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Wednesday, 9 September 2020

रिया-सुशांत की कहानी इस शोषणकारी डूबती अर्थव्यवस्था की कहानी है ------ सीमा आजाद


अर्थव्यवस्था और रिया-सुशांत फिल्म का काला जादू
कुछ ही सप्ताह पहले तक देश भर में लगे लॉकडाउन की भयावहता के दृश्य छाये हुए थे। शहरों में काम करने वाले गांवों के मजदूर इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आये थे, कि मीडिया को अपना कैमरा उधर घुमाना ही पड़ गया। हर जगह यही चर्चा थी कि खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को लॉकडाउन ने और खस्ताहाल बनाया है या यह खस्ताहाल स्थिति लॉकडाउन की वजह से आयी है। दोनों की स्थितियों के लिए सरकार पर सवाल उठ रहे थे। नौजवानों के अन्दर कितना गुस्सा भर चुका है यह 5 सितम्बर की थाली-ताली से समझा जा सकता है। हर जगह यह चिन्ता थी कि अब आगे क्या होगा, भविष्य की भयावहता डरा रही थी।
मार्च 2020 के पहले वाले जीवन में लोग जब अपने रूटीन काम से ऊब जाते थे, तो सब कुछ भुलाने के लिए सीरियल या फिल्म देख लिया करते थे। फिल्म देखने के दौरान और उसके आगे-पीछे के समय में भी काफी देर तक इंसान अपनी परेशानियों से बाहर निकलकर फिल्म की चमकीली दुनिया में, पोशाक और मेकअप में खोया रहता है। लेकिन अभी फिल्मे बंद हैं और टीवी पर कितना भी चीन पाकिस्तान चिल्लाया जाय, अर्थव्यवस्था के रसातल में जाने का असर दिख ही जाता है। ऐसी स्थिति में सुशांत-रिया मामला एक ऐसी फिल्म के रूप में लोगों के सामने पेश कर दिया गया है, जिसमें हीरो-हिरोइन, खलनायक-खलनायिका, प्यार-धोखा, सेक्स और सस्पेंस सब कुछ है। बताने की जरूरत नहीं कि इस फिल्म का प्रोड्यूसर सरकार और वितरक मीडिया है। इन मीडिया वितरकों के माध्यम से यह फिल्म/सीरियल घर-घर में देखा जा रहा है। लोगों ने अपनी-अपनी समझ के हिसाब से नायक/नायिका और खलनायक/खलनायिका चुन लिया है। देश की अर्थव्यवस्था के गर्त में जाने की चर्चा इसके बहुत पीछे छूट गयी है। इसका असर इतना व्यापक है कि काफी समय तक जो लोग इस फिल्म के प्रकोप से बच रहे थे या भाग रहे थे, वे भी इसे देखने के लिए और अपने नायक/नायिका, खलनायक/खलनायिका चुनने के लिए मजबूर हो गये हैं। फिल्म की महिला पात्र के साथ जिस तरीके का ट्रीटमेंट किया जा रहा है, प्रगतिशील लोगों का उसके पक्ष में आवाज उठना स्वाभाविक है, आवाज उठी भी। इसके पहले भी मीडिया कईयों के साथ यूं ही गिद्ध चाल दिखा चुका है। रिया पर इस तरीके से टूट पड़ने का दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद एक पुराना दृश्य फिर से घूम रहा है, जब 2007 में बच्चों से यौनकर्म कराने के आरोप में एक शिक्षिका को भीड़ और मीडिया ने न सिर्फ घसीटा, बल्कि उसके कपड़े भी फाड़ दिये थे। याद करेंगे तो और कई ऐसे दृश्य और घटनायें याद आयेंगे। मीडिया के इस गिद्ध चरित्र को भी नायक पक्ष के लोगों ने सही माना, दूसरी ओर इसके बाद ही रिया के पक्ष में लिखने बोलने वालों की संख्या बढ़ गयी। मीडिया द्वारा वितरित इस फिल्म को फॉलो करने वालों और इस पर बोलने वालों की संख्या बढ़ गयी। (यह लिखकर मैं भी इसमें शामिल हो गयी) इसी बीच भीमा कोरेगांव साजिश केस में कबीर कलामंच के तीन कलाकारों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें एक ज्योति जगताप को पुलिस ने पीछा करते हुए पकड़ा है, लेकिन यह सुशांत-रिया की फिल्म में कहीं दब गया। हवाई अड्डे बिक गये, शिक्षा को बरबाद और लोगों को अशिक्षित करने वाली शिक्षा नीति आ गयी, रेलवे बेंच दिया गया, एलआईसी बेंचने की तैयारी है, श्रम कानून खतम हो गये। लाखों लोग एक झटके में सड़क पर आ गये, अर्थव्यवस्था डूब चुकी है, लेकिन इन सब पर बातों और चर्चा की जगह सुशांत-रिया की इस सरकारी फिल्म ने ले लिया है।
सुशांत-रिया इस समाज का हिस्सा हैं, इसलिए उन पर बात होनी चाहिए। लेकिन ऐसे समय में ये चुनाव का मुद्दा बन जाय, तो इसे कोई बड़ी साजिश ही कही जा सकती है। काला जादू रिया ने सुशांत पर नहीं सरकार ने मीडिया के माध्यम से हम पर किया है, जिसके कारण हम सच्चाई देखना भूल गये हैं। रिया-सुशांत की कहानी इस शोषणकारी डूबती अर्थव्यवस्था की कहानी है। यह बॉलीबुड के चमक-धमक के पीछे बहते गन्दे गटर की कहानी है। राजदीप सरदेसाई को दिये गये रिया के इण्टरव्यू में दरअसल उसके सही होने की बात से ज्यादा इसी गटर की कहानी है। जहां इफरात पैसा है, और यह पैसा सिर्फ फिल्म की कमाई का पैसा नहीं है। जहां नशे का बड़ा व्यापार है, जिसमें इण्डस्ट्री के ज्यादातर लोग किसी न किसी रूप में शामिल हैं। जहां पैसे से पैसे को खींचने के लिए कम्पनियां (सुशांत रिया और शौविक ने आर्टिफीशिएल इंटेलिजेंस कम्पनी का रजिस्ट्रेशन कराया) और एनजीओ खोलते जाने का धन्धा है। जहां सफल लोगों के कदमों में हर सुख-सुविधा है, लेकिन उनका जीवन कई मनोचिकित्सकों के भरोसे और नींद किसी नशे के भरोसे है। जहां बेइन्तहां पैसा खर्चकर लोग विदेश जाते हैं कि वहां वे सड़क पर घूमेंगे, लेकिन किसी अनजाने डर से खुद को कमरे में बन्द कर लेते हैं। ये किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, इस ग्लैमर की दुनिया के पीछे का सच है, जो समय-समय पर किसी न किसी के माध्यम से बाहर आता रहता है। कभी परवीन बॉबी, कभी संजय दत्त तो कभी सुशांत या रिया। जहां महिलाओं के शारीरिक शोषण की खबरें भी आती रहती हैं और ये यहां के लिए आम बात मानी जाती है। रिया भले ही अपनी लड़ाई को पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई कह रही हैं, लेकिन अपने इण्टरव्यू में पितृसत्तात्मक लम्पटई के खिलाफ खड़े हुए ‘मी टू’ आन्दोलन के प्रति उनका नजरिया सकारात्मक नहीं लगता। ‘मी टू’ आन्दोलन के समय भी फिल्म इण्डस्ट्री के इस गटर की बदबू सामने आई थी, जिसे खुशबू छिड़ककर दूर करने की कोशिश की गयी। रिया सुशान्त की कहानी को इस समाज की इस ‘एलीट’ संस्था के एक नमूने के तौर पर ही देखना चाहिए। यह ऐसी संस्था है, जो हो सकता है अपने अन्दर की इस कहानी पर ही जल्द ही फिल्म बनाकर कमाई कर डाले।
पूरे देश की अर्थव्यवस्था डूबने का असर फिल्म इण्डस्ट्री पर भी हुआ है, लॉकडाउन ने इस कहर को और बढ़ाया है, बहुत सारे कलाकारों के अवसाद में जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। हो सकता है सुशांत की मौत भी उसका हिस्सा हो।
जो भी हो, मीडिया में धारावाहिक के रूप में प्रसारित हो रही इस फिल्म ने क्योंकि सरकार की नाकामी की बहस को पीछे छोड़ने का काम किया है, क्योंकि यह इस समय में बिहार चुनाव और महाराष्ट्र की राजनीति का केन्द्रीय मुद्दा बन गया है, जब रोजगार का सवाल एक बड़ा सवाल है। क्योंकि यह दो-तीन हिन्दुत्ववादी राजनीति पार्टियों का फुटबाल मैच हो गयी है, क्योंकि हम इसके कारण अपने हालात भूल बैठे हैं इसलिए इसपर सवाल तो उठता ही है कि यह मुद्दा था या सरकार हम पर काला जादू करने के लिए इस धारावाहिक फिल्म का प्रसारण कर रही है।
इस काला जादू से जितनी जल्दी निकल जायं, उतना अच्छा है। 
सीमा आज़ाद
https://www.facebook.com/seema.azad.33/posts/3311991402359720?__cft__[0]=AZVoALPdggpTSjPvAEOidGGTZ1XnnuAHwtfrUYCdUobep-6eoTi7ybOptV1S2L9hsj-RpLHBLRfslTW1wT-WfG1OaDx_SJgeMHTPrFNzCXo1bo9JLLo_1FGiZdxtlJjHpctOXzpWhglJRYRCclA6QXRt&__tn__=%2CO%2CP-R

Saturday, 25 May 2019

मोदी के जीत में EVM का खेल !

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 












The Live Tv
Published on May 24, 2019




मोदी के जीत में EVM का खेल ! बनारस में लोगों ने MODI के खिलाफ किया बवाल :

 






संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 3 May 2019

तेजबहादुर बिना लड़े ही जीत गया,और कोई लाखों के फूल बरसा कर भी जनता की नजरों में गिर गया ------ सुनीता वर्मा


Sunita Verma
मेरे प्यारे भटके हुए सम्मानित भाइयों ! अंधभक्ति में इतना भी न गिरो की इंसानियत भी शर्मसार हो जाये
आप कितना जानते हो इस तेजबहादुर यादव के बारे में ???
मैं बताती हूँ आपको, वो मेरे गांव एवं वार्ड (जिला महेन्द्रगढ़, हरियाणा) से ही है तेजबहादुर, पहले वो भी आपकी तरहं मोदी की अंधभक्ति में आकंठ डूबा हुआ था, इसने पूर्व चुनावों में अपने परिवार के वोट तो मोदी को दिलाये ही और लोगों को भी मोदी को जिताने के लिए प्रेरित किया, इसे सनक थी कि मोदी ईमानदार है, वह आ गया तो भ्र्ष्टाचार खत्म कर देगा,
और जब मोदी जीता तो इस ने सोचा कि अब मैं सेना में जो भी गलत हो रहा है उससे मोदी को अवगत कराऊंगा ताकि सैनिकों की सुध ली जा सके, सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोका जा सके।
बस ! इसकी यही मूर्खता इसे ले डूबी, इसने सेना में खराब खाने की वीडियो जारी करने से पहले कई पत्र भी पीएमओ को लिखे लेकिन जब कोई उनका सकारात्मक जवाब नही आया तब उसने ये वीडियो बनाया ताकि ईमानदारी का ढोल पीटने वाला मोदी इस पर संज्ञान ले सके,...उसके बाद क्या हुआ पूरा देश जानता है, इसे बर्खास्त कर दिया गया,,,अब इसके सिर से मोदी भक्ति का भी भूत उतर चुका था,,,एक सैनिक होने के नाते इसने अन्याय के खिलाफ लड़ने की सोची,,इसी दौरान इसका इकलौता पुत्र भी हादसे का शिकार हो गया,,,इस दुख की घड़ी का भी बीजेपी आईटी सैल वालो ने नफरत के रूप में भुनाना शुरू कर दिया, एक साजिश के तहत बीजेपी ने अपनी पारम्परिक गन्दी राजनीति का धर्म निभाते हुए इस बारे झूठ प्रचारित करना शुरू कर दिया कि बेटे ने अपने बाप से दुखी होकर आत्महत्या कर ली, और सुसाइड नोट में ये बात लिख कर मरा...जबकि ये दोनों ही बातें झूठ के रूप में साजिशन फैलाई जा रही थी, इसे मानसिक रूप से परेशान करने के लिए इसे ट्रोल करने के लिए इसे जनता में पागल साबित करने के लिए। सच ही कहा है मूर्ख और असामाजिक तत्वों के सिर पर सिंग नही होते वो अपनी संकीर्ण व औछी बातों से ही अपने नकली मिलावटी खून की पहचान करा देते है...और ऐसा ही तेजबहादुर को ट्रोल करने वालो ने भी किया...
बीजेपी आईटी सैल ने तेजबहादुर यादव के नाम से एक फेसबुक आईडी बनाई जिसमे ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तानी फॉलोवर्स जोड़े गए, वजह आप समझ सकते हैं ???
इस फेसबुक से तेजबहादुर को बदनाम करने के लिए मुस्लिम भाइयों को गालियां दी गई ताकि मुस्लिमों की नजर में इसे खराब किया जा सके।।।।।
वो मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने और जितने के लिए नही गया था बल्कि अपना विरोध दर्ज कराने और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ने के एक सैनिक का धर्म निभाने गया था।
मगर देश के तथाकथित फर्जी राष्ट्रभक्तों ने उस पर सुनियोजित तरीके से तरह - तरह के आरोप लगाने शुरू कर दिए, ये सब बीजेपी, संघ और उसकी आईटी सैल का पूर्व प्रायोजित काम था,...
उसे कहा जाने लगा कि सेना में और भी तो सैनिक हैं सिर्फ उसे ही खाने की क्यो दिक्कत हुई, तो उन मंधबुद्धि लोगों से मैं बताना चाहूंगी कि और सैनिकों ने भी इस बारे आवाज उठाई थी और इस बारे कुल 16 सैनिक बर्खास्त किये गए थे, वैसे भी इस बात को यों भी समझा जा सकता है कि गुलाम देश भारत मे सिर्फ भगत सिंह को ही क्या जरूरत थी आजादी का बिगुल बजाने की गुलाम तो और भी लोग थे? भगत सिंह ने भी जेल में खराब खाने को लेकर भूख हड़ताल की थी क्या वो भी 'पेटू और गद्दार' था..???
तेजबहादुर का परिवार ही सैनिक परिवार है इसके दादा भी आजाद हिंद फौज का सिपाही रहा है, तेजबहादुर ने भी अपने परिवार के देशभक्ति संस्कारों का लोहा सेना में मनवाया थे इन्हें कुल 16 अवार्ड सेना की तरफ से मिले थे।
और इसमे कोई दो राय नही की इसका नामांकन साजिशन रद्द कराया गया, क्योंकि मोदी डर गया था अप्रत्याशित चुनावी परिणाम से..
अन्यथा NOC लाने के लिए इतना थोड़ा समय नही दिया जाता, और इसके अलावा भी जानबूझ कर NOC देने वाले अधिकारी को उसकी कुर्सी से गायब रखा गया,,,।
बैगर किसी की पूरी प्रोफाइल जाने नकारात्मक टिप्पणी देना ना सिर्फ अपनी मूर्खता और नासमझी का परिचय देता है अपितु ऐसा करके हम अपने अधकचरे ज्ञान को ही प्रदर्शित करते हैं।
*"तेजबहादुर बिना लड़े ही जीत गया,*
*और कोई लाखों के फूल बरसा कर भी जनता की नजरों में गिर गया*
और हां ! इस घटनाक्रम से चौकीदार ने साबित कर दिया कि वो डरपोक भी है और 'चौकीदार ही ..... है।'
वैसे डरना भी सच्चा था, एक तो 'तेज' ऊपर से 'बहादुर'
धन्यवाद
शुभेच्छुक :
आलेख : सुनीता वर्मा जिला पार्षद महेन्द्रगढ़ (हरियाणा)
एवं
पूर्व उपजिला प्रमुख व पूर्व बसपा जिला अध्यक्षा महेन्द्रगढ़
एवं
बसपा पूर्व प्रत्याशी अटेली विधानसभा
ट्विटर अकाउंट




https://www.facebook.com/sunita1verma/?__tn__=%2Cd%3C*F-R&eid=ARCui_6q0nYW2Rg3ORMlOr6T9h2MGXozIjE8oT7VvKYoaJ9KuImzjuQxssTRzl5wPhbf14BCtpnsWVul&hc_ref=ARRJiLi0ONGoB4UsAsp757oj4i7jmXsujTwC9d0njFw9phKJm0I6ZeHuAaonhn0dzdw







 

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06-05-2019 

Sunday, 16 September 2012

ग्रहों की चाल मध्यावधि चुनावों की ओर


तीसरा मोर्चा का शिगूफ़ा,ग्रहों की चाल और समय पूर्व चुनावों की दस्तक



लोकसंघर्ष मे 13-09-2012 को ऐसा कहा गया था---

(मुलायम सिंह के तीसरा मोर्चा कीचुनाव बाद घोषणा पर )

चुनाव लड़ने में समझौता नहीं करेंगे क्यूंकि उसमें अन्य दलों को भी सीटें देनी पड़ेंगी और चुनाव बाद उन्ही दलों की मदद से तीसरा मोर्चा बना कर प्रधानमंत्री बनने  की उनकी ख्वाहिश भी पूरी नहीं होगी।
http://loksangharsha.blogspot.com/2012/09/blog-post_13.html

उस लेख पर मैंने यह टिप्पणी दी थी-

ब्लॉगर विजय राज बली माथुर ने कहा…
मनमोहन सिंह जी नरसिंघा राव जी के परम प्रिय शिष्य हैं। राव साहब ने अपने हटने से पहले कांग्रेस को सत्ताच्युत करने का बंदोबस्त कर दिया था और दो वर्षों के अंतराल मे भाजपा को सत्तासीन होने का अवसर प्रदान कर दिया था। मनमोहन जी उसी नीति का अनुसरण कर रहे हैं। एक के बाद एक ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं जिंनका खामियाजा कांग्रेस चुनावों मे भुगतेगी। गत वर्ष अपनी पार्टी अध्यक्ष की गैर हाजिरी मे उनके द्वारा RSS/देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मदद से अन्ना आंदोलन खड़ा करा कर पार्टी महासचिव राहुल को अन्ना से भिड़ाने का उपक्रम किया था। राहुल ने चुप्पी साध कर उनकी योजना पर पानी फेर दिया था। इस बार जन-विरोधी निर्णयों को लागू करके अपनी पूरी पार्टी की कब्र उन्होने खोद दी है। इतिहास मे वह आत्मभंजक के रूप मे ही जाने जाएँगे।
लेकिन इस बार एल के आडवाणी साहब ने भी ठान लिया है कि वह अपनी पार्टी और उसके नेता को पी एम नहीं बनने देंगे। ऐसी सूरत मे यदि बामपंथ ने साथ न दिया तो मुलायम वाया आडवाणी भाजपा के समर्थन से भी पी एम बन सकते हैं भले ही छह माह के लिए ही सही।

यदि बामपंथ मे कुछ नेता केंद्र सरकार मे मंत्री बनने के इच्छुक होंगे तो निश्चित रूप से बामपंथ भाजपा को रोकने के नाम पर मुलायम के तीसरे मोर्चे को ही समर्थन दे देगा बनिस्बत कांग्रेस
के।
15 सितम्बर 2012 9:07 am

हिंदुस्तान,लखनऊ दिनांक -16 सितंबर,2012 ,पृष्ठ 17 पर '20 सितंबर को भारत बंद का ऐलान' शीर्षक के अंतर्गत एजेंसी के हवाले से खबर छ्पी है कि,"भाकपा के वरिष्ठ नेता ए बी वर्धन ने बताया कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने 20 तारीख को हड़ताल का सुझाव दिया था जिसे स्वीकार कर लिया गया है। "

साम्यवादियों समेत सम्पूर्ण बामपंथ ने जिस प्रकार खुद को 'धर्म विरोधी' छवी प्रदान करके जनता से काट रखा है और जनता को RSSआदि से  गुमराह होने देने की छूट प्रदान कर रखी है क्योंकि वे ढ़ोंगी-ढकोसले बाज़ आडंबर को धर्म बता कर जनता को छलते रहते हैं।  यदि बामपंथी साम्यवादियों ने 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बता कर जनता को समझाया होता तो जनता उनके अलावा किसी फरेबी  पर विश्वास कर उसके चक्कर मे फँसती ही नही।

मैंने इसी ब्लाग मे 14-08-2012 को अपने 04 अगस्त के फेसबुक नोट के हवाले से  यह लिखा था-

·



'बकवास' कहना और लिखना कितना आसान है लेकिन क्या ग्रहों की चाल को रोका या टाला जा सकता है?यदि हाँ तो वित्त मंत्रालय,महाराष्ट्र के सी एम आफिस,नेल्लोर मे तामिल नाडू एक्स्प्रेस मे अग्निकांड क्यों नहीं रोके जा सके। ईरान की भूकंप त्रासदी को क्यों नहीं रोका जा सका। ईरान का घोर शत्रु भी आज ईरान को मानवीय मदद का प्रस्ताव दे रहा है पहले उसके वैज्ञानिकों ने चेतावनी देकर आबादी को क्यों नहीं हटवाया या भूकंप को रोक लिया।लेकिन विरोध के लिए विरोध करना फैशन है तो करते हैं जन-कल्याण बाधित करने के लिए।


राजनेताओं मे कैप्टन डॉ  लक्ष्मी सहगल,के बाद केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख को भी क्यों नहीं बचाया जा सका?
यू पी सरकार के नेताओं मे मतभेदों के बारे मे भी आंकलन पहले ही दिया जा चुका है। 

http://krantiswar.blogspot.in/2012/03/blog-post_16.html?


14 सितंबर को केंद्र सरकार ने गैस के दाम अनाप शनाप बढ़ाते हुये 'खुदरा व्यापार' के लिए वाल मार्ट आदि विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजे खोल दिये और सहयोगी दलों के विरोध पर सदा  चुप रहने वाले पी एम मनमोहन सिंह जी ने कहा कि सरकार जानी है तो दम-खम के साथ जाये। तमाम लोग इस पर भी सरकार की स्थिरता के प्रति आश्वस्त हैं। लेकिन ग्रह क्या कहते हैं जान लीजिये-

 अमा.पूर्णिमा वार रवि,नहीं सुखद परिवेश। निर्धन लेवे आपदा ,पशुजन पीड़ित देश । । 
रोग शोक व्याधि गति,संक्रामक अतिचार। सुख सुविधा मे न्यूनता,पाँच रूप रविवार । । 

गति चाल मार्गी गति ,गणना  शनि प्रधान । मौलिक राशि तुला बने,गोचर पंथ विधान । । 
राज काज व्यापार मे,चिंतन विविध प्रकार । नायक नेता आपदा ,जन विग्रह संचार । । 

कृषि खेत खलिहान मे,चिंतन कृषक निहार। उत्पादन उद्योग मे,सांसारिक अधिभार । । 
वित्त व्यवस्था विश्व की,असंतुलित परिवेश। मुद्राकोश आर्थिक विषय,चिंतन देश विदेश । । 

चलन कलाँ गुरु भौम का,षडाश्टकी शनि पक्ष। राजतंत्र नव चेतना,गठबंधन गति दक्ष । । 
दल विरोध की जगराती,नायक सत्ता मंद। राजकाज विपदा गति,निर्णय कथन दु: द्वंद । । 

युति योग शनि भौम का,राशि तुला निहार। अग्नि -वात से आपदा ,अस्त्र शस्त्र भंडार । । 
विस्फोटक रचना गति,हिंसा द्वंद प्रसार। राहत सेहत पक्ष मे,व्यय विशेष अधिभार । । 

मंगल राहू साथ मे,सम सप्तक गुरु भौम। यान खान घटना विविध,भू क्रंदन गति व्योम ।  । 
व्यय विशेष संसार मे,राज काज पाठ भार । त्रोटक संधि वार्ता,सीमा क्षेत्र विचार । ।
(पृष्ठ-41,निर्णय सागर-'चंड मार्तंड पंचांग ) इसी पृष्ठ पर 02 सितंबर से 05 सितंबर तथा 12 सितंबर से 16 सितंबर एवं 19 सितंबर से 23 तथा 27 सितंबर से 30 सितंबर तक न्यूनाधिक मानसून रचना का अंदेशा व्यक्त किया गया है। )

हिंदुस्तान,लखनऊ,16-09-2012 के पृष्ठ 02 पर मौसम निदेशक जे पी गुप्त की रिपोर्ट मे छ्पा है-"मध्य उत्तर प्रदेश के ऊपर कम हवा का दबाव क्षेत्र बना हुआ है और मानसून की ट्रफ   लाईन फिरोजपुर,करनाल,बरेली,बलिया,धनबाद,कोलकाता से होकर गुजर रही है। "मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार बीते 24 घंटों मे पूर्वी उत्तर प्रदेश मे मानसून सक्रिय रहा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे भी कहीं -कहीं बारिश हुई।

मौसम विभाग तो वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे निकट भविष्य की बात करता है जबकि पंचांग मे गणना ग्रहों की चाल के आधार पर बहुत पहले प्रकाशित हो चुकी है। केवल किसी के न  मानने या बकवास घोषित कर देने से ग्रहों के असर को टाला नहीं जा सकता है और इसी लिए सम्पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि पी एम साहब ने मध्यावधि चुनावों का बिगुल फूँक दिया है अपनी  ही पार्टी को सत्ताच्युत करने हेतु।  राष्ट्रपति महोदय भी तीसरा मोर्चा को ही वरीयता देंगे ,यह बात उनकी शपथ कुंडली वाली पोस्ट मे दी जा चुकी है-

 http://krantiswar.blogspot.in/2012/07/blog-post_28.html

वर्तमान हालात 

इस समय देश मे कन्या के शनि-मंगल विग्रह,अग्निकांड,उपद्रव, हिंसा,तोड़-फोड़,जन-संहार की स्थिति उत्पन्न किए हुये हैं। केंद्र सरकार 'जनाक्रोश' के भी केंद्र मे है।
राष्ट्रपति पद के चुनाव मे अपने-अपने हितों के संरक्षण हेतु यू पी ए के प्रत्याशी को समर्थन देने वाले दल अब चुनाव के बाद यू पी ए को आँखें दिखा रहे हैं और 'मध्यावधि चुनावों' की संभावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। ग्रह भी अराजकता की स्थिति बनाए हुये हैं। चुनावों की स्थिति मे एन डी ए और यू पी ए से कुछ दल टूट कर तीसरे गैर कांग्रेसी/गैर भाजपाई  गुट के साथ आ जाएँगे। इस तीसरे गुट को बहुमत न भी मिले तो भी कांग्रेस को मजबूरन इसे ही समर्थन देना होगा और राष्ट्रपति महोदय भी चुनाव अभियान के दौरान इस गुट के नेताओं को दिये गए अपने आश्वासन को पूर्ण करेंगे। अतः नए महामहिम के आगमन को केंद्र मे गैर कांग्रेस/भाजपा सरकार के गठन की मुहिम के रूप मे भी देखा जा सकता है।   
   



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