Sunday, 23 November 2014

आग लगाना क्या मुश्किल हैं”: गीता दत्त ----संजोग वाल्टर



-संजोग वाल्टर|| 
गीतादत्त को गुज़रे 41 साल हो गये हैं, महज़ 42 साल की उम्र में दुनिया को उस वक्त अलविदा कहा जब उनके बच्चे छोटे थे,शौहर था उनकी ज़िन्दगी में जिसे उन्होंने कभी टूट कर चाहा था,शौहर दूसरी औरत के लिए पागल हो गया था,शौहर की खुदकुशी के बाद जिस दौलत और कम्पनी की मालियत उन्हें और उनके बच्चों को मिलनी थी वो सब कुछ उन्हें नहीं मिला शौहर के भाई सब ले गये, गम गलत करने के लिए शराब का सहारा लिया जब होश आया तीन बच्चों की ज़िम्मेदारी थी  उनके कन्धों पर. तब तक बहुत देर हो चुकी थी,1950 के मध्य से ही कुछ न कुछ वजहों से वो फ़िल्मी दुनिया से धीरे धीरे अलग हो रही थी.

जिसने हरेक गाने को अपने अंदाज़ में गाया. नायिका, सहनायिका, खलनायिका, नर्तकी या रास्ते की बंजारिन, हर किसी के लिए अलग रंग और ढंग के गाने गाये.नाचे घोड़ा नाचे घोड़ा, किम्मत इसकी बीस हज़ार मैं बेच रही हूँ बीच बाज़ारआज से 61  साल पहले बना हैं और फिर भी तरोताजा हैं. आज की काली घटासुनते हैं तो लगता है सचमुच बाहर बादल छा गए हैं. तब लोग कहते थे गीता गले से नहीं दिल से गाती थी! गीता दत्त का नाम ऐसी पा‌र्श्वगायिका के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने अपनी दिलकश आवाज की कशिश से लगभग तीन दशकों तक करोड़ों श्रोताओं को मदहोश किया.

फिल्म जगत में गीता दत्त के नाम से मशहूर गीता घोष राय चौधरी महज 12 वर्ष की थी तब उनका पूरा परिवार फरीदपुर (अब बंगलादेश) से 1942 में बम्बई (अब मुंबई) आ गया. उनके पिता देबेन्द्रनाथ घोष रॉय चौधरी ज़मींदार थे ,गीता के कुल दस भाई बहन थे जमींदार थे. बचपन के दिनों से ही गीता राय का रूझान संगीत की ओर था और वह पा‌र्श्वगायिका बनना चाहती थी. गीता राय ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हनुमान प्रसाद से हासिल की. 23 नवंबर 1930 में फरीदपुर शहर में जन्मी गीता राय को सबसे पहले वर्ष 1946 में फिल्म भक्त प्रहलाद के लिए गाने का मौका मिला. गीता राय ने कश्मीर की कली, रसीली, सर्कस किंग (1946) जैसी कुछ फिल्मो के लिए भी गीत गाए लेकिन इनमें से कोई भी बॉक्स आफिस पर सफल नही हुई. इस बीच उनकी मुलाकात महान संगीतकार एस डी बर्मन से हुई. गीता रॉय मे एस डी बर्मन को फिल्म इंडस्ट्री का उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने गीता राय से अपनी अगली फिल्म दो भाई के लिए गाने की पेशकश की. वर्ष 1947 में प्रदर्शित फिल्म दो भाई गीता राय के सिने कैरियर की अहम फिल्म साबित हुई और इस फिल्म में उनका गाया यह गीत मेरा सुंदर सपना बीत गया. लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ. फिल्म दो भाई मे अपने गाये इस गीत की कामयाबी के बात बतौर पा‌र्श्वगायिका गीता राय अपनी पहचान बनाने में सफल हो गई.

वर्ष 1951 गीता राय के सिने करियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन में भी एक नया मोड़ लेकर आया. फिल्म बाजी के निर्माण के दौरान उनकी मुलाकात निर्देशक गुरूदत्त से हुई. फिल्म के एक गाने तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले की रिर्काडिंग के दौरान गीता राय को देख गुरूदत्त फ़िदा हो गए. फिल्म बाजी की सफलता ने गीता राय की तकदीर बना दी और बतौर पा‌र्श्व गायिका वह फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गई. गीता राय भी गुरूदत्त से प्यार करने लगी. वर्ष 1953 में गीता राय ने गुरूदत्त से शादी कर ली. गीता राय से वो बन गयी थी गीता दत्त, साल 1956 गीता दत्त के सिने कैरियर में एक अहम पड़ाव लेकर आया. हावड़ा ब्रिज के संगीत निर्देशन के दौरान ओ पी नैयर ने ऐसी धुन तैयार की थी जो सधी हुयी गायिकाओं के लिए भी काफी कठिन थी. जब उन्होने गीता दत्त को मेरा नाम चिन चिन चुगाने को कहा तो उन्हे लगा कि वह इस तरह के पाश्चात्य संगीत के साथ तालमेल नहीं बिठा पायेंगी. लेकिन उन्होने इसे एक चुनौती की तरह लिया और इसे गाने के लिए उन्होंने पाश्चात्य गायिकाओ के गाये गीतों को भी बारीकी से सुनकर अपनी आवाज मे ढालने की कोशिश की और बाद में जब उन्होंने इस गीत को गाया तो उन्हें भी इस बात का सुखद अहसास हुआ कि वह इस तरह के गाने गा सकती है.

गीता दत्त के पंसदीदा संगीतकार के तौर पर एस डी बर्मन का नाम सबसे पहले आता है. गीता दत्त और एस डी बर्मन की जोड़ी वाली गीतो की लंबी फेहरिस्त में कुछ है .मेरा सुंदर सपना बीत गया (दो भाई- 1947), तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे (बाजी-1951), चांद है वही सितारे है वही गगन (परिणीता-1953), जाने क्या तुने सुनी जाने क्या मैने सुनी, हम आपकी आंखों मे इस दिल को बसा लें तो (प्यासा-1957), वक्त ने किया क्या हसीं सितम (कागज के फूल-1959) जैसे न भूलने वाले गीत शामिल है. गीता दत्त के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी संगीतकार ओ.पी.नैयर के साथ भी पसंद की गई. ओ पी नैयर के संगीतबद्ध जिन गीतों को गीता दत्त ने अमर बना दिया उनमें कुछ है, सुन सुन सुन जालिमा, बाबूजी धीरे चलना, ये लो मै हारी पिया, मोहब्बत कर लो जी भर लो, (आरपार-1954), ठंडी हवा काली घटा, जाने कहां मेरा जिगर गया जी, (मिस्टर एंड मिसेज 55-1955), आंखो हीं आंखो मे इशारा हो गया, जाता कहां है दीवाने (सीआईडी-1956), मेरा नाम चिन चिन चु (हावड़ा ब्रिज-1958), तुम जो हुये मेरे हमसफर (12ओ क्लाक-1958), जैसे न भूलने वाले गीत शामिल है.जिस साल फिल्मदो भाईप्रर्दशित हुई उसी साल फिल्मिस्तान की और एक फिल्म आयी थी जिसका नाम था शहनाई. दिग्गज संगीतकार सी रामचन्द्र ने एक फडकता हुआ प्रेमगीत बनाया था चढ़ती जवानी में झूलो झूलो मेरी रानी, तुम प्रेम का हिंडोला”. इसे गाया था खुद सी रामचंद्र, गीता रॉय और बीनापानी मुख़र्जी ने. कहाँ दो भाईके दर्द भरे गीत और कहाँ यह प्रेम के हिंडोले!

गीतकार राजेंदर किशन की कलम का जादू हैं इस प्रेमगीत में जिसे संगीतबद्ध किया हैं सचिन देव बर्मन ने. एक हम और दूसरे तुम, तीसरा कोई नहीं, यूं कहो हम एक हैं और दूसरा कोई नहीं”. इसे गाया हैं किशोर कुमार और गीता रॉय ने फिल्म प्यारके लिए जो सन 1950  में आई थी. गीत फिल्माया गया था राज कपूर और नर्गिस पर.हम तुमसे पूंछते हैं सच सच हमें बताना, क्या तुम को आ गया हैं दिल लेके मुस्कुराना?” वाह वाह क्या सवाल किया हैं. यह बोल हैं अंजुम जयपुरी के लिए जिन्हें संगीतबद्ध किया था चित्रगुप्त ने फिल्म हमारी शान के लिए जो 1950  में प्रर्दशित हुई थी. बहुत कम संगीत प्रेमी जानते हैं की गीता दत्त ने सबसे ज्यादा गीत संगीतकार चित्रगुप्त के लिए गाये हैं. यह गीत गाया हैं मोहम्मद रफी और गीता ने. रफी और गीता दत्त के गानों में भी सबसे ज्यादा गाने चित्रगुप्त ने संगीतबद्ध किये हैं.भले गाना पूरा अकेले गाती हो या फिर कुछ थोड़े से शब्द, एक अपनी झलक जरूर छोड़ देती थी. पिकनिक में टिक टिक करती झूमें मस्तों की टोलीऐसा युगल गीत हैं जिसमें मन्ना डे साहब और साथी कलाकार ज्यादातर गाते हैं , और गीता दत्त सिर्फ एक या दो पंक्तियाँ गाती हैं.

इस गाने को सुनिए और उनकी आवाज़ की मिठास और हरकत देखिये. ऐसा ही गाना हैं रफी साहब के साथ ए दिल हैं मुश्किल जीना यहाँजिसमे गीता दत्त सिर्फ आखिरी की कुछ पंक्तियाँ गाती हैं. दादा गिरी नहीं चलने की यहाँ..जिस अंदाज़ में गाया हैं वो अपने आप में गाने को चार चाँद लगा देता हैं. ऐसा ही एक उदाहरण हैं एक लोरी का जिसे गीता ने गया हैं पारुल घोष जी के साथ. बोल हैं आ जा री निंदिया आ”, गाने की सिर्फ पहली दो पंक्तियाँ गीता के मधुर आवाज़ मैं हैं और बाकी का पूरा गाना पारुल जी ने गाया हैं.बात हो चाहे अपने से ज्यादा अनुभवी गायकों के साथ गाने की (जैसे की मुकेश, शमशाद बेग़म और जोहराजान अम्बलावाली) या फिर नए गायकोंके साथ गाने की (आशा भोंसले, मुबारक बेग़म, सुमन कल्याणपुर, महेंद्र कपूर या अभिनेत्री नूतन)! न किसी पर हावी होने की कोशिश न किसीसे प्रभावित होकर अपनी छवि खोना.

अभिनेता सुन्दर, भारत भूषण, प्राण, नूतन, दादामुनि अशोक कुमार जी और हरफन मौला किशोर कुमार के साथ भी गाने गाये! चालीस के दशक के विख्यात गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ तो इतने ख़ूबसूरत गाने गाये हैं मगर दुर्भाग्य से उनमें से बहुत कम गाने आजकल उपलब्ध हैं. ग़ज़ल सम्राट तलत महमूद के साथ प्रेमगीत और छेड़-छड़ भरे मधुर गीत गायें. इन दोनों के साथ संगीतकार बुलो सी रानी द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ यह प्यार की बातें यह आज की रातें दिलदार याद रखनाबड़ा ही मस्ती भरा गीत हैं, जो फिल्म बगदाद के लिए बनाया गया था. इसी तरह गीता ने तलत महमूद के साथ कई सुरीले गीत गायें जो आज लगभग अज्ञात हैं.

जब वो गाती थी आग लगाना क्या मुश्किल हैंतो सचमुच लगता हैं कि गीता की आवाज़ उस नर्तकी के लिए ही बनी थी. गाँव की गोरी के लिए गाया हुआ गानाजवाब नहीं गोरे मुखडे पे तिल काले का” (रफी साहब के साथ) बिलकुल उसी अंदाज़ में हैं. उन्ही चित्रगुप्त के संगीत दिग्दर्शन में उषा मंगेशकर के साथ गाया लिख पढ़ पढ़ लिख के अच्छा सा राजा बेटा बन”. और फिर उसी फिल्म में हेलन के लिए गाया बीस बरस तक लाख संभाला, चला गया पर जानेवाला, दिल हो गया चोरी हाय…!”

सन १९४९ में संगीतकार ज्ञान दत्त का संगीतबद्ध किया एक फडकता हुआ गीतजिया का दिया पिया टीम टीम होवेशमशाद बेग़म जी के साथ इस अंदाज़ में गाया हैं कि बस! उसी फिल्म में एक तिकोन गीत था उमंगों के दिन बीते जाएजो आज भी जवान हैं. वैसे तो गीता दत्त ने फिल्मों के लिए गीत गाना शुरू किया सन 1946 में, मगर एक ही साल में फिल्म दो भाई के गीतों से लोग उसे पहचानने लग गए. अगले पांच साल तक गीता दत्त, शमशाद बेग़म और लता मंगेशकर सर्वाधिक लोकप्रिय गायिकाएं रही. अपने जीवन में सौ से भी ज्यादा संगीतकारों के लिए गीता दत्त ने लगभग सत्रह सौ गाने गाये.अपनी आवाज़ के जादू से हमारी जिंदगियों में एक ताज़गी और आनंद का अनुभव कराने के लिए संगीत प्रेमी गीता दत्त को हमेशा याद रखेंगे.गीता रॉय (दत्त) ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत प्रेमगीत गाये हैं मगर जिनके बारे में या तो कम लोगों को जानकारी हैं या संगीत प्रेमियों को इस बात का शायद अहसास नहीं है. इसीलिए आज हम गीता के गाये हुए कुछ मधुर मीठे प्रणय गीतों की खोज करेंगे.

गीता दत्त और किशोर कुमार ने फिल्म मिस माला (१९५४)के लिए, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में. नाचती झूमती मुस्कुराती आ गयी प्यार की रातफिल्माया गया था खुद किशोरकुमार और अभिनेत्री वैजयंती माला पर. रात के समय इसे सुनिए और देखिये गीता की अदाकारी और आवाज़ की मीठास. कुछ संगीत प्रेमियों का यह मानना हैं कि यह गीत उनका किशोरकुमार के साथ सबसे अच्छा गीत हैं.

गौर करने की बात यह हैं कि गीता दत्त ने अभिनेत्री वैजयंती माला के लिए बहुत कम गीत गाये हैं. सन 1955 में फिल्म सरदार का यह गीत बिनाका गीतमाला पर काफी मशहूर था. संगीतकार जगमोहन सूरसागरका स्वरबद्ध किया यह गीत हैंबरखा की रात में हे हो हां..रस बरसे नील गगन से”. उद्धव कुमार के लिखे हुए बोल हैं. भीगे हैं तन फिर भी जलाता हैं मन, जैसे के जल में लगी हो अगन, राम सबको बचाए इस उलझन से”.कुछ साल और पीछे जाते हैं सन १९४८ में. संगीतकार हैं ज्ञान दत्त और गाने के बोल लिखे हैं जाने माने गीतकार दीना नाथ मधोक ने. जी हाँ, फिल्म का नाम हैं चन्दा की चांदनीऔर गीत हैं उल्फत के दर्द का भी मज़ा लो”. १८ साल की जवान गीता रॉय की सुमधुर आवाज़ में यह गाना सुनते ही बनता है. प्यार के दर्द के बारे में वह कहती हैं यह दर्द सुहाना इस दर्द को पालो, दिल चाहे और हो जरा और हो”. लाजवाब! प्रणय भाव के युगल गीतों की बात हो रही हो और फिल्म दिलरुबा का यह गीत हम कैसे भूल सकते हैं? अभिनेत्री रेहाना और देव आनंद पर फिल्माया गया यह गीत है हमने खाई हैं मुहब्बत में जवानी की कसम, न कभी होंगे जुदा हम”. चालीस के दशक के मशहूर गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ गीता रॉय ने यह गीत गाया था सन 1950 में. आज भी इस गीत में प्रेमभावना के तरल और मुलायम रंग हैं.

दुर्रानी और गीता दत्त के मीठे और रसीले गीतों में इस गाने का स्थान बहुत ऊंचा हैं.गीतकार अज़ीज़ कश्मीरी और संगीतकार विनोद (एरिक रॉबर्ट्स) कालारा लप्पागीत तो बहुत मशहूर हैं जो फिल्म एक थी लड़की मेंथा. उसी फिल्म में विनोद ने गीता रॉय से एक प्रेमविभोर गीत गवाया. गाने के बोल हैंउनसे कहना के वोह पलभर के लिए आ जाए”. एक अद्भुत सी मीठास हैं इस गाने में. जब वाह गाती हैं फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए, हाय, फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाएतब उस हायपर दिल धड़क उठता हैं.सन १९४८ में पंजाब के जाने माने संगीतकार हंसराज बहल के लिए फिल्म चुनरियाके लिए गीता ने गाया था ओह मोटोरवाले बाबू मिलने आजा रे, तेरी मोटर रहे सलामत बाबू मिलने आजा रे”. एक गाँव की अल्हड गोरी की भावनाओं को सरलता और मधुरता से इस गाने में गीता ने अपनी आवाज़ से सजीव बना दिया है.सन 1950 में फिल्म हमारी बेटीके लिए जवान संगीतकार स्नेहल भाटकर (जिनका असली नाम था वासुदेव भाटकर) ने मुकेश और गीता रॉय से गवाया एक मीठा सा युगल गीत किसने छेड़े तार मेरी दिल की सितार के किसने छेड़े तार”. भावों की नाजुकता और प्रेम की परिभाषा का एक सुन्दर उदाहरण हैं यह युगल गीत जिसे लिखा था रणधीर ने.बावरे नैन फिल्म में संगीतकार रोशन को सबसे पहला सुप्रसिद्ध गीत (ख़यालों में किसी के) देने के बाद अगले साल गीता रॉय ने रोशन के लिए फिल्म बेदर्दी के लिए गाया दो प्यार की बातें हो जाए, एक तुम कह दो, एक हम कह दे”. बूटाराम शर्मा के लिखे इस सीधे से गीत में अपनी आवाज़ की जादू से एक अनोखी अदा बिखेरी हैं गीता रोय ने.

पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ एक स्वप्नील प्रेमगीत हैं फिल्म ज़माना (1957 ) से जिसके संगीत निर्देशक हैं सलील चौधरी और बोल हैं दिल यह चाहे चाँद सितारों को छूले ..दिन बहार के हैं..उसी साल  फिल्म बंदी का मीठा सा गीत हैं गोरा बदन मोरा उमरिया बाली मैं तो गेंद की डाली मोपे तिरछी नजरिया ना डालो मोरे बालमा”. हेमंतकुमार का संगीतबद्ध यह गीत सुनने के बाद दिल में छा जाता है.संगीतकार ओमकार प्रसाद नय्यर (जो की ओ पी नय्यर के नाम से ज्यादा परिचित है) ने कई फिल्मों को फड़कता हुआ संगीत दिया. अभिनेत्री श्यामा की एक फिल्म आई थी श्रीमती 420 (1956) में, जिसके लिए ओ पी ने एक प्रेमगीत गवाया था मोहम्मद रफी और गीता दत्त से. गीत के बोल है यहाँ हम वहां तुम, मेरा दिल हुआ हैं गुम”, जिसे लिखा था जान निसार अख्तर ने.आज के युवा संगीत प्रेमी शायद शंकरदास गुप्ता के नाम से अनजान है. फिल्म आहुती (1950) के लिए गीता राय ने शंकरदास गुप्ता के लिए युगल गीत गाया था लहरों से खेले चन्दा, चन्दा से खेले तारे”.

उसी फिल्म के लिए और एक गीत इन दोनों ने गाया था दिल के बस में हैं जहां ले जाएगा हम जायेंगे..वक़्त से कह दो के ठहरे बन स्वर के आयेंगे”. एक अलग अंदाज़ में यह गीत स्वरबद्ध किया हैं, जैसे की दो प्रेमी बात-चीत कर रहे हैं. गीता अपनी मदभरी आवाज़ में कहती हैं -चाँद बन कर आयेंगे और चांदनी फैलायेंगे”.”दिल-ऐ-बेकरार कहे बार बार,हमसे थोडा थोडा प्यार भी ज़रूर करो जी”. इस को गाया हैं गीता दत्त और गुलाम मुस्तफा दुर्रानी ने फिल्म बगदाद के लिए और संगीतबद्ध किया हैं बुलो सी रानी ने. जिस बुलो सी रानी ने सिर्फ दो साल पहले जोगन में एक से एक बेहतर भजन गीता दत्त से गवाए थे उन्हों ने इस फिल्म में उसी गीता से लाजवाब हलके फुलके गीत भी गवाएं. और जिस राजा मेहंदी अली खान साहब ने फिल्म दो भाई के लिखा था मेरा सुन्दर सपना बीत गया” , देखिये कितनी मजेदार बाते लिखी हैं इस गाने में: दुर्रानी : मैं बाज़ आया मोहब्बत से, उठा लो पान दान अपना गीता दत्त : तुम्हारी मेरी उल्फत का हैं दुश्मन खानदान अपना दुर्रानी : तो ऐसे खानदान की नाक में अमचूर करो जी सचिन देव बर्मन ने जिस साल गीता रॉय को फिल्म दो भाई के दर्द भरे गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर पहुंचाया उसी साल उन्ही की संगीत बद्ध की हुई फिल्म आई थी दिल की रानी”. जवान राज कपूर और मधुबाला ने इस फिल्म में अभिनय किया था. उसी फिल्म का यह मीठा सा प्रेमगीत हैं आहा मोरे मोहन ने मुझको बुलाया हो”. इसी फिल्म में और एक प्यार भरा गीत था आयेंगे आयेंगे आयेंगे रे मेरे मन के बसैय्या आयेंगे रे”. और अब आज की आखरी पेशकश है संगीतकार बुलो सी रानी का फिल्म दरोगाजी (१९४९) के लिया संगीतबद्ध किया हुआ प्रेमगीत अपने साजन के मन में समाई रे”. बुलो सी रानी ने इस फिल्म के पूरे के पूरे यानी 12 गाने सिर्फ गीता रॉय से ही गवाए हैं. अभिनेत्री नर्गिस पर फिल्माये गए इस मधुर गीत के बोल हैं मनोहर लाल खन्ना (संगीतकार उषा खन्ना के पिताजी) के. गीता की आवाज़ में लचक और नशा का एक अजीब मिश्रण था जिसने इस गीत को और भी मीठा कर दिया.

वर्ष 1957 मे गीता दत्त और गुरूदत्त की विवाहित जिंदगी मे दरार आ गई. गुरूदत्त ने गीता दत्त के काम में दखल देना शुरू कर दिया. वह चाहते थे गीता दत्त केवल उनकी बनाई फिल्म के लिए ही गीत गाये. काम में प्रति समर्पित गीता दत्त तो पहले इस बात के लिये राजी नही हुयी लेकिन बाद में गीता दत्त ने किस्मत से समझौता करना ही बेहतर समझा. धीरे-धीरे अन्य निर्माता निर्देशको ने गीता दत्त से किनारा करना शुरू कर दिया. कुछ दिनो के बाद गीता दत्त अपने पति गुरूदत्त के बढ़ते दखल को बर्दाशत न कर सकी और उसने गुरूदत्त से अलग रहने का निर्णय कर लिया.

इस बात की एक मुख्य वजह यह भी रही कि उस समय गुरूदत्त का नाम अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ भी जोड़ा जा रहा था जिसे गीता दत्त सहन नही कर सकी. गीता दत्त से जुदाई के बाद गुरूदत्त टूट से गये और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे मे डूबो दिया. दस अक्तूबर 1964 को अत्यधिक मात्रा मे नींद की गोलियां लेने के कारण गुरूदत्त इस दुनियां को छोड़कर चले गए. गुरूदत्त की मौत के बाद गीता दत्त को गहरा सदमा पहुंचा और उसने भी अपने आप को नशे में डुबो दिया.

गुरूदत्त की मौत के बाद उनकी निर्माण कंपनी उनके भाइयो के पास चली गयी. गीता दत्त को न तो बाहर के निर्माता की फिल्मों मे काम मिल रहा था और न ही गुरूदत्त की फिल्म कंपनी में. इसके बाद गीता दत्त की माली हालत धीरे धीरे खराब होने लगी. कुछ वर्ष के पश्चात गीता दत्त को अपने परिवार और बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास हुआ तरुण ( 1954), अरुण (1956),और नीना ( 1962) का भविष्य उनके सामने था और वह पुन: फिल्म इंडस्ट्री में अपनी खोयी हुयी जगह बनाने के लिये संघर्ष करने लगी. मंगेशकर बैरियरभी सामने था लिहाज़ा वो दुर्गापूजा में होने वाले स्टेज कार्यकर्मों के लिए गा कर गुज़र बसर करने लगी.

ज़मींदार घराने की गीता दत्त के आख़िरी दिन मुफलिसी में गुज़रे ,1967 में रिलीज़ बंग्ला फिल्म बधू बरन में गीता दत्त को काम करने का मौका मिला जिसकी कामयाबी के बाद गीता दत्त कुछ हद तक अपनी खोयी हुयी पहचान बनाने में सफल हो गई. हिन्दी के अलावा गीता दत्त ने कई बांग्ला फिल्मों के लिए भी गाने गाए. इनमें तुमी जो आमार (हरनो सुर-1957), निशि रात बाका चांद (पृथ्वी आमार छाया-1957), दूरे तुमी आज (इंद्राणी-1958), एई सुंदर स्वर्णलिपि संध्या (हॉस्पिटल-1960), आमी सुनचि तुमारी गान (स्वरलिपि-1961) जैसे गीत श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय है. सत्तर के दशक में गीता दत्त की तबीयत खराब रहने लगी और उन्होंने एक बार फिर से गीत गाना कम कर दिया. 1971 में रिलीज़ हुई अनुभव में गीता दत्त ने तीन गीत गाये थे,संगीतकार थे कनु राय कोई चुपके से आके” “मेरा दिल जो मेरा होता “”मेरी जान मुझे जान न कहोइस फिल्म में काम करने के बाद वो बीमार रहने लगी:आखिकार 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया .


+

Friday, 21 November 2014

जातीय गृह-युद्ध की आहट सुनिए लोकतंत्र के प्रति ईमानदार हो जाइये--- Subhash Chandra

सवर्ण जातियां,विशेष रूप से जातियों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण मित्र गौर करें
+
कृपया निम्न दो समकालीन घटनाओं पर आप गम्भीरता से चिन्तन मनन करें

====================================================
पोस्ट पर कमेन्ट या लाइक न भी करें पर चिन्तन मनन ज़रूर करें
+
एक तरफ संत रामपाल हैं जो ब्राह्मण -वेद-पुराण का खंडन करते हैं , विरोध करने वाले आर्य समाजियों की हत्या के उन पर आरोप हैं इस के बाद भी वो कोर्ट हाज़िर नही हो रहे हैं उनके निम्न जाति के कमांडो ट्रेनिंग प्राप्त भक्त हथियार बंद होकर पुलिस-प्रशासन से क्षमता भर सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं - ये लोकतंत्र में स्तब्ध कर देने वाली घटना है
+
दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी हैं जो सवर्णों को विदेशी आर्य /सगे नही हैं आदि आदि कहकर समाज की जातीय विद्वेष को स्पष्ट विभाजक रेखा बना रहे हैं
+
इन दोनों घटनाओं के सन्दर्भ में हमें ये समझना पड़ेगा कि रामपाल जैसे दबंग संत देश में सदियों से चले आ रहे धार्मिक जातिभेद की आनुवांशिक बीमारी की वज़ह से ही पैदा हुए हैं और उन्हें समाज और धर्म से अपमानित शूद्र जातियों के नागरिकों के बड़े समूह का मानसिक आर्थिक समर्थन उन्हें प्राप्त है
+
जीतन राम मांझी भले ही वोट की राजनीति के लिए ऐसा कर रहे हों पर सोशल मीडिया से लेकर हर छोटी जाति के संगठन में इस बयान को छोटी जातियों के स्वाभिमान और देश पर असली मालिक होने की हैसियत के रूप में देखा जा रहा है इसकी बानगी आप मांझी के समर्थन में सोशल मीडिया पर समर्थन की उमड़ती भीड़ के रूप में देख सकते हैं
+
मेरा निवेदन सिर्फ इतना है कि
+
बहुसंख्यक जातियों का अपमान करने वाले धार्मिक जातिभेद की गन्दगी का इलाज़ करके सबको सम्मान देने वाले स्वस्थ समाज निर्माण की ओर कदम जल्द नहीं उठाये गये तो जातिभेद के गटर से हजारों लाखों रामपाल और जीतन राम मांझी पैदा होने से आप नही रोक सकते
जो भारत को गृह युद्ध की विभीषिका की ओर ले जायेंगे और लोकतंत्र को लहुलुहान करेंगे

+
एक अंधेरी सुरंग में हमारा देश समाज प्रवेश कर रहा है। यह शुभ संकेत नहीं हो सकते
+
जातीय गृह-युद्ध की आहट सुनिए लोकतंत्र के प्रति ईमानदार हो जाइये

https://www.facebook.com/rajubhaiya1978/posts/828387797225472 
********************************************************************

1947 में जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत को आज़ादी दी तो अमेरिकी इशारे पर भारत का विभाजन करके सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया था। अब एक लंबे अरसे से अमेरिकी साम्राज्यवाद भारत को 25-30 हिस्सों में विभक्त करने की योजना पर चलता आ रहा है। कभी मेंका गांधी को आगे किया गया था जिनको भाजपा उपाध्यक्ष विजय राजे सिंधिया का खुला समर्थन था। फिर कांशी राम को आगे किया गया था उनको भी भाजपा का समर्थन था और मायावती को भी। लेकिन ये लोग सफल न हो सके। 2011 में हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितार्थ और कारपोरेट के संरक्षणार्थ सत्ता विरोधी आंदोलन चलाया था जिसे तत्कालीन पी एम मनमोहन सिंह जी का भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिला था और उसी के परिणाम स्वरूप आज मोदी जी सत्ताशीन हैं। अब अमेरिकी योजना को सफल बनाने हेतु मूल निवासी आंदोलन चलाया जा रहा है जो आर्य को जाति/धर्म का प्रतीक यूरोपीय निष्कर्षों के आधार पर बताता है। 

'आर्य' =  आर्ष =श्रेष्ठ अर्थात जिन मनुष्यों के 'कर्म' श्रेष्ठ हों वे सब जाति /देश/काल से परे आर्य -आर्ष-श्रेष्ठ हैं। लेकिन शोषण-उत्पीड़न-ढोंग-पाखंड के सिद्धांतकार ब्राह्मणों ने जातिगत -व्यवस्था जो चला रखी है वह ही साम्राज्यवादियों के मंसूबे सफल करेगी। प्रत्येक राजनीतिक दल का नेतृत्व ब्राह्मण जातीय लोगों ने हथिया रखा है और वे अपने-अपने दल को शोषको व लुटेरों के पक्ष में नीतियाँ बनाने हेतु प्रेरित कर लेते हैं। 'सत्य ' बोलने और ढोंग - पाखंड का विरोध करने वालों को उत्पीड़ित किया जाता है। परिस्थितियाँ साम्राज्यवादियो के अनुकूल हैं।  
(विजय राज बली माथुर ) 
**********************************
Coment on Facebook :
 

राजनीति में अंध-भक्ति खतरनाक होती है -----कँवल भारती

20-11-2014 · Edited
राजनीति में अंध-भक्ति खतरनाक होती है
(कँवल भारती)
फेसबुक मित्र पवन कुमार ने मेरे इनबॉक्स में मुझसे पूछा है कि-- “सर, मोदी के बढ़ते रथ को रोकने के लिये हमारे विश्लेषक व लेखक कोई कदम उठा रहे है या नहीं ? बहन जी ने तो मिशन की गति ही रोक दी.”
मैं इसका क्या जवाब दूं? यह सवाल तो पवन कुमार को उन दलित चिंतकों से पूछना चाहिए, जिन्होनें कांशीराम और मायावती की चापलूसी करने के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे, जो मायावती को दलितों की जिन्दा देवी कहते थे, जिनके लिए वे सिर्फ पूजा की वस्तु हैं और जिन्होने यह कभी नहीं सोचा कि वे क्या कर रही हैं और दलितों को कहाँ ले जा रही हैं? अगर मेरे जैसे कुछ लोगों ने मायावती के नेतृत्व पर सवाल उठाया, तो हमें उनहोंने समाज का गद्दार और ब्राह्मणों का दलाल कहा.
अभी हमारे एक मित्र, जो एक पत्रिका भी निकालते हैं, लखनऊ में ‘कथाक्रम’ के बाद मुझसे मिलने लखनऊ विश्वविद्यालय के गेस्टहाउस में आये थे. उन्होंने मायावती की अंधी भक्ति में अपनी पत्रिका को बसपा का पोस्टर बना दिया था. इससे उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ. उन्होंने भी मुझसे यही सवाल पूछा, जो पवन कुमार ने पूछा है. मैं तो इस मौके की तलाश में ही था. सो, मैंने कहा, “अगर आप जैसे बुद्धिजीवियों ने अपनी चापलूसी की भूमिका नहीं निभाई होती, एक आलोचक की भूमिका निभाई होती, तो आज मोदी को लेकर आप इतने परेशान नहीं होते, पर आप तो उन्हें अपना आराध्य माने हुए थे”.
यह सिर्फ उन्हीं की बात नहीं है, हमारे एक दलित लेखक ने तो बाकायदा किताब ही लिख दी—‘मायावती जिन्दा देवी’. ऐसे ही लोगों ने मायावती को यह एहसास कराया कि सब कुछ हरा-हरा है, कहीं भी कुछ सूखा नहीं है. वे कहीं कुछ गलत नहीं कर रही हैं. कब और कैसे बसपा का हाथी गणेश बन गया, इस पर किसी ने सवाल नहीं उठाया. जब कांशीराम ने सपा-बसपा गठबंधन तोड़कर पहली बार भाजपा से हाथ मिलाया और मायावती को मुख्यमंत्री बनाया, तो दलितों ने जश्न मनाया था. दलित बुद्धिजीवियों ने कसीदे पढ़े थे, यहाँ तक कहा गया कि दलित-ब्राह्मण की एकता से समाज बदलेगा. किसी ने भी इस पर सवाल खड़े नहीं किये, किसी ने भी इसके दूरगामी परिणाम पर विचार नहीं किया. जब दूसरी बार उन्होंने फिर से भाजपा से हाथ मिलाकर सरकार बनाई, तब भी उन दलित बुद्धिजीवियों ने जश्न मनाया. तीसरी बार जब बसपा को पूर्ण बहुमत मिला, तो उसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया गया. किसी ने उसे इस नजरिये से नहीं देखने की कोशिश नहीं की कि वह ब्राह्मण की अवसरवादिता थी, जिसे मायावती के सहारे सत्ता में आना था. अगर वह सोशल इंजीनियरिंग थी, तो लोकसभा-2014 के चुनावों में बसपा का सूपड़ा क्यों साफ़ हो गया? अगर सोशल इंजीनियरिंग नाम की कोई चीज है, तो वह ‘बहुजन’ की अवधारणा को कायम रखने और मजबूत करने में होनी चाहिए थी, लेकिन मायावती ने उसी को अपनी तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग में ध्वस्त कर दिया.
यहाँ मैं कहना चाहता हूँ कि दलित बुद्धिजीवी सवाल क्यों नहीं उठाते? जब पहली बार कांशीराम ने भाजपा से हाथ मिलाया था, तो उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया? जब कांशीराम ने भाजपा को असाम्प्रदायिक और राष्ट्रवादी पार्टी बताया था, तो उन्होंने उस पर सवाल क्यों नहीं खड़े किये? जब मायावती 2000 में नरेंद्र मोदी के लिए वोट मांगने गुजरात गयीं थीं, तो उन्होंने उन्हें कटघरे में खड़ा क्यों नहीं किया? जब यह सब उन्होंने नहीं किया, तो अब मायावती के पतन पर हाय-हाय क्यों की जा रही है? मैं अपने से एक उदाहरण देता हूँ, जब मैंने आज़म खां के जुल्म के खिलाफ कांग्रेस का दामन थामा था, तो देश भर में मेरे खिलाफ विरोध का माहौल बना था, मेरे बहुत करीबी मित्र भी मेरे खिलाफ हो गये थे, यहाँ तक कि मेरे पक्ष में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले एक सीनियर अधिवक्ता ने भी बहस नहीं की थी, क्योंकि वे मेरे कांग्रेस में जाने से नाराज हो गये थे. इसे कहते हैं विरोध. और मैंने कुछ ही समय बाद कांग्रेस छोड़ दी थी, जबकि मैं कांग्रेस का मेंबर तक नहीं बना था. अगर इसी तरह का दबाव दलित बुद्धिजीवियों और दलितों ने मायावती पर बनाया होता तो आज बहुजन राजनीति की इतनी दुर्गति नहीं होती कि जहाँ से हम चले थे, लौट कर वहीँ आ गये. कहीं पहुंचे ही नहीं.

https://www.facebook.com/kanwal.bharti/posts/4728907597877 

Wednesday, 19 November 2014

जन नेता इंदिराजी ---Pankaj Chaturvedi


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10204328995338387&set=a.3544322740135.144367.1634516462&type=1&theater
तब इंटरनेट नहीं था, टीवी भी नहीं था, लेाग इतने ज्ञानवान नहीं थे, उस दौर में लोकप्रियता, ताकतवर निर्णयों और विकास के नए माॅडल के साथ दिलों पर राज करने वाली, दुनिया की अब तक की सबसे लोकप्रिय नेता व देश की शान इंदिराजी का आज जन्‍मदिन है, जैसा कि सभी राजनेताओं के साथ होता है, कुछ कदम गलत भी होते हैं, उसके बावजूद उनके जैसा प्रभामंडल का, बगैर लागलपेट वाला, बगैर नौटंकी, मार्केटिंग, प्रोपेगोंडा के दुनिया पर छाप छोडने वाले नेता दुनिया में बहुत कम हुए हैं इस अवसर पर इंदर मल्‍होत्रा की पुस्‍तक पढने का सुझाव उन लोगों को दूंगा जो केवल नाम सुन कर गाली बकने के आदी हैं, जो केवल 'बकलोली' को देशप्रेम व लोकप्रियता मानते हैं

यहां इंदिराजी की बुंदेलखंड यात्रा का एक दुर्लभ फोटो डाल रहा हूं, खजुरोहो हवाई अड्रडे पर , इसमें आपको अर्जुन सिंह दिखेंगे, सत्‍यव़त चतुर्वेदी भी हैं जिन्‍हें तलाशना मुश्किल होगा, उस समय के कलेक्‍टर होशियार सिंह व कई ऐसे चैहरे जो स्‍म़तियों में भी नहीं हैं और यह फोटो उन लोगों के पास भी नहीं होगा जो इसमें हैं , जरा देखें कि वे कितनी कम सुरक्षा व्‍यवस्‍था के स्‍ज्ञाि चलती थीं और उन्‍हें भरोसा था कि वे जन नेता हैं

Tuesday, 18 November 2014

ब्राह्मण दृष्टि असहमति को बर्दाश्त नहीं करती है---कॅंवल भारती

17-11-2014  ·
15 नवम्बर 2014 को ‘कथाक्रम-2014’ लखनऊ में मेरे जिस वक्तव्य पर बवाल मचा था, मैं उसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. मेरे आलेख का शीर्षक था--
वे हमें जातिवादी कहते हैं
(कॅंवल भारती)

https://www.facebook.com/kanwal.bharti/posts/4721117483129
एक लम्बे अरसे के बाद मैं ‘कथाक्रम-2014’ में आया हूॅं। जब पहली बार सम्भवतः सन् 2000 में मैं इस मंच से बोला था, तो मुझे अभी तक याद है, मेरे एक मित्र ने दिल्ली में मुझसे कहा था, ‘कथाक्रम’ में तो आप दहाड़ रहे थे। अब जब हमारा बोलना भी लोगों को दहाड़ना लगता है, तो इससे आप समझ सकते हैं कि हमारी आलोचना को किस रूप में लिया जाता है। इसलिए मैं ऐसी संगोष्ठियों में जाने से बचने की कोशिश करता हूॅं। मैंने बहुत से सेमीनारों में भाग लिया है और इस नतीजे पर पहुॅंचा हॅंू कि एक-दो दलित लेखकों को सिर्फ सन्तुलन के लिए बुला लिया जाता है, बाकी तो उद्घाटन से लेकर समापन तक का सारा अनुष्ठान दूसरे ही लोग सम्पन्न करते हैं। इसका साफ मतलब है कि गैर-दलित लेखकों की नजर में हम सिर्फ सन्तुलन के लिए हैं। वे दलित आलोचना को हिन्दी आलोचना के विकास के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। हम जब दलित के पक्ष की बात करते हैं, या डा. आंबेडकर की बात करते हैं, या ज्योतिबा फूले की बात करते हैं, तो वे हमें जातिवादी कहते हैं और सीधे हमें साहित्य से उठाकर राजनीति में पटक देते हैं। और तब हमारी आलोचना उनकी नजर में एक विमर्श से ज्यादा अहमियत नहीं रखती। हम बताना चाहते हैं कि हमारी आलोचना विमर्श नहीं है, बल्कि आलोचना की तीसरी धारा है, जैसे दूसरी धारा प्रगतिवादी या माक्र्सवादी है। दरअसल, अभी तक हिन्दी साहित्य में जितनी भी धाराएॅं चली हैं- जैसे नई कविता, नई कहानी, छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, जनवाद, माक्र्सवाद आदि, वे सब की सब ब्राह्मणों के बीच से ही निकली हैं। इसलिए उन्होंने उन सारी धाराओं को स्वीकार किया। पर उन्होंने कभी यह सपने में भी नहीं सोचा था कि साहित्य की कोई धारा उनके बाहर से भी फूट सकती है। इसलिए वे दलित साहित्य की धारा को साहित्य की धारा नहीं मानते हैं। भले ही वे न मानें, पर मैं बताना चाहता हूॅं कि दलित आलोचना हिन्दी आलोचना को हिन्दुत्व के फोल्ड से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है, जिसमें प्रगतिशील आलोचना भी फॅंसी हुई है।
दलित चिन्तन की दृष्टि में हिन्दी साहित्य का इतिहास और हिन्दी आलोचना दोनों ही जातिवादी हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में सिर्फ तीन कहानियाॅं लिखने वाले ब्राह्मण लेखक का नाम मिल जाएगा। लेकिन दर्जनों पुस्तकें लिखने वाले किसी भी दलित लेखक का नाम नहीं मिलेगा। मैं हीरा डोम की बात नहीं करता, जिन पर एक दूसरी ही बहस छेड़ दी गई है। पर, मैं स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ की बात जरूर करुॅंगा, जो कवि और नाटककार के साथ-साथ एक मासिक पत्र के सम्पादक भी थे। पर, हिन्दी साहित्य के इतिहास में उनका कोई जिक्र नहीं है। कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ अपनी किताब में उनको नकली स्वामी कहकर उनका गन्दा मजाक उड़ा सकते हैं, गणेश शंकर विद्यार्थी ‘प्रताप’ में उनके विरोध में लेख लिख सकते हैं, पर हिन्दी साहित्य के इतिहासकार उन्हें इतिहास में स्थान नहीं देते। क्योंकि उनकी नजर में वे जातिवादी थे, दलित की बात करते थे, दलितों पर लिखते थे। पर, दलितों पर लिखने वाले उन्हीं के समकालीन प्रेमचन्द उनके लिए महान लेखक थे, वे उनके लिए जातिवादी नहीं हैं, वे इतिहास में प्रगतिशील लेखक के रूप में दर्ज हैं। चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, जिन्होंने 40, 50 और 60 के दशकों में 100 से भी ज्यादा पुस्तकें लिखकर हिन्दी बेल्ट में ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलित वर्गों में क्रान्ति का बिगुल बजाया था, उनका नाम हिन्दी साहित्य के इतिहास में नहीं मिलेगा। पर उन्हीं के समकालीन वेद-विरोधी राहुल सांकृत्यायन का नाम मिल जाएगा, क्योंकि वे ब्राह्मण थे। जिस तरह वैदिकी हिन्सा हिन्सा नहीं कहलाती है, उसी तरह ब्राह्मण का ब्राह्मण-विरोध भी विरोध नहीं कहलाता है। उन्हें राहुल सांकृत्यायन स्वीकार्य हैं, पर चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु स्वीकार्य नहीं हैं, क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं हैं। इसलिए मैं कहता हूॅं कि हिन्दी साहित्य का इतिहास और आलोचना दोनों ही जातिवादी हैं।
अभी मैं मैनेजर पाण्डेय का एक इण्टरव्यू पढ़ रहा था ‘लहक’ में। धर्मवीर यादव और संजीव चंदन ने उनसे बातचीत की है। मैनेजर पाण्डेय कहते हैं कि दलित दृष्टि असहमति को बर्दाश्त नहीं कर सकती। पर, मैं बताना चाहता हूॅं कि ब्राह्मण दृष्टि असहमति को बर्दाश्त नहीं करती है। दलित बेचारों की हैसियत ही क्या है, जो असहमति को बर्दाश्त नहीं करेंगे? उनके हाथ में है क्या, जो वे कुछ कर लेंगे? अभी तक तो सारा व्यवस्था और नियामन ब्राह्मणों के ही हाथों में है। विश्वविद्यालयों में भी अभी उन्हीं का बोलबाला है। अब संघपरिवार की सरकार है, तो यह वर्चस्व और भी बढ़ेगा। काॅंग्रेस सरकार में यूजीसी पैसा देती थी, तो विश्वविद्यालय दलित साहित्य पर सेमिनार करा लेते थे। अब वह सब बन्द हो जाएॅंगे। अब देखते हैं, कितने विश्वविद्यालय दलित साहित्य पर सेमिनार कराते हैं? दलित साहित्य और दलितों के अब बहुत बुरे दिन आने वाले हैं। ओबीसी के लिए फिर भी दरवाजे खुले हुए हैं, हिन्दी के सरकारी संस्थान उन्हें सम्मान-पुरुस्कार दे देते हैं। पर दलितों के लिए वहाॅं भी दरवाजे बन्द होते जा रहे हैं। इसका कारण है कि ओबीसी ब्राह्मणवाद के लिए उतना बड़ा खतरा नहीं है, जितना बड़ा खतरा दलित वर्ग है। मोदी खुद पिछड़े वर्ग से आते हैं, पर परम हिन्दू-भक्त हैं।
मैनेजर पाण्डेय कहते हैं कि ‘दलित दृष्टि की सीमा यह है कि वह अपने प्रति असहमति को बर्दाश्त नहीं कर सकती।’ लेकिन वे इसी इण्टरव्यू में दलित लेखक डा. धर्मवीर के बारे में कहते हैं कि जब धर्मवीर ने उनके बारे में कुछ लिखा, तो उन्होंने धर्मवीर को पढ़ना छोड़ दिया। अब बताइए कि असहमति कौन बर्दाश्त नहीं कर रहा है? मैनेजर पाण्डेय के इसी साक्षात्कार से असहमति का एक और उदाहरण लेते हैं। वे कहते हैं, उन्होंने धर्मवीर की पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ को दलित विमर्श की पुस्तक कहा था, इस पर धर्मवीर नाराज हो गए और कुछ दिन बाद राष्ट्रीय सहारा में श्यौराजसिंह बेचैन ने लेख लिखकर कहा कि आखिर मैनेजर पाण्डेय का पांडित्य प्रगट हो ही गया। अब क्या इसके बाद संवाद की कोई गुंजाइश बचती है क्या?’ इससे क्या जाहिर होता है? क्या मैनेजर पाण्डेय अपनी ही सीमा नहीं बता रहे हैं? आखिर संवाद की गुंजाइश खत्म होने का मतलब क्या है? आप संवाद कहाॅं कर रहे हैं? आप तो फैसला सुना रहे हैं? आप आलोचना की पुस्तक को विमर्श की पुस्तक कहकर फैसला ही दे रहे हैं। श्यौराजसिंह क्या गलत कह रहे थे? यह मैनेजर पाण्डेय का पांडित्य ही तो है, जो उन्होंने आलोचना को विमर्श बता दिया? यह कौन सा सिद्धान्त है कि मैनेजर पाण्डेय जो व्याख्या करें, वह आलोचना है और जो व्याख्या दलित लेखक करे, वह विमर्श है? अगर मैं कहूॅं कि मैनेजर पाण्डेय का सारा आलोचनात्मक साहित्य विमर्श का साहित्य है, वह आलोचना है ही नहीं, तो तो क्या वे मानेंगे? धर्मवीर यादव और संजीव चंदन ने डा. मैनेजर पाण्डेय से एक सवाल हजारीप्रसाद द्विवेदी पर पूछा था। उन्होंने पूछा था कि ‘क्या हजारीप्रसाद द्विवेदी की कबीर पर जो आलोचना है, उसे इस तरह देखा जाए कि आचार्य शुक्ल पर उनका ब्राह्मणवाद अधिक हावी था, कबीर द्विवेदी जी की आलोचना-दृष्टि का एक शिफ्ट है?’ इस सवाल के उत्तर में डा. पाण्डेय कहते हैं- ‘रामचन्द्र शुक्ल को ब्राह्मणवादी कहना दलित दृष्टि से साहित्य पर विचार करना है। अगर आचार्य शुक्ल ब्राह्मणवादी थे, तो जिस जायसी का हिन्दी में कहीं नाम नहीं था, उसकी सम्पूर्ण ग्रन्थावली को 200 पृष्ठों की भूमिका के साथ क्यों प्रकाशित करवाते? इसलिए यह कहना मुझे उचित नहीं जान पड़ता कि शुक्ल जी ब्राह्मणवादी थे।’ यह है वर्गीय आलोचना का फर्क। ब्राह्मण आलोचक को आचार्य शुक्ल ब्राह्मणवादी नजर नहीं आते हैं, पर दलित आलोचकों को वे ब्राह्मणवादी ही नजर आते हैं। हिन्दी आलोचना किन्तु-परन्तु से आगे नहीं बढ़ी है। वह सवाल नहीं उठाती है। वह खण्डन नहीं करती है। वह इतिहास की गहराई में नहीं जाती है, क्योंकि इतिहास से अनभिज्ञ है। इसीलिए उन्हें शुक्ल जी ब्राह्मणवादी नजर नहीं आते हैं। शुक्ल जी जब ब्राह्मणवादी नहीं थे तो जाहिर है कि वह पाण्डेय जी की नजर में मानववादी या प्रगतिवादी थे। वे इसका प्रमाण भी देते हंै कि उन्होंने जायसी ग्रन्थावली का सम्पादन किया था। लेकिन हकीकत यह है कि रामचन्द्र शुक्ल को जायसी इसलिए पसन्द थे, क्योंकि जायसी ने तुलसीदास की तरह ही राजा-रानियों के मिथकों पर काव्य-रचना की है और वेद-ब्राह्मण के चरणों में शीश नवाया है। शुक्ल जी ने खुद अपनी भूमिका में लिखा है कि जो वेद के मार्ग पर नहीं चलता है, उसे जायसी अच्छा नहीं समझते। जायसी की वेदों में आस्था थी, इसलिए वह शुक्ल जी को प्रिय थे। पर उन्हें कबीर प्रिय नहीं थे, क्योंकि वह वेद, पुराण और ब्राह्मण तीनों को नकारते थे। अगर मैनेजर पाण्डेय को शुक्ल जी का यह ब्राह्मणवाद दिखाई नहीं देता, तो इसीलिए कि वर्गीय चेतना से वे ग्रस्त हैं।
मैं हिन्दी के मूर्धन्य आलोचकों से, चाहे वे नामवर सिंह हों, मैनेजर पाण्डेय हों, पूछना चाहता हूॅं कि जब वे आलोचना की दूसरी परम्परा चला सकते हैं, तो हम तीसरी परम्परा क्यों नहीं चला सकते? हमारी पहली-दूसरी दोनों परम्परा की आलोचना से तमाम असहमतियाॅं हैं, जिन्हें हमने अपनी आलोचना में बाकायदा दर्ज किया है, हमने अपनी आलोचना को इतिहास से जोड़ा है, जबकि पहली-दूसरी परम्परा के आलोचक इतिहास की तरफ पीठ किए हुए खड़े हैं। मैं इसका उदाहरण कबीर की आलोचना से देता हूॅं। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने कबीर को वेदान्ती, वैष्णवी और रामानन्द का शिष्य सिद्ध करने में हर साधन अपनाया है, जो इतिहास से परे है। इसलिए दलित आलोचक उनसे सहमत नहीं हंै। मेरी जानकारी में रामानन्द को कबीर का गुरु बताए जाने का पहला खण्डन 1942 में डा. राकेश गुप्त ने ‘सम्मेलन पत्रिका’ में लेख लिखकर किया था। उन्होंने आचार्य शुक्ल और अयोध्या सिंह हरिऔध की मान्यताओं का जोरदार खण्डन इस लेख में किया था। उस समय तक द्विवेदी जी की कबीर नहीं आई थी। तब किसी हिन्दी आलोचक ने न उसे विमर्श कहा था और न उसका विरोध किया था। शायद वह आलोचना उनके वर्ग के भीतर से आई थी। पर जब दलित आलोचक डा. धर्मवीर ने इस पर विस्तार से काम किया और कबीर के ब्राह्मण आलोचकों की इतिहास-विरोधी एवं तथ्य-विरोधी आलोचना की चिन्दी-चिन्दी कर दी, तो हल्ला मच गया। उन्हें ब्राह्मणवाद का किला, जिसे बड़े परिश्रम से द्विवेदी जी ने बनाकर खड़ा किया था, ढहता हुआ नजर आने लगा। तब साहित्य की ब्राह्मणवादी लाबी ने दो काम किए। पहला दलित आलोचना को दलित विमर्श कहना शुरु किया और दूसरा, उस लाबी ने मोटी रकम देकर द्विवेदी जीे के मण्डन में और धर्मवीर के खण्डन में काम करने के लिए डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल को तैयार किया। उन्होंने डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल को इसलिए यह काम सौंपा, क्योंकि वह ब्राह्मण नहीं हैं। जब डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने मिथकीय और अर्नगल प्रलाप के साथ ‘अकथ कहानी प्रेम की’ लिखकर हजारीप्रसाद द्विवेदी की ही लाइन पर, बल्कि उससे भी बढ़कर कबीर को वेदान्ती, वैष्णवभक्त और रामानन्द का शिष्य घोषित कर दिया, तो तुरन्त ब्राह्मणवादी लाबी ने उसे विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में लगा दिया। एक सीधा सा तर्क इन आलोचकों की समझ में नहीं आता कि जो कबीर वेदविरोधी थे, पुराणविरोधी थे, ब्राह्मणविरोधी थे और सगुणविरोधी थे, वे वेदान्ती, वैष्णवी और रामानन्दी कैसे हो सकते हैं? वे रामानन्द के ऐसे शिष्य को, जो रामानन्द की वेद-वेदान्त, वर्णव्यवस्था और वैष्णवी आस्थाओं का खण्डन कर रहा था, रामानन्द का जबरदस्ती शिष्य क्यों बनाने पर तुले हैं?
मैं बहुत ज्यादा न कहकर, अन्त में हिन्दी आलोचकों से कहना चाहता हूॅं कि दलित आलोचना के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण मत अपनाइए। ये दोहरे-तीहरे मापदण्ड साहित्य का विकास रोक रहे हैं। यह कहना कि दलित लेखकों के साथ संवाद की गुंजाइश नहीं है, आपके अहंकार को दर्शाता है। आप कहना चाहते हैं कि साहित्य में सिर्फ आप ही नियामक-नियन्ता हैं, हम केवल आपको फालो करें, तो यह अब नहीं चलेगा।

Sunday, 16 November 2014

चित्रगुप्त श्रीवास्तव---Dhruv Gupt








जन्मदिन / चित्रगुप्त:


चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना !




फिल्म संगीत के सुनहरे दौर के सबसे सुरीले संगीतकारों में से चित्रगुप्त भी एक थे। चल उड़ जा रे पंछी, तेरी दुनिया से दूर चले होके मज़बूर, एक रात में दो दो चांद खिले, मुझे दर्दे दिल का पता न था मुझे आप किसलिए मिल गए, महलों ने छीन लिया बचपन का प्यार मेरा, लागी छूटे ना अब तो सनम, उठेगी तुम्हारी नज़र धीरे-धीरे, मुफ्त हुए बदनाम किसी से हाय दिल को लगा के, दिल का दीया जलाके गया ये कौन मेरी तन्हाई मेबांके पिया कहो ना दगाबाज़ हो, छेड़ो न मेरी ज़ुल्फ़ें सब लोग क्या कहेंगे, चली चली रे पतंग मेरी चली रे, मैं कौन हूं मैं कहां हूं मुझे ये होश नहीं, कोई बता दे दिल है जहां क्यों होता है दर्द वहां, छुपा कर मेरी आंखों को वो पूछे कौन हो जी तुम, ये पर्बतों के दायरें ये शाम का धुंआ, न तो दर्द गया न दवा ही मिली, रंग दिल की धड़कन भी लाती तो होगी, आज की रात नया चांद लेके आई है, मुस्कुराओ कि जी नहीं लगता, तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो, महलों में रहने वाली दिल है गरीब का, जाग दिले दीवाना रूत जागी वस्ले यार की, देखो मौसम क्या बहार है - जैसे सैकड़ों कालजयी गीतों के रचयिता को वह वह चर्चा नहीं मिली जिसके वे सही मायने में हक़दार थे। उस युग के कई महान संगीतकारों की भीड़ में वे हमेशा पृष्ठभूमि में ही रहे। बिहार के गोपालगंज जिले के एक छोटे से गांव के चित्रगुप्त श्रीवास्तव संगीत के प्रति अपने जुनून के कारण पटना कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी छोड़ 1946 में बम्बई आए और संगीतकार एस.एन त्रिपाठी के सहायक बन गए। स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म थी 'फाइटिंग हीरो', लेकिन उन्हें शोहरत मिली फिल्म 'भाभी' के संगीत से। उन्होंने 139 हिंदी तथा भोजपुरी फ़िल्मों में संगीत दिया जिनमें प्रमुख हैं - भाभी, बरखा, चांद मेरे आजा, जबक, मैं चुप रहूंगी, ऊंचे लोग, ओपेरा हाउस, गंगा की लहरें,हम मतवाले नौजवां, आकाशदीप, पूजा के फूल, औलाद, एक राज, मैं चुप रहूंगी,अफ़साना, बिरादरी, परदेशी, वासना, बारात, मेरा कसूर क्या है, किस्मत, काली टोपी लाल रूमाल, गंगा मईया तोहे पियरी चढ़बो, लागी नहीं छूटे राम, गंगा किनारे मोरा गांव, बलम परदेसिया और भैया दूज। उनकी मृत्यु के बाद उनके दो पुत्रों - आनंद-मिलिन्द ने अस्सी के दशक में हिंदी फिल्म संगीत में कुछ अरसे तक अपनी छाप छोड़ी थी।




जन्मदिन पर मरहूम चित्रगुप्त को हार्दिक श्रद्धांजलि !

Meenakshi Seshadri---Sanjog

Meenakshi Seshadri (born November 16, 1963) is an film actress and dancer. She won the Miss India contest in 1981 at age 17 the youngest woman to be crowned Miss India.Meenakshi Seshadri, born as Shashikala Seshadri, made her debut in Painter Babu,Telugu/Hindi bilingual film (1982) opposite Rajiv Goswami, the younger brother of Manoj Kumar. She shot to fame with the mega hit film Hero (1983) directed by Subhash Ghai. She was nominated for a Filmfare Award for her role in the film Damini. She acted in her last film Ghatak in (1997). Meenakshi appeared in a number of films like Awara Baap alongside Madhuri Dixit and Rajesh Khanna, Bewafai alongside Rajnikant and Rajesh Khanna, Meri Jung opposite Anil Kapoor, Inaam Dus Hazaar opposite Sanjay Dutt, Shahenshah alongside Amitabh Bachchan and Mithun, Vijay opposite Anil Kapoor. Meenakshi Sheshadri had the privilege of working with the best Bollywood banners as well as distinguished actors.
Known for her angelic beauty and impeccable dance performances, Meenakshi is among the few actresses who did not stereotype their on screen image. Her magnetism would liveliness to every film she worked in.Though she was appreciated for all her films, her high came when she was paired opposite superstar Amitabh Bachchan in 1988's Shahenshah. The film, though considered then as a flop,was a money spinner and is said to have made more money than any other blockbuster film. Her groundbreaking performance was in Damini released in 1993. Directed by famed filmmaker Rajkumar Santoshi, it also starred Rishi Kapoor, Sunny Deol, Amrish Puri, Tinu Anand and Paresh Rawal. The film was based on the sensitive subject of injustice towards a rape victim. Damini became a mega success and received a number of awards including the coveted National Film Award. Meenakshi was accolade for her versatility and display of varied set of emotions on screen.
In the 1990s, she appeared in films like Aadmi Khilona Hai alongside Govinda, Kshatriya alongside veteran actors Sunil Dutt, Dharmendra and Vinod Khanna. Meenakshi played the female lead in 1996 blockbuster Ghatak opposite Sunny Deol. Directed by Rajkumar Santoshi, it was her last film.Meenakshi Seshadri was born into a Tamil Iyengar Brahmin family in Sindri, Jharkhand.She is trained in four Indian classical dance forms: Bharata Natyam, Kuchipudi, Kathak and Odissi. She studied dance under Vempati Chinna Satyam and Jaya Rama Rao.
She retired from cinema after marrying investment banker Harish Mysore.She had a civil wedding, a registered shaadi, in New York.The couple is blessed with two children, daughter Kendra and son Josh. Meenakshi lives in Plano,Texas,with a daughter, Kendra and a son, Josh.There, she teaches Bharatanatyam,Kathak and Odissi. She performs with her students at charity events and fundraisers. A philanthropist, Meenakshi and her disciples performed at the American Association of Physicians of Indian Origin (AAPI) convention in California.
She had an alleged affair with Rajkumar Santoshi.Meenakshi Seshadri was nominated for Filmfare Best Actress Award for Jurm in 1991 and for Damini in 1994.She used to be knowns as one of the most beautiful actress at her peak.

बेगुनाह को गुनहगार बनाया गया

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )





 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश