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Thursday, 28 January 2016

पर आदमी तन्हा है ------ Sanjay Sinha

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लेकिन यहां सिंगापुर में बैठ कर मुझे लगा कि आधुनिकता अपने साथ अकेलापन लेकर आगे बढ़ रही है।
सड़कें चमचमा रही हैं।। शहर जगमगा रहा है। तकनीक के एक इशारे पर सारी सुविधाएं कदमों में हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं।
पर आदमी तन्हा है।
तो क्या एक दिन हम भी एक दूसरे के बेहद करीब होंगे, पर हक़ीकत में बहुत दूर होंगे।
जब-जब मैं रिश्तों में इस दूरी को देखता हूं, मुझे अपना वतन, अपना घर, अपना परिवार और आप सब बहुत याद आने लगते हैं।




 कल शाम मैं सिंगापुर के एक रेस्त्रां में बैठा था।
मेरा मन पिज़्जा खाने का था। आर्किड रोड पर हल्की बारिश के बीच मैंने उस इटालियन रेस्त्रां में बैठ कर पिज्ज़ा का ऑर्डर किया। मेरे ठीक बगल वाली मेज पर एक दंपत्ति बैठे थे। उन्होंने भी पिज़्जा ऑर्डर किया था। मैं मन ही मन सोच रहा था कि यहां के लोग कितने खुश रहते हैं। पति-पत्नी या दोस्त शाम को साथ घूमने निकलते हैं, साथ बैठते हैं, डिनर करते हैं।
पर मैं इस बात पर हैरान था कि दोनों दंपत्ति करीब आधे घंटे तक उस टेबल पर बैठे रहे, लेकिन दोनों ने आपस में एक शब्द भी बात नहीं की। दोनों लगातार अपने-अपने मोबाइल फोन पर लगे रहे।
मेरा कौतूहल बढ़ गया था। उन्होंने अपना डिनर किया और बिल देकर कर चले गए। मेरा भी खाना हो चुका था। पर मुझे लगा कि अभी मुझे कुछ देर और यहां रुकना चाहिए। मैं समझना चाह रहा था कि आख़िर तकनीक ने हमें एक दूसरे के करीब किया है, या दूर कर दिया है।
कुछ देर बाद मेरी निगाह दूसरी मेज़ पर पड़ी। वहां भी एक युवा दंपत्ति आए। उन्होंने भी खाने का ऑर्डर किया। दोनों पति-पत्नी या दोस्त ने अपने लिए अलग-अलग खाने के ऑर्डर किए थे। मेरा पिज़्जा खत्म हो चुका था। पर मैं कुछ देर और रुकना चाह रहा था, इसिलिए मैंने फिश ऑर्डर कर दिया। मुझे मालूम था कि फिश में देर लगेगी।
मैं चुपचाप दूसरी टेबल की ओर देखता रहा। वहां भी वही हाल था। दोनों लोग आपस में कोई बात नहीं कर रहे थे। पुरुष तो अपने साथ आईपैड जैसी कोई चीज लिए हुए था, और वो उसमें पूरी फिल्म देख रहा था। महिला लगातार फोन पर लगी थी।
***
मैं और मेरी पत्नी कभी कहीं किसी रेस्त्रां में जाते हैं, तो हम ऑर्डर चाहे जो करें, पर थोड़ी ही देर में हम एक दूसरे के ऑर्डर पर हाथ मारने लगते हैं। पत्नी तय करके गई होती है कि वो सिर्फ डोसा खाएगी और मैं छोले भटूरे। लेकिन दो मिनट के बाद आधा भटूरा वो खा जाती है, और मैं उसका डोसा साफ कर चुका होता हूं। दुनिया के सारे गमों की चर्चा हम खाने की मेज पर कर लेते हैं।
लेकिन यहां सिंगापुर में बैठ कर मुझे लगा कि आधुनिकता अपने साथ अकेलापन लेकर आगे बढ़ रही है।
सड़कें चमचमा रही हैं।। शहर जगमगा रहा है। तकनीक के एक इशारे पर सारी सुविधाएं कदमों में हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं।
पर आदमी तन्हा है।
तो क्या एक दिन हम भी एक दूसरे के बेहद करीब होंगे, पर हक़ीकत में बहुत दूर होंगे।
जब-जब मैं रिश्तों में इस दूरी को देखता हूं, मुझे अपना वतन, अपना घर, अपना परिवार और आप सब बहुत याद आने लगते हैं। मुझे तब तक अकेलापन का अहसास नहीं होता, जब तक ऐसी चुप्पी से मैं गुजर नहीं चुका होता हूं। तीन दिन हो गए, सिंगापुर में। अब यहां इस रेस्त्रा में बैठ कर मुझे अकेलापन बहुत साल रहा है।
पता नहीं ये लोग इस सच तो समझते हैं या नहीं, पर अकेलापन एक सज़ा है।
रेस्त्रां में लोग एकांत की तलाश में आते हैं और अकेले हो कर चले जाते हैं।

@Rishtey @Sanjay Sinha








संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 10 September 2014

एकल परिवार भी बिखरने की कगार पर---अरविंद विद्रोही

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09 -09-2014 :


 https://www.facebook.com/arvind.vidrohi/posts/742166825819570
अरविंद विद्रोही जी एक जागरूक पत्रकार हैं और उनकी चिंता स्व्भाविक तथा वास्तविक है। प्रस्तुत दोनों घटनाओं में युवा महिलाओं को सिर्फ इसीलिए अपनी ज़िंदगी से हाथ धोना पड़ा कि वे आर्थिक स्वतन्त्रता हेतु जीविकोपार्जन के लिए घर से बाहर निकली थीं। कितनी आर्थिक स्वतन्त्रता मिली और परिवार में कितनी समृद्धि आ पाई ? बल्कि असमय ही उनके सपने और परिवार बिखर गए। :



ये दो तो सिर्फ उदाहरण हैं न जाने कितनी ही इस प्रकार की घटनाएँ रोज़ घटित हो रही हैं और अनेकों परिवार अनायास संकटों का सामना कर रहे हैं।  रोजगार रत महिलाओं पर घर और बाहर दोनों की ज़िम्मेदारी रहती है और कुछ को छोड़ कर अधिकांश के स्वस्थ्य व मनोदशा पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसका खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। 

जब तक जिस परिवार में पुरुष भी घर की ज़िम्मेदारी निबाहने को तैयार न हों उस परिवार की महिलाओं को रोजगार करने से इंकार कर देना चाहिए ,वे क्यों घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िम्मेदारी लेकर अपने निजी स्वस्थ्य व समस्त परिवार को जोखिम में डालें?

सनातन धर्म गर्ल्स  इंटर कालेज,आगरा छावनी में गणित के एक अध्यापक आलोक श्रीवास्तव साहब तो घर का काम बाकायदा अपनी श्रीमती जी को मदद करने के उद्देश्य से करते थे जबकि वह रोजगार में भी नहीं थीं। आलोक जी का कहना था कि यदि वह सुबह नाश्ता बना कर खा कर और अपनी श्रीमती जी को खिला कर कालेज चले जाते हैं तो सुबह-सुबह उनकी श्रीमती जी को छोटे बच्चे को अकेला छोड़ कर जल्दी-जल्दी उनके लिए नाश्ता नहीं तैयार करना पड़ता जबकि दिन में तसल्ली से इतमीनान से वह सब कार्य सुचारू रूप से कर लेती थीं। 

इसके विपरीत सेंट पैटरिक जूनियर गर्ल्स हाईस्कूल,आगरा में गणित के अध्यापक नरेंद्र चौहान साहब अपनी श्रीमती जी को घर के किसी भी काम में मदद नहीं करते थे यहाँ तक कि पौधों में पानी भी नहीं डालते थे। एक बार उनको कहीं  अचानक जाने की जल्दी थी और खाना तैयार नहीं था उन्होने बाज़ार से कुछ नाश्ता मंगाया जिसकी सब्जी में बैंगन की डंडी भी पड़ी थी जो मास्टर साहब के गले में जाकर अटक गई और उनको मुंह खोले -खोले ही डॉ के पास जाकर चिमटी से निकलवानी पड़ी। कार्यक्रम का मज़ा तो किरकिरा हुआ ही गले का घाव कई दिन तक परेशान किए रहा। यदि वह सब्जी बना देते या छील -काट कर ही तैयार कर देते तो  डॉ के पास दौड़ लगाने और तकलीफ उठाने की नौबत क्यों आती?

गणित मास्टर चौहान साहब के मुक़ाबले गणित मास्टर आलोक श्रीवास्तव साहब की घरेलू गणित ज़्यादा सटीक व कारगर साबित होती है। अतः समाजवाद को घर में भी लागू किया जाना चाहिए तभी परिवारों में खुशहाली लौट सकेगी। 

(विजय राजबली माथुर )

Sunday, 2 June 2013

घर से ही होगी बदलाव की शुरुआत ---शबाना आज़मी

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 हिदुस्तान,2 जून2013 , लखनऊ के समपादकीय पृष्ठ से साभार ---





 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर