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Sunday, 26 August 2018
Sunday, 12 November 2017
हवा में बढ़ते जहर का समाधान : ' हवन ' ------ विजय राजबली माथुर
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भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे ? निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग ' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु राजीव गांधी सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन ' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था।अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिसेज पेट्रिसिया हेमिल्टन ने भोपाल के उप नगर (15 किलो मीटर दूर ) बेरागढ़ के समीप माधव आश्रम मे स्वीकार किया था कि'होम -चिकित्सा'अमेरिका,चिली और पोलैंड मे प्रासंगिक हो रही है। राजधानी वाशिंगटन (डी सी ) मे "अग्निहोत्र विश्वविद्यालय"की स्थापना हो चुकी है । बाल्टीमोर मे तो 04 सितंबर 1978 से ही लगातार 'अखंड हवन ' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो, मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव ,अन्ना हज़ारे ,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है एक विद्वान ने यह बताया है-
परम पिता से प्यार नहीं ,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं।
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । ।
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है।
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। ।
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार नहीं।
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 । ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं।
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। ।
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं ।
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । ।
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है।
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। ।
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं।
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । ।
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ।
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। ।
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं।
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।
"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"-यह निष्कर्ष 35 वर्ष आर एस एस मे रह कर और उससे दुखी होकर अलग होने वाले सोरो निवासी आचार्य राम किशोर जी(पूर्व प्राचार्य ,संस्कृत महाविद्यालय,हापुड़)का है।
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं। राम ने जो त्याग किया और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज फिर से देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप 'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।
यज्ञ माहात्म्य
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।
फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।
जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।
जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।
जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।
देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )।
मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।
अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल -काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग 'हवन 'करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-
भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।
प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन ' अर्थात 'यज्ञ ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।
यज्ञ महिमा
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।
1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........
2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......
3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....
4-वशिष्ठ विश्वमित्र और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......
5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे ? निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग ' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु राजीव गांधी सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन ' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था।अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिसेज पेट्रिसिया हेमिल्टन ने भोपाल के उप नगर (15 किलो मीटर दूर ) बेरागढ़ के समीप माधव आश्रम मे स्वीकार किया था कि'होम -चिकित्सा'अमेरिका,चिली और पोलैंड मे प्रासंगिक हो रही है। राजधानी वाशिंगटन (डी सी ) मे "अग्निहोत्र विश्वविद्यालय"की स्थापना हो चुकी है । बाल्टीमोर मे तो 04 सितंबर 1978 से ही लगातार 'अखंड हवन ' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो, मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव ,अन्ना हज़ारे ,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है एक विद्वान ने यह बताया है-
परम पिता से प्यार नहीं ,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं।
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । ।
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है।
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। ।
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार नहीं।
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 । ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं।
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। ।
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं ।
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । ।
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है।
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। ।
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं।
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । ।
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ।
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। ।
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं।
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।
"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"-यह निष्कर्ष 35 वर्ष आर एस एस मे रह कर और उससे दुखी होकर अलग होने वाले सोरो निवासी आचार्य राम किशोर जी(पूर्व प्राचार्य ,संस्कृत महाविद्यालय,हापुड़)का है।
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं। राम ने जो त्याग किया और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज फिर से देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप 'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।
यज्ञ माहात्म्य
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।
फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।
जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।
जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।
जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।
देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )।
मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।
अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल -काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग 'हवन 'करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-
भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।
प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन ' अर्थात 'यज्ञ ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।
यज्ञ महिमा
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।
1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........
2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......
3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....
4-वशिष्ठ विश्वमित्र और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......
5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Wednesday, 20 March 2013
हिन्दू शब्द -फेसबुक पर
Vijai RajBali Mathur 'हिन्दू' शब्द 'हिंसा' से बना है अतः हिंदुओं मे 'हिंसा'=मनसा-वाचा-कर्मणा करने वालों को पूजा जाना आश्चर्य जनक नहीं है।
23 hours ago · Like · 1
Vijai RajBali Mathur जनाब आप ही क्यों न पढे इसे-http://madhyabharat.net/ archives.asp?NewsID=179
madhyabharat.net
Vijai RajBali Mathur सर्व
प्रथम बौद्धों ने अपने मठों/विहारों/ग्रन्थों को जलाने/नष्ट करने वालों को
यह संज्ञा दी थी फिर फारसियों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप मे इस शब्द
का प्रयोग इस देश के लोगों को निकृष्ट सिद्ध करने के लिए किया था और
ब्रिटिश हुकूमत के हक मे पूर्व क्रांतिकारी सावरकर महोदय ने इसे प्रचारित
करा दिया। क्यों नहीं 'श्रेष्ठ' ='आर्य'बनने की बात करते?गुलामी के
प्रतीकोण से प्रेम क्यों?
23 hours ago · Like · 2Vijai RajBali Mathur जनाब आप ही क्यों न पढे इसे-http://madhyabharat.net/
madhyabharat.net
Madan Sharma यह
बात सही है कि विदेशी भाषा में हिंदू शब्द का अर्थ चोर डाकू व् लुटेरा है
...किन्तु हम अपने शब्दों के लिए विदेशी शब्दकोष क्यों देखते है ....हिंदी
भाषा में बहुत से ऐसे शब्द है जिनका अर्थ विदेशी भाषा में कुछ और है ...यह
भी बात सही है कि हिंदू शब्द का यदि
व्याकरण द्वारा अर्थ किया जाय तो यह हिंसावाची शब्द सिद्ध होता है ... आज
व्यवहारिक पक्ष यही है कि हिंदू शब्द का अर्थ है हिंद के निवासी ..यदि अन्य
मत वाले अपने को हिंदू ना माने तो य अलग बात है ...ये उनकी समस्या है
....आज सरकारी रूप से वैदिक धर्म या सनातन धर्म का ही रूप हिंदू धर्म है ये
अलग बहस कि बात है ....मुख्य रूप से देखा जाय तो हम वैदिक धर्मी अर्थात
वेद के अनुसार आचरण करने वाले लोग हैं ....आज वेद व अन्य आर्ष गर्न्थों कि
गलत व्याख्या व अवैज्ञानिक विचारों पर आधारित पुराणों कि वजह से हमें अन्य
धर्मावलंबियो के सामने पराजय का सामना करना पड़ता है .....सिर्फ एक आर्य
समाज ही है जो वेद के आधार पर अन्य मतावलंबियों को मुह तोड़ उत्तर दे सकती
है ...
विश्वप्रिय वेदानुरागी हिन्दू संस्कृत का शब्द नहीं है , राम कृष्ण व्यास पतंजलि हनुमान हिन्दू नहीं थे , किसी शास्त्र में हिन्दू शब्द नहीं है
11 hours ago · Unlike · 2
- विश्वप्रिय वेदानुरागी हिन्दू का एक संक्षिप्तिकरण देखिये :- “हि” “न्” “दु”
“हि” अर्थात् हित ना करे वह
“न्” अर्थात् न्याय ना करे वह
“दु” अर्थात् दुष्टता करे वह
और इसका प्रमाण निम्न श्लोक है :-
हिन्दू शब्द की एक और व्याख्या देखिये जिसमें हिन्दू शब्द का निन्दित अर्थ दिया गया है |
हितम् न्यायम् न कुर्याद्यो
दुष्टतामेव आचरेत्
स पापात्मा स दुष्टात्मा
हिन्दू इत्युच्यते बुधै:||३/२१||
आत्मानम् यो वदेत् हिन्दू
स याति अधमां गतिम् |
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तु त हिन्दुं
सद्य: स्नानमुपाचरेत् ||७/४७||
हिंकारेण परीहार्य:
नकारेण निषेधयेत् |
दुत्कारेण विलोप्तव्य:
यस्स हिन्दू सदास्मरेत् ||९/१२||
इति कात्थक्य: शिवस्मृतौ
शिव स्मृति
(जो हित और न्याय ना करे, दुष्टता का आचरण करे, वह पापी, वह दुष्टात्मा हिन्दू कहलाते हैं)
(जो व्यक्ति अपने आप को हिन्दू कहता है वह अधम गति को प्राप्त होता है और ऐसे हिन्दू को देख कर स्पर्श कर शीघ्र ही स्नान करें)
(हिं हिं करके जिसका परिहार करना चाहिए, न न करके जिसका निषेध करना चाहिए, दूत् दूत् करके जिसे दूर भगाना (नष्ट कर देना) चाहिए वही हिन्दू है इसे सदा याद रखें)11 hours ago · Unlike · 2 - Madan Sharma धन्यवाद विश्वप्रिय वेदानुरागी जी इतनी सुन्दर जानकारी के लिए .....किन्तु यह विडंबना है कि हम चाह कर भी खुद को हिंदू शब्द से अलग नहीं रख सकते .....
- ज्ञान चंद आर्य आदरनीय विश्वप्रिय वेदानुरागी जी ने बिल्कुल सही कहा है और जो प्रमाण उन्होने दीये हैं वो भी सराहनीय हैं इतना सब होते हुए भी अपने आप को हिंदू कहलवाना हमारी विवशता बन चुका है अभी पिछले दिनों जनगणना हुई थी उसमें या तो अपने धर्म का नाम हिंदू लिखवाओ या फिर अन्य उनके यहाँ यहाँ रजिस्टर में ऐसा कोई खाना नही है जिसमे अपने धर्म का नाम वैदिक लिखवाया जा सके
यहाँ भी स्पष्ट है---
http://madhyabharat.net/archives.asp?NewsID=179

Wednesday, 13 February 2013
कांग्रेस -कौन सी कांग्रेस?---विजय राजबली माथुर
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
hindustaan,lakhnau ,28 janvaree 2013
उपरोक्त समाचार मे 'राहुल गांधी' को 'कांग्रेस उपाध्यक्ष' बताया गया है। परंतु प्रश्न यह है कि,यह कांग्रेस कौन सी कांग्रेस है?निश्चय ही राहुल जी की कांग्रेस वह कांग्रेस नहीं है जिसने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व किया था।राहुल जी की कांग्रेस मात्र 44 वर्ष की पार्टी है जिसका जन्म उनकी दादी साहिबा द्वारा स्वतन्त्रता आंदोलन की कांग्रेस के प्रति बगावत का नतीजा है।
सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या 'क्रान्ति' के विफल हो जाने के 18 वर्षों बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती (जिनहोने उस संग्राम मे सक्रिय भाग लिया था) सन 1875 ई .मे चैत्र प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र ) के दिन 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी जिसका मूल उद्देश्य जनता को 'ढोंग-पाखंड-आडंबर'के विरुद्ध जाग्रत करके भारत को स्वाधीन करना था। जहां-जहां ब्रिटिश छावनियाँ थीं वहाँ-वहाँ इसकी शाखाओं का गठन प्राथमिकता के आधार पर किया गया । ब्रिटिश हुकूमत ने स्वामी दयानन्द को क्रांतिकारी संत (Revolutionary Saint) की संज्ञा दी थी। भयभीत अङ्ग्रेज़ी सरकार ने लार्ड डफरिन के इशारे पर अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र बनर्जी की अध्यक्षता मे सन 1885 ई मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना करवाई जिसका उद्देश्य 'औपनिवेशिक राज्य'-Dominiyan State की स्थापना था। अतः स्वामी दयानन्द की प्रेरणा से आर्यसमाजी अधिकांश संख्या मे कांग्रेस मे शामिल हो गए और उसका उद्देश्य 'पूर्ण स्वाधीनता' करवाने मे कामयाब रहे। 'कांग्रेस का इतिहास' के लेखक डॉ पट्टाभि सीता रमेय्या ने लिखा है कि,'स्वाधीनता आंदोलन मे जेल जाने वाले कांग्रेसियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे'।
अतः स्वाधीनता आंदोलन को छीण करने हेतु ब्रिटिश सरकार ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को प्रेरित करके 'मुस्लिम लीग' की स्थापना 1906 मे तथा पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा 1920 मे 'हिन्दू महासभा' की स्थापना करवाई। भारतीयों को 'हिन्दू' और 'मुस्लिम' मे विभाजित करके परस्पर विरोध मे ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया किन्तु हिन्दू महासभा ज़्यादा कामयाब न हो सकी । अतः पूर्व कांग्रेसी डॉ हेडगेवार एवं पूर्व क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को माध्यम बना कर ब्रिटिश सरकार ने RSS की स्थापना 1925 ई मे करवाई। मुस्लिम लीग और RSS ने देश को 'दंगों' की आग मे झोंक दिया जिसकी अंतिम परिणति 'देश-विभाजन' के रूप मे सामने आई।
1925 ई मे देश-भक्त कांग्रेसियों ने 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य देश के स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करना तथा साम्राज्यवादी विदेशी सरकार की विभाजनकारी नीतियों को विफल करना था। 'गेंदा लाल दीक्षित','स्वामी सहजानन्द सरस्वती' सरीखे कट्टर आर्यसमाजी 'क्रांतिकारी कम्युनिस्ट' बने। 'सत्यार्थ प्रकाश' पढ़ कर ही सरदार भगत सिंह जिनके चाचा कट्टर आर्यसमाजी थे 'क्रांतिकारी कम्युनिस्ट' बने।
क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के प्रभाव को छीण करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी के अहिंसक सत्याग्रह के साथ समझौते करने शुरू किए जिसका जनता पर यह प्रभाव पड़ा कि,जनता ने गांधी जी के पीछे खुद को लामबंद कर लिया और इस प्रकार देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधीजी और उनकी कांग्रेस को दे दिया जबकि क्रांतिकारी कम्युनिस्टों तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की INA-आज़ाद हिन्द फौज,एयर फोर्स व नेवी के विद्रोहों का बड़ा योगदान 15 अगस्त 1947 की आज़ादी के पीछे है।
आज़ादी दिलाने का श्रेय मिलना ही कांग्रेस की 'पूंजी' बना और वह सत्ता प्राप्त कर सकी। शनैः शनैः कांग्रेस सरकार जनता से कटती गई और 'पूंजीपतियों' को समृद्ध करती गई। 1967 मे सम्पूर्ण उत्तर भारत से कांग्रेस की सत्ता का सफाया हो गया। सत्ता पर अपनी पकड़ को बनाए रखने के उद्देश्य से इंदिरा गांधी जी (राहुल साहब की दादी )ने जनता को ठगने हेतु 'समाजवाद' का नारा लगा कर 1969 मे राष्ट्रपति चुनावों मे कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के विरुद्ध निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा करके मूल कांग्रेस से बगावत कर दी और 'इन्दिरा कांग्रेस' की स्थापना की। यह उपाध्यक्ष राहुल साहब इसी बागी कांग्रेस-इन्दिरा कांग्रेस के नेता हैं जिसका उद्देश्य शोषक/उत्पीड़क 'पूँजीपतियों' व 'उद्योगपतियों' का हितसाधन है और इंनका देश के स्वाधीनता आंदोलन से किसी प्रकार का कोई सरोकार कभी भी नहीं रहा है न ही देश की जनता से । न ही इनको कोई अधिकार है कि वह स्वाधीनता आंदोलन की विरासत का खुद को वारिस बताएं। ऐसा करना सिर्फ गलत बयानी ही होगा।
1971 मे बांग्लादेश के स्वाधीनता आंदोलन को सफल समर्थन देकर इंदिराजी की लोकप्रियता बढ़ गई थी और उसी को भुनाते हुये मध्यावधी चुनाव करा दिये थे। प्रचंड बहुमत का दुरुपयोग करते हुये संविधान मे संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष कर दिया था और खुद इन्दिरा जी का राय बरेली का चुनाव हाई कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर देश मे 'आपात काल' थोप कर प्रभावशाली नेताओं को जेलों मे ठूंस दिया था जिनमे 'लोकनायक जय प्रकाश नारायण''भी शामिल थे। जनता के साथ-साथ सरकारी कर्मचारी/अधिकारी बहुत त्रस्त थे और खुफिया विभाग ने गुमराह करके 1977 मे उनसे मध्यवधी चुनाव करवा दिये जिसमे इन्दिरा जी खुद भी और जहां का प्रतिनिधितित्व राहुल कर रहे हैं वहाँ से संजय गांधी भी चुनाव हार गए थे।
1980 के मध्यवधी चुनावों मे राहुल की दादी साहिबा ने RSS से 'गुप्त समझौता ' करके सांप्रदायिक आधार पर बहुमत हासिल कर लिया था और पूर्व 'जनता सरकार' को परेशान करने हेतु अपने द्वारा खड़े किए गए और 'भस्मासुर' बने भिंडरा वाले का सैन्य कारवाई मे खात्मा करा दिया था। परिणाम स्वरूप अपने ही अंग रक्षकों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी जिसकी सहानुभूति प्राप्त कर उनके उत्तराधिकारी -राहुल के पिता राजीव गांधी ने तीन चौथाई बहुमत हासिल कर लिया था और पहले 'शाहबानों'को न्याय से वंचित करने हेतु 'मुस्लिम सांप्रदायिकता 'फिर राम मंदिर की आड़ मे 'हिन्दू सांप्रदायिकता' से समझौता करके विद्वेष भड़का कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पुरानी नीतियों को लागू कर दिया था । उनके कार्यकाल मे सरकार को कारपोरेट लाबी मे तब्दील कर दिया गया जो उनकी हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर मे प्रधानमंत्री बने पी वी नरसिंघा राव के वित्त मंत्री जो अब पी एम हैं के द्वारा और परिपुष्ट किया गया।
आज की राहुल कांग्रेस घोर जन-विरोधी एवं शोषक/उत्पीड़क शक्तियों का संरक्षक दल बन गई है।
वे कम्युनिस्ट जो प्रथम आम चुनावों के जरिये संसद मे 'मुख्य विपक्षी'दल थे और जिन्हों ने केरल मे विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार का गठन किया था जनता की नब्ज़ न पकड़ने के कारण पिछड़ गए हैं और अब राहुल जी उनको ही देश से उखाड़ फेंकने की दहाड़ लगा रहे हैं। मैं ढाई वर्षों से अपने ब्लाग के माध्यम ('क्रांतिस्वर'---http://krantiswar.blogspot.in)
से अपने विचारों मे जनता की नब्ज़ पर ध्यान रख कर चलने का निवेदन करता रहा हूँ जिसका संकीर्ण साम्यवादी लगातार विरोध करते रहे हैं। खुशी की बात है कि कभी साम्यवादी दल के प्रशिक्षक रहे डॉ मोहन श्रोत्रिय साहब ने भी आज ऐसे ही विचारों का समर्थन किया है।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
hindustaan,lakhnau ,28 janvaree 2013
उपरोक्त समाचार मे 'राहुल गांधी' को 'कांग्रेस उपाध्यक्ष' बताया गया है। परंतु प्रश्न यह है कि,यह कांग्रेस कौन सी कांग्रेस है?निश्चय ही राहुल जी की कांग्रेस वह कांग्रेस नहीं है जिसने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व किया था।राहुल जी की कांग्रेस मात्र 44 वर्ष की पार्टी है जिसका जन्म उनकी दादी साहिबा द्वारा स्वतन्त्रता आंदोलन की कांग्रेस के प्रति बगावत का नतीजा है।
सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या 'क्रान्ति' के विफल हो जाने के 18 वर्षों बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती (जिनहोने उस संग्राम मे सक्रिय भाग लिया था) सन 1875 ई .मे चैत्र प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र ) के दिन 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी जिसका मूल उद्देश्य जनता को 'ढोंग-पाखंड-आडंबर'के विरुद्ध जाग्रत करके भारत को स्वाधीन करना था। जहां-जहां ब्रिटिश छावनियाँ थीं वहाँ-वहाँ इसकी शाखाओं का गठन प्राथमिकता के आधार पर किया गया । ब्रिटिश हुकूमत ने स्वामी दयानन्द को क्रांतिकारी संत (Revolutionary Saint) की संज्ञा दी थी। भयभीत अङ्ग्रेज़ी सरकार ने लार्ड डफरिन के इशारे पर अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र बनर्जी की अध्यक्षता मे सन 1885 ई मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना करवाई जिसका उद्देश्य 'औपनिवेशिक राज्य'-Dominiyan State की स्थापना था। अतः स्वामी दयानन्द की प्रेरणा से आर्यसमाजी अधिकांश संख्या मे कांग्रेस मे शामिल हो गए और उसका उद्देश्य 'पूर्ण स्वाधीनता' करवाने मे कामयाब रहे। 'कांग्रेस का इतिहास' के लेखक डॉ पट्टाभि सीता रमेय्या ने लिखा है कि,'स्वाधीनता आंदोलन मे जेल जाने वाले कांग्रेसियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे'।
अतः स्वाधीनता आंदोलन को छीण करने हेतु ब्रिटिश सरकार ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को प्रेरित करके 'मुस्लिम लीग' की स्थापना 1906 मे तथा पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा 1920 मे 'हिन्दू महासभा' की स्थापना करवाई। भारतीयों को 'हिन्दू' और 'मुस्लिम' मे विभाजित करके परस्पर विरोध मे ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया किन्तु हिन्दू महासभा ज़्यादा कामयाब न हो सकी । अतः पूर्व कांग्रेसी डॉ हेडगेवार एवं पूर्व क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को माध्यम बना कर ब्रिटिश सरकार ने RSS की स्थापना 1925 ई मे करवाई। मुस्लिम लीग और RSS ने देश को 'दंगों' की आग मे झोंक दिया जिसकी अंतिम परिणति 'देश-विभाजन' के रूप मे सामने आई।
1925 ई मे देश-भक्त कांग्रेसियों ने 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य देश के स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करना तथा साम्राज्यवादी विदेशी सरकार की विभाजनकारी नीतियों को विफल करना था। 'गेंदा लाल दीक्षित','स्वामी सहजानन्द सरस्वती' सरीखे कट्टर आर्यसमाजी 'क्रांतिकारी कम्युनिस्ट' बने। 'सत्यार्थ प्रकाश' पढ़ कर ही सरदार भगत सिंह जिनके चाचा कट्टर आर्यसमाजी थे 'क्रांतिकारी कम्युनिस्ट' बने।
क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के प्रभाव को छीण करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी के अहिंसक सत्याग्रह के साथ समझौते करने शुरू किए जिसका जनता पर यह प्रभाव पड़ा कि,जनता ने गांधी जी के पीछे खुद को लामबंद कर लिया और इस प्रकार देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधीजी और उनकी कांग्रेस को दे दिया जबकि क्रांतिकारी कम्युनिस्टों तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस की INA-आज़ाद हिन्द फौज,एयर फोर्स व नेवी के विद्रोहों का बड़ा योगदान 15 अगस्त 1947 की आज़ादी के पीछे है।
आज़ादी दिलाने का श्रेय मिलना ही कांग्रेस की 'पूंजी' बना और वह सत्ता प्राप्त कर सकी। शनैः शनैः कांग्रेस सरकार जनता से कटती गई और 'पूंजीपतियों' को समृद्ध करती गई। 1967 मे सम्पूर्ण उत्तर भारत से कांग्रेस की सत्ता का सफाया हो गया। सत्ता पर अपनी पकड़ को बनाए रखने के उद्देश्य से इंदिरा गांधी जी (राहुल साहब की दादी )ने जनता को ठगने हेतु 'समाजवाद' का नारा लगा कर 1969 मे राष्ट्रपति चुनावों मे कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के विरुद्ध निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा करके मूल कांग्रेस से बगावत कर दी और 'इन्दिरा कांग्रेस' की स्थापना की। यह उपाध्यक्ष राहुल साहब इसी बागी कांग्रेस-इन्दिरा कांग्रेस के नेता हैं जिसका उद्देश्य शोषक/उत्पीड़क 'पूँजीपतियों' व 'उद्योगपतियों' का हितसाधन है और इंनका देश के स्वाधीनता आंदोलन से किसी प्रकार का कोई सरोकार कभी भी नहीं रहा है न ही देश की जनता से । न ही इनको कोई अधिकार है कि वह स्वाधीनता आंदोलन की विरासत का खुद को वारिस बताएं। ऐसा करना सिर्फ गलत बयानी ही होगा।
1971 मे बांग्लादेश के स्वाधीनता आंदोलन को सफल समर्थन देकर इंदिराजी की लोकप्रियता बढ़ गई थी और उसी को भुनाते हुये मध्यावधी चुनाव करा दिये थे। प्रचंड बहुमत का दुरुपयोग करते हुये संविधान मे संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष कर दिया था और खुद इन्दिरा जी का राय बरेली का चुनाव हाई कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर देश मे 'आपात काल' थोप कर प्रभावशाली नेताओं को जेलों मे ठूंस दिया था जिनमे 'लोकनायक जय प्रकाश नारायण''भी शामिल थे। जनता के साथ-साथ सरकारी कर्मचारी/अधिकारी बहुत त्रस्त थे और खुफिया विभाग ने गुमराह करके 1977 मे उनसे मध्यवधी चुनाव करवा दिये जिसमे इन्दिरा जी खुद भी और जहां का प्रतिनिधितित्व राहुल कर रहे हैं वहाँ से संजय गांधी भी चुनाव हार गए थे।
1980 के मध्यवधी चुनावों मे राहुल की दादी साहिबा ने RSS से 'गुप्त समझौता ' करके सांप्रदायिक आधार पर बहुमत हासिल कर लिया था और पूर्व 'जनता सरकार' को परेशान करने हेतु अपने द्वारा खड़े किए गए और 'भस्मासुर' बने भिंडरा वाले का सैन्य कारवाई मे खात्मा करा दिया था। परिणाम स्वरूप अपने ही अंग रक्षकों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी जिसकी सहानुभूति प्राप्त कर उनके उत्तराधिकारी -राहुल के पिता राजीव गांधी ने तीन चौथाई बहुमत हासिल कर लिया था और पहले 'शाहबानों'को न्याय से वंचित करने हेतु 'मुस्लिम सांप्रदायिकता 'फिर राम मंदिर की आड़ मे 'हिन्दू सांप्रदायिकता' से समझौता करके विद्वेष भड़का कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पुरानी नीतियों को लागू कर दिया था । उनके कार्यकाल मे सरकार को कारपोरेट लाबी मे तब्दील कर दिया गया जो उनकी हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर मे प्रधानमंत्री बने पी वी नरसिंघा राव के वित्त मंत्री जो अब पी एम हैं के द्वारा और परिपुष्ट किया गया।
आज की राहुल कांग्रेस घोर जन-विरोधी एवं शोषक/उत्पीड़क शक्तियों का संरक्षक दल बन गई है।
वे कम्युनिस्ट जो प्रथम आम चुनावों के जरिये संसद मे 'मुख्य विपक्षी'दल थे और जिन्हों ने केरल मे विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार का गठन किया था जनता की नब्ज़ न पकड़ने के कारण पिछड़ गए हैं और अब राहुल जी उनको ही देश से उखाड़ फेंकने की दहाड़ लगा रहे हैं। मैं ढाई वर्षों से अपने ब्लाग के माध्यम ('क्रांतिस्वर'---http://krantiswar.blogspot.in)
से अपने विचारों मे जनता की नब्ज़ पर ध्यान रख कर चलने का निवेदन करता रहा हूँ जिसका संकीर्ण साम्यवादी लगातार विरोध करते रहे हैं। खुशी की बात है कि कभी साम्यवादी दल के प्रशिक्षक रहे डॉ मोहन श्रोत्रिय साहब ने भी आज ऐसे ही विचारों का समर्थन किया है।
Vijai RajBali Mathur shared Mohan Shrotriya's status.13 फरवरी,2013
किन्तु
'धर्म' की वास्तविक व्याख्या और 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' के विरुद्ध मेरे 'क्रांतिस्वर' मे अभियान को बामपंथी साथी पुराणपंथियो के स्वर मे स्वर मिला
कर विरोध करके उसी पाखंड को मजबूत कर रहे हैं,क्यों?
***इस ओर भी ध्यान दें***
"विकलांग श्रद्धा" के दौर से उबरे बिना बुनियादी समस्याओं पर लोक की लामबंदी एकदम नामुमकिन है. पौराणिक आख्यानों का लोक-चेतना पर कितना गहरा असर है यह बात इस तथ्य से ही स्पष्ट और सिद्ध हो जाती है कि रोज़मर्रा के जीने-मरने के सवालों पर संगठित होने को अनिच्छुक लोग, कितनी बड़ी संख्या में अपने खर्चे पर "परलोक सुधारने" के अनुष्ठानों से जा जुड़ते हैं. भीषण सर्दी और यात्रा की तमाम असुविधाओं को धता बताते हुए.
इस लोक-मनोविज्ञान का अध्ययन करने के साथ-इसे बदलने के समानांतर कार्यक्रमों को हाथ में लिए बगैर किसी अर्थवान सामाजिक बदलाव की बात बेमानी होगी. वामपंथियों को अपने एजेंडे पर इसे रखना होगा अन्यथा किसी भी सामाजिक बदलाव की लड़ाई के ये स्वाभाविक सहभागी अनंत काल तक ऐसी लड़ाइयों से अपनी दूरी बनाए रखेंगे. यह जूनून जो जान चली जाने की आंखों-देखी घटनाओं से भी कम नहीं होता, मनःस्थितियां बदल जाने पर एक बड़े सामाजिक प्रयोजन की पूर्ति में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा कर सकता है. चाहें तो इसे महज़ क़यास कहकर ख़ारिज भी कर सकते हैं, पर ध्यान रहे कि इह-लोक को सुधारने के किसी भी अभियान से इस विशाल जनशक्ति का बाहर रहना भी चिंताजनक तो है ही. करोड़ों लोगों के कुछ मायने तो होते ही हैं. नहीं?
-मोश्रो
"विकलांग श्रद्धा" के दौर से उबरे बिना बुनियादी समस्याओं पर लोक की लामबंदी एकदम नामुमकिन है. पौराणिक आख्यानों का लोक-चेतना पर कितना गहरा असर है यह बात इस तथ्य से ही स्पष्ट और सिद्ध हो जाती है कि रोज़मर्रा के जीने-मरने के सवालों पर संगठित होने को अनिच्छुक लोग, कितनी बड़ी संख्या में अपने खर्चे पर "परलोक सुधारने" के अनुष्ठानों से जा जुड़ते हैं. भीषण सर्दी और यात्रा की तमाम असुविधाओं को धता बताते हुए.
इस लोक-मनोविज्ञान का अध्ययन करने के साथ-इसे बदलने के समानांतर कार्यक्रमों को हाथ में लिए बगैर किसी अर्थवान सामाजिक बदलाव की बात बेमानी होगी. वामपंथियों को अपने एजेंडे पर इसे रखना होगा अन्यथा किसी भी सामाजिक बदलाव की लड़ाई के ये स्वाभाविक सहभागी अनंत काल तक ऐसी लड़ाइयों से अपनी दूरी बनाए रखेंगे. यह जूनून जो जान चली जाने की आंखों-देखी घटनाओं से भी कम नहीं होता, मनःस्थितियां बदल जाने पर एक बड़े सामाजिक प्रयोजन की पूर्ति में अपनी सकारात्मक भूमिका अदा कर सकता है. चाहें तो इसे महज़ क़यास कहकर ख़ारिज भी कर सकते हैं, पर ध्यान रहे कि इह-लोक को सुधारने के किसी भी अभियान से इस विशाल जनशक्ति का बाहर रहना भी चिंताजनक तो है ही. करोड़ों लोगों के कुछ मायने तो होते ही हैं. नहीं?
-मोश्रो
- You, Manu Prakash Tyagi, Sanjog Walter and 2 others like this.
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Tuesday, 8 November 2011
"क्रान्तिकारी लाला हर दयाल "-हस्तक्षेप से साभार
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
वरिष्ठ पत्रकार सुनील दत्ता जी का एक लेख हस्तक्षेप .काम पर प्रकाशित हुआ है जिसे हम साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं-




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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
वरिष्ठ पत्रकार सुनील दत्ता जी का एक लेख हस्तक्षेप .काम पर प्रकाशित हुआ है जिसे हम साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं-
विलक्षण प्रतिभावान प्रवासी क्रांतिकारी -लाला हरदयाल
WRITTEN BY AMALENDU ON NOVEMBER 8TH, 2011 | NO COMMENTS
14 अक्तूबर 1884-4 मार्च 1939
सुनील दत्ता
लाला हरदयाल जी के बारे में लोग कम ही जानते है | उसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि उनकी वैचारिक एवं व्यवहारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र देश से बाहर विदेश में खासकर अमेरिका में रहा | लाला जी में प्रचण्ड बौद्धिक क्षमता के साथ आत्म त्याग की और राष्ट्र – सेवा तथा जन – सेवा की भावना भी अत्यन्त प्रबल थी | यही कारण है कि उनकी विलक्षण बौद्धिक क्षमता , उनके निजी जीवन की चदत – बढत का सोपान कभी नही बनी | उन्होंने ऐसे हर अवसर को दृढ़ता के साथ ठुकरा दिया | लाला हरदयाल का जीवन राष्ट्रवादी – क्रांतिकारी तथा आध्यात्मिक , वैचारिक एवं व्यवहारिक क्रिया – कलापों का एक अजीब सा मिश्रण है | पर उनके हर क्रिया – कलाप में राष्ट्र व मानव समाज की मुक्ति का लक्ष्य समाहित था |फिर उनके समग्र क्रिया -कलाप राष्ट्र के क्रांतिकारी स्वतंत्रता की दिशा में विकसित होते और बढ़ते रहे | इसलिए आर्य – समाज , बौद्दवाद के साथ स्वत: के आध्यात्मवादी चिंतन से आगे बढ़ते हुए वे क्रांतिकारी भौतिकवाद को भी अपनाने के प्रयास में लगे रहे | राजनीति के क्षेत्र में वे सुधारवादी राष्ट्रवाद व अराजकवाद से गुजरते हुए तथा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की दिशा में आगे बढ़ते हुए गदर पार्टी के प्रमुख नायक बने | अधाधुंध नीजिवादी , भोगवादी जीवन के वर्तमान दौर में लाला जी का जीवन उन लोगो के लिए स्मरणीय एवं अनुकरणीय है , जो आज राष्ट्र तथा जनसाधारण की गिरती दशाओं के प्रति गम्भीर है , चिन्तित हैं | राष्ट्र पर बढती विदेशी प्रभुत्व के वर्मान दौर में गदर पार्टी व लाला हरदयाल की गतिविधिया तथा राष्ट्र की क्रांतिकारी स्वतंत्रता के उनके उद्देश्य आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है |
महान राष्ट्रवादी विलक्षण विद्वान् , दृढनिश्चयी , संघर्षशील तथा आध्यात्मिक व्यक्तित्व के पर्याय थे लाला हरदयाल | उनका जन्म दिल्ली में हुआ था | उनके पिता गौरी दयाल माथुर जिला कचहरी में पेशकार थे | लाला हरदयाल ने दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज से बी0 ए0 किया |उसके पश्चात उन्होंने लाहौर के राजकीय कालेज से अंग्रेजी साहित्य में और फिर संस्कृत व इतिहास में मास्टर डिग्री किया | अनेक प्रश्न पत्रों में उन्हें शत – प्रतिशत अंक मिले | अंग्रेजी विषय में परीक्षक भी प्राय: अंग्रेज ही रहा करते थे , फिर भी उन्हें 96 % अंक प्राप्त हुए | उनकी शैक्षणिक उपलब्धिया साबित करती है कि वे विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा से सम्पन्न थे | अपनी इस प्रतिभा के चलते लन्दन के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा उच्च शिक्षा के लिए छात्र वृति मिली | इसके फलस्वरूप वे उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय पहुच गये | वहा के प्राध्यापक उनकी तीक्ष्ण बौद्धिकता से अत्यंत प्रभावित हुए | लन्दन में ही उनका परिचय श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुआ | श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृति विद्यार्थियों को अपनी ऑर आकर्षित कर रहे थे और विद्यार्थियों के रूप में वे क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | इन विद्यार्थियों के भोजन और रहने की व्यवस्था करने के लिए ” इंडिया हाउस ‘ की स्थापना की गयी थी | सच कहा जाए तो यह स्थान क्रान्तिकारियो के लिए ही था | लाला हरदयाल यही पर विनायक दामोदर सावरकर और मैडम भीकाजी कामा तथा अन्य राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो के सम्पर्क में आये और उनसे प्रभावित भी हुए | इंग्लैण्ड में रहते हुए भी उन्होंने भारत सरकार और आक्सफोर्ड विद्यापीठ की छात्रवृति को नकार दिया था | अंग्रेजी शिक्षा के साथ ही उन्होंने अंग्रेजी पोशाक को भी ठुकरा दिया था | लन्दन की ठंड में वे धोती पहनते थे |बाद में राष्ट्र स्वतंत्रता के उद्देश्य पूर्ति के लिए विश्व विद्यालय और इंग्लैण्ड को छोडकर हिन्दुस्तान पहुच आये | फिर देश सेवा के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया | उसके पश्चात उन्होंने पुन:कभी भी परिवार में वापसी नही की |यहा वे लाहौर के एक आश्रम में रहने लगे |फिर यहा उन्होंने पंजाबी भाषा में अखबार निकाला | लाहौर की आश्रम में कार्यकर्ताओं के भर्ती के लिए युवको के खोज के लिए कानपुर आये | यहा वे प्रसिद्ध वकील और समाज सेवक पृथ्वीनाथ के घर पर रुके | कुछ कार्यकर्ता जमा हुए | उनके सादगी पूर्ण और तपस्वियों – से जीवन का उन युवको पर बहुत प्रभाव पडा | फिर पंजाब के अकाल के समय उन्होंने संकटग्रस्त लोगो की बहुत सहायता की थी | इन कामो से भी वे अत्यधिक लोकप्रिय हुए | लन्दन में रहते हुए ही वे ‘ इंडियन सोशियोलाजिस्ट ‘ में ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में खुलकर लिखा करते थे | यह प्रक्रिया उन्होंने यहा भी जारी रखी |सरकार विरोधी रवैये के साथ उनकी बढती लोकप्रियता को को देखकर सरकार उन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहती थी |इसीलिए कुछ शुभ चिंतको ने तथा लाला लाजपत राय ने भी लाला हरदयाल को विदेश चले जाने पर पूरा जोर लगा दिया | परन्तु हरदयाल इसके लिए तैयार नही थे | बहुत कहने सुनने पर लाला हरदयाल ने बड़े दू:खी मन से भारत छोड़ा | भविष्य में वे पुन: कभी भारत के दर्शन न कर सके | वे कोलम्बो मार्ग से इटली और इटली से फ्रांस पहुचे |फ्रांस में श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनका सहयोगी दल सक्रिय था | मादाम कामा ने ‘वन्देमातरम ‘ नामक अखबार का सम्पादन कार्य लाला हरदयाल जी को सौप दिया | उस दैनिक पत्र का प्रथम अंक मदन लाल धिगरा की स्मृति को समर्पित किया गया |आगामी अंको में भी बलिदानों के संस्मरण ही रहते थे | ये अंक भारतीयों को देशभक्ति की प्रेरणा देते थे | पेरिस में ब्रिटिश सरकार की नजर इन भारतीय क्रांतिकारियों का पीछा कर ही रही थी |
ब्रिटिश सरकार फ्रांस सरकार पर इन भारतीयों को गिरफ्तार करने के लिए दबाव डाल रही थी | इन परिस्थितियों में लाला हरदयाल मिस्र चले गये | वहा मिस्र के क्रांतिकारियों से उनका परिचय हुआ | कुछ समय बाद वे पुन: पेरिस वापस लौटे , परन्तु अभी भी उन पर ब्रिटिश सरकार की नजर थी , जिससे बचने के लिए वे वेस्टइंडीज के ‘ ला मार्टिनिक ‘ नामक समुद्री तट पर पहुचे | वहा वे लोगो को अंग्रेजी पढाकर अपना गुजर – बसर करते अपने साथियो और क्रांतिकारी आंदोलनों से निर्लिप्त होकर दूर अकेले पड़े थे | वे पूरी तरह सन्यासियों और वैरागियो – सा जीवन व्यतीत कर रहे थे | फिर भी उन्हें खोजते हुए प्रसिद्ध आर्य समाजी एवं क्रांतिकारी भाई परमानन्द वहा पहुचे | भाई परमानन्द लाला हरदयाल के साथ उस समुद्र किनारे महीना भर रहे |उन्होंने उन्हें तपस्वी जीवन छोडकर पुन:क्रांति कार्य में शामिल होने के लिए राज़ी कर लिया |
लाला हरदयाल पेरिस में बिताए जा रहे अपने जीवन और अपने लोगो की स्वार्थ – वृत्ति से उकता गये थे |भाई परमानन्द जैसे क्रांतिकारी ही उन्हें पुन:आन्दोलन में वापस लाने में सफल हो सकते थे |भाई परमानन्द के जोर देने पर वे कैलिफोर्निया पहुचे |वहा उन्होंने एक समिति का गठन किया और भारत के परिश्रमी विद्यार्थियों के लिए अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए छात्र वृत्ति देने की घोषणा की |उन्होंने छ:विद्यार्थियों को चुना और उन्हें उच्च शिक्षा देने के साथ ही क्रान्तिकारी उद्देश्यों की भी शिक्षा देने का काम किया |इस दौरान लाला हरदयाल के सेन फ्रांसिस्को में और बर्कल में दीये गये भाषणों से प्रभावित होकर उन्हें लेलैंड – स्टेनफोर्ड विद्यापीठ में संस्कृत और भारतीय दर्शन के प्राध्यापक के पद पर रखा गया , जिसे उन्होंने अवैतनिक सेवा के रूप में ही स्वीकारा |अमेरिका में उनकी प्रसिद्धि एक भारतीय ऋषि के रूप में फ़ैल गयी |अपनी लोकप्रियता और प्रसिद्धि का उपयोग उन्होंने क्रांति कार्य को बढावा देने में कर लिया | अमेरिका में रहते हुए भी उनका सारा ध्यान भारत में आ रहे बदलाव पर लगा हुआ था |23 दिसम्बर , 1912 को दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर बम फेंके जाने की खबर सुनकर वे प्रसन्न हुए थे |इस उपलक्ष्य में उन्होंने उनके क्रांतिकारी विद्यार्थियों ने ‘वन्देमातरम ‘ ‘भारत माता की जय ‘ की हर्षोल्लास के साथ सार्वजनिक सभा को भी आयोजित किया |
1- अमेरिका व कनाडा में प्रवासी हिन्दुस्तानियों में देश को स्वतंत्र कराने की भावनाए जोर पकड़ने लगी थी |उनमे खासकर पंजाब के किसान घरो से गये हुए लोगो की अच्छी खासी संख्या थी | लाला हरदयाल अब इन राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो के साथ थे | उनके अगुवा लोगो में थे |उन्होंने अमेरिका में हिन्दुस्तानियों की समिति का गठन किया | पहले उसका नाम ‘ द हिन्दुस्तान एसोसियन आफ द पेसिफिक एशियन ‘ था | बाद में उसका नाम बदलकर ‘ गदर पार्टी ‘ रख दिया गया |गदर पार्टी के अध्यक्ष सोहन सिंह बहकना थे |लाला हरदयाल उसके मंत्री और पंडित काशीराम कोषाध्यक्ष थे |गदर पार्टी का प्रमुख पत्र ‘ गदर ‘ था |जो उर्दू और पंजाबी भाषा में निकलता था |कुछ सामग्री अंग्रेजी में भी प्रकाशित की जाती थी |’ गदर ‘ की प्रतिया सारी दुनिया में भेजी जाती थी | कड़े पहरे के बावजूद ‘ गदर ‘ की प्रतिया हिन्दुस्तान की लश्करी छावनियो तक में पहुचाई जाती थी |२ गदर पार्टी के एक अगुआ के रूप में ही लाला हरदयाल का राष्ट्रवादी , क्रांतिकारी जीवन परवान चढा |वे अमेरिका में पार्टी के एक प्रमुख प्रवक्ता या कहिये प्रमुख बौद्धिक प्रतिनिधि थे |गदर पार्टी के साहित्यों के प्रकाशन में लाला जी की अग्रणी भूमिकाये थी | पार्टी के प्रति विदेशो में समर्थन जुटाने और अन्य देशो में बसे हिन्दुस्तानियों को इसका सक्रिय समर्थन व सहयोगी बनाने की भूमिका प्रमुखत:लाला हरदयाल को ही निभानी थी | सेन फ्रांस्सिको का युगान्तर आश्रम गदर पार्टी और ‘ गदर ‘ पत्र का कार्यालय था | इस आश्रम में अनेक क्रांतिकारियों के साथ लाला हरदयाल तपोमय पर क्रांतिकारी जीवन जी रहे थे |’ गदर ‘ के अभियान को गति तो मिल रही थी |साथ ही लाला हरदयाल के ओजस्वी लेखन के जादू से धन संग्रह भी बढ़ रहा था |बाद में ‘ गदर ‘ पार्टी के अनुरोध से वे तुर्की से जिनेवा पहुच गये |रामदास के झूठे नाम से 27 जनवरी 1915 को वे जिनेवा से बर्लिन जा पहुचे |तब तक प्रथम विश्व युद्ध का आरम्भ हो चुका था |अनेक भारतीय क्रांतिकारी बर्लिन में जमा थे | उन्होंने बर्लिन कमेटी की स्थापना करके यहा भी स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी | इन क्रान्तिकारियो में चम्पक रामन पिल्लै , तारकनाथ दास , अब्दुल हफ़ीज़ , बरकतुल्ला , डॉ ० भूपेन्द्रनाथ दत्त , डॉ प्रभाकर , वीरेंद्र सरकार व वीरेंद्र चट्टोपाध्याय प्रमुख थे | लाला हरदयाल के आ जाने से क्रांतिकारी साहित्य के निर्माण में तेज़ी आ गयी | क्रान्तिकारियो ने तुर्की , अरब और अफगानिस्तान के शासको को ब्रिटेन के विरुद्ध एकत्रित होने का पत्र भी भेजा था | परन्तु वह पत्र अंग्रेजो के हाथ लग गया | क्रान्तिकारियो की यह योजना थी कि भारतीय जनता की ओर से जब भारत विद्रोह हो तभी अंग्रेजो के शत्रु देश आक्रमण तेज़ कर दे | अपने लक्ष्य तक पहुचने के लिए गदर पार्टी के सदस्य हजारो की संख्या में अमेरिका और कनाडा से भारत वापस लौट रहे थे |पंजाब और संयुक्त प्रांत के गदर आन्दोलन का संचालन रासबिहारी बोस और यतीन्द्रनाथ सान्याल कर रहे थे |यतीन्द्रनाथ मुखर्जी ( बाघा जतिन ) बंगाल से एशिया और यूरोप के क्रान्तिकारियो से सम्पर्क साध रहे थे |बर्लिन कमेटी के प्रयत्नों से क्रान्तिकारियो के लिए जर्मनी से शस्त्रों से भरे जहाज भेजे गये |परन्तु अंग्रेजो ने इन्हें पकड़ लिया |लाला हरदयाल ने फ्रांस , स्वीडन , नार्वे , स्विट्जरलैंड , इटली ,आस्ट्रिया आदि देशो के क्रान्तिकारियो से सम्पर्क बनाकर उन्हें भारत की क्रांति के समर्थन के लिए प्रेरित किया |जर्मनी में युद्ध बंदी के पश्चात लौटे हुए सैनिको का उपयोग करने की योजना बनाई गयी | लेकिन विश्वासघातियो के चलते गदर पार्टी द्वारा देश में सशस्त्र एवं सैन्य विद्रोह के जरिये राष्ट्र को स्वतंत्र कराने का प्रयास निर्धारित समय से पहले ही विफल हो गया | लिहाजा लाला हरदयाल और विदेशो में रह रहे दुसरे क्रान्तिकारियो का मनोबल भी काफी टूट – सा गया | उधर विश्व युद्ध के अंतिम दौर से पराजित हो रहे जर्मनी का भारत की तरफ देखने का दृष्टिकोण बदल गया था |अब जर्मनी ने लाला हरदयाल पर नजर रखनी शुरू की | 1916 से 1917 तक वे जर्मनी में नजर कैद में रखे गये | बाद में छिपते हुए स्वीडन पहुचे और अलग – अलग शहरों में 9 वर्षो तक रहे | विलक्षण बुद्धि के धनी तो वे थे ही |स्वीडन पहुचते ही स्वीडिश भाषा में अपना भाषण सभाष्ण और अध्यापन भी करने लगे | दुनिया कि अनेक भाषाओं पर उनको महारत हासिल थी | अध्यापन से वे अपनी आजीविका चलाते रहे | वहा भी उनके अनेक मित्र और प्रशंसक बन गये थे | बाद के दौर में सर तेज़ बहादुर सप्रू और सी ० ऍफ़ ० एंड्रूज के प्रयत्नों से ब्रिटिश सरकार से उन्हें भारत आने की अनुमति मिल गयी | उस समय लाला हरदयाल अमेरिका में थे | स्वदेश वापसी की अनुमति के वावजूद लाला हरदयाल हिन्दुस्तान कभी नही पहुच सके | अमेरिका के फिलाडेलिफया नामक स्थान पे 4 मार्च 1939 को उनकी अकस्मात मृत्यु हो गयी | मृत्यु से पहले वे पूरी तरह स्वस्थ थे |हमेशा कि तरह 3 मार्च कि रात को वे सोये और दूसरे दिन उन्हें मृत पाया गया | लाला हरदयाल व उनके साथी क्रांतिकारी युद्ध के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना चाहते थे | पर वे अपने उद्देश्य में सफल न हो सके | लेकिन राष्ट्र – स्वतंत्रता के उनके उद्देश्य और उसके लिए किए गये अथक प्रयास देश वासियों के लिए स्मरणीय है | लाला हरदयाल विलक्षण -प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व थे , वे कुशल वक्ता और उच्च कोटि के लेखक भी थे |उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की | इसमें कोई सन्देह नही की अगर जीवन ने उन्हें और मौक़ा दिया होता तो वे अपनी विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा और सांगठनिक क्षमता का उपयोग आश्चर्यजनक कार्यो के लिए कर जाते.
ऐसे महान क्रांतिकारी को मेरा शत – शत नमन
महान राष्ट्रवादी विलक्षण विद्वान् , दृढनिश्चयी , संघर्षशील तथा आध्यात्मिक व्यक्तित्व के पर्याय थे लाला हरदयाल | उनका जन्म दिल्ली में हुआ था | उनके पिता गौरी दयाल माथुर जिला कचहरी में पेशकार थे | लाला हरदयाल ने दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज से बी0 ए0 किया |उसके पश्चात उन्होंने लाहौर के राजकीय कालेज से अंग्रेजी साहित्य में और फिर संस्कृत व इतिहास में मास्टर डिग्री किया | अनेक प्रश्न पत्रों में उन्हें शत – प्रतिशत अंक मिले | अंग्रेजी विषय में परीक्षक भी प्राय: अंग्रेज ही रहा करते थे , फिर भी उन्हें 96 % अंक प्राप्त हुए | उनकी शैक्षणिक उपलब्धिया साबित करती है कि वे विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा से सम्पन्न थे | अपनी इस प्रतिभा के चलते लन्दन के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा उच्च शिक्षा के लिए छात्र वृति मिली | इसके फलस्वरूप वे उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय पहुच गये | वहा के प्राध्यापक उनकी तीक्ष्ण बौद्धिकता से अत्यंत प्रभावित हुए | लन्दन में ही उनका परिचय श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुआ | श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृति विद्यार्थियों को अपनी ऑर आकर्षित कर रहे थे और विद्यार्थियों के रूप में वे क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | इन विद्यार्थियों के भोजन और रहने की व्यवस्था करने के लिए ” इंडिया हाउस ‘ की स्थापना की गयी थी | सच कहा जाए तो यह स्थान क्रान्तिकारियो के लिए ही था | लाला हरदयाल यही पर विनायक दामोदर सावरकर और मैडम भीकाजी कामा तथा अन्य राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो के सम्पर्क में आये और उनसे प्रभावित भी हुए | इंग्लैण्ड में रहते हुए भी उन्होंने भारत सरकार और आक्सफोर्ड विद्यापीठ की छात्रवृति को नकार दिया था | अंग्रेजी शिक्षा के साथ ही उन्होंने अंग्रेजी पोशाक को भी ठुकरा दिया था | लन्दन की ठंड में वे धोती पहनते थे |बाद में राष्ट्र स्वतंत्रता के उद्देश्य पूर्ति के लिए विश्व विद्यालय और इंग्लैण्ड को छोडकर हिन्दुस्तान पहुच आये | फिर देश सेवा के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया | उसके पश्चात उन्होंने पुन:कभी भी परिवार में वापसी नही की |यहा वे लाहौर के एक आश्रम में रहने लगे |फिर यहा उन्होंने पंजाबी भाषा में अखबार निकाला | लाहौर की आश्रम में कार्यकर्ताओं के भर्ती के लिए युवको के खोज के लिए कानपुर आये | यहा वे प्रसिद्ध वकील और समाज सेवक पृथ्वीनाथ के घर पर रुके | कुछ कार्यकर्ता जमा हुए | उनके सादगी पूर्ण और तपस्वियों – से जीवन का उन युवको पर बहुत प्रभाव पडा | फिर पंजाब के अकाल के समय उन्होंने संकटग्रस्त लोगो की बहुत सहायता की थी | इन कामो से भी वे अत्यधिक लोकप्रिय हुए | लन्दन में रहते हुए ही वे ‘ इंडियन सोशियोलाजिस्ट ‘ में ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में खुलकर लिखा करते थे | यह प्रक्रिया उन्होंने यहा भी जारी रखी |सरकार विरोधी रवैये के साथ उनकी बढती लोकप्रियता को को देखकर सरकार उन्हें गिरफ्तार कर लेना चाहती थी |इसीलिए कुछ शुभ चिंतको ने तथा लाला लाजपत राय ने भी लाला हरदयाल को विदेश चले जाने पर पूरा जोर लगा दिया | परन्तु हरदयाल इसके लिए तैयार नही थे | बहुत कहने सुनने पर लाला हरदयाल ने बड़े दू:खी मन से भारत छोड़ा | भविष्य में वे पुन: कभी भारत के दर्शन न कर सके | वे कोलम्बो मार्ग से इटली और इटली से फ्रांस पहुचे |फ्रांस में श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनका सहयोगी दल सक्रिय था | मादाम कामा ने ‘वन्देमातरम ‘ नामक अखबार का सम्पादन कार्य लाला हरदयाल जी को सौप दिया | उस दैनिक पत्र का प्रथम अंक मदन लाल धिगरा की स्मृति को समर्पित किया गया |आगामी अंको में भी बलिदानों के संस्मरण ही रहते थे | ये अंक भारतीयों को देशभक्ति की प्रेरणा देते थे | पेरिस में ब्रिटिश सरकार की नजर इन भारतीय क्रांतिकारियों का पीछा कर ही रही थी |
ब्रिटिश सरकार फ्रांस सरकार पर इन भारतीयों को गिरफ्तार करने के लिए दबाव डाल रही थी | इन परिस्थितियों में लाला हरदयाल मिस्र चले गये | वहा मिस्र के क्रांतिकारियों से उनका परिचय हुआ | कुछ समय बाद वे पुन: पेरिस वापस लौटे , परन्तु अभी भी उन पर ब्रिटिश सरकार की नजर थी , जिससे बचने के लिए वे वेस्टइंडीज के ‘ ला मार्टिनिक ‘ नामक समुद्री तट पर पहुचे | वहा वे लोगो को अंग्रेजी पढाकर अपना गुजर – बसर करते अपने साथियो और क्रांतिकारी आंदोलनों से निर्लिप्त होकर दूर अकेले पड़े थे | वे पूरी तरह सन्यासियों और वैरागियो – सा जीवन व्यतीत कर रहे थे | फिर भी उन्हें खोजते हुए प्रसिद्ध आर्य समाजी एवं क्रांतिकारी भाई परमानन्द वहा पहुचे | भाई परमानन्द लाला हरदयाल के साथ उस समुद्र किनारे महीना भर रहे |उन्होंने उन्हें तपस्वी जीवन छोडकर पुन:क्रांति कार्य में शामिल होने के लिए राज़ी कर लिया |
लाला हरदयाल पेरिस में बिताए जा रहे अपने जीवन और अपने लोगो की स्वार्थ – वृत्ति से उकता गये थे |भाई परमानन्द जैसे क्रांतिकारी ही उन्हें पुन:आन्दोलन में वापस लाने में सफल हो सकते थे |भाई परमानन्द के जोर देने पर वे कैलिफोर्निया पहुचे |वहा उन्होंने एक समिति का गठन किया और भारत के परिश्रमी विद्यार्थियों के लिए अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए छात्र वृत्ति देने की घोषणा की |उन्होंने छ:विद्यार्थियों को चुना और उन्हें उच्च शिक्षा देने के साथ ही क्रान्तिकारी उद्देश्यों की भी शिक्षा देने का काम किया |इस दौरान लाला हरदयाल के सेन फ्रांसिस्को में और बर्कल में दीये गये भाषणों से प्रभावित होकर उन्हें लेलैंड – स्टेनफोर्ड विद्यापीठ में संस्कृत और भारतीय दर्शन के प्राध्यापक के पद पर रखा गया , जिसे उन्होंने अवैतनिक सेवा के रूप में ही स्वीकारा |अमेरिका में उनकी प्रसिद्धि एक भारतीय ऋषि के रूप में फ़ैल गयी |अपनी लोकप्रियता और प्रसिद्धि का उपयोग उन्होंने क्रांति कार्य को बढावा देने में कर लिया | अमेरिका में रहते हुए भी उनका सारा ध्यान भारत में आ रहे बदलाव पर लगा हुआ था |23 दिसम्बर , 1912 को दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर बम फेंके जाने की खबर सुनकर वे प्रसन्न हुए थे |इस उपलक्ष्य में उन्होंने उनके क्रांतिकारी विद्यार्थियों ने ‘वन्देमातरम ‘ ‘भारत माता की जय ‘ की हर्षोल्लास के साथ सार्वजनिक सभा को भी आयोजित किया |
1- अमेरिका व कनाडा में प्रवासी हिन्दुस्तानियों में देश को स्वतंत्र कराने की भावनाए जोर पकड़ने लगी थी |उनमे खासकर पंजाब के किसान घरो से गये हुए लोगो की अच्छी खासी संख्या थी | लाला हरदयाल अब इन राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियो के साथ थे | उनके अगुवा लोगो में थे |उन्होंने अमेरिका में हिन्दुस्तानियों की समिति का गठन किया | पहले उसका नाम ‘ द हिन्दुस्तान एसोसियन आफ द पेसिफिक एशियन ‘ था | बाद में उसका नाम बदलकर ‘ गदर पार्टी ‘ रख दिया गया |गदर पार्टी के अध्यक्ष सोहन सिंह बहकना थे |लाला हरदयाल उसके मंत्री और पंडित काशीराम कोषाध्यक्ष थे |गदर पार्टी का प्रमुख पत्र ‘ गदर ‘ था |जो उर्दू और पंजाबी भाषा में निकलता था |कुछ सामग्री अंग्रेजी में भी प्रकाशित की जाती थी |’ गदर ‘ की प्रतिया सारी दुनिया में भेजी जाती थी | कड़े पहरे के बावजूद ‘ गदर ‘ की प्रतिया हिन्दुस्तान की लश्करी छावनियो तक में पहुचाई जाती थी |२ गदर पार्टी के एक अगुआ के रूप में ही लाला हरदयाल का राष्ट्रवादी , क्रांतिकारी जीवन परवान चढा |वे अमेरिका में पार्टी के एक प्रमुख प्रवक्ता या कहिये प्रमुख बौद्धिक प्रतिनिधि थे |गदर पार्टी के साहित्यों के प्रकाशन में लाला जी की अग्रणी भूमिकाये थी | पार्टी के प्रति विदेशो में समर्थन जुटाने और अन्य देशो में बसे हिन्दुस्तानियों को इसका सक्रिय समर्थन व सहयोगी बनाने की भूमिका प्रमुखत:लाला हरदयाल को ही निभानी थी | सेन फ्रांस्सिको का युगान्तर आश्रम गदर पार्टी और ‘ गदर ‘ पत्र का कार्यालय था | इस आश्रम में अनेक क्रांतिकारियों के साथ लाला हरदयाल तपोमय पर क्रांतिकारी जीवन जी रहे थे |’ गदर ‘ के अभियान को गति तो मिल रही थी |साथ ही लाला हरदयाल के ओजस्वी लेखन के जादू से धन संग्रह भी बढ़ रहा था |बाद में ‘ गदर ‘ पार्टी के अनुरोध से वे तुर्की से जिनेवा पहुच गये |रामदास के झूठे नाम से 27 जनवरी 1915 को वे जिनेवा से बर्लिन जा पहुचे |तब तक प्रथम विश्व युद्ध का आरम्भ हो चुका था |अनेक भारतीय क्रांतिकारी बर्लिन में जमा थे | उन्होंने बर्लिन कमेटी की स्थापना करके यहा भी स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी | इन क्रान्तिकारियो में चम्पक रामन पिल्लै , तारकनाथ दास , अब्दुल हफ़ीज़ , बरकतुल्ला , डॉ ० भूपेन्द्रनाथ दत्त , डॉ प्रभाकर , वीरेंद्र सरकार व वीरेंद्र चट्टोपाध्याय प्रमुख थे | लाला हरदयाल के आ जाने से क्रांतिकारी साहित्य के निर्माण में तेज़ी आ गयी | क्रान्तिकारियो ने तुर्की , अरब और अफगानिस्तान के शासको को ब्रिटेन के विरुद्ध एकत्रित होने का पत्र भी भेजा था | परन्तु वह पत्र अंग्रेजो के हाथ लग गया | क्रान्तिकारियो की यह योजना थी कि भारतीय जनता की ओर से जब भारत विद्रोह हो तभी अंग्रेजो के शत्रु देश आक्रमण तेज़ कर दे | अपने लक्ष्य तक पहुचने के लिए गदर पार्टी के सदस्य हजारो की संख्या में अमेरिका और कनाडा से भारत वापस लौट रहे थे |पंजाब और संयुक्त प्रांत के गदर आन्दोलन का संचालन रासबिहारी बोस और यतीन्द्रनाथ सान्याल कर रहे थे |यतीन्द्रनाथ मुखर्जी ( बाघा जतिन ) बंगाल से एशिया और यूरोप के क्रान्तिकारियो से सम्पर्क साध रहे थे |बर्लिन कमेटी के प्रयत्नों से क्रान्तिकारियो के लिए जर्मनी से शस्त्रों से भरे जहाज भेजे गये |परन्तु अंग्रेजो ने इन्हें पकड़ लिया |लाला हरदयाल ने फ्रांस , स्वीडन , नार्वे , स्विट्जरलैंड , इटली ,आस्ट्रिया आदि देशो के क्रान्तिकारियो से सम्पर्क बनाकर उन्हें भारत की क्रांति के समर्थन के लिए प्रेरित किया |जर्मनी में युद्ध बंदी के पश्चात लौटे हुए सैनिको का उपयोग करने की योजना बनाई गयी | लेकिन विश्वासघातियो के चलते गदर पार्टी द्वारा देश में सशस्त्र एवं सैन्य विद्रोह के जरिये राष्ट्र को स्वतंत्र कराने का प्रयास निर्धारित समय से पहले ही विफल हो गया | लिहाजा लाला हरदयाल और विदेशो में रह रहे दुसरे क्रान्तिकारियो का मनोबल भी काफी टूट – सा गया | उधर विश्व युद्ध के अंतिम दौर से पराजित हो रहे जर्मनी का भारत की तरफ देखने का दृष्टिकोण बदल गया था |अब जर्मनी ने लाला हरदयाल पर नजर रखनी शुरू की | 1916 से 1917 तक वे जर्मनी में नजर कैद में रखे गये | बाद में छिपते हुए स्वीडन पहुचे और अलग – अलग शहरों में 9 वर्षो तक रहे | विलक्षण बुद्धि के धनी तो वे थे ही |स्वीडन पहुचते ही स्वीडिश भाषा में अपना भाषण सभाष्ण और अध्यापन भी करने लगे | दुनिया कि अनेक भाषाओं पर उनको महारत हासिल थी | अध्यापन से वे अपनी आजीविका चलाते रहे | वहा भी उनके अनेक मित्र और प्रशंसक बन गये थे | बाद के दौर में सर तेज़ बहादुर सप्रू और सी ० ऍफ़ ० एंड्रूज के प्रयत्नों से ब्रिटिश सरकार से उन्हें भारत आने की अनुमति मिल गयी | उस समय लाला हरदयाल अमेरिका में थे | स्वदेश वापसी की अनुमति के वावजूद लाला हरदयाल हिन्दुस्तान कभी नही पहुच सके | अमेरिका के फिलाडेलिफया नामक स्थान पे 4 मार्च 1939 को उनकी अकस्मात मृत्यु हो गयी | मृत्यु से पहले वे पूरी तरह स्वस्थ थे |हमेशा कि तरह 3 मार्च कि रात को वे सोये और दूसरे दिन उन्हें मृत पाया गया | लाला हरदयाल व उनके साथी क्रांतिकारी युद्ध के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना चाहते थे | पर वे अपने उद्देश्य में सफल न हो सके | लेकिन राष्ट्र – स्वतंत्रता के उनके उद्देश्य और उसके लिए किए गये अथक प्रयास देश वासियों के लिए स्मरणीय है | लाला हरदयाल विलक्षण -प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व थे , वे कुशल वक्ता और उच्च कोटि के लेखक भी थे |उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की | इसमें कोई सन्देह नही की अगर जीवन ने उन्हें और मौक़ा दिया होता तो वे अपनी विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा और सांगठनिक क्षमता का उपयोग आश्चर्यजनक कार्यो के लिए कर जाते.
ऐसे महान क्रांतिकारी को मेरा शत – शत नमन
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Friday, 28 October 2011
अध्यात्म और कम्यूनिज़्म
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उडिया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार मनोज दास जी जो खुद बाम-पंथी रहे हैं और अब आध्यात्मिकता के मार्ग से जन-कल्याण मे लगे हुये हैं यहाँ स्पष्ट रूप से कह गए हैं कि 'बुकर पुरस्कार' भारत को नीचा दिखाने वालों को दिया जाता है और "बुकर पुरस्कार तय करने वाली कमेटी सामाजिक यथार्थ और कामुकता का काकटेल है।"
अभी कुछ ही दिनों पहले जन-लोकपाल को नियुक्त करने की कमेटी मे 'बुकर' पुरस्कार प्राप्त लोगों को रखने की मांग एक भारत-विरोधी शख्स ने खुले आम रखी थी। उसी शख्स ने स्वाधीनता दिवस पर ब्लैक आउट रखवाया था उसी ने राष्ट्रध्वज का अपमान करवाया था और आज भी वह तथा उसके गैंग के लोग निर्बाध घूम रहे हैं।दुर्भाग्य यह है कि विद्वान भी जिनमे इंटरनेटी ब्लागर्स भी शामिल हैं उसी देशद्रोही शख्स के अंध-भक्त बने हुये हैं।
मनोज दास जी ने बताया है कि आज 36 प्रतिशत लोग 'अवसाद'-डिप्रेशन -से ग्रस्त हैं । बच्चों को अपने माँ-बाप पर नही ,फेसबुक और एस एम एस पर विश्वास है।मेरे विचार मे उसी प्रकार इंटरनेटी ब्लागर्स को देश-भक्तों पर नही 'अन्ना' पर विश्वास है। अन्ना आंदोलन कांग्रेस के मनमोहन गुट,संघ/भाजपा ,भारतीय और अमेरिकी कारपोरेट घरानों तथा अमेरिकी प्रशासन के सहयोग से 'कारपोरेट-भ्रष्टाचार के संरक्षण' हेतु चलाया गया था। अपने उद्देश्य मे वह जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ कर पूरी तरह सफल रहा है। टाटा,अंबानी,नीरा राडिया आदि उद्योगपति और उनके दलाल जिनहोने 'राजा' आदि मंत्री अपने हितार्थ बनवाए खुले घूम रहे हैं और राजा आदि मंत्री जिनहोने इन उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाया जेल मे विराजमान हैं। राजनेताओं का मखौल उड़ाने वाली किरण बेदी एयर टिकटों का घपला करके और अरविंद केजरीवाल प्राप्त चंदे मे घपला करके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मे जनता को बेवकूफ बना रहे थे। हमारे इंटरनेटी ब्लागर्स उनका गुणगान कर रहे थे/हैं। सम्पूर्ण परिस्थितियों के लिए धर्म के नाम पर फैली अधार्मिकता जिम्मेदार है। लेकिन अफसोस कि हमारा बाम-पंथ अधार्मिकों की परिभाषा स्वीकार करके धर्म का विरोध करता तथा जनता की सहानुभूति खोता रहता है। जब मै धर्म की परिभाषा बताने का प्रयास करता हूँ तो सांप्रदायिक तत्व मुझ पर प्रहार करते हैं और हमारे बाम-पंथी बंधु भी उसका विरोध करते हैं। 'सत्य' कड़ुवा होता है और उसे कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहता।
आध्यात्मिकता=अध्ययन +आत्मा= अपनी आत्मा का अध्ययन करना ही अध्यात्म है।
धर्म=जो धारण करता है (शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है वही धर्म है बाकी सब अधर्म है,एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए मूली अथवा दही का सेवन करना धर्म है लेकिन जुकाम-खांसी के रोगी व्यक्ति हेतु वही दही अथवा मूली सेवन अधर्म है)। यह व्यक्ति सापेक्ष है। सब को एक ही तरह नहीं हाँका जा सकता।
भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। इन पाँच प्रकृतिक तत्वों के समन्वय को भगवान कहते हैं इनके पहले अक्षरों के संयोजन से और चूंकि ये खुद ही बने हैं इन्हें किसी ने बनाया नहीं है इसीलिए इन्हे 'खुदा' भी कहते हैं और चूंकि येGENERATE,OPERATE ,DESTROY करते हैं पहले अक्षरों के संयोजन से इन्हे ही GOD भी कहते हैं। भगवान=खुदा =GOD तीनों एक ही के तीन नाम हैं। मतभेद कहाँ है?
मतभेद जो है वह दलालों=पुरोहितों ने अपने निजी स्वार्थ मे जनता को बाँट कर शोषण करने हेतु उत्पन्न किया है। अतः हमे पुरोहितवाद का जम कर और डट कर विरोध करना है न कि,अध्यात्म,भगवान,खुदा या गाड का या शरीर को धारण करने वाले धर्म का।
बाम-पंथ,कम्यूनिस्ट और वैज्ञानिक यहीं गलती करते हैं कि वे ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितों की व्याख्या को धर्म मान कर धर्म का विरोध करते हैं। महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी पुरोहितवाद को ही धर्म मान कर उसका विरोध किया है। आज के कम्यूनिस्ट भी दक़ियानूसी पोंगापंथियों के काले कारनामों को ही धर्म मान कर धर्म का विरोध करते हैं जबकि उन्हे वास्तविकता को समझ कर,पहचान कर जनता को भी समझाना चाहिए तभी 'मानव को मानव के शोषण 'से मुक्त कराकर 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाया जा सकेगा अन्यथा पुरोहितवाद का शिकार होकर परस्पर संघर्षरत रह कर जनता अपना उल्टे उस्तरे से मुंडन कराती रहेगी।
साहित्यकार मनोज दास जी ने जनता को बामपंथ के मर्म को समझाने हेतु अध्यात्म का मार्ग अपना कर एक सकारात्मक पहल की है। हम उनके प्रयासों की सफलता की कामना करते हैं और 'भाई-दोज़' के इस पावन पर्व पर दुनिया मे भाई-चारा और अमन कायम करने की दिली ख़्वाहिश रखते हैं।
'भाई-दोज' पर' चित्रगुप्त-पूजा' भी होती है। 'चित्रगुप्त' के संबंध मे भी पुरोहितवाद ने भ्रांति फैला रखी है। ढोंगियों के अनुसार ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने के कारण 'कायस्थ'कहलाने वाले चित्रगुप्त की एक पत्नी ब्राह्मण कन्या और दूसरी नाग कन्या थीं। पढे-लिखे और समझदार कहलाने वाले कायस्थ इसे ही सही मान कर इतराते हैं। लेकिन यह पुरोहितवाद के शिकंजे को और मजबूत करने वाली मनगढ़ंत दन्त-कथा है।
वस्तुतः अब से दस लाख वर्ष पूर्व जब मानव आज जैसी स्थिति मे आया तो बुद्धि,ज्ञान और विवेक द्वारा उसने मनन करना प्रारम्भ किया और इसीलिए वह 'मनुष्य' कहलाया। उस समय 'काया' से संबन्धित ज्ञान देने वाले को 'कायस्थ' कहा गया। अर्थात मनुष्य की 'काया' से संबन्धित सभी प्रकार का ज्ञान देना इस कायस्थ का कर्तव्य था। 12 राशियों के आधार पर चित्रगुप्त की 12 संतानों की गणना प्रचलित हो गई।
'चित्रगुप्त' कोई व्यक्ति-विशेष नहीं है बल्कि प्रत्येक मनुष्य के 'अवचेतन-मस्तिष्क' मे गुप्त रूप से सक्रिय रहने वाला उसका अपना ही 'चित्त' है । प्रत्येक मनुष्य द्वारा किए गए सदकर्म,दुष्कर्म और अकर्म का लेखा-जोखा उसके अपने मस्तिष्क के इसी 'चित्त' पर गुप्त रूप से अंकित होता रहता है जो मोक्ष-प्राप्ति तक जन्म-जन्मांतर मे उस मनुष्य के 'कारण शरीर' और 'सूक्ष्म शरीर' के साथ उसकी 'आत्मा' के साथ चलता रहता है और उसी अनुरूप आगामी जन्म मे उसका 'भाग्य' या प्रारब्ध निर्धारित होता है।
अतः चित्रगुप्त पूजा का अभिप्राय तो मानव मस्तिष्क मे इस 'गुप्त' रूप से अवस्थित 'चित्त' को स्वस्थ व संतुलित रखने से है न कि,पुरोहितवादी वितंडवाद मे फँसने से।
बढ़ती आबादी के साथ-साथ जब 'कायस्थ' पर अधिक भार हो गया तो 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा को चार वर्गों मे बाँट दिया गया-
1-ब्रह्मांड से संबन्धित ज्ञान को ब्रह्म-विद्या और देने वाले को 'ब्राह्मण' कहा गया ,उत्तीर्ण करने पर विद्यार्थी को 'ब्राह्मण' की उपाधी दी जाती थी।
2-क्षात्र विद्या जिसमे सैन्य तथा सामान्य प्राशासन आता था को 'क्षत्री' कहा गया।
3-व्यापार,बानिज्य से समांबंधित ज्ञान को 'वैश्य' -उपाधि से विभूषित किया गया।
4-विभिन्न प्रकार की सेवाओं से संबन्धित ज्ञान प्राप्त करने वालों को 'क्षुद्र' की उपाधि मिलती थी।
ये चारों उपाधियाँ अर्जित ज्ञान के आधार पर थीं। 'कर्म' करना उनका उद्देश्य था। जैसे बिना डिग्री के डॉ की संतान डॉ नहीं हो सकती,इंजीनियर की संतान बिना डिग्री के इंजीनियर नहीं हो सकती उसी प्रकार उस समय भी ये उपाधियाँ ज्ञानार्जन से प्राप्त करने वाला ही उसके अनुरूप उन्हें धारण व उनका उपयोग कर सकता था। एक ही पिता की अलग-अलग सन्तानें उपाधि के आधार पर -ब्राह्मण,क्षत्री,वैश्य और क्षुद्र हो सकती थीं।
कालांतर मे शोषणवादी व्यवस्था मे 'पुरोहितवाद' पनपा और उसने इन उपाधियों-डिगरियों के स्थान पर 'कर्म'सिद्धान्त की अवहेलना करके 'जातिगत'व्यवस्था फैला दी जो आज तक उत्पीड़न और शोषण का माध्यम बनी हुई है।
जरूरत तो इस बात की है कि अपनी प्राचीन 'कर्म-सिद्धान्त'पर आधारित ज्ञान-व्यवस्था को बहाल करने मे कम्यूनिस्ट तथा बामपंथी कोशिश करेंतथा जनता को जागरूक करें और 'पुरोहितवाद' की जकड़न से उसे छुड़ाए। लेकिन पुरोहितवादियो के कुचक्र मे फंस कर अभी बामपंथ एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन इस ओर से आँखें मूँदे हुये है और इसीलिए सफल नहीं हो पा रहा है। हम आशा करते हैं कि महापंडित राहुल सांस्कृतियायान ,स्वामी सहजानन्द सरस्वती और क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित सरीखे आर्यसमाजी -कम्यूनिस्टों से प्रेरणा लेकर बामपंथ और कम्यूनिस्ट आंदोलन जनता को 'सन्मार्ग' पर ला सकेगा।
http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
मनोज दास जी,बाम-पंथ और आध्यात्मिकता
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| हिंदुस्तान,लखनऊ,25 अक्तूबर,2011 |
अभी कुछ ही दिनों पहले जन-लोकपाल को नियुक्त करने की कमेटी मे 'बुकर' पुरस्कार प्राप्त लोगों को रखने की मांग एक भारत-विरोधी शख्स ने खुले आम रखी थी। उसी शख्स ने स्वाधीनता दिवस पर ब्लैक आउट रखवाया था उसी ने राष्ट्रध्वज का अपमान करवाया था और आज भी वह तथा उसके गैंग के लोग निर्बाध घूम रहे हैं।दुर्भाग्य यह है कि विद्वान भी जिनमे इंटरनेटी ब्लागर्स भी शामिल हैं उसी देशद्रोही शख्स के अंध-भक्त बने हुये हैं।
मनोज दास जी ने बताया है कि आज 36 प्रतिशत लोग 'अवसाद'-डिप्रेशन -से ग्रस्त हैं । बच्चों को अपने माँ-बाप पर नही ,फेसबुक और एस एम एस पर विश्वास है।मेरे विचार मे उसी प्रकार इंटरनेटी ब्लागर्स को देश-भक्तों पर नही 'अन्ना' पर विश्वास है। अन्ना आंदोलन कांग्रेस के मनमोहन गुट,संघ/भाजपा ,भारतीय और अमेरिकी कारपोरेट घरानों तथा अमेरिकी प्रशासन के सहयोग से 'कारपोरेट-भ्रष्टाचार के संरक्षण' हेतु चलाया गया था। अपने उद्देश्य मे वह जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ कर पूरी तरह सफल रहा है। टाटा,अंबानी,नीरा राडिया आदि उद्योगपति और उनके दलाल जिनहोने 'राजा' आदि मंत्री अपने हितार्थ बनवाए खुले घूम रहे हैं और राजा आदि मंत्री जिनहोने इन उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाया जेल मे विराजमान हैं। राजनेताओं का मखौल उड़ाने वाली किरण बेदी एयर टिकटों का घपला करके और अरविंद केजरीवाल प्राप्त चंदे मे घपला करके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मे जनता को बेवकूफ बना रहे थे। हमारे इंटरनेटी ब्लागर्स उनका गुणगान कर रहे थे/हैं। सम्पूर्ण परिस्थितियों के लिए धर्म के नाम पर फैली अधार्मिकता जिम्मेदार है। लेकिन अफसोस कि हमारा बाम-पंथ अधार्मिकों की परिभाषा स्वीकार करके धर्म का विरोध करता तथा जनता की सहानुभूति खोता रहता है। जब मै धर्म की परिभाषा बताने का प्रयास करता हूँ तो सांप्रदायिक तत्व मुझ पर प्रहार करते हैं और हमारे बाम-पंथी बंधु भी उसका विरोध करते हैं। 'सत्य' कड़ुवा होता है और उसे कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहता।
आध्यात्मिकता=अध्ययन +आत्मा= अपनी आत्मा का अध्ययन करना ही अध्यात्म है।
धर्म=जो धारण करता है (शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है वही धर्म है बाकी सब अधर्म है,एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए मूली अथवा दही का सेवन करना धर्म है लेकिन जुकाम-खांसी के रोगी व्यक्ति हेतु वही दही अथवा मूली सेवन अधर्म है)। यह व्यक्ति सापेक्ष है। सब को एक ही तरह नहीं हाँका जा सकता।
भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। इन पाँच प्रकृतिक तत्वों के समन्वय को भगवान कहते हैं इनके पहले अक्षरों के संयोजन से और चूंकि ये खुद ही बने हैं इन्हें किसी ने बनाया नहीं है इसीलिए इन्हे 'खुदा' भी कहते हैं और चूंकि येGENERATE,OPERATE ,DESTROY करते हैं पहले अक्षरों के संयोजन से इन्हे ही GOD भी कहते हैं। भगवान=खुदा =GOD तीनों एक ही के तीन नाम हैं। मतभेद कहाँ है?
मतभेद जो है वह दलालों=पुरोहितों ने अपने निजी स्वार्थ मे जनता को बाँट कर शोषण करने हेतु उत्पन्न किया है। अतः हमे पुरोहितवाद का जम कर और डट कर विरोध करना है न कि,अध्यात्म,भगवान,खुदा या गाड का या शरीर को धारण करने वाले धर्म का।
बाम-पंथ,कम्यूनिस्ट और वैज्ञानिक यहीं गलती करते हैं कि वे ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितों की व्याख्या को धर्म मान कर धर्म का विरोध करते हैं। महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी पुरोहितवाद को ही धर्म मान कर उसका विरोध किया है। आज के कम्यूनिस्ट भी दक़ियानूसी पोंगापंथियों के काले कारनामों को ही धर्म मान कर धर्म का विरोध करते हैं जबकि उन्हे वास्तविकता को समझ कर,पहचान कर जनता को भी समझाना चाहिए तभी 'मानव को मानव के शोषण 'से मुक्त कराकर 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाया जा सकेगा अन्यथा पुरोहितवाद का शिकार होकर परस्पर संघर्षरत रह कर जनता अपना उल्टे उस्तरे से मुंडन कराती रहेगी।
साहित्यकार मनोज दास जी ने जनता को बामपंथ के मर्म को समझाने हेतु अध्यात्म का मार्ग अपना कर एक सकारात्मक पहल की है। हम उनके प्रयासों की सफलता की कामना करते हैं और 'भाई-दोज़' के इस पावन पर्व पर दुनिया मे भाई-चारा और अमन कायम करने की दिली ख़्वाहिश रखते हैं।
'भाई-दोज' पर' चित्रगुप्त-पूजा' भी होती है। 'चित्रगुप्त' के संबंध मे भी पुरोहितवाद ने भ्रांति फैला रखी है। ढोंगियों के अनुसार ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने के कारण 'कायस्थ'कहलाने वाले चित्रगुप्त की एक पत्नी ब्राह्मण कन्या और दूसरी नाग कन्या थीं। पढे-लिखे और समझदार कहलाने वाले कायस्थ इसे ही सही मान कर इतराते हैं। लेकिन यह पुरोहितवाद के शिकंजे को और मजबूत करने वाली मनगढ़ंत दन्त-कथा है।
वस्तुतः अब से दस लाख वर्ष पूर्व जब मानव आज जैसी स्थिति मे आया तो बुद्धि,ज्ञान और विवेक द्वारा उसने मनन करना प्रारम्भ किया और इसीलिए वह 'मनुष्य' कहलाया। उस समय 'काया' से संबन्धित ज्ञान देने वाले को 'कायस्थ' कहा गया। अर्थात मनुष्य की 'काया' से संबन्धित सभी प्रकार का ज्ञान देना इस कायस्थ का कर्तव्य था। 12 राशियों के आधार पर चित्रगुप्त की 12 संतानों की गणना प्रचलित हो गई।
'चित्रगुप्त' कोई व्यक्ति-विशेष नहीं है बल्कि प्रत्येक मनुष्य के 'अवचेतन-मस्तिष्क' मे गुप्त रूप से सक्रिय रहने वाला उसका अपना ही 'चित्त' है । प्रत्येक मनुष्य द्वारा किए गए सदकर्म,दुष्कर्म और अकर्म का लेखा-जोखा उसके अपने मस्तिष्क के इसी 'चित्त' पर गुप्त रूप से अंकित होता रहता है जो मोक्ष-प्राप्ति तक जन्म-जन्मांतर मे उस मनुष्य के 'कारण शरीर' और 'सूक्ष्म शरीर' के साथ उसकी 'आत्मा' के साथ चलता रहता है और उसी अनुरूप आगामी जन्म मे उसका 'भाग्य' या प्रारब्ध निर्धारित होता है।
अतः चित्रगुप्त पूजा का अभिप्राय तो मानव मस्तिष्क मे इस 'गुप्त' रूप से अवस्थित 'चित्त' को स्वस्थ व संतुलित रखने से है न कि,पुरोहितवादी वितंडवाद मे फँसने से।
बढ़ती आबादी के साथ-साथ जब 'कायस्थ' पर अधिक भार हो गया तो 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा को चार वर्गों मे बाँट दिया गया-
1-ब्रह्मांड से संबन्धित ज्ञान को ब्रह्म-विद्या और देने वाले को 'ब्राह्मण' कहा गया ,उत्तीर्ण करने पर विद्यार्थी को 'ब्राह्मण' की उपाधी दी जाती थी।
2-क्षात्र विद्या जिसमे सैन्य तथा सामान्य प्राशासन आता था को 'क्षत्री' कहा गया।
3-व्यापार,बानिज्य से समांबंधित ज्ञान को 'वैश्य' -उपाधि से विभूषित किया गया।
4-विभिन्न प्रकार की सेवाओं से संबन्धित ज्ञान प्राप्त करने वालों को 'क्षुद्र' की उपाधि मिलती थी।
ये चारों उपाधियाँ अर्जित ज्ञान के आधार पर थीं। 'कर्म' करना उनका उद्देश्य था। जैसे बिना डिग्री के डॉ की संतान डॉ नहीं हो सकती,इंजीनियर की संतान बिना डिग्री के इंजीनियर नहीं हो सकती उसी प्रकार उस समय भी ये उपाधियाँ ज्ञानार्जन से प्राप्त करने वाला ही उसके अनुरूप उन्हें धारण व उनका उपयोग कर सकता था। एक ही पिता की अलग-अलग सन्तानें उपाधि के आधार पर -ब्राह्मण,क्षत्री,वैश्य और क्षुद्र हो सकती थीं।
कालांतर मे शोषणवादी व्यवस्था मे 'पुरोहितवाद' पनपा और उसने इन उपाधियों-डिगरियों के स्थान पर 'कर्म'सिद्धान्त की अवहेलना करके 'जातिगत'व्यवस्था फैला दी जो आज तक उत्पीड़न और शोषण का माध्यम बनी हुई है।
जरूरत तो इस बात की है कि अपनी प्राचीन 'कर्म-सिद्धान्त'पर आधारित ज्ञान-व्यवस्था को बहाल करने मे कम्यूनिस्ट तथा बामपंथी कोशिश करेंतथा जनता को जागरूक करें और 'पुरोहितवाद' की जकड़न से उसे छुड़ाए। लेकिन पुरोहितवादियो के कुचक्र मे फंस कर अभी बामपंथ एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन इस ओर से आँखें मूँदे हुये है और इसीलिए सफल नहीं हो पा रहा है। हम आशा करते हैं कि महापंडित राहुल सांस्कृतियायान ,स्वामी सहजानन्द सरस्वती और क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित सरीखे आर्यसमाजी -कम्यूनिस्टों से प्रेरणा लेकर बामपंथ और कम्यूनिस्ट आंदोलन जनता को 'सन्मार्ग' पर ला सकेगा।
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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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