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Friday, 21 October 2016

जाऊंगा ख़ाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जाएगा : अशफाकुल्लाह खां ------ ध्रुव गुप्त





Dhruv Gupt
हमारा क्या है अगर हम रहें, रहें न रहें !
काकोरी के शहीद अशफाकुल्लाह खां भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी सेनानी और 'हसरत' उपनाम से उर्दू के अज़ीम शायर थे। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक ने अपनी किशोरावस्था में अपने ही शहर के क्रांतिकारी शायर राम प्रसाद बिस्मिल से प्रभावित होकर अपना जीवन वतन की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया था। वे क्रांतिकारियों के उस जत्थे के सदस्य बने जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त, राजेंद्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्सी, ठाकुर रोशन सिंह, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल शामिल थे। चौरी चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के फ़ैसले से इस जत्थे को बेहद पीड़ा हुई। 8 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में इस क्रांतिकारी जत्थे की एक अहम बैठक हुई जिसमें अपने अभियान हेतु हथियार खरीदने के लिए ट्रेन से सरकारी ख़ज़ाने को लूटने की योजना बनी। उनका मानना था कि यह वह धन अंग्रेजों का नहीं था, अंग्रेजों ने उसे भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को अशफाकउल्ला खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आठ क्रांतिकारियों के दल ने सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना लूट लिया। अंग्रेजों को हिला देने वाले काकोरी षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्द इस कांड में गिरफ्तारी के बाद जेल में अशफ़ाक़ को यातनाएं देकर उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिशें हुईं। अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे यह तक कहा कि हिन्दुस्तान आज़ाद हो भी गया तो उस पर मुस्लिमों का नहीं, हिन्दुओं का राज होगा और मुस्लिमों को कुछ भी नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफ़ाक़ ने कहा था - 'तुम लोग हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालकर आज़ादी की लड़ाई को अब नहीं दबा सकते। अब हिन्दुस्तान आज़ाद होकर रहेगा। अपने दोस्तों के ख़िलाफ़ मैं सरकारी गवाह कभी नहीं बनूंगा।'
अंततः संक्षिप्त ट्रायल के बाद अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा और बाकी लोगों को चार साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई गई। अशफ़ाक को 19 दिसंबर, 1927 की सुबह फैज़ाबाद जेल में फांसी दी गई। फांसी के पहले अशफाक ने वजू कर कुरआन की कुछ आयतें पढ़ी, कुरआन को आंखों से लगाया और ख़ुद जाकर फांसी के मंच पर खड़े हो गए। वहां मौज़ूद जेल के अधिकारियों से यह कहने के बाद कि 'मेरे हाथ इन्सानी खून से नहीं रंगे हैं। खुदा के यहां मेरा इन्साफ़ होगा।', उन्होंने अपने हाथों फांसी का फंदा अपने गले में डाला और झूल गए। यौमे पैदाईश (22 अक्टूबर) पर शहीद अशफ़ाक़ को कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि, उनकी लिखी एक नज़्म के साथ !
जाऊंगा ख़ाली हाथ मगर, 
यह दर्द साथ ही जाएगा 
जाने किस दिन हिंदोस्तान 
आज़ाद वतन कहलाएगा
बिस्मिल हिन्दू हैं, कहते हैं 
फिर आऊंगा, फिर आऊंगा 
फिर आकर ऐ भारत माता 
तुझको आज़ाद कराऊंगा
जी करता है मैं भी कह दूं 
पर मज़हब से बंध जाता हूं
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की 
बात नहीं कर पाता हूं
हां ख़ुदा अगर मिल गया कहीं 
अपनी झोली फैला दूंगा 
और जन्नत के बदले उससे 
एक पुनर्जन्म ही मांगूंगा !

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