Friday, 14 November 2014

इस मुद्दे से जुड़ी गहरी, दीर्घकालिक चुनौतियों एवं कार्यभारों की अनदेखी की जा रही है------- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

  • http://vijaimathur.blogspot.in/2014/11/blog-post_13.html 
    मूल लेख पर आई प्रतिक्रियाओं पर टिप्पणियाँ :
    1 3-11-2014 
  • Kavita Krishnapallavi  चूँकि सामाजिक-सांस्‍कृतिक स्‍तर पर प्रतिक्रियावादी विचारों-संस्‍थाओं और रू‍ढ़ि‍यों का मूलाधार पूँजीवादी आर्थिक ढाँचा है, अत: उस पूँजीवादी आर्थिक ढाँचे के बदलने तक सामाजिक-सांस्‍कृतिक रूढ़ि‍यों एवं प्रतिगामी विचारों-संस्‍थाओं के विरुद्ध कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए और सारी कोशिशें पूँजीवाद को उखाड़कर समाजवाद की स्‍थापना के लिए होनी चाहिए -- यह एक यांत्रिक भौतिकवादी (अधिभूतवादी), आर्थिक नियतत्‍ववादी(इकोनॉमिक डिटर्मिनिस्टिक) या आर्थिक अपचयनवादी (इकोनॉमिक रिडक्‍शनिस्‍ट) दृष्टिकोण है जो मूलाधार और अधिरचना के द्वंद्वात्‍मक सम्‍बन्‍धों को न समझ पाने का नतीजा है। पूँजीवादी आर्थिक मूलाधार को बदलने के लिए भी पहले राजनीतिक अधिरचना के स्‍तर पर ही कार्रवाई करनी होती है यानी पूँजीवादी राज्‍यसत्‍ता का ध्‍वंस करना होता है और इस राजनीतिक कार्रवाई के लिए जनता की चेतना तैयार करने के लिए सामाजिक-सांस्‍कृतिक अधिरचना के धरातल पर लम्‍बी कार्रवाइयों का सिलसिला चलाना होताहै। सर्वहारा वर्ग जब आर्थिक संघर्ष करता है तो वह समाजवाद के लिए संघर्ष नहीं करता बल्कि पूँजीवादी दायरे के भीतर ही श्रमशक्ति के बेहतर मूल्‍य के लिए संगठित सामूहिक दबाव बनाता है। इस प्रक्रिया में वह संगठित होना सीखता है और धीरे-धीरे पूँजीवादी व्‍यवस्‍था की सीमाओं को पहचानने लगता है। लेकिन महज आर्थिक संघर्ष से वह समाजवाद के लक्ष्‍य के लिए लड़ने को तैयार नहीं होता, समाजवाद के लिए संघर्ष के विचार को मज़दूर आंदोलन में सचेतन प्रयासों से डालना पड़ता है। इसके लिए सांस्‍कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक धरातल पर शिक्षा और प्रचार की कार्रवाइयों के साथ ही मज़दूर वर्ग को राजनीतिक माँगों के लिए संघर्ष में उतारना होता है। बुर्जुआ जनवादी दायरे के भीतर ही अपने जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष जन समुदाय द्वारा समाजवाद के लिए संघर्ष की तैयारी की अनिवार्य पहली मंजिल है। जैसाकि लेनिन ने कहा था, ''... जनवाद की समस्‍या का मार्क्‍सवादी हल यह है कि अपना वर्ग संघर्ष चलाने वाला सर्वहारा वर्ग बुर्जुआ वर्ग का तख्‍ता उलट देने की तैयारी करने और अपनी विजय सुनिश्चित करने के लिए बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ सभी जनवादी संस्‍थाओं और आकांक्षाओं का इस्‍तेमाल करे'' (प. कीयेव्‍स्‍की को जवाब, 'मज़दूर आंदोलन में जड़सूत्रवाद और संकीर्णतावाद का विरोध', पृ.82) पूँजीवाद की प्रकृति अन्‍तर्विरोधी होती है। वह स्‍वयं ही जनवादी मूल्‍यों, आकांक्षाओं, संस्‍थाओं को जन्‍म देता है (स्‍वयं ही जनवादी चेतना की जमीन तैयार करता है) और फिर न केवल उन्‍हें एक भ्रम में तबदील कर देता है, बल्कि उन्‍हें दबाने कुचलने का भी काम करता है। मज़दूर वर्ग और आम जन समुदाय इन जनवादी आकांक्षाओं-अधिकारों के लिए ही लड़ने से शुरुआत करते हैं और समाजवाद के लिए लड़ने की चेतना हासिल करने की मंजिल तक की यात्रा करते हैं।......................................

  • Kavita Krishnapallavi दो व्‍यक्तियों के बीच प्रेम या रिश्‍तों के मामले में निर्णय की स्‍वतंत्रता समाजवाद का नहीं, बुर्जुआ जनवादी अधिकार का सवाल है। यदि इस अधिकार पर निरंकुश सामाजिक संस्‍थाएँ, नैतिक पुलिसगिरी करने वाले फासिस्‍ट गिरोह और राज्‍यतंत्र किसी किस्‍म की पाबंदी लगाते हैं, तो हर कीमत पर इस पाबंदी का विरोध करना जनवादी अधिकार की एक ऐसी लड़ाई है, जिससे कोई कम्‍युनिस्‍ट कत्‍तई मुँह नहीं मोड़ सकता। यदि हम समाज में जनवाद की संस्‍कृति, आचार और विचारों की स्‍वीकार्यता के लिए नहीं लड़ेंगे तो समाजवाद की संस्‍कृति और विचारों के लिए लड़ने के लिए जनता को भला क्‍या तैयार कर पायेंगे? मेरी आपत्ति सिर्फ इस बात पर है कि सांस्‍कृतिक-वैचारिक महत्‍व के इस अहम मुद्दे को व्‍यापक सामाजिक-सांस्‍कृतिक आंदोलन का एजेण्‍डा बनाने के बजाय मध्‍यवर्गीय कुलीनतावादी प्रतीकात्‍मक विरोध का अनुष्‍ठान बना दिया जा रहा है तथा इस मुद्दे से जुड़ी गहरी, दीर्घकालिक चुनौतियों एवं कार्यभारों की अनदेखी की जा रही है।
    दो व्‍यक्तियों के बीच प्रेम के मामले में निर्णय की आजादी पर यदि सामाजिक संस्‍थाएँ, राजनीतिक गिरोह या राज्‍यसत्‍ता किसी तरह की पाबंदी लगाते हैं तो यह निजी दायरे का मुद्दा न रहकर सामाजिक-राजनीतिक प्रश्‍न बन जाता है। निजी आजादी पर कोई भी प्रतिबंध यदि सार्विक प्रश्‍न बन जाता है तो वह सामाजिक-राजनीतिक प्रश्‍न बन जाता है। यही नहीं, मान लीजिए कि किसी एक परिवार में एक व्‍यक्ति पत्‍नी को पीटता है या बाप बेटी को मनमर्जी से जीवन-साथी चुनने से रोकता है तो समाज को इस मामले में हस्‍तक्षेप का अधिकार है। निजी और सार्वजनिक के मामले में उसतरह भेद नहीं किया जा सकता, जैसे आप कर रहे हैं। जहाँ दो नागरिक 'इन्‍वॉल्‍व' हैं, वह मसला भी तभी तक निजी है जबतक परस्‍पर विवाद या बलप्रयोग न हो। और जहाँ दो व्‍यक्तियों के 'इन्‍वॉल्‍वमेण्‍ट' में किसी भी तीसरी शक्ति की बलात् दखलंदाजी है, वह तो निजी मामला हो ही नहीं सकता। वैसे भी मार्क्‍सवाद व्‍यक्ति की निजी आजादी और वैयक्तिकता पर अपने जन्‍मकाल से ही ('1844 की दार्शनिक और आर्थिक पाण्‍डुलिपियाँ' और 'ग्रुंड्रिस्‍से') पूरा बल देता रहा है और इसकी लड़ाई की प्रक्रिया को ऐतिहासिक तौर पर जनसमुदाय की मुक्ति की लड़ाई की प्रक्रिया से द्वंद्वात्‍मकत: जुड़ा हुआ मानता रहा है।
    पूँजीवाद केवल पिछड़ी प्रतिगामी संस्‍कृति, संस्‍थाओं और चेतना को जन्‍म देता है, यह भी एक यांत्रिक,आधिभौतिक समझ है। पूँजीवाद की प्रकृति अन्‍तरविरोधी होती है। एक ओर वह जनवादी आकांक्षाओं, मूल्‍यों, संस्‍थाओं के फलने-फूलने की जमीन अपनी स्‍वयंस्‍फूर्त आंतरिक गति से पैदा करता है, दूसरी ओर इन्‍हें रस्‍मी बना देने और दबाने-कुचलने की सतत् कोशिशें करता रहता है। संकटग्रस्‍त पूँजीवाद निरंकुशता और फासीवादी मूल्‍यों-संस्‍थाओं को भी स्‍वयंस्‍फूर्त गति से पैदा करता है और सचेतन बढ़ावा भी देता है। उस समय जनवादी मूल्‍यों-संस्‍थाओं का स्‍पेस सिकुड़ता जाता है, लेकिन जनता की जनवादी आकांक्षाएँ बनी रहती हैं और जनवाद के स्‍पेस के संकुचन के विरुद्ध उसे संगठित करने की वस्‍तुगत जमीन तैयार रहती है। जनवाद की यह लड़ाई जनता की चेतना को उन्‍नत करती है और आगे समाजवाद की लड़ाई के लिए उसे तैयार करती है।...........................
  • Kavita Krishnapallavi (पिछले कमेंट से आगे)बात को दूसरे तरीके से समझने की कोशिश करें। मार्क्‍स ने सिर्फ यह कहा था कि किसी भी सामाजिक ढाँचे में शासक वर्ग के विचार, संस्‍कृति और मूल्‍य ही प्रभुत्‍वशील होते हैं, उन्‍होंने यह नहीं कहा था कि किसी सामाजिक ढाँचे में एकमात्र शासकवर्गीय विचारों-मूल्‍यों-संस्‍कृति का ही अस्तित्‍व होता है। पूँजीवादी व्‍यवस्‍था में पूँजीवादी (और उसके द्वारा सहयोजित, उत्‍सादित प्राक् पूँजीवादी) मूल्‍य, संस्‍कृति और संस्‍थाएँ प्रभुत्‍वशील स्थिति में होती हैं, लेकिन उनके साथ ही सर्वहारा मूल्‍य, संस्‍कृति और संस्‍थाएँ भी पैदा होकर लगातार विकासमान रहती हैं और प्रभुत्‍वशील पूँजीवादी संस्‍कृति एवं संस्‍थाओं के विरुद्ध टकराती रहती हैं। 'वर्चस्‍व' ('हेजेमनी') की अवधारणा निरूपित करते हुए अन्‍तोनियो ग्राम्‍शी ने इस प्रश्‍न पर काफी विस्‍तार से चर्चा की है। शासक वर्ग की सांस्‍कृतिक-वैचारिक 'हेजेमनी' के विरुद्ध वर्गों के बीच के सुदीर्घ 'पोजीशनल वारफेयर' में लगातार खंदकों और बंकरों की मोर्चेबन्‍दी जैसी लड़ाई चलती रहती है। अत: यह बेहद भोंड़ी अधिभूतवादी समझ है कि समाजवादी मूल्‍यों, आचार और संस्‍कृति की स्‍थापना हम समाजवाद आने के बाद कर लेंगे (या तब वह स्‍वत: हो जायेगी),फिलहाल हमें समाजवाद के लिए लड़ना चाहिए, और यह कि, पूँजीवाद के रहते पूँजीवादी बुराइयाँ ही छाई रहेंगी, अत: उनके विरुद्ध लड़ना बेमानी है। सच यह है कि वर्ग संघर्ष के वैचारिक-सांस्‍कृतिक मोर्चे के बगैर समाजवाद की राजनीतिक-आर्थिक लड़ाई के लिए जनचेतना तैयार ही नहीं की जा सकती। सही है कि पूँजीवादी समाज में शासक वर्ग के मूल्‍यों-संस्‍थाओं-संस्‍कृति का ही वर्चस्‍व होगा, पर उस वर्चस्‍व को कमजोर करने का संघर्ष लगातार जारी रहेगा तभी पूँजीवाद के ध्‍वंस के लिए जनचेतना तैयार की जा सकेगी। सांस्‍कृतिक क्रांति एक अनवरत जारी प्रक्रिया है, जो क्रांतिपूर्व काल में भी जारी रहती है, राज्‍य सत्‍ता पर सर्वहारा वर्ग के कब्‍जे के बाद उसका रूप बदल जाता है, रणनीति और आम रणकौशल बदल जाते हैं, कार्रवाई के नारे बदल जाते हैं।
    (समाप्‍त)

Thursday, 13 November 2014

जवाबी तमाचा लगाने का संतोष' समस्‍या के समाधान में कोई विशेष मदद नहीं पहुँचायेगा-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी

 

 (गंभीरता पूर्वक इस लेख का अध्यन करके अमल करने की  सख्त ज़रूरत है अन्यथा सम्पूर्ण वामपंथ को गंभीर हानि होने की संभावना है। ---विजय राजबली माथुर )

'किस ऑफ लव' मुहिम के बारे में कुछ विचार

-- कविता कृष्‍णपल्‍लवी'

किस ऑफ लव' आन्‍दोलन के बारे में कुछ साथियों ने मेरी राय पूछी है।इस आन्‍दोलन से मेरा कोई विरोध तो नहीं है, पर इसके बारे में मेरा रुख आलोचनात्‍मक है।
हिन्‍दुत्‍ववादी ताकतें अपने सामाजिक-सांस्‍कृतिक एजेण्‍डा को लागू करने के लिए प्राय: संस्‍कृति और परम्‍परा की दुहाई देती हैं और प्रतीकवाद के लोकरंजक हथकण्‍डे का इस्‍तेमाल करती हैं। प्रतीकवाद का जवाब महज प्रतीकवाद से देने से मुद्दा हल्‍का हो जाता है। सांस्‍कृतिक आतंकवाद की पुरोगामी राजनीति एक व्‍यापक और दीर्घकालिक प्रतिरोध संगठित किये  जाने की माँग करती है, प्रगतिशील संस्‍कृति और सामाजिक आचार का जनजीवन में व्‍यापक एवं सुदृढ़ आधार तैयार करने के लिए तृणमूल स्‍तर पर व्‍यापक सामाजिक-सांस्‍कृतिक आन्‍दोलन संगठित करने की श्रमसाध्‍य गातिविधियों की सुदीर्घ निरंतरता की माँग करती है। 'दक्षिणपंथियों के मुँह पर जवाबी तमाचा लगाने का संतोष' समस्‍या के समाधान में कोई विशेष मदद नहीं पहुँचायेगा।
निजी आजादी-विरोधी और स्‍त्री-विरोधी जिन आचार-व्‍यवहारों को तमाम धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें जनता पर थोपना चाहती हैं, उनका समाज में व्‍याप्‍त रू‍ढ़ि‍यों-रीतियों-संस्‍कारों और संस्‍थाओं (जाति पंचायत, खाप पंचायत, पुराना पारिवारिक ढाँचा आदि) के रूप में व्‍यापक समर्थन आधार है। साथ ही, धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें तृणमूल स्‍तर पर लगातार अपनी संस्‍थाओं, प्रचारपरक गतिविधियों और सामाजिक-सांस्‍कृतिक आयोजनों के जरिए रू‍ढ़ि‍वाद को पोषक खुराकें देकर मजबूत बनाती रहती हैं। दूसरी ओर महानगरों का आधुनिक प्रगतिशील विचारों वाला जो मध्‍यवर्गीय तबका (विशेषकर युवा) है, वह अपने ही खित्‍तों में सिमटा हुआ, अपने ही लोगों के बीच 'किस ऑफ लव' जैसी प्रतीकात्‍मक जवाबी मुहिम चलाकर अपनी पीठ ठोंकता रहता है। रूढ़ि‍वाद जहाँ उसकी आजादी पर चोट करता है, वहाँ वह उसका मुखर प्रतीकात्‍मक प्रतिवाद करता है, लेकिन रूढ़ि‍यों की सर्वाधिक निर्मम मार तो अपने रोज-रोज के जीवन में व्‍यापक आम मेहनतकश जनता झेल रही है और विडम्‍बना यह है कि प्रतिगामी शक्तियों के सांस्‍कृतिक वर्चस्‍व की राजनीति स्‍वयं उनके दिलो-दिमाग को रूढ़ि‍यों की स्‍वीकृति के लिए काफी हद तक अनु‍कूलित किये हुए है। रू‍ढ़ि‍यों के विरोध के लिए प्रतिबद्ध आधुनिक प्रगतिशील विचारों सरोकारों वाले युवा बुद्धिजीवियों को सबसे पहले आम जनता के बीच जाकर जाति-धर्म के रूढ़ि-बंधनों के विरुद्ध, स्‍त्री-विरोधी रूढ़ि‍यों-संस्‍थाओं के विरुद्ध सतत् अभियान चलाना होगा, संस्‍थाएँ खड़ी करनी होंगी, सांस्‍कृतिक-सामाजिक काम करने होंगे और इस उद्देश्‍य पूर्ति के लिए युवा संगठन, स्‍त्री संगठन, जाति उन्‍मूलन मंच, रूढ़ि-विरोधी मंच आदि बनाने होंगे। 
अपने सुरक्षित, कुलीन, मध्‍यवर्गीय, महानगरीय द्वीपों पर लड़ी जाने वाली प्रतीकात्‍मक लड़ाइयों से आत्‍मसंतोष के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं मिलेगा। हालत तो यह है कि सहारनपुर, बिजनौर, आजमगढ़, बस्‍ती जैसे छोटे शहरों और गाँवों को भी छोड़ दें, तो दिल्‍ली में भी जनेवि कैम्‍पस, दिविवि कैम्‍पस और केन्‍द्रीय दिल्‍ली के बाहर यदि आम निम्‍न मध्‍यवर्गीय मुहल्‍लों और मज़दूर बस्तियों में 'किस ऑफ लव' की मुहिम चलाई जाये तो जनता ही दौड़ा लेगी या ढेले फेंकने लगेगी। इसलिए सबसे पहले जनता के बीच सांस्‍कृतिक-सामाजिक कार्रवाइयों की ज़रूरत है, सघन रूप से और निरंतरता के साथ। बेशक प्रतीकात्‍मक लड़ाइयाँ भी लड़ी जाती हैं, ज़रूर लड़ी जानी चाहिए, लेकिन उनकी सार्थकता एवं प्रभाविता तभी बनती है जब उनके पीछे एक सशक्‍त सामाजिक आन्‍दोलन का पूर्वाधार हो। पेरियार ने शहर की सड़कों पर हिन्‍दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को झाड़ू मारते हुए जुलूस निकाला था। यह एक उग्र प्रतीकात्‍मक प्रतिवाद था, पर इसके पीछे सुदीर्घ प्रयासों से खड़ा किये गये एक सशक्‍त सामाजिक आन्‍दोलन की ताकत थी। ज्‍योतिबा फुले, पेरियार, आन्‍ध्र महासभा के भीतर सक्रिय कम्‍युनिस्‍टों और रैडिकल तत्‍वों तथा राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के दौर के बहुतेरे सुधारकों ने ज़मीनी स्‍तर पर सामाजिक आन्‍दोलन खड़ा करने के काम में काफी धैर्यपूर्वक समय और ऊर्जा लगायी थी। आज का जो कुलीन मध्‍यवर्गीय वामपंथ है, वह ऐसा किये बिना कुछ प्रतीकात्‍मक लड़ाइयाँ लड़कर, कुछ अनुष्‍ठानिक कार्रवाइयाँ करके अपने कर्तव्‍यों की इतिश्री कर लेना चाहता है और अपनी 'उग्र क्रांतिकारिता' पर अपनी पीठ ठोंक लेना चाहता है। यह दोन किहोते जैसी हरकत है।
दूसरी बात यह है कि सामाजिक रूढ़ि‍यों और पोंगापंथ को थोपने की कोशिशें धार्मिक कट्टरपंथी फासिस्‍टों का स्‍वतंत्र एजेण्‍डा नहीं है। यह उनके सम्‍पूर्ण आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक-सांस्‍कृतिक-शैक्षिक एजेण्‍डा का एक हिस्‍सा है। हमें उनके समूचे एजेण्‍डा को 'एक्‍सपोज' करना होगा,समूचे प्रोजेक्‍ट का विरोध करना होगा। इसके लिए हमें व्‍यापक मेहनतकश जनता के बीच हर स्‍तर पर काम करना होगा। अपनी हर सूरत में फासीवाद एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्‍दोलन होता है जो पूँजीवाद के संकट का समाधान देने के नाम पर तरह-तरह के लोकरंजक नारे देकर जनता को लुभाता और ठगता है। 'सुनहरे अतीत की वापसी' और 'परम्‍परा के नाम पर रूढ़ि‍यों का महिमामण्‍डन' भी इसी लोकरंजक तिकड़म का एक हिस्‍सा है जो जनता के एक अच्‍छे-खासे हिस्‍से को मिथ्‍याभासी चेतना के गुंजलक में सफलतापूर्वक फँसा लेता है। इस प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्‍दोलन का प्रतिकार केवल एक सशक्‍त प्रगतिशील, क्रांतिकारी सामाजिक आन्‍दोलन खड़ा करने की कोशिशों द्वारा ही किया जा सकता है।
https://www.facebook.com/notes/761551077233769/
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Tuesday, 11 November 2014

माला सिन्हा ---Dhruv Gupt/Sanjog Waltar





जन्मदिन / माला सिन्हा
मैं तेरी नज़र का सरूर हूं, तुझे याद हो कि न याद हो !

हिंदी सिनेमा के छठे और सातवे दशक की भावप्रवण अभिनेत्री माला सिन्हा नेपाली मूल की पहली अदाकारा थीं जिन्हें हिंदी फिल्मों में सफलता और लोकप्रियता हासिल हुई। प्रेम के उल्लास, दर्द की गहराई और भावुकता के सघन से सघन क्षणों को अपनी आंखों और अपने चेहरे से बखूबी अभिव्यक्त करने का हुनर उन्हें आता था। यही वज़ह है कि वहीदा रहमान, नूतन, आशा पारेख, साधना, हेमा मालिनी जैसी अभिनेत्रियों के दौर में भी अपना एक ख़ास मुक़ाम बनाए रखने में वे सफल हुईं। आल इंडिया रेडियो में गायिका के तौर पर अपना कैरियर शुरू करने वाली माला सिन्हा की नायिका के रूप में पहली फिल्म केदार शर्मा की 'रंगीन रातें' (1956) थी, लेकिन उन्हें ख्याति मिली बी.आर.चोपड़ा की फिल्मों 'धर्मपुत्र' और 'धूल का फूल' से। उन्होंने सौ से ज्यादा हिंदी, उर्दू, बंगला और नेपाली फिल्मों में अभिनय किया। जिन फिल्मों के लिए उन्हें याद किया जाता है, वे हैं - धर्मपुत्र, धूल का फूल, अनपढ़, फिर सुबह होगी, प्यासा, जहांआरा, गीत, आंखें, माया, दिल तेरा दीवाना, मेरे हुज़ूर, गुमराह, हिमालय की गोद में, हरियाली और रास्ता, बहुरानी, आसरा, नया ज़माना, उजाला, एक गांव की कहानी, परवरिश, मैं नशे में हूं, गहरा दाग, नीला आकाश, संजोग, हमसाया, दुनिया न माने, बेवक़ूफ़, पूजा के फूल, सुहागन, जब याद किसी की आती है, दो कलियां, बहारें फिर भी आएंगी, अपने हुए पराए, दिल्लगी, मर्यादा, रिवाज़ और कर्मयोगी। 1994 की फिल्म 'ज़िद' में वे आखिरी बार देखी गईं। चार फिल्मों - धूल का फूल, बहुरानी, जहांआरा और हिमालय की गोद में उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले थे। फ़िलहाल वे सिनेमा को अलविदा कह अलग-थलग पारिवारिक जीवन बिता रही हैं। माला सिन्हा के जन्मदिन पर उन्हें हार्दिक बधाई, उनकी फिल्म 'धर्मपुत्र' के लिए साहिर के लिखे एक नज़्म की पंक्तियों के साथ !

रो रोके तुम्हें ख़त लिखती हूं
और खुद पढ़कर रो लेती हूं
हालात के तपते तूफां में
जज़्बात की कश्ती खेती हूं
कैसे हो कहां हो कुछ तो कहो
मैं तुमको सदाएं देती हूं

मैं जब भी अकेली होती हूं
तुम चुपके से आ जाते हो
और झांक के मेरी आंखों में
बीते दिन याद दिलाते हो !
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=550151248394811&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=1 
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Sanjog Waltar :
Mala Sinha (born 11 November 1936 in Calcutta is a Nepali Indian actress who has worked in Hindi, Bengali and Nepali films. Recognised for her talent and beauty, she went on to become a popular leading actress in Hindi films from the early 1950s until the late 1970s. Sinha has starred in over a hundred film productions: popular ones include Pyaasa (1957), Dhool Ka Phool (1959), Anpadh, Dil Tera Deewana ( both 1962), Gumrah (1963), Himalaya Ki God Mein (1965) and Aankhen (1968).
Sinha was born in a Bengali descent Nepalese Christian family in Calcutta. Mala Sinha claimed herself a Bengali descent Nepali many years ago in a T.V. interview.They named her Alda. Her friends at school used to tease her by calling her Dalda (a brand of vegetable oil), so she changed her name to Mala.In her childhood she learnt dancing and singing.
Although she was an approved singer of All India Radio, she has never done playback singing in films. But as a singer she has done stage shows in many languages from 1947 to 1975.
Sinha started her career as child artist in Bengali films Jai Vaishno Devi followed by Shri Krishan Leela, Jog Biyog and Dhooli. Noted Bengali director Ardhendu Bose saw her acting in a school play and took permission from her father to cast her as a heroine in his film Roshanara (1952), her cinematic debut.
After acting in a couple of films in Calcutta, Mala had to go to Bombay for a Bengali film. There she met Geeta Bali, a noted Bollywood actress, who was charmed by her and introduced her to film director Kidar Sharma. It was Sharma who cast her as a heroine in his Rangeen Ratein. Her first Hindi film was Badshah opposite Pradeep Kumar, then came Ekadashi, a mythological film. Both failed, but her lead role in Kishore Sahu's Hamlet, paired opposite Pradeep Kumar, fetched her rave reviews in spite of it failing at the box office. Films like Lai Batti (ac­tor Balraj Sahni’s only directorial venture), Nausherwan-E-Adil where she starred as the fair maiden Marcia in Sohrab Modi’s romance about forbidden love and Phir Subah Hogi, which was direc­tor Ramesh Saigal’s adapta­tion of Dosteovsky’s Crime and Punishment established Mala Sinha's reputation as a versatile actress who took the maximum career risks by accepting unconventional roles.
Mala was a singer of some repute and used to sing for All India Radio; she was not allowed to sing playback (even for herself) in the movies with the lone exception being 1972's Lalkar.[5] In the 1950s, she had string of hits opposite Pradeep Kumar like Fashion (1957), Detective (1958), Duniya Na Mane (1959) though their first two ventures had failed. The films she did with Pradeep Kumar were men-oriented. In 1957, noted Bollywood actor and film director Guru Dutt (the husband of Geeta Dutt) cast Mala in his film Pyaasa (1957) in a role originally intended for Madhubala. Mala gave a memorable performance as the relatively unsympa­thetic part of an ambitious woman who chooses to marry a rich man (played by actor Rehman) and have a loveless marriage rather than a poor, unsuccessful poet and her impoverished lover (played by Guru Dutt) whom she ditches. Pyaasa remains to this day a classic in the history of Indian cinema and a turning point for Sinha.
After Pyaasa her major success were Phir Subah Hogi(1958) and Yash Chopra's directorail debut Dhool Ka Phool (1959) that elevated her into a major dramatic star.[6] There was no looking back for Sinha then as she was part of many successful movies from 1958 to the early '60s like Parvarish (1958), Ujala, Main Nashe Main Hoon, Duniya Na Mane, Love Marriage (1959), Bewaqoof (1960), Maya (1961), Hariyali Aur Rasta and Dil Tera Deewana (1962), Anpadh, Bombay Ka Chor (1962). Critics believe her career best performance was in Bahurani (1963), Gumrah, Gehra Daag, Apne Huye Paraye and Jahan Ara. Apart from pairing with Pradeep Kumar, her pairing opposite Raaj Kumar, Rajendra Kumar, Biswajit and Manoj Kumar in woman-oriented films were appreciated by audiences, with her films opposite Biswajit being the most popular. With Raaj Kumar, she gave box office hits like Phool Bane Angaare, Maryada and Karmayogi and opposite Manoj Kumar, gave commercial successes like Hariyali Aur Rasta, Apne Huye Paraye and Himalaya Ki God Mein. The hits with Rajendra Kumar were Devar Bhabhi, Dhool Ka Phool, Patang, Geet and Lalkar.
With Biswajit her popular movies include Aasra, Night in London, Do Kaliyaan, Tamanna, Nai Roshni and critically acclaimed films Pyar Ka Sapna, Paisa Ya Pyaar, Jaal and Phir Kab Milogi (1974 film). She did 10 films with Biswajit. In 2007, they won the Star Screen Lifetime Achievement Award, calling them on stage together giving due respect to their popularity as a pair who have tasted box office success.The most remarkable feature of career of Mala Sinha was that most of her 1960s and 1970s hits were fueled by her own star power as much as the heroes and most of the times her role was more powerful than the hero. Though she was pitted opposite her seniors like Raj Kapoor, Dev Anand, Kishore Kumar, Pradeep Kumar and when she acted opposite the emerging stars from late 1950s like Shammi Kapoor, Rajendra Kumar and Raaj Kumar, she made sure her role was as good as theirs. The characters she played stood out and gave her recognition for her performances. Sinha did not mind working with newcomers as long as her role was worth it. She worked with many newcomers of her era including Manoj Kumar, Dharmendra, Rajesh Khanna, Sunil Dutt, Sanjay Khan, Jeetendra and Amitabh Bachchan. In most of her films from the 1960s, she got the first billing in the credits, even before the heroes, with exceptions being those with Guru Dutt, Raj Kapoor, Dev Anand, Pradeep Kumar and Kishore Kumar.
In 1966, Sinha went to Nepal to act in a Nepali film called Maitighar when the Nepali film industry was still in its infancy. This was the only Nepali film she did in her career. Her hero in the film was an estate owner called Chidambar Prasad Lohani.[9] Soon after, Mala Sinha married C. P. Lohani with the blessings of her parents. From the beginning theirs was a long-distance marriage with Lohani based in Kathmandu to look after his business and Sinha living in Bombay with their daughter Pratibha. She continued acting after her marriage.
She has been a heroine in many Bengali films. In Bengali films she has acted with Uttam Kumar as well as Kishore Kumar. Her last Bengali film as a main female lead was Kabita (1977) which featured Ranjit Mullick and Kamal Hassan; it was a super-hit at the box office. She is noted for her strong women-oriented, glamorous roles fuelled by her equal star power on par with the heroes in films like Dhool Ka Phool, Suhag Sindoor,Anpadh, Phir Subah Hogi, Hariyali Aur Rasta, Bahurani, Aasra, Do Kaliyaan, Gumrah, Aankhen, Baharen Phir Bhi Aayengi, Himalaya Ki God Mein, Do Kaliyaan, Holi Aayi Re, Nai Roshni, Mere Huzoor, Kangan, Archana, Maryada amongst others.
Of her rich and varied repertoire, she mentions she is rather partial to Jahan Ara (1964), a historical movie that Meena Kumari passed on to her:
"Meenaji turned down the role saying that she would not look the part whereas I would. Given my ignorance of Urdu, I was rather sceptical but Meenaji was convinced that I could do justice to the role. Playing Mumtaz Mahal's eldest daughter entailed gruelling Urdu classes and learning royal tehzeeb. It was hot on the grand sets erected at Ranjit Studio and the film had Madan Mohan's haunting music. It was a film replete with lyrical moments."
From 1974, she cut down on her assignments as the lead actresses. She accepted strong character roles in films like 36 Ghante (1974), Zindagi (1976), Karmayogi (1978), Be-Reham (1980), Harjaee (1981), Yeh Rishta Na Tootay, Babu (film) and Khel, which were popular.
In the early '90s Madhuri Dixit was promoted as new Mala Sinha in magazines. But, after 1994, she completely withdrew from industry and has given very few public appearances. In Dhool Ka Phool and B.R. Chopra's Gumrah, she played the first unwed mother and adulterous wife respectively in Hindi cinema. As she grew older, she gracefully moved on to doing character roles that befitted her age. She was last seen in Zid (1994).Though Mala evinced as much interest in her daughter Pratibha's career as her father did in her career, she was unable to achieve the same success for her daughter.
Sinha married her co-star from Nepali films, Chidambar Prasad Lohani in 1968. The couple met when they worked together in the Nepali film Maiti Ghar (1966). Lohani had an estate agency business. After her marriage, she used to come and stay in Mumbai to shoot films while her husband stayed in Nepal running his business. She has one daughter from the marriage: Pratibha Sinha, who is a former Bollywood actress. From the late 1990s, the couple and their daughter have been residing in a bungalow in Bandra, Mumbai.

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Pratibha Sinha (17 Novomber 1969) is an actress and the daughter of Mala Sinha, a formerly popular Bollywood actress. She is mostly remembered for dance performance in the 1996 blockbuster Raja Hindustani in the song "Pardesi Pardesi"
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Monday, 10 November 2014

Simple Kapadia ---स्वप्निल संसार

Simple Kapadia (15 August 1958 – 10 November 2009) was a Bollywood actress and costume designer.Simple Kapadia began her career when she was 18 years old. She made her acting debut in 1977 in the film Anurodh, paired opposite her then real-life brother-in-law, actor Rajesh Khanna. In that movie, she played the role of Sumitha Mathur. Her career as an actress spanned for almost 10 years. She starred in Shaaka in 1981 opposite Jeetendra. Her role in Lootmaar received all the plaudits from critics as well as theatregoers.She then distinguished herself with secondary roles in movies such as Jeevan Dhara, Hum Rahe Na Hum and Dulha Bikta Hai in which she performed a memorable qawali dance. In 1985, she starred in alternate cinema movie Rehguzar opposite Shekhar Suman. This poetic movie confirmed her qualities as an actress. Despite several offers and after more than 20 movies, she decided to end her acting career in 1987 after performing in an item song for the movie Parakh. She decided to become a costume designer. She very quickly excelled in that role and in her clientele, famous names such as Tabu, Amrita Singh, Sridevi and Priyanka Chopra could be found.
In 1994, she won a National Award for her costume design in Rudaali. Later, she distinguished herself in movies such as Rok Sako To Rok Lo and Shaheed which made her one of the most sought designers of Bollywood.
Her elder sister is actress Dimple Kapadia. She was the aunt of Twinkle Khanna and Rinke Khanna.
1994- Rudaali- National Award for Best Costume Design
Simple Kapadia was diagnosed with cancer in 2006. Despite this, she was still designing costumes for movies and going through the pain barrier to get her work done. She died in a hospital in Andheri, Mumbai on 10 November 2009.

‘क्रांतिवीर’ सुरेश भट्ट की तीनों बेटियां हैं दुर्भाग्य का शिकार-----Vinayak Vijeta

Vinayak Vijeta


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भगवन्! कुछ भी कीजौ पर ‘अगले जनम मुझे बिटिया ना दीजौ........’
‘क्रांतिवीर’ सुरेश भट्ट की तीनों बेटियां हैं दुर्भाग्य का शिकार
प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा ने भी छल से किया था असीमा से विवाह
धन्वा आज तक न तो अपने ससुराल नवादा गए न ही ली पत्नी की सुध

बेटियों का दुर्भाग्य और उनका दुख देख कोई भी मां भगवान से शायद यही प्रार्थना करेगी कि भगवन्! कुछ भी कीजौ पर ‘अगले जनम मुझे बिटिया ना दीजौ........’ यह कहानी है 1974 के जयप्रकाश आंदोलन के उस समर्पित नेता सुरेश भट्ट के परिवार और बेटियों की जो सुरेश भट्ट जब आंदोलन के दौरान सड़कों पर निकलते थे तो उस समय लालू प्रसाद सहित आज के सत्ता शीर्ष पर बैठे दर्जनों नेता उनके पीछे यह नारा लगाते हुए चलते थे कि ‘अगल-बगल हट्ट, आ रहे सुरेश भट्ट।’ मूल रुप से नवादा के रहने वाले सुरेश भट्ट ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान अपनी लगभग सारी संपति कुर्बान कर दी। उन्होंने न तो कभी अपने लिए और ही न अपने परिवार के लिए कुछ अर्जित किया। संपत्ति के नाम पर नवादा में एक विजय सिनेमा हॉल ही रहा जिसपर उनके सौतेले भाई ने कब्जा कर रखा है। दिल्ली के एक ओल्ड एज होम में पांच वर्षों तक गुमनामी की जिंदगी जीने वाले सुरेश भट्ट की कभी भी उनके किसी समाजवादी चेलों ने सुध नहीं ली। दिल्ली में ही उनका नवम्बर 2012 में देहांत हो गया। सुरेश भट् जैसे कांतिवीर के परिवार की दारून दशा मन को व्यथित कर देने वाली है। सुरेश भट्ट की तीन पुत्रियों में सबसे बड़ी पुत्री असीमा भट्ट उर्फ क्रांति भट्ट कभी पटना में एक दैनिक अखबार में कार्यरत थीं उसी समय उनका परिचय प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा से हुआ। एक दूसरी युवती से तब संबंध रहते हुए भी आलोक धन्वा ने असीमा को अपने जाल में फंसा उनसे विवाह कर लिया। असीमा भट्ट के साथ आलोक धन्वा ने इतना अन्याय और उन्हें प्रताड़ित किया कि असीमा को उनका घर छोड़ना पड़ा। 2005 को असीमा भट्ट के नाम एक माफीनामा पत्र लिखने वाले आलोक धन्वा शायद देश के ऐसे पहले दामाद हैं जिन्होंने कभी न तो अपने ससुराल का चौखट देखा नही ससुर-सास और उनके अन्य परिजनों की सुध ही ली। असीमा भट् बीते कई वर्षों से मुंबई में रहते हुए अभिनय क्षेत्र में कार्यरत हैं। असीमा ने आलोक धन्वा से अपने बने और बिगड़े संबंध और कारणों को लेकर एक लंबी आत्मकथा भी लिखी थी जो तीन वर्ष पूर्व ‘कथादेश’ नामक चर्चित साहित्यिक पत्रिका में छपी थी और कई लोगों इसे अपने ब्लॉग में भी लिया था।सुरेश भट्ट की दुसरी पुत्री प्रतिभा भट्ट शादी सहरसा में हुई उनकी एक पुत्री भी है पर उनके पति ने भी एक तरह से उनका परित्याग कर रखा है। ऐसी ही हालत सुरेश भट्ट की तीसरी और सबसे छोटी पुत्री प्रगति भट्ट का है। मधेपुरा के आलम नगर में ब्याहता प्रगति भी बीते कई वर्षों से अपने मायके में रहने को बाध्य हैं। जबकि सुरेश भट्ट का इकलौता बेटा प्रकाश बेरोजगार है। अपने सौतेले देवर द्वारा कब्जा कर रखे गए विजय सिनेमा हॉल में बने केबिन के कमरे में अपनी दो पुत्रियों और एक बेटे के साथ वर्षों से रहकर गुजारा कर रहीं सरस्वती भट्ट * जिनकी माली हालत भी काफी खराब है के दिल पर क्या गुजरती होगी इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
तस्वीर
1. असीमा भट्ट (बीच में) अपनी दोनों बहनों के साथ
2. असीमा उर्फ क्रांति भट्ट के साथ आलोक धन्वा
3. वर्ष 2002 में असीमा को आलोक धन्वा द्वारा भेजा गया माफीनामा पत्र


https://www.facebook.com/asima.bhatt/posts/10202963524918001

* सरस्वती भट्ट  http://krantiswar.blogspot.in/2014/09/blog-post_48.html

Wednesday, 5 November 2014

किसी राष्ट्र के लिए परम वैभव क्या होगा ?---अरविंद राज स्वरूप

अरविंद राज स्वरूप ,सह सचिव, भाकपा , उ . प्र .

श्री मोहन भागवत जी किसी राष्ट्र के लिए परम वैभव क्या होगा ?
कल आगरा में श्री भागवत ने संघ के कार्यकर्ताओ को संबोधित किया। कहा " संघ ही देश को परम वैभव दिला सकता है"(जागरण 4-11-2014 कानपुर)
21वीं शताब्दी में किसी राष्ट्र/देश के लिए वैभव की क्या परिभाषा होगी।
सामान्य एवं मान्य समझ के अनुसार जिस समाज/ देश में:
# मानव द्वारा मानव का शोषण न हो।
# सामाजिक एवं आर्थिक न्याय हो।
# सामाजिक असमानता पनपने के सारे कारण समाप्त कर दिए गए हों।
# प्रत्येक धर्मावलम्बी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता हो और उक्त धार्मिक निजता में राज्य का सरोकार उसी हद तक हो जिससे विभिन्न धार्मिक समूहों में यदि कोई विरोधाभाव पैदा हो तो उसका निवारण हो सके।
# महिलाओ को बराबरी का हक़ और सम्मान मिले।

यदि भारत का संविधान देखा जाये तो उसके' राज्य की निति के निदेशक तत्वों 'में भारत को परम वैभव शाली राज्य बनाने के बहुत से सूत्र दिए गए हैं।
क्या आपका आशय उसी वैभव से है भागवत जी?
लेकिन आपने अपने संबोधन में जो दो उदहारण प्रस्तुत किये हैं उनकी दशा तो वैभव हीन सम्माज की है।
जापान: 

 दूसरे विश्वयुद्ध में जापान का टोजो, हिटलर - मुसोलिनी की धुरी  का हिस्सा था। वहा का विकास पूंजीवादी पूंजी प्रधान विकास है और बावजूद 12 करोड़ की आबादी के आर्थिक असमानताए और विषमताए विद्यमान हँ। गरीबी और अमीरी का बड़ा अंतर है। जिनी की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार वहाँ गरीबी की दर 8%है। यह बात अलग है की वहाँ के गरीब भारत के अमीरों के बाराबर हों।
इजराइल:
82 लाख की आबादी का एक ऐसा देश है जो सिर्फ और सिर्फ अमरीका और अन्य धनी मुल्को की वजेह और मदद से चौधरी बना बैठा है। वहाँ के एक एक उद्योग में विदेशी बहु राष्ट्रीय कंपनियों का पैसा लगा है।
अरब देशो के नवाब शेख बेहद अमीर हैं पर उन देशो के आम लोग तो गरीब हैं और वो अधिकतर उन्ही लोगो को मारता है और संघ के सबसे बड़े पदाधिकारी द्वारा परम वैभव के ऐसे आदर्श प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! क्या मानवता से कोई सरोकार नहीं है?
भागवत जी ! यह कैसा वैभव है?और न ही यह स्थिति भारत के " वसुधैव कुटुम्बकम"के दर्शन को अभिव्यक्त करती है।
वास्तव में संघ प्रमुख जी आप बड़े बड़े प्रचंड शब्दों का प्रयोग करके उस सच्चाई को छिपाना चाहते हैं जो है पूंजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण। आप उक्त उदाहारणों से केवल उन्ही की प्रशस्ति का गायन कर रहे हैं और इस पुरातन सभ्यता और संस्कृति के देश वासियों को ऐसे ही वैभव और श्री विहीन सामाज की ओर उन्मुख होने का सन्देश दे रहे हैं !ये कैसा देश प्रेम है?
देश का नौजवान श्री भागवत से यह भी पूछना और जानना चाहता है की देश के परम वैभव की एक घड़ी 15 अगस्त 1947 थी जब देश अंग्रेजो की दास्ता से मुक्त हुआ।
जवाब दे संघ की उस परम वैभव तक पहुचने में 1925(जन्म काल से) 1947 तक क्यो उसकां कोई योगदान नहीं था!
 

Friday, 31 October 2014

केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह---यह देश हमारा है

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 हर जगह मंदिरों का यही हाल है और पुजारियों का भी। चाहे जैसे हो आगंतुकों को लूटना और उल्टे उस्तरे से मूढ़ना ही पुजारियों का एकमात्र लक्ष्य होता है। इसीलिए तो कबीर दास जी ने कहा था-


* दुनिया ऐसी बावरी कि पत्थर पूजन जाये।

 घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाये। ।
* कंकर-पत्थर जोड़ कर लई मस्जिद बनाए।

 ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाए। ।

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मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।
इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।
कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया। नादर , नायर और नंबुदरी जाती की औरतें और दरबार !!!!!!!!!!!!!!!

Tuesday, 28 October 2014

ऎसे बचाएं अपने आपको "झूठी एफआईआर" और पुलिस कार्यवाही से ---Igzone Lucknow

9 mins ·
ऎसे बचाएं अपने आपको "झूठी एफआईआर" और पुलिस कार्यवाही से:
कुछ लोग आपसी मतभेद में एक दूसरे के खिलाफ पुलिस में झूठी एफआईआर लिखवा देते हैं। अक्सर ऎसे मामलों में जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है, वे पुलिस और कोर्ट के कानूनी झंझटों में फंस जाते हैं और उनका धन, समय और जीवन बर्बादी की कगार पर चल पड़ता है। परन्तु क्या आप जानते हैं कि ऎसी झूठी शिक ायतों के खिलाफ आप कार्यवाही कर अपने आपको बचा सकते हैं। भारतीय संविधान में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 482 ऎसा ही एक कानून है जिसके उपयोग से आप फिजूल की परेशानियों से बच सकते हैं।
क्या है धारा 482
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 482 के तहत आप अपने खिलाफ लिखाई गई एफआईआर को चैलेन्ज करते हुए हाईकोर्ट से निष्पक्ष न्याय की मांग कर सकते हैं। इसके लिए आपको अपने वकील के माध्यम से हाई कोर्ट में एक प्रार्थनापत्र देना होता है जिसमें आप पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर पर प्रश्नचिन्ह लगा सकते हैं। यदि आपके पास अपनी बेगुनाही के सबूत जैसे कि ऑडियो रिकॉर्डिग, वीडियो रिकॉर्डिग, फोटोग्राफ्स, डॉक्यूमेन्टस हो तो आप उनको अपने प्रार्थना पत्र के साथ संलग्न करें। ऎसा करने से हाई कोर्ट में आपका केस मजबूत हो बन जाता है और आपके खिलाफ दर्ज एफआईआर कैंसिल होने के आसार मजबूत हो जाते हैं।
कैसे करें धारा 482 का प्रयोग :
धारा 482 का प्रयोग दो तरह से किया जाता है।
 पहला प्रयोग अधिकतया दहेज तथा तलाक के मामलों में किया जाता है। इन मामलों में दोनों पार्टियां आपसी रजामंदी से सुलह कर लेती है जिसके बाद वधू पक्ष हाईकोर्ट में वर पक्ष के खिलाफ एफआईआर कैंसिल करने की एप्लीकेशन देता है, जिसके बाद वर पक्ष के खिलाफ दायर 498, 406 तथा अन्य धाराओं में दर्ज मामले हाई कोर्ट के आदेश पर बन्द कर दिए जाते हैं।
दूसरा प्रयोग आपराधिक मामलों में किया जाता है। मान लीजिए किसी ने आपके खिलाफ मारपीट , चोरी, बलात्कार अथवा अन्य किसी प्रकार का षडयंत्र रच कर आपके खिलाफ पुलिस में झूठी एफआईआर लिखा दी है। आप हाई कोर्ट में धारा 482 के तहत प्रार्थना पत्र दायर कर अपने खिलाफ हो रही पुलिस कार्यवाही को तुरंत रूकवा सकते हैं। यही नहीं हाई कोर्ट आपकी एप्लीकेशन देख कर संबंधित जांच अधिकारी जांच करने हेतु आवश्यक निर्देश दे सकता है। इस तरह के मामलों में जब तक हाई क ोर्ट में धारा 482 के तहत मामला चलता रहेगा, पुलिस आप के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकेगी। यही नहीं यदि आपके खिलाफ गिरफ्तारी का वारन्ट जारी है तो वह भी तुरंत प्रभाव से हाई कोर्ट के आदेश आने तक के लिए रूक जाएगा।
ध्यान रखें इन बातों का
इन कानून के तहत आप को एक फाइल तैयार करनी होती है जिसमें एफआईआर की कॉपी तथा आपके प्रार्थना पत्र के साथ साथ आपको जरूरी एविडेन्स भी लगाने होते हैं। यदि एविडेन्स नहीं है तो आप अपने वकील से सलाह मशविरा कर पुलिस में दर्ज शिकायत के लूपहोल्स को ध्यान से देख कर उनका उल्लेख करें। इसके अतिरिक्त आप यदि आपके पक्ष में कोई गवाह है तो उसका भी उल्लेख करें। -

Friday, 24 October 2014

ईमानदार राजनीज्ञ: रफ़ी अहमद किदवई ----- संजोग वाल्टर

Rafi Ahmed Kidwai was a politician, an Indian independence activist and a socialist, sometimes described as an Islamic socialist.He hailed from Barabanki District of United Provinces, now Uttar Pradesh.He was born on 18 February 1894 in the village of Masauli, in Barabanki district, United Provinces, India, the eldest of four sons of Imtiaz Ali Kidwai, a middle-class zamindar (or landowner) and government servant, and his wife, Rashid ul-Nisa, who died during his early childhood. He received his early education from a tutor at the home of his uncle, Wilayat Ali, a politically active lawyer, and in the village school. He attended the Government High School, Barabanki, until 1913. He then attended the Mohammadan Anglo-Oriental College, Aligarh, where he graduated BA in 1918. He began work towards the degree of LLB, but, swept up by the khilafat and non-co-operation movements in 1920–21 (the first of Mahatma Gandhi's major all-India satyagraha, or non-violent civil resistance, movements) and jailed for his participation, he never completed it. He married Majid ul-Nisa in 1919. They had one child, a son, who died at seven years of age. Late Rafi Sahab had five brothers, he himself was the eldest. other brothers were Late Shafi Ahmad Kidwai, Late Mehfooz Ahmad Kidwai, Late Ali Kamil Kidwai and Late Hussain kamil Kidwai.Now Fareed Kidwai s/o late Mehfooz Ahmad Kidwai is a MOS in UP govt. Other surviving nephews are Rishad Kamil Kidwai s/o Late Mehfooz Ahmed Kidwai, Mumtaz Kamil Kidwai s/o Late Ali Kamil Kidwai and Hasan Javed Kidwai s/o Husain kamil Kidwai.Kidwai suffered heart failure, precipitated by an attack of asthma, in the midst of a speech at a public meeting in Delhi and died shortly thereafter, on 24 October 1954. He was buried in his home village, Masauli, where a Mughal-style mausoleum was built over his grave. *A formidable fund-raiser for Congress movements and elections, he distributed his largesse to all and sundry, but died in debt, leaving behind only a decaying house in his home village.
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* 1965 में जब मैं सिलीगुड़ी में नवी कक्षा का छात्र था तब अपने हेड मास्टर साहब( डॉ कैलाशनाथ ओझा ) से भारत-पाक संघर्ष के दौरान रफ़ी अहमद किदवई साहब का ज़िक्र सुना था। डॉ ओझा साहब ने उनकी ईमानदारी की कई बातों का ज़िक्र किया था और बताया था कि नेहरू जी ने उनके मकबरे के लिए अनुमानित लागत से दुगुनी रकम मंजूर कराई थी। पूछे जाने पर नेहरू जी का जवाब था कि एक ईमानदार नेता का जैसा भव्य मकबरा वह चाहते हैं तभी बन सकेगा वरना अफसर-ठेकेदार कमीशन काट कर उसकी गुणवत्ता गिरा देंगे। 
*आज़ादी के तुरंत बाद काश्मीर को  महाराजा हरी सिंह (डॉ कर्ण सिंह के पिता श्री ) द्वारा स्वतंत्र घोषित करते ही पाकिस्तान ने कबाइलियों को आगे करके आक्रमण कर दिया था। सरदार पटेल ने रफ़ी साहब के परामर्श से उनके  गृह मंत्रालय में अधिकारी भाई साहब को साथ लेकर श्रीनगर प्रस्थान किया था तब उनके साथ बीजू पटनायक भी थे जिन्होने विमान चलाया था। हरी सिंह को भारत विलय का प्रस्ताव पास कराना पड़ा था। 
*आज़ादी के तुरंत बाद ही कलकत्ता के मारवाड़ी व्यापारी गल्ला तस्करी के जरिये बाहर भेज रहे थे और भारत में तंगी व मंहगाई की मार पड़ रही थी। रफ़ी साहब केंद्रीय खाद्य व कृषि मंत्री थे। उन्होने मारवाड़ी व्यापारी का वेश बना कर कलकत्ता के मारवाड़ी व्यापारियों से बात की और छिपे राशन का पता चलते ही उन पर छापा डलवा कर सारा राशन सस्ते गल्ले की दुकानों से जनता को वितरित करवा दिया था। 

मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि मेरा संबंध रफ़ी साहब के ज़िला बाराबंकी (दरियाबाद ) से है और मैं भी अपने बाबा जी, बाबू जी व नाना जी की भांति ही आज भी ईमानदारी के मार्ग पर चल कर पग-पग पर काँटों का सामना कर रहा हूँ। 24 अक्तूबर रफ़ी अहमद किदवई साहब का स्मृति दिवस है तो  हमारे पिता जी स्व.ताजराज बली माथुर साहब का जन्मदिन है ।

"गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

बाबूजी का स्मृति चित्रण"

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/10/blog-post_24.html 

--- विजय राजबली माथुर