Showing posts with label जवाहर लाल नेहरू. Show all posts
Showing posts with label जवाहर लाल नेहरू. Show all posts

Sunday, 27 May 2018

पुण्यतिथि पर : जवाहरलाल नेहरू की विदेशनीति ------ शेष नारायण सिंह

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 



Shesh Narain Singh
( जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर उनको नमन )

जवाहरलाल नेहरू की विदेशनीति को समझे बिना इस देश को समझना नामुमकिन है

शेष नारायण सिंह

जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु को 54 साल हो गए . देखा गया है कि हर साल 27 मई के आस पास जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के बारे में बहस का सिलसिला शुरू हो जाता . पिछले चार साल से यह कम हुआ है क्योंकि इसी तारीख को बीजेपी की भारत विजय की गाथा चलती है . लेकिन अन्य मंचों पर या एकाध टीवी चैनलों पर कहीं न कहीं चर्चा हो ही जाती है. अक्सर देखा गया है कि जिन नेताओं की पार्टियां आज़ादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों की मददगार थीं, वे ही नेहरू को बहुत ही मामूली नेता बताने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं . .कुछ साल पहले ऐसे ही एक डिबेट में मुझे शामिल होने का मौक़ा मिला था. आजकल एक अजीब नज़ारा देखने को मिलता है .दिल्ली की काकटेल सर्किट में होने वाली गपबाज़ी से इतिहास और राजनीति की जानकारी ग्रहण करने वाले कुछ पत्रकार भी नेहरू को नीचा बताने की मुहिम में शामिल हो जाते हैं . १९४७ के पहले और बाद के अंग्रेजों के वफादार रही पार्टियों के बुद्धिजीवियों की जमात भी जवाहरलाल नेहरू को बौना बताने की कोशिश में जुटी रहती है . 
यहाँ किसी का नाम लेकर बौने नेताओं , दलालों और पत्रकारों को महत्व नहीं दिया जाएगा लेकिन यह ज़रूरी है कि आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद की भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तरक्की में जवाहरलाल नेहरू की हैसियत को कम करने वालों की कोशिशों पर लगाम लगाई जाए. .. जिस चैनल पर जवाहरलाल नेहरू की विदेशनीति के बारे में बहस चल रही थी ,उसमें विषय ही ऐसा चुना गया था जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, राजनेता, राष्ट्रनिर्माता, संस्थाओं के निर्माता जवाहललाल नेहरू की शान के मुताबिक नहीं था . बहस में सत्ताधारी पार्टी का एक नेता, एक बड़ा पत्रकार और भारतीय मूल का एक ब्रिटिश नागरिक जवाहरलाल नेहरू को अपमानित कर रहे थे . इस हमले से नेहरू को बचाने के लिए एक कांग्रेसी नेता मैदान में था जिसको शायद खुद इंदिरा गांधी के पहले का कांग्रेस इतिहास नहीं याद था .


अँगरेज़ नागरिक की बात तो समझ में आती है कि वे नेहरू की मुखालिफत करें लेकिन एक नामी टी वी चैनल जब इस खेल में इस्तेमाल होता है तो तकलीफ होती है .बहरहाल नेहरू की विदेश नीति या राजनीति में कमी बताने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह नेहरू की दूरदर्शिता का ही नतीजा है कि आज भारत एक महान देश माना जाता है और ठीक उसी दिन आज़ादी पाने वाला पाकिस्तान आज एक बहुत ही पिछड़ा मुल्क है.. बहस में शामिल ब्रिटिश नागरिक की कोशिश थी कि वह यह साबित करे कि अगर आज़ादी मिलने के बाद भारत ने अमरीका का साथ पकड़ लिया होता तो बहुत अच्छी विदेशनीति बनती और आर एस एस वाले बुद्धिजीवी की कोशिश तो वही थी कि जो कुछ भी कांग्रेस ने किया वह गलत था.. ज़ाहिर है यह दोनों ही सोच भारत के राष्ट्रीय हित के खिलाफ है और उसे गंभीरता से लेने की ज़रुरत नहीं है . देश के ऍम बुद्धिजीवी और पत्रकार को जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति की बुनियाद को समझना ज़रूरी है ..१९४६ में जब कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया , उसी वक़्त जवाहरलाल ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत की विदेशनीति विश्व के मामलों में दखल रखने की कोशिश करेगी , स्वतंत्र विदेशनीति होगी और अपने राष्ट्रहित को सर्वोपरि महत्व देगी .. लेकिन यह बात भी गौर करने की है कि किसी नवस्वतंत्र देश की विदेशनीति एक दिन में नहीं विकसित होती. जब विदेशनीति के मामले में नेहरू ने काम शुरू किया तो बहुत सारी अडचनें आयीं लेकिन वे जुटे रहे और एक एक करके सारे मानदंड तय कर दिया जिसकी वजह से भारत आज एक महान शक्ति है .. सच्चाई यह है कि भारत की विदेशनीति उन्ही आदर्शों का विस्तार है जिनके आधार पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी थी और आज़ादी की लड़ाई को एक महात्मा ने नेतृत्व प्रदान किया था जिनकी सदिच्छा और दूरदर्शिता में उनके दुश्मनों को भी पूरा भरोसा रहता था. आज़ादी के बाद भारत की आर्थिक और राजनयिक क्षमता बहुत ज्यादा थी लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में ताक़त कुछ नहीं थी. जब भारत को आज़ादी मिली तो शीतयुद्ध शुरू हो चुका था और ब्रितानी साम्राज्यवाद के भक्तगण नहीं चाहते थे कि भारत एक मज़बूत ताक़त बने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी आवाज़ सुनी जाए . जबकि जवाहरलाल नेहरू की विदेशनीति का यही लक्ष्य था. अमरीका के पास परमाणु हथियार थे लेकिन उसे इस बात से डर लगा रहता था कि कोई नया देश उसके खिलाफ न हो जाए जबकि सोविएत रूस के नेता स्टालिन और उनके साथी हर उस देश को शक की नज़र से देखते थे जो पूरी तरह उनके साथ नहीं था. नेहरू से दोनों ही देश नाराज़ थे क्योंकि वे किसी के साथ जाने को तैयार नहीं थे, भारत को किसी गुट में शामिल करना उनकी नीति का हिस्सा कभी नहीं रहा . दोनों ही महाशक्तियों को नेहरू भरोसा दे रहे थे कि भारत उनमें से न किसी के गुट में शामिल होगा और न ही किसी का विरोध करेगा. यह बात दोनों महाशक्तियों को बुरी लगती थी. यहाँ यह समझने की चीज़ है कि उस दौर के अमरीकी और सोवियत नेताओं को भी अंदाज़ नहीं था कि कोई देश ऐसा भी हो सकता है जो शान्तिपूर्वक अपना काम करेगा और किसी की तरफ से लाठी नहीं भांजेगा . जब कश्मीर का मसला संयुक्तराष्ट्र में गया तो ब्रिटेन और अमरीका ने भारत की मुखालिफत करके अपने गुस्से का इज़हार किया ..नए आज़ाद हुए देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमरीकियों को कुछ इन शब्दों में फटकारा था . उन्होंने कहा कि ,'यह हैरतअंगेज़ है कि अपनी विदेशनीति को अमरीकी सरकार किस बचकानेपन से चलाती है .वे अपनी ताक़त और पैसे के बल पर काम चला रहे हैं , उनके पास न तो अक्ल है और न ही कोई और चीज़.' सोवियत रूस ने हमेशा नेहरू के गुटनिरपेक्ष विदेशनीति का विरोध किया और आरोप लगाया कि वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समर्थन देने का एक मंच है ..सोवियत रूस ने कश्मीर के मसले पर भारत की कोई मदद नहीं की और उनकी कोशिश रही कि भारत उनके साथ शामिल हो जाए . जवाहरलाल ने कहा कि भारत रूस से दोस्ती चाहता है लेकिन हम बहुत ही संवेदंशील लोग हैं . हमें यह बर्दाश्त नहीं होगा कि कोई हमें गाली दे या हमारा अपमान करे. रूस को यह मुगालता है कि भारत में कुछ नहीं बदला है और हम अभी भी ब्रिटेन के साथी है . यह बहुत ही अहमकाना सोच है ..और अगर इस सोच की बिना पर कोई नीति बनायेगें तो वह गलत ही होगी जहां तक भारत का सवाल है वह अपने रास्ते पर चलता रहेगा. 'जो लोग समकालीन इतिहास की मामूली समझ भी रखते हैं उन्हें मालूम है कि कितनी मुश्किलों से भारत की आज़ादी के बाद की नाव को भंवर से निकाल कर जवाहरलाल लाये थे और आज जो लोग अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर टी वी चैनलों पर बैठ कर मूर्खतापूर्ण प्रलाप करते हैं उन पर कोई भी केवल दया ही कर सकता है.

https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1709071115845958&id=100002292570804


****************************************************************************

जहां तक शेष नारायण सिंह जी के विचारों की बात है  सटीक और स्पष्ट हैं। उनके द्वारा ठीक ही कहा गया है कि, "आज जो लोग अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर टी वी चैनलों पर बैठ कर मूर्खतापूर्ण प्रलाप करते हैं उन पर कोई भी केवल दया ही कर सकता है." 
भाजपा की  स्थापना के बाद आगरा  के सुभाष पार्क में एक जनसभा को संबोद्धित करते हुये बाजपेयी जी ने बताया था कि, जब वह विदेशमंत्री थे तो पत्रकारों द्वारा उनसे पूछा गया था कि उनकी विदेश नीति क्या है ? वह रूस या फिर अमेरिका किसकी ओर झुकेंगें ? तब उन्होने जवाब दिया था कि, विदेश नीति पर कोई मतभेद नहीं है, पंडित नेहरू ने जो विदेश नीति निर्धारित कर दी है वही सही है और हम उसी पर चलते रहेंगें । उन्होने मज़ाकिए अंदाज में यह भी कहा कि, हम किसी की तरफ नहीं झुकेंगे बल्कि दोनों हमारी ओर झुकेंगें। 
अतः आज भाजपा / आर एस एस के जो लोग नेहरू जी या उनकी विदेश नीति का मखौल उड़ा रहे हैं वे अपने ही पूर्व अध्यक्ष और पूर्व पी एम बाजपेयी जी का भी मखौल उड़ा रहे हैं इसलिए उनके इस कदम को शेष नारायण सिंह जी ने  "मूर्खतापूर्ण प्रलाप " बिलकुल सटीक कहा है। 
लेकिन रामचन्द्र गुहा साहब के विचार गांधी जी के नाम का दुरुपयोग करते हुये आर एस एस की विचार - धारा को मजबूती देने वाले अधिक लगते हैं। 
गांधी जी के समय में पहले से ही  : 1- कांग्रेस, 2- कम्युनिस्ट , 3- कांग्रेस समाजवादी पार्टी, 4- मुस्लिम लीग, 5- हिंदूमहासभा , 6- गदर पार्टी, , 7- हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी  आदि - आदि अनेकों  राजनीतिक दल थे तब वह कैसे सिर्फ दो पार्टी सिस्टम की बात कह सकते थे ? इन सब पार्टियों को वह केवल दो पार्टियों में किस तरह सिमटवा सकते थे ? 
रामचन्द्र गुहा साहब ने आर एस एस / जनसंघ ( अब भाजपा ) की दो - पार्टी सिस्टम की मांग को गांधी जी की चादर ओढा कर पेश किया है जो भारत जैसे ' विविधता में एकता ' वाले देश के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। ------विजय  राजबली माथुर

Saturday, 5 December 2015

जन्मदिन पर स्मरण :जोश मलीहाबादी

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश