Thursday, 13 October 2016

फासीवाद के खिलाफ हम सब ------ राकेश (इप्टा )

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Arvind Raj Swarup Cpi added 4 new photos.
Lucknow 13th October 2016.
A few Photos of Protest at Lucknow against the attack of Sanghis on IPTA conference participants at Indore (MP)on 4th October 2016.

















लखनऊ , 13 अक्तूबर 2016 :
आज साँय जी पी ओ पार्क, हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा पर इंदौर ( म . प्र .) में 'इप्टा  ' के राष्ट्रीय सम्मेलन पर 04 अक्तूबर 2016 को फासिस्टी गुंडों के हमले के खिलाफ विरोध स्वरूप एक धरना - प्रदर्शन का आयोजन किया गया । इसका संचालन इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने किया और इसमें प्रलेस, जलेस, जसम,साझी दुनिया, नीपा रंगमन्डली, अलग दुनिया, कलम सांस्कृतिक मंच, कलम विचार मंच , सेंटर फार आबजेक़टिव रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट, राही मासूम रज़ा एकेडमी, पी यू सी एल, अमित, दस्तक, डी वाई एफ वाई, नौजवानसभा, एस एफ आई, आल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, लखनऊ कलेक्टिव आदि संस्थाओं का प्रतिनिधित्व रहा। 

राकेश ने सविस्तार इप्टा के राष्ट्रीय कन्वेन्शन में घटित हादसे का उल्लेख करते हुये कलाकारों और प्रतिनिधियों के संयम व साहस की सराहना की। 


 इप्टा के कलाकारों ने गीतों के माध्यम से फासीवादी ताकतों के विरुद्ध  संघर्ष व जनता की एकजुटता का आह्वान किया। 


इस धरने में बड़ी संख्या में लखनऊ के लेखक कलाकार व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुये जिनमें वेदा राकेश, अरविंद राज स्वरूप, वीरेंद्र यादव, रूप रेखा वर्मा, ताहिरा हसन, आनंद रमन तिवारी, फूलचंद यादव, सुभाष राय, ओ पी सिन्हा, के के शुक्ल, मोहम्मद ख़ालिक़, मोहम्मद अकरम, विजय राजबली माथुर, मोहम्मद शोएब, मधु गर्ग, कान्ति मिश्रा, आशा मिश्रा, बिपिन मिश्रा, रमेश दीक्षित  आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।  
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आगरा, 13 अक्तूबर 2016  : 


Jyotsna Raghuvanshi


आगरा इप्टा प्रतिरोध दिवस 13अक्तूबर 2016....अभिव्यक्ति की आजादी ...बाधक हो तूफान बवंडर नाटक नहीं रुकेगा...






 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 9 October 2016

यवा व महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का समर्थन ------ प्रदीप घोष


Pradeep Ghosh .



2-4अक्टूबर 2016 इन्दौर में इप्टा का राष्ट्रीय  सम्मेलन। 90 वर्षीय का.पेरीन दाजी ने इप्टा का झंडा फहराकर कार्यक्रम की शुरुआत की। एम एस सैत्थु, आनन्द पटवर्धन, राजन राजन हर सत्र मे न जाने कितने ही बुद्धीजीवी,सामाजिक कार्यकर्ता, सांस्कृतिक कर्मीयों का जमावड़ा व विचारों का आदान प्रदान होता रहा। उ प्र का महामंत्री होने के नाते डेलीगेट शेसन मे मुझे भी वक्ता बनाया गया। मैने जिन बिन्दुओं पर बल दिया :
1) हर सत्र में मंच पर युवा व महिला होनी चाहिए , 
2)क्षेत्रिय भाषा मे 4-5 प्रदेशों का वर्ष भर अलग अलग फेस्टीवल हो जिस्से देश भर मे प्रभाव व सक्रियता बनी रहे। 
3) हमे अपने विषय व शर्तों पर गरान्ट लेना चाहिए। मंत्री अपने जेब से नही देता हमारे टैक्स का पैसा है।  
सत्र के अन्त महामंत्री राकेश व अध्यक्ष रणवीर सिंह जी द्वारा तीनो बातें स्वीकृत कर ली गई। शीतल सठे को सुनना एक उपलब्धि थी।
https://www.facebook.com/pradeep.ghosh.7587/posts/566584150216159

Thursday, 6 October 2016

लड़ना आसान होता है; ज़रूरत शांति के प्रयास की है - एम एस सथ्यु




 लड़ना आसान होता है; ज़रूरत शांति के प्रयास की है - एम एस सथ्यु

भारतीय जन नाट्य संघ के तीन दिवसीय 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का शुभारंभ ‘गर्म हवा’ जैसी कालजयी फिल्म के निर्देशक श्री एम एस सथ्यु द्वारा इप्टा के ध्वज वंदना से हुई। ध्वजारोहण में उनके साथ थे कॉमरेड पेरीन दाजी, प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन और इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश। ध्वजारोहण के बाद इप्टा अशोक नगर ईकाई, म.प्र और बिहार इकाई ने मिलकर शैलेंद्र द्वारा लिखित मशहूर जनगीत ‘तू ज़िंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर’ प्रस्तुत किया। इस मौके पर कॉमरेड पेरीन दाजी ने एम एस सथ्यु का स्वागत किया। इंदौर में उनकी उपस्थिति को गौरवपूर्ण बताया। ध्वज वंदना के बाद पुस्तक एवं पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन अंजन श्रीवास्तव ने किया।

2 अक्टूबर से 4 अक्टूबर तक चलनेवाले भारतीय जन नाट्य संघ के इस तीन दिवसीय 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का विधिवत उद्घाटन आनंद मोहन माथुर सभागार में एम एस सथ्यु की अध्यक्षता में हुआ। मंच पर उपस्थित कलाकारों, लेखकों एवं रंगकर्मियों में थे ख्यात डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह, उपाध्यक्ष अंजन श्रीवास्तव, राजेन्द्र राजन, राकेश, कॉमरेड पेरीन दाजी, नरहरि पटेल, वसंत शिंत्रे और मध्य प्रदेश इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया। मंच में उपस्थित लोगों के अतिरिक्त सभागार में देश के 25 राज्यों के लगभग 800 सौ रंगकर्मियों-संस्कृति कर्मियों के अलावा सैकड़ों की संख्या में लेखक, पत्रकार, कलाकार एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

अपने स्वागत भाषण में राकेश ने कहा इप्टा मोहब्बत की बात करती है। चार्ली चैप्लिन ने कहा था कि कला, कलाकार द्वारा जनता को लिखा गया प्रेमपत्र है। हम इसमें यह जोड़ते हैं कि इप्टा समय आने पर जनता की ओर से शासकों को अभियोग पत्र भी भेजती है। इप्टा के 75 साल पूरे हो रहे हैं। इसका नामकरण मशहूर वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था। हम युद्ध के विरोध में तब भी थे और आज भी हैं। हम शांति के पक्षधर हैं। राकेश ने एम एम कलबुर्गी समेत दिवंगत अन्य विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इप्टा बेगूसराय के पुराने साथी कन्हैया कुमार सहित सभी संघर्षशील साथियों के प्रति समर्थन व्यक्त किया। विभिन्न संगठनों एवं साथियों द्वारा प्राप्त ग्रीटिंग तथा शुभकामना संदेशों का उल्लेख किय़ा।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे एम एस सथ्यु ने मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य और हमारी चुनौतियाँ विषय पर अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा यह तय करना मुश्किल होता है कि किस भाषा में बात करें। मैं कन्नड़ हूँ यहाँ भारत के सभी भाषा भाषी लोग मौजूद हैं। अपने आत्मीय लहजे में सथ्यु ने दक्षिण भारतीय भाषाओं समेत हिंदी और अंग्रेज़ी में सभी का अभिवादन किया। उन्होंने कहा मै अनेक रंग संगठनों से होता हुआ 1965 में इप्टा में शामिल हुआ। लड़ना बहुत आसान होता है। लोगों से शांतिपूर्ण व्यवहार करना कठिन होता है। तकनीकि प्रगति इतनी हो चुकी है कि घर बैठे बम फेंके जा सकते हैं लेकिन शांति के प्रयास काफ़ी कठिन हैं। युद्ध के मौके पिछली सरकारों के पास भी थे। लेकिन उन्होंने हमले नहीं किये। लेकिन यह सरकार युद्ध कर रही है। आज की सरकार कम्युनल है। राहुल गांधी मोदी का युद्ध के विषय में समर्थन कर बचकानी बात कर रहे हैं। यह कांग्रेस का पक्ष नहीं राहुल गांधी की अपरिपक्वता है। मेरे विचार से सर्जिकल ऑपरेशन भारत के लिए शर्मनाक है। भारत का भरोसा आक्रमण पर नहीं होना चाहिए। कलाकार के रूप में हमें सांप्रदायिकता, चरमपंथ आदि से मुकाबला करना है। हमारे लिए धर्म, जाति और द्रोणाचार्य सभी गैरज़रूरी हैं। लाल, क्रांति का रंग है। हमे प्रिय है। हम लोकतंत्र के पक्षकार हैं। हमें आज द्रोणाचार्य नहीं चाहिए। हम लोकतांत्रिक उम्मीद के लोग हैं। रंगमंच दुमिया नहीं बदल सकता। वह लोगों को उत्प्रेरित कर उन्हें एक्टिव बनाता है। स्वीकार और निर्णय तक पहुँचाता है। मैं खुद को कलाकार मानता हूँ। मुझे बहुत खुशी होगी अगर मैं अगली बार अपना नाटक लेकर आऊँ।

प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी 20 रुपये प्रतिदिन से कम कमाती है। हमारा देश वित्तीय पूँजी का गुलाम हो चुका है। दूसरी दुनिया बनाने की लड़ाई अब तक बाकी है। भारतीय लोकतंत्र और विचारों की स्वतंत्रता खतरे में है। लेखकों को गुमराह किया जा रहा है उन्हें तोड़ा जा रहा है लेकिन हम टूटने भटकनेवाले नहीं निदान करनेवाले लोग हैं।

राजेन्द्र राजन के वक्तव्य के बाद इप्टा अशोक नगर के कलाकारों ने बामिक जौनपुरी का लिखा जनगीत ‘रात के समंदर में गम की नाव चलती है’ प्रस्तुत किया।

कॉमरेड शमीम फैज़ी ने कॉमरेड एबी बर्धन को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा वर्धन कल्चर, आर्ट, राजनीति और आंदोलनों से समान रूप से जुड़े थे। उनकी लिखी किताब फाइनांस कैपिटल आज टेक्स्ट बुक की तरह है। वे आयडियोलाग की तरह थे।

इस अवसर पर आनंद पटवर्धन की कॉमरेड ए बी वर्धन के अयोध्या भाषण पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गयी। इप्टा के पूर्व राष्ट्रीय महा सचिव कवि-कथाकार-रंगकर्मी जितेंद्र रघुवंशी पर आधारित एक फिल्म ‘सीप का मोती’ का प्रदर्शन भी किया गया। कवि और अनुवादक उत्पल बैनर्जी ने फैज़ की नज़्म 'लाजिम है कि हम भी देखेंगे' सुनायी। महाराष्ट्र के अंध विश्वास निर्मूलन समिति के कलाकारों ने सुकरात, तुकाराम और नरेन्द्र दाभोलकर एवं गोविंद पानसरे पर केन्द्रित नाटक की प्रस्तुति दी।

अंत में कॉमरेड विनीत तिवारी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा कि रोहित वेमुला की हत्या सांस्थानिक थी। एम एम कलबुर्गी की हत्या से हम अब तक नहीं उबरे है। कलबुर्गी कन्नड़ के 1400 साल के इतिहास में सबसे विपुल लेखन करनेवाले साथी रहे हैं। उन्हें याद करने के साथ साथ हम अपनी लड़ाइयों और एकता के लिए प्रतिबद्ध हैं। सत्र का संचालन अरविंद पोरवाल ने किया।

साभार :
https://www.facebook.com/shashi.bhooshan.35/posts/1467367616612963

Thursday, 29 September 2016

यह गजब की राजनीति है ------ विजय राजबली माथुर

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https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1390625684299468






   



वस्तुतः यह गजब का दिमाग नहीं , गजब की राजनीति है जिसका पता 2019 के संसदीय चुनावों से चलेगा। जिनके दिमाग से यह केंद्र सरकार बनी है उनका दिमाग अब उसकी पुनर्वापिसी की ओर लग चुका है। ये चित्र यू पी की राजधानी लखनऊ के एक क्षेत्र मात्र के हैं, सम्पूर्ण देश में सर्वत्र यही स्थिति है । पढे- लिखे सुविधा- साधन सम्पन्न किन्तु मूरख लोग सभी जगहों पर भेड़ियाधसान मचाये हुये हैं। लोगों में होड मची हुई है वर्तमान कंपनी छोड़ कर मुफ्त वाली कंपनी के सिम लेने की जबकि फिलहाल यह दिसंबर तक के लिए ही मुफ्त घोषित स्कीम है। उसके बाद जब चार्ज लगेगा तब मुफ्त के फायदे - नुकसान सामने आएंगे। यह केवल आर्थिक बात है जिसे शायद अधिकांश लोग झेल ही लेंगे। मुफ्त सिम लेने वालों में मजदूर, रिक्शा - टेम्पो चालक , गरीब और मेहनतकश लोग नहीं हैं। अतः ज़्यादा चार्ज देकर भी लोग डटे रह सकते हैं। 

राजनीतिक पक्ष यह है कि, दूसरी संचार कंपनियाँ या तो बाज़ार से विलुप्त हो जाएंगी या फिर इसी मुफ्त वाली कंपनी की सहयोगी बन जाएंगी। तात्पर्य यह कि, एक ही कंपनी का संचार पर एकाधिकार हो जाएगा। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया तो पहले ही इसके मालिकों के कब्जे में आ ही चुका है। केवल सोशल मीडिया से ही सरकार को चुनौती मिल रही थी। मुफ्त सिम की राजनीति से इन्टरनेट गतिविधियां एक ही कंपनी की कृपा - दृष्टि पर निर्भर हो जाएंगी। चुनाव के समय सर्वर की समस्या बता कर सोशल मीडिया पर गतिरोध होने के कारण सरकार विरोधी मुहिम को नियंत्रित कर लिया जाएगा। हवा में लट्ठ घुमाने वाला एथीस्ट संप्रदाय जो जनता से तो कटा हुआ है ही , पढे - लिखे तबके से भी कट जाएगा। एकतरफा प्रचार में वर्तमान सत्तारूढ़ पक्ष बाज़ी जीत लेगा और उसकी आसान पुनर्वापिसी हो जाएगी। इस ओर ध्यान देने के बजाए अपनी अलग डफली बजा कर  वामपंथ जाने - अनजाने फासिस्टों का मार्ग सुगम करता प्रतीत हो रहा है।  

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Wednesday, 21 September 2016

देशहित में युद्ध की संभावना से भी बचा जाना चाहिए ------ विजय राजबली माथुर

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हिंदुस्तान,20 सितंबर 2016 के अंक में प्रकाशित वर्तमान सेनाध्यक्ष  की तरफ से DGMO का यह बयान पूरी तरह से घोर अनुशासन हीनता का ज्वलंत उदाहरण है। भारतीय संविधान के अनुसार भारत का राष्ट्रपति भारतीय सेना का सर्वोच्च समादेष्टा (सुप्रीम कमांडर ) है , क्या सेनाध्यक्ष ने अपने सुप्रीम कमांडर से इजाजत लेकर यह बयान दिलवाया है? शायद नहीं और इसी कारण यह अनुशासन हीनता है। राष्ट्रपति को सुप्रीम कमांडर की हैसियत से इसके विरुद्ध कारवाई करनी चाहिए। 
इनके अतिरिक्त पूर्व सैन्य अधिकारी भी युद्ध के हक में बयान जारी करके जनता को भड़का रहे हैं। 

1971 जैसी भड़काऊ नीतियाँ केंद्र सरकार के इशारे पर चलाई जा रही हैं जिससे निकट भविष्य में सीमित युद्ध करके फिर मध्यावधि चुनावों में उसी प्रकार जीत हासिल की जाये जैसी इन्दिरा जी ने 1971 युद्ध के बाद 1972 में हासिल की थी और संसद की अवधि छह वर्ष करके एमर्जेंसी थोप दी थी। तब निकसन के 7 वां बेड़े की चुनौती को रूस की मदद से मुक़ाबला किया गया था। लेकिन अब तो ओबामा प्रशासन से सहयोग चल रहा है ।अब रूस का भी पाकिस्तान से सहयोग चल रहा है और चीन व यू एस ए का तो है ही। आज शत्रु से नहीं मित्र से ज़्यादा खतरा है। देश की जनता को यह समझना चाहिए और भावावेश में नहीं बहना चाहिए। कश्मीर स्थित जोजीला दर्रे के नीचे छिपा 'प्लेटिनम' यू एस ए को 'यूरेनियम ' निर्माण हेतु चाहिए जो एटम बम के निर्माण में सहायक होता है। अपने सामरिक-आर्थिक हितों की रक्षा के लिए यू एस ए के फायदे के लिए कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे युद्ध का बहाना मिल जाये। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की जनता के लिए ऐसा युद्ध विनाशक होगा जबकि यू एस ए के लिए लाभदायक । देशहित में युद्ध की संभावना से भी बचा जाना चाहिए।


    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 8 September 2016

चिता पर अपनी रोटी पका कर खाता है - वो है कर्मकांडी ब्राह्मण ------ मंजुल भारद्वाज

भारतीय मानस की ब्राह्मणवादी कृति का घिनौना रूप है कर्मकाण्ड ।
- मंजुल भारद्वाज ( विश्वविख्यात रंगचिंतक एवं दार्शनिक )

एक व्यापार
जन्म और मृत्यु का ,
निरा और निरा अमानवीय कृत्य
ईश्वर के नाम पर एक ढोंग , 
भारतीय संस्कृति के किसी भी सार्वभौमिक तत्त्व की कब्र खोदता , 
बखियां उधेड़ने का कृत्य है कर्मकाण्ड ।
ना आत्मा के तर्क पर टिकता है 
ना परमात्मा के तर्क पर टिकता है  ,
अनुवांशिक रूप 'भय' से पीड़ित भारतीय मानस की ब्राह्मणवादी कृति का घिनौना रूप है कर्मकाण्ड ।

आत्मा अजर है ,
अमर है आत्मा
जब शरीर धारण करती है उसको जन्म और शरीर त्यागती है उसको मृत्यु कहते हैं 
जन्म से मृत्यु की यात्रा यानि जीवन ।
किसी भी वेद  में कर्मकाण्ड की व्याख्या, अनिवार्यता और संदर्भ उद्धर्त नहीं है ।

यह ब्राह्मणवाद क्या है - यह वो मनोवृति है जो मनुष्य की चिता पर अपनी रोटीयां सेक कर खाती है , जीवन के हर मोड़ पर "ईश्वरीय" भय का विकराल रूप दिखा कर ठगती , लुटती और शोषित करती है मानवता को ।
शरीर छोड़ जाने पर आत्मा का शरीर से कोई रिश्ता नहीं है उसी तरह बाकी  जीवित देहों  के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। पर ब्राह्मण का खेल देखिये मोक्ष,स्वर्ग लोक का मोह जाल देखिये, कितना शातिर खेल है यह - आत्मा की शांति का ।
जिसका कोई प्रमाण नहीं है झूठे  मन्त्रों के उच्चार एक एक अभिशाप है मानवता पर , और ईश्वर की शक्ति को धिक्कारता है । जब ईश्वर ही सब करता कर्ता है , तो मनुष्य उसकी सत्ता को क्यों चुनौती देकर भगवान बनना चाहता है ?

आत्मा ईश्वर के अधिकार क्षेत्र में आती है तो क्या ईश्वरीय मिलन भी उसको शांत नहीं करता । उसके लिए पृथ्वी पर या मृत्युलोक पर छुट गए लोगों का बिलखना , ब्राह्मण के माया जाल में लूटना जरुरी है । कोई तर्क नहीं क्योंकि सत्य तो यही है । जहाँ तर्क नहीं होता वहीँ से भगवान जन्मता है  और तर्क आस्था में और  आस्था अन्धविश्वास , अंधविश्वास कर्मकाण्ड में बदल जाता है और चिता पर रोटियां सेकने वाला ब्राह्मण फलता फूलता है ।
और श्रद्धा  के मायाजाल में फंसे रिश्तेदार , आंसू बहा बहा कर झूठ के फरेब में पिसते हैं  । ब्राह्मण उसको नए ढकोसलों की व्याख्या से उलझाता रहता है। शरीर और आत्मा का घालमेल कर मनुष्यों को ऐसा जमाल गोटा पिलाता है - एक वीभत्स रचना करता है जिसमें आत्मा भी शरीर के रूप में रिश्ते नाते धारण कर लेती है । इसका ही खेल है पितर !
ये पितर का खेल ब्राह्मण का जन्मों जन्मों का इन्शुरन्स है - कर्मकाण्ड जो देश , उसकी संस्कृति , मानवीय मूल्यों और स्वयं ईश्वर को ठगता है । बस एक प्राणी जिन्दा है और चिता पर अपनी रोटी पका कर खाता है - वो है कर्मकांडी ब्राह्मण ।


        




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संक्षिप्त परिचय -

“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज वह थिएटर शख्सियत हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने रंग विचार "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।



एक अभिनेता के रूप में उन्होंने 16000 से ज्यादा बार मंच से पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।लेखक-निर्देशक के तौर पर 28 से अधिक नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। फेसिलिटेटर के तौर पर इन्होंने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर थियेटर ऑफ रेलेवेंस सिद्धांत के तहत 1000 से अधिक नाट्य कार्यशालाओं का संचालन किया है। वे रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने वाला हथियार मानते हैं। मंजुल मुंबई में रहते हैं। उन्हें 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है।


संपर्क - मंजुल भारद्वाज .

373/ 18 , जलतरंग ,सेक्टर 3 , चारकोप ,कांदिवली (पश्चिम)  मुंबई -400067.

फोन : 9820391859
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फेसबुक कमेंट्स :
09-092016 



Saturday, 3 September 2016

उत्तर प्रदेश में तबादला उद्योग फल फूल रहा है ------ एस आर दारापुरी

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http://indiavoice.tv/m/detail.php?url=hindi-news-IAS-says-70-lacs-is-rate-for-dm-in-up

S.r. Darapuri
सपा/बसपा दोनों सरकारों में ट्रांसफर /पोस्टिंग में पैसा लिया जाता रहा है। मायावती के पिछले शासन काल में तो राज्यपाल महोदय ने खुले आम कहा था कि उत्तर प्रदेश में तबादला उद्योग फल फूल रहा है।
जब अधिकारी पैसा देकर पोस्टिंग लेगा तो फिर वह व्याज समेत पैसा वसूलेगा भी।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था, "और कुछ न सही, जनता को स्वच्छ प्रशासन तो दिया जा सकता है।" परंतु इसमें मुलायम और मायावती दोनों नाकाम रहे हैं। उत्तर प्रदेश लंबे समय से चिंताजनक दृष्टि से भ्रष्ट राज्य चला आ रहा है जिसके लिए सपा और बसपा पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=10154541914336554&id=749021553

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 9 August 2016

क्या ऐसा होगा? ------ विजय राजबली माथुर

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 क्या ऐसा होगा?
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अयोध्या के बाबरी प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार का अस्तित्व आया था। काशीराम जी को अपने गृह जनपद इटावा से मुलायम सिंह जी ने सांसद तक बनवाया था। यदि यह गठबंधन कायम रहता तो सदा-सर्वदा के लिए उत्तर प्रदेश से भाजपा का अस्तित्व समाप्त हो जाता। अतः संघप्रिय गौतम के माध्यम से मायावती जी को मुलायम सिंह जी के विरुद्ध करके वह सरकार गिरा दी गई। भाजपा के समर्थन से कई बार मायावती जी मुख्यमंत्री बनीं किन्तु उनकी सरकार भाजपा द्वारा ही हर बार गिरा दी गई। इसके बावजूद गुजरात नर-संहार के बाद 2002 में मायावती जी ने अटल व मोदी के साथ भाजपा का वहाँ प्रचार किया था।


2014 के लोकसभा चुनावों से काफी पहले  व्हाईट हाउस में बराक हुसैन ओबामा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय गोपनीय बैठक की गई थी जिसमें भारत से भी कई दलित कहे जाने वाले चिंतक शामिल हुये थे जिनमें से एक लखनऊ के विद्वान भी थे। वहीं पर मुस्लिमों के विरुद्ध विश्व व्यापी मुहिम चलाये जाने और उसमें प्रत्येक देश के दलित माने जाने वाले लोगों का सहयोग लेने की रूप रेखा तय की गई थी। उसी अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में समस्त दलित कहे जाने वाले वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को गया था और बसपा का एक भी सांसद न जीत सका था। उसी मुहिम का परिणाम है बसपा से हाल ही में हुई टूटन। मायावती जी को उनके खास लोगों ने उसी अंदाज़ में उनको झटका दिया है जिस अंदाज़ में 1995 में उन्होने खुद मुलायम सिंह जी को झटका दिया था तब उनको भी भाजपा का समर्थन हासिल था जिस प्रकार अब उनको झटका देने वालों को हासिल हुआ है।
2017 के आसन्न चुनावों में यदि बसपा-सपा गठबंधन बना कर चुनाव लड़ा जाये तो अब भी भाजपा के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है वरना अभी तो भाजपा बसपा को ध्वस्त करने के लिए गोपनीय समर्थन देकर सपा सरकार फिर से बनवा देगी लेकिन उसके बाद सपा को उसी प्रकार तोड़ेगी जिस प्रकार अभी बसपा को तोड़ा है। मायावती जी व मुलायम सिंह जी दूरदर्शिता का परिचय दें तो दीर्घकालीन मजबूत गठबंधन बना कर न केवल उत्तर प्रदेश में वरन सम्पूर्ण देश में भाजपा को परास्त कर सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा होगा?
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1137504919644816
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 7 August 2016

हिंदी पत्रकारिता का 'तेज' : राजेंद्र माथुर ------ पंकज श्रीवास्तव


Pankaj Srivastava
आज राजेंद्र माथुर का जन्मदिन है। दिल्ली में नवभारत टाइम्स के संपादक रहे 1982 से 1991 तक। बमुश्किल 56 साल की उम्र पाई लेकिन हिंदी पत्रकारिता को ऐसा 'तेज' दिया कि तमाम नामी अंग्रेज़ी संपादक 'उपग्रह' नज़र आते थे। हाल यह था कि वे रज्जू बाबू के संपादकीय और लेख पढ़कर देश-दुनिया के तमाम विषयों पर अपनी समझ बढ़ाते थे.. राय बनाते थे। हाँ, घर नहीं बना पाए थे और जब उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उनक फ़्लैट पर पहुँचे तो मकान मालिक जान पाया कि किरायेदार क्या हस्ती था !
बहरहाल, अब दिल्ली में तमाम फ़ार्म हाउस वाले संपादक हैं। दो-चाार फ़्लैट के मालिक संपादकों की तो गिनती ही नहीं। संपादक जी की कार की लंबाई उनके वास्तविक कद से मीलों ज़्यादा है, लेकिन वे यह नहीं जानते कि सार्क सम्मेलन में केवल अध्यक्ष के भाषण का प्रसारण होता है। बाक़ी कार्रवाई 'इन कैमरा' होती है। वे शान से राजनाथ सिंह के भाषण को प्रसारित न करने को भारत की बेइज्ज़ती करार देते हुए पाकिस्तान से जंग का आह्वान करते हैं। दूसरे दिन जब विदेश मंत्रालय का कोई बाबू प्रसारण रोकने की ख़बर का खंडन करता है तो कुछ 'सम्मानित' अख़बार दसवें पेज पर छोटी सी ख़बर छाप देते हैं। बाक़ी में इतनी भी शर्म नहीं.! चैनलों से तो उम्मीद करना ही क़ुफ़्र है ! सोचिये, क्या ही अच्छे दिन आये हैं.. संपादकों को सरकारी बाबू 'ज्ञान' पिला रहा है !
कई बार लगता है कि रज्जू बाबू का 1991 में मरना एक रूपक है। उदारीकरण की शुरुआत के साथ तमाम प्रतिभाओं को बौना बनाने का जो क़ामयाब उपक्रम चला, उसमें रज्जू बाबू कहाँ फिट होते। रोज़-रोज़ मरने से तो अच्छा था कि तभी मर गये।
हो सके तो माफ़ कर देना सर, हाँलाकि हम इस लायक़ नहीं हैं । 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1141232722605286&set=a.238145616247339.57071.100001557065849&type=3