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Tuesday, 14 July 2020

नेपाल से सम्बन्ध बिगाड़ना घातक होगा ------ अतुल सती जोशीमठ

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14-07-2020 


पहले नया  नक्शा पास किया । विवादित क्षेत्र अपने नक्शे में दर्शाए । फिर सीमा पर तनाव की स्थिति बनाई । भारतीय न्यूज चैनल पर प्रतिबंध लगाया । अब यह बयान अयोध्या राम आदि पर आया है  । 
शुरू में यह मात्र भारतीय विस्तारवाद की राजनैतिक लाइन पर ही बात थी । जो कि नेपाल में वर्षों से प्रमुख मुद्दा रहा है । सीमा विवाद भी बहुत समय से है । और उस पर कोई बात न होने के चलते वह बढ़ता गया है । नेपाल में आये भूकम्प के बाद भारतीय सरकार की प्रतिक्रिया से जो नाराजगी बनी थी उसने इसमें थोड़ा और बढ़ोतरी की थी । भारत की सरकार के नाकेबंदी वाले कदम ने भी सम्बन्धों को कडुवाहट में बदलने के साथ नेपाल को चीन के और करीब किया । उसके बाद नोटबन्दी विवाद ने इस खाई को और चौड़ा और गहरा किया । भारत सरकार बन्द किये करेंसी को लेने को तैयार न हुई । 
इस तरह पिछले कुछ सालों में दूरियां बढ़ती गयीं । किन्तु यह राजनैतिक थीं कूटनीतिक थीं । 
भारत नेपाल की जनता का आपसी सम्बन्ध यथावत रहता आया है । सांस्कृतिक एकता में फर्क नहीं आया । किन्तु संवादहीनता ने व भारतीय मीडिया की प्रतिक्रिया ने वापसी के संवाद के रास्ते भी बन्द करने शुरू किए । नेपाल भारत की सेना के तुनात्मक व्यौरे दिए जाने लगे । नेपाल के प्रधानमंत्री के चीनी राजदूत के साथ रिश्ते जोड़ते हुए अनाप शनाप , बेहूदा भाषा में खबरें चलाई जाने लगी । इसकी प्रतिक्रिया वहां से होनी ही थी हुई । किन्तु सरकार की तरफ से आधिकारिक रूप से कोई पहल नहीं दिखाई दी । 
अब जो बयान आया है नेपाल के प्रधानमंत्री का वह ज्यादा चिंताजनक व गम्भीर है । अयोध्या राम को लेकर । भले ही उसको लेकर तमाम हंसी ठिठोली हो रही है , पर यह गम्भीर चिंता का विषय होना चाहिए । क्योंकि अब तक जो भी हुआ वह राजनैतिक कूटनीतिक दूरी ही बन रही थी । जो भविष्य में सरकारों के बदलने पर सामान्य हो सकती थी । जिसमें बातचीत, समझौते, सन्धियों के जरिये पुनः सम्बन्धों को पटरी पर लाया जा सकता था, पुनर्बहाल किया जा सकता था । किंतु यह बयान भारत नेपाल के बीच जो सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं वर्षो वर्ष से उस पर चोट है । उन सम्बन्धों को भी समाप्त करने की तरफ पहल है । भारत नेपाल की जनता के मध्य जो रोटी बेटी का नाता रहा है यह बयान उन रिश्तों को चुनौती है । इसलिए इस बयान को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए । किन्तु भारत में जिस तरह का माहौल बना दिया गया है और शीर्ष नेतृत्व जिस तरह की आत्ममुग्धता और अहम का शिकार है उसमें यह उम्मीद करना कि वह इसकी गम्भीरता को 
समझ कोई पहल करेगा, बेमानी है । 
सोसियल मीडिया में तो इस बयान का हल्के फुल्के में मजा लिया जा सकता है पर वास्तविक समाज में यह भविष्य में बड़ी चुनौती बनेगा । 

चीन ने धमकाते हुए कहा ही है कि यदि भारत ने सीमा पर गलती की तो तीन तरफ से मोर्चे खुलेंगे । अमेरिका इजरायल बहुत दूर हैं आग लगेगी तो पानी लेकर दौड़े भी तो तब तक सब राख हो चुकेगा । पड़ोसी बदले नहीं जा सकते वक़्त जरूरत वही बाल्टी ले खड़े हो सकते हैं ।  उनसे सम्बन्ध बिगाड़ना घातक होगा । खासकर नेपाल से  ।
साभार : 
https://www.facebook.com/atul.sati.5/posts/3148336838577510?__cft__[0]=AZWzBo4Hsjdfmeq6yXd-C8yncD41onjwTEZbdXp9ijw2w53bllxauTNZcFWkmTIHMZ_-8xX79ryEMwtJVtOw133K4o1F9LQMCDM3pgWV-4MLireRMGtKvaiUy6m-ga-DvJ9yVYkRhC6dWe_Ix1jBtvbP&__tn__=%2CO%2CP-R

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

( नेपाली प्रधानमंत्री  के पी शर्मा ओली का दावा कि अयोध्या और राम नेपाल के थे तो गलत हो सकता है परंतु अवध क्षेत्र पुराने फैजाबाद वाली अयोध्या को सम्राट हर्ष वर्द्धन ने ' साकेत ' नाम से बसाया था । त्रेता वाली अयोध्या तो वस्तुतः वह नहीं है । ) 
------ विजय राजबली माथुर 

Sunday, 28 January 2018

नारी - सम्मान हेतु मिथ्या मिथकों को त्यागना होगा ------ विजय राजबली माथुर

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परिवार नागरिकता की प्रथम पाठशाला होते हैं वहीं से भेदभाव रहित व्यवहार शुरू करने होंगे। पोंगापंथियों द्वारा गढ़े गए प्रक्षेपकों जैसे श्री कृष्ण गोपियों से रास रचाते थे उनके कपड़े ले भागे थे और राम ने स्वर्ण नखा (अपभ्रंश सूपनखा ) को लक्ष्मण के पास तथा लक्ष्मण ने राम के पास भेजा आदि को निषिद्ध करना होगा उनका प्रतिकार करना होगा। वस्तुतः श्री कृष्ण व राम दोनों तत्कालीन राजनीति में शोषित- उत्पीड़ित वर्ग के साथ शोषकों / साम्राज्यवादियों के विरुद्ध संघर्ष के अगुवा थे। इसलिए पुरोहित वर्ग से शोषक शासकों ने उनको बदनाम करने हेतु प्रक्षेपक डलवाए थे जिंनका समाज के पतन में व्यापक हाथ है। अपनी युवा पीढ़ी को सच्चाई से रू -ब - रू करवाकर समस्या का समाधान प्राप्त किया जा सकता है। 


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 10 March 2015

गांधी जी पर लांछन क्यों? --- विजय राजबली माथुर

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http://vijai-vidrohi.blogspot.in/2015/03/gandhi-british-agent-markandey-katju.html 

https://www.facebook.com/justicekatju/posts/933487810025099 
 हालांकि जस्टिस काटजू का यह कहना कि गांधी जी ने 'क्रांतिकारी आंदोलन' की धार कुन्द कर दी और अधिकांश क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई तो सही है परंतु 'भारत-विभाजन' के लिए उनको उत्तरदाई ठहराना उनके साथ अन्याय होगा एवं अप्रत्यक्ष रूप से RSS/भाजपा के गलत विचारों को प्रोत्साहन देना भी  । 1857 की प्रथम क्रान्ति का हश्र गांधी जी के समक्ष था कि किस प्रकार पारस्परिक फूट से उसे विफल किया गया था अतः 'अहिंसा और सत्याग्रह' का मार्ग अपनाना उनकी एक रणनीतिक सफलता थी । विभाजन तो अमेरिकी राष्ट्रपति आईजेन हावर की दुर्नीति के कारण सामने आया था जिसे कमजोर होते जा रहे ब्रिटिश साम्राज्य को भी मानना ज़रूरी हो गया था। 
 यह एक सुनिश्चित ब्राह्मणवादी विचार धारा है कि भारत के प्रतीक महा पुरुषों को बुरी तरह बदनाम कर के जनता को दिग्भ्रमित किया जाये। इसी कारण पौराणिक ग्रन्थों के जरिये 'राम' और 'कृष्ण' के चरित्रों पर लांछन लगाए गए दूसरी ओर उनको अलौकिक घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी गई जिसके जरिये ब्राह्मणों को रोजगार मिल गया। शेष जनता उनके क्रांतिकारी विचारों से अनभिज्ञ होने के कारण लाभ न उठा सकी। आधुनिक युग में एक बार फिर गैर ब्राह्मण महा पुरुषों पर लांछन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है जिससे उन लोगों को लाभ पहुंचाया जा सके जो साम्राज्यवाद के पिट्ठू रहे हैं और इसी लिए त्याग,बलिदान करने वाले महा पुरुषों पर ये कीचड़ उछाले जा रहे हैं।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=846099345452043&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater
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जस्टिस काटजू जातिवाद पर चल कर गैर ब्राह्मण महा पुरुषों पर लांछन लगा रहे हैं। अब नेहरू जी को भी गांधी जी के विरुद्ध घसीट लिया है। महात्मा गांधी जी के साथ-साथ नेताजी सुभाष बोस को भी विदेशी एजेंट घोषित करके जस्टिस काटजू RSS के इतिहास पुनरलेखन का कार्य संपादित कर रहे हैं।

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Friday, 5 August 2011

'तुलसी की महत्ता' --- विजय राजबली माथुर

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28 जूलाई 1982 को 'सप्तदिवा'आगरा मे प्रकाशित यह लेख 30 वर्ष की आयु की समझ से लिखा था जिसे आज 29 वर्ष बाद पुनः प्रकाशित कर रहे हैं तुलसी दास जी की जयंती-श्रावण शुक्ल सप्तमी के अवसर पर ।

खेद यह है कि कुछ दूसरे ब्लागो पर आपको तुलसी दास जी का दूसरा रूप दिखाया जाएगा जो उनका था नहीं। तमाम लोग भक्ति-अध्यात्म के नाम पर महान 'ऐतिहासिक-राजनीतिक ग्रंथ' को जनता के सामने पाखंडी रूप मे प्रस्तुत करते और तमाम वाहवाही लूटते हैं। अफसोस आज के विज्ञान के युग मे भी लोग-बाग अपनी सोच को परिष्कृत नहीं करना चाहते। खैर मैंने अपना फर्ज अदा किया है। -



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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07-08-2015 ---