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Friday, 8 June 2018

एक साधारण इंसान का असाधारण कार्य ------ अपूर्वानंद

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अंकित सक्सेना के पिता ने पिछले हफ़्ते इफ़्तार का आयोजन किया। इफ़्तार जब एक हिंदू आयोजित करता है तो उसे छद्म धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। लेकिन अंकित सक्सेना के पिता को ऐसा अपशब्द कहने की हिमाक़त शायद इस शब्द को चलन में लाने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी न कर पाएं।अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना एक साधारण इंसान हैं। लेकिन उन्होंने पिछले महीनों में जो किया है, वह असाधारण है। उनके बेटे को उसकी प्रेमिका के परिवारवालों ने, जो मुसलमान हैं, गला काट कर मार डाला था। इसलिए कि उसने हिंदू होते हुए उनकी लड़की से प्यार करने की हिम्मत की थी। दिन-दहाड़े एक नौजवान की इस तरह की गई हत्या ने सबको दहला दिया। लेकिन इस तरह की हत्याएं देखने का आदी भारत का समाज है। मुसलमान का हिंदू से या दलित का तथाकथित उच्च-जाति से प्रेम-संबंध होना असंभव है और यह दोनों ही समुदायों के लिए अपमानजनक है। विशेषकर आपकी लड़की को उस समुदाय में नहीं जाना चाहिए जिसे आप हीन समझते हैं या अपना शत्रु मानते हैं, उसकी लड़की को आप किसी तरह ले आएं तो आपकी जीत मानी जाएगी। इसीलिए जो मुसलमानों पर यह इल्ज़ाम लगाते हैं कि वे अपने नौजवानों को तैयार करके हिंदू लड़कियों को फुसलाने की साज़िश में लगाते हैं, वे ही यह भी कहते हैं कि उनकी लड़की ले आओ।रक्त या जाति या धर्म की शुद्धता के अतार्किक आग्रह के कारण रोज़ाना भारत में कई अंकित मारे जाते हैं। इस हत्या को समाज की स्वीकृति भी प्राप्त है। पिछले कुछ सालों में “लव जिहाद” का हव्वा खड़ा करके मुसलमान युवकों को निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए जब अंकित की हत्या हुई तो अचानक भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को लगा कि यह एक अच्छा मौक़ा है।अंकित के पिता और मां को घेरने की और इस हत्या को मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश की गई। लेकिन दिल्ली और भारत उनकी प्रतिक्रिया देखकर दंग रह गया। उन्होंने इस हत्या के लिए पूरे मुसलमान समुदाय को ज़िम्मेवार मानने से इंकार कर दिया। यहां तक कि अंकित के नाम पर निकाले गए जुलूस में जाने से भी मना कर दिया।यशपालजी ने बड़ी सादगी से कहा कि उन्हें अपने बेटे के लिए इंसाफ़ चाहिए ,लेकिन आख़िर वे इसका हिसाब सारे मुसलमानों से क्यों लें! आख़िर यह हत्या मुसलमानों की ओर से तो नहीं की गई थी! यह एक परिवार की अहमकाना समझ का भयावह परिणाम था, उसके लिए सारे मुसलमान क्योंकर जवाबदेह हों!जो यशपाल सक्सेना ने कहा वही ठीक है और वही समझदारी की बात है। लेकिन यह समझ आज भारत में दुर्लभ है। इसलिए यशपालजी एक अजूबा नज़र आने लगे। फिर भी उन्होंने इंसानियत की अपनी ज़िद नहीं छोड़ी। उनका स्टैंड कोई सनक या झक न था, यह इससे साबित हुआ की महीनों गुजर जाने के बाद भी वे अपनी जगह पर क़ायम हैं।यशपाल सक्सेना वैसे इंसान हैं, जैसा हर व्यक्ति के होने की चाह महात्मा गांधी या नेहरू की थी। जो किसी भी विषय पर ठंडे दिमाग़ से सोचकर निर्णय करे। ऐसा दिमाग़ ही भीड़ बनने से ख़ुद को रोक सकता है और दूसरों को भी भीड़ बनाने से रोक सकता है।
यशपाल सक्सेना की इस इंसानियत को उनके बेटे के दोस्तों का सहारा भी मिला। उनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। यह सहारा बहुत ज़रूरी था। उसके साथ उनके पड़ोसियों के अलावा हर्ष मंदर और उनके साथियों ने भी हाथ बढ़ाया। यह एक नई बिरादरी है। यह बिरादरी समझ की बिरादरी है। यूरोप में हिटलर के उदय और यहूदी संहार को समझने की कोशिश करते हुए विद्वानों ने कहा कि यह इस वजह से मुमकिन हो सका कि जर्मन समाज ने अपनी इंसानियत की समझ को स्थगित कर दिया था। जर्मन विचारक अडोर्नो ने कहा कि इस अवस्था से बचने का एक ही उपाय है कि प्रत्येक व्यक्ति ठहर कर ख़ुद सोचने का प्रयास करे और दूसरों की समझ को अपना न बना ले। यह काम शिक्षा का है। लेकिन शिक्षा यही नहीं करती।यशपाल ऐसा कैसे कर पाए जो खासे पढ़े-लिखे लोग नहीं कर पाते? वे उस प्रलोभन से ख़ुद को कैसे बचा सके जिससे कासगंज में मारे गए नौजवान चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता ख़ुद को नहीं बचा सके? उन्होंने अपने बेटे को शहीद, देशभक्त घोषित करने की मांग की, उसकी मौत के लिए मुसलमानों को ज़िम्मेवार ठहराया। यह सब कुछ यशपाल भी कर सकते थे। यही आज का चलन है। लेकिन उन्होंने धारा के ख़िलाफ़ तैरने का जोखिम लिया।यशपाल सक्सेना ने रमजान के मौक़े पर अपने मुसलमान पड़ोसियों के लिए इफ़्तार का आयोजन किया। अपने बेटे के न रहने की तकलीफ़ को उन्होंने घृणा का इंधन नहीं बनने दिया। लेकिन जैसा हमने कहा, इसके लिए एक व्यापक बिरादरी बनाने की आवश्यकता है। यह एक बड़ा पड़ोस निर्माण करने की चुनौती है। यह चुनौती यशपाल सक्सेना के साथ और लोगों ने भी स्वीकार की और उसकी ओर हिंदुस्तान का ध्यान भी गया है।इंसानियत अक्सर ख़बर नहीं बनती, लेकिन यशपाल सक्सेना इस वक़्त भी बड़ी ख़बर हैं। उस समय उनकी बात करना और भी ज़रूरी है जिस समय जनसंहार के लिए दिमाग़ तैयार करने के कारख़ाने में पूर्व राष्ट्राध्यक्ष के भ्रमण को उदारता का बड़ा प्रमाण माना जा रहा हो।

https://www.navjivanindia.com/opinion/it-is-important-that-the-humanity-of-yashpal-saxena-should-be-a-big-news?utm_source=one-signal&utm_medium=push-notification

Tuesday, 30 January 2018

यदि डॉ राम मनोहर लोहिया ने महात्मा गांधी की विरासत को कांग्रेस और कांग्रेसी सत्ता की फाइलों में गुम होने से बचा लिया होता ------शेष नारायण सिंह

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महात्मा गांधी के अंतिम दो दिन एक कुजात गांधीवादी उनका सबसे करीबी था.

शेष नारायण सिंह
Shesh Narain Singh
30-01-2018
30 जनवरी के दिन दिल्ली के बिडला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या करके नाथूराम गोडसे ने केवल महात्मा गाँधी की ही हत्या नहीं की थी .उसने एक आज़ाद देश के सपने के भविष्य को भी मार डाला था. शासक वर्गो के शोषण के दर्शनशास्त्र के प्रतिनिधि नाथूराम ने उसी हत्या के साथ अन्य बहुत सी विचारधाराओं की हत्या कर दी थी। महात्मा गाँधी को पढने वाला कोई भी आदमी बता देगा की महात्मा जी ने कांग्रेस के आर्थिक विकास के उस माडल को नहीं स्वीकार किया था जिसे स्वतन्त्र भारत के लिए जवाहर लाल नेहरू और उनकी सरकार वाले लागू करना चाहते थे। महात्मा गाँधी ने साफ़ बता दिया था की वे गाँव को विकास की इकाई बनाने के पक्षधर थे लेकिन जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई को वाली कांग्रेस के नेताओं के दिमाग में औद्योगीकरण के रास्ते देश के आर्थिक विकास करने के सपने पल रहे थे . गांधी जी ने इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखा है . उनकी मूल किताब हिंद स्वराज में तो यह बात साफ़ साफ़ लिखी ही है बाद के ग्रंथोंमें भी गाँव को विकास की यूनिट बनाने की बात बार बार कही गयी है . आज़ादी की लड़ाई तक यानी 1946 तक महात्मा गांधी की हर बात मानने वाले जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा जी की आर्थिक विकास की सोच को नकारना शुरू कर दिया था। भारत के आख़िरी आदमी के विकास की पक्ष धर गांधी की राजनीति से इसी दौर में जवाहर लाल नेहरू की विचारधारा ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी। कांग्रेस का प्रभावशाली तबका भी इस मामले में नेहरू के साथ था . गांधी जी एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस को खत्म करके बाकी राजनीतिक जमातों को चुनावी मैदान में बराबरी देना चाहते थे . लेकिन उस वक़्त तक कांग्रेस में सबसे अधिक प्रभाव शाली हो चुके सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया था। आर्थिक विकास की उनकी सोच को भी सही ठहराने वाला कोई भी आदमी जवाहर लाल की पहली मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं था। गांधी जी इस बात से संतुष्ट नहीं थे। उधर मुहम्मद अली जिन्नाह की जिद के चलतेे मुसलमान ज़मींदारों ने पूरे देश में दंगे भड़काने की साज़िश पर अमल करना शुरू कर दिया था। . 1946 के बाद से ही हर उस मूल्य को दफ़न किया जा रहा था जिसको आधार बनाकर आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी। आज़ादी के आन्दोलन के इथोस को कांग्रेस को लोग भूल चुके थे और अगर भूले नहीं थे तो उसे इतिहास के कूड़ेदान के हवाले करने की पूरी तैयारी कर चुके थे।

इस पृष्ठभूमि में जिन लोगों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई थी ,महात्मा गांधी उन लोगों पर बहुत भरोसा कर रहे थे .इनमें से एक डॉ राम मनोहर लोहिया थे . अगस्त क्रान्ति के दौरान डॉ. लोहिया के काम से महात्मा गांधी अत्यंत प्रभावित हुए थे। उसके पहले डॉ. लोहिया के कई लेख, महात्मा गांधी के अखबार 'हरिजन' में प्रकाशित भी हो चुके थे। गोवा के मामले पर उनका साथ महात्मा गांधी को छोड़कर और किसी बड़े नेता ने नहीं दिया।
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार की आर्थिक नीतियां गांधी के विचारों से प्रतिकूल थीं। डॉ. लोहिया का समाजवाद गांधी की विचारधारा के अत्यन्त निकट था। नेहरू सरकार की दशा-दिशा के कारण महात्मा गांधी का नेहरू से मोहभंग हो रहा था और लोहिया की तरफ रूझान बढ़ रहा था। आज़ादी के बाद देश साम्प्रदायिकता के संकट में फंस गया तो शांति और सद्भाव कायम करने में डॉ. लोहिया ने गांधी का सहयोग किया। इस प्रकार वे गांधीजी के करीब क़रीब आ गये थे। इतने क़रीब कि गांधी ने जब लोहिया से कहा कि जो चीज़ आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं उसका उपभोग तुम्हें भी नहीं करना चाहिए और सिगरेट त्याग देना चाहिए तो लोहिया ने तुरन्त उनकी बात मान ली। महात्मा जी से लोहिया के विचार इतने मिल रहे थे कि लगता था कि आज़ादी के बाद लोहिया ही गांधी की राजनीति के वारिस बनेगें .ऐसा सन्दर्भ देखने को मिला लगता है कि आज़ादी के बाद की भारत की राजनीति पर फिर से विचार की ज़रूरत जितनी आज है उतनी कभी नहीं थी ."भारतीय पक्ष" नाम के एक कोष में लिखा है की 28 जनवरी, 1948 को गांधी ने लोहिया से कहा, मुझे तुमसे कुछ विषयों पर विस्तार में बात करनी है। इसलिये आज तुम मेरे शयनकक्ष में सो जाओ। सुबह तड़के हम लोग बातचीत करेंगे। लोहिया गांधी के बगल में सो गये। उन्होंने सोचा कि जब बापू जागेंगे, तब बातचीत हो जाएगी। लेकिन जब लोहिया की आँख खुली तो गाँधी जी बिस्तर पर नहीं थे। बाद में जब डॉ. लोहिया गांधी से मिले तब गांधी ने कहा, "तुम गहरी नींद में थे। मैंने तुम्हें जगाना ठीक नहीं समझा। खैर कोई बात नहीं। कल शाम तुम मुझसे मिलो। कल निश्चित रूप से मैं कांग्रेस और तुम्हारी पार्टी के बारे में बात करूँगा। कल आख़िरी फैसला होगा।" यानी २९ जनवरी के दिन डॉ लोहिया उन्हें वादा करके आये कि 30 तारीख को बात करने के लिए आ जायेगें .
लोहिया 30 जनवरी, 1948 को गांधी से बातचीत करने के लिए टैक्सी से बिड़ला भवन की तरफ बढ़े ही थे कि तभी उन्हें गांधी की शहादत की खबर मिली। एक ठोस योजना की भ्रूण हत्या हो गयी। बापू अपनी शहादत से पहले अपने आख़िरी वसीयतनामे में कांग्रेस को भंग करने की अनिवार्यता सिद्ध कर चुके थे। उस समय उन्होंनें ऐसा स्पष्ट संकेत दिया था कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान अनेकानेक उद्देश्यों के निमित्त गठित विविध रचनात्मक कार्य लारने वाली संस्थाओं को एकसूत्र में पिरोकर शीघ्र ही एक नया राष्ट्रव्यापी लोक संगठन खड़ा किया जायेगा। डॉ. लोहिया की उसमें विशेष भूमिका होगी। इस प्रकार बनने वाले शक्तिपुंज से बापू आज़ादी की अधूरी जंग के निर्णायक बिन्दु तक पहुंचाना चाहते थे।
डॉ लोहिया के जीवन के इस पक्ष के बारे में जानकारी की कमी है . ज़ाहिर है कि अब इस विषय पर भी सोचविचार की जानी चाहिए कि अगर महात्मा जी और लोहिया की वह मुलाक़ात हो गयी होती तो हमारे देश का इतिहास बिलकुल अलग होता.इस बात की पूरी संभावना है कि महात्मा गांधी की राजनीति और उसमें होने वाले संघर्ष के असली वाहक डॉ राम मनोहर लोहिया ही होते.लेकिन वह मुलाक़ात नहीं हो सकी और कांग्रेस से अलग होकर डॉ लोहिया और उनके साथियों ने जो राजनीतिक रास्ता चुना वह समाजवाद का था. आज़ादी के बाद के लोहिया के सारे काम पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि उनकी मान्यताएं भी लगभग वही थीं जिनके लिए महात्मा गाँधी ने आजीवन संघर्ष किया . जब कांग्रेस के सत्ताधीशों से महात्मा गांधी निराश हो गए थे तो उनको लगा था कि डॉ राम मनोहर लोहिया ही उनकी राजनीतिक सोच के हिसाब से आज़ाद भारत के भविष्य को डिजाइन कर सकते हैं .लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था.
१९४७ के बाद की जो कांग्रेस है उसमें महात्मा गांधी की राजनीति का कोई पुछत्तर नहीं नज़र आता .महात्मा गांधी ने छुआछूत को खत्म करने के लिए आज़ादी के आंदोलन को एक हथियार माना था लेकिन १९४७ के बाद हम साफ़ देखते हैं कि डॉ बी आर आंबेडकर की दलितों के लिए आरक्षण की योजना को संविधान में डालने के अलावा कुछ नहीं हुआ. हाँ यह भी सच है कि जवाहरलाल नेहरू ने डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच का समर्थन किया .लेकिन इस सीन से कांग्रेसी नदारद थे . सरकारी तौर पर जाति आधारित छुआछूत को मिटाने और सामाजिक समरसता की स्थापना का कोई प्रयास नज़र नहीं आता. गांधी के नाम पर अपना कारोबार चलाने वाली कुछ संस्थाओं ने मंदिर आदि में प्रवेश जैसी कुछ सांकेतिक कार्यवाही की लेकिन कहीं भी गंभीर राजनीतिक क़दम नहीं उठाये गए.

महात्मा गांधी ने साफ कहा था कि कल कारखानों के मालिक उद्योगपति का रोल एक ट्रस्टी का होगा लेकिन जिस तरह की औद्योगिक नीति बनी , सार्वजनिक संपत्ति की मिलकियत के जो नियम बने उसमें महात्मा गांधी कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आते.सारा का सारा कंट्रोल पूंजीपति के हाथ में दे दिया गया . मजदूरों के कल्याण के लिए जो नीतियां बनीं उसमें भी उद्योगपति का पलड़ा भारी कर दिया गया.अपने देश की श्रम नीतियां मजदूरों के शोषण का हथियार बनीं .महात्मा जी का सबसे प्रिय विषय था , ग्रामीण भारत का समुचित विकास लेकिन कृषि नीतियां ऐसी बनायी गयीं जिसमें कहीं भी गाँव में रहने वाले किसान की भलाई का कोई स्थान नहीं था. इस देश में शुरू से ही खेती को उस रास्ते पर विकसित किया गया जिसके बाद किसान का रोल राष्ट्रीय विकास में केवल मतदाता का होकर रह गया . इस देश में नेहरू के वारिसों ने जिस तरह की कृषि नीति को महत्व दिया उसमें किसान को केवल उतना ही सुविधा दी जाती है जिसके बाद वह शहरी आबादी के लिए भोजन का इंतज़ाम करता रहे , और सत्ताधारी पार्टी को वोट देता रहे. 
महात्मा गांधी ने कहा था कि पंचायतों का रोल भारत के ग्रामीण जीवन में सबसे ज्यादा होना चाहिए . लेकिन सरकार ने ऐसी नीतियों बनाईं कि आज देश में वकीलों और उनके दलालों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार हो गया है . ग्रामीण भारत में ऐसा कोई परिवार नहीं बचा है जिसने कोर्ट के फेरी न लगायी हो . ज़ाहिर है कि महात्मा गांधी के हर सपने को सत्ताधारी दलों ने नाकाम किया है .


ऐसा लगता है कि अगर २९ जनवरी १९४८ की सुबह डॉ लोहिया और महात्मा गांधी की बातचीत हो गयी होती तो शायद डॉ लोहिया कुजात गांधीवादी न होते। बहुत बाद में उन्होंने सरकारी और मठी गांधीवादियों से परेशान होकर अपने आपको और अपने साथियों को कुजात गांधीवादी कह दिया था लेकिन अगर गांधी जी ने उनको कांग्रेस से अपनी निराशा से विधिवत परिचित करा दिया होता तो इस बात में दो राय नहीं होनी चाहिए कि डॉ राम मनोहर लोहिया ने महात्मा जी की इच्छा को पूरा किया होता और महात्मा गांधी की विरासत को कांग्रेस और कांग्रेसी सत्ता की फाइलों में गुम होने से बचा लिया होता
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1578364205583317&id=100002292570804

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लेकिन योजनाबद्ध ढंग से आज गांधी और उनकी नीतियों को गलत सिद्ध करने की मुहिम चल रही है जिसको कारपोरेट देशी व विदेशी का पूर्ण समर्थन है और जो भाजपा / आर एस एस के अनुकूल है, जैसे ::

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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30-01-2018

Monday, 12 October 2015

विभ्रम के दौर में विवेक वांछित है --- विजय राजबली माथुर

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'सूर्या' की पूर्व संपादक के पुत्र के नाम से छपा यह लेख RSS की किसी चाल का हिस्सा भी हो सकता है कि असंतुष्टों को वरुण के पक्ष मे लामबंद करके उनके प्रतिरोध की वास्तविक 'धार' को 'कुंद' कर दिया जाये। 
या यह भी हो सकता है कि वरुण और उनकी माता को अब भाजपा में वांछित लक्ष्य प्राप्त होने की संभावना न दीख रही हो और वे भविष्य के लिए उससे अलगाव की भूमिका बना रहे हों। यदि ये वास्तव में उनके विचार परिवर्तन का संकेत हो तो वे सोनिया कांग्रेस में प्रविष्ट होकर जनता को आकृष्ट करने में सफल भी हो सकते हैं। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि 'तुर्कमान गेट कांड' व 'आपात काल' वरुण के पिता की दिमागी उपज थे।



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जिस समाचार-पत्र के संस्थापक संपादक महात्मा गांधी रहे हों जिनहोने ;सविनय अवज्ञा आंदोलन' का सूत्रपात किया था उसी पत्र का समपादकीय अब 'चारण विरुदावली' गा रहा है तो स्पष्ट है कि, 'विकास' का दावा करने वाले 'चारित्रिक पतन' को प्राप्त हो चुके हैं।
सत्ता पर फर्क पड़े न पड़े परंतु 'विरोध' तो दर्ज हो ही रहा है।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश