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Monday, 5 November 2018

पटना हो या लखनऊ पुलिस का कार्पोटीकरण व सांप्र्दायिकीकरण हो चुका है

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 25 August 2018

डरा और अपमानित पुलिस बल स्वतंत्र व निष्पक्ष कार्य कैसे करे ? ------ नवीन जोशी

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भाजपाइयों के साथ अलग और गैर - भाजपाइयों के साथ अलग व्यवहार करने का पुलिस को निर्देश होगा इन दोनों घटनाओं से तो यही सिद्ध होता है ------







 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 4 June 2018

पुलिस संवेदनहीन क्यों ? : रिटायर्ड IPS की नजरों से ------ ध्रुव गुप्त

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इतनी संवेदनहीन क्यों है हमारी पुलिस ?
(सौजन्य अखबार 'सुबह सवेरे')



Dhruv Gupt
04-06-2018 

अभी कुछ ही दशक पहले की बात है कि गांव-मुहल्लों में पुलिस के सिपाही को भी देखकर लोग रास्ता बदल लेते थे या घरों में छुप जाते थे। बच्चों में तो भगदड़ ही मच जाती थी जिन्हें होश संभालने के पहले से ही पुलिस से डरना सिखाया जाता था। 'भागो, पुलिस आई' उस दौर का मुहाबरा था। यह देश के मानस में अंग्रेजों की सामंती पुलिस की स्मृतियों का अवशेष था। अभी का मुहाबरा है - 'मारो, पुलिस आई !' पुलिस के प्रति अविश्वास और गुस्सा आज इतना गहरा हो चला है कि गालियां तो आम बात है, उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर लोग पत्थर उठा लेते हैं। गलतियां न भी हो तो गैरकानूनी हरकतें रोकने के दौरान भी पुलिस को मार ही खानी पड़ती है। पिछले कुछ सालों में पुलिस और पुलिस प्रतिष्ठानों पर हमले बेतहाशा बढे हैं। पुलिस का दुर्भाग्य है कि देश की आज़ादी के बाद उसे इन्हीं दो अतियों के बीच काम करना पड़ा है। पुलिस का ही क्यों, यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी दुर्भाग्य की बात है कि लोकतंत्र में पुलिस की त्राता, मित्र और सहयोगी की जो छवि बननी चाहिए थी, वह कभी बन ही नहीं पाई। पुलिस और नागरिकों के बीच का यह फासला और अविश्वास भारतीय समाज में उद्दंडता और अराजकता बढ़ने की प्रमुख वजहों में एक है।

हमारी पुलिस पर सबसे बड़े आरोप भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के हैं। पुलिस में भ्रष्टाचार तो है और उसकी जड़ें भी बहुत गहरी फैली हुई हैं। लेकिन भ्रष्टाचार सिर्फ पुलिस की समस्या नहीं है। देश की लगभग हर संस्था आज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। जब देश की राजनीतिक व्यवस्था ही भ्रष्टाचार से संचालित हो तो उसकी शाखाओं और संस्थाओं से ईमानदारी की उम्मीद करना फ़िज़ूल है। यह छुपी हुई बात नहीं है कि पुलिस में बड़े पदों पर राजनीति से प्रेरित पदस्थापनाएं होती हैं। जो राजनेताओं को जितना खुश कर सके उसको उतना ही प्रमुख और मलाईदार पद। कुछ प्रदेशों में तो पुलिस जिलों की नीलामी तक होती है। इसका असर पुलिस के अधीनस्थ पदों पर पड़ना स्वाभाविक है। चंद अपवादों को छोड़ दें तो विधि-व्यवस्था की सबसे बुनियादी संस्था थानों के प्रभारी अधिकारियों के पद राजनीतिक पैरवी और पैसों के बल पर बांटे जाते है। ऐसे पुलिस अधिकारियों की जनपक्षधरता कैसी और कितनी होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। जबतक राजनीतिक व्यवस्था की ईमानदारी, जनपक्षधरता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता स्थापित नहीं होगी, पुलिस तो क्या किसी भी संस्था से ईमानदारी की अपेक्षा दिवास्वप्न ही साबित होगी। जिले का पुलिस नेतृत्व अगर ईमानदार है, आमलोगों से उसका सीधा संवाद है और जनता का भरोसा उसके प्रति बना हुआ है तो स्थिति में थोड़ा-बहुत तात्कालिक सुधार ही लाया जा सकता है।

पुलिस की छवि बिगाड़ने में जिस चीज का सबसे बड़ा योगदान है, वह है उसकी संवेदनहीनता। कुछ हद तक अमानवीयता भी। आम तौर पर हालत यह है कि अपनी फ़रियाद लेकर आम लोग थानों में जाने से डरते हैं। रसूखदार और संपन्न लोगों को वहां कोई कठिनाई नहीं होती। उन्हें सम्मान भी मिलता है और उनकी बात भी सुनी जाती है। अपवादों को छोड़ दें तो आम लोगों के पास अगर राजनीतिक पैरवी और गांठ में पैसे न हो तो उन्हें कोई सुनता नहीं। केस दर्ज भी हो गया तो कार्रवाई नहीं होती। स्त्रियां रात में तो क्या, दिन के उजाले में भी थाने का दरवाजा खटखटाने का साहस आज भी कम जुटा पाती हैं। केसों की तफ्तीश में लापरवाही और मनमर्जी, संदेह के आधार पर या बिना आरोप साबित हुए मनमानी गिरफ्तारी, गिरफ्तारियों में पहुंच और पैसों का अंतहीन खेल, पुलिस कस्टडी में महिलाओं से दुर्व्यवहार, आरोपियों की निर्मम पिटाई और पिटाई से मौत, अपराधी बताकर लोगों की नकली मुठभेड़ में हत्या, राजनीतिक पक्षपात, उद्दंडता और जनता से दुर्व्यवहार ऐसी आम शिकायतें हैं जो लोगों को पुलिस से लगातार दूर कर रही है। इसका असर विधि-व्यवस्था पर ही नहीं, पुलिस की कार्यक्षमता पर भी पड़ा है। आम लोगों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध के अभाव में उसे अपराध और अपराधियों के बारे में अपेक्षित सूचनाएं नहीं मिलतीं। उग्र प्रदर्शनों, सड़क जाम और दंगों की स्थिति में उसे लोगों का सहयोग नहीं मिलता। जनसहयोग से जो समस्याएं बातचीत से हल हो सकती हैं, जनसहयोग के अभाव में शान्ति की बहाली के लिए बल-प्रयोग और कभी-कभी पुलिस फायरिंग का भी सहारा लेना पड़ता है। लब्बोलुबाब यह कि पुलिस की विश्वसनीयता के अभाव में स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है और राजनीतिक नेतृत्व इन बुरे हालात से आंखें चुराए बैठा है।

आखिर हमारी पुलिस इस कदर संवेदनहीन क्यों हैं ? सरकार के सभी अंग संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाएं तो देश चल जाएगा, लेकिन पुलिस अगर संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाय तो देश नहीं चल सकता। पुलिस के कंधे पर भ्रष्टाचार और अराजकता से लड़ने और और जनता में व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करने की महती ज़िम्मेदारी है। भारत की पुलिस अपने गठन से लेकर अबतक जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं पर कभी खरी नहीं उतरी है। ऐसा नहीं है कि पुलिस की छवि सुधारने और उसकी कार्यप्रणाली को लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए कोशिशें नहीं हुई है। पुलिस आयोगों के गठन से लेकर उनके प्रशिक्षण का स्तर और उनकी सुविधाएं बेहतर करने के कई कदम उठाए गए हैं, मगर आधे-अधूरे मन से। देश के लगभग हर राज्य में पुलिस के वेतन-भत्ते बढ़े हैं, अपराधियों से लड़ने के लिए उन्हें इंटरनेट फ्रेंडली और डिजिटल बनाया गया है तथा आधुनिक हथियार भी उपलब्ध कराए गए हैं। इन उपायों से पुलिस के छानबीन के तरीकों में तब्दीली जरूर आई है और आपराधिक मामलों में उसकी सफलता का प्रतिशत भी बढ़ा है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है पुलिस की संवेदनहीनता और अमानवीयता। यह समस्या पुलिस के उच्च अधिकारियों में कम, अधीनस्थ अधिकारियों और सिपाहियों में ज्यादा है। दुर्भाग्य से आम लोगों का पाला पुलिस के बड़े अधिकारियों से कम, निचले अधिकारियों और सिपाहियों से ही ज्यादा पड़ता है।

पुलिस की असंवेदनशीलता का एक कारण उसपर काम का जरूरत से ज्यादा बोझ, अवकाश की कमी और उनसे उपजा तनाव भी है जो कुछ परिस्थितियों में अवसाद का रूप भी ले लेता है। यह स्थिति तभी बदल सकती है जब चौबीसों घंटे उन्हें तनाव में रखने के बजाय पुलिस के काम के घंटे सीमित किये जायं। उप निरीक्षक और सहायक उप निरीक्षक स्तर तक के पुलिस के लगभग सभी अधिकारियों को अपने परिवार के साथ रहने की सुविधा हासिल है। बुरी हालत किसी भी थाने, पुलिस पोस्ट या पुलिस लाइन में नियुक्त सिपाहियों की होती हैं जो आम तौर पर एक ही कमरे में पशुओं की तरह रहने को विवश होते हैं। उन्हें परिवार के साथ रहने की इजाजत तो नहीं ही होती हैं। अधिकारियों द्वारा विधि-व्यवस्था की बढ़ती समस्याओं की तुलना में सिपाहियों की सीमित संख्या के कारण उनकी छुट्टियों में भी कंजूसी बरती जाती है। सभी सिपाहियों को घर देना तो संभव नहीं है, अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए उन्हें उदारता से छुट्टियां देकर उनके तनाव को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। विधि-व्यवस्था संधारण के दौरान अपना दायित्व निभा रहे पुलिसकर्मियों के साथ भीड़ का दुर्व्यवहार भी उन्हें गुस्से से भर देता है। दुर्घटनाओं के बाद सड़क जाम की स्थिति में बिना दोष के भी पत्थर पुलिस को ही खाने पड़ते हैं। प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्रों में जाने से रोकना पुलिस का कानूनी दायित्व है। दुर्भाग्य से पुलिस को सबसे ज्यादा ईंट-पत्थर इन प्रदर्शनकारियों से ही खाने पड़ते हैं। इन परिस्थितियों में निचले स्तर के पुलिस वालों में गुस्सा और प्रतिशोध की भावना पैदा होती है जिसकी परिणति अक्सर बर्बर लाठीचार्ज और पुलिस फायरिंग में होती है। धीरे-धीरे यह गुस्सा पुलिसकर्मियों का स्वभाव बन जाता है।

गड़बड़ी की शुरुआत दरअसल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों की चयन-प्रक्रिया से ही हो जाती है। उनके चयन में मानसिक नहीं, शारीरिक बल और क्षमता को आधार बनाया गया है। शारीरिक स्वास्थ पुलिस की सेवा में एक आवश्यक तत्व है, लेकिन चयन में प्रत्याशियों के मानसिक और भावनात्मक स्तर की उपेक्षा के दुखद परिणाम सामने आये हैं। कुछ स्तरों पर लिखित परीक्षाएं भी ली जाती हैं, लेकिन उनसे प्रत्याशियों की रटंत क्षमता का ही पता चलता है, योग्यता और संवेदनाओं का नहीं। रही-सही कसर उनके प्रशिक्षण के दौरान पूरी हो जाती है। यहां तमाम जोर चुने गए पुलिसकर्मियों की शारीरिक क्षमता और परेड तकनीक के विकास और क़ानून की किताबों की पढ़ाई पर ही होता है। आधुनिक हथियारों और वैज्ञानिक अनुसंधान के इस दौर में पुलिस का पहलवान होना जरूरी नहीं है। होना यह चाहिए था कि इन चीजों के अलावा उनके भीतर की मानवीयता और संवेदना को जगाने के लिए उन्हें मानविकी, मसलन समाजशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला जैसे विषयों की भी शिक्षा दी जाती। जिनके हाथ में आपने हथियार थमाए हैं, संवेदनाओं की सबसे ज्यादा ज़रुरत उनको ही है। यह न हो तो हथियार हमेशा गलत जगह पर ही चलेंगे। व्यवहारिक प्रशिक्षण के दौरान उन्हें थानों के हृदयहीन माहौल में बिठाने के अलावा पिछड़े क्षेत्र में गरीबों, दलितों और न्याय की आस लगाए लोगों की बस्तियों में भी कुछ वक्त बिताने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि आम लोगों की तकलीफों और संघर्षों से उनका निकट का परिचय रहे। उन्हें यह महसूस कराया जाय कि वे शासक नहीं सेवक हैं और अपने सेवा-काल में उनका पाला दुश्मनों से नहीं, अपने ही लोगों से पड़ना है।


सक्षम और मानवीय पुलिस-व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्तों में एक है। यह लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को मजबूत करती है। अगर इसका अभाव है तो समाज में अशांति है। अशांति है तो कोई भी विकास संभव नहीं है। अंग्रेजों से विरासत में मिली पुलिस-व्यवस्था में सुधार कर उसे संवेदनशील और लोगों की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य से यह कभी हमारी प्राथमिकता-सूची में भी शामिल नहीं रहा। पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए बनाये गए पुलिस आयोगों की अनुशंसाओं को आधा-अधूरा ही लागू किया गया। पुलिस को एक मानवीय संगठन बनाने की जगह उसे देह-हाथ से मजबूत संवेदनहीन और बर्बर लोगों का संगठन बनाकर रख दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि आज पुलिस और जनता साथ-साथ नहीं, आमने-सामने खड़े हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और जल्दी बदलनी चाहिए। पुलिस सुधार के लिए सरकार को तत्काल कदम तो उठाने ही होंगे। उससे भी बड़ी जरूरत इस बात की है कि पुलिस और आमजन के बीच के फासले कम करने के ईमानदार प्रयास किये जायं। यह दोतरफा प्रक्रिया है। इसके लिए पुलिस को जनता के प्रति अपना सामंती व्यवहार बदलना होगा। लाठियों और गालियों से तौबा कर अपने व्यवहार और संवेदनशीलता से लोगों का विश्वास अर्जित करना होगा। अपनी वर्तमान संरचना में यह काम पुलिस खुद-ब-खुद नहीं करेगी। राजनीतिक व्यवस्था अगर ईमानदार और इच्छाशक्ति से भरी है तो वह उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकती है। जनता तो एक बेहतर और मित्रतापूर्ण पुलिस व्यवस्था की आस ही लगाए बैठी है। जिस दिन उसकी उम्मीदें पूरी होती दिखेंगी, वह पुलिस को अपने सर-आंखों पर बिठा लेगी।
साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1742963082446949&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Monday, 3 July 2017

हिंदुस्तान की हिंदुस्तानियत ख़त्म हो रही है : रूपरेखा वर्मा ------ मुलायम यादव

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Thursday, 21 May 2015

साजिश और परिवार : विद्वजन के विचार

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( परिवार नागरिकता की प्रथम पाठशाला होते हैं अतः रंजना कुमारी जी द्वारा समाज सुधार हेतु परिवार की पहल पर जो ध्यानाकर्षण किया है उस पर गंभीरता से विचार कर अनुपालन करने की ज़रूरत है। --- विजय राजबली माथुर )

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 15 April 2015

एक हिन्दुस्तानी हकीकत :रस्सी का साँप --- अमित सिंह शिवभक्त नंदी

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 एक हिन्दुस्तानी हकीकत :

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10153172376217052&set=a.10152344320177052.1073741826.675882051&type=1&theater
 
एक बार एक दरोगा जी का मुंह लगा नाई पूछ बैठा -
"हुजूर पुलिस वाले रस्सी का साँप कैसे बना देते हैं ?"

दरोगा जी बात को टाल गए।

लेकिन नाई ने जब दो-तीन
बार यही सवाल पूछा तो दरोगा जी ने मन ही मन तय किया कि इस भूतनी वाले को बताना ही पड़ेगा कि रस्सी का साँप कैसे बनाते हैं !

लेकिन प्रत्यक्ष में नाई से बोले - "अगली बार आऊंगा तब
बताऊंगा !"

इधर दरोगा जी के जाने के दो घंटे बाद ही 4 सिपाही नाई
की दुकान पर छापा मारने आ धमके - "मुखबिर से पक्की खबर मिली है, तू हथियार सप्लाई करता है। तलाशी लेनी है दूकान की !"

तलाशी शुरू हुई ...

एक सिपाही ने नजर बचाकर हड़प्पा की खुदाई से निकला जंग लगा हुआ असलहा छुपा दिया !

दूकान का सामान उलटने-पलटने के बाद एक सिपाही चिल्लाया - "ये रहा रिवाल्वर"

छापामारी अभियान की सफलता देख के नाई के होश उड़ गए - "अरे साहब मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता"।

"आपके बड़े साहब भी मुझे अच्छी तरह पहचानते हैं !"

एक सिपाही हड़काते हुए बोला - "दरोगा जी का नाम लेकर बचना चाहता है ?

साले सब कुछ बता दे कि तेरे गैंग में कौन-कौन है ...
तेरा सरदार कौन है ... तूने कहाँ-कहाँ हथियार सप्लाई किये ... कितनी जगह लूट-पाट की ...
आ चल तू अभी थाने चल !"

थाने में दरोगा साहेब को देखते ही नाई पैरों में गिर पड़ा - "साहब बचा लो ... मैंने कुछ नहीं किया !"

दरोगा ने नाई की तरफ देखा और फिर सिपाहियों से पूछा - "क्या हुआ ?"

सिपाही ने वही जंग लगा असलहा दरोगा के सामने पेश कर दिया - "सर जी मुखबिर से पता चला था .. इसका गैंग है और हथियार सप्लाई करता है.. इसकी दूकान से ही ये रिवाल्वर मिली है !"

दरोगा सिपाही से - "तुम जाओ मैं पूछ-ताछ करता हूँ !"

सिपाही के जाते ही दरोगा हमदर्दी से बोले - "ये क्या किया तूने ?"

नाई घिघियाया - "सरकार मुझे बचा लो ... !"

दरोगा गंभीरता से बोला - "देख ये जो सिपाही हैं न ...साले एक नंबर के कमीने हैं ...
मैंने अगर तुझे छोड़ दिया तो ये साले मेरी शिकायत ऊपर अफसर से कर देंगे ...
इन कमीनो के मुंह में हड्डी डालनी ही पड़ेगी ...
मैं तुझे अपनी गारंटी पर दो घंटे का समय देता हूँ , जाकर किसी तरह बीस हजार का इंतजाम कर ..
पांच - पांच हजार चारों सिपाहियों को दे दूंगा तो साले मान जायेंगे !"

नाई रोता हुआ बोला - "हुजूर मैं गरीब आदमी बीस हजार कहाँ से लाऊंगा ?"

दरोगा डांटते हुए बोला - "तू मेरा अपना है इसलिए इतना सब कर रहा हूँ तेरी जगह कोई और होता तो तू अब तक जेल पहुँच गया होता ...जल्दी कर वरना बाद में मैं कोई मदद नहीं कर पाऊंगा !"

नाई रोता - कलपता घर गया ... अम्मा के कुछ चांदी के जेवर थे

चौक में एक ज्वैलर्स के यहाँ सारे जेवर बेचकर किसी तरह बीस हजार लेकर थाने में पहुंचा और सहमते हुए बीस हजार रुपये दरोगा जी को थमा दिए !

दरोजा जी ने रुपयों को संभालते हुए पूछा - "कहाँ से लाया ये रुपया?"

नाई ने ज्वैलर्स के यहाँ जेवर बेचने की बात बतायी तो दरोगा जी ने सिपाही से कहा - "जीप निकाल और नाई को हथकड़ी लगा के जीप में बैठा ले .. दबिश पे चलना है !"

पुलिस की जीप चौक में उसी ज्वैलर्स के यहाँ रुकी !

दरोगा और दो सिपाही ज्वैलर्स की दूकान के अन्दर पहुंचे ...

दरोगा ने पहुँचते ही ज्वैलर्स को रुआब में ले लिया - "चोरी का माल खरीदने का धंधा कब से कर रहे हो ?"

ज्वैलर्स सिटपिटाया - "नहीं दरोगा जी आपको किसी ने गलत जानकारी दी है!"
दरोगा ने डपटते हुए कहा - "चुप ~~~ बाहर देख जीप में
हथकड़ी लगाए शातिर चोर बैठा है ... कई साल से पुलिस को इसकी तलाश थी ... इसने तेरे यहाँ जेवर बेचा है कि नहीं ? तू तो जेल जाएगा ही .. साथ ही दूकान का सारा माल भी जब्त होगा !"

ज्वैलर्स ने जैसे ही बाहर पुलिस जीप में हथकड़ी पहले नाई को देखा तो उसके होश उड़ गए..

तुरंत हाथ जोड़ लिए - "दरोगा जी जरा मेरी बात सुन लीजिये!

कोने में ले जाकर मामला एक लाख में सेटल हुआ !

दरोगा ने एक लाख की गड्डी जेब में डाली और नाई ने जो गहने बेचे थे वो हासिल किये फिर ज्वैलर्स को वार्निंग दी - "तुम शरीफ आदमी हो और तुम्हारे खिलाफ पहला मामला था इसलिए छोड़ रहा हूँ ... आगे कोई शिकायत न मिले !"

इतना कहकर दरोगा जी और सिपाही जीप पर बैठ के
रवाना हो गए !

थाने में दरोगा जी मुस्कुराते हुए पूछ रहे थे - "साले तेरे को समझ में आया रस्सी का सांप कैसे बनाते हैं !"

नाई सिर नवाते हुए बोला - "हाँ माई-बाप समझ गया !"

दरोगा हँसते हुए बोला - "भूतनी के ले संभाल अपनी अम्मा के गहने और एक हजार रुपया और जाते-जाते याद कर ले ...

हम रस्सी का सांप ही नहीं बल्कि नेवला .. अजगर ... मगरमच्छ सब बनाते हैं .. बस
 







 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 6 March 2014

चिकित्सकों को जन-विरोधी सिद्ध करने का औचित्य क्या है?












फेसबुक तथा समाचार-पत्रों के माध्यम से एक बड़ा वर्ग कानपुर के चिकित्सा  छात्रों एवं चिकित्सक/शिक्षकों के साथ हुये अन्यायपूर्ण अत्याचार के बावजूद समस्त चिकित्सक समुदाय को दोषी सिद्ध करके बर्बर पुलिस और अमानवीय प्रदेश सरकार को बचाने का प्रयास कर रहा है।

उपरोक्त दोनों वीडियों का अवलोकन करने तथा चिकित्सकों के बयानों का अध्ययन करने से ज्ञात होगा कि किस प्रकार पुलिस के माध्यम से छात्रों एवं शिक्षक चिकित्सकों को पुलिस द्वारा उत्पीड़ित कराया गया है इस संबंध में कानपुर के जिलाधिकारी का कहना है कि छात्रावास में पुलिस जाने की उनको जानकारी थी। क्या उन्होने प्राचार्य से पुलिस प्रवेश की अनुमति ली थी? यदि नहीं तो पुलिस के साथ-साथ वहाँ के जिलाधिकारी भी  इस उत्पीड़न में भागीदार हैं और बेगुनाह मरीजों की मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। 


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=295422987277272&set=gm.616254928457429&type=1&theater शिक्षा  संस्थानों में पुलिस का प्रवेश ब्रिटिश शासन में भी वर्जित था और बगैर प्राचार्य की पूर्वानुमती के पुलिस विद्यालय अथवा छात्रावास में नहीं घुस सकती थी। एक उदाहरण इस संबंध में शाहजहाँपुर के मिशन हाईस्कूल का देना उपयुक्त रहेगा। सभी जानते थे कि राम प्रसाद बिस्मिल जो वहाँ कक्षा नौ के छात्र थे देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। सरकार ने खुफिया जानकारी के आधार पर उनको गिरफ्तार करने हेतु स्कूल भेजा था किन्तु प्राचार्य महोदय ने बिस्मिल जी की देश-भक्ति के मद्देनजर उनको गिरफ्तार न होने देने का निश्चय करके पुलिस को अपने कार्यालय में उलझाए रख कर कक्षाध्यापक के पास संदेश भेजा कि हाज़िरी रजिस्टर में रामप्रसाद को 'अनुपस्थित' दिखा कर कक्षा से भगा दें।रामप्रसाद जी ऊपरी मंजिल की कक्षा में थे और खिड़की के जरिये पेड़ पर कूद कर नीचे उतर  कर गायब हो गए जब पुलिस का कक्षा में प्रवेश हुआ वह वहाँ नहीं मिले हाजिरी  रजिस्टर में भी गैर-हाजिर पाये गए। 

लेकिन इस वीडियों में डॉ प्रोफेसर साहब बता रहे हैं कि पुलिस ने गेट बंद करवाकर छात्रों के साथ-साथ उनको भी पीटा और गालियां दी तथा गिरफ्तार करके थाने भेज दिया। गुलाम भारत में विद्यालय के अध्यापकों ने क्रांतिकारी बिस्मिल को बचा लिया किन्तु आज़ाद भारत में छात्रों को बचाने की प्रक्रिया में शिक्षक चिकित्सक भी पिटे व गिरफ्तार हुये जिसके  लिए कानपुर के जिलाधिकारी और एस पी सीधे -सीधे तथा प्रदेश सरकार अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं।  

डाक्टरों के आंदोलन के संबंध में पुलिस और प्रशासन की बदनीयती का एक और उदाहरण आगरा का है। सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज के जूनियर डाक्टर्स का आंदोलन था और उस समय के एस पी सिटी ( जो DG भी बने ) ने मजिस्ट्रेट से ब्लैंक साईंन  करा कर रखे वारंट्स के आधार पर डाक्टर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। भाकपा ने डाक्टरों का समर्थन किया और अपने कार्यालय से मशाल जुलूस निकाला था। राजा-की-मंडी चौराहे पर पहुँचते ही  जुलूस में शामिल जिलामंत्री कामरेड रमेश  मिश्रा समेत सभी लोगों को उस एस पी सिटी द्वारा हस्तगत ब्लैंक  वारंट्स के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया । यहाँ तक कि डॉ जवाहर सिंह धाकरे जो उस एस पी सिटी के शिक्षक भी रहे थे को भी नहीं बकशा  गया। सहायक जिलमंत्री डॉ महेश चंद्र शर्मा जी और मैं बच कर पार्टी कार्यालय आ गए और पार्टी कार्यालय नियमित खुलता रहा। रोजाना डाक्टरों व कम्युनिस्ट नेताओं के समर्थन में मजदूर भवन से  गिरफ्तारी आंदोलन चला। किसी ने भी जमानत नहीं कराई और अंत में पंद्रह दिन बाद  सभी को बिना शर्त रिहा किया गया। 

मुकदमा पार्टी नेताओं पर आगजनी व अशांति भड़काने का लगाया गया था। बाज़ार के दूकानदारों ने सभी गिरफ्तारियों की निंदा की थी और पुलिस के  आरोपों को झूठा साबित कर दिया था। लेकिन कानपुर में चिकित्सकों के साथ हुई इस ज्यादती पर कुछ लोग डाक्टरों को ही गुनाहगार ठहरा रहे हैं जो सर्वथा गलत है। जनता को डाक्टरों के साथ खड़े होना चाहिए अन्यथा फासिस्ट सरकार आने वाले समय में दूसरे वर्गों का भी जब उत्पीड़न करेगी तब उनको भी जन-समर्थन मिलना मुश्किल हो जाएगा।