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Monday, 6 June 2016

यूपी में वह कौन बड़ा साहेब है, जो नहीं चाहता था कि तीस्ता सीतलवाड़ लखनऊ में रहें? ------ हस्तक्षेप







क्या अखिलेश सरकार नहीं चाहती तीस्ता सीतलवाड़ लखनऊ में रहें? :
नई दिल्ली। क्या उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और केंद्र की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के बीच कोई गुपचुप समझौता हो चुका है? ऐसी कोई आधिकारिक सूचना तो नहीं है, लेकिन उप्र की अखिलेश सरकार की कार्यप्रणाली संकेत दे रही है कि सपा-भाजपाके बीच अंदरूनी तौर पर खिचड़ी पक चुकी है और अगर ऐसा नहीं है तो माना जा सकता है कि अफसरशाही पर संघी कब्जा हो चुका है और अखिलेश यादव केवल संवैधानिक तौर पर मुख्यमंत्री रह गए हैं व अफसरशाही नागपुर मुख्यालय से निर्देश ले रही है।

आतंकवाद के आरोपों से निचली अदालत द्वारा बरी किए गए मुस्लिम युवकों के मामले में सपा सरकार द्वारा उच्च अदालत में फैसले के खिलाफ अपील करने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को लखनऊ में न ठहरने देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने अखिलेश सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर सवालिया निशान लगाए हैं। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर पूरी घटना का ब्यौरा प्रस्तुत किया है, जो निम्नवत् है।

अमित शाह और ऐसे ही लोग अगर चलकर कभी गुजरात दंगों के कारण जेल गए, तो तीस्ता सीतलवाड़ को शुक्रिया कहिएगा। संविधान और कानून की हिफाजत के लिए वे सारे खतरे उठा रही हैं। केस नतीजे तक पहुंचे, इसके लिए वे जुटी हैं।

अखिलेश यादव जी से भी एक निवेदन है। पिछले दिनों तीस्ता और मैं लखनऊ लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लेने लखनऊ गए थे। तीस्ता की सरकारी गेस्ट हाउस में बुकिंग थी। वहां अफसरों ने बताया कि हाई लेवल से बुकिंग कैंसिल कर दी गई है। इसके बाद तीस्ता को जिन बड़े होटलों में ठहराने की कोशिश की गई, सबने नाम सुनते ही कहा कि किसी बड़े साहब ने मना किया है।

तीस्ता को जान पर खतरे की वजह से सुप्रीम कोर्ट से सुरक्षा मिली हुई है। साथ में गार्ड चलते हैं। उन्हें सुरक्षित जगह पर रहना पड़ता है। लेकिन उस दिन उन्हें जोखिम उठाकर एक सामान्य होटल में ठहरना पड़ा।

तीस्ता सुरक्षा की हाई कैटेगरी में हैं। उनकी मूवमेंट राज्य सरकार और लोकल पुलिस के संज्ञान में होती है। राज्य सरकार आसानी से जांच करा सकती है।

यूपी में वह कौन बड़ा साहेब है, जो नहीं चाहता था कि तीस्ता सीतलवाड़ लखनऊ में रहें?
http://www.hastakshep.com/hindi-news/2016/06/05/do-akhilesh-government-not-want-to-stay-teesta-setalvad-in-lucknow#.V1O7UJF9601

