शादी करा दी। संयोग ऐसा रहा कि पत्नी एक साल बाद ही चल बसीं। परिजनों ने दूसरी शादी की बात निकाली तो वे भाग कर काशी चले गये।
काशी प्रवास
वहाँ शंकराचार्य की परंपरा के स्वामी अच्युतानन्द से दीक्षा लेकर सन्न्यासी बन गये। बाद के दो वर्ष उन्होंने तीर्थों के भ्रमण और गुरु की खोज में बिताया। 1909 में पुनः काशी पहुंचकर दंडी स्वामी अद्वैतानन्द से दीक्षा ग्रहणकर दण्ड प्राप्त किया और दण्डी स्वामी सहजानंद सरस्वती बने। इसी दौरान उन्हें काशी में समाज की एक और कड़वी सच्चाई से सामना हुआ। दरअसल काशी के कुछ पंड़ितों ने उनके सन्न्यास पर सवाल उठा दिया। उनका कहना था कि ब्राह्मणेतर जातियों को दण्ड धारण करने का अधिकार नहीं है। स्वामी सहजानंद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और विभिन्न मंचों पर शास्त्रार्थ कर ये प्रमाणित किया कि भूमिहार भी ब्राह्मण ही हैं और हर योग्य व्यक्ति सन्न्यास ग्रहण करने की पात्रता रखता है। काफ़ी शोध के बाद उन्होंने भूमिहार-ब्राह्मण परिचय नामक ग्रंथ लिखा जो आगे चलकर ब्रह्मर्षि वंश विस्तर के नाम से सामने आया। इसके ज़रिये उन्होंने अपनी धारणा को सैद्धांतिक जामा पहनाया। सन्न्यास के तदुपरांत उन्होंने काशी और दरभंगा में कई वर्षो तक संस्कृत साहित्य, व्याकरण, न्याय और मीमांसा का गहन अध्ययन किया। साथ-साथ देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों के अध्ययन भी करते रहे।
स्वामी सहजानंद के समग्र जीवन पर नजर डालें तो मोटे तौर पर उसे तीन खंडों में बांटा जा सकता है। पहला खंड है जब वे सन्न्यास धारण करते हैं, काशी में रहते हुए धार्मिक कुरीतियों और बाह्यडम्बरों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते हैं। निज जाति गौरव को प्रतिष्ठापित करने के लिए भूमिहार ब्राह्मण महासभा के आयोजनों में शामिल होते हैं। उनका ये क्रम सन् 1909 से लेकर 1920 तक चलता है। इस दौरान काशी के अलावा उनका कार्यक्षेत्र बक्सर ज़िले का डुमरी, सिमरी और ग़ाज़ीपुर का विश्वम्भरपुर गांव रहता है। काशी से उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण नामक पत्र भी निकाला।
किसान आन्दोलन
महात्मा गांधी ने चंपारण के किसानों को अंग्रेज़ी शोषण से बचाने के लिए आंदोलन छेड़ा था, लेकिन किसानों को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित कर प्रभावी आंदोलन खड़ा करने का काम स्वामी सहजानंद ने ही किया। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में किसान आंदोलन शुरू करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को ही जाता है। एक ऐसा दंडी सन्न्यासी जिसे भगवान का दर्शन भूखे, अधनंगे किसानों की झोपड़ी में होता है, जो परंपारनुपोषित सन्न्यास धर्म का पालन करने की बजाय युगधर्म की पुकार सुन भारत माता को ग़ुलामी से मुक्त कराने के संघर्ष में कूद पड़ता है, लेकिन अन्न उत्पादकों की दशा देख अंग्रेज़ी सत्ता के भूरे दलालों अर्थात देसी ज़मींदारों के ख़िलाफ़ भी संघर्ष का सूत्रपात करता है। एक ऐसा सन्न्यासी, जिसने रोटी को ही भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया।
कांग्रेस से जुड़ाव
स्वामीजी के जीवन का दूसरा अध्याय तब शुरू होता है, जब 5 दिसम्बर 1920 को पटना में कांग्रेस नेता मौलाना मजहरुल हक के आवास पर महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात होती है। गांधीजी के अनुरोध पर वे कांग्रेस में शामिल होते हैं। साल के भीतर हीं वे ग़ाज़ीपुर ज़िला कांग्रेस का अध्यक्ष चुने गये और कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में शामिल हुए। अगले साल उनकी गिरफ्तारी और एक साल की कैद हुई। जेल से रिहा होने के बाद बक्सर के सिमरी और आसपास के गांवों में बड़े पैमाने पर चरखे से खादी वस्त्र का उत्पादन कराया। ब्राह्मणों की एकता और संस्कृत शिक्षा के प्रचार पर उनका ज़ोर रहा। सिमरी में रहते हुए सनातन धर्म के जन्म से मरण तक के संस्कारों पर आधारित 'कर्मकलाप' नामक 1200 पृष्ठों के विशाल ग्रंथ की हिन्दी में रचना की। काशी से कर्मकलाप का प्रकाशन किया।
किसान संगठन
महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन जब बिहार में गति पकड़ा तो सहजानंद उसके केन्द्र में थे। घूम-घूमकर उन्होंने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ लोगों को खड़ा किया। इसी दौरान स्वामी जी को लगा कि बिहार के गांवों में ग़रीब लोग अंग्रेज़ों से नहीं वरन् गोरी सत्ता के इन भूरे दलालों से आतंकित हैं। किसानों की हालत ग़ुलामों से भी बदतर है। युवा सन्न्यासी का मन एक बार फिर से नये संघर्ष की ओर उन्मुख हुआ। वे किसानों को लामबंद करने की मुहिम में जुट गये। 17 नवंबर, 1928 को सोनपुर में उन्हें बिहार प्रांतीय किसान सभा का अध्यक्ष चुना गया। इस मंच से उन्होंने किसानों की कारुणिक स्थिति को उठाया। एक साथ जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने और ज़मीन पर रैयतों का मालिकाना हक दिलाने की मुहिम शुरू की। अप्रैल, 1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में 'अखिल भारतीय किसान सभा' की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद सरस्वती को उसका पहला अध्यक्ष चुना गया। स्वामी सहजानंद ने नारा दिया था-
"जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो क़ानून बनायेगा
ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा।"
कारावास के दौरान
कांग्रेस में रहते हुए स्वामीजी ने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त कराने का अभियान जारी रखा। उनकी बढ़ती सक्रियता से घबड़ाकर अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल में डाल दिया। कारावास के दौरान गांधीजी के कांग्रेसी चेलों की सुविधाभोगी प्रवृति को देखकर स्वामीजी हैरान रह गये। कांग्रेस के नेता कारावास के दौरान सुविधा हासिल करने के लिए छल-प्रपंच का सहारा ले रहे थे। स्वभाव से हीं विद्रोही स्वामीजी का कांग्रेस से मोहभंग होना शुरू हो गया। इस दौरान एक और घटना हुई। 1934 में जब बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तब स्वामीजी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के काम में भाग लिया।लेकिन किसानों जमींदारों के अत्याचार से पीड़ित थे। जमींदारों के लठैत किसानों को टैक्स भरने के लिए प्रताड़ित कर रहे थे। पटना में कैंप कर रहे महात्मा गांधी से मिलकर स्वामीजी ने ये हाल सुनाया। कहते हैं कि गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने के लिए स्वामीजी को कहा। ऐसा सुनना था कि स्वामी सहजानंद गुस्से में लाल हो गये और चले गये। जाते-जाते उन्होंने गांधीजी को कह दिया कि अब आपका और मेरा रास्ता अलग-अलग है। स्वामीजी का मानना था कि जो राजे-रजवाड़े और जमींदार अंग्रेजों की सरपरस्ती कर रहे हैं, उनसे किसानों का भला नहीं हो सकता है। चाहे वो दरभंगा महाराज ही क्यों न हो। इसी प्रकरण के बाद सहजानंद ने कांग्रेस में अपनी सक्रियता कम कर दी और किसान सभा के कार्य में मन-प्राण से जुट गये।
ज़मींदारी विरोधी आंदोलन
स्वामी सहजानन्द सरस्वती के सम्मान में जारी डाक टिकट
स्वामीजी के जीवन का तीसरा चरण तब शुरू होता है जब वे कांग्रेस में रहते हुए किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को हीं जीवन का लक्ष्य घोषित करते हैं। उन्होंने नारा दिया- कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा ज़िन्दाबाद । बाद में यहीं नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया। वे कहते थे - अधिकार हम लड़ कर लेंगे और जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे। उनका ओजस्वी भाषण किसानों पर गहरा असर डालता था। काफ़ी कम समय में किसान आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया। स्वामीजी का प्रांतीय किसान सभा संगठन के तौर पर खड़ा होने के बजाए आंदोलन बन गया। हर ज़िले और प्रखण्डों में किसानों की बड़ी-बड़ी रैलियां और सभाएँ हुईं। बाद के दिनों में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी नेताओं से हाथ मिलाया। सर्वश्री एम जी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंड़ित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुना कार्यजी जैसे वामपंथी और समाजवादी नेता किसान आंदोलन के अग्रिम पंक्ति में। आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी. सुन्दरैया और बंकिम मुखर्जी जैसे तब के कई नामी चेहरे भी किसान सभा से जुड़े थे। वामपंथी रुझान के चलते सीपीआई उन्हें अपना समझती रही और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ भी वे अनेक रैलियों में शामिल हुए। आज़ादी की लड़ाई के दौरान जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो नेताजी ने पूरे देश में 'फ़ारवर्ड ब्लॉक' के ज़रिये हड़ताल कराया।
स्वामी सहजानंद ने पटना के समीप बिहटा में सीताराम आश्रम स्थापित किया जो किसान आंदोलन का केन्द्र बना। वहीं से वे पूरे आंदोलन को संचालित करते रहे। संघर्ष के साथ-साथ स्वामी जी सृजन के भी प्रतीक पुरुष थे। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद स्वामीजी ने सृजन का कार्य जारी रखा। दो दर्जन से ज़्यादा पुस्तकों की रचना की। मेरा जीवन संघर्ष नामक जीवनी लिखी।
अन्तिम समय
जमींदारी प्रथा के ख़िलाफ़ लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून ,1950 को मुजफ्फरपुर में महाप्रयाण कर गये। आज़ादी मिलने के साथ ही सरकार ने क़ानून बनाकर ज़मींदारी राज को खत्म कर दिया। मरणोपरांत ही सही स्वामी जी की सबसे बड़ी मांग पूरी हो गयी, लेकिन किसानों को सुखी-समृद्ध और खुशहाल देखने की उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। वैश्वीकरण की आंधी ने तो अब किसानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर छोड़ दिया है। किसान पहले से कहीं ज़्यादा असंगठित हैं और कर्ज़ के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने को विवश हैं। देश में किसानों के संगठन कई हैं, लेकिन एक भी नेता ऐसा नहीं है, जो किसानों में सर्वमान्य हो और जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हो। ऐसे समय में स्वामी सहजानंद और ज़्यादा याद आते हैं, जिन्होंने किसान को संगठित और शोषण मुक्त बनाने में अपना सम्पूर्ण जीवन बलिदान कर दिया। उनके निधन के साथ हीं भारतीय किसान आंदोलन का सूर्य अस्त हो गया। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में दलितों का सन्न्यासी चला गया। स्वामीजी द्वारा प्रज्जवलित ज्योति की लौ मद्धिम ज़रूर पड़ी है, बुझी नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे किसान-मज़दूर आंदोलन इसके उदाहरण हैं।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1846724022264391&set=a.1382415478695250.1073741826.100007804330133&type=3

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 24 June 2015

प्रतिभा की धनी, कलम की खिलाड़ी और महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत अनीता गौतम जी ------ रूपेश वत्स


 जन्म दिवस : 24 जून पर विशेष ------



Anita Gautam shared Rupesh Vats's post.
रूपेश वत्स जी, पता नहीं आपके द्वारा दिए गए इस सम्मान के हकदार हैं भी या नहीं , पर आभारी है आपके इस अनोखी पहल में जगह पाकर। तहे दिल से शुक्रिया ।



https://www.facebook.com/anita.gautam.39/posts/794873853934922

एक बेहतर सफल गृहणी के साथ-साथ अपने सपनो को पूरा करना किसी चुनौती से कम नहीं ! इसके लिए जज्बा और हिम्मत की जरूरत होती है जो शायद हर महिलाओं में नहीं होती है ! “पत्रकार एक नजर में” सीरिज के 18वें अंक में मिलिए प्रतिभा की धनी, कलम की खिलाड़ी और महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत अनीता गौतम जी से :-
अनिता गौतम जी का जन्म 24 जून को पटना में हुआ था ! इनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, पटना में हुयी ! इन्होने एम.ए की पढाई इतिहास विषय से ए.एन. कॉलेज पटना, मगध विश्वविद्यालय से की ! हिन्दी लेखन में इनकी विशेष रूचि रही है राजनीति पर विशेष नजर के साथ-साथ समाजिक सरोकार से जुड़ी ख़बरें लिखना इन्हें खूब पसंद है ! इनका मानना है की सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर लिखने से ही समाजिक उत्थान संभव है ! पहली बार इनकी एक अपनी कविता के अलावा दो रिपोर्ट दिल्ली से निकलने वाली अखबार अमृत-वर्षा में छपी थी । इसके बाद इन्होने पत्रकारिता की शुरुआत की ! अनीता जी डीएनए, बिंदिया , प्रभात खबर, स्कैनर, चर्चित बिहार, बिहार अभ्युदय आदि मैगजीन और अखबारों के लिए भी लगातार विभन्न विषयों पर लिखती रही हैं ! वर्तमान समय में तेवर तेवरऑनलाइन डॉट कॉम (www.tewaronline.com) में संयुक्त संपादक के पद पर कार्यरत हैं । इसके अलावा भारत के पड़ोसी देशों से बनते बिगड़ते रिश्ते और इनमें सुधार की गुंजाइश पर नजर रखना भी इनके शौक में शामिल है । बिहार की बेहतरी के लिए भी लिखना इन्हें अच्छा लगता है। ये महिला और उनसे जुड़ी समस्याएं और उनके निदान पर विचार- विमर्श में शामिल होती रहती हैं हाल ही में मुझे भी इन्हें दूरदर्शन पर वाद-विवाद में देखने का मौका मिला ! इनकी एक खासियत यह भी है की ये सिर्फ बहस में भाग नहीं लेती बल्कि बहस के बाद जो निकल कर आता है उन पर लिखती भी है । नये लेखकों की किताबें पढ़ना और उनकी समीक्षा करना इनके शौक में शुमार है साथ ही लिखना और खूब पढ़ना पसंद है। कहानी औऱ कविता लिखना , छोटी छोटी लाइनों में अपनी बात लिखना , हिन्दी को सरह बनाती हैं ! इनका यह मानना है की अलंकृत भाषा ने युवा पीढी को हिन्दी से दूर कर दिया है इसलिए ये आसान शब्दों में अपनी बात को युवाओं को समझाने की कोशिश करती हूं। सोशल साईट फेसबुक पर भी इनकी जोरदार उपस्थिति हैं व्यक्तिगत तौर पर मैं इनके लिखे किसी सन्देश, खबरे आदि मिस नहीं करता ! इनके लेखनी में केवल दम ही नहीं बल्कि बेहतरीन जानकारी छिपी होती है ! अनीता जी हमारे समाज के लिए किसी आदर्श से कम नहीं हैं ! मैं इनके लेखनी का मुरीद हूँ और इनके होंसले और जज्बे को सलाम करता हूँ ! इनकी लिखी एक कहानी आप भी इस लिंक को खोलकर पढ़ सकते हैं **+**
 http://tewaronline.com/?p=2181&cpage=1#comment-9084
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**+**इंगित कहानी पर मैंने यह टिप्पणी दी थी :
vijai mathur says:
‘सच्चा प्यार’ और ‘दिली मोहब्बत’ को ‘बेबसी’ के रूप मे मार्मिक ढंग से पेश करके आपने समाज मे व्याप्त ढ़ोंगी -पाखंडी धार्मिक रूढ़ियों के जिंदंगियों पर पड़ने वाले ‘मनोवैज्ञानिक प्रभाव’ को बखूबी रेखांकित किया है।
http://tewaronline.com/?p=2181&cpage=1#comment-9084 
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 https://www.facebook.com/anita.gautam.39/posts/668987146523594

मीडिया में आधी आबादी की नगण्य भागीदारी!

