Showing posts with label किसान. Show all posts
Showing posts with label किसान. Show all posts

Saturday, 12 December 2020

किसानों का बहिष्कार और जियो फ़ेसबुक

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
















 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 20 December 2018

कष्ट में डेयरी किसान ------ भारत डोगरा

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 






 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 16 November 2017

पर्यावरण और किसान की बरबादी मशीनीकरण के कारण ------ बृजेश शुक्ल

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )  






संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 12 July 2016

अफ्रीकी देशों से भारत की दाल खरीदी देश के किसानों को जड़ से उखाड़ देगी ------ देविन्दर शर्मा/पवन करन

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )  
http://epaper.bhaskar.com/detail/?id=1035292&boxid=7121591125&ch=mpcg&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=07%2F12%2F2016&editioncode=135&pageno=8&view=image
Pawan Karan
यदि भारत नियमित रूप से दालों के उत्पादन के लिये मोजाम्बिक में किसानों का नेटवर्क तैयार कर सकता है तो किसानों का ऐसा नेटवर्क भारत में ही खड़ा क्यों नहीं किया जा सकता। यदि भारत सरकार मोजाम्बिक के किसानों को यह आश्वासन दे सकती है कि वह जो भी उत्पादन करेंंगे वह खरीदेगी तो यह आश्वासन अपने देश के भीतर लगातार आत्महत्याएं कर रहे किसानों को क्यों नहीं दिया जा सकता। अफ्रीकी देशों से भारत की दाल खरीदी देश के किसानों को जड़ से उखाड़ देगी। जब तक सरकार गेहूं—चावल की तर्ज पर दलहन की खरीद नहीं करती तब तक देश के भीतर दलहन का उत्पादन बढ़ने की संभावना नहीं है।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1247460738598672&set=a.196669657011124.50214.100000042739542&type=3




संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 8 May 2016

किसान और देश को बचाने के लिए है किसान जागरण यात्रा ------ इम्तियाज़ बेग / राजेन्द्र यादव

******


भाइयों,बहनों 

आइये इस किसान जागरण यात्रा में आप अपना सक्रिय सहयोग और समर्थन दें। आज़ादी के बाद कुटिल राजनीतिक चालाकियों के कारण हाशिये पर डाल दिये गाँव और किसान को संगठित कर इस देश की मुख्य राजीनीतिक और आर्थिक धारा में शामिल करने के इस महाभियान में आप सक्रिय हिस्सेदारी निभाएँ जो आज़ादी के सिपाहियों और शहीदों का एक मात्र सपना रहा है। 
भारतीय किसान एक निर्मम षणयंत्र के तहत लूटे जा रहे हैं। किसान विरोधी देशी-परदेसी सरकारी नीतियाँ तो उसे लूट ही रही हैं,साथ में असमय वर्षा,बाढ़,सूखा,ओलावृष्टि और कीट हमले से प्रकृति भी लूट रही है। मौसम विज्ञान इसे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बता रहे हैं, किन्तु सबसे बड़ा सवाल है कि किसान कहाँ जाये?आज इस देश में सबकी आवाज़ सुनी जाती है,किसान संगठित नहीं है,इसलिए सरकारी नीतियाँ उसे पीट-पीट कर अधमरा करती जा रही हैं। अधमरे लोगों में कमजोर दिल वाले आत्महत्या कर रहे हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों (क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) के अनुसार पिछले 15 वर्षों से आठ लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा मं  दसों किसान बेचारगी में आत्महत्या कर रहे हैं,और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी रोजाना चार-पाँच किसान आत्महत्या कर रहे हैं। शराब कारोबारी विजय माल्या जहाँ एक ओर सरकारी बैंकों का हजारों-हजार करोड़ रूपये दिनदहाड़े लूट कर चला गया,वहीं कृषि आय के बहाने बेईमान पूंजीपति और कारोबारी बीस हजार लाख करोड़ रूपये का कालाधन इसी देश में दबा कर रखे हुए हैं और किसान नकली बीज-खाद और कीटनाशक ऊंचे दामों पर इस बेईमान सरकारी तंत्र के चलते खरीदने के लिए विवश है। सरकारी तंत्र (जिलाधिकारी,एस.पी.) न तो टैक्स चोरों-मिलावटखोरों को पकड़ पा रहा है और न तो डकैती और सांप्रदायिकता भड़काने वाले राजनीतिक गुंडों पर कोई लगाम लगा पा रहा है। विजया माल्या जैसे टैक्स चोर,काले कारोबारी जेल के बजाय राज्य सभा में सांसद चुन कर भेजे जा रहे हैं, वहीं प्राकृतिक  आपदा और बढ़ते खेती की लागत के कारण समय पर मामूली ऋण जमा न कर पाने वाले किसान को बेरहमी से उसके खेत और घर से घसीट कर हवालात में बंद कर दिया जाता है तथा हवालात का भी खर्च उसी से जबरदस्ती वसूला जा रहा है। 
स्थिति खतरनाक मोड़ ले चुकी है। किसान अपने दलहन-तिलहन,गेहूं-धान गन्ना का दाम नहीं तय कर सकता है। अब स्टाक मार्केट के अरबपति-खरबपति दलाल और बाजार के मुनाफाखोर खिलाड़ी इसका दाम तय कर रहे हैं। यही पूंजी का कमाल खेती-किसानी का दुर्दिन है। कारण साफ है किसान संगठित नहीं है। वेतन आयोग ने हाल ही में सरकारी कर्मचारी का न्यूनतम मासिक वेतन रु. 18,0000.00 मासिक तथा अधिकतम रु.2.50 लाख मासिक तय कर दिया है किन्तु साथ सत्तर सालों तक खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों,खेत मजदूरों का कोई पुरसा हाल नहीं है न तो उनके न्यूनतम आय की कोई गारंटी है। इसीलिए गांवों से प्रतिवर्ष 9% की दर से सालान पलायन हो रहा है और खेती का रकबा भूमि अधिग्रहण कानून और अंधे विकासवाद की नीतियों के चलते लगातार घटता जा रहा है। 
कृषि लागत दर और महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है,इसे हर हाल में रोकना होगा और इसे रोकने के लिए संगठित और धारदार किसान आंदोलन की जरूरत आज सबसे ज्यादा है। खेती को बचना है तो गाँव को भी बचना होगा,गाँव बचेगा तभी खेती और किसानी बचेगी। खेती और गाँव बचाकर ही हम किसान और देश को बचा सकते हैं यही सच्ची देश भक्ति और राष्ट्रवाद है। 
इन्हीं सच्चाइयों को ध्यान में रख कर उत्तर-प्रदेश किसान सभा ने पूरे प्रदेश में 11 अप्रैल 2016 से किसान जागरण यात्रा प्रारम्भ की है। देश के किसानों के सर्वमान्य नेता,स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी स्वामी सहजानन्द के जन्म स्थल गाजीपुर से यह अभियान शुरू किया गया है जो 20 मई को लखनऊ में विशाल किसान महापंचायत में तब्दील हो जायेगा और इस महापंचायत में उत्तर प्रदेश के सभी प्रभावी किसान संगठनों के नेतृत्व के अतिरिक्त अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और साथी अतुल कुमार अनजान की उल्लेखनीय उपस्थिति रहेगी।

 यह अभियान नई सोच और किसानोन्मुखी राजनीति पैदा करने का है। किसानों,मजदूरों,दस्तकारों को संगठित कर देश एवं प्रदेश की राजनीति को किसानोन्मुखी बनाने की दिशा में यह सशक्त हस्तक्षेप है ताकि देश की दौलत का मुंसिफ़ाना तस्कीम हो सके और देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों,शेयर बाजार के सट्टेबाज खिलाड़ियों,भ्रष्ट राजनेताओं,कुटिल अफसरशाहों-ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त हो सके। 



प्रमुख मांगें

1. राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) की संस्तुतियों को केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल लागू करें। 
2. 60 वर्ष के सभी स्त्री-पुरुष किसानों,खेत मजदूरों,ग्रामीण दस्तकारों को 10,000 रु. ( दस हजार रुपया) मासिक पेंशन केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर देना सुनिश्चित करें। 
3. किसानों के सहकारी-सरकारी कर्ज़ माफ किये जायें एवं उन्हें रबी-खरीफ पर ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाये। 
4. कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य (लागत पर पचास फीसदी जोड़ कर) दिया जाय। 
5. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तत्काल वापस लिया जाय। 
6. केरल राजयकी भांति किसान कर्ज़ एवं आपदा राहत ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाय। 
7. खेती किसानी के लिए बिजली की बढ़ी दरों को वापस लिया जाय, साथ ही सस्ती एवं अबाध बिजली 18 घंटे उपलब्ध कराई जाय। 
8. नहरों की टेल तक वास्तविक सफाई कराकर पानी खेतों में पहुँचने का पुख्ता प्रबंध किया जाय। 
9. प्रदेश के किसानो के निजी नलकूपों को अन्य राज्यों की तरह मुफ्त बिजली की व्यवस्था की जाय। 
10. नंदगंज,रसड़ा,छाता,देवरिया,औरैया,शाहगंज चीनी मिलों को चालू किया जाय। 
11. शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था को सरकार अपने हाथ में ले। 
12. गन्ने का सामान्य मूल्य 450 रु. किया जाय एवं गन्ने का बकाया भुगतान किया जाय। 
13. प्रदेश में रबी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद केंद्र व प्रदेश की सरकारें क्षतिपूर्ति देने का वादा करें या अब तक लगभग 33%किसान लाभान्वित हुए हैं शेष किसानों को तत्काल क्षतिपूर्ति दी जाय। 

Friday, 12 April 2013

पास्को विरोधी संघर्ष के साथ एकजुटता

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )


 




लखनऊ 12 अप्रैल। पास्को विरोधी संघर्ष के साथ एकजुटता दिवस पर प्रदर्शन करते हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा के सामने जिला मंत्री मो ख़ालिक़ के नेतृत्व मे लखनऊ के कोने -कोने से आए मजदूर,किसान,महिलाओं ने गगनभेदी नारे लगाते हुए का. आशा मिश्रा की अध्यक्षता मे धरना दिया। धरने को संबोधित करते हुए का. परमानंद द्विवेदी ने कहा कि उड़ीसा की सरकार ने किसानों की बेशकीमती उपजाऊ भूमि व पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने वाले जंगलों को कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने हेतु कोरिया की स्टील कंपनी को कौड़ियों के भाव भूमि अधिग्रहण कर किसानों को बेरोजगार कर व पीढ़ी दर पीढ़ी बर्बाद करने के लिए कमर कस लिया है। और आंदोलनकारी किसानों के नेताओं पर बेबुनियाद हजारों मुकदमे व तमाम किसानों की हत्याएँ भी की गई हैं। जिसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती और आंदोलन को और तेज किया जाएगा। मधुकर राम ने कहा कि केंद्र सरकार को किसानों को आठ वर्षों से चल रहे आंदोलन की समाप्ति करने हेतु हस्तक्षेप कर पास्को के लिए भूमि अधिग्रहण को तत्काल रोकना चाहिए। का. मो.अकरम ने कहा कि भारत की नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने देश में भ्रष्टाचार को जन्म दिया है। जिसके खिलाफ जनता को लामबंद हो कर मूल रूप से व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होने कहा कि जिससे लोकतन्त्र के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी आजादी का लाभ मिल सके। का.विजय माथुर ने धरने को संबोधित करते हुए कहा कि आज की सरकारें धर्म के आडंबर का सहारा ले कर विकृत राजनीति कर सत्ता हथिया लेती हैं और बड़े भू-माफियाओं व धनवानो को पैदा करने मे मदद करती हैं।उन्होने कहा कि,50 वर्षों के लिए कोरिया की कंपनी को उड़ीसा की कृषी उपयोगी उपजाऊ भूमि को लीज़ पर तो दे दिया गया है परंतु किसानो और कृषी मजदूरों के पुनर्वास का कोई प्रबंध नहीं किया गया है । वहाँ 8 वर्षों से हमारी पार्टी इकाई संघर्ष कर रही है और आज के दिन सारे भारत मे हमारी पार्टी उनके साथ एकजुट्टता का प्रदर्शन कर रही है तथा हमे उम्मीद है कि हम शीघ्र ही सफल होंगे। अंत में धरने को समाप्त करते हुए का. आशा मिश्रा ने कहा कि आज भारत के तमाम राज्यों की सरकारें गरीब किसानों की भूमि को अधिग्रहण कर बड़ी-बड़ी कंपनियों,बिल्डर्स व कॉर्पोरेट घरानों को दे कर बड़ा मुनाफा कमा रही हैं। वस्तुतः वे सरकार न चलाकर व्यापार कर रही हैं। अंत मे का. मो. ख़ालिक़ ने छः सूत्री निम्नलिखित बिन्दुओं का राष्ट्रपति को संबोधित माँगपत्र श्रीमान जिलाधिकारी महोदय को सौंपा। मांग पत्र में पास्को के विरोध में चल रहे जन आंदोलन में हुई क्षति को क्षति पूर्ति किया जाये। विदेशी स्टील कंपनी पास्को के लिए किसानों की भूमि अधिग्रहण कदापि न किया जाए। पास्को परियोजना रद्द किया जाए। पिछले पास्कों विरोधी आंदोलन कारियों की हत्या की साजिश को बेनकाब कर हत्यारों को गिरफ्तार किया जाए। मृतक किसानों के परिवारों को पर्याप्त मुआवजा दिया जाय। आंदोलन में समर्पित नेताओं पर लगे फर्जी मुकदमों को वापस लिया जाए। सभा को कान्ति मिश्रा,के सचान,अशोक रावत,महेंद्र रावत,बलवन्त लोधी तथा अन्य नेताओं ने भी संबोधित किया।

=====
फेसबुक -स्थिति---

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Wednesday, 20 February 2013

खाड़ी युद्ध के भारत पर घातक परिणाम---विजय राजबली माथुर

20 फरवरी ईराक पर द्वितीय आक्रमण की वर्षगांठ पर विशेष-
दुर्भाग्य से 17 जनवरी 1991 की प्रातः खाड़ी मे अमेरिका नेपहली बार युद्ध छेड़  दिया था । दोषी ईराक था अथवा अमेरिका इस विषय मे मतभेद हो सकते हैं। परन्तु अमेरिकी कारवाई न्यायसंगत न होकर निजी स्वार्थ से प्रेरित थी यह हकीकत है। जार्ज बुश (जो तेल कंपनियों मे नौकरी कर चुके थे ) अनेकों बार ईराकी सेना को नष्ट करने की धम्की दे चुके थे। उनके पूर्ववर्ती रोनाल्ड रीगन लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी को नष्ट करने का असफल प्रयास कर चुके थे और जिसे बाराक ओबामा ने पूरा किया। बुश पनामा के राष्ट्रपति का अपहरण करने मे कामयाब रहे थे। ईराक पर अमेरिकी आक्रमण का उद्देश्य कुवैत को मुक्त  कराना नहीं अमेरिकी साम्राज्यवाद को पुख्ता कराना था।

जब खाड़ी समस्या प्रारम्भ हुई तो वी पी सरकार के कुशल कदम से ईराक और कुवैत मे फंसे भारतीयों को स्वदेश ले आया गया। परन्तु जब युद्ध के बादल मंडराने लगे तो राजीव गांधी-समर्थित चंद्रशेखर सरकार ने खाड़ी क्षेत्र मे फंसे 12-13 लाख भारतीयों को स्वदेश लाने का कोई प्रयत्न नहीं किया। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सफाई देते रहे थे कि वे प्रवासी भारतीय लौटना नहीं चाहते थे और  युद्ध काल मे उन्हें बुलाया नहीं जा सकता था ।

युद्ध का लाभ-

एक ओर जहां लाखों भारतीयों का जीवन दांव पर लगा था । हमारे देश के जमाखोर व्यापारी खाड़ी संकट की आड़ मे खाद्यान ,खाद्य-तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ा कर अपना काला व्यापार बढ़ा कर लाभ उठाने मे लगे हुये थे । प्रधानमंत्री कोरी धमकियाँ दाग कर जनता को दिलासा दे रहे थे । बाज़ार मे कीमतें आसमान छू रही थीं और आज तो और भी भीषण अवस्था हो गई है । राशन की दुकानों मे चीनी और गेंहू चिराग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिल रहा था।

गरीब जनता विशेष कर रोज़ कमाने-खाने वाले भुखमरी के कगार पर पहुँच थे । सरकार एय्याशी मे व्यस्त थी । उप-प्रधानमंत्री और किसानों के तथाकथित ताऊ चौ. देवीलाल कहते थे  मंहगाई बढ़ाना उनकी सरकार का लक्ष्य है जिससे किसानों को लाभ हो। वह सोने के मुकुट और चांदी की छड़ियाँ लेकर अट्हास कर रहे थे और आज उनके बेटा व पोता जेलों मे हैं।

लुटेरा कौन?

लेकिन निश्चित रूप से बढ़ती हुई कीमतों का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा था और न आज ही मिल रहा है। किसान कम दाम पर फसल उगते ही व्यापारियों को बेच देता था/ है। जमाखोर व्यापारी कृत्रिम आभाव पैदा कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे थे/ हैं और उन्हें सरकारी संरक्षण मिला हुआ था/ है।

गाँव के कृषि मजदूर को राशन मे उपलब्ध गेंहू नहीं मिल रहा ,अधिक दाम देकर वह खरीद नहीं सकता। खेतिहर  मजदूर भूखा रह कर मौत के निकट पहुँच रहा था/है। प्रदेश और केंद्र की सरकारें अपना अस्तित्व बचाने के लिए पूँजीपतियों के आगे घुटने टेके हुये तब भी थीं और आज भी हैं। पूंजीपति वर्ग और व्यापारी वर्ग मिल कर जनता का शोषण कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं और गरीब जनता को भूखा मारने की तैयारी कर रहे हैं और वह भी सरकारी संरक्षण मे।

भूखे भजन होही न गोपाला- 

मध्यम वर्गीय जमाखोर व्यापारियों की पार्टी भाजपा हिन्दुत्व की ठेकेदार बन कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के नाम का दुरुपयोग कर जनता को बेवकूफ बनाने मे लगी हुई तब भी थी और आज फिर 2014 के चुनावों मे वही तीर छोड़ रही है उसका उद्देश्य जनता को गुमराह कर व्यापारियों की सत्ता कायम करना है। उधर पूँजीपतियों की पार्टी इंका अवसरवादी सरकारों को टिका कर शोषक वर्ग की सेवा कर रही है। ये दोनों पार्टियां मण्डल आयोग द्वारा घोषित पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की विरोधी हैं इसलिए मंदिर-मस्जिद के थोथे  झगड़े खड़े करके भूखी,त्रस्त जनता को आपस मे लड़ा कर मार देना चाहती हैं।

क्रान्ति होगी-

इन हालात के चलते तो निश्चय ही शोषित ,दमित,पीड़ित और भूखी जनता  को एक न एक दिन (चाहे वह जब भी आए)भारत मे भी वैसी ही 'क्रान्ति'कर देनी होगी  जैसी 1917 मे रूस मे और 1949 मे चीन की भूखी जनता ने की थी उसे तलाश है किसी 'लेनिन' अथवा 'माओ' की जिसे भारत -भू पर अवतरित होना ही होगा।

                                 
परंतु एक तो हमारे देश के शोषक वर्ग ने 'पुरोहितवाद'की आड़ मे 'फूट' फैलाकर जनता के एकीकरण मे बाधा खड़ी कर रखी है दूसरे शासक वर्ग असंतोष की चिंगारी देखते ही अपने लोगों को बीच मे घुसा कर जन-असंतोष को दूसरी ओर कामयाबी से मोड देता है जैसा कि 2011 मे 'अन्ना' के माध्यम से किया गया है। अफसोस यह कि साम्यवादी और प्रगतिशील लोग शोषकों द्वारा परिभाषित 'पुरोहितवाद' को ही 'धर्म' मान कर "धर्म" का विरोध कर डालते हैं। "धर्म" का अर्थ है -'धारण'करना जो वह नहीं है जैसा पोंगा-पंथी बताते हैं। भारत के लेनिन और माओ को 'धर्म'(वास्तविक =वेदिक/वैज्ञानिक)का सहारा लेकर पोंगा-पंथी 'पुरोहितवाद पर प्रहार करना होगा तभी भारत मे 'क्रान्ति'सफल हो सकेगी अन्यथा 1857 की भांति ही कुचल दी जाएगी।


भारत के राष्ट्रीय हित और खाड़ी युद्ध-1991

 खाड़ी युद्ध दिनों दिन गहराने के साथ   इसके दुष्परिणाम तभी से हमारे देश पर पड़ने लगे थे जो अब विकराल रूप मे सामने हैं। इस युद्ध की आड़ मे खाद्यानों की भी काला बाजारी हो रही थी  और डीजल की सप्लाई का तो बुरा हाल था।तत्कालीन  पेट्रोलियम मंत्री द्वारा दिल्ली-भ्रमण की दूरदर्शन रिपोर्ट मे भले ही पेट्रोलियम सप्लाई सही दर्शा दी गई हो किन्तु  आगरा  आदि अन्य स्थानों के ग्रामीण क्षेत्रों मे किसान सिंचाई के लिए डीजल न मिलने से बुरी तरह से कराह उठे थे अब फिर वही स्थिति बनने जा रही है। इसी संबंध मे आगरा के तत्कालीन  पुलिस उपाधीक्षक का सिर भी फट चुका है।

विदेश नीति की  विफलता- 

पूर्व विदेश सचिव वेंकटेश्वरन ने तो भारत द्वारा ईराक का समर्थन करने का केवल  एहसास दिलाने की बात कही थी और उन्होने अमेरिका का पक्ष लेने की  ही  हिमायत की थी। परन्तु वास्तविकता यह है कि,भारत अपनी विदेश नीति मे पूरी तरह कूटनीतिक तौर पर  इसलिए विफल हुआ है कि,युद्ध शुरू होने से रोकने के लिए राष्ट्रसंघ अथवा निर्गुट आंदोलन मे भारत ने कोई पहल ही नहीं की थी।

 पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की जार्डन के शाह हुसैन और ईराकी राष्ट्रपति श्री सद्दाम हुसैन से फोन वार्ता के बाद उनके निवास पर विपक्षी बाम-मोर्चा आदि के दलों और विदेशमंत्री श्री विद्या चरण शुक्ल की उपस्थिती मे हुई बैठक मे भारत की विदेश नीति की समीक्षा की गई थी । बैठक के बाद इंका महासचिव श्री भगत ने सरकार की विदेश नीति की भर्तस्ना खुल कर की थी । इसी के बाद विदेश मंत्रियों के दौरे शुरू हुये थे । अमेरिका ने भारत के शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया था  और सुरक्षा परिषद ने युद्ध विराम की अपील रद्द कर दी थी जो भारतीय विदेश नीति की विफलता के अकाट्य प्रमाण हैं।

अमेरिका की जीत से  भारत का अहित हुआ  है-

खाड़ी युद्ध से पर्यावरण प्रदूषण और औद्योगिक संकट के साथ बेरोजगारी और बढ्ने तथा भुखमरी और बीमारियों के फैलने का  ही खतरा नहीं था बल्कि  सबसे बड़ा खतरा अमेरिका की जीत और ईराक की पराजय के बाद आया है। इस  स्थिति मे पश्चिम एशिया के तेल पर अमेरिकी साम्राज्यवाद का शिकंजा कस गया है  वहाँ साम्राज्यवादी सेनाएँ मजबूत किलेबंदी करके जम गई हैं। भारत आदि निर्गुट देशों को तेल प्राप्त करने के लिए साम्राज्यवादियों की शर्तों के आगे झुकना पड़ रहा है हम ईरान से सस्ता तेल नहीं आयात कर पा रहे हैं। हमारी अर्थनीति और उद्योग नीति पश्चिम के हितों के अनुरूप ढालने के बाद ही  हमे तेल प्राप्त हो पा रहा है। अब  भारत का 'स्वाभिमान' दांव पर लगा हुआ है हमारी केंद्र सरकार अमेरिका की जी-हुज़ूरी मे लगी हुई है।

एशिया का गौरव सद्दाम -

यह विडम्बना ही रही कि न तो भारत और न ही सोवियत रूस ने  ईराक का साथ दिया  जबकि दोनों देशों की आर्थिक और राजनीतिक ज़रूरत ईराक और सद्दाम को बचाने से ही पूरी हो सकती थी। पश्चिम के साम्राज्यवादी -शोषणवादी हमले को ईराक अकेला ही झेलता  रहा।  ईराक के  पराजित होने से   न केवल पश्चिम एशिया औपनिवेशिक जाल मे फंस गया वरन एशिया और अफ्रीका के देशों को पश्चिम का प्रभुत्व स्वीकार करना ही पड़ रहा है।

अतः आज ज़रूरत नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा प्रस्तुत नारे-"एशिया एशियाईओ के लिए" पर अमल करने की है । भारत को एशिया के अन्य महान देशों -चीन और रूस को एकताबद्ध करके अमेरिकी साम्राज्यवादियों के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए और अब ईरान को बचाने के लिए उसको नैतिक समर्थन प्रदान करना चाहिए। भारत के स्वाभिमान ,आर्थिक और राजनीतिक हितों का तक़ाज़ा है कि,अब ईरान का भी पतन न हो जाये ऐसी व्यवस्था करने वाली सरकार  केंद्र मे आ सके।

आज तो भारत के भावी प्रधानमंत्री हेतु भी अमेरिका नाम का  सुझाव देने लगा है-कौन सा दल किसे अपना नेता चुने यह भी अमेरिका मे तय हो रहा है। भारत मे किस विषय पर आंदोलन चले यह भी अमेरिका तय कर रहा है-अन्ना आंदोलन इसका ताजा तरीन उदाहरण है। अतीत की गलतियों का खामियाजा आज मिल रहा है और आज जो गलतियाँ की जा रही हैं-अन्ना जैसों का समर्थन उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को निश्चित रूप से भुगतना ही होगा।

Tuesday, 7 February 2012

कम्युनिस्टों ने नही भुलाया गांवों को

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )


HINDUSTAN--07/02/2012
पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी साहब ने गवों की उपेक्षा की बात उठाई है। सी पी आई ने अपने घोषणा पत्र मे स्पष्ट रूप से 15 मुद्दों को केवल 'खेती और किसानों के लिए' ही रखा है। यदि बुद्धिजीवी गाँव वालों को समझा कर जाति- वाद से परे हट कर कम्युनिस्ट प्रत्याशियों को जितवाने मे मदद करें तो गाँव वालों को भी खुशी नसीब हो सकती है।





 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर