Showing posts with label मंदिर. Show all posts
Showing posts with label मंदिर. Show all posts

Wednesday, 7 August 2019

संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार गंवा कर अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे ------ हेमंत झा

Hemant Kumar Jha
इस देश के 18 से 35 वर्ष के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है? क्या कश्मीर? या राम मंदिर? या पाकिस्तान...?
या...उच्च शिक्षा में वंचित समुदाय के युवाओं के लिये घटते अवसर? रोजगार के घटते अवसर? अंध निजीकरण? श्रमिक अधिकारों पर लगातार हो रहे सुनियोजित हमले?

जाहिर है, सैद्धांतिक जवाब तो यही होगा कि शिक्षा और रोजगार युवाओं के लिये सबसे बड़ी समस्या हैं जो हाल के दिनों में और गम्भीर हुई हैं।

लेकिन...गौर करने वाली बात यह है कि इस देश की सरकार ही नहीं, स्वयं युवा वर्ग इन समस्याओं को लेकर कितने संवेदनशील हैं।

बीते एकाध महीने में कई मुद्दे सतह पर आए हैं। नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित प्रारूप, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, तीन तलाक, रेलवे का निजीकरण, कश्मीर में धारा 370...आदि।

अपने आप में हर मुद्दा अहमियत रखता है। लेकिन, मायने यह रखता है कि किस मुद्दे पर लोगों की कैसी प्रतिक्रिया रही। किस मुद्दे पर बहस कोलाहल में बदल गया और किस मुद्दे की कोई खास चर्चा तक नहीं हुई?

सड़कों, चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक तीन तलाक पर जितनी बहसें हुईं, पाकिस्तान पर जितनी बातें होती हैं, अभी धारा 370 पर जितनी बहसें हो रही हैं, उनकी तुलना में नई शिक्षा नीति, नेशनल मेडिकल कमीशन, निजीकरण आदि पर कितनी बहसें हुईं?

अभी, जब लोग कश्मीर मुद्दे को लेकर इस तरह उछल रहे हैं जैसे कोई जीत मिली हो ठीक उसी वक्त सूचनाएं आ रही हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2 लाख नौकरियां खत्म हो गई हैं, रेलवे के निजीकरण वाया निगमीकरण के विरोध में रेलवे कर्मचारियों के संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल में ग्रामीण क्षत्रों को झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे करने की बातें हो रही हैं, मेडिकल शिक्षा को निम्न आय वर्ग तो क्या, मध्य वर्ग के प्रतिभाशाली युवाओं से दूर किया जा रहा है।

लेकिन, जीवन से जुड़े मुद्दों की कहीं कोई खास चर्चा नहीं।

जब अपने कॅरिअर, अपने भविष्य को लेकर युवा ही संवेदनशील नहीं हैं तो व्यवस्था क्यों संवेदनशील हो? सत्ता के लिये युवा वर्ग ही सबसे बड़ी चुनौती होता है इसलिये इस वर्ग को दिग्भ्रमित बनाए रखने के लिये सत्ता-संरचना हर सम्भव कोशिश करती है।

अंध निजीकरण युवाओं के भविष्य पर सबसे बड़ा आघात है। उच्च शिक्षा का कारपोरेटीकरण निम्न आय वर्ग के युवाओं के भविष्य को अंधेरों में धकेल देगा, इकोनॉमिक स्लोडाउन के कारण नौकरियां तो खत्म हो ही रही हैं, नई नौकरियों का सृजन भी नहीं हो रहा। इस आर्थिक दुर्व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार युवा वर्ग ही है।

वास्तविकता यह है कि रोजगार के क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मची हुई है।

लेकिन, आश्चर्य है कि इन मुद्दों को लेकर कहीं बहस नहीं, जबकि कोलाहल होना चाहिये था, आंदोलन होना चाहिये था।

फिलहाल, कश्मीर का झुनझुना है। पहले मंदिर झुनझुना था। ऐसे ही कई तरह के झुनझुने हैं। झुनझुने बदलते रहते हैं लेकिन उनकी आवाज वैसी ही रहती है। ऐसी आवाज...जिसमें अजीब सा नशा है। ऐसा नशा...जिसमें न अपना जीवन सूझता है, न अपना भविष्य सूझता है, न बाल बच्चों का भविष्य सूझता है।

इन संदर्भों में हम बीते सौ वर्षों की सबसे अभिशप्त पीढ़ी हैं...जो अपने बाप-दादों के अथक संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार तो गंवाते जा ही रहे हैं, अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे हैं।
साभार : 
https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2290223617752205

Wednesday, 6 December 2017

डॉ अंबेडकर का परिनिर्वाड़ दिवस और विध्वंस की राजनीति

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )  

आस्था और विश्वास के नाम पर गुमराह करके  भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर डॉ भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाड़ दिवस पर 25 वर्ष पूर्व 06 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिरा दिया गया था और आज भी वही राग अलापा जा रहा है उस पर नूपुर शर्मा जी का दृष्टिकोण है कि, ' भूखे भजन होय न गोपाला ' अतः  उन्होने  भव्य मंदिर के स्थान पर भव्य चिकित्सालय व विद्यालय के निर्माण की मांग रखी है  जो सर्वथा उचित है और उसका समर्थन प्रत्येक भारतीय को करना चाहिए । 










संविधान निर्मात्री समिति के चेयरमेन डॉ भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाड़ दिवस पर 25 वर्ष पूर्व 06 दिसंबर 1992 को अयोध्या में  राम मंदिर  / बाबरी मस्जिद के ढांचे को तब गिरा दिया गया था जब उत्तर प्रदेश में भाजपा बहुमत की सरकार सत्तासीन थी। यह मात्र एक ढांचे का विध्वंस नहीं था बल्कि यह संकेत था कि, भाजपा और उसके प्रणेता आर एस एस डॉ अंबेडकर द्वारा रचित  जिस संविधान को नहीं मानते हैं  उसे ध्वस्त कर देंगे। दस वर्ष बाद 2002 में गोधरा का वीभत्सकांड भी इसी मुहिम का ही हिस्सा था । इसी आधार पर 2014 में केंद्र में भी भाजपा सत्तारूढ़ हो सकी है एवं कारपोरेट घरानों की सेवा सुगमतापूर्वक कर रही है उसे साधारण जनता के दुखों को दूर करने की लेशमात्र भी चिंता नहीं है जैसा कि, नूपुर शर्मा जी की पोस्ट व उस पर प्राप्त प्रतिक्रिया से भी स्पष्ट होता है। : 



संकलन-विजय माथुर

Saturday, 19 December 2015

ब्राहमणवाद का राजनीतिक अर्थशास्त्र ------ महेश राठी

हिंदू समाज में दलित के रूप में पैदा होना निश्चित ही दुनिया का सबसे निकृष्टतम कृत्य और कृत्य भी ऐसा जिसमें आपका कोई हाथ नही होता है। यह निकृष्टता और अपमान ब्राहमणवादी संघी टोले के केन्द्रीय सत्ता पर काबिज होने के बाद से अपने चरम पर है। ब्राहमणवादियों की दबंगई और उसमें सत्ता का दुरूपयोग अपनी पूरी आक्रामकता और निर्लज्जता के साथ देश में चारो तरफ पैर पसार रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी भी इस दबंगई से अछूती नही है। 


Mahesh Rathi


ब्राहमणवाद का राजनीतिक अर्थशास्त्र :
हिंदू समाज में दलित के रूप में पैदा होना निश्चित ही दुनिया का सबसे निकृष्टतम कृत्य और कृत्य भी ऐसा जिसमें आपका कोई हाथ नही होता है। यह निकृष्टता और अपमान ब्राहमणवादी संघी टोले के केन्द्रीय सत्ता पर काबिज होने के बाद से अपने चरम पर है। ब्राहमणवादियों की दबंगई और उसमें सत्ता का दुरूपयोग अपनी पूरी आक्रामकता और निर्लज्जता के साथ देश में चारो तरफ पैर पसार रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी भी इस दबंगई से अछूती नही है। 
द्वारका इलाके में कुतुब विहार नामक कालोनी में एक दलित रामप्रसाद के नेतृत्व में कालोनी के अनुसूचित जाति के लोगों ने कुछ साल पहले एक मंदिर की नींव रखी और कईं सालों की मेहनत के बाद उसे विकसित भी किया। अब अचानक इलाके के ब्राहमणवादी भाजपाईयों को याद आ गया कि उनकी देवी देवताओं की देखभाल करने वाले लोग दलित हैं और उन्हें उनके देवी देवताओं की रखवाली और पूजा अर्चना करने का कोई अधिकार नही है। उसके बाद भाजपा के स्थानीय नेता शेलैन्द्र पाण्ड़े के साथ मिलकर उनकी ही पार्टी के दो अन्य कार्यकर्ताओं अभिमन्यू और मनीषा ने रामप्रसाद और उनके परिवार को मंदिर से धक्के देकर बाहर कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि तुम नीच जाति वालों को पूजा पाठ करने विशेषकर मंदिर की देखभाल करने का कोई अधिकार ही नही है। रामप्रसाद ने थाने जाकर शिकायत करनी चाही तो थानाध्यक्ष ने साफ कहा कि शिकायत मत करो पछताना पडेगा और शिकायत लेने से मनाकर दिया। उसके बाद उन्होंने अपनी शिकायत डीसीपी और पुलिस आयुक्त को एवं अनुसूचित जाति जनजाति आयोग में भी भेजी जहां आयोग ने 29 दिसम्बर को इस मामले की सुनवाई तय की है। 
अब थानाघ्यक्ष की चेतावनी के मूर्त रूप लेने का समय था। भाजपा नेता ने अपनी सहयोगी मनीषा के माध्यम रामप्रसाद पर छेड़छाड़ करने का आरोप लगवाकर उसे जेल भेज दिया। पंरतु ऐसा मामला बनने की आशंका को लेकर एक शिकायत रामप्रसाद ने पहले ही पुलिस विभाग को कर दी थी और उसी के आधार पर उन्हें जमानत भी मिल गई। इस इलाके में जगह जगह लगे पोस्टर एवं होर्डिंग्स भाजपा नेता के पद एवं रसूख का पता दे रहे हैं तो वहीं उनके साथ उन्हीं होर्डिंग्स में लगी उस महिला की तस्वीर भी पूरी कहानी बयां कर देती है जिसने रामप्रसाद को छेडछाड़ को आरोप में फंसवाया है। 
दरअसल यह पूरा मामला सरकारी जमीन को हड़पने का है। डीडीए की कईं बीघा जमीन में यह मंदिर बना हुआ है। मंदिर के पास भी लगभग एक हजार गज की जमीन पर बना ढ़ंाचा है अर्थात मामला स्थानीय निवासियों द्वारा इस मंदिर को कालोनी के कब्जे में रखकर इसका सामाजिक इस्तेमाल करने बनाम लैंड माफिया द्वारा इसे हथियाकर बेचन का है। जिसने कईं सालों तक इस मंदिर को बनाने में अपना सब कुछ लगाया और जिसका पूरा परिवार इस मंदिर के रख रखाव में लगा उसे एक दिन ब्राहमणवादी संगठन के प्रदेश स्तरीय नेता ने बता दिया कि तुम दलित हो और ना मंदिर तुम्हारा है और यह धर्म ही तुम्हारा है, भागो यहां से। हिंदू धर्म, उसके मंदिर उसके पूरे कार्मकाण्ड़ों का सच ही यही है कि वो एक वर्ग विशेष को देश और समाज के पूरे संसाधनों पर कब्जे और उसके दोहन का अर्थशास्त्र सिखाता है। यह तभी से जारी है जब हजारों साल पहले इस देश के मूल निवासियों पर आर्यों के रूप में पहला साम्राज्यवादी हमला हुआ था।* तभी से इन ब्राहमणवादियों की कोशिश धार्मिक कर्मकाण्ड़ों पर अपना वर्चस्व बनाने के माध्यम से पूरी प्राकृतिक और राष्ट्रीय संपदा के दोहन की है। परंतु अब लड़ाई का बिगुल बज चुका है और कुतुब विहार, गोला डेरी में ब्राहमणवाद के कब्जे से इस मंदिर को आजाद कराकर इसे समता प्रेरणा स्थल के रूप स्थापित किया जायेगा। आप सभी के इसमें सहयोग की आशा है।
https://www.facebook.com/mahesh.rathi.33/posts/10203777537797264
**********************************************
===========================================
*
'भारत पर आर्यों का हमला ' यह एक पाश्चात्य दृष्टिकोण है जो साम्राज्यवादियो द्वारा खुद को श्रेष्ठ साबित करने का एक घृणित प्रयास है। 
वस्तुतः आर्य न कोई जाति है, न संप्रदाय, न ही धर्म । आर्य शब्द आर्ष का अपभ्रंश है जिसका अभिप्राय है 'श्रेष्ठ' अर्थात विश्व का कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ है वह आर्य है। 
यदि पाश्चात्य दुष्चक्र में फंस कर आर्य को जाति,धर्म,संप्रदाय के रूप में लेकर हमलावर मानते रहेंगे तो कभी भी अपने लक्ष्य में सफल न हो सकेंगे, जैसा कि ब्राह्मणवादी चाहते भी हैं। 
'त्रिवृष्टि' अर्थात तिब्बत क्षेत्र आर्यों का मूल उद्गम क्षेत्र है जहां 'स्व:' और 'स्वधा' का सृजन हुआ। ये श्रेष्ठ लोग जब आबादी बढ्ने पर दक्षिण में हिमालय के पार जिस निर्जन-क्षेत्र में बसे वह इनके कारण आर्यावृत कहलाया। पहले मूल निवासी तो ये श्रेष्ठ जन- आर्य ही थे। तब तक आज का दक्षिण भारत  'जंबू द्वीप' के रूप में एक अलग निर्जन टापू था। जब  भू- गर्भीय हलचलों से 'जंबू द्वीप' उत्तर की ओर बढ़ कर आर्यावृत से टकराया तब 'हिंदमहासागर' नाम से जाना जाने वाला समुद्र सिकुड़ कर धुर दक्षिण में चला गया तथा जंबू द्वीप व  आर्यावृत को संयुक्त करने वाले 'विंध्याचल' पर्वत की उत्पत्ति हुई। आर्यावृत से जंबू द्वीप पर आबादी के स्थानांतरण से आर्यजन वहाँ भी आबाद हुये। पाश्चात्य इतिहासकारों ने इनको प्रथक द्रविन घोषित करके पार्थक्य की भावना को पोषित कर रखा है। 
जब अफ्रीका व यूरोप की आबादी को श्रेष्ठ अर्थात आर्य बनाने के उद्देश्य से आर्यों के जत्थे पश्चिम से चले तो उनका पहला पड़ाव था आर्यनगर= एर्यान= ईरान। खोमेनी से पहले तक वहाँ का शासक खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहता था। आगे बढ़ते हुये आर्य मेसोपोटामिया होते हुये जर्मनी पहुंचे थे। लेकिन पाश्चात्य जगत से गुमराह लोग उल्टा कहते हैं कि वहाँ से आर्य भारत पर आक्रमण करके आए थे। 
पूर्व से चले आर्य वर्तमान चीन, साईबेरिया क्षेत्र से होते हुये ब्लाड़ीवासटक और अलास्का को पार करते हुये कनाडा से दक्षिण की ओर बढ़े थे। उनका पहला पड़ाव 'तक्षक' ऋषि के नेतृत्व में जहां पड़ा था वह स्थान आज भी उनके नाम पर अपभ्रंश में 'टेक्सास' कहलाता है जहां  जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। दूसरा पड़ाव धुर दक्षिण में 'मय' ऋषि के नेतृत्व में जहां पड़ा वह आज भी उनके ही नाम पर मेक्सिको है।  
दक्षिण दिशा में 'पुलत्स्य'ऋषि के नेतृत्व में गए आर्य वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे जहां का शासक 'सोमाली' एक निर्जन टापू की ओर अपने समर्थकों सहित भाग गया था वह आज भी उसी के नाम पर सोमाली लैंड है। 
भारत से बाहर गए इन आर्यों का ध्येय लोगों को श्रेष्ठ मार्ग सिखाना अर्थात आर्यत्व में ढालना था। किन्तु पुलत्स्य के वंशज 'विश्र्श्वा' ने वर्तमान लंका में एक राज्य की स्थापना कर डाली जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ और इसी कारण उनका पुत्र रावण साम्राज्यवादी बन सका अपने अमेरिकी और साईबेरियाई सहयोगियों (एरावन व कुंभकरण ) की सहायता से। इसी साम्राज्यवादी आर्य - रावण को भारत के आर्य - राम ने कूटनीति व युद्ध में परास्त कर साम्राज्यवाद का सर्व प्रथम विनाश किया था। 
दुर्भाग्यपूर्ण है कि विद्वान लेखक महेश राठी जी ने भी पाश्चात्य साम्राज्यवादियों के दुर्भावनापूर्ण शब्द आर्य हमलावर थे को अपना लिया। भारतीय साम्यवाद के जनता के मध्य अलोकप्रिय होने का सबसे बड़ा कारण साम्यवादी विद्वानों द्वारा साम्राज्यवादी इतिहासकारों से भ्रमित होते रहना ही है। काश अब भी साम्यवादी विद्वान 'सत्य ' को स्वीकार करके ' हिन्दू' और 'ब्रहमनवाद' को अभारतीय कहने का साहस दिखा सकें तो सफलता उनके चरण चूम लेगी। साम्यवाद और कुछ नहीं वेदोक्त समष्टिवाद ही है लेकिन सत्य से दूर रहना और उसका वरन करने की बजाए उस पर प्रहार करते रहना ही वह वजह है जिसने जनता के दिलो-दिमाग में साम्यवाद के प्रति नफरत भर रखी है।महेश राठी जी सत्य के शस्त्र से हिंदूवाद और ब्रहमनवाद पर प्रहार करें तो निश्चय ही सफल होंगे , हमारी शुभकामनायें उनके साथ हैं। 
(विजय राजबली माथुर ) 

Saturday, 30 May 2015

क्या कहता है भारत का कालोनी कल्चर --- संजीव खुदशाह

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )



https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10204838505705945&set=a.2023770677401.2105740.1338014495&type=1&theater
आप जब भी किसी नये कालोनी की प्रचार सामग्री पर गौर करे तो पायेगे। आज कल की कालोनी का प्रमुख आकर्षण गार्डन और मंदिर होता है। प्रश्न यह है की क्या भारत में सिर्फ एक धर्म के ही लोग कालोनी पर निवास करते है? ज्यातदातर सरकारी हाउसिंग बोर्ड कालोनियों में आप मंदिर ही पायेगे। प्राईवेट कालोनी के विज्ञापन तो मंदिर को सामने रखकर ही दिये जाते है। जबकी सच्चाीई ये है की कालोनी में सभी धर्म समुदाय के लोग निवास करते है, लेकिन कहीं भी सर्वधर्म प्रार्थना भवन नही मिलेगा। ये भारत में सामुदायिक सौहार्द के लिए खतरनाक है।
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 31 October 2014

केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह---यह देश हमारा है

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )

 हर जगह मंदिरों का यही हाल है और पुजारियों का भी। चाहे जैसे हो आगंतुकों को लूटना और उल्टे उस्तरे से मूढ़ना ही पुजारियों का एकमात्र लक्ष्य होता है। इसीलिए तो कबीर दास जी ने कहा था-


* दुनिया ऐसी बावरी कि पत्थर पूजन जाये।

 घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाये। ।
* कंकर-पत्थर जोड़ कर लई मस्जिद बनाए।

 ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाए। ।

***************************************************************************
Naag Nath Megh shared यह देश हमारा है.'s status update.
मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।
इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।
कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया। नादर , नायर और नंबुदरी जाती की औरतें और दरबार !!!!!!!!!!!!!!!