अनिता गौतम.
मीडिया में महिलाओं की भूमिका उनकी स्थिति और स्थान आज चौतरफा बहस का मुद्दा बना हुआ है। हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को अनमने मन से भले स्वीकार किया जा रहा है पर उनकी वास्तविक स्थिति आज भी समाज में कमतर आंकी जाती है।  मीडिया संस्थानों में महिला पत्रकारों की स्थिति दोयम दर्जे की है, इस कड़वे सच से इनकार नहीं किया जा सकता है। कदम कदम पर यहां नारी विभेद की तस्वीर बिल्कुल साफ देखी जा सकती है।
महिलाओं की स्थिति की समीक्षा जब कभी करने की कोशिश होती है, तो उसी क्षेत्र के पुरुषों की कार्य शैली से की जाती है। आकड़ों को ही आधार बनाया जाये तो पत्रकारिता में आज महिला कहां खड़ी हैं, खासकर पुरुषों की तुलना में तो उनकी असमान्य उपस्थिति को समझना मुश्किल नहीं है। दूसरे कार्यक्षेत्रों की तरह मीडिया में भी नारी विभेद का मतलब उनकी क्षमता को कम कर के आंकना, पुरुषवादी सोच और महिलाओं की दीन-हीन दशा का प्रस्तुतिकरण ही आधार बनता है। सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर होती कि स्त्री के आधुनिकीकरण और उनके बराबरी के अधिकारों को भी मनोविज्ञान की कसौटी पर तराशा जाता है।
नारी विभेद और मनोवैज्ञानिक आधार उन्हें संरंक्षण की श्रेणी में लाता है पर खुल कर लिखने की आजादी से वंचित कर देता है। महिला पत्रकार का मतलब महिलाओं की समस्या को समझने की कोशिश और उसी आधार पर लेखन की उम्मीद, व्यवहारिक समस्याओं के समाधान की पहल, समाज में स्त्री पर बर्बरता की कहानियों के आधार पर महिला पत्रकारों की लेखनी का बांधा जाना मीडिया में महिलाओं के लिये सर्वमान्य है।
देश की राजधानी की बात अगर छोड़ दे तो छोटे छोटे राज्यों और गांव कस्बों में महिला पत्रकार अपनी मूलभूत सुविधाओं तक से भी वंचित हैं। यूं तो पत्रकार को किसी जेंडर में नहीं बांधा जा सकता है पर बात जब लेखनी और उसकी स्वतंत्रता की हो तो इस अलगाव को बड़ी सहजता से समझा जा सकता है। महिला पत्रकारिता सुरक्षा और संरंक्षणात्मक हो गयी है जबकि इसे अपनी पहचान और बराबरी की दरकार है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के साथ साथ मीडिया हाउस भी महिला पत्रकारिता में बराबरी की अवहेलना करता आया है।
आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छा शक्ति से भरी महिलायें बड़ी संख्या में पत्रकारिता में अपने कदम रखती है, परन्तु पुरुषों की सनक भरी पत्रकारिता की शिकार होकर हाशिये पर ढकेल दी जाती हैं या फिर उनकी कलम की धार को कांट-छांट और संपादन के नाम पर कुंद कर दिया जाता है।
इन सबके साथ समय समय मीडिया में महिला की स्थिति की जो तस्वीर निकल कर आती है उस से पूरी पत्रकारिता को शर्मशार होना पड़ता है।
साहित्य और मीडिया में महिलाओं की लेखनी अपने मुकाम तक पहुंचे इसके लिए उनकी भागीदारी को बढ़ाना, साथ में हर गतिविधि में उन्हें सम्मान मिले ऐसी संभावनाओं पर विचार करने की जरुरत है। सुरक्षा, सहयोग, संकोच और विशेष सुविधाओं से बाहर आकर अपने अस्तित्व की पहचान करनी होगी।  व्यवहारिक स्तर पर मानसिकता की बराबरी को तवज्जो देना और आत्मसम्मान की जरूरत पर बल देने की आवश्यकता है।



Friday, 23 January 2015

राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय धन का समान बंटवारा हो --- नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 4 April 2013

विकास सहयात्री मे प्रकाशित लेख---विजय राजबली माथुर

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पटना से प्रकाशित होने वाली  त्रै मासिकी-विकास सहयात्री ,मार्च 2013 मे प्रकाशित लेख।
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर