21-08-2017
शिक्षा में साम्प्रदायिकता और स्टीरियोटाइप :
आप देश में कहीं पर भी जाइए आपको विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों में एक बड़ा तबक़ा मिलेगा जो सहज और स्वाभाविक तौर पर साम्प्रदायिकचेतना और जातिचेतना संपन्न है । स्थानीय तौर पर अनेक मसलों पर ये लोग साम्प्रदायिक या जातिवादी नजरिए से सोचते हैं । इस तरह की चेतना कांग्रेस के जमाने में भी थी और आज भी है।लेकिन भाजपा-आरएसएस का प्रचार यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों में वामदलों का , वाम विचारधारा का वर्चस्व है।आरएसएस का यह प्रचार एकदम निराधार और सफेद झूठ है।मैं जब पढता था तब और जब पढाने लगा तब भी अधिकांश शिक्षकों में साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना के मैंने जेएनयू से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय तक साक्षात दर्शन किए हैं।सवाल यह है शिक्षकों में यह चेतना कहाँ से आती है? हम अपनी शिक्षा और शिक्षकों को साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना से मुक्त क्यों नहीं कर पाए ? असल में हमारी शिक्षा परिवर्तन विरोधी है , परिवर्तनकामी को शिक्षा में शक की नजर से देखते हैं।
एक अन्य बुनियादी सवाल यह है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय और कॉलेज तर्क और विवेक के आधार पर चल रहे हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से चल रहे हैं ? शिक्षक अपने विद्यार्थियों को तर्क,विवेक और वैज्ञानिक नजरिए से पढाते हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से पढाते हैं? अंदर की हकीकत यह है कि हम अपने विद्यार्थी को स्टीरियोटाइप पद्धति से पढाते हैं।वास्तविकता यह है कि हमारे विकास और परिवर्तन की गारंटी स्टीरियोटाइप नजरिया नहीं है। हमें यदि बदलना है और नया समाज बनाना है तो तर्क और विवेक के आधार पर चीजों को देखने,समझने और परखने के संस्कार पैदा करने होंगे।ये चीजें ही शिक्षा की सार्थकता की गारंटी हैं।
विश्वविद्यालय और कॉलेज का नाम आते ही पहला शब्द ज़ेहन में आता है वह है ज्ञान या नॉलेज।सवाल यह है हम ज्ञान कैसे अर्जित करते हैं ? ज्ञान कैसे संप्रेषित करते हैं ? जानना या खोज की भूख पैदा करना बेहद जरुरी है लेकिन हमारा समूचा पठन -पाठन ज्ञान की भूख पैदा नहीं करता,खोज की इच्छा पैदा नहीं करता इसके विपरीत हमने यह मान लिया है कि हमें किसी तरह डिग्री हासिल करनी है, नौकरी हासिल करनी है और इसके लिए जितना जरुरी है उतना ही पढो, रट लो और फिर काम पर निकल लो! यानी ज्ञान के साथ हमने प्रयोजनमूलक संबंध बनाया है ज्ञानकेन्द्रित संबंध नहीं बनाया है।शिक्षा में प्रयोजनमूलक दृष्टि हमें पुराने संस्कारों ,मूल्यों और संबंधों से मुक्त करने में मदद नहीं करती यही वजह है कि हम जैसे पढने आते हैं डिग्री पाने के बाद भी वैसे ही बने रहते हैं। यही दशा शिक्षकों की भी है। वे शिक्षित होकर भी अवैज्ञानिक बातें करते हैं, तर्कहीन और अविवेकपूर्ण बातें करते हैं ,अपरिवर्तित बने रहते हैं।
असली शिक्षा वह है जो मनुष्य को बदले, मनुष्य के अंदर बैठे पशुबोध को नष्ट करे। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम न तो बदलते हैं और न हमारे अंदर का पशुबोध मरता है बल्कि शिक्षित होने के बाद यह प्रबल और शक्तिशाली हो जाता है।यथास्थिति बनी रहती है और इसे बनाने में स्टीरियोटाइप पठन-पाठन की केन्द्रीय भूमिका है।यही वह बुनियादी जगह है जहाँ पर साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना फल-फूल रही है।
साभार:
https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1751594058202627
मोदी सरकार की पहली पराजय
June 22, 2014 at 8:47am
विश्वविद्यालय स्वायत्तता अपहरण का एक खेल दिल्ली में चल रहा है। इस
खेल में संयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ,माकपा और भाजपा एक ही मंच पर
आकर मिल गए हैं। इस खेल की खूबी है कि ये तीनों खिलाडी संविधान,अकादमिक
स्वायत्तता और बौद्धिक स्वतंत्रता इन तीनों का मखौल उडाने में लगे हैं।
विगत सप्ताह मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को
सर्कुलर भेजकर चार साला बीए कोर्स बंद करने का निर्देश दिया ,वह पूरी तरह
असंवैधानिक है। यूजीसी इस तरह का आदेश किसी भी विश्वविद्यालय को नहीं दे
सकता। सवाल यह है कि यूजीसी ने जब यह कोर्स लागू किया गया उस समय यह राय
क्यों नहीं दी ?
यूजीसी सुझाव दे सकती है.आदेश नहीं। यूजीसी के
आदेशों की हकीकत यह है कि गुजरात में अभी तक कॉलेज-विश्वविद्यालयों में छठे
वेतन आयोग के आधार पर बने वेतनमान लागू नहीं हुए हैं। पश्चिम बंगाल में
शिक्षकों का छठे वेतनमान के आधार पर वेतन मिला लेकिन बकाया धन अभी तक नहीं
मिल पाया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो दिए जा सकते हैं। मूल बात यह है कि
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप
करने का कोई हक नहीं है। यहां तक कि संसद को भी हक नहीं है।विजिटर को भी
हक नहीं नहीं है। विजिटर या शिक्षामंत्री किसी भी फैसले के एक महिने के अंदर
विरोध करता है तो वह विरोध विचार योग्य होता है। यदि एक महिने के बाद राय
आतीहै तो विचारयोग्य भी नहीं होता।
विश्वविद्यालय के फैसले
अकादमिक परिषद लेती है,कार्यकारी परिषद लेती है। शिक्षामंत्री या यूजीसी
नहीं । यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को चारसाला कोर्स को खारिज करने का
आदेश देकर अपने संवैधानिक कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण किया है। यूजीसी को
जबाव देना होगा कि विगत समय में उसने और उसके अधिकारियों ने यही फैसला
क्यों नहीं लिया ? क्यों दिविवि को कोर्स लागू करने को कहा ? क्या उन
अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई ? हमारे शासकों को नौकरशाही को उपकरण
बनाकर काम करने से बाज आना चाहिए।
चारसाला कोर्स की गुणवत्ता
और गुणहीनता, संवैधानिकता और असंवैधानिकता,प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर
बहस का समय खत्म हो चुका है क्योंकि कोर्स लागू हो चुका है। हजारों
विद्यार्थी एक साल से पढ़ रहे हैं, नए दाखिले होने जा रहे हैं। रिव्यू ही
करना है तो पहले बैच के निकलने पर रिव्यू करो। लेकिन यह काम अकादमिक परिषद
करेगी न कि यूजीसी। चारसाला कोर्स प्रासंगिक है या नहीं यह तय करने का काम
विश्वविद्यालय का है। यह कोर्स तय करते समय बहुमत से तय पाया गया कि कोर्स
आरंभ किया जाय।सभी इस फैसले को मानने को बाध्य हैं। इस मामले में
माकपा-भाजपा की हठधर्मिता विलक्षण है।
शिक्षक संघ इसके विरोध
में था अनेक छात्रसंगठन भी विरोध में थे,कई राजनीतिक पार्टियां भी विरोध
में थीं। लेकिन विश्वविद्यालय के फैसले अकादमिक परिषद में होते हैं और
दिविवि की अकादमिक परिषद ने पक्ष-विपक्ष पर विचार करने के बाद यह कोर्स
आरंभ किया। शिक्षा के फैसले सड़कों पर जुलूसों और धरना स्थलों या फेसबुक पर
नहीं होते।
यह मसला कईबार यूजीसी में भी गया,अनेक
ज्ञानीलोगों ने यूजीसी से लेकर शिक्षामंत्री,प्रधानमंत्री,संसद और
राष्ट्रपति तक अपनी राय भेजी लेकिन कहीं से भी यह नहीं कहा गया कि दिविवि
यह कोर्स बंद कर दे। सबने कहा यह विश्वविद्यालय का आंतरिक मामला है बाहरी
राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
लेकिन भाजपा को जनादेश
मिलतेही पहला हमला दिविवि की स्वायत्तता पर हुआ जो निंदनीय है। भाजपा के
चुनाव घोषणापत्र में चारसाला बीए कोर्स को खत्म करने का वायदा किया गया है।
मोदी के सत्तारुढ़ होते ही निहित स्वार्थी लोग असंवैधानिक हथकंडों का
इस्तेमाल करके यह कोर्स बंद कराना चाहते हैं जबकि इस मामले में नियमानुसार
दिविवि प्रशासन एकदम सही मार्ग का अनुसरण कर रहा है। कल के अकादमिक परिषद
के फैसले के बाद यह साफ हो चुका है कि भाजपा और माकपा के शिक्षक संगठनों के
पास अकादमिक परिषद में समर्थन का अभाव है। मात्र 10 शिक्षक उनके पक्ष में
थे बाकी सभी ने विवि के पक्ष का समर्थन किया। यह यूजीसी और प्रकारान्तर से
भाजपा की पहली बड़ी पराजय है।यह मोदी सरकार के स्वायत्तता अपहरण अभियान की
पहली बड़ी हार है।
इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि दिविवि को
चारसाला कोर्स लागू करने पर पिछली सरकार का पूर्ण समर्थन था,संसद से लेकर
पीएम तक,यूजीसी से लेकर शिक्षामंत्री तक सबने पिछले साल हस्तक्षेप करने से
मना किया और दिविवि प्रशासन का साथ दिया। मोदी सरकार को पुरानी सरकार के इस
फैसले का आदर करना चाहिए।
https://www.facebook.com/notes/jagadishwar-chaturvedi/मोदी-सरकार-की-पहली-पराजय/689106901124724?