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Tuesday, 1 May 2018

यह देश खतरनाक दौर से गुजर रहा है ------ सीमा आज़ाद



Seema Azad
दस्तक मई-जून २०१८ का संपादकीय

यह देश खतरनाक दौर से गुजर रहा है
20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी एक्ट में बदलाव कर उसे ऐसा बना दिया कि उसका दुरूपयोग तो क्या, उपयोग करना भी मुश्किल हो जायेगा। लगभग इसी समय सुप्रीम कोर्ट से ही विवि में विभागवार आरक्षण करने का फैसला आया, जिससे एससी एसटी ही नहीं ओबीसी वर्ग भी आरक्षण से बाहर हो जायेगा। वास्तव में यह शिक्षण संस्थानों में आरक्षण खत्म करने का ही एक नया तरीका है, जो बीएचयू में पहले से ही लागू हो रहा था। जिसे कोर्ट में चुनौती देने पर उसने सही ठहराया और इस मौके की ताक में बैठे मनुवादी यूजीसी ने बीएचयू के तरीके को पूरे देश के शिक्षण संस्थानों पर लागू करने का फरमान तुरन्त जारी कर दिया, जिसके बाद इन वर्गों में आक्रोश के बाद समाज में एक बार फिर सवर्ण और अवर्ण के बीच की खाई अधिक चौड़ी होने लगी। 
इन सबके बीच ही दो तीन खबरों पर और ध्यान दीजिये-राजस्थान में एक दलित युवक को ठाकुर लड़कों ने इसलिए जान से मार दिया, क्योंकि वह उनके सामने घोड़े पर सवार होकर चलता था। कासगंज में एक दलित लड़की की शादी में बारात ठाकुरों की बस्ती से होकर निकलेगा या नहीं और इसमें दूल्हा घोड़ी पर चढ़ेगा या नहीं, यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा और हाईकोर्ट ने इस पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर, अर्जी खारिज कर दी।
इन सभी घटनाओं को देखते हुए कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीशों की टिप्पणी ताजा हो जाती कि ‘देश खतरनाक दौर से गुजर रहा है।’ 
उप्र में ‘इनकाउण्टरों’ की संख्या एक साल के अन्दर ही 1000 की संख्या पार कर चुकी है, मारे जाने वालों में बड़ी संख्या मुसलमानों और पिछड़ी जातियों की है। विभिन्न जांचों में ये इनकाण्टर फर्जी साबित होते जा रहे हैं, फिर भी मुख्यमंत्री विधानसभा में यह बयान दे रहे हैं कि ‘इनकाउण्टर जारी रहेंगे, इसके खिलाफ बोलने वाले खुद अपराधी कहे जायेंगे।’ यानि उप्र में भी गुजरात और छत्तीसगढ़ के शासन का तरीका अपनाया जाने लगा है, सेना-पुलिस का प्रमोशन और सत्ता का रथ लोगों की लाशों पर चढ़कर आगे बढ़ रहा है। धीरे-धीरे यह तरीका पूरे देश में लागू किया जा रहा है। संविधान की शपथ लेकर संविधान की धज्जियां उड़ाना, खुद को कानून से ऊपर रखना और विरोधियों को संविधान विरोधी, अपराधी और देशद्रोही बताना सत्ता की मुख्य कार्यवाही होती जा रही है। हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले आतंकवादि के मुकदमों को कमजोर कर, उनके बाहर निकलने का रास्ता बनाना और आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम नौजवानों को जेल में डालते जाना और फासी पर लटकाना, यह आज की राजनीति की स्वाभाविक सी दिखने वाली घटना लगने लगी है।
सैद्धांतिक भाषा में यह फासीवाद है, जो कि विश्व आर्थिक मंदी की एक अभिव्यक्ति है, जिससे निपटने के लिए पूंजीपतियों के नुमाइन्दे सत्ताधीश लोगों के अन्तर्विरोधों को बढ़ाने और इससे फायदा उठा कर सत्ता में आने और बने रहने का जतन करती है। फासीवाद को सैद्धांतिक रूप से परिभाषित करने वाले ज्यॉर्जी दिमित्रोव का कहना है-
‘‘साम्प्रदायिक फासीवाद हमेशा अपने समय की वर्चस्वशाली साम्राज्यवादी शक्ति के हितों से जीवनी शक्ति हासिल करता है, फिर उसके हितों की सेवा करता है.....’’
‘‘........फासीवाद का मुख्य वाहक है राष्ट्रवाद। हर जगह फासीवाद जनसमुदाय की राष्ट्रवादी भावनाओं को अपने हाथ का खिलौना बनाता है और सत्ता में आने के लिए उन्माद भरे आन्दोलन छेड़ता है।’’
आगे उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी आर्थिक स्थिति से उत्पन्न फासीवाद हर देश में अलग-अलग तरीके से आता है। जाहिर है उस देश की राजनैतिक सामाजिक स्थिति के हिसाब से आता है और ऊपर की घटनायें भारत में यहां की राजनैतिक आर्थिक स्थिति के अनुरूप आये फासीवाद का ही नमूना है, जो मनुवादी, ब्राह्मणवादी, साम्प्रदायिक फासीवाद है। यानि भारत का साम्प्रदायिक फासीवाद साम्राज्यवादी दमन के लिए यहां के मनुवादी व्यवस्था को अपना अवलम्ब बनाये हुए है। भारतीय फासीवाद के इस स्वरूप पर बात करने के लिए पहले फासीवाद के स्रोत- साम्राज्यवादी पूंजी के आर्थिक संकट की बात करते हैं।
मार्क्सवाद को समृद्ध करते हुए लेनिन ने पूंजी के साम्राज्यवादी स्वरूप की व्याख्या करने वाली पुस्तक ‘साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्था’ लिखी। जिसमें उन्होंने मंदी दर मंदी गुजरने के बाद वैश्विक स्तर पर पूंजी के एकाधिकारी चरित्र को समझाया है, जिसमें बड़े कॉरपोरेट बड़ी पूंजी के रूप में छोटे कॉरपोरेट यानि छोटी पूंजी को निगलते जाते हैं। अधिक से अधिक मुनाफे के लिए प्राकृतिक संसाधनों और श्रम की लूट अपने चरम पर पहुंच जाती है, जिससे पूरी दुनिया में अराजकता की स्थिति खड़ी हो जाती है और पूंजी का दमन जनता पर बढ़ जाता है साथ ही तीखा हो जाता है। इस दमन को आसान बनाने के लिए पूंजी की एकाधिकारी शक्तियां लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़े करने वाले रास्तों को तलाशती हैं, जिनमें साम्प्रदायिकता उनका चिर-परिचित और स्वाभाविक तरीका है। उतना ही स्वाभाविक, जितना कि ऐसी अराजक स्थिति से निपटने का एक ही रास्ता है- पूंजी के एकाधिकारी स्वरूप और मुनाफे की अर्थव्यवस्था को खत्म करना। 
भारत में पूंजी के इस फासीवादी स्वरूप को लागू कराने का ठोस आधार देने का काम करने वाली विचारधारा ‘मनुवाद’ सैकड़ों सालों से मौजूद है, जिसने लोगों को वर्णव्यवस्था की जातीय श्रेणीबद्धता में बांट रखा है और समाज के एक बड़े शोषित हिस्से को एक ‘वर्ण’ के रूप में आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक तौर पर संकरे हाशिये पर ढकेलकर रखा है। इसने लोगों को वर्ण और जातियों के आधार पर शासक और शोषितों में बांट रखा है। इसने मुसलमानों और वर्णव्यवस्था के बाहर के लोगों को ‘म्लेच्छ’ घोषित कर रखा है। इसने महिलाओं को इंसान होने का दर्जा देने की बजाय हर उम्र में किसी पुरूष की सम्पत्ति या संरक्षिता घोषित कर रखा है। संविधान के माध्यम से इन्हें कुछ जनवादी अधिकार दिलाने की कोशिश अम्बेडकर ने की, लेकिन आज की फासीवादी सत्ता उन अधिकारों को भी छीनने पर अमादा है। यानि भारत की ब्राह्णवादी मनुवादी व्यवस्था साम्राज्यवादी पूंजी के मंदी के संकट को हल करने की जमीन मुहैया करा रही है। मनुवाद के माध्यम से वह समाज में पहले से शोषण झेल रही एक बड़ी आबादी को उनके शिक्षा, रोजगार, भोजन, आवास और कई अन्य अधिकारों से पल्ला झाड़ सकती है, क्योंकि सवर्णांे का एक बड़ा तबका उनके साथ नहीं आयेगा, बल्कि खुद सरकार के साथ मिल कर इस तबके को हाशिये पर ढकेलने में तत्पर हो रहा है। 
वास्तव में साम्राज्यवादी पूंजी के एकाधिकारी स्वरूप अख्तियार करने की स्थिति में राजनीति, समाज और संस्कृति में भी इसकी अभिव्यक्ति एकाधिकार के ही रूप में होती है। यानि समाज में मुनाफे की एकाधिकारी होड़ ‘एक राष्ट्र’ के विचार से आगे बढ़ता हुआ, एक धर्म, एक वर्ण, एक लिंग, एक झण्डा, ‘राष्ट्रभक्ति’ की एक ही अभिव्यक्ति, एक गीत, एक भाषा, एक रंग, एक नेता या मुखिया तक जा पहुंचता है, जिसे हम आज घटित होता देख भी रहे हैं। 
भारतीय संविधान ने भले ही सबको जनवाद देने का दावा किया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं रह सका, क्योंकि उसने दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों आदिवासियों और महिलाओं को जनवादी अधिकार देने वाले आर्थिक आधार मुहैया नहीं कराये। आज भी ज्यादातर दलित और पिछड़े भूमिहीन हैं, जबकि ऊपरी दो वर्णों के पास उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा जमीनें और सम्पत्ति हैं। महिलाओं को तो सम्पत्ति में संवैधानिक अधिकार भी काफी संघर्षों के बाद मिला। जाति, वर्ण, लिंग, धर्म के आधार पर इनकी जनवाद की लड़ाई अभी बाकी ही थी, कि साम्प्रदायिक फासीवाद ने इन सबके संवैधानिक अधिकारों को भी छीनने की शुरूआत कर दी है। यहां की मनुवादी ब्राह्मणवादी सोच और इसका आज तक मौजूद मजबूत आर्थिक आधार इनके अधिकारों को छीनने में सहयोगी की भूमिका में नजर आ रहा है, भले ही पूंजी के दमन की प्रवृति उनको भी नहीं बख्श रही है, लेकिन वे इसमें ही खुश हैं कि वे किसी से ‘ऊपर’ है, किसी के बरख्श ‘शासक’ हैं। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यहां ‘ब्राह्मणवाद’ से तात्पर्य ब्राह्मण जाति से नहीं, बल्कि जातियों की उस श्रेणीबद्धता से है, जिसमें हर जाति के नीचे एक जाति है। और हर जाति किसी जाति से अपने को श्रेष्ठ या ब्राह्मण समझती है, वह उसके यहां का खाना नहीं खाती है, न ही उनके यहां वैवाहिक रिश्ता बनाती है। सबसे ऊपरी वर्ण की जातियां अगर कई जातियों से श्रेष्ठ हैं, तो सबसे निचले वर्ण की जातियां भी कई जातियों से खुद को श्रेष्ठ या उनके मुकाबिल खुद को शुद्ध या ब्राह्मण मानती हैं। 
भारत की इस पृष्ठभूमि में दमनकारी एकाधिकारी साम्राज्यवादी पूंजी हमारे देश में इस मनुवादी ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था के कंधे पर सवार होकर तबाही मचा रही है, यह कंधा उसे वह आधार मुहैया करा रहा है, जिसके बल पर वह यहां अपने मरणासन्न साम्राज्य का विस्तार कर रही है। भारतीय फासीवाद की यही विशेषता है। इस बात को इस तरह से कहना भी सही होगा कि भारतीय जनता पार्टी, जो कि मनुवादी ब्राह्मणवाद का सबसे सच्चा प्रतिनिधित्व करती है, को भारत की जनता ने नहीं, बल्कि वेंटिलेटर पर पहुंच चुकी साम्राज्यवादी पूंजी ने अपने लिए चुना है, जो भारत में अपनी वैचारिकी के कारण फासीवादी दमन को सबसे अच्छे तरीके से लागू करवा सकती है। इसका यह मतलब नहीं है कि सरकारों को चुनने में जनता की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन उसकी यह भूमिका आज के साम्राज्यवादी समय में ‘आभासी’ हो गयी है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में कांग्रेस और भाजपा के बीच फेसबुक वाला झगड़ा है, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे की पोल खोली, कि किसने चुनाव के समय किस कॉरपोरेट की मदद लोगों का दिमाग तैयार करने के लिए ली है। ‘फेसबुक’ और तमाम सोशल साइट्स लोगों की निजी जानकारियों को चुनावों के समय बेचकर लोगों का ‘माइण्डसेट’ तैयार करने का काम कर रही हैं। फेसबुक के संचालक मार्क जुकरबर्ग ने इसे अमेरिकी कांग्रेस में स्वीकार किया है। इसके अलावा बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा चुनावी पार्टियों को अरबों, खरबों का चन्दा, निजी विमान से लेकर हर तरह की सुविधा देने की खबरें भी अब कहीं न कहीं से लीक हो ही जाती है, जिनसे पता चल जाता है कि किस समय बिजनेस घराने किस पार्टी के पक्ष में जनता के बीच पैसा बहा रहे हैं। 2014 में उनकी पहली पसन्द मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ही थी, इसलिए उसकी जीत हुई। दरअसल साम्राज्यवादी पूंजी सरकार चुनकर उन पर पानी की तरह रूपये बहाकर जनता से उन्हें चुनवाने का प्रचार अभियान चलाती है, पिछले कई चुनावों के अन्दर की खबरें पढ़ें, तो यह बात साफ हो जाती है। आज आधार कार्ड द्वारा हर व्यक्ति की जानकारी डिजीटल बना देने से चुनावों में ‘जनमत’ तैयार कर लेना और भी आसान हो गया है, यह बात खुद सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड पर होने वाली बहस के दौरान कहा। 2014 के चुनावों में केन्द्र में भाजपा ‘प्रचंड बहुमत’ (यह शब्द भी कॉरपोरेटी मीडिया का दिया हुआ है, जो कि जीती हुई पार्टी के पक्ष में माहौल बनाता है, और विरोधी पक्षों को डराता है) से इसलिए आयी, क्योंकि एक तो साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करते जाने के कारण जनता कांग्रेस ने नाराज चल रही थी, दूसरे उसके पास लोगों पर दमन करने वाली लोगों को बांटकर दमन को ‘मैनेज’ कर लेने वाली साम्प्रदायिक फासीवादी विचारधारा भाजपा के मुकाबिल कमजोर थीं। फिलहाल भाजपा उनकी पहली पसन्द है। चुनाव से ही एक के बदले दूसरे दल को चुन कर इस फासीवाद को हरा देने की बात सोचने वाले दरअसल फासीवाद को विश्व के वित्तीय संकट से जोड़कर न देखकर उसे देश की एक अलग-थलग परिघटना के रूप में देखने की गलती कर रहे हैं। अव्वल तो भाजपा ही इस पूंजीवादी संकट से निपटने के लिए पूंजीपतियों की पहली पसन्द है, जिसे चुनावों से शिकस्त देना मुश्किल है, लेकिन यदि अत्यधिक दमन से उपजी जागरूकता की वजह से भाजपा सत्ता से बाहर हो भी गयी, तो वह इतनी मजबूत हो गयी है कि सत्ता से बाहर रहकर भी वह कारपोरेटी पूंजी के हितों को साधती रह सकती है। 
कांग्रेस और दूसरे चुनावी दल भी साम्राज्यवादी पूंजी के हितों को साधने में एक दूसरे से होड़ लेते दिख रहे हैं, इसलिए इनका जनता के प्रति साधुभाव रखना असम्भव है। इसे नहीं भुलाया जा सकता कि 1991 में साम्राज्यवादी हमला तेज होने के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही बाबरी मस्जिद ढहाई गयी, कई बड़े दंगे हुए, आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम नौजवानों को फंसाने का सिलसिला शुरू हुआ और गौरक्षा के नाम पर झज्जर जैसा काण्ड भी हुआ। घटनायें और भी है, जो कांग्रेस के मनुवादी ब्राह्मणवादी चरित्र का बयान करती हैं, भले ही भाजपा का यह चरित्र अधिक बर्बर और उजागर है। इसलिए इस दौर में एक चुनावी दल को हराकर दूसरे को जिताकर राहत पा लेने की बात सोचना इस खतरनाक दौर को सिर्फ पार्टियों के चरित्र को फासीवाद के कारण तक सीमित कर देना है। इस तर्क से भी सोचें तो भाजपा को हराकर कांग्रेस को सत्ता में ले आने पर भी भाजपा और उनके अनुसंगी संगठन समाज में बने ही रहेंगे और अपना काम करते रहेंगे। कांग्रेस उन पर रोक लगायेगी ऐसा सोचना भी नासमझी है, उल्टे पिछली घटनायंे बताती हैं कि कांग्रेस सहित दूसरे चुनावी दल उनके साम्प्रदायिक कर्मांे को अपने हित के लिए इस्तेमाल ही करती रही है। 
दरअसल फासीवाद को हराना केवल सत्ता में बैठी एक पार्टी को हराना भर नहीं है। यह निहायत निष्क्रिय सोच है, जिससे कुछ नहीं बदलने वाला। इस फासीवाद को टक्कर देने का मतलब है समाज में अराजकता फैलाने वाली इस अर्थव्यवस्था के खिलाफ चल रही लड़ाई का हिस्सा बनना, उसके लिए जरूरी है कि मनुवादी व्यवस्था को पोषित करने वाली सत्ता को समाज से समाप्त कर देने के लिए लड़ना, जो लोगों को छूत-अछूत में बांटने का काम कर रही है।
सीमा आज़ाद

Friday, 4 December 2015

समाजवादियों की गंगा में भी अधिकतर ब्राह्मणवादियों का ही कब्जा है ------ जगदीश चंदर

***पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री शैलजा के एक बयान पर कंवल भारती जी के दृष्टिकोण पर मैंने यह टिप्पणी दी थी जिसके जवाब में निम्नांकित दो टिप्पणिया प्रकाश में आईं हैं :---
इस सच -झूठ का चक्कर छोड़ भी दें तो पहले उड़ीसा मे एक मंदिर में बाबू जगजीवन राम जी को रोक कर इन्दिरा जी को जाने को कहा गया था जिस पर इन्दिरा जी ने खुद भी बहिष्कार कर दिया था। बेहतर तो यह है कि इन लूट के अड्डों का बहिष्कार करने को आम जनता से कहा जाये।
Kanwal Bharti यह हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है. निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता. यह राजनीति है.

Jagdish Chander......................................................................................................... इस देश में तथाकथित जातिवाद पूर्ण रूप से ज़िंदा है,न तो यह बृद्ध हुआ है, और न ही बीमार है ? अगर बीमार होता तो सायद उसे मारने के लिए तथाकथित दलित ही अधिक प्रयास करते, किन्तु दुर्भाग्य से दलित भी , तथाकथित कटटरवादी आस्थावादी धार्मिकता और सामंती मानसिकता में पली विचारधारा में ही पैदा हुए और बड़े हुए है, सो वे भी अपने नाम के पश्चात तथाकथित जातिगत नामों का अलंकरण कर तथाकथित जातिवाद को ज़िंदा रखे हुए बढ़ावा दे रहे हैं ! मेरे अनेक रिस्तेदार हैं, और उनमे अनेक के साथ घनिष्टता भी है, मेरे अपने परिवार के अपने चाचा , ताऊ , को छोड़कर बाकी अन्य रिस्तेदार , देश के विभिन्न सहरों में स्थायी निवास कर चुके हैं, शर्म के मारे , हीन भावना से ग्रसित , सभी के समक्ष वे बेचारे हीन भावना से ग्रसित नहीं होना चाहते , इस लिए अपने नामों के पश्चात तथाकथित सवर्ण जाती के नामों का अलंकरण / धारण किये हुए हैं, क्यों है ऐसी स्थिति मंथन करें यह समाजवादी , समरसतावादी बुद्धि जीवियों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए ?? , सोचिये कारण आज भी वह चाहे काशी विश्वनाथ का मंदिर हो, या पूरी का, द्वारका का हो या बद्रीनाथ, केदारनाथ को तो बेचारे भूल गए, या गली हो या मोहल्ला सहर का होटल , बस का सफर हो या रेल का सफर , पार्क हो या सड़क, कहीं पर साक्षात्कार हो या नौकरी लगने के पश्चात कार्यालय, बच्चों का स्कूल, हो या कॉलेज, अक्सर आपसे कोई भी अनजान ब्यक्ति जो आपको नहीं जानता पहली बार, बातों बातों में आपका नाम पूछता है, और यदि वह तथाकथित सवर्ण जाती का ब्यक्ति, नवजवान,युवती, स्त्री , पुरुष कोई भी हो, वह अपने नए मुलाकाती स्त्री , पुरुष मित्र है, और अपने नाम के पश्चात तथाकथित सवर्ण जाती के उपनाम के "अलंकार " को अलंकृति करता है, और आप साधारण नामधारी यानी आप नाम के साथ तथाकथित जातीय "अलंकार" का इस्तेमाल नहीं करते हैं, तो एक बार आपसे ऐसे स्त्री , पुरुष, ब्यक्तित्व की कहीं पर भी उक्त स्थानों में आपकी मुलाक़ात होती हैं, तो पूछ बैठेगा/ बैठेगी की आपके सर- में - नाम क्या है यानी आपका सरनेम क्या है (दुर्भाग्य से उस ब्यक्तित्व का दोष नही है यह दोष तो तथाकथित , सामंती, पूंजीवादी, और तथाकथित कट्टर धार्मिक आस्थावादी संश्कृति , और इससे जुडी, अहंकारी चतुर धूर्त ब्राह्मणवादी जातिब्यवस्था का ही है, उसने इस सवर्णवादी/ ब्राह्मणवादी जातीय अहंकार की मानसिकता का जहर समाज के मष्तिष्क में घोल दिया है उसे ये मूर्ख नहीं निकाल पा रहे हैं , यह कैसे निकलेगा ? एक ही मार्ग है, कि हम तथाकथित जातीय नामों का "अलंकरण" बंद कर दें , बच्चों के विद्यालयों में प्रवेश के समय या तो कानून बनाएं कि बच्चों के साधारण नाम ही प्रवेश के समय लिखे जाएंगे या इसका अंत समाजवाद, कम्युनिज्म, (साम्यवाद ) के द्वारा ही होना है, उसको लाने का प्रयास जोरों से करें ??? . ............... 2 / - .........

वैसे समाजवादियों की गंगा में भी अधिकतर ब्राह्मणवादियों का ही कब्जा है, यानी, कुछ ऐसे ब्यक्तित्व थोड़ा सा ब्राह्मणवादी मानसिकता पाले हुए हैं, फिर भी हमे गंगा की इस तेज धार में तैरना सीखना होगा, यह सत्य के मार्ग का युद्ध है, इसमें सत्य की ही विजय होनी है, और सत्य पीड़ा, उत्पीड़न , दमन, और शोषण के गर्भ में छिपा है, जिस प्रकार सोना, चांदी , हीरा कहाँ छिपा है ) ,अरे मूर्ख तू सरनेम लेकर क्या करेगा ? अगर आपका कुछ भी जबाव नहीं होगा तो समझ जाएगा, और अगर आप सवर्ण हैं तो आप बेझिजक कहेंगे, कि पांडे , सांडे, मिश्रा, फिशरा, ठाकुर वाकुर, आदि, अहंकारी मानसिकता बड़ी तेजी और खुलेपन से जबाव देती है, किन्तु हीन दलित, पीड़ित और शोषित मानसिकता सच्चाई, और दबाव से डर कर सही उत्तर देती है , सायद मेरे तथाकथित जातीय मित्रों , रिश्तेदारों ने अपने जीवन में इस पीड़ा का अहसास नहीं किया है, वे शर्म के मारे सहरों में अपनी तथाकथित दलित जाति के नाम के " अलंकार " को नहीं लगाते और झूटी तथाकथित सवर्ण जातीय नाम के " अलंकार " का प्रयोग करते हैं, ऐसे लोग झूठ पर आधारित जिंदगी जीते हैं, ?
मैं यह मानता हूँ, कि वह शिक्षित और साक्षर ब्यक्ति जो अपनी शिक्षा का सदुपयोग करता है , और एक निररक्षक ब्यक्ति जिसे अक्षर ज्ञान भी न हो किन्तु सभ्य समाज में रह कर ज्ञान हाशिल कर चुका है, जैसे कबीर आदि, और समाज में ज्ञानी ब्यक्ति कहलाता है, चाहे वह साक्षर भी न हो वह हमारे विचारों से ब्रह्म ज्ञानी यानी तथाकथित सूद्र, दलित होते हुए भी ब्राह्मण है ??
और कोई ब्यक्ति शिक्षित है, शिक्षित होते हुए शिक्षा का दुरुपयोग कर रहा है, और अहंकारी है, जहरीली मानसिकता है, समाज में रहते हुए भी समाजवादी नहीं है, यानी सामंती, और लुटेरी प्रवृति का ब्यक्ति है , वह चाहे तथाकथित सवर्ण ब्राह्मण, ब्राह्मणवादी, राजपूत कुछ भी हो या दूसरा कोई अन्यन , वह सूद्र और नीच ही कहलायेगा ? और दुसरे कोई तथाकथित सवर्ण, ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर आदि, और अन्यन , साक्षर नहीं है, किन्तु समाज की संगत में कुछ ज्ञान हाशिल कर चुका है, और समाज की संगत से प्राप्त , उस ज्ञान का सदुपयोग नहीं करता , दुर्भाग्य से समाज में बहुमत में ज्ञान की परिभाषा को न जानने वाले लोग जाने - अनजाने , " अदरक की गाँठ को प्राप्त करने वाले बन्दर का , पन्सारी बनना के सामान " उस ब्यक्ति को जाने - अनजाने में ज्ञानी मान बैठते हैं, जैसे आजकल के बाबाओं का ढोंगी और पाखंडी प्रवचन --- एक निर्मल बाबा भी है, जो हजारों लाखों को मूर्ख बना रहा है " ?? ऐसा ब्यक्ति ज्ञानी होते हुए भी ज्ञान का दुरुपयोग कर रहा है, वह सूद्र यानी नीच बनकर लूट रहा है ? इस प्रकार के अवगुणी /निर्गुणी तत्व दुर्भाग्य से इस देश की तथाकथित जाती ब्यवस्था में पाये जाते हैं ?? और इस प्रकार के कुकर्मों का इस्तेमाल हर वर्ग का ब्यक्ति और तथाकथित जाती का ब्यक्ति कर रहा है, इसमें बहुमत तो तथाकथित नीच ब्राह्मणवादियों का यानी शोषकों, लालचियों,लुटेरों, धूर्तों, चालकों ,और चतुर अन्यनो का ही है ??

*********************************************************************************जगदीश चंदर जी ने जिस बात की ओर इंगित किया है वह महत्वपूर्ण है किन्तु उससे निबटने का जो मार्ग उन्होने प्रस्तुत किया है वह एक तो यह कि, सब लोग जाति सूचक शब्दों का प्रयोग स्वतः न करें एवं दूसरा यह कि कानूनन इस प्रयोग को रोका जाये। स्वेच्छा से सभी यों ही मानेंगे नहीं और कानून बनाने के लिए आपके पास बहुमत तो पहले जुटे तब न आप कानून बनाएँगे।
दोनों बातें तभी संभव हैं जब आप लोगों को अपनी बात सही तरीके से समझा सकें। 'एकला चलो रे' की तर्ज पर अपने ब्लाग 'क्रांतिस्वर' के माध्यम से मैंने ढोंग-पाखंड-आडंबर के विरुद्ध अनेक लेख दिये हैं किन्तु किसी का भी समर्थन नहीं मिलता है। जो पोंगा-पंथी/पुराण-पंथी/ब्राह्मण वादी हैं वे तