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Wednesday, 30 October 2019

आंतरिक मामले में विदेशी सांसदों का दख़ल क्यों? ------ रवीश कुमार




इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर का कश्मीर से क्या लेना देना? भारत सरकार को कश्मीर के मामले में इंटरनेशनल ब्रोकर की ज़रूरत क्यों पड़ी? भारत आए यूरोपियन संघ के सांसदों को कश्मीर ले जाने की योजना जिस अज्ञात एनजीओ के ज़रिए तैयार हुई उसका नाम पता सब बाहर आ गया है. यह समझ से बाहर की बात है कि सांसदों को बुलाकर कश्मीर ले जाने के लिए भारत ने अनौपचारिक चैनल क्यों चुना? क्या इसलिए कि कश्मीर के मसले में तीसरे पक्ष को न्यौतने की औपचारिक शुरूआत हो जाएगी? लेकिन इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर कहने वाली मादी(मधु) शर्मा के ज़रिए सांसदों का दौरा कराकर क्या भारत ने कश्मीर के मसले में तीसरे पक्ष की अनौपचारिक भूमिका स्वीकार नहीं की ?
ब्रिटेन के लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद क्रिस डेवीज़ को मादी शर्मा ने ईमेल किया है. सात अक्तूबर को भेजे गए ईमेल में मादी शर्मा कहती हैं कि वे यूरोप भर के दलों के एक प्रतिनिधिमंडल ले जाने का आयोजन का संचालन कर रही हैं. इस वीआईपी प्रतिनिधिमंडल की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात कराई जाएगी और अगले दिन कश्मीर का दौरा होगा. ईमेल में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की तारीख़ 28 अक्तूबर है और कश्मीर जाने की तारीख़ 29 अक्तूबर है. ज़ाहिर है ईमेल भेजने से पहले भारत के प्रधानमंत्री मोदी की सहमति ली गई होगी. तभी तो कोई तारीख़ और मुलाक़ात का वादा कर सकता है. बग़ैर सरकार के किसी अज्ञात पक्ष की सक्रियता के यह काम हो ही नहीं सकता.
यह ईमेल कभी बाहर नहीं आता, अगर सांसद क्रिस डेवीज़ ने अपनी तरफ से शर्त न रखी होती. डेवीज़ ने मादी शर्मा को सहमति देते हुए लिखा कि वे कश्मीर में बग़ैर सुरक्षा घेरे के लोगों से बात करना चाहेंगे. बस दस अक्तूबर को मादी शर्मा ने डेविस को लिखा कि बग़ैर सुरक्षा के संभव नहीं होगा क्योंकि वहाँ हथियारबंद दस्ता घूमता रहता है. यही नहीं अब और सांसदों को ले जाना मुमकिन नहीं. इस तरह डेविस का पत्ता कट जाता है. क्रिस डेवीज़ नार्थ वेस्ट ब्रिटेन से यूरोपियन संघ में सांसद हैं. उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र में कश्मीर के लोग रहते हैं जो अपने परिजनों से बात नहीं कर पा रहे. डेवीज़ ने मीडिया से कहा है कि वे मोदी सरकार के जनसंपर्क का हिस्सा नहीं होना चाहते कि कश्मीर में सब ठीक है.


मादी शर्मा का ट्विटर अकाउंट है, उन्हें तीन हज़ार लोग भी फोलो नहीं करते हैं. प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी तस्वीरें हैं. उनकी स्वतंत्र हैसियत भी है. उनकी प्रोफ़ाइल बताती है कि वे म्यानमार में रोहिंग्या से लेकर चीन में उघूर मुसलमानों के साथ हो रही नाइंसाफ़ी से चिन्तित हैं और ग़लत मानती हैं. ऐसी सोच रखने वाली मादी शर्मा ऐसे सांसदों को क्यों बुलाती हैं जो इस्लाम से नफ़रत करते हैं और कट्टर ईसाई हैं? जो माइग्रेंट को कोई अधिकार न दिए जाने की वकालत करते हैं. मादी शर्मा खुद को गांधीवादी बताती हैं. उनकी साइट पर गांधी के वचन हैं.
मादी शर्मा का एक एनजीओ है. WESTT women's economic and social Think Tank. इस एनजीओ की तरफ से वे सांसदों को ईमेल करती हैं और लिखती हैं कि आने जाने का किराया और ठहरने का प्रबंध कोई और संस्था करेगा जिसका नाम है International Institute for Non-Aligned Studies. इस संस्था का दफ्तर दिल्ली के सफ़दरजंग में है. 1980 में बनी यह संस्था निर्गुट देशों के आंदोलन को लेकर सभा-सेमिनार कराना है. दौर में आपने कब निर्गुट देशों के बारे में सुना है? निर्गुट आंदोलन के लिए बनी यह संस्था यूरोपियन संघ के 27 सांसदों का किराया क्यों देगी? इसकी वेबसाइट से पता नहीं चलता कि इसका अध्यक्ष कौन है?
अब सवाल है भारत ने मादी शर्मा का सहारा क्यों लिया? कई दफ़ा राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अगर भारत पाकिस्तान चाहें तो वे बीच-बचाव के लिए तैयार हैं. भारत ने ठुकरा दिया. संयुक्त राष्ट्र संघ में इमरान खान के भाषण से भारत प्रभावित नहीं हुआ. कश्मीर पर टर्की और मलेशिया की आलोचना से भारत ने ऐसे जताया जैसे फ़र्क़ न पड़ा हो.जब अमरीकी कांग्रेस के विदेश मामलों की समिति में कश्मीर को लेकर सवाल उठे तब भी भारत ने ऐसे जताया कि उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. भारत की तरफ से जताया जाता रहा कि कई देशों को ब्रीफ़ किया गया है और वे भारत के साथ हैं. ऊपर ज़्यादातर देशों ने भारत से कुछ ख़ास ऐसा नहीं कहा जिससे ज़्यादा परेशानी हो. बल्कि जब पाकिस्तान ने विदेशी राजनयिकों और पत्रकारों को अपने अधिकृत कश्मीर का दौरा कराया तो भारत में मज़ाक़ उड़ाया गया. इतना सब होने के बाद भारत को क्या पड़ी कि एक इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर के ज़रिए विदेशी सांसदों को कश्मीर आने की भूमिका तैयार की गई ?
जो सांसद बुलाए गए हैं वो धुर दक्षिणपंथी दलों के हैं. इनमें कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिनकी सरकार हो या प्रमुख आवाज़ रखते हों. यूरोपियन संघ के 751 सीटों में से ऐसे सांसदों की संख्या 73 से अधिक नहीं है. तो भारत ने कश्मीर पर एक कमजोर पक्ष को क्यों चुना? क्या प्रमुख दलों से मन मुताबिक़ साथ नहीं मिला? अमरीकी सिनेटर को कश्मीर जाने की अनुमति न देकर भारत ने इस मामले में अमरीकी दबाव को ख़ारिज कर दिया. फिर भारत को इन सांसदों को बुलाने की भूमिका क्यों तैयार करनी पड़ी?
क्या डेवीज़ ने मादी शर्मा के ईमेल को सार्वजनिक कर भारत के पक्ष को कमजोर नहीं कर दिया? क्या यह सब करने से कश्मीर के मसले का अंतर्राष्ट्रीयकरण नहीं होता है ? क्या कश्मीर का पहले से अधिक अंतर्राष्ट्रीयकरण नहीं हो गया है? आज ही संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति ने ट्विट किया है कि कश्मीर में मानवाधिकार का हनन हो रहा है. भारत के लिए कश्मीर अभिन्न अंग है. आंतरिक मामला है तो फिर भारत विदेशी सांसदों को बुलाने के मामले में पिछले दरवाज़े से क्यों तैयारी करता है?

इसका सही जवाब तभी मिलेगा तब प्रेस कांफ्रेंस होगी. अभी तक कोई बयान भी नहीं आया है. चिन्ता की बात है कि इन सब सूचनाओं को करोड़ों हिन्दी पाठकों से दूर रखा जा रहा है. उन्हें कश्मीर पर अंधेरे में रखा जा रहा है. ऐसा क्यों ? आप कश्मीर को लेकर हिन्दी अख़बारों की रिपोर्टिंग पर नज़र रखें. बुधवार के अख़बार में यूरोपियन संघ के सांसदों के दौरे की ख़बर को ग़ौर से पढ़ें और देखें कि क्या ये सब जानकारी दी गई है? कश्मीर पर राजनीतिक सफलता तभी मिलेगी जब यूपी बिहार को अंधेरे में रखा जाएगा.

जो चैनल कल तक कश्मीर पर लिखे लेख के किसी दूसरे मुल्क में री-ट्विट हो जाने पर लेखक या नेता को देशद्रोही बता रहे थे, जो चैनल दूसरे देश में कश्मीर पर बोलने को देशद्रोही बता रहे थे आज वही इन विदेशी सांसदों के श्रीनगर दौरे का स्वागत कर रहे हैं. क्यों?
साभार :

https://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-blog-over-european-union-mps-kashmir-visit-and-chris-davies-mail-2124308

Wednesday, 7 August 2019

संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार गंवा कर अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे ------ हेमंत झा

Hemant Kumar Jha
इस देश के 18 से 35 वर्ष के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है? क्या कश्मीर? या राम मंदिर? या पाकिस्तान...?
या...उच्च शिक्षा में वंचित समुदाय के युवाओं के लिये घटते अवसर? रोजगार के घटते अवसर? अंध निजीकरण? श्रमिक अधिकारों पर लगातार हो रहे सुनियोजित हमले?

जाहिर है, सैद्धांतिक जवाब तो यही होगा कि शिक्षा और रोजगार युवाओं के लिये सबसे बड़ी समस्या हैं जो हाल के दिनों में और गम्भीर हुई हैं।

लेकिन...गौर करने वाली बात यह है कि इस देश की सरकार ही नहीं, स्वयं युवा वर्ग इन समस्याओं को लेकर कितने संवेदनशील हैं।

बीते एकाध महीने में कई मुद्दे सतह पर आए हैं। नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित प्रारूप, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, तीन तलाक, रेलवे का निजीकरण, कश्मीर में धारा 370...आदि।

अपने आप में हर मुद्दा अहमियत रखता है। लेकिन, मायने यह रखता है कि किस मुद्दे पर लोगों की कैसी प्रतिक्रिया रही। किस मुद्दे पर बहस कोलाहल में बदल गया और किस मुद्दे की कोई खास चर्चा तक नहीं हुई?

सड़कों, चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक तीन तलाक पर जितनी बहसें हुईं, पाकिस्तान पर जितनी बातें होती हैं, अभी धारा 370 पर जितनी बहसें हो रही हैं, उनकी तुलना में नई शिक्षा नीति, नेशनल मेडिकल कमीशन, निजीकरण आदि पर कितनी बहसें हुईं?

अभी, जब लोग कश्मीर मुद्दे को लेकर इस तरह उछल रहे हैं जैसे कोई जीत मिली हो ठीक उसी वक्त सूचनाएं आ रही हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2 लाख नौकरियां खत्म हो गई हैं, रेलवे के निजीकरण वाया निगमीकरण के विरोध में रेलवे कर्मचारियों के संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल में ग्रामीण क्षत्रों को झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे करने की बातें हो रही हैं, मेडिकल शिक्षा को निम्न आय वर्ग तो क्या, मध्य वर्ग के प्रतिभाशाली युवाओं से दूर किया जा रहा है।

लेकिन, जीवन से जुड़े मुद्दों की कहीं कोई खास चर्चा नहीं।

जब अपने कॅरिअर, अपने भविष्य को लेकर युवा ही संवेदनशील नहीं हैं तो व्यवस्था क्यों संवेदनशील हो? सत्ता के लिये युवा वर्ग ही सबसे बड़ी चुनौती होता है इसलिये इस वर्ग को दिग्भ्रमित बनाए रखने के लिये सत्ता-संरचना हर सम्भव कोशिश करती है।

अंध निजीकरण युवाओं के भविष्य पर सबसे बड़ा आघात है। उच्च शिक्षा का कारपोरेटीकरण निम्न आय वर्ग के युवाओं के भविष्य को अंधेरों में धकेल देगा, इकोनॉमिक स्लोडाउन के कारण नौकरियां तो खत्म हो ही रही हैं, नई नौकरियों का सृजन भी नहीं हो रहा। इस आर्थिक दुर्व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार युवा वर्ग ही है।

वास्तविकता यह है कि रोजगार के क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मची हुई है।

लेकिन, आश्चर्य है कि इन मुद्दों को लेकर कहीं बहस नहीं, जबकि कोलाहल होना चाहिये था, आंदोलन होना चाहिये था।

फिलहाल, कश्मीर का झुनझुना है। पहले मंदिर झुनझुना था। ऐसे ही कई तरह के झुनझुने हैं। झुनझुने बदलते रहते हैं लेकिन उनकी आवाज वैसी ही रहती है। ऐसी आवाज...जिसमें अजीब सा नशा है। ऐसा नशा...जिसमें न अपना जीवन सूझता है, न अपना भविष्य सूझता है, न बाल बच्चों का भविष्य सूझता है।

इन संदर्भों में हम बीते सौ वर्षों की सबसे अभिशप्त पीढ़ी हैं...जो अपने बाप-दादों के अथक संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार तो गंवाते जा ही रहे हैं, अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे हैं।
साभार : 
https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2290223617752205

Sunday, 19 August 2018

नया रास्ता निकाल सकते हैं इमरान - मोदी ------ ए एस दुल्लत ( पूर्व रॉ प्रमुख )

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https://www.jansatta.com/trending-news/senior-congress-leader-digvijaya-singh-lauds-punjab-minister-navjot-singh-sidhu-for-attending-pakistan-pm-imran-khan-oath-ceremony-says-promotion-friendship/742764/?utm_source=izooto&utm_medium=push_notification&utm_campaign=browser_push&utm_content=&utm_term=

The Wire
Published on Aug 25, 2016

The Wire interviewed former Research and Analysis Wing chief A.S Dulat to understand the crisis in Kashmir and possible resolutions. Dulat has served in Kashmir for a long time, his most important tenure being from the year 2001 to 2004 when he was the advisor on Kashmir in the then Prime Minister Atal Bihari Vajpayee's office. 



Last year, his book Kashmir: The Vajpayee years, co-authored with senior journalist Aditya Sinha, created a lot of ripples as he became one of the few security personnels to advocate that the military presence in Kashmir should be reduced and that India needs to take the Kashmiris into confidence through humanitarian measures




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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 2 July 2018

अमरीका भारत के बुरे वक़्त में काम कभी नहीं आया ------ शेष नारायण सिंह

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आज भारत के जिन इलाकों में भी अशांति है , वह सब अमरीकी दखलंदाजी की वजह से ही है . कश्मीर में जो कुछ भी पाकिस्तान कर रहा है उसके पीछे पूरी तरह से अमरीका का पैसा लगा है . पंजाब में भी आतंकवाद पाकिस्तानी फौज की कृपा से ही शुरू हुआ था . पूर्वोत्तर भारत में जो आतंकवादी पाकिस्तान की कृपा से सक्रिय हैं , उन सबको को पाकिस्तान उसी पैसे से मदद करता था जो उसे अमरीका से अफगानिस्तान में काम करने के लिए मिलता था  :: 
Shesh Narain Singh
02-07-2018 






साभार : 
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1756971584389244&id=100002292570804

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 22 June 2017

ऐसा कहना कि वर्तमान में मोदी का कोई विकल्प नहीं है देश के 125 करोड़ टैलेन्टेड भारतीयों का अपमान हैं ------ रजनीश श्रीवास्तव

 देश 125 करोड़ भारतीयों का है।यहाँ के 30 करोड़ लोग मोदी जी से ज्यादा शिक्षित और गुणी हैं।इनमें से कोई भी मोदी जी से कहीं बेहतर भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है।..................मोदी जी बिन बुलाए पाकिस्तान जाकर भारतीय सैनिकों के खून से सना नवाज शरीफ के जन्मदिन का केक खाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री निकले।यही नहीं जब नवाज शरीफ ने आई एस आई की मदद से रिटर्न गिफ्ट के रूप में भारत को पठानकोट आतंकी हमला दिया तो भारत की कातिल पाकिस्तान की इसी आई एस आई को पठानकोट बुला कर कातिल से जाँच कराने वाले भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने।......................भाजपा में लगभग दो सौ से ज्यादा सांसद ऐसे होंगे जो मोदी जी से ज्यादा पढ़ेलिखे और काबिल हैं और मौका मिले तो मोदी जी से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे।.....कल कोई और होगा और यकीन मानिए मोदी जी से कहीं बेहतर होगा------------------


Rajanish Kumar Srivastava
#क्या देश नरेन्द्र मोदी के अलावा सक्षम प्रधानमंत्री पाने के मामले में विकल्पहीन हो गया है?#
एक सधी हुई रणनीति के तहत अक्सर भाजपा भक्त यही प्रश्न करते हैं कि माना मोदी जी बहुत सारे वादे पूरा नहीं कर पा रहे हैं व शासन में कुछ कमियाँ हैं तो आप ही बताईये कि वर्तमान में मोदी का क्या विकल्प है।प्रायोजित ढ़ंग से वही स्थिति बनाने की कोशिश की जा रही है कि जैसे "मोदी इज़ इंडिया एण्ड़ इंडिया इज़ मोदी"। जैसा कभी स्व० इन्दिरा गाँधी के लिए कहा जाता था कि,"इन्दिरा इज़ इंडिया एण्ड़ इंडिया इज़ इन्दिरा"।
आइए आज इतिहास के आईने से वर्तमान का जवाब तलाशते हैं।
ये देश 125 करोड़ भारतीयों का है।यहाँ के 30 करोड़ लोग मोदी जी से ज्यादा शिक्षित और गुणी हैं।इनमें से कोई भी मोदी जी से कहीं बेहतर भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है।केवल लोकलुभाना भाषण देने से सक्षम प्रधानमंत्री नही हो जाता।मोदी जी जब विपक्ष में थे तो ऐसा ललकारते थे कि लगता था कि उनके सत्ता में आते ही पाकिस्तान विश्व के नक्शे से गायब हो जाएगा और चीन चूहे की तरह बिल में दुबक जाएगा।हुआ बिल्कुल उल्टा मोदी जी बिन बुलाए पाकिस्तान जाकर भारतीय सैनिकों के खून से सना नवाज शरीफ के जन्मदिन का केक खाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री निकले।यही नहीं जब नवाज शरीफ ने आई एस आई की मदद से रिटर्न गिफ्ट के रूप में भारत को पठानकोट आतंकी हमला दिया तो भारत की कातिल पाकिस्तान की इसी आई एस आई को पठानकोट बुला कर कातिल से जाँच कराने वाले भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने।इसके विपरीत जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे तो विद्वानों को यह चिन्ता सताती थी कि नेहरू के बाद कौन? और फिर नेहरू जी की मृत्यु के बाद लाईम लॉईट से दूर रहने वाले अत्यन्त साधारण ,सौम्य और मितभाषी आदरणीय लाल बहादुर शास्त्री जी देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने और ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल बने।इसी तरह जब अचानक असमय ही लाल बहादुर शास्त्री जी कालकवलित हो गये तो यह समझ में नहीं आ रहा था कि चुनौती की इस घड़ी में देश को कौन सम्हालेगा।उस समय तक यद्यपि इन्दिरा गाँधी जी सांसद और कैबिनेट मंत्री का अनुभव रखती थीं लेकिन उनको बोलते हुए बहुधा नहीं पाया जाता था
वो मौन रहना पसन्द करती थीं।मोरारजी देसाई और श्री जयप्रकाश नारायण जी उन्हें #गूँगी गुड़िया# कहा करते थे।यही गूँगी गुड़िया इन्दिरा गाँधी जी जब भारत की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल दोनों एक साथ बदल दिया और एक नये देश बांग्लादेश को जन्म दे दिया।इसी तरह अनिच्छा से राजनीति में आए मितभाषी और भद्र युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने देश को कम्प्यूटर,संचार और डिजिटल क्रांति के माध्यम से 21 वी सदी में प्रवेशित करा दिया।इसी तरह एक अर्थशास्त्री और मौन रहने वाले मनमोहन सिंह जिनमें नेतागिरी का कोई गुण नहीं था ने राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी दो बार लगातार प्रधानमंत्री बनने का कारनामा कर दिखाया और मौन रहकर देश को आर्थिक प्रगति और उदारीकरण की राह दिखाई।आज मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं कल कोई और होगा और यकीन मानिए मोदी जी से कहीं बेहतर होगा।भाजपा में लगभग दो सौ से ज्यादा सांसद ऐसे होंगे जो मोदी जी से ज्यादा पढ़ेलिखे और काबिल हैं और मौका मिले तो मोदी जी से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे।यह टैलेंट से भरा देश है और यहाँ प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है।ऐसा कहना कि वर्तमान में मोदी का कोई विकल्प नहीं है देश के 125 करोड़ टैलेन्टेड भारतीयों का अपमान हैं।जो देश विश्व गुरू बनने की क्षमता रखता है जिसके वैज्ञानिक नासा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हों, जिस देश का इसरो अपने योग्यतम वैज्ञानिकों के दम पर विश्व कीर्तिमान रच रहा हो।जो देश योग्यतम वैज्ञानिकों,शिक्षाविदों, प्रशासकों आदि से भरापुरा हो वह प्रधानमंत्री के सन्दर्भ में कभी भी विकल्पहीन नहीं हो सकता है।ऐसा कहने वाले कि वर्तमान में मोदी का कोई विकल्प नहीं है, प्रतिभाओं से भरे देश का अपमान करते हैं।कृपया निराशावादी ना बने।ये महान देश ना कभी रूका है ना कभी रूकेगा।

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Thursday, 4 August 2016

विश्व बंधुत्व की भावना का परित्याग भारत की मूल भावना की समाप्ती होगा ------ हरजिंदर

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 28 February 2016

भारत का विभाजन क्यों हुआ ? ------ डॉ. गिरीश मिश्र

**प्रश्न उठता है कि भारत का विभाजन क्यों हुआ जब मुस्लिम लीग मुसलमानों को हिन्दुओं के बराबर दर्जा देने की बात कर रही थी। यह स्थिति 1946 की गर्मियों में बदल गई। ब्रिटिश उपनिवेशवाद नहीं चाहता था कि भारत अखंड रहे और एक सुदृढ़ देश बन कर उभरे। ब्रिटेन और अमेरिका दोनों चाहते थे कि उनकी निजी पूंजी को चरने का पूरा मौका मिले। अखिल भारतीय कांग्रेस के प्रस्तावों तथा प्रस्तावित औद्योगिक नीति को देखते हुए उन्हें संदेह था कि भारत में शायद उनकी निजी पूंजी को बेधड़क चरने का अवसर न मिले इसीलिए वे भारत के विभाजन के पक्षधर बने। उनकी रणनीति थी कि पाकिस्तान बनाकर उसे भारत से भिड़ा दिया जाए और उनको बेरोकटोक काम करने का मौका मिले।**

***आयशा जलाल के अनुसार इतिहास की जगह एक कुपरिभाषित इस्लामी विचारधारा को थोपने के कारण एक आलोचनात्मक ऐतिहासिक परंपरा न विकसित हो पाई है और न ही तर्कसंगत सार्वजनिक बहस संभव है। पाकिस्तान के स्कूलों  में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह कृत्रिम राष्ट्रीय मिथकों को बढ़ावा देता है। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अंतर पर जोर दिया जाता है और इस प्रकार पाकिस्तान के अस्तित्व को उचित ठहराया जाता है।***


12, FEB, 2016, FRIDAY 11:05:55 PM
इन दिनों पाकिस्तान को लेकर काफी चर्चा हो रही है किन्तु ध्यान से देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पूरी चर्चा सतही है क्योंकि किसी ने भी पाकिस्तान के अंदररूनी हालात और शक्ति-संतुलन पर ध्यान देने की जहमत नहीं उठाई है।
यहां हम अनेक पुस्तकों में से सिर्फ दो का जिक्र करेंगे। पहली पुस्तक है: ''ए केस ऑफ  एक्सप्लोडिंग मैंगो•ाÓÓ जिसके लेखक हैं- मोहम्मद हनीफ। दूसरी पुस्तक है: ''द स्ट्रगल फॉर पाकिस्तान: ए मुस्लिम होमलैंड एंड ग्लोबल पॉलिटिक्सÓÓ जिसकी लेखिका हैं- आयशा जलाल। दोनों पाकिस्तानी मूल के हैं और काफी प्रतिष्ठित हैं।
आइए हम पहली पुस्तक से अपनी चर्चा शुरु करें। यह पुस्तक उपन्यास बतौर लिखी गई है और लेखक ने तथ्यों को रोचक बनाकर पेश किया है यद्यपि इसके सारे चरित्र वास्तविक हैं। जून 1988 का पाकिस्तान। जनरल जिया को पक्का विश्वास है कि उनकी हत्या की साजिश रची जा रही है इसलिए उन्होंने अपने सरकारी आवास आर्मी हाउस के चारों ओर बाड़ा लगवाने के साथ ही कड़ी सुरक्षा कर ली है। ऐसे अनेक लोग हैं जो उन्हें मृत देखना चाहते हैं उनमें राजनेताओं के अतिरिक्त फौजी जनरल भी हैं जो अपनी पदोन्नति के लिए बेताब हैं। फौजी जनरल चाहते हैं कि यदि जनरल मिया को खत्म कर दिया जाय तो उनके ऊपर बढऩे का मार्ग प्रशस्त हो जाय। इतना ही नहीं, उनके सीआईए, आईएसआई और रॉ से भी खतरा दिख रहा है। मिलिटरी अकादमी के एक जूनियर अफसर की हत्या फौज ने कर दी है क्योंकि अली शिगरी से जिया भयभीत थे।
जिया को लगता है कि उनकी मृत्यु से कई लोगों को फायदा होगा। कुछ को प्रभाव बढ़ाने की ललक है तो कुछ लोग अपनी पहचान बनाने के लिए आतुर हैं।
महज दो महीने बाद जनरल जिया राष्ट्रपति के लिए निर्दिष्ट विमान पाक वन में बैठकर यात्रा पर निकलते हैं मगर विमान में उड़ान के समय विस्फोट हो जाता है जिसमें जिया और उनके साथ जा रहे सबकी मौत हो जाती है।
पाकिस्तानी टेलीविजन पर विमान हादसे के बाद दो बुलेटिनों के बाद उसके प्रसारण पर रोक लगा दी जाती है क्योंकि कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना का हौसला पस्त हो सकता है।
उपर्युक्त विमान बहावलपुर रेगिस्तान से उड़ा था जो अरब सागर से करीब 600 मील की दूरी पर है। थोड़ी देर के लिए जनरल जिया न•ार आते हैं और लगता है कि वे कुछ परेशान हैं। उनकी दाईं ओर पाकिस्तान स्थित अमरीकी राजदूत न•ार आ रहे हैं। बाईं ओर पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस) के प्रमुख जनरल अख्तर हैं। उनको देखने से लगता है कि संभावित हादसे को देखते हुए उन्हें विमान में नहीं सवार होना चाहिए। जो भी हो उन सहित दस व्यक्ति विमान में सवार होते हैं। विमान हादसे का शिकार हो जाता है और जनरल जिया, पाकिस्तानी राजदूत तथा जनरल जिया के सहयोगी समेत दस के दस लोग मर जाते हैं।
विमान बनाने वालों अमेरिकी कंपनी लॉकहीड के विशेषज्ञ विमान के उडऩे के मात्र चार मिनट बाद वह हादसे का शिकार होने के कारणों का विश्लेषण करते हैं।  इस कंपनी के सी-190 विमान में प्रत्यक्षतया कोई खामी न•ार नहीं आती है फिर भी वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। फलित ज्योतिष में विश्वास रखने वाले मानते हैं कि काफी अरसे पहले ही भविष्यवाणी सामने आई थी कि पाकिस्तानी फौज के शीर्ष पर बैठे लोग और अमेरिकी राजदूत विमान हादसे के शिकार हो जाएंगे। उपन्यासकार मोहम्मद हनीफ के अनुसार वामपंथी बुद्धिजीवी मानते हैं कि एक क्रूर तानाशाही का खात्मा होना ही था और इसे वे ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के आधार पर स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। उधर अफगानिस्तान से सोवियत फौज के सिपाही घर वापसी की तैयारी में जुटे हैं। खाने-पीने और बहावलपुर में खरीदारी कर झूमते-झामते विमान में सवार होकर जा रहे हैं। उनका मनोभाव काफी बदल गया है। वे यही सोचकर आए थे कि उनकी घर वापसी शायद ही हो पाएगी।
अब बहावलपुर से उडऩे वाले पाकिस्तानी विमान की ओर देखें। महज कुछ पलों में वह हादसे का शिकार हो जाता है। उसमें सारे के सारे लोग मर जाते हैं। जनरल जिया समेत सभी जनरलों के परिवारों को पूरा मुआवजा मिलता है। उनके परिवारों को यह सख्त हिदायत है कि वे मृत व्यक्तियों के ताबूतों को न खोलें। विमान चालकों के परिवार वालों को अलग बंद रखा जाता है और कुछ दिनों के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है। अमेरिकी राजदूत के शव को अर्लिंग्टन कब्रिस्तान में दफनाकर उसके इर्द-गिर्द कतिपय सुशिष्ट शब्द लिख दिए जाते हैं। किसी भी मृत व्यक्ति की शव परीक्षा नहीं होती है। इस प्रकार मृत्यु के कारणों पर पर्दा डाल दिया जाता है। अमेरिकी पत्रिका ''वैनिटी फेयरÓÓ और ''न्यूयार्क टाइम्सÓÓ ने जरूर संपादकीय लिखकर उनकी मृत्यु से जुड़े कुछ सवाल उठाए। इसके बाद मृतकों के घरवालों ने कोर्ट में मुकदमे दर्ज करवाए किन्तु उन्हें उच्च पद देकर उनका मुंह बंद करवा दिया गया। मोहम्मद हनीफ का मानना है कि विमानन के इतिहास में पूरी घटना पर पर्दा डालने का प्रयास शायद ही कभी हुआ है। विमान हादसे के बाद न मृतकों का शव मिला और न ही कोई फोटो खींचकर प्रदर्शित किया जा सका। विमान के मलबे में हड्डियों के टुकड़े जरूर यत्र-तत्र  मिले किन्तु उसमें सवार लोगों की ठीक से पहचान असंभव थी। किसी प्रकार से सबको दफना दिया गया।
उपन्यास के अनुसार अली शिगरी पूरी घटना का प्रत्यक्षदर्शी था। बतलाया गया कि एक अनजानी वस्तु ने विमान को टक्कर मारी जिससे वह क्षतिग्रस्त होकर गिर गया। एक छोटे अफसर अली शिगरी के बयान के अनुसार, 31 मई 1988 की सुबह वह ड्यूटी पर ठीक साढ़े छ: बजे आया और उसने अपना काम शुरु किया। तभी उसने महसूस किया कि उसका तलवार को बांधने वाला बेल्ट ढीला हो गया है। जब उसने कसने की कोशिश की तो वह टूट गया। वह अपने बैरक की ओर उसके बदले नए बेल्ट के लिए गया मगर उसने अतिक नामक व्यक्ति को अपना काम सौंप कर बैरक में चला गया।
उधर 15 जून 1988 को जनरल जिया कुरान शरीफ पढ़ते समय आयत 21:87 पर आ गए और उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी। वे अपने आधिकारिक आवास आर्मी हाउस में ही बने रहे और उसे छोड़कर राष्ट्रपति निवास में जाने को तैयार नहीं थे। दो महीने और दो दिन बाद पहली बार आर्मी हाउस से निकलकर हवाई जहाज में बैठे और उसके हादसे में उनकी मृत्यु हो गई। यद्यपि राष्ट्र भर में खुशी हुई किन्तु कुरान शरीफ की उपर्युक्त आयत को दुबारा पढऩे पर उनके मन में भ्रम पैदा हो गया क्योंकि उसमें कहा गया था कि वे उन लोगों में हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को उत्पीडि़त किया है। सुबह के समय जनरल जिया कुरान शरीफ का अंग्रेजी अनुवाद पढऩे लगे थे जिससे नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उनके द्वारा उसे स्वीकारने के अवसर पर दिए जाने वाले भाषण को तैयार करने में मदद मिलती। वे कुरान शरीफ से कोई उपयुक्त पैराग्राफ को उद्धृत करना चाहते थे जिससे उनका भाषण दमदार बन सके। जनरल जिया अपना भाषण उर्दू में देना चाहते थे मगर बीच-बीच में अरबी उद्धरण देकर अपने सऊदी मित्रों को प्रभावित करना चाहते थे। किन्तु उन्हें असली चिंता रोनाल्ड रीगन की थी जो शायद उनके उर्दू-अरबी मिश्रित भाषण को नहीं समझ पाएं। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में ही भाषण देने का निर्णय लिया। जनरल जिया ने सैनिक इतिहास संबंधी सारी पुस्तकों और अपने पूर्ववर्ती जनरलों की तस्वीरों को अतिथिगृह में लगवा कर वर्तमान कमरे को प्रार्थनागृह बना दिया था। साथ ही वही मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक का दफ्तर भी बन गया था। वे जहां रहते थे वह एक औपनिवेशिक युग का बंगला था जिसमें 14 शयन कक्ष, अठारह एकड़ का लॉन और एक छोटी मस्जिद थी।
नया राष्ट्रपति निवास तो तैयार था मगर वे वहां नहीं जाना चाहते थे। वहां विदेशी अतिथियों और स्थानीय मुल्ला लोगों का आदर-सत्कार किया जाता था। उन्हें डर था कि कहीं आर्मी हाउस से निकल कर वहां जाने पर उनकी सुरक्षा खतरे में न पड़ जाए। जनरल जिया सदैव कुरान शरीफ में अपना पथ प्रदर्शन ढूंढते थे। ग्यारह वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सत्ता से अपदस्थ करने के पहले उन्होंने कुरान शरीफ का मनन कर पथ प्रदर्शन लिया था। उनको सत्ता से हटाकर मुकदमा चलाया था। फांसी की सजा को निरस्त करने की अपील को ठुकराकर फांसी पर लटकाने का फैसला लेने के बाद उन्होंने कुरान शरीफ से ही पथ प्रदर्शन लेने की कोशिश की थी। जनरल जिया इतिहास के चौराहे पर खड़े थे। पिछले ग्यारह वर्षों से वे प्रतिदिन कुरान शरीफ से पथ प्रदर्शन पाने की कोशिश में लगे थे। वे आर्मी हाउस की मस्जिद के इमाम से पथ प्रदर्शन चाहते थे मगर उनसे मिलने के पूर्व वे अपने शयन कक्ष से गुजरे जहां उनकी पत्नी सोई हुई थीं। उनकी पत्नी उन पर दबाव डाल रही थीं कि वे राष्ट्रपति निवास में चलें मगर वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे।
वे अपने निवास के साथ जुड़ी मस्जिद में नमाज के लिए पहुंचे। इमाम ने प्रार्थना शुरु की और उनके पीछे जनरल जिया बैठे थे और उन्हें साथ ही इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस के प्रधान जनरल अख्तर थे।
जनरल जिया को आर्मी चीफ बने मात्र 16 महीने हुए थे। उनको भुट्टो ने ही इस पद पर बैठाया था। उन्होंने भुट्टो को अपस्थ कर चीफ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेशन के रूप में अपने को पदस्थापित कर दिया था। भुट्टो को जेल में डाल दिया गया। सारे देश में आंतक का माहौल था। अब एक ही रास्ता था: षडय़ंत्र के जरिए जनरल जिया को उखाड़ फेंका जाय। कहना न होगा कि साजिश के जरिए ही जनरल जिया को समाप्त किया जा सकता है।
मिलिटरी अकादमी के अली शिगरी को आगे किया गया। उसके पिता जो सेना के अधिकारी थे उनकी हत्या कर दी गई थी। अली शिगरी जनरल जिया से बदला लेना चाहता था। अली के कारण भले ही कई लोगों का भला होगा मगर वह तो सिर्फ बदला लेना चाहता है।
उपर्युक्त उपन्यास ''ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोजÓÓ काफी रोचक है यद्यपि उसने पाकिस्तान की तत्कालीन स्थिति को अपना आधार बनाया है। दूसरी पुस्तक की चर्चा हम अगली बार करेंगे।

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/5714/10/330
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद फौजी शासन की अहमियत बहुत कुछ समाप्त हो चुकी है। अब वह जमाना जा चुका है जब लियाकत अली खां से लेकर बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी। इसी दौरान डॉ. खां साहब को मौत के घाट उतार दिया गया और जुल्फिकार अली भुट्टो को भी फांसी पर लटका दिया गया। वर्ष 1988 में जनरल जिया की जीवन-लीला समाप्त हो गई। कालक्रम में बेनजीर भुट्टो काफी संघर्ष के बाद सत्ता में आईं मगर उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया। उनकी मौत की जांच करने वाले आयोग का मानना था कि उन्हें मारने वालों के पीछे बड़ी ताकतें सक्रिय थीं।
भारत के साथ निरंतर तनाव और अफगानिस्तान के लड़ाई ने पाकिस्तान को काफी नुकसान पहुंचाया। वर्ष 2003 और 2013 के बीच 40 हजार से अधिक लोग आतंकवाद के शिकार हुए हैं। साथ ही पाकिस्तान की सुरक्षा पर खर्च बढ़ा है यद्यपि इसका भार बहुत कुछ अमेरिका ने उठाया है। जो भी हो एक आम पाकिस्तानी का देश के बाहर संदेह की निगाह से देखा जाता है। देश के अंदर ऊर्जा का भारी संकट है, चोरी और राज्य ही नहीं बल्कि प्रभावशाली लोगों द्वारा सरकारी संस्थानों के बिलों का भुगतान न करना भारी समस्या है। देश के अंदर रोजगार के अवसर घट रहे हैं इसलिए शिक्षित मध्य वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी देश के बाहर नौकरियों की तलाश का रहे हैं। अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई से पाकिस्तानियों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। तालिवानीकरण के बढ़ते खतरे से लोग च्ंिातित हैं। आम लोगों के सामने एक बड़ा सवाल है कि वे एक दकियानूसी और कट्टर धार्मिक राज्य चाहते हैं या एक आधुनिक, प्रबुद्ध राज्य। इस प्रश्न पर विचार विमर्श एक लम्बे समय तक सैनिक सत्तावाद के कारण बाधित रहा है। वह जुझारू इस्लाम को बढ़ावा देता रहा है। कहना न होगा कि विश्व भर में लोग उसे शक की न•ार से देखते हैं।
लोग चिंतित हैं कि पड़ोसी देश भारत में आ•ाादी के बाद से ही जनतंत्र पनपा है और उसकी जड़ें मजबूत हुई हैं वहीं पाकिस्तान में एक लम्बे समय तक सैनिक शासन रहा है। अब भी सेना का दबदबा बना हुआ है और उसकी गुप्तचर संस्था देश पर हावी है। सेना देश के आंतरिक और बाहरी विरोधियों को दबाने के लिए इस्लाम का इस्तेमाल कर रहा है। आम पाकिस्तानी को न जीवन और न ही संपत्ति की सुरक्षा है। उसे सामाजिक एवं आर्थिक अवसर राज्य की ओर से नहीं मिलते हैं। हिंसा और अनिश्चितता का खतरा लगतार बना हुआ है। पिछले 67 वर्षों के दौरान अब तक पाकिस्तानी यह फैसला नहीं कर पाए हैं कि वे देश की इस्लामी पहचान बनाए रखना चाहते हैं या उसे एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना चाहते हैं। बंगलादेश के अलग होने के बाद पाकिस्तान में भारत की तुलना में काफी कम मुस्लिम आबादी रह गई है। भारत में तो देशी रियासतें कब की खत्म हो चुकी हैं मगर पाकिस्तान में उनका अस्तित्व बना हुआ है। वहां अब भी दस रियासतें मौजूद हैं। पाकिस्तान का धार्मिक आधार 1971 में तब धराशायी हो गया जब बंगलादेश अलग हो गया।
आज पािकस्तान की हालत काफी दयनीय है। वहां शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। जहां तक मीडिया का प्रश्न है वह सरकारी नियंत्रण और बढ़ते वाणिज्यिकरण के बीच झूल रहा है। सैनिक एवं अर्ध सैनिक नियंत्रण के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। अभी हाल तक प्रेस को दबाकर और घूस के जरिए नियंत्रण में रखा जाता रहा है। देश के सामने आनेवाली समस्याओं पर शायद ही स्वतंत्र विचार विमर्श की गुंजाइश है। पाकिस्तान के अंदर शायद ही कभी अकादमिक या राजनीतिक बहस-मुबाहसें की गुंजाइश बनी है।
आयशा जलाल के अनुसार इतिहास की जगह एक कुपरिभाषित इस्लामी विचारधारा को थोपने के कारण एक आलोचनात्मक ऐतिहासिक परंपरा न विकसित हो पाई है और न ही तर्कसंगत सार्वजनिक बहस संभव है। पाकिस्तान के स्कूलों  में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह कृत्रिम राष्ट्रीय मिथकों को बढ़ावा देता है। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अंतर पर जोर दिया जाता है और इस प्रकार पाकिस्तान के अस्तित्व को उचित ठहराया जाता है।

आज पाकिस्तान की स्थिति काफी दयनीय बन गई है। उसे आतंकवादी विचारधारा और धार्मिक उन्माद से ग्रस्त हिंसा का उद्गम बताया जा रहा है। इसी से जुड़ा मुद्दा यह है कि पाकिस्तान का इतिहास वर्ष 1947 से आरंभ होता है अथवा इस्लाम के जन्म के समय से राज्य की इस्लामी पहचान का तालमेल आधुनिक राष्ट्र-राज्य के साथ कैसे बैठाया जाय? मुस्लिम राष्ट्रवाद के सामने यह एक बड़ा सवाल है। यहां एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान कैसे एक राष्ट्र के रूप में तब्दील हो गए और फिर दो राज्यों के बीच विभाजित होगा।
मोहम्मद अली जिन्ना का उदय एक उपनिषदवाद-विरोधी राष्ट्रवादी के रूप में हुआ। वर्ष 1916 में उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के जन्म का स्वागत करते हुए कहा था कि ''एक संयुक्त भारत जन्म के पीछे यह एक बड़ा कारक होगा।ÓÓ यहां तक कि वर्ष 1937 तक उनकी दिलचस्पी अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस के साथ गंठजोड़ करने की थी। उनका नजरिया अधिकतर मुस्लिम राजनेताओं से अलग था। मुसलामानों की दिलचस्पी उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी भारत में स्वायत्त राज्यों तक ही सीमित थी। शेष जगहों में वे चाहते थे कि अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकारों की सुरक्षा की जाय। उस समय तक मुद्दा स्वायत्त राज्यों तक सीमित था जिससे एक राज्य दूसरे पर धौंस नहीं दिखायें।
इसमें बदलाव 1940 के लाहौर अधिवेशन में दिखा जब मुस्लिम लीग ने मांग की कि उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी भारत में मुसलमानों का दबदबा स्वीकार किया जाय। लीग ने सारे भारतीय मुसलमानों की ओर से बोलने का दावा किया। तब तक उनकी ओर से पाकिस्तान की मांग नहीं उठी थी बल्कि उनका जोर मुस्लिम हितों की रक्षा तक ही सीमित था। लाहौर प्रस्ताव में जिन्ना ने देश-विभाजन और पाकिस्तान का कोई जिक्र नहीं किया था। उनका कहना था कि तथाकथित हिन्दू प्रेस ने यह शब्द उनके ऊपर थोपा था। 'पाकिस्तानÓ शब्द वर्ष 1933 में कैम्ब्रिज के एक विद्यार्थी चौधरी रहमत अली की देन है। रहमत अली की कल्पना के पाकिस्तान में पंजाब, अफगानिस्तान (उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत सहित) कश्मीर, सिंध और बलोचिस्तान शामिल थे। ध्यान रहे कि इसमें बंगाल का कोई हिस्सा शामिल न था। यहां पर मुहम्मद इकबाल का जिक्र जरूरी है। उन्होंने देश के विभाजन की कोई बात नहीं की थी। उनका मानना था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। उनका ख्याल था कि मुसलमान अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं का निर्वाह करते हुए वहां रहें। हिन्दुओं के साथ उनका कोई टकराव न हो। इकबाल हर तरह की मुस्लिम दकियानूसी के खिलाफ थे। भारत में स्थापित मुस्लिम राज्य इस्लाम को नई ऊंचाईयों पर ले जाएगा जिसमें ''अरबी साम्राज्यवादÓÓ कोई खलल पैदा नहीं कर पाएगा।
याद रहे कि रहमत अली की कल्पना के पाकिस्तान को खतरनाक और अव्यवहारिक धारणा बतलाकर दरकिनार कर दिया गया। फिर भी शहरी पंजाबी मुसलमानों के एक तबके ने उसे लोक लिया और उसे इकबाल की मुस्लिम राज्य की अवधारणा से जोड़कर देखना आंरभ किया। याद रहे कि इस अवधारणा को बढ़ावा देने में पंजाब और यूपी के हिन्दू स्वामित्व कै अंतर्गत संचालित समाचार पत्रों ने कम भूमिका नहीं निभाई। जहां तक मोहम्मद अली जिन्ना का सवाल है वे काफी हद तक पश्चिमी रंग में रंगे हुए वकील थे और धार्मिक रूढि़वाद से उनका कोई वास्ता नहीं था। किन्तु उन्हें अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए इस्लाम का सहारा लेना पड़ा। यदि वे ग्रामीण मुस्लिम जनता को उभारने की कोशिश करते तो उनका टकराव हिन्दू और मुसलमान दोनों भूमिपतियों से होता। वे इस स्थिति से बचना चाहते थे। उन्होंने यहां पाकिस्तान का सहारा लिया जिससे मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा किया जा सके।
आ•ाादी के कुछ समय पहले क्रिप्स मिशन भारत आया जिसका उद्देश्य किसी न किसी तरह वायसराय की कार्यकारी समिति में कांग्रेस को लाना था। साथ ही उसने प्रांतों को भारत से अलग होने का अधिकार देने की बात की जिससे वे पाकिस्तान की अपनी मांग पर बल दे सकें। क्रिप्स मिशन का प्रयास विफल हो गया। वर्ष 1944 में दक्षिण के नेता राज गोपालाचारी ने पाकिस्तान का प्रस्ताव फिर से आगे रखा जिसमें पंजाब और बंगाल के मुस्लिम बहुमत वाले जिलों को काफी कुछ केन्द्र में स्वायत्तता देने  की बात की गई। कहा गया कि वे भारत में रहें और केन्द्र सरकार को रक्षा, संचार और वाणिज्य को छोड़कर अन्य मामलों में उनकी स्वायत्तता बनी रहे। मगर जिन्ना को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आया। जिन्ना ने मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया और पाकिस्तान की मांग को जोरदार ढंग से दुहराया। उन्होंने पंजाब, बंगाल, सिंघ, और उत्तर- पश्चिम सीमा प्रांत के मुसलमानों को परस्पर जोडऩे की कोशिश की और इस प्रकार पाकिस्तान की अवधारणा को मृर्तरूप देकर आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अल्प संख्यकों के हितों की रक्षा उसी प्रकार की जाएगी जैसे भारत में होती है।

प्रश्न उठता है कि भारत का विभाजन क्यों हुआ जब मुस्लिम लीग मुसलमानों को हिन्दुओं के बराबर दर्जा देने की बात कर रही थी। यह स्थिति 1946 की गर्मियों में बदल गई। ब्रिटिश उपनिवेशवाद नहीं चाहता था कि भारत अखंड रहे और एक सुदृढ़ देश बन कर उभरे। ब्रिटेन और अमेरिका दोनों चाहते थे कि उनकी निजी पूंजी को चरने का पूरा मौका मिले। अखिल भारतीय कांग्रेस के प्रस्तावों तथा प्रस्तावित औद्योगिक नीति को देखते हुए उन्हें संदेह था कि भारत में शायद उनकी निजी पूंजी को बेधड़क चरने का अवसर न मिले इसीलिए वे भारत के विभाजन के पक्षधर बने। उनकी रणनीति थी कि पाकिस्तान बनाकर उसे भारत से भिड़ा दिया जाए और उनको बेरोकटोक काम करने का मौका मिले।

Saturday, 26 December 2015

परवीन शाकिर का पुण्यतिथि पर एक स्मरण

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 5 December 2015

जन्मदिन पर स्मरण :जोश मलीहाबादी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश