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Friday, 26 July 2019
Thursday, 2 May 2019
Wednesday, 15 August 2018
Saturday, 7 October 2017
बी जे पी को विरोध नहीं चाहिए --- शरद यादव / विकल्प न होने की बात डिक्टेटरशिप है --- विनोद दुआ
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जहां मोदी समर्थक पत्रकार विपक्ष का नेता न होने की बात कह कर सरकार की खामियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं वहीं वास्तविक पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करने वाले विनोद दुआ जी का अभिमत है कि, विकल्प हीनता की बात लोकतान्त्रिक नहीं डिक्टेटरशिप की बात है।
संकलन - विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
जहां मोदी समर्थक पत्रकार विपक्ष का नेता न होने की बात कह कर सरकार की खामियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं वहीं वास्तविक पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करने वाले विनोद दुआ जी का अभिमत है कि, विकल्प हीनता की बात लोकतान्त्रिक नहीं डिक्टेटरशिप की बात है।
संकलन - विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Monday, 2 January 2017
यह लोकतंत्र की लड़ाई है पिता के सम्पत्ति की नहीं ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव
लेकिन जब शरीर और दिमाग दोनों थक जाएँ लेकिन राजनीतिक वासना पहले से भी ज्यादा लोलुप हो जाए तो परिणाम मुलायम हो ही जाता है।किसी बड़ी मजबूरी के तहत मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास चला गया है।वो समाजवादी पार्टी का निर्विवादित भूत तो हैं लेकिन वर्तमान और भविष्य कतई नहीं।............................अखिलेश यादव को विष का पान कर महादेव बनने का अवसर मिल गया है।राजनीति में नेता वही है जिसके साथ जनता है।अखिलेश को आसुरी शक्तियों का विनाश करना ही चाहिए।ये आगे बढ़ने का समय है।
Rajanish Kumar Srivastava
समाजवादी पार्टी का संघर्ष वास्तव में एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री और एक भटके एवं भ्रमित पार्टी अध्यक्ष के सही गलत फैसलों से सम्बन्धित है उसे पिता और पुत्र के पारिवारिक संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दरअसल राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जिसमें रिटायरमेंट की कोई उम्र ही नहीं होती।लेकिन जब शरीर और दिमाग दोनों थक जाएँ लेकिन राजनीतिक वासना पहले से भी ज्यादा लोलुप हो जाए तो परिणाम मुलायम हो ही जाता है।किसी बड़ी मजबूरी के तहत मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास चला गया है।वो समाजवादी पार्टी का निर्विवादित भूत तो हैं लेकिन वर्तमान और भविष्य कतई नहीं।
सारी दिक्कत दो पृथक मुद्दों को पृथक रूप से नहीं देख पाने के कारण हो रही है।यह भारतीय राजनीति में पहली बार हुआ है कि ठीक चुनाव के पहले एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री को एक पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी से निष्कासित कर दिया हो। जबकि हर सर्वे में अखिलेश की लोकप्रियता अपनी पार्टी से लगभग दोगुनी है।यह उसी तरह है कि एक पिता खुद पुत्र का विवाह तय करे और बारात के दिन जिद्द करे कि बारात पुत्र के बिना जाएगी।एक मुख्यमंत्री लगातार गुहार लगा रहा था कि इस चुनाव में चूँकि जनता मेरे कार्यों का मुल्याँकन करने जा रही है इसलिए उत्तरपुस्तिका मुझे लिखने दी जाए।लेकिन निष्ठुर पिता और स्वयं से निर्णय कर पाने में असमर्थ पार्टी अध्यक्ष ने अपने मुख्यमंत्री को बिना उत्तरपुस्तिका दिए ही परीक्षा में बैठाने की जिद्द पकड़ रखी थी।लोकतंत्र में अलग पार्टी वो बनाता है जिसे पार्टी में बहुमत प्राप्त ना हो। यह पूरा मसला लोकतंत्र और राजनीति का है।यह पूरी लड़ाई एक मुख्यमंत्री और एक पार्टी अध्यक्ष के सही गलत फैसलों की है ना कि कोई पारिवारिक विरासत की।लोकतंत्र में बहुमत ही निर्णायक होता है और चुने सांसदों तथा विधायकों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं में 90% का बहुमत अखिलेश के पास है।अलग पार्टी मुलायम सिंह यादव को बनानी पड़ेगी।यह लोकतंत्र की लड़ाई है पिता के सम्पत्ति की नहीं।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1769884630002810&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3
क्या मुलायम सिंह यादव का रिमोट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के हाथ में है? सभ्य और शिष्ट तथा विकास के नाम पर चुनाव लड़ने की घोषणा करने और बाहुबलियों को टिकट ना देने की भरपूर कोशिश करने वाले अपने ही लोकप्रिय मुख्यमंत्री को पार्टी से निकालने का दुस्साहस भला कोई यूँ ही कर सकता है।मुलायम सिंह यादव किसी बहुत बड़ी मजबूरी में ऐसा विनाश काले विपरीत बुद्धि वाला निर्णय ले सकते हैं । लेकिन सारे सर्वे यही बताते हैं कि लोकप्रिय युवा मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को अपनी समाजवादी पार्टी से भी ज्यादा लोकप्रियता हासिल है।यकीन मानिए मुलायम सिंह यादव का रिमोट किसी और के पास है वरना कोई यूँ ही अपने पैर पर कुल्हाडी नहीं मार लेता है।
समुद्र मंथन में पहले विष निकला था बाद में अमृत।अमृत के लिए राक्षस और देवता लड़ मरे थे लेकिन विष का पान कर मानवता को जिसने बचाया था वह गरलकंठ महादेव कहलाए थे।अखिलेश यादव को विष का पान कर महादेव बनने का अवसर मिल गया है।राजनीति में नेता वही है जिसके साथ जनता है।अखिलेश को आसुरी शक्तियों का विनाश करना ही चाहिए।ये आगे बढ़ने का समय है।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1768165316841408&set=a.1488982591426350.1073741827.100009438718314&type=3
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| 02-01-2016 |
Wednesday, 20 July 2016
Thursday, 24 April 2014
सत्ता की भागीदारी से उपेक्षित वर्ग कैसे दूर रक्खा जाए ? ---तुकाराम वर्मा
विश्व के मानवीय समाज के बीच चोरी को कब से अपराध घोषित किया गया इसका उत्तर बीस वर्षों से अत्यधिक अन्वेषण करने पर भी कहीं से किसी स्रोत से नहीं मिल सका| हाँ इतना तो सुनिश्चित हो गया कि जब कुछ लोगों ने संघठित शक्ति और समूहों ने लूट के द्वारा अपार संपत्ति को एकत्र कर लिया तो उस लूटी हुई उनकी संपत्ति को कोई और न लूट सके इस कारण चोरी और लूट को सामाजिक अपराध मान लिया गया|
कालांतर में राज्य व्यवस्था बनने के बाद उसे कानूनी मान्यता दे दी गई| यह सब राजशाही के दौरान हुआ, फिर भी लूट का उद्योग चलता रहा और एक राजा दूसरे राजा पर आक्रमण करके उसकी संपत्ति को लूटने में विजय और शौर्य के रूप में पहचान पाता रहा| इसे उस राजा के धार्मिक पुरोहितों ने मान्यता दी तथा राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बनाकर जनता से स्वीकार्य करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया| इस सहयोग के लिए धार्मिक तंत्र और उसके आचार्यों को राजा से पुरस्कार एवं सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होती रही|
विश्व में लोकतंत्र आने के बाद साधारण जनता को सत्ता की भागेदारी मिलने लगी
जिस कारण स्थापित भोगवादी तंत्र को अपने को स्थापित किये रहने का खतरा
बढ़ने लगा| अब चिंतनीय प्रश्न यह उभरा कि जनता को सत्ता से कैसे अलग रक्खा
जाए अतः दुरभिसंधियां रची आने लगी और प्रतिमान रूप में स्वच्छ दिखने वाली
व्यवस्था के पीछे शोषण लूट और अर्थ का स्थापित साम्राज्य अधिक मजबूत किया
जाने लगा|
सम्प्रति धनतंत्र प्रभावी है, दुनिया को बाजार चला रहा है| राजनेता बाजारवाद से ग्रसित हैं और पूँजीपतियों के इशारों को समझकर अपना मुँह खोलते हैं| जिन कमजोर वर्गों के नेताओं ने इस साजिश को समझा और उसे उजागर करने का प्रयास किया उनपर शिकंजा कसा गया और संगठित होकर व्यवस्था, सत्ता, धर्मतंत्र और औद्योगिक घरानों ने उन्हें अपमानित और बदनाम करना प्रारम्भ कर दिया|
चूँकि निर्वाचन के लिए राजनैतिक दल बनाना उसे चलाना अर्थ के बिना संभव नहीं अतः इन दलों को आर्थिक सहयोग से वंचित रक्खा गया और जब इन्होंने अपने आपको आर्थिक सुदृढ़ता के अपने स्तर से प्रयास किए तो उसे वर्षों से भ्रष्टाचार करते आ रहे वर्ग ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घेरना प्रारम्भ कर दिया, जिससे उन्हें सत्ता से बेदखल किया जा सके अथवा वह वर्ग इनके अधीन चलने वाले दलों में शामिल होकर उनकी दासता को शिरोधार्य कर ले|
ऐसा कहकर यहाँ कमजोर वर्ग के भ्रष्ट आचरण को बचाने का प्रयास नहीं किया जा रहा अपितु यह स्पष्ट करने की कोशिश है कि सत्ता की भागीदारी से उपेक्षित वर्ग कैसे दूर रक्खा जाए तथा स्थापित वर्ग का वर्जस्व बना रह सके और लोकतंत्र का केवल प्रदर्शनीय चेहरा सामने रहे|
यह विचार किसी भी तरह से एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लोकतंत्र के पथिकों के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं कि किसी को सत्ता प्राप्त करने के लिए ईश्वर ने चुना है| यह काल्पनिक भ्रामक मनगढंत ढोंग है कि अमुक व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा चुन लिया गया है| भारतीय संवैधानिक व्यवस्था ऐसे किसी विचार को मान्यता नहीं देती जिसके लिए कोई प्रमाणिक साक्ष्य न हो, क्या इस कथन के प्रमाण में परमेश्वर उनके लिए साक्ष्य के रुप में उपस्थित हो सकता है? कदाचित नहीं|
हमारा संसद भवन ईश्वर का मंदिर नहीं अपितु जनता का मंदिर है, इसमें ईश्वर के प्रतिनिधियों की नहीं अपितु जनता के प्रतिनिधियों की आवश्यकता एवं उपयोगिता है| ईश्वर के प्रतिनिधि को जनता से वोट माँगने की क्या जरूरत? ऐसा लग रहा है कि जनता का अपार धन जो ईश्वर के मंदिरों में भरा पड़ा है वह इनके प्रचार में प्रयुक्त हो रहा है|
ईश्वर के प्रतिनिधियों को ईश्वर के मंदिर में जाकर सेवकाई करनी चाहिये|
सम्प्रति धनतंत्र प्रभावी है, दुनिया को बाजार चला रहा है| राजनेता बाजारवाद से ग्रसित हैं और पूँजीपतियों के इशारों को समझकर अपना मुँह खोलते हैं| जिन कमजोर वर्गों के नेताओं ने इस साजिश को समझा और उसे उजागर करने का प्रयास किया उनपर शिकंजा कसा गया और संगठित होकर व्यवस्था, सत्ता, धर्मतंत्र और औद्योगिक घरानों ने उन्हें अपमानित और बदनाम करना प्रारम्भ कर दिया|
चूँकि निर्वाचन के लिए राजनैतिक दल बनाना उसे चलाना अर्थ के बिना संभव नहीं अतः इन दलों को आर्थिक सहयोग से वंचित रक्खा गया और जब इन्होंने अपने आपको आर्थिक सुदृढ़ता के अपने स्तर से प्रयास किए तो उसे वर्षों से भ्रष्टाचार करते आ रहे वर्ग ने भ्रष्टाचार के आरोपों में घेरना प्रारम्भ कर दिया, जिससे उन्हें सत्ता से बेदखल किया जा सके अथवा वह वर्ग इनके अधीन चलने वाले दलों में शामिल होकर उनकी दासता को शिरोधार्य कर ले|
ऐसा कहकर यहाँ कमजोर वर्ग के भ्रष्ट आचरण को बचाने का प्रयास नहीं किया जा रहा अपितु यह स्पष्ट करने की कोशिश है कि सत्ता की भागीदारी से उपेक्षित वर्ग कैसे दूर रक्खा जाए तथा स्थापित वर्ग का वर्जस्व बना रह सके और लोकतंत्र का केवल प्रदर्शनीय चेहरा सामने रहे|
यह विचार किसी भी तरह से एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लोकतंत्र के पथिकों के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं कि किसी को सत्ता प्राप्त करने के लिए ईश्वर ने चुना है| यह काल्पनिक भ्रामक मनगढंत ढोंग है कि अमुक व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा चुन लिया गया है| भारतीय संवैधानिक व्यवस्था ऐसे किसी विचार को मान्यता नहीं देती जिसके लिए कोई प्रमाणिक साक्ष्य न हो, क्या इस कथन के प्रमाण में परमेश्वर उनके लिए साक्ष्य के रुप में उपस्थित हो सकता है? कदाचित नहीं|
हमारा संसद भवन ईश्वर का मंदिर नहीं अपितु जनता का मंदिर है, इसमें ईश्वर के प्रतिनिधियों की नहीं अपितु जनता के प्रतिनिधियों की आवश्यकता एवं उपयोगिता है| ईश्वर के प्रतिनिधि को जनता से वोट माँगने की क्या जरूरत? ऐसा लग रहा है कि जनता का अपार धन जो ईश्वर के मंदिरों में भरा पड़ा है वह इनके प्रचार में प्रयुक्त हो रहा है|
ईश्वर के प्रतिनिधियों को ईश्वर के मंदिर में जाकर सेवकाई करनी चाहिये|
Sunday, 10 June 2012
सोच को सकारात्मक बनाएँ
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फ़तेहपुर सीकरी (आगरा) से सांसद श्रीमती सीमा उपाध्याय ने राज बब्बर जी को पराजित किया था जिनहोने फीरोजाबाद मे डिम्पल जी को पराजित किया और अब डिम्पल जी कन्नौज से लोक-सभा पहुँच गई हैं। अब एक दूसरे से पराजित हुये और पराजित करने वाले -सीमा उपाध्याय जी,राज बब्बर जी और डिम्पल जी एक साथ लोक-सभा मे विराजमान होंगे। यह लोकतन्त्र की मजबूती का प्रतीक हुआ या कमजोरी का?
यदि डिम्पल जी या उनकी पार्टी द्वारा सत्ता बल से दूसरों को नामांकन करने से रोका गया होता तब तो आरोप लगाना ठीक रहता। जब राष्ट्रीय दलों ने ही अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किए तो निश्चित हार देख कर निर्दलीय भी हट गए। जो लोग आज विरोध मे गाल बाजा रहे हैं उन महानुभावों को समुचित वक्त मे अपना नामांकन करके चुनाव सुनिश्चित कराना चाहिए था। ये बड़बोले लोग अपना खुद का वोट तो डालने जाते नहीं हैं और 'राजनीति' तथा 'राजनीतिज्ञों' को कोसने आगे आ जाते हैं ऐसे लोग ही 'लोकतन्त्र के लिए खतरा' हैं। पटना नगर निगम के चुनावों मे लगभग 67 प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं डाले हैं। क्या इस कदम को लोकतन्त्र मजबूती का कदम कहा जाएगा?
शरद पवार जी और उनकी बेटी एवं पी ए संगमा साहब और उनकी बेटी सभी इसी लोकसभा मे सांसद हैं उन पर जब परिवारवाद चस्पा नहीं होता तो सिर्फ 'डिम्पल जी' के सांसद बनने पर परिवारवाद का सवाल क्यों उठाया गया। यहाँ तो बेटी की जगह 'बहू' को चुना गया है। दूसरे के घर से आई बेटी को सम्मान देने पर यह सराहना जनक उदाहरण माना जाना चाहिए था। काश आक्षेप लगाने वाले लोगों की सोच सकारात्मक होती!
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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| कन्नौज से निर्विरोध निर्वाचित सांसद श्रीमती डिम्पल यादव |
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| हिंदुस्तान ,लखनऊ,10 जून 2012 ,पृष्ठ-2 |
कन्नौज मे श्रीमती डिम्पल यादव निर्विरोध क्या जीतीं कुछ लोग जो खुद को विद्वान और महान कहते हैं 'लोकतन्त्र' और 'राजनीति' का मखौल उड़ाने लगे। जहां दहेज की खातिर बहुओं को जला कर मार डाला जाता हैं वहाँ यदि एक 'बहू' को संसद मे भेजा गया तो इसकी सराहना और प्रशंसा की जानी चाहिए थी। क्या महिला होना ही गुनाह माना जा रहा है?
· · 16 hours ago ·फ़तेहपुर सीकरी (आगरा) से सांसद श्रीमती सीमा उपाध्याय ने राज बब्बर जी को पराजित किया था जिनहोने फीरोजाबाद मे डिम्पल जी को पराजित किया और अब डिम्पल जी कन्नौज से लोक-सभा पहुँच गई हैं। अब एक दूसरे से पराजित हुये और पराजित करने वाले -सीमा उपाध्याय जी,राज बब्बर जी और डिम्पल जी एक साथ लोक-सभा मे विराजमान होंगे। यह लोकतन्त्र की मजबूती का प्रतीक हुआ या कमजोरी का?
यदि डिम्पल जी या उनकी पार्टी द्वारा सत्ता बल से दूसरों को नामांकन करने से रोका गया होता तब तो आरोप लगाना ठीक रहता। जब राष्ट्रीय दलों ने ही अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किए तो निश्चित हार देख कर निर्दलीय भी हट गए। जो लोग आज विरोध मे गाल बाजा रहे हैं उन महानुभावों को समुचित वक्त मे अपना नामांकन करके चुनाव सुनिश्चित कराना चाहिए था। ये बड़बोले लोग अपना खुद का वोट तो डालने जाते नहीं हैं और 'राजनीति' तथा 'राजनीतिज्ञों' को कोसने आगे आ जाते हैं ऐसे लोग ही 'लोकतन्त्र के लिए खतरा' हैं। पटना नगर निगम के चुनावों मे लगभग 67 प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं डाले हैं। क्या इस कदम को लोकतन्त्र मजबूती का कदम कहा जाएगा?
शरद पवार जी और उनकी बेटी एवं पी ए संगमा साहब और उनकी बेटी सभी इसी लोकसभा मे सांसद हैं उन पर जब परिवारवाद चस्पा नहीं होता तो सिर्फ 'डिम्पल जी' के सांसद बनने पर परिवारवाद का सवाल क्यों उठाया गया। यहाँ तो बेटी की जगह 'बहू' को चुना गया है। दूसरे के घर से आई बेटी को सम्मान देने पर यह सराहना जनक उदाहरण माना जाना चाहिए था। काश आक्षेप लगाने वाले लोगों की सोच सकारात्मक होती!
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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