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Thursday, 26 July 2018

भाजपा - संघ - विपक्ष और लोकसभा चुनाव ------ विजय राजबली माथुर

*ये दोनों  लेखक महोदय जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं  वे भाजपा को पुन : सत्तासीन  देखना चाहते हैं। 
** वास्तविकता तो यह है कि , राहुल कांग्रेस जो  इन्दिरा जी के समय 1980 से ही संघ के निकट रही है अपने खुद के दम  पर पूर्ण बहुमत लाने की स्थिति में नहीं है इसीलिए  पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि , जहां जो क्षेत्रीय दल प्रभावी है उसे आगे रख कर कांग्रेस उसे  समर्थन दे और लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने दे। इस दिशा में चर्चायेँ  चल भी रही हैं। 
***कुछ विद्वान वास्तविकता से आँखें मूँद कर दिवा - स्वप्न लोक में विचरण करते हुये जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वैसा होगा नहीं और जनता जन - विरोधी मोदी सरकार को आगामी चुनावों में उखाड़ फेंकेगी।
**** विपक्ष को यह देखना होगा कि सिर्फ भाजपा को हराने से देश का भला नहीं हो सकता उनको संघ को परास्त करने हेतु बुद्धि - चातुर्य संजोना होगा तभी देश का भला कर पाएंगे। राहुल कांग्रेस को भी संघ के चंगुल से निकालना विपक्ष का लक्ष्य होना चाहिए।


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(आ  ):: 

(ब  ) : : 


ये दोनों  लेखक महोदय जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं  वे भाजपा को पुन : सत्तासीन  देखना चाहते हैं। ' (ब  )' के लेखक इसलिए चिंतित हैं कि , संघ के कार्यकर्ता मोदी - शाह के नेतृत्व वाली भाजपा से असंतुष्ट हैं। लेकिन उनको उम्मीद है कि उनके पास मोदी को चुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 
शायद इनको यह याद नहीं रहा कि, 1980 में इन्दिरा जी व 1985 में राजीव जी की कांग्रेस को संघ ने वोट देकर भारी बहुमत से जिताया और भाजपा को हराया था। इसी प्रकार दिल्ली में AAP को जिताया व BJP को हराया था। 
वस्तुतः संघ भाजपा पर नहीं भाजपा संघ पर निर्भर है। जबकि संघ अपना दायरा बढ़ाने के लिए दूसरे दलों में भी घुसपैठ करता जा रहा है। उसका लक्ष्य सत्ता और विपक्ष दोनों को अपनी मुट्ठी में रखना है। 
मोदी - शाह ने संघ को ही अपनी मुट्ठी में समेटना चाहा जिस कारण संघ ने अपने कार्यकर्ताओं के जरिये उनको संदेश दिलवा दिया है। यदि भाजपा को बहुमत मिलता है तब इस जोड़ी को हटाया नहीं जा सकेगा इसलिए संघ आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा को शिकस्त दिलवाएगा। विपक्ष को यह भ्रम रहेगा कि ऐसा उनकी एकता से संभव हुआ है जबकि संघ और मजबूत होता जाएगा। पूर्व राष्ट्रपति महोदय को रणनीति के तहत ही नागपुर बुलाया गया था बिलावजह नहीं। 
'(आ  )' के लेखक   की चिंता यह है कि, वह कांग्रेस व विपक्षी दलों को अक्षम समझ रहे हैं।  दोनों लेख जनता के मध्य भ्रम फैलाने का काम करने वाले हैं। 
वास्तविकता तो यह है कि , राहुल कांग्रेस जो  इन्दिरा जी के समय 1980 से ही संघ के निकट रही है अपने खुद के दम  पर पूर्ण बहुमत लाने की स्थिति में नहीं है इसीलिए  पी चिदंबरम ने सुझाव दिया है कि , जहां जो क्षेत्रीय दल प्रभावी है उसे आगे रख कर कांग्रेस उसे  समर्थन दे और लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने दे। इस दिशा में चर्चायेँ  चल भी रही हैं। 

2014 में भाजपा के बहुमत में कांग्रेस से गए सौ से अधिक सांसदों का योगदान था यदि वे वापिस लौट लें तो भाजपा वैसे भी बहुमत नहीं प्राप्त कर सकती है। इस दिशा में भी संजय गांधी का परिवार मददगार हो सकता है । कुछ विद्वान वास्तविकता से आँखें मूँद कर दिवा - स्वप्न लोक में विचरण करते हुये जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु वैसा होगा नहीं और जनता जन - विरोधी मोदी सरकार को आगामी चुनावों में उखाड़ फेंकेगी। 
विपक्ष को यह देखना होगा कि सिर्फ भाजपा को हराने से देश का भला नहीं हो सकता उनको संघ को परास्त करने हेतु बुद्धि - चातुर्य संजोना होगा तभी देश का भला कर पाएंगे। राहुल कांग्रेस को भी संघ के चंगुल से निकालना विपक्ष का लक्ष्य होना चाहिए। 

संकलन-विजय राजबली माथुर

Monday, 25 December 2017

राहुल से हिन्दुत्व पर न चलने की उम्मीद व्यर्थ है ------ विजय राजबली माथुर

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यद्यपि कुछ विद्वान राहुल गांधी से यह अपेक्षा कर रहे हैं कि, वह संविधान के धर्म - निरपेक्ष सिद्धांतों का अनुगमन करें और संघ - प्रेरित भाजपा के हिन्दुत्व का अनुसरण न करें। किन्तु वे इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि, उनकी दादी इन्दिरा गांधी ने ही संघ की ओर रुझान कर लिया था । 
1975 में एमर्जेंसी के दौरान हुये अत्याचारों ने 1977 में उनको करारी शिकस्त दिलवाई। मोरारजी प्रधानमंत्री बन गए और उनके विदेशमंत्री ए बी बाजपेयी व सूचना प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी। इन दोनों ने संघियों को प्रशासन में ठूंस डाला। इसके अतिरिक्त गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के पीछे ए बी बाजपेयी,पी एम मोरारजी के पीछे सुब्रमनियम स्वामी तथा जपा अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे नानाजी देशमुख छाया की तरह लगे रहे और प्रशासन को संघी छाप देते चले। संघ की दुरभि संधि के चलते मोरारजी व चरण सिंह में टकराव हुआ और इंदिराजी के समर्थन से चरण सिंह पी एम बन गए। 

एमर्जेंसी के दौरान हुये मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस'- इन्दिरा (गुप्त ) समझौते  को आगे बढ़ाते हुये चरण सिंह सरकार गिरा दी गई और 1980 में संघ के पूर्ण समर्थन से इन्दिरा जी की सत्ता में वापसी हुई। अब संघ के पास (पहले की तरह केवल जनसंघ ही नहीं था ) भाजपा के अलावा जपा और इन्दिरा कांग्रेस भी थी। संघ के इशारे पर केंद्र में सरकारें बनाई व गिराई जाने लगीं। सांसदों पर उद्योपातियों का शिकंजा कसता चला गया। 1996 में 13 दिन, 1998 में 13 माह फिर 1999 में पाँच वर्ष ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का भरपूर संघीकरण हुआ। 2004 से 2014 तक कहने को तो मनमोहन सिंह कांग्रेसी पी एम रहे किन्तु संघ के एजेंडा पर चलते रहे। 1991 में जब वह  वित्तमंत्री बन कर ‘उदारीकरण ‘ लाये थे तब यू एस ए जाकर आडवाणी साहब ने उसे उनकी नीतियों को चुराया जाना बताया था। स्पष्ट है कि वे नीतियाँ संघ व यू एस ए समर्थक थीं। जब सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बना कर मनमोहन जी को राष्ट्रपति बनाना चाहा  था तब तक वह हज़ारे /रामदेव/केजरीवाल आंदोलन खड़ा करवा चुके थे। 2014 के चुनावों में 100 से अधिक कांग्रेसी मनमोहन जी के आशीर्वाद से भाजपा सांसद बन कर वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में सहायक बने हैं। 


यदि इंदिरा जी ने 1975 में  'देवरस'से समझौता  नहीं किया होता व 1980 में संघ के समर्थन से चुनाव न जीता होता तब 1984 में राजीव जी भी संघ का समर्थन प्राप्त कर बहुमत हासिल नहीं करते। विभिन्न दलों में भी संघ की खुफिया घुसपैठ न हुई होती। 
आज संघ के पास सिर्फ भाजपा ही नहीं राहुल की कांग्रेस भी है और वह अदल - बदल कर  इन दो दलों के माध्यम से सत्ता पर पकड़ बनाए रखने में सक्षम है। 
जो लोग या दल इसे नापसंद करते हैं उनको अन्य विकल्प तलाशना होगा और कांग्रेस पर निर्भरता समाप्त करनी होगी। 



Saturday, 14 October 2017

' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति को नहीं समझ कर विपक्ष अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चला रहा है ------ विजय राजबली माथुर

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Arvind Raj Swarup Cpi
16 hrs
हिंदू राष्ट्रवादी सम्पादक हरिशंकर व्यास ने अपने अख़बार ‘नया इंडिया’ में आज लिखा है -

“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।

“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!

“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!

“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।

“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।

“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।

“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।

“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।

“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!


“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1984164238468371




वरुण गांधी (भाजपा सांसद ), हरिशंकर व्यास ( जिनका  लेख अरविंद राज स्वरूप CPI के वरिष्ठ नेता द्वारा उद्धृत किया गया है )  और  हज़ारे साहब के साक्षात्कार पर ध्यान दें  तो स्पष्ट होता है कि , संघ की पसंद के पी एम मोदी  की सरकार के विरुद्ध अभियान में भी अग्रणी संघ के नेता और विचारक ही हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघन सिन्हा  आदि नेताओं व विचारकों के कदम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। विपक्ष के जो नेता या विचारक मुखर होते हैं उनके विरुद्ध क्रिमिनल  व सिविल केस चलाये जाते हैं या उनकी हत्या करा दी जाती है। यह है ' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति जिसे वर्तमान विपक्ष के नेता और दल नहीं समझ रहे हैं  जो कि, भारतीय राजनीति से उनके सफाये की योजना है। 
संघ ने सत्ता ( शासन और प्रशासन दोनों ) पर  मजबूत पकड़ बनाने के बाद  अब विपक्ष पर भी पकड़ बनाना शुरू कर दिया है जिससे मोदी सरकार के पतन  की दशा में बनने वाली सरकार में भी संघ की मजबूत पकड़ बरकरार रहे। 
यदि वर्तमान विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस + CPM समेत सम्पूर्ण वामपंथ + ममता बनर्जी समेत समस्त क्षेत्रीय दलों ने एक साथ न लड़ कर अलग - अलग लड़ा या आ आ पा (AAP) को अपने साथ जोड़ा तो तय है कि, बनने वाली सरकार  पर भी संघ का ही नियंत्रण रहेगा। 
------ विजय राजबली माथुर 





Tuesday, 10 November 2015

संघी भारतीय संस्कृति में विश्वास ही नहीं रखते इनका गणवेश तक विदेशी है विचारधारा भी आयातित है*** संध्या नवोदिता

***संघियों  की भाषा शैली है...........माँ- बहन की भद्दी गालियाँ, स्त्री का चरित्र हनन, द्विअर्थी संवाद ...खुद इनकी अपनी वाल भी अश्लीलता से भरी होती है | अश्लील तस्वीरें, अश्लील चुटकुले, फूहड़ मज़ाक जो स्त्रियों को लेकर होते हैं और अपनी वाल की इस सडांध भरी गंदगी को वे किसी देवी देवता की तस्वीर से ढंकने का प्रयास करते हैं ......वेद इन्होने कभी पढ़ा नहीं| पढ़ी तो इन्होने मानस और गीता भी नहीं| वरना गार्गी, अपाला, द्रोपदी की तर्क शक्ति ये जानते तो स्त्रियों की वाल पर अपनी कुंठा का वमन न कर रहे होते| इनके लिए स्त्री केवल भोग की वस्तु है ***संघ की ड्रेस काली टोपी, खाकी निक्कर ये सब विदेशी हैं| ये लोग भारतीय संस्कृति में विश्वास ही नहीं रखते| इनका गणवेश तक विदेशी है| विचारधारा भी आयातित है***



· 
मुझे संघियों से क्या समस्या है ? क्योंकि वे निहायत पिछड़ी और सामन्ती मानसिकता के होते हैं | उनसे इस मंच पर बहुत संवाद करने का प्रयास किया है, पर वे तर्क और तथ्य के बजाय फ़ौरन गाली गलौज, चरित्र हनन और अश्लीलता पर उतर आते हैं |
माँ- बहन की भद्दी गालियाँ, स्त्री का चरित्र हनन, द्विअर्थी संवाद ही इनकी भाषा शैली है |
ये वेद वेद बस चिल्लाते ही हैं, वेद इन्होने कभी पढ़ा नहीं| पढ़ी तो इन्होने मानस और गीता भी नहीं| वरना गार्गी, अपाला, द्रोपदी की तर्क शक्ति ये जानते तो स्त्रियों की वाल पर अपनी कुंठा का वमन न कर रहे होते| इनके लिए स्त्री केवल भोग की वस्तु है, ये उसे फैसलों में शामिल नहीं करते|
कम से कम मेरा अनुभव तो यही है | मुझे दर्जनों संघियों को ब्लॉक करना पड़ा है| खुद इनकी अपनी वाल भी अश्लीलता से भरी होती है | अश्लील तस्वीरें, अश्लील चुटकुले, फूहड़ मज़ाक जो स्त्रियों को लेकर होते हैं और अपनी वाल की इस सडांध भरी गंदगी को वे किसी देवी देवता की तस्वीर से ढंकने का प्रयास करते हैं |
इसका कारण उनके संस्कारों में है. अक्सर वे निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि के बेरोजगार नौजवान या अधेड़ हैं| या फिर अपने व्यवसाय में बहुत सफल लोग नहीं हैं | वे अपने काम में सफल नहीं हैं | और बहुत बार खाली दिमाग शैतान का घर होता है, सो वे खूब खुराफाती हैं |
अपनी कम अकली और गैर तार्किक सोच के कारण वे ठस्स दिमाग के हैं| उनका आई क्यू स्तर कम है| वे गणित और विज्ञान और दुनिया की तमाम भाषाओं से अपरिचित हैं| वे दारू पीते हैं , जगराता करते हैं, सड़क पर निकलते हैं लडकी छेड़ते हैं, फेसबुक पर आते हैं अश्लील टिप्पणी करते हैं| रिश्तेदारों के घर जाते हैं अपने माँ बाप को जलील करते हैं| वे अपने मोहल्ले में अराजक गुंडे की पहचान लिए होते हैं|
आप उन्हें हिन्दू न समझें| इस देश का बहुसंख्यक हिन्दू बहुत उदार और सर्व धर्म समभाव वाला है | ऐसे हिन्दुओं के कारण ही भारत का राष्ट्रीय चरित्र सुरक्षित है| यही हिन्दू हैं जिनके कारण यह देश कई संस्कृतियों और कई धर्मो का देश है| यही हिन्दू हैं जिनके कारण यह देश महकता है |
बहुसंख्यक हिन्दू तो संघियों को पसंद ही नहीं करता| उनसे एक सुरक्षित दूरी बना के चलता है| वह अपने बच्चों को कूप मण्डूक स्कूलों में नहीं पढ़ाता और ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देता है| वह अपने बच्चों को एक उदार और ज़िम्मेदार नागरिक बनाता है| वह दंगों और साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलता है| वह धार्मिक है, मंदिर जाता है पर गैर धर्मियों से नफरत नहीं करता, वह विधर्मियों को मारने काटने की वकालत नहीं करता| यही वह हिन्दू है जो वैज्ञानिक भी है, साहित्य भी रचता है, फ़िल्में बनाता है और स्त्रियों से बराबरी से बात भी करता है|
पर नौजवान अगर संघी सोच के बने तो इसमें सिर्फ उनका कुसूर नहीं है| गैर तार्किक शिक्षा और बेरोजगारी तमाम नौजवानों को बम, गोला, बारूद में तब्दील कर रही है| अगर इन्हीं नौजवानों को बेहतर शिक्षा के साथ मनचाहा काम मिला होता, कुछ सर्जनात्मक टास्क जीवन में होता तो ये एक पल यहाँ न रहते|
तार्किक होने के लिए पढ़ना पड़ता है| बहुत सारा इतिहास, विज्ञान, भूगोल, राजनीति, दर्शन कला.... जब कोई भी खूब पढता है, दुनिया को जानता और समझता है तो वह खुद ही संकीर्णता से ऊपर उठ जाता है|
प्रेम करें... लेकिन संघ में तो प्रेम होता ही नहीं | वहां स्त्री सदस्य नहीं बन सकती| वहां स्त्री पुरुष बराबर दर्जे पर नहीं होते| वहाँ स्त्री को तर्क का अधिकार ही नहीं, जब सदस्यता ही नहीं, तो तर्क कैसा? संघ के सरसंघचालक हमेशा पुरुष ही होते हैं, वह भी एक ख़ास किस्म के ब्राह्मण के लिए पद आरक्षित है| वहां सरसंघ चालक चुना नहीं जाता, बल्कि मनोनीत होता है| संघ लोकतंत्र में यकीन नहीं रखता|
और दूसरा संघ की ड्रेस काली टोपी, खाकी निक्कर ये सब विदेशी हैं| ये लोग भारतीय संस्कृति में विश्वास ही नहीं रखते| इनका गणवेश तक विदेशी है| विचारधारा भी आयातित है|
ये ठेठ सामन्ती मूल्य हैं| इनमे पला व्यक्ति कैसे किसी का आदर करना सीखेगा| वह रिजिड ही होगा|

Wednesday, 5 November 2014

किसी राष्ट्र के लिए परम वैभव क्या होगा ?---अरविंद राज स्वरूप

अरविंद राज स्वरूप ,सह सचिव, भाकपा , उ . प्र .

श्री मोहन भागवत जी किसी राष्ट्र के लिए परम वैभव क्या होगा ?
कल आगरा में श्री भागवत ने संघ के कार्यकर्ताओ को संबोधित किया। कहा " संघ ही देश को परम वैभव दिला सकता है"(जागरण 4-11-2014 कानपुर)
21वीं शताब्दी में किसी राष्ट्र/देश के लिए वैभव की क्या परिभाषा होगी।
सामान्य एवं मान्य समझ के अनुसार जिस समाज/ देश में:
# मानव द्वारा मानव का शोषण न हो।
# सामाजिक एवं आर्थिक न्याय हो।
# सामाजिक असमानता पनपने के सारे कारण समाप्त कर दिए गए हों।
# प्रत्येक धर्मावलम्बी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता हो और उक्त धार्मिक निजता में राज्य का सरोकार उसी हद तक हो जिससे विभिन्न धार्मिक समूहों में यदि कोई विरोधाभाव पैदा हो तो उसका निवारण हो सके।
# महिलाओ को बराबरी का हक़ और सम्मान मिले।

यदि भारत का संविधान देखा जाये तो उसके' राज्य की निति के निदेशक तत्वों 'में भारत को परम वैभव शाली राज्य बनाने के बहुत से सूत्र दिए गए हैं।
क्या आपका आशय उसी वैभव से है भागवत जी?
लेकिन आपने अपने संबोधन में जो दो उदहारण प्रस्तुत किये हैं उनकी दशा तो वैभव हीन सम्माज की है।
जापान: 

 दूसरे विश्वयुद्ध में जापान का टोजो, हिटलर - मुसोलिनी की धुरी  का हिस्सा था। वहा का विकास पूंजीवादी पूंजी प्रधान विकास है और बावजूद 12 करोड़ की आबादी के आर्थिक असमानताए और विषमताए विद्यमान हँ। गरीबी और अमीरी का बड़ा अंतर है। जिनी की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार वहाँ गरीबी की दर 8%है। यह बात अलग है की वहाँ के गरीब भारत के अमीरों के बाराबर हों।
इजराइल:
82 लाख की आबादी का एक ऐसा देश है जो सिर्फ और सिर्फ अमरीका और अन्य धनी मुल्को की वजेह और मदद से चौधरी बना बैठा है। वहाँ के एक एक उद्योग में विदेशी बहु राष्ट्रीय कंपनियों का पैसा लगा है।
अरब देशो के नवाब शेख बेहद अमीर हैं पर उन देशो के आम लोग तो गरीब हैं और वो अधिकतर उन्ही लोगो को मारता है और संघ के सबसे बड़े पदाधिकारी द्वारा परम वैभव के ऐसे आदर्श प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! क्या मानवता से कोई सरोकार नहीं है?
भागवत जी ! यह कैसा वैभव है?और न ही यह स्थिति भारत के " वसुधैव कुटुम्बकम"के दर्शन को अभिव्यक्त करती है।
वास्तव में संघ प्रमुख जी आप बड़े बड़े प्रचंड शब्दों का प्रयोग करके उस सच्चाई को छिपाना चाहते हैं जो है पूंजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण। आप उक्त उदाहारणों से केवल उन्ही की प्रशस्ति का गायन कर रहे हैं और इस पुरातन सभ्यता और संस्कृति के देश वासियों को ऐसे ही वैभव और श्री विहीन सामाज की ओर उन्मुख होने का सन्देश दे रहे हैं !ये कैसा देश प्रेम है?
देश का नौजवान श्री भागवत से यह भी पूछना और जानना चाहता है की देश के परम वैभव की एक घड़ी 15 अगस्त 1947 थी जब देश अंग्रेजो की दास्ता से मुक्त हुआ।
जवाब दे संघ की उस परम वैभव तक पहुचने में 1925(जन्म काल से) 1947 तक क्यो उसकां कोई योगदान नहीं था!