Saturday, 16 January 2016

:सृजन का संतोष या आनन्द कहीं दिखायी नहीं देता ------ वीरेन्द्र जैन

वीरेन्द्र जैन
            यह, वह कठिन समय है जब लेखक बढ़ रहे हैं और पाठक कम हो रहे हैं। पुस्तकें समुचित संख्या में छप रही है किंतु उनके खरीददार कम होते जाते हैं। पुस्तक मेलों में काफी भीड़ उमड़ती है पुस्तकों की प्रदर्शनी को निहारती है, ढेर में रखी पुस्तकों को पलटती है और जाकर चाट-पकोड़ी फास्ट फूड खाती है, स्वेटर मफलर जैकिट खरीदती है, मित्रों परिचितों से गले मिलती है, सैल्फी लेती देती है और दिन सफल करके लौट आती है। वहाँ से मिले सूची पत्र रद्दी के ढेर में रख देती है।
             इस कठिन समय को मैं भिन्न समय कहना चाहता हूं। प्रकाशक पुस्तकें इसलिए छाप रहे हैं, क्योंकि वे बिक रही हैं, उन्हें सरकारी पुस्तकालय और शिक्षा विभाग समेत रेल, रक्षा, व विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान खरीद रहे हैं। उनकी कीमतें ऊंची रखी जा रही हैं और सम्बन्धित अधिकारियों को खरीद पर भरपूर कमीशन दिया जा रहा है, जो बहुत ऊपर तक पहुँच रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र का यह धन अंततः जनता की जेब से जा रहा है। पुस्तक प्रकाशन और इसकी खरीद बिक्री में प्रकाशक और सरकारी खरीद के लिए जिम्मेवार अधिकारी मालामाल हो रहे हैं। कोई प्रकाशक गरीबी में नहीं जी रहा है, सबके पास भव्य बंगले हैं, गाड़ियां हैं, दौलत का नंगा प्रदर्शन है, वे अधिकारियों को जो पार्टियां देते हैं उनमें पैसा पानी की तरह बहाते हैं। कोई देखने वाला नहीं है कि जो पुस्तकें खरीदी गयीं उनमें से कितनी पढ़ी गयी हैं, या पढ़े जाने लायक हैं? किसी को नहीं पता कि उनको खरीद किये जाने का आधार क्या है? प्रकाशित पुस्तकों के पाँच प्रतिशत लेखकों को भी रायल्टी नहीं मिलती। अधिकांश लेखक इस बात से खुश हो जाते हैं कि प्रकाशक ने कृपा करके उनकी पुस्तक छाप दी है। बहुत बड़ी संख्या में लेखक अपना पैसा लगा कर अपनी पुस्तकें छपवाते हैं और सरकारी सप्लाई की दर पर मुद्रित कीमत से अपनी लागत की पुस्तकें खरीद लेते हैं। वे खुद का पैसा खर्च करके विमोचन समारोहआयोजित करते हैं जिसमें प्रकाशक मुख्य अतिथि की तरह मंच पर बैठता है। यही कारण है कि आज ज्यादातर सम्पन्न और अतिरिक्त आय अर्जित करने वाले वर्ग के  लेखक प्रकाशित हो रहे हैं।
            जिस तरह किसी कुत्ते को हड्डी मिल जाती है, जिसे चूसते चूसते उसकी जुबान से खून निकलने लगता है और वह अपने ही खून को हड्डी में से निकला खून समझ कर उसे और ज्यादा चूसता जाता है, उसी तरह लेखक भी अपना ही खून चूस चूस कर खुश होता रहता है। उसके अपने पैसे से किताब छपती है जो उसके ही पैसे से उसके घर पर आती है, और ‘सौजन्य भेंट’ देने के काम आती है। भेंट पाने वाला सौजन्यता में ही दो चार शब्द प्रशंसा के कह देता है भले ही उसने उसे पढी ही न हो। ऐसी पुस्तकें कम ही पढ़ी जाती हैं। आमतौर पर पुस्तक मेलों में पाक कला, बागवानी, घर का वैद्य, या कैरियर से सम्बन्धित पुस्तकें ही बिकती हैं।
            पुस्तक आलोचना का और भी बुरा हाल है। आलोचक के नाम पर कुछ चारण पैदा हो गये हैं जो प्रत्येक प्रकाशित पुस्तक की बिना पढ़े प्रशंसा की कला में सिद्धहस्त हैं। प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिका में भी पुस्तक आलोचना के नाम पर जो कुछ छपता है वह प्रकाशन की सूचना और फ्लैप पर लिखी टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं होती है। कथित आलोचक उसमें दो चार पंक्तियां और एकाध उद्धरण जोड़ कर उसे समीक्षा की तरह प्रकाशित करा देता है। ऐसा आलोचना कर्म कोई भी कर देता है। एक आलोचक को कम से कम विषय और विधा की परम्परा व समकालीन लेखन का विस्तृत अध्ययन होना चाहिए जिसे वह दूसरी भाषाओं के साहित्य के साथ तुलना कर के परखता है। उसके सामाजिक प्रभाव के बारे में अपने विचार व्यक्त करता है व पुस्तक की उपयोगिता या निरर्थकता को बताता है। एक अच्छी आलोचना स्वयं में रचना होती है जिसके सहारे न केवल कृति को समझने में मदद मिलती है अपितु विधा के समकालीन लेखन और प्रवृत्तियों की जानकारी भी मिलती है। एक पुस्तक समीक्षा अनेक दूसरी पुस्तकों को पढ़ने के प्रति जिज्ञासा पैदा कर सकती है।
            पुस्तक प्रकाशन से लेकर पुस्तक मेले तक छद्म ही छद्म फैला हुआ है। प्रकाशक, लागत लगाने वाले और सरकारी खरीद में मदद कर सकने वाले महात्वाकांक्षी व्यक्ति को लेखक के रूप में अधिक प्रतिष्ठित करना चाहते हैं और ऐसे ही लोगों को छापना चाहते हैं। दूसरी ओर उनकी कृतियों को पाठक पढ़ना नहीं चाहते, खरीदना नहीं चाहते। ऐसे ही लेखकों के व्यय की भरपाई के लिए नये नये सरकारी पुरस्कार पैदा किये जा रहे हैं, जुगाड़े जा रहे हैं। कैसी विडम्बना है कि बहुत सारे पुरस्कृत और सम्मानित लेखकों के प्रशंसक और पाठक नहीं के बराबर हैं। सामान्य पाठक के लिए ऐसा लेखन कौतुकपूर्ण वस्तु बन चुका है। सरकारी पुरस्कारों से वह भ्रमित रहता है कि जरूर इस कृति में कुछ महत्वपूर्ण होगा जो उसकी समझ में नहीं आ रहा, जबकि उसमें कुछ होता ही नहीं है। कम प्रतिभा वाले लेखक समूहों ने अपनी-अपनी संस्थाएं बना ली हैं जिनके माध्यम से वे खुद पुस्तकें प्रकाशित करके एक दूसरे को आभासी पुरस्कार लेते देते रहते हैं. ‘अहो रूपम अहो ध्वनिम’ करते रहते हैं व अपना फोटो संग समाचार खुद छपवा कर खुद को धोखा देते रहते हैं।
            सच तो यह है कि लेखन की दुनिया में गहरी बेचैनी, निराशा, ईर्षा, कुंठा, शोषण, धूर्तता छायी हुयी है। सृजन का संतोष या आनन्द कहीं दिखायी नहीं देता। यहाँ मसखरों से लेकर बहुरूपियों तक फैंसी ड्रैस वालों से लेकर नशाखोर तक भरे हुये हैं। कभी मुकुट बिहारी सरोज ने लिखा था-
गर्व से मुखपृष्ठ जिनको शीश धारें, आज उन पर हाशियों तक आ बनी है
क्योंकि मुद्रित कोश की उपलब्धियों से, कोठरी की पाण्डुलिपि ज्यादा धनी है
अक्षरों को अंक करके रख दिया है, तुम कसम से खूब साहूकार हो
तुम कसम से खूब रचनाकार हो 
साभार :
http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/2016/01/15/% 

Saturday, 3 December 2011

हस्तक्षेप मे सत्य का दर्पण

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देश नहीं, सत्ताधारियों की आजादी

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देश नहीं, सत्ताधारियों की आजादी

पुण्य प्रसून बाजपेयी


पहली बार विदेशी निवेश पर घिरे ‘मनमोहनोमिक्स’ ने मौका दिया है कि अब बहस इस बात पर भी हो जाये कि देश चलाने का ठेका किसी विदेशी कंपनी को दिया जा सकता है या नही। संसदीय चुनाव व्यवस्था के जरीये लोकतंत्र के जो गीत गाये जाते हैं अगर वह आर्थिक सुधार तले देश की सीमाओं को खत्म कर चुके हैं,और सरकार का मतलब मुनाफा बनाते हुये विकास दर के आंकड़े को ही जिन्दगी का सच मान लिया गया है तो फिर आउट सोर्सिंग या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरीये सरकार चलाने की इजाजत अब क्यों नहीं दी जा सकती। अगर 69 करोड़ वोटरों के देश में लोकतंत्र का राग अलापने वाली व्यवस्था में सिर्फ 29 करोड़ [ 2009 के आम चुनाव में पड़े कुल वोट लोग ]वोट ही पड़ते हैं और उन्हीं के आसरे चुनी गई सरकार [ कांग्रेस को 11.5 करोड़ वोट मिले ] यह मान लेती है कि उसे बहुमत है और उसके नीतिगत फैसले नागरिको से ज्यादा उपभोक्ताओं को तरजीह देने में लग जाते हैं तो फिर यह सवाल क्यों नहीं उठना चाहिये कि देश के 40 करोड़ उपभोक्ताओ को जो बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने साथ जोड़ने का मंत्र ले आये देश में उसी की सत्ता हो जाये।
असल में छोटे और मझोले व्यापारियों से लेकर किसान और परचून की दुकान चलाने वालो को अगर विदेशी कंपनियों के हवाले करने की सोच को सरकार ताल ठोक कर कह रही है तो समझना यह भी होगा कि आखिर आने वाले वक्त में देश चलेगा कैसे और उसे चलाने कौन जा रहा है। और आर्थिक सुधार की हवा में कैसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश दुनिया के सबसे बडे बाजार में बदलता जा रहा है । जिस पर वालमार्ट,आकिया या कारफूर सरीखी वैश्विक खुदरा कंपनियो की चील नजर लगी हुई है। इसमें दो मत नही कि एफडीआई को देश में बडी मात्रा में घुसाने का प्रयास पहली बार 2004 में चुनाव से ऐन पहले बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने ही किया। और संसद के भीतर उस वक्त लोकसभा में विपक्ष के नेता प्रियरंजनदास मुंशी और राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने विरोध करते हुये सरकार को पत्र लिखा। लेकिन 2007 में वही मनमोहन सिंह पहली बार पलटे और उन्होंने एफडीआई की वकालत की और यह मामला जब संसदीय समिति के पास गया तो बीजेपी पलटी और स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर मुरली मनमोहर जोशी ने इसका विरोध किया। लेकिन यहां भी सवाल राजनातिक दलों या राजनेताओ की सियासी चालो का नहीं है।
असल में देश के भीतर ही देश को बेचने का जो सिलसिला शुरु हुआ है और अब वह लूट सामने आ रही है तो पहली बार प्रशनचिन्ह सरकार चलाने और राजनीति साधने में तालमेल बैठाने पर पड़ा है। मनमोहन सिंह के दौर में अर्थशास्त्र के नियमों ने पहली बार देशी कारपोरेट को बहुराष्ट्रीय कंपनियो में तब्दील कर दिया। देश के टॉप कारपोरेट घरानों ने भारत छोड़ यूरोप और अमेरिका में अपनी जमीन बनानी शुरु की । सिर्फ 2004 से 2009 के दौर के सरकारी आंकडे बताते हैं कि समूचे देश में जो भी योजनायें आई चाहे वह इन्फ्रस्ट्रक्चर के क्षेत्र में हो या पावर के या फिर या फिर शिक्षा,स्वास्थ्य,पीने का पानी या खनन और संचार तकनीक। सारे ठेके निजी कपंनियों के हवाले किये गये और सरकार से सटी निजी कंपनियों को औसतन लाभ इस दौर में तीन सौ फीसदी तक का हुआ। जबकि किसी भी क्षेत्र में काम पूरा हुआ नहीं। पूंजी की जो उगाही इन निजी कंपनियों ने विदेशी बाजार या विदेशी कंपनियो से की संयोग से वह भी इन्हीं निजी कंपनियों की बनायी विदेशी कंपनिया रही। यानी कौडियों के मोल भारत की खनिज संपदा से लेकर जमीन और मजदूरी तक का दोहन कर उसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेचने से लेकर भारत में योजनाओ को पूरा करने के लिये हवाला और मनी-लैडरिंग का जो रास्ता काले को सफेद करता रहा अब उसकी फाइले जब सीबीडीटी और प्रवर्तन निदेशालय में खोली जा रही है तो सरकार के सामने संकट यह है कि आगे देश में किसी भी योजना को कैसे पूरा किया जाये। और अगर योजनाये रुक गयीं तो सरकार के खजाने में पैसा आना रुकेगा। और यह हालात सरकार के लिये जितने मुश्किल भरे हो लेकिन यह राजनीतिक तौर पर कांग्रेस के लिये शह और मात वाली स्थिति है। क्योंकि जब देश में सत्ता का मतलब ही जब राजनीति सौदेबाजी का दायरा बड़ा करना हो तो फिर देसी की जगह विदेशी ही सही, सौदेबाज को अंतर कहां पड़ेगा। इसलिये एफडीआई के आसरे यह तर्क बेकार है कि जहां जहां रिटेल सेक्टर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पांव पड़े वहा वहा बंटाधार हुआ। क्या यह आंकड़ा सरकार के पास नहीं है कि अमेरिका में इसी खेल के चलते बीते 30 बरस में 75 लाख से ज्यादा रोजगार उत्पादन क्षेत्र में कम हो गये। क्या वाणिज्य मंत्री आंनद शर्मा वाकई नहीं जानते कि दुनिया भर में कैसे किराना कारोबार पर बडी कंपनियों ने कब्जा किया। देश के तमाम मुख्यमंत्रियो को पत्र लिखते वक्त क्या वाकई मंत्री महोदय को उनके किसी बाबू ने नही बताया कि आस्ट्रेलिया, ब्राजील, मैक्सिको, कनाडा, फ्रांस तक में रिटेल बाजार पर कैसे बडी कंपनियों ने कब्जा किया और इस वक्त हर जगह 49 से 78 फीसदी तक के कारोबार पर बडी कंपनियों का कब्जा है। क्या सरकार वाकई मुनाफा बनाती कंपनियों के उस चक्र को नहीं समझती है जिसमें पहले खुद पर निर्भर करना और बाद में निर्भरता के आसरे गुलाम बनाना। यह खेल तो देसी अंदाज में वाइन बनाने वाली कंपनियां नासिक में खूब खेल रही हैं। नासिक में करीब 60 हजार अंगूर उगाने वाले किसानों को वाइन के लिये अंगूर उगाने के बदले तिगुना मुनाफा देने का खेल संयोग से 2004 में ही शुरु हुआ। और 2007-08 में वाइन कंपनियों को खुद को घाटे में बताकर किसानों से अंगूर लेना ही बंद कर दिया। किसानों के सामने संकट आया क्योंकि जमीन दुबारा बाजार में बेचे जाने वाले अंगूर को उगा नहीं सकती थीं और वाइन वाले अंगूर का कोई खरीददार नहीं था। तो जमीन ही वाइन मालिकों को बेचनी पड़ी। अब वहां अपनी ही जमीन पर किसान मजदूर बन कर वाइन के लिये अंगूर की खेती करता है और वाइन इंडस्ट्री मुनाफे में चल रही है। तो क्या देसी बाजार पर कब्जा करने के बाद बहुराष्ट्रीय़ कंपनिया उन्हीं माल का उत्पादन किसान से नहीं चाहेगी
जिससे उसे मुनाफा हो। या फिर सरकार यह भी समझ पाती कि जब मुनाफा ही पूरी दुनिया में बाजार व्यवस्था का मंत्र है तो दुनिया के जिस देश या बाजार से माल सस्ता मिलेगा वहीं से माल खरीद कर भारत में भी बेचा जायेगा। यानी कम कीमत पर उत्पादों की सोर्सिंग ही जब रिटेल सेक्टर से मुनाफा बनाने का तरीका होगा तो भारत में समूचे रोजगार का वह 51 फीसदी रोजगर कहां टिकेगा जो अभी स्वरोजगार पर टिका है। क्योंकि नेशनल सैंपल सर्वे के आंकडे बताते हैं कि आजादी के 64 बरस बाद भी देश में महज 16 फीसदी रोजगार ही सरकार चलाने की देन है। बाकि का 84 फीसदी रोजगार देश में आपसी सरोकार और जरुरतो के मुताबिक एक-दूसरे का पेट पालते हैं। जिसमें 33.5 फीसदी तो बहते हुये पानी की तरह है। यानी जहां जरुरत वहां काम या रोजगार। अगर सरकार यह सब समझ रही है तो इसका मतलब है सरकार किसी भी तरह सत्ता में टिके रहने का खेल खेलना चाहती है। क्योंकि उसके सामने बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा है। करीब 56 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। घाटे का आंकड़ा बढ़कर 6 लाख करोड़ तक हो रहा है। इन सबके बीच महंगाई चरम पर है। उघोग विकास दर ठहरी हुई है। विनिवेश रुका हुआ है ।
राजस्व का जुगाड़ जितना होना चाहिये वह हो नहीं पा रहा है। और इन सबके बीच राजनीतिक तौर पर सरकार से कांग्रेस को सौदेबाजी के लिये जो चाहिये वह भी उलट खेल होता जा रहा है। अब सरकार कह रही है कि डी एमके, टीएमसी, यूडीएफ, मुलायम,मायावती,लालू सभी को अपने राजनीतिक दायरे में लाये। तभी कुछ होगा । और इन सबके बीच मनरेगा और फूड सिक्योरटी बिल को लाकर सोनिया गांधी के राजनीतिक सपने को भी सरकार को ही पूरा करना है। यानी कमाई बंद है और बोझ सहन भी करना है।
दरअसल, बड़ा सवाल यहीं से खड़ा हो रहा है कि क्या संसदीय लोकतंत्र की चाहत में अपनी आजादी को
पुण्य प्रसून बाजपेयी
पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 का इंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला। उनके ब्लॉगhttp://prasunbajpai.itzmyblog.com/ से साभार
गिरवी रखने की स्थिति में तो देश नहीं आ गया। क्योंकि आजादी के बाद दो सवाल महात्मा गांधी ने कांग्रेस से बहुत सीधे किये थे। पहला जब सरकार का गठन हो रहा था तब गांधी ने नेहरु से कहा आजादी देश को मिली है कांग्रेस को नहीं। और दूसरा मौका तब आया जब संविधान के पहले ड्राफ्ट को देखते वक्त महात्मा गांधी ने राजेन्द्र प्रसाद से कहा था कि देखना, आजादी का मतलब अपनी जमीन पर अन्न उपजा कर देश का पेट भरना भी होता है। जाहिर है 1947-48 के दौर से देश बहुत आगे निकल गया है लेकिन समझना यह भी होगा आजादी के वक्त 31 करोड़ लोग थे और आज उस दौर का ढाई भारत यानी 75 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। और इसी बीपीएल के नाम पर जारी होने वाले 30 हजार करोड़ के अन्न को भी बीच में लूट लिया जाता है। और यह लूट अपने ही देश के नेता,नौकरशाह और राशन दुकानदार करते हैं। फिर विदेशी कंपनिया आयेगी तो क्या करेंगी। यह अगर सरकार नहीं जानती तो वाकई आजादी देश को नहीं सत्ताधारियो को मिली है।
पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ में प्राइम टाइम एंकर और सम्पादक हैं। पुण्य प्रसून बाजपेयी के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 20 साल से ज़्यादा का अनुभव है। प्रसून देश के इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी पत्रकारिता में बेहतरीन कार्य के लिए वर्ष 2005 का इंडियन एक्सप्रेस गोयनका अवार्ड फ़ॉर एक्सिलेंस और प्रिंट मीडिया में बेहतरीन रिपोर्ट के लिए 2007 का रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला। उनके ब्लॉगhttp://prasunbajpai.itzmyblog.com/ से साभार










 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर