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Sunday, 12 November 2017

हवा में बढ़ते जहर का समाधान : ' हवन ' ------ विजय राजबली माथुर

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भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे ? निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग ' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु राजीव गांधी सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन ' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था।अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिसेज पेट्रिसिया हेमिल्टन ने भोपाल के उप नगर (15 किलो मीटर दूर ) बेरागढ़ के समीप माधव आश्रम मे स्वीकार किया था कि'होम -चिकित्सा'अमेरिका,चिली और पोलैंड मे प्रासंगिक हो रही है। राजधानी वाशिंगटन (डी सी ) मे "अग्निहोत्र विश्वविद्यालय"की स्थापना हो चुकी है । बाल्टीमोर मे तो 04 सितंबर 1978 से ही लगातार 'अखंड हवन ' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो, मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव ,अन्ना हज़ारे ,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है एक विद्वान ने यह बताया है-

परम पिता से प्यार नहीं ,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 

फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 । ।

मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 

जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 

सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । । 

"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"-यह निष्कर्ष 35 वर्ष आर एस एस मे रह कर और उससे दुखी होकर अलग होने वाले सोरो निवासी आचार्य राम किशोर जी(पूर्व प्राचार्य ,संस्कृत महाविद्यालय,हापुड़)का है। 


आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं। राम ने जो त्याग किया और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज फिर से देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप 'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।

          यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल -काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग 'हवन 'करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन ' अर्थात 'यज्ञ ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।

होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है .... 


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 19 February 2013

होली मनाएँ-पौधे न जलायेँ---विजय राजबली माथुर

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हिंदुस्तान,लखनऊ,19 फरवरी 2013,पृष्ठ-07




स्वामी स्वरूपानन्द जी  आयुर्वेद मे MD  थे ,प्रेक्टिस करके खूब धन कमा सकते  थे लेकिन जन-कल्याण हेतु सन्यास ले लिया था और पोंगा-पंथ के दोहरे आचरण से घबराकर आर्यसमाजी बन गए थे। उन्होने 20 वर्ष तक पोंगा-पंथ के महंत की भूमिका मे खुद को अनुपयुक्त पा कर आर्यसमाज की शरण ली थी और जब हम उन्हें सुन रहे थे उस वक्त वह 30 वर्ष से आर्यसमाजी प्रचारक थे। स्वामी स्वरूपानन्द जी स्पष्ट कहते थे जिन लोगों की आत्मा 'तामसिक' और हिंसक प्रवृति की होती है उन्हें दूसरों को पीड़ा पहुंचाने मे आनंद आता है और ऐसा वे धमाका करके उजागर करते हैं। यही बात होली पर 'टेसू' के फूलों के स्थान पर सिंथेटिक रंगों,नाली की कीचड़,गोबर,बिजली के लट्ठों का पेंट,कोलतार आदि का प्रयोग करने वालों के लिए भी वह बताते थे। उनका स्पष्ट कहना था जब प्रवृतियाँ 'सात्विक' थीं और लोग शुद्ध विचारों के थे तब यह गंदगी और खुराफात (पटाखे /बदरंग)समाज मे दूर-दूर तक नहीं थे। गिरते चरित्र और विदेशियों के प्रभाव से पटाखे दीपावली पर और बदरंग होली पर स्तेमाल होने लगे।

दीपावली/होली क्या हैं?

हमारा देश भारत एक कृषि-प्रधान देश है और प्रमुख दो फसलों के तैयार होने पर ये दो प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। खरीफ की फसल आने पर धान से बने पदार्थों का प्रयोग दीपावली -हवन मे करते थे और रबी की फसल आने पर गेंहूँ,जौ,चने की बालियों (जिन्हें संस्कृत मे 'होला'कहते हैं)को हवन की अग्नि मे अर्द्ध - पका कर खाने का प्राविधान  था।  होली पर अर्द्ध-पका 'होला' खाने से आगे आने वाले 'लू'के मौसम से स्वास्थ्य रक्षा होती थी एवं दीपावली पर 'खील और बताशे तथा खांड के खिलौने'खाने से आगे शीत  मे 'कफ'-सर्दी के रोगों से बचाव होता था। इन पर्वों को मनाने का उद्देश्य मानव-कल्याण था। नई फसलों से हवन मे आहुतियाँ भी इसी उद्देश्य से दी जाती थीं।

लेकिन आज वेद-सम्मत प्रविधानों को तिलांजली देकर पौराणिकों ने ढोंग-पाखंड को इस कदर बढ़ा दिया है जिस कारण मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा बना हुआ है। आज यदि कोई चीज सबसे सस्ती है तो वह है -मनुष्य की जिंदगी। छोटी-छोटी बातों पर व्यक्ति को जान से मार देना इन पौराणिकों की शिक्षा का ही दुष्परिणाम है। गाली देना,अभद्रता करना ,नीचा दिखाना और खुद को खुदा समझना इन पोंगा-पंथियों की शिक्षा के मूल तत्व हैं। इसी कारण हमारे तीज-त्योहार विकृत हो गए हैं उनमे आडंबर-दिखावा-स्टंट भर  गया है जो बाजारवाद की सफलता के लिए आवश्यक है। पर्वों की वैज्ञानिकता को जान-बूझ कर उनसे हटा लिया गया है ।


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Saturday, 3 November 2012

पूजा क्या,क्यों और कैसे?

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 आए दिन अखबारों मे पढ़ने को मिलता है कि किसी मंदिर,आश्रम आदि मे भगदड़ मचने से जन-धन हानि हो गई। यह भेद-चाल कोई धर्म नहीं है न ही पूजा। वास्तविक पूजा क्या ,क्यों और कैसे हो 7-8 वर्ष पूर्व अग्र मंत्र पत्रिका आगरा मे प्रकाशित इस लेख से समझें---




संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Sunday, 2 September 2012

उल्टी और डकार


भर्त्सना

अरुण चन्द्र रॉय said...

"यह तो होना ही था... शास्त्री जी आप जैसे यशस्वी और अनुभवी साहित्यकार को उस फार्स (farce) कार्यक्रम में जाना ही नहीं चाहिए था. क्या गत वर्ष की अवास्य्स्था और बंदरबाट भूल गए थे आप... गत वर्ष के कार्यक्रम की रूपरेखा जो हिंदी साहित्य निकेतन ने तय की थी वह वैसी रही और वहां भी ब्लॉग सत्र को स्क्रैप कर दिया गया था. यहाँ भी सूना है कि वैसा ही हुआ है.... शिवमूर्ति जैसे कथाकार को बुलाकर बेईज्ज़त करना शर्मनाक है... यदि आप ब्लोगर को आमंत्रित करते हैं तो उन्हें सम्मान देना चाहिए.... यह कार्यक्रम तीन लोगों का व्यक्तिगत कार्यक्रम था...वटवृक्ष के ब्लोगर विशेषांक के अवसर पर उसके संपादक का न रहना भी दुखद है... गत वर्ष के अनुभव से शायद वे न आई हों..... खैर.... हम इसकी भर्त्सना करते हैं..... "


सम्मान समारोह : ब्लागिंग का ब्लैक डे !

"1- पूरी हो गई "अलीबाबा 40 चोर" की टीम।
2-नाराजगी शिखा वार्ष्णेय से भी है। आप मंचासीन थीं, आप नहीं जानतीं कि रुपचंद्र शास्त्री जी का हिंदी ब्लागिग और ब्लागर के बीच क्या सम्मान है। इस पर तो हिंदी ब्लागर में वोटिंग करा ली जानी चाहिए कि क्या शास्त्री जी को मंच पर स्थान नहीं मिलना चाहिए था ? मुझे पता है कि जब लोग देश छोडकर बाहर जाते हैं तो अपनी संस्कृति  और सभ्यता से भी बहुत दूर हो जाते हैं। वरना शिखा से ऐसी  उम्मीद नहीं की जा सकती थी। उन्हें चाहिए था कि वो अपना स्थान शास्त्री जी के लिए खाली करतीं, इससे आयोजक मजबूर हो जाते एक वरिष्ठ ब्लागर को सम्मान देने के लिए।
3- एक ब्लागर की बात तो मैं आज भी नहीं भूल पाया हू, जिन्होंने मुझे बताया कि उन्हें "वटवृक्ष" का सह संपादक बनाने के लिए पैसे लिए गए।"

संपादक-प्रकाशक गठजोड़-

जो ब्लागर्स अपने नाम के प्रचार के ख़्वाहिशमंद होते हैं उनके इस लालच को भुनाने मे माहिर उक्त संपादक उनसे हजारों मे रकम एंठ कर पुस्तकें छ्पवाता रहता है। स्व्भाविक रूप से पुस्तकें प्रकाशक लोग ही छापते हैं जिंनका धंधा उक्त संपादक के सहारे चलता रहता है। फलतः यदि ऐसे प्रकाशक उक्त संपादक की आड़ लेकर हल्ला करते हैं तो विस्मय की कोई बात नहीं है यह तो व्यापीरिक रिश्ते निभाने का उनका अपना फर्ज़ ही है।  

वस्तुतः  "वटवृक्ष" का सह संपादक बनाने के लिए पैसे लिए गए।"---जैसा कि तमाम ब्लागर्स ने पीड़ा व्यक्त की कि उक्त सम्पादक महोदया ही ने उनको फोन करके हजारों मे रकम की मांग करके 'वटवृक्ष' पत्रिका से जोड़ने की बात कही थी जिन लोगों ने रकम नहीं दी वे नहीं जुड़े जिसने दी होगी वह जुड़ गया होगा।

   यदि वटवृक्ष पत्रिका के मालिकान कारपोरेट घराना होते तो अब तक सम्पादक को कान पकड़ कर हटा चुके होते। लेकिन सम्पादक उनके विरुद्ध लगातार लामबंदी करके विष-वमन करता जा रहा है सिर्फ उनको ब्लैकमेल करने हेतु। अपने बच्चों के एंगेजमेंट करना ,धन बटोरना और फिर रिश्ता तोड़ना यही धंधा है उन सम्पादक का।

    • "उंगलियाँ इतनी लचीली होती हैं
      कि फट से उठ जाती हैं किसी पर
      अपनी हार पर बौखला कर
      सबसे सरल तरीका है
      ऊँगली उठाना !
      ...
      सामनेवाला कोई शिकायत न रख दे
      बेहतर है उससे शिकायत कर अपना रास्ता साफ़ कर लेना ...

      सौ प्रतिशत सही कौन होता है दोस्त
      मेरी कमी तो तुम कह गए
      रिश्ते का मान उतार गए
      अब तो अपनी कमी देखो मेरे दोस्त !

      कहनेवालों ने तुम्हारे लिए भी बहुत कहा
      हमने अनसुना किया
      प्रश्न उठाकर तुमसे
      तुम्हें रुसवा न किया
      तुमने जो भी कहा मुझसे
      बस उसी पर ऐतबार किया ...

      बड़े मनोयोग से तुम मेरी तस्वीर बनाते गए
      दूसरी तरफ उसमें आग लगाते गए
      तस्वीर देख लोगों ने तुमको खुदा मान लिया
      राख के ढेर में हम
      खामोश होकर रह गए ...

      प्यार - पूजा
      शब्द - आरती ...
      सोचकर बढ़ती गई
      ये तो वक़्त ने है बताया
      खून की पगडंडियाँ बनती गयी !..."

      माँजरा क्या है सब समझ सकते हैं सम्पादक महोदया के  इस उद्बोधन से।

यह एक हकीकत है कि उक्त सम्पादक जी काव्य रचयिता ब्लागर्स से हजारों की रकम लेकर कभी किसी कभी किसी प्रकाशक के यहाँ से पुस्तकें छपवा कर अपना व्यापार चलाती हैं। जब ब्लागर्स शोहरत के लालच मे धन व्यय करने को लालायित हैं तो वह कोई समस्या नहीं है। लेकिन यदि 'वटवृक्ष' के सम्पादक के नाते रकम एंठी गई होगी और मालिकान से छिप कर तब तो 'समस्या' उठी ही होगी। ताज्जुब यह है कि पत्रिका के मालिकान ने किस भय से सम्पादक के विरुद्ध कारवाई नहीं की और उनको अपने विरुद्ध हल्ला मचाने की छूट प्रदान कर दी?

सम्मान गलत हुआ हो या सही ,जिनका सम्मान हुआ उनको 40 चोर कहने का क्या औचित्य?कहने वाले ब्लागर साहब कारपोरेट घराने की मज़ेदार नौकरी मे हैं। वह उक्त संपादक महोदया के पूना निवास पर पाँच घंटे बिता कर-चाय,नाश्ता,खाना,मीट,मुर्गा,मच्छी खा कर और शराब आदि से जो मेहमान नवाज़ी करा कर आए थे उसी की 'डकार' और 'उल्टी' है उनका यह अभद्र,अश्लील,असामाजिक लेखन। किसी भी आयोजन मे उसके आयोजकों द्वारा निर्धारित व्यक्ति किसी दूसरे को अपनी मंचस्थ 'कुर्सी' किस अधिकार से हस्तांतरित कर सकता है?क्या चेनल शास्त्र मे ऐसा होता है?

यह ब्लागर साहब संकीर्ण पोंगापंथी ढ़ोंगी विचार-धारा के ध्वजा वाहक हैं और 'हवन' जैसी वैज्ञानिक पद्धति के विरोधी। यह पुरोहितवाद के संरक्षण के हिमायती हैं । ज्योतिष के मेरे वैज्ञानिक विश्लेषण की खिल्ली इनके ही ब्लाग पर उक्त संपादक महोदया ने तब उड़ाई थी जबकी  अपने बच्चों की चार कुंडलियों का विश्लेषण मुझसे करा चुकी थीं और 'रेखा के राजनीति'मे आने का मेरा विश्लेषण सही सिद्ध हो चुका था।  अतः उनका लेखन मुझे तो 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे' ही लगता है।

Tuesday, 14 August 2012

सुंदर,सुखद,समृद्ध जीवन बनाएँ






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'बकवास' कहना और लिखना कितना आसदान है लेकिन क्या ग्रहों की चाल को रोका या टाला जा सकता है?यदि हाँ तो वित्त मंत्रालय,महाराष्ट्र के सी एम आफिस,नेल्लोर मे तामिल नाडू एक्स्प्रेस मे अग्निकांड क्यों नहीं रोके जा सके। ईरान की भूकंप त्रासदी को क्यों नहीं रोका जा सका। ईरान का घोर शत्रु भी आज ईरान को मानवीय मदद का प्रस्ताव दे रहा है पहले उसके वैज्ञानिकों ने चेतावनी देकर आबादी को क्यों नहीं हटवाया या भूकंप को रोक लिया।लेकिन विरोध के लिए विरोध करना फैशन है तो करते हैं जन-कल्याण बाधित करने के लिए।

राजनेताओं मे कैप्टन डॉ  लक्ष्मी सहगल,के बाद केंद्रीय मंत्री विलास राव देशमुख को भी क्यों नहीं बचाया जा सका?

यू पी सरकार के नेताओं मे मतभेदों के बारे मे भी आंकलन पहले ही दिया जा चुका है। 
http://krantiswar.blogspot.in/2012/03/blog-post_16.html?

हाँ बचाव हो सकता है यदि वैज्ञानिक विधि से 'हवन' का सहारा लिया जाये तो। चेतावनी देने का अभिप्राय बचाव के वैज्ञानिक उपाय अपनाने का अवसर प्रदान करना होता है। 'बकवास' नहीं जैसा कि विदेश स्थित प्रो साहब के अनुयाई कहते हैं। 












 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर