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Saturday, 24 March 2018

तीन सौ सीटों पर सोशल मीडिया वोटर्स ओपिनियन बदल चुनावी सफलता दिला सकती है

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 17 April 2017

सोशल मीडिया पर मनमानी ------ मैत्रेयी पुष्पा

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वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा की ख्याति न सिर्फ बतौर कथाकार-उपन्यासकार रही, बल्कि अपने लेखन में वह स्त्री अस्मिता की बड़ी पैरोकार बनकर भी उभरी हैं। उनकी सार्वजनिक सक्रियता और बेबाक टिप्पणियों ने भी हिंदी पट्टी में उन्हें अलग मुकाम पर खड़ा किया। हिंदी अकादमी, दिल्ली की उपाध्यक्ष के तौर पर भी उनकी सक्रियता चर्चा में है, सवाल भी उठे। मैत्रेयी के अपने अवदान के साथ समाज व साहित्य में स्त्री की हैसियत, सोशल मीडिया पर साहित्य के अच्छे-बुरे स्वरूप आदि मुद्दों पर हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द्र ने उनसे लंबी बातचीत की:
अपने फेसबुक पेज पर आपने लिखा है, ‘आंधियों को पता है कि इधर के रास्ते आना है उन्हें, और हम भी जानते हैं कि कैसे पेश आया जाएगा’... इसमें कोई खास संदेश पढ़ा जाए?
जीवन के सफर में वे आसानियां नहीं देखीं, जो रास्तों को चलने लायक बना देती हैं। बचपन भी जीने और पढ़ने की जुड़वां चुनौती लेकर आया। पिता को नहीं देखा मैंने, क्योंकि वे तब खत्म हो गए, जब मैं सिर्फ 18 महीने की थी। मां ने किसानी की और फिर अपनी पढ़ाई। स्कूल हम दोनों के ही पास नहीं था। तीन-चार मील के बीहड़ सफर के बाद कक्षा में बैठना नसीब होता। मैं गांव से पढ़ने जाने वाली अकेली लड़की थी। शायद तभी से मेरे छोटे से मन ने दृढ़ता हासिल कर ली और खतरों की चुनौतियों का सामना करती हुई पढ़ती रही। बाबा से कहा करती थी कि स्कूल क्यों नहीं है, सड़क क्यों नहीं है और हमारे घर कच्चे फूस की छान वाले क्यों हैं, पक्के क्यों नहीं? बाबा कहते, सब नसीब के खेल हैं। मेरी समझ के बाहर रही यह बात और मैं नसीब के खिलाफ जाना सीखने लगी। बस तभी से मेरे साथ चल रही हैं ये पंक्तियां ...यह मेरा उद्बोधन गीत है।
सोशल मीडिया पर खास तरह की रचनात्मक सक्रियता दिख रही है। क्या नई रचनाशीलता सोशल मीडिया से निकलेगी, जैसे कभी लघु पत्रिका आंदोलन से निकली थी?
सोशल मीडिया पर रचनाशीलता से ज्यादा रचना पर मनमानी है। कोई कविता अच्छी लगी, शेयर कर ली। बस इतना ही। कूड़ा-कबाड़ा भी कम नहीं होता। लघु पत्रिका आंदोलन व्यावसायिक घरानों की पत्रिकाओं के लोप होते जाने का परिणाम था। उनमें रचनाएं मुकम्मल होती थीं। सोशल मीडिया के लेखन में वह करीनेदारी और गहराइयां कहां? यहां तो ‘जोई सोई कछु गावै’ जैसा ज्यादा है। कुछ पंक्तियों या पैराग्राफ बन जाने से साहित्य नहीं बनता।
ब्लॉगिंग को साहित्य के किस खांचे में रखेंगी...?
ब्लॉग के जरिये साहित्य लिखा जाएगा, यह समझ से परे है, क्योंकि ब्लॉग तो कोई भी लिख रहा है। माना कि साहित्य से जुडे़ लोग भी लिख रहे हैं, तो उनसे इसमें कैसी रचनाशीलता की उम्मीद की जाए? सोचने की बात है कि क्लासिक आज भी क्यों महत्वपूर्ण है? इधर कुछ ऐसी किताबें भी आ रही हैं, जो ब्लॉग लिखते-लिखते बन गईं। वे पढ़ी तो जा रही हैं, लेकिन ये फास्ट-फूड की तर्ज पर ही हैं।
क्या सोशल मीडिया ने रचनाकार का समय चुराया है? साहित्य को यह किस तरह प्रभावित कर रहा है?
सोशल मीडिया ऐसा नशा परोसता है कि चस्का लग जाता है। गंभीर विषयों पर सोचने वाला रचनाकार छोटी-मोटी, हल्की-पतली टिप्पणी करके खुश हो लेता है, क्योंकि वहां तत्काल लाइक मिलने लगता है। यह एक भ्रम में डालता है। रचनाकार को इससे बचना होगा। खासकर तब, जब उसकी रचनाशीलता प्रभावित होने लगे।
आरोप है कि साहित्य का दायरा धीरे-धीरे सिमट रहा है, यह नई पीढ़ी से दूर जा रहा है?
माना जा रहा है कि साहित्य के नाम पर अब सूचनाएं ही रह गई हैं, क्योंकि नए लेखकों का रुझान इंटरनेट ने खींचा है। फेसबुक का प्लेटफॉर्म सहज सुलभ है। इस बात को हम खारिज नहीं कर सकते कि फेसबुक पर लेखक-लेखिकाओं की जो बाढ़ आई है, उनमें से कुछ बहुत अच्छे रचनाकार होकर साहित्य में योगदान कर सकते हैं। लेकिन यह भी तय है कि अच्छे संपादक और समीक्षकों के हट जाने से निखारने और संवारने का काम कौन करेगा? पत्रिकाएं और अखबारों के साहित्यिक पृष्ठ जरूरी हैं। न तो पुराना सब बुरा है और न नया सारा अच्छा।
कभी-कभी लगता है कि साहित्य में स्त्री विमर्श और देह विमर्श के बीच कुछ घालमेल हो गया है?
स्त्री विमर्श बनाम देह विमर्श का नारा चारों ओर सुनाई देता है। राजेंद्र यादव ने स्त्री के लिए देहमुक्ति का आह्वान किया था -‘पुरुष ने स्त्री के खून में यह भावना संस्कार की तरह कूट-कूटकर भर दी कि वह सिर्फ और सिर्फ शरीर है। वह शरीर के सिवा उसकी और किसी पहचान से इनकार करता है।’ पर मैं मानती हूं कि यह विमर्श का प्रथम चरण था। अब आगे आना चाहिए। शरीर के दावे के साथ लोकतांत्रिक समाज का दावा जरूरी है। जो स्थितियां हमारे खिलाफ हैं, हमारा हक छीनती हैं, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व कायम किए हुए हैं, उनके विरुद्ध लड़ना स्त्री विमर्श के फलक का विस्तार करेगा, पर ऐसा दिख नहीं रहा।
आपकी कहती हैं कि ‘राजनीति जैसा क्रूर इलाका कहीं नहीं’? राजनीति से इतनी नफरत क्यों?
हाथ कंगन को आरसी क्या? महाभारत से बड़ा कोई राजनीतिक ग्रंथ नहीं। कृष्ण कहते हैं- ‘मर जाने पर स्वर्ग मिलेगा, जय होने पर भूतल राज/ इससे ही निश्चय भारत, तू हो जा खड़ा युद्ध को आज’। तब से आज तक देखा जाए तो बिना स्वार्थ के संबंधों का कोई वजूद नहीं। हाल के चुनाव में जो दृश्य देखने को मिले, वे महाभारत को ही दोहरा रहे थे। कहीं धृतराष्ट्र, कहीं शकुनि। हां, जयचंदों की कमी न थी। संबंध ही खूनमखून नहीं हुए, देश के लिए बेहतरी के डंकों की चोट में कुटिल चालें चली आईं।
लेकिन आपका हिंदी अकादमी में आना भी तो राजनीति (अरविंद केजरीवाल) से नजदीकी के कारण हुआ?
लोग ऐसा कहते और फैलाते भी हैं कि अरविंद केजरीवाल से नजदीकी मुझे हिंदी अकादमी में लाई। बेशक मुख्यमंत्री ने मेरे नाम का चुनाव किया होगा, पर मेरी जान-पहचान या मिलना-जुलना हरगिज न था। ताज्जुब हुआ था, जब महिला आयोग के लिए मेरा नाम आया, फिर दूसरी बार सरकार आई, तो हिंदी अकादमी के लिए बुला लिया, जबकि मेरी कोई मुलाकात तक नहीं थी। यहां राजनीति नहीं, शायद ईमानदारी का कोई भरोसा या साहित्यकार का सम्मान होगा।
शिकायत है कि हिंदी अकादमी लेखकों, कलाकारों के लिए वह नहीं कर पाई, जिसकी अपेक्षा थी?
कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनमें आप अपना परिश्रम ही नहीं, जिंदगी भी झोंक दें, तब भी लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे। ऐसा ही मामला दिल्ली हिंदी अकादमी का है। हमने साहित्यकारों, नाट्यकर्मियों और पत्रकारों के साथ शिक्षकों के लिए कार्यक्रम किए हैं। छात्रों को अकादमी से जोड़ा। अभी कुछ ही दिनों पहले हिंदू कॉलेज में तीन दिन का साहित्य महोत्सव हुआ, जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया। ऐसे कार्यक्रम कालेजों में ले जाने से छात्र काफी संख्या में साहित्य के प्रति आकर्षित हुए हैं। अकादमी के सम्मान में पूरी ईमानदारी बरती जाती है। रेस्पांस बहुत अच्छा है। हां, कुछ लोग हैं, जिनका मेरे आने के पहले यहां प्रभुत्व रहा होगा, उनका सिक्का चलना जरूर बंद हुआ है।
आपके रचनाकार में एक एक्टिविस्ट हावी दिखाई देता है?
मैं खुद न तो समाज सेविका बनी, न आगे बढ़कर नारे-झंडे लहराने का मन बनाया। हां, परिस्थितियां जरूर ऐसी आ टकराईं कि कभी विरोध करना पड़ा, तो कभी विद्रोह। मैं लड़कों वाले स्कूल-कॉलेज में पढ़ी हूं। पंद्रह साल की उम्र में इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल साहब का दिल इस किशोरी पर आ गया और फिर एक्स्ट्रा क्लास के फरेब के बीच धक्का-मुक्की। दूसरे दिन लड़कों से मिलकर स्ट्राइक! मैंने उन दिनों ही जान लिया, जिस लड़की के पिता-भाई या संरक्षक नहीं होते, उसके सच्चे मित्र सहपाठी होते हैं। मैं एक्टिविस्ट थी नहीं, बना दी गई।
आपकी नई किताबवह सफर था कि मुकाम था ... राजेंद्र यादव पर केंद्रित है। क्या यह गुड़िया भीतर गुड़िया की अगली कड़ी है?
वह सफर था कि मुकाम था... अभी का लेखन है। राजेंद्र यादव का नाम मेरे साथ आते ही लोग चौकन्ने हो जाते हैं। कारण कि स्त्रयिों को लेकर राजेंद्र जी की छवि एक शिकारी की बनती रही है, जिसके पास लुभाने और ललचाने के लिए हंस पत्रिका है। मेरे लिए भी लेखक-लेखिकाओं ने ऐसा ही माना और प्रचारित किया कि पाठक भी यही बात मान लें। मेरा और उनका साथ 23 साल का रहा। मुझे लगा कि जिस विद्वान से मैंने लिखने का प्रशिक्षण पाया, जिसने मेरे उपन्यासों की पांडुलिपियों को मनोयोग से पढ़ा और जिसने उस प्रशिक्षण के दौरान कठोर शिक्षक की भूमिका अदा कर मुझे लिखने के अनुशासन में ढाला, उसके प्रति मेरा व्यवहार क्या हो? संयोग ही था कि मुझे राजेंद्र यादव मिले, जिन्होंने माना और लिखा - ‘मैत्रेयी एक विद्यार्थी की तरह आई।’ तब यह किताब एक स्त्री-पुरुष के संबंध से पहले एक लेखिका के बनने और संपादक के निर्देशन की कहानी है।
इतना व्यापक कथा संसार रचने के बाद भी आपको मनचाहा मुकाम नहीं मिला?
व्यापक कथा संसार रच पाई, यह मेरे अनुभव के खजाने की देन है। अगर इशारा किसी विशेष सम्मान या पुरस्कार की ओर है, तो बताओ कि मेरे अनुभवों का खजाना किसी का कृपाकांक्षी होने के लिए था क्या? मानो या न मानो, लेखन में आई लिखने के लिए। यहीं पता चला कि लिखने का इनाम भी मिलता है। और कुछ इनाम बड़ी भाग-दौड़, जोड़-तोड़ के बाद मिलते हैं...। मैं स्त्री हंू, स्त्री के घर से तो लेखन ही हो जाए यही बहुत, इनाम-खिताब की कौन कहे? हां, पाठक मिले और मिली अच्छी सी रॉयल्टी!
महिला कथा-लेखन की मौजूदा स्थिति से आप संतुष्ट नहीं हैं, क्यों?
महिला रचनाकार कहानियां लिख रही हैं। आप की भाषा में महिला कथाकारों की फौज भी है। होनी भी चाहिए, नहीं तो छोटी से लेकर बड़ी पत्रिकाओं का पेट कैसे भरेगा? मैं संतुष्ट होती हूं या नहीं, इससे क्या फर्क पड़ेगा? फिर भी, मेरा कहना यही रहा है कि देखना चाहिए कि कहां कमी है कि कहानियां पहले की तरह सिर चढ़कर बोलती नहीं। कैसा समय चल रहा है, इससे कोई सरोकार है नहीं। कपड़े, सेक्स और मर्द से रिलेशनशिप जैसे विषय फेडआउट हो चुके हैं।

 












संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 20 March 2013

हिन्दू शब्द -फेसबुक पर

Vijai RajBali Mathur 'हिन्दू' शब्द 'हिंसा' से बना है अतः हिंदुओं मे 'हिंसा'=मनसा-वाचा-कर्मणा करने वालों को पूजा जाना आश्चर्य जनक नहीं है। 23 hours ago · Like · 1


Vijai RajBali Mathur सर्व प्रथम बौद्धों ने अपने मठों/विहारों/ग्रन्थों को जलाने/नष्ट करने वालों को यह संज्ञा दी थी फिर फारसियों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप मे इस शब्द का प्रयोग इस देश के लोगों को निकृष्ट सिद्ध करने के लिए किया था और ब्रिटिश हुकूमत के हक मे पूर्व क्रांतिकारी सावरकर महोदय ने इसे प्रचारित करा दिया। क्यों नहीं 'श्रेष्ठ' ='आर्य'बनने की बात करते?गुलामी के प्रतीकोण से प्रेम क्यों?
23 hours ago · Like · 2

Vijai RajBali Mathur जनाब आप ही क्यों न पढे इसे-http://madhyabharat.net/archives.asp?NewsID=179

madhyabharat.net
Madan Sharma यह बात सही है कि विदेशी भाषा में हिंदू शब्द का अर्थ चोर डाकू व् लुटेरा है ...किन्तु हम अपने शब्दों के लिए विदेशी शब्दकोष क्यों देखते है ....हिंदी भाषा में बहुत से ऐसे शब्द है जिनका अर्थ विदेशी भाषा में कुछ और है ...यह भी बात सही है कि हिंदू शब्द का यदि व्याकरण द्वारा अर्थ किया जाय तो यह हिंसावाची शब्द सिद्ध होता है ... आज व्यवहारिक पक्ष यही है कि हिंदू शब्द का अर्थ है हिंद के निवासी ..यदि अन्य मत वाले अपने को हिंदू ना माने तो य अलग बात है ...ये उनकी समस्या है ....आज सरकारी रूप से वैदिक धर्म या सनातन धर्म का ही रूप हिंदू धर्म है ये अलग बहस कि बात है ....मुख्य रूप से देखा जाय तो हम वैदिक धर्मी अर्थात वेद के अनुसार आचरण करने वाले लोग हैं ....आज वेद व अन्य आर्ष गर्न्थों कि गलत व्याख्या व अवैज्ञानिक विचारों पर आधारित पुराणों कि वजह से हमें अन्य धर्मावलंबियो के सामने पराजय का सामना करना पड़ता है .....सिर्फ एक आर्य समाज ही है जो वेद के आधार पर अन्य मतावलंबियों को मुह तोड़ उत्तर दे सकती है ...
विश्वप्रिय वेदानुरागी हिन्दू संस्कृत का शब्द नहीं है , राम कृष्ण व्यास पतंजलि हनुमान हिन्दू नहीं थे , किसी शास्त्र में हिन्दू शब्द नहीं है

  • विश्वप्रिय वेदानुरागी हिन्दू का एक संक्षिप्तिकरण देखिये :- “हि” “न्” “दु”
    “हि” अर्थात् हित ना करे वह
    “न्” अर्थात् न्याय ना करे वह
    “दु” अर्थात् दुष्टता करे वह

    और इसका प्रमाण निम्न श्लोक है :-
    हिन्दू शब्द की एक और व्याख्या देखिये जिसमें हिन्दू शब्द का निन्दित अर्थ दिया गया है |
    हितम् न्यायम् न कुर्याद्यो
    दुष्टतामेव आचरेत्
    स पापात्मा स दुष्टात्मा
    हिन्दू इत्युच्यते बुधै:||३/२१||
    आत्मानम् यो वदेत् हिन्दू
    स याति अधमां गतिम् |
    दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तु त हिन्दुं
    सद्य: स्नानमुपाचरेत् ||७/४७||
    हिंकारेण परीहार्य:
    नकारेण निषेधयेत् |
    दुत्कारेण विलोप्तव्य:
    यस्स हिन्दू सदास्मरेत् ||९/१२||
    इति कात्थक्य: शिवस्मृतौ



    शिव स्मृति
    (जो हित और न्याय ना करे, दुष्टता का आचरण करे, वह पापी, वह दुष्टात्मा हिन्दू कहलाते हैं)
    (जो व्यक्ति अपने आप को हिन्दू कहता है वह अधम गति को प्राप्त होता है और ऐसे हिन्दू को देख कर स्पर्श कर शीघ्र ही स्नान करें)
    (हिं हिं करके जिसका परिहार करना चाहिए, न न करके जिसका निषेध करना चाहिए, दूत् दूत् करके जिसे दूर भगाना (नष्ट कर देना) चाहिए वही हिन्दू है इसे सदा याद रखें)

  • Madan Sharma धन्यवाद विश्वप्रिय वेदानुरागी जी इतनी सुन्दर जानकारी के लिए .....किन्तु यह विडंबना है कि हम चाह कर भी खुद को हिंदू शब्द से अलग नहीं रख सकते .....

  • ज्ञान चंद आर्य आदरनीय विश्वप्रिय वेदानुरागी जी ने बिल्कुल सही कहा है और जो प्रमाण उन्होने दीये हैं वो भी सराहनीय हैं इतना सब होते हुए भी अपने आप को हिंदू कहलवाना हमारी विवशता बन चुका है अभी पिछले दिनों जनगणना हुई थी उसमें या तो अपने धर्म का नाम हिंदू लिखवाओ या फिर अन्य उनके यहाँ यहाँ रजिस्टर में ऐसा कोई खाना नही है जिसमे अपने धर्म का नाम वैदिक लिखवाया जा सके 

    यहाँ भी स्पष्ट है---
     
    http://madhyabharat.net/archives.asp?NewsID=179

Friday, 4 May 2012

फेसबुक के आलोचक ब्लागर्स ध्यान दें-

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इधर कुछ दिनों से ब्लाग जगत मे फेसबुक के विरुद्ध भूचाल आया हुआ है। प्रबुद्ध ब्लागर एक के बाद एक पोस्ट फेसबुक लेखन की आलोचना मे लगा रहे हैं। छोटे मियां छोटे मियां,बड़े मियां सुभान अल्लाह की तर्ज पर उन पोस्ट के टिप्पणीकार फेसबुक लेखकों का निर्मम चरित्र हनन कर रहे हैं।

आज के हिंदुस्तान के समपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित डॉ मोहन श्रोत्रिय साहब द्वारा फेसबुक स्टेटस के आधार पर अपने ब्लाग मे लिखा यह लेख पढ़ कर क्या आप कह सकते हैं कि,फेसबुक लेखन निकृष्ट होता है। यदि किसी ब्लागर ने निकृष्ट फेसबुकिया को अपना फ्रेंड बना रखा है तो उसे निकृष्ट लेखन ही मिलेगा।

फेसबुक के माध्यम से ब्लाग  लेखन उन लोगों तक आसानी से पहुँच जाता है जो पहले ब्लाग से अपरिचित थे। जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु तिन  मूरत,तिन्ह तैसी। जो जैसा होगा उसे वैसा ही दीखेगा। वैसे कई ब्लागर्स तो फेसबुकिए लोगों की निकृष्टता से भी गए गुजरे हैं और वे ही दुष्प्रचार मे आगे-आगे हैं।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर