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Friday, 4 January 2019
Wednesday, 28 March 2018
Saturday, 2 September 2017
यूँ ही नहीं कोई प्रियंका से हनीप्रीत बनता ! ------ मोनिका भारद्वाज
| Monika Bhardwaj |
Monika Bhardwaj
0 2 - 0 9 - 2017
यूँ ही नहीं कोई प्रियंका से हनीप्रीत बनता !
बहुत बार दुःख होता है कि भला कैसे किसी रसूख वाले व्यक्तित्व के सामने एक महिला अपनी गरिमा सरेंडर कर सकती है। हर क्षेत्र में बहुत से ऐसे उदहारण हैं जहाँ या तो महिलायें सब कुछ जानते बूझते व्यक्तिगत लालच में अनर्गल व्यवहार करती हैं या किसी बहकावे में आकर शोषक का साथ देती हैं। आखिर क्यों महिलायें इन बाबों, मठाधीशों, राजनीतिज्ञों, महंतों, अभिनेताओं, बिजनसमैन, साहित्यकारों, पत्रकारों, अफसरों, संस्थाधीशों, निर्देशकों के चंगुल में फंस जाती हैं। ऐसे दुराचारियों के साथ वो महिलायें भी बराबर की दोषी हैं। क्या इन अल्पबुद्धियों को जरा भी एहसास नहीं होता कि कैसे ऐसे व्यक्ति दुनिया दिखाने के भ्रम में इनकी उंगली पकड़ने के बहाने कब इनका शरीर पकड़ लेते हैं।
क्या वे उनके रसूख की सहायता से अपना जीवन संवारना चाहती हैं या फिर वो सच में इतनी भोली होती हैं कि उन्हें स्वयं नहीं पता चलता की सामने वाला उनका इस्तेमाल कर रहा है। अगर पहला पक्ष है तो ये घोर निंदनीय एवं शर्मनाक है। अपने अस्तित्व को दांव पर लगा कर पायी इज़्ज़त कीचड़ से भी बदतर है। पर दूसरे पक्ष पर विचार जरुरी है। हो सकता है शुरूआती दौर में उन्हें आभास न हो पाए पर एक वक़्त के बाद तो उन्हें पता चल ही जाता है कि उपरोक्त व्यक्ति वास्तव में कितने पानी में है।
दरअसल अपने अभावों के शून्य को भरने के लिए आप किसी बेहतर और पूर्ण इंसान की खोज करती हैं। वें अभाव कुछ भी, किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। पर औरते क्यों नहीं समझती की उन अभावों की एवज में उन्हें सिर्फ ठगा ही जाता है। और जरा ये बताइये कि आपकी किसी भी रिक्तता को भरने के लिए दैहिकता से होकर ही क्यों गुजरना पड़ता है ? सबसे जरुरी जब हमें सब पता चल जाता है तो हम आवाज क्यों नहीं उठाती हैं ? अगर गलती दोनों तरफ से है तो खुद को समझाइये। लेकिन तब भी चाहे कुछ आ जाए उस स्थिति से भागो मत। चूँकि बहुत बार परिवार, समाज और हमारी इज़्ज़त आड़े आ जाती है। तो भी रहो इनके बीच। इन्हें जवाब दो। इन्हें लताड़ों। एहसास दिलाओ जो हुआ सही नहीं हुआ। और आगे किसी और के साथ न किया जाए। लेकिन अगर गलती सिर्फ सामने वाले की है तो उसे बख्शिए मत। किसी भी कीमत पर चुप मत बैठिये। यकीन मानिये जब आप सहीं हैं तो विपरीत परस्थितियों में भी जीत सिर्फ आपकी ही होगी।
लेकिन अंततः सवाल वही ! कि मात्र किसी रसूख के आगे औरत बिछ कैसे सकती है ? आपकी उच्चतम अंक अर्हता आपकी योग्यता का इंडेक्स नहीं हो सकता। आपकी योग्यता आपके विवेक, आपकी बुद्धि और आपकी आवाज में है। शोषण हो जाना और बेवजह मूक बधिर बन कर करवाने में फर्क है। जब तक आपको अंदाजा होता है तब तक बहुत देर हो जाती है। इसलिए जागरूकता ही बचाव है।
साभार :
https://www.facebook.com/monikabugana/posts/739678499568703
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फेसबुक कमेंट्स :
Sunday, 9 October 2016
यवा व महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का समर्थन ------ प्रदीप घोष
Pradeep Ghosh .
2-4अक्टूबर 2016 इन्दौर में इप्टा का राष्ट्रीय सम्मेलन। 90 वर्षीय का.पेरीन दाजी ने इप्टा का झंडा फहराकर कार्यक्रम की शुरुआत की। एम एस सैत्थु, आनन्द पटवर्धन, राजन राजन हर सत्र मे न जाने कितने ही बुद्धीजीवी,सामाजिक कार्यकर्ता, सांस्कृतिक कर्मीयों का जमावड़ा व विचारों का आदान प्रदान होता रहा। उ प्र का महामंत्री होने के नाते डेलीगेट शेसन मे मुझे भी वक्ता बनाया गया। मैने जिन बिन्दुओं पर बल दिया :
1) हर सत्र में मंच पर युवा व महिला होनी चाहिए ,
2)क्षेत्रिय भाषा मे 4-5 प्रदेशों का वर्ष भर अलग अलग फेस्टीवल हो जिस्से देश भर मे प्रभाव व सक्रियता बनी रहे।
3) हमे अपने विषय व शर्तों पर गरान्ट लेना चाहिए। मंत्री अपने जेब से नही देता हमारे टैक्स का पैसा है।
सत्र के अन्त महामंत्री राकेश व अध्यक्ष रणवीर सिंह जी द्वारा तीनो बातें स्वीकृत कर ली गई। शीतल सठे को सुनना एक उपलब्धि थी।
https://www.facebook.com/pradeep.ghosh.7587/posts/566584150216159
Sunday, 16 November 2014
बेगुनाह को गुनहगार बनाया गया
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Wednesday, 10 September 2014
एकल परिवार भी बिखरने की कगार पर---अरविंद विद्रोही
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
09 -09-2014 :
https://www.facebook.com/arvind.vidrohi/posts/742166825819570
अरविंद विद्रोही जी एक जागरूक पत्रकार हैं और उनकी चिंता स्व्भाविक तथा वास्तविक है। प्रस्तुत दोनों घटनाओं में युवा महिलाओं को सिर्फ इसीलिए अपनी ज़िंदगी से हाथ धोना पड़ा कि वे आर्थिक स्वतन्त्रता हेतु जीविकोपार्जन के लिए घर से बाहर निकली थीं। कितनी आर्थिक स्वतन्त्रता मिली और परिवार में कितनी समृद्धि आ पाई ? बल्कि असमय ही उनके सपने और परिवार बिखर गए। :
ये दो तो सिर्फ उदाहरण हैं न जाने कितनी ही इस प्रकार की घटनाएँ रोज़ घटित हो रही हैं और अनेकों परिवार अनायास संकटों का सामना कर रहे हैं। रोजगार रत महिलाओं पर घर और बाहर दोनों की ज़िम्मेदारी रहती है और कुछ को छोड़ कर अधिकांश के स्वस्थ्य व मनोदशा पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसका खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है।
जब तक जिस परिवार में पुरुष भी घर की ज़िम्मेदारी निबाहने को तैयार न हों उस परिवार की महिलाओं को रोजगार करने से इंकार कर देना चाहिए ,वे क्यों घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िम्मेदारी लेकर अपने निजी स्वस्थ्य व समस्त परिवार को जोखिम में डालें?
सनातन धर्म गर्ल्स इंटर कालेज,आगरा छावनी में गणित के एक अध्यापक आलोक श्रीवास्तव साहब तो घर का काम बाकायदा अपनी श्रीमती जी को मदद करने के उद्देश्य से करते थे जबकि वह रोजगार में भी नहीं थीं। आलोक जी का कहना था कि यदि वह सुबह नाश्ता बना कर खा कर और अपनी श्रीमती जी को खिला कर कालेज चले जाते हैं तो सुबह-सुबह उनकी श्रीमती जी को छोटे बच्चे को अकेला छोड़ कर जल्दी-जल्दी उनके लिए नाश्ता नहीं तैयार करना पड़ता जबकि दिन में तसल्ली से इतमीनान से वह सब कार्य सुचारू रूप से कर लेती थीं।
इसके विपरीत सेंट पैटरिक जूनियर गर्ल्स हाईस्कूल,आगरा में गणित के अध्यापक नरेंद्र चौहान साहब अपनी श्रीमती जी को घर के किसी भी काम में मदद नहीं करते थे यहाँ तक कि पौधों में पानी भी नहीं डालते थे। एक बार उनको कहीं अचानक जाने की जल्दी थी और खाना तैयार नहीं था उन्होने बाज़ार से कुछ नाश्ता मंगाया जिसकी सब्जी में बैंगन की डंडी भी पड़ी थी जो मास्टर साहब के गले में जाकर अटक गई और उनको मुंह खोले -खोले ही डॉ के पास जाकर चिमटी से निकलवानी पड़ी। कार्यक्रम का मज़ा तो किरकिरा हुआ ही गले का घाव कई दिन तक परेशान किए रहा। यदि वह सब्जी बना देते या छील -काट कर ही तैयार कर देते तो डॉ के पास दौड़ लगाने और तकलीफ उठाने की नौबत क्यों आती?
गणित मास्टर चौहान साहब के मुक़ाबले गणित मास्टर आलोक श्रीवास्तव साहब की घरेलू गणित ज़्यादा सटीक व कारगर साबित होती है। अतः समाजवाद को घर में भी लागू किया जाना चाहिए तभी परिवारों में खुशहाली लौट सकेगी।
(विजय राजबली माथुर )
09 -09-2014 :
https://www.facebook.com/arvind.vidrohi/posts/742166825819570
अरविंद विद्रोही जी एक जागरूक पत्रकार हैं और उनकी चिंता स्व्भाविक तथा वास्तविक है। प्रस्तुत दोनों घटनाओं में युवा महिलाओं को सिर्फ इसीलिए अपनी ज़िंदगी से हाथ धोना पड़ा कि वे आर्थिक स्वतन्त्रता हेतु जीविकोपार्जन के लिए घर से बाहर निकली थीं। कितनी आर्थिक स्वतन्त्रता मिली और परिवार में कितनी समृद्धि आ पाई ? बल्कि असमय ही उनके सपने और परिवार बिखर गए। :
ये दो तो सिर्फ उदाहरण हैं न जाने कितनी ही इस प्रकार की घटनाएँ रोज़ घटित हो रही हैं और अनेकों परिवार अनायास संकटों का सामना कर रहे हैं। रोजगार रत महिलाओं पर घर और बाहर दोनों की ज़िम्मेदारी रहती है और कुछ को छोड़ कर अधिकांश के स्वस्थ्य व मनोदशा पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसका खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है।
जब तक जिस परिवार में पुरुष भी घर की ज़िम्मेदारी निबाहने को तैयार न हों उस परिवार की महिलाओं को रोजगार करने से इंकार कर देना चाहिए ,वे क्यों घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िम्मेदारी लेकर अपने निजी स्वस्थ्य व समस्त परिवार को जोखिम में डालें?
सनातन धर्म गर्ल्स इंटर कालेज,आगरा छावनी में गणित के एक अध्यापक आलोक श्रीवास्तव साहब तो घर का काम बाकायदा अपनी श्रीमती जी को मदद करने के उद्देश्य से करते थे जबकि वह रोजगार में भी नहीं थीं। आलोक जी का कहना था कि यदि वह सुबह नाश्ता बना कर खा कर और अपनी श्रीमती जी को खिला कर कालेज चले जाते हैं तो सुबह-सुबह उनकी श्रीमती जी को छोटे बच्चे को अकेला छोड़ कर जल्दी-जल्दी उनके लिए नाश्ता नहीं तैयार करना पड़ता जबकि दिन में तसल्ली से इतमीनान से वह सब कार्य सुचारू रूप से कर लेती थीं।
इसके विपरीत सेंट पैटरिक जूनियर गर्ल्स हाईस्कूल,आगरा में गणित के अध्यापक नरेंद्र चौहान साहब अपनी श्रीमती जी को घर के किसी भी काम में मदद नहीं करते थे यहाँ तक कि पौधों में पानी भी नहीं डालते थे। एक बार उनको कहीं अचानक जाने की जल्दी थी और खाना तैयार नहीं था उन्होने बाज़ार से कुछ नाश्ता मंगाया जिसकी सब्जी में बैंगन की डंडी भी पड़ी थी जो मास्टर साहब के गले में जाकर अटक गई और उनको मुंह खोले -खोले ही डॉ के पास जाकर चिमटी से निकलवानी पड़ी। कार्यक्रम का मज़ा तो किरकिरा हुआ ही गले का घाव कई दिन तक परेशान किए रहा। यदि वह सब्जी बना देते या छील -काट कर ही तैयार कर देते तो डॉ के पास दौड़ लगाने और तकलीफ उठाने की नौबत क्यों आती?
गणित मास्टर चौहान साहब के मुक़ाबले गणित मास्टर आलोक श्रीवास्तव साहब की घरेलू गणित ज़्यादा सटीक व कारगर साबित होती है। अतः समाजवाद को घर में भी लागू किया जाना चाहिए तभी परिवारों में खुशहाली लौट सकेगी।
(विजय राजबली माथुर )
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