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Tuesday, 26 May 2015

'ज्योतिष' विरोधियों एवं एथीस्टों द्वारा ढोंग-पाखंड को बढ़ावा --- विजय राजबली माथुर

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ढ़ोंगी पोंगापंथी और एथीस्ट एक समान
http://communistvijai.blogspot.in/2015/01/blog-post_30.html




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 19 May 2015

अंध श्रद्धा और अंध आलोचना के शिकंजे में भारतीय फलित विद्याएँ /मंगली दोष-ऐश्वर्या राय



*निश्चय ही 'चंद्रमा' का मानव-जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है लेकिन केवल महिला वर्ग पर ही उसे क्यूँ लागू किया जाता है? 
*चूंकि चंद्रमा सूर्यास्त के बाद ही प्रभावी हो पाता है अतः सूर्यास्त के बाद 'जल' का सेवन कम किया जाना चाहिए। लेकिन पोंगापंथी ढोंगवादचंद्रमा को जल चढ़ाने के बाद भोजन करने का गलत विधान पेश करता है। 
*वस्तुतः कोई भी उपवास शाम के वक्त ही किया जाना चाहिए न कि दिन के समय। भोजन के बाद प्यास अधिक लगती है और जल अधिक लेना पड़ता है अतः गलत निष्कर्षों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के कारण ठुकराया जाना चाहिए और 'करवा-चौथ' जैसे  शोषणकारी  ढोंगों को समाप्त किया जाना चाहिए।
(विजय राजबली माथुर )

Sanjiv Verma 'salil'
अंध श्रद्धा और अंध आलोचना के शिकंजे में भारतीय फलित विद्याएँ:
भारतीय फलित विद्याओं (ज्योतषशास्त्र, सामुद्रिकी, हस्तरेखा विज्ञान, अंक ज्योतिष आदि) तथा धार्मिक अनुष्ठानों (व्रत, कथा, हवन, जाप, यज्ञ आदि) के औचित्य, उपादेयता तथा प्रामाणिकता पर प्रायः प्रश्नचिन्ह लगाये जाते हैं. इनपर अंधश्रद्धा रखनेवाले और इनकी अंध आलोचना रखनेवाले दोनों हीं विषयों के व्यवस्थित अध्ययन, अन्वेषणों तथा उन्नयन में बाधक हैं. शासन और प्रशासन में भी इन दो वर्गों के ही लोग हैं. फलतः इन विषयों के प्रति तटस्थ-संतुलित दृष्टि रखकर शोध को प्रोत्साहित न किये जाने के कारण इनका भविष्य खतरे में है.
हमारे साथ दुहरी विडम्बना है:
१. हमारे ग्रंथागार और विद्वान सदियों तक नष्ट किये गए. बचे हुए कभी एक साथ मिल कर खोये को दुबारा पाने की कोशिश न कर सके. बचे ग्रंथों को जन्मना ब्राम्हण होने के कारण जिन्होंने पढ़ा वे विद्वान न होने के कारण वर्णित के वैज्ञानिक आधार नहीं समझ सके और उसे ईश्वरीय चमत्कार बताकर पेट पालते रहे. उन्होंने ग्रन्थ तो बचाये पर विद्या के प्रति अन्धविश्वास को बढ़ाया। फलतः अंधविरोध पैदा हुआ जो अब भी विषयों के व्यवस्थित अध्ययन में बाधक है.
२. हमारे ग्रंथों को विदेशों में ले जाकर उनके अनुवाद कर उन्हें समझ गया और उस आधार पर लगातार प्रयोग कर विज्ञान का विकास कर पूरा श्रेय विदेशी ले गये. अब पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से पढ़े और उस का अनुसरण कर रहे हमारे देशवासियों को पश्चिम का सब सही और पूर्व का सब गलत लगता है. लार्ड मैकाले ने ब्रिटेन की संसद में भारतीय शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन पर हुई बहस में जो अपन लक्ष्य बताया था, वह पूर्ण हुआ है.
इन दोनों विडम्बनाओं के बीच भारतीय पद्धति से किसी भी विषय का अध्ययन, उसमें परिवर्तन, परिणामों की जाँच और परिवर्धन असीम धैर्य, समय, धन लगाने से ही संभव है.
अब आवश्यक है दृष्टि सिर्फ अपने विषय पर केंद्रित रहे, न प्रशंसा से फूलकर कुप्पा हों, न अंध आलोचना से घबरा या क्रुद्ध होकर उत्तर दें. इनमें शक्ति का अपव्यय करने के स्थान पर सिर्फ और सिर्फ विषय पर केंद्रित हों.
संभव हो तो राष्ट्रीय महत्व के बिन्दुओं जैसे घुसपैठ, सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा (भूकंप, तूफान. अकाल, महत्वपूर्ण प्रयोगों की सफलता-असफलता) आदि पर पर्याप्त समयपूर्व अनुमान दें तो उनके सत्य प्रमाणित होने पर आशंकाओं का समाधान होगा। ऐसे अनुमान और उनकी सत्यता पर शीर्ष नेताओं, अधिकारियों-वैज्ञानिकों-विद्वानों को व्यक्तिगत रूप से अवगत करायें तो इस विद्या के विधिवत अध्ययन हेतु व्यवस्था की मांग की जा सकेगी।
साभार :
https://www.facebook.com/sanjiv.salil/posts/10203046678030084 





मंगली दोष-ऐश्वर्या राय :
*ढ़ोंगी पंडितों के परामर्श पर अमिताभ बच्चन,अनिल अंबानी व अमर सिंह ने 50-50-50 लाख रुपए एक मंदिर में दान दिये थे और मान लिया था कि 'मंगली दोष' समाप्त हो गया है। यदि ऐसा हुआ तब 20 अप्रैल 2014 के हिंदुस्तान में 'मतभेद' की खबरें कैसे छ्प गईं?
*वस्तुतः 'मंगली दोष' का निवारण मंदिरों में दान देने से नहीं होता है वह तो महज़ एक पाखंड के सिवा कुछ नहीं है। इसके लिए 'वर' और 'कन्या' दोनों के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के अनुसार 'मंगली योग' होने चाहिए। तब संतुलन बना रहता है। जन्मकालीन ग्रहों को पुजारी या मंदिर में दान देने से नहीं बदला जा सकता है। 
* 'मंगल' एवं सूर्य',शनि,राहू,केतू  में कोई एक भी यदि किसी जन्म-कुंडली में लग्न, चतुर्थ, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित हो तो कुंडली 'मंगली दोष' वाली है उसके समाधान के लिए वैसे योगों से युक्त कुंडली से ही 'गुणों' का मिलान किया जाना चाहिए। 
धनाढ्य लोग खुद तो गलत करते ही हैं साथ ही साथ गलत लोगों को प्रोत्साहित भी करते हैं जिससे साधारण जनता का अहित होता है और प्रतिक्रिया स्वरूप 'ज्योतिष विरोध' भी।
(विजय राजबली माथुर )
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 25 June 2013

ये प्रगतिशील नहीं पोंगापंथियों के संरक्षक हैं---विजय राजबली माथुर

 कुछ लोग फेसबुक आदि पर उत्तराखंड,दिल्ली आदि में वर्षा-बाढ़ की तबाही से चिंता प्रकट कर रहे हैं किन्तु समय रहते बचाव के उपाय करना उन्ही लोगों को पसंद नहीं हैं। अभी 14 जून तक 'सूर्य' और 'मंगल' वृष राशि में थे जिस का भी प्रभाव रहा और इसके अलावा 8 मई शनिवार को 'अमावस्या' एवं 23 जून रविवार को 'पूर्णिमा' पड़ने का ही यह प्रभाव है। आजकल वैज्ञानिक 'हवन'-'यज्ञ'पद्धति को ठुकरा कर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म के नाम पर महिमामंडित करने का यह प्राकृतिक पुरस्कार है। चाहे सहर्ष स्वीकार करें अथवा चिंतित होकर जब उपाय नहीं करेंगे तो पीड़ा तो होगी ही।
जब तक हवन पद्धति प्रचलन में रही प्राकृतिक प्रकोप नियंत्रण में रहे क्योंकि अब मनुष्य प्रकृति के स्थान पर 'जड़' की पूजा करता है तो प्रकृति की कृपा कहाँ से?कैसे हो?
........ 
ह जानते हुये भी कि खुद को 'प्रगतिशील',वामपंथी,विज्ञान प्रेमी आदि-आदि घोषित करने वाले लोग इसका विरोध करके पोंगा-पंथ को संरक्षण प्रदान करेंगे।   
 मैंने समय-समय पर ब्लाग्स व फेसबुक के माध्यम से चेतावनियाँ दी हैं और उपहास  का पात्र तथाकथित वामपंथी-प्रगतिशीलों  एवं पोंगापंथियों दोनों के द्वारा बनाया गया हूँ। ये प्रगतिशील नहीं पोंगापंथियों के संरक्षक हैं। 


 'कुम्भ' हादसा एवं उल्का पिंड गिरने से पूर्व लिखा था-
http://krantiswar.blogspot.in/2013/01/blog-post_15.html

"04 जनवरी 2013 को शुक्र के धनु राशि मे प्रवेश से उसका वृष राशि के गुरु से 180 डिग्री का संबंध
बना जिसके फल स्वरूप सीमा पर विवाद-गोली चालन,सैनिकों की हत्या आदि घटनाएँ घटित हुईं।.................
28 जनवरी को शुक्र ग्रह मकर राशि मे सूर्य के साथ आएगा जो 12 फरवरी तक .... परिणाम स्वरूप शीत लहरें चलेंगी,हिम प्रपात,नभ-गर्जना के योग होंगे। जन-धन की क्षति होगी। 12 फरवरी से 03 मार्च 2013 तक सूर्य और मंगल कुम्भ राशि मे एक साथ होंगे जिसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया मे भू-क्रंदन और आपदा के योग रहेंगे।"

18 मार्च 2013 को लिखा था- http://vijaimathur.blogspot.in/2013/03/blog-post_18.html 11 मार्च,2013 को प्रकाशित समाचार मे मौसम विभाग की आशंका प्रकाशित हुई थी जो ज्योतिष के आंकलन के अनुरूप ही थी और 15 मार्च को प्रकाशित समाचार द्वारा उसके सही सिद्ध होने की पुष्टि भी हो गई। 'कोटा',राजस्थान के जिन महान ज्ञाता की टिप्पणी उस सूचना के विरुद्ध आई थी उनके राजस्थान मे भी तेज़ आंधी और बारिश होने की सूचना फेसबुक पर वहीं के लोगों ने दी थी और 'मोहाली' मे तो क्रिकेट मैच भी बारिश के कारण स्थगित करना पड़ा था। तथाकथित प्रगतिशील/वैज्ञानिक विद्वान वास्तव मे पोंगापंथियों/शोषकों के उत्पीड़न और शोषण पर पर्दा डालने हेतु ही जनता को वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं होने देना चाहते हैं तभी जागरूकता के प्रयासों की निंदा व विरोध करते हैं। इन जन-विरोधी लोगों से सदा ही सतर्क रहना चाहिए। 



 26 मई को यह लिखा था-http://krantiswar.blogspot.in/2013/05/blog-post_26.html
 04 मई से 29 मई 2013 तक वृष राशि में 'गुरु' व 'शुक्र' ग्रह एक साथ होने का परिणाम है आज कल ग्रीष्म का प्रचंड -प्रकोप । 'राहू' व 'मंगल' तथा 'शनि' व 'मंगल' के मध्य बना 180 डिग्री का संबंध अमेरिका के तूफानी बवंडर ,बस्तर आदि की आतंकवादी  घटनाओं के कारक हैं (निर्णय सागर पंचांग के पृष्ठ-32एवं 33 पर पूर्व चेतावनी दी गई थी-
"राहू भौम सप्तम गति,शनि भौम संम सप्त। 
भूक्रंदनजन धन क्षति,मनसा मानस तप्त। । 
चक्रवात आंधी पवन,सागर देश विदेश। 
संहारक रचना गति,जन धन मध्य विशेष। । "

26 मई से 23 जून के मध्य सीमा क्षेत्रों में यातना तथा सम्पूर्ण विश्व में आतंकवादी हिंसा बढ्ने की चेतावनी दी गई है। 
परंतु खेद के साथ कहना और लिखना पड़ रहा है  कि कोई भी इस ओर उसी प्रकार ध्यान नहीं देगा जैसा कि पूर्व में हुआ था जो कि निम्नांकित के अवलोकन से सिद्ध हो जाएगा। :-----
 


बुधवार, 6 अप्रैल 2011
[२७ अप्रैल २०१० को लखनऊ के एक स्थानीय समाचार पत्र में पूर्व प्रकाशित आलेख ]


दंतेवाडा त्रासदी - समाधान क्या है? http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_06.html




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Friday, 10 May 2013

लुटेरों से सावधान रहें---विजय राजबली माथुर

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समाचार पत्रों,रेडियो,टेलीविज़न,सूचना-प्रसारण आदि के द्वारा पोंगा पंडित गण 10 मई को सूर्य ग्रहण और उस हेतु दान -पुण्य करने का विभ्रम फैलाएँगे जैसा कि 25-26 अप्रैल 2013 के चंद्र ग्रहण के बारे में किया था। लेकिन कंक्णाकृति यह सूर्य ग्रहण  भी भारत में मान्य नहीं है। केवल इन्डोनेशिया-मलेशिया-आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड तथा पेसेफिक महासागर आदि प्रदेश संभाग में सुदृश्य होगा।
इसके बाद 03 नवंबर 2013 को पड़ने वाला चंद्र ग्रहण भी भारत मे नहीं दीखने के कारण मान्य नहीं होगा। किन्तु परोप जीवी पोंगा पंडित अपनी पेट-पूजा के लिए जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते हैं और गुमराह करते हैं ,उनसे सतर्क व सावधान रहने की आवश्यकता है। 
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Monday, 18 March 2013

जन-विरोधियों से सतर्क रहें---विजय राजबली माथुर

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हिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक-15 मार्च,2013 मे प्रकाशित समाचार---



11 मार्च,2013 को प्रकाशित समाचार मे मौसम विभाग की आशंका प्रकाशित हुई थी जो ज्योतिष के आंकलन के अनुरूप ही थी और 15 मार्च को प्रकाशित समाचार द्वारा उसके सही सिद्ध होने की पुष्टि भी हो गई। 'कोटा',राजस्थान के जिन महान ज्ञाता की टिप्पणी उस सूचना के विरुद्ध आई थी उनके राजस्थान मे भी तेज़ आंधी और बारिश होने की सूचना फेसबुक पर वहीं के लोगों ने दी थी और 'मोहाली' मे तो क्रिकेट मैच भी बारिश के कारण स्थगित करना पड़ा था। तथाकथित प्रगतिशील/वैज्ञानिक विद्वान वास्तव मे पोंगापंथियों/शोषकों के उत्पीड़न और शोषण पर पर्दा डालने हेतु ही जनता को वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं होने देना चाहते हैं तभी जागरूकता के प्रयासों की निंदा व विरोध करते हैं। इन जन-विरोधी लोगों से सदा ही सतर्क रहना चाहिए। 

(संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर)

Sunday, 2 September 2012

उल्टी और डकार


भर्त्सना

अरुण चन्द्र रॉय said...

"यह तो होना ही था... शास्त्री जी आप जैसे यशस्वी और अनुभवी साहित्यकार को उस फार्स (farce) कार्यक्रम में जाना ही नहीं चाहिए था. क्या गत वर्ष की अवास्य्स्था और बंदरबाट भूल गए थे आप... गत वर्ष के कार्यक्रम की रूपरेखा जो हिंदी साहित्य निकेतन ने तय की थी वह वैसी रही और वहां भी ब्लॉग सत्र को स्क्रैप कर दिया गया था. यहाँ भी सूना है कि वैसा ही हुआ है.... शिवमूर्ति जैसे कथाकार को बुलाकर बेईज्ज़त करना शर्मनाक है... यदि आप ब्लोगर को आमंत्रित करते हैं तो उन्हें सम्मान देना चाहिए.... यह कार्यक्रम तीन लोगों का व्यक्तिगत कार्यक्रम था...वटवृक्ष के ब्लोगर विशेषांक के अवसर पर उसके संपादक का न रहना भी दुखद है... गत वर्ष के अनुभव से शायद वे न आई हों..... खैर.... हम इसकी भर्त्सना करते हैं..... "


सम्मान समारोह : ब्लागिंग का ब्लैक डे !

"1- पूरी हो गई "अलीबाबा 40 चोर" की टीम।
2-नाराजगी शिखा वार्ष्णेय से भी है। आप मंचासीन थीं, आप नहीं जानतीं कि रुपचंद्र शास्त्री जी का हिंदी ब्लागिग और ब्लागर के बीच क्या सम्मान है। इस पर तो हिंदी ब्लागर में वोटिंग करा ली जानी चाहिए कि क्या शास्त्री जी को मंच पर स्थान नहीं मिलना चाहिए था ? मुझे पता है कि जब लोग देश छोडकर बाहर जाते हैं तो अपनी संस्कृति  और सभ्यता से भी बहुत दूर हो जाते हैं। वरना शिखा से ऐसी  उम्मीद नहीं की जा सकती थी। उन्हें चाहिए था कि वो अपना स्थान शास्त्री जी के लिए खाली करतीं, इससे आयोजक मजबूर हो जाते एक वरिष्ठ ब्लागर को सम्मान देने के लिए।
3- एक ब्लागर की बात तो मैं आज भी नहीं भूल पाया हू, जिन्होंने मुझे बताया कि उन्हें "वटवृक्ष" का सह संपादक बनाने के लिए पैसे लिए गए।"

संपादक-प्रकाशक गठजोड़-

जो ब्लागर्स अपने नाम के प्रचार के ख़्वाहिशमंद होते हैं उनके इस लालच को भुनाने मे माहिर उक्त संपादक उनसे हजारों मे रकम एंठ कर पुस्तकें छ्पवाता रहता है। स्व्भाविक रूप से पुस्तकें प्रकाशक लोग ही छापते हैं जिंनका धंधा उक्त संपादक के सहारे चलता रहता है। फलतः यदि ऐसे प्रकाशक उक्त संपादक की आड़ लेकर हल्ला करते हैं तो विस्मय की कोई बात नहीं है यह तो व्यापीरिक रिश्ते निभाने का उनका अपना फर्ज़ ही है।  

वस्तुतः  "वटवृक्ष" का सह संपादक बनाने के लिए पैसे लिए गए।"---जैसा कि तमाम ब्लागर्स ने पीड़ा व्यक्त की कि उक्त सम्पादक महोदया ही ने उनको फोन करके हजारों मे रकम की मांग करके 'वटवृक्ष' पत्रिका से जोड़ने की बात कही थी जिन लोगों ने रकम नहीं दी वे नहीं जुड़े जिसने दी होगी वह जुड़ गया होगा।

   यदि वटवृक्ष पत्रिका के मालिकान कारपोरेट घराना होते तो अब तक सम्पादक को कान पकड़ कर हटा चुके होते। लेकिन सम्पादक उनके विरुद्ध लगातार लामबंदी करके विष-वमन करता जा रहा है सिर्फ उनको ब्लैकमेल करने हेतु। अपने बच्चों के एंगेजमेंट करना ,धन बटोरना और फिर रिश्ता तोड़ना यही धंधा है उन सम्पादक का।

    • "उंगलियाँ इतनी लचीली होती हैं
      कि फट से उठ जाती हैं किसी पर
      अपनी हार पर बौखला कर
      सबसे सरल तरीका है
      ऊँगली उठाना !
      ...
      सामनेवाला कोई शिकायत न रख दे
      बेहतर है उससे शिकायत कर अपना रास्ता साफ़ कर लेना ...

      सौ प्रतिशत सही कौन होता है दोस्त
      मेरी कमी तो तुम कह गए
      रिश्ते का मान उतार गए
      अब तो अपनी कमी देखो मेरे दोस्त !

      कहनेवालों ने तुम्हारे लिए भी बहुत कहा
      हमने अनसुना किया
      प्रश्न उठाकर तुमसे
      तुम्हें रुसवा न किया
      तुमने जो भी कहा मुझसे
      बस उसी पर ऐतबार किया ...

      बड़े मनोयोग से तुम मेरी तस्वीर बनाते गए
      दूसरी तरफ उसमें आग लगाते गए
      तस्वीर देख लोगों ने तुमको खुदा मान लिया
      राख के ढेर में हम
      खामोश होकर रह गए ...

      प्यार - पूजा
      शब्द - आरती ...
      सोचकर बढ़ती गई
      ये तो वक़्त ने है बताया
      खून की पगडंडियाँ बनती गयी !..."

      माँजरा क्या है सब समझ सकते हैं सम्पादक महोदया के  इस उद्बोधन से।

यह एक हकीकत है कि उक्त सम्पादक जी काव्य रचयिता ब्लागर्स से हजारों की रकम लेकर कभी किसी कभी किसी प्रकाशक के यहाँ से पुस्तकें छपवा कर अपना व्यापार चलाती हैं। जब ब्लागर्स शोहरत के लालच मे धन व्यय करने को लालायित हैं तो वह कोई समस्या नहीं है। लेकिन यदि 'वटवृक्ष' के सम्पादक के नाते रकम एंठी गई होगी और मालिकान से छिप कर तब तो 'समस्या' उठी ही होगी। ताज्जुब यह है कि पत्रिका के मालिकान ने किस भय से सम्पादक के विरुद्ध कारवाई नहीं की और उनको अपने विरुद्ध हल्ला मचाने की छूट प्रदान कर दी?

सम्मान गलत हुआ हो या सही ,जिनका सम्मान हुआ उनको 40 चोर कहने का क्या औचित्य?कहने वाले ब्लागर साहब कारपोरेट घराने की मज़ेदार नौकरी मे हैं। वह उक्त संपादक महोदया के पूना निवास पर पाँच घंटे बिता कर-चाय,नाश्ता,खाना,मीट,मुर्गा,मच्छी खा कर और शराब आदि से जो मेहमान नवाज़ी करा कर आए थे उसी की 'डकार' और 'उल्टी' है उनका यह अभद्र,अश्लील,असामाजिक लेखन। किसी भी आयोजन मे उसके आयोजकों द्वारा निर्धारित व्यक्ति किसी दूसरे को अपनी मंचस्थ 'कुर्सी' किस अधिकार से हस्तांतरित कर सकता है?क्या चेनल शास्त्र मे ऐसा होता है?

यह ब्लागर साहब संकीर्ण पोंगापंथी ढ़ोंगी विचार-धारा के ध्वजा वाहक हैं और 'हवन' जैसी वैज्ञानिक पद्धति के विरोधी। यह पुरोहितवाद के संरक्षण के हिमायती हैं । ज्योतिष के मेरे वैज्ञानिक विश्लेषण की खिल्ली इनके ही ब्लाग पर उक्त संपादक महोदया ने तब उड़ाई थी जबकी  अपने बच्चों की चार कुंडलियों का विश्लेषण मुझसे करा चुकी थीं और 'रेखा के राजनीति'मे आने का मेरा विश्लेषण सही सिद्ध हो चुका था।  अतः उनका लेखन मुझे तो 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे' ही लगता है।

Tuesday, 14 August 2012

सुंदर,सुखद,समृद्ध जीवन बनाएँ






·



'बकवास' कहना और लिखना कितना आसदान है लेकिन क्या ग्रहों की चाल को रोका या टाला जा सकता है?यदि हाँ तो वित्त मंत्रालय,महाराष्ट्र के सी एम आफिस,नेल्लोर मे तामिल नाडू एक्स्प्रेस मे अग्निकांड क्यों नहीं रोके जा सके। ईरान की भूकंप त्रासदी को क्यों नहीं रोका जा सका। ईरान का घोर शत्रु भी आज ईरान को मानवीय मदद का प्रस्ताव दे रहा है पहले उसके वैज्ञानिकों ने चेतावनी देकर आबादी को क्यों नहीं हटवाया या भूकंप को रोक लिया।लेकिन विरोध के लिए विरोध करना फैशन है तो करते हैं जन-कल्याण बाधित करने के लिए।

राजनेताओं मे कैप्टन डॉ  लक्ष्मी सहगल,के बाद केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख को भी क्यों नहीं बचाया जा सका?

यू पी सरकार के नेताओं मे मतभेदों के बारे मे भी आंकलन पहले ही दिया जा चुका है। 
http://krantiswar.blogspot.in/2012/03/blog-post_16.html?

हाँ बचाव हो सकता है यदि वैज्ञानिक विधि से 'हवन' का सहारा लिया जाये तो। चेतावनी देने का अभिप्राय बचाव के वैज्ञानिक उपाय अपनाने का अवसर प्रदान करना होता है। 'बकवास' नहीं जैसा कि विदेश स्थित प्रो साहब के अनुयाई कहते हैं। 












 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Thursday, 21 July 2011

अतीत के ज्योतिष्यात्मक राजनीतिक विश्लेषण---विजय राजबली माथुर

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अभी ०२ जुलाई २०११ को 'क्रन्तिस्वर' में कुछ ज्योतिश्यात्मक विश्लेषण दिए थे और १०,११,१२ जुलाई को रेल हादसे तथा १३ जुलाई को मुम्बई में हुई आतंकवादी गतिविधियां सभी गृह-नक्षत्रों के प्रभाव से हैं.तमाम वैज्ञानिक ज्योतिष को अवैज्ञानिक ठहराते हैं क्योंकि प्रचलित ज्योतिषी गण इसे अवैज्ञानिक और अधार्मिक गतिविधियों से जोड़ कर धर्म कह कर परोसते हैं.वस्तुतः किन्हीं व्यक्ति-विशेषों द्वारा की गई गलतियों के कारण ज्योतिष की वैज्ञानिकता नहीं समाप्त हो जाती है.किसी विद्वान का कहना है-

समय करे,नर क्या करे,समय बड़ा बलवान.
असर ग्रह सब पर करें,परिंदा-पशु-इंसान..

१२ जुलाई २०११ को 'समझदारों की नासमझी' शीर्षक से मैंने ०२ जुलाई वाले विश्लेषणों की और ध्यानाकर्षण किया था.उसमें आगे के लिए और भी घटनाओं को इंगित किया गया है.मात्र डा.मोनिका शर्मा जी और अल्पना वर्मा जी ने सकारात्मक प्रतिक्रया दी है.बाकी विद्वान तो ज्योतिष को बकवास मानते हैं.उनकी जानकारी हेतु -०४ से १० ,११ से १७ और १८ से २४ सितम्बर,२००३तथा २२-२८ अप्रैल २००४ के अंकों  में 'ब्रह्मपुत्र समाचार',आगरा में पूर्व प्रकाशित अपने लेखों की स्कैन कापियां प्रस्तुत कर रहा हूँ.इनसे स्पष्ट होगा कि मेरे विश्लेषण तो सही गए किन्तु उन पर वांक्षित लोगों ने ध्यान नहीं दिया इसलिए हानि का उन्हें सामना करना पड़ा

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http://krantiswar.blogspot.com/2011/07/blog-post_18.html

    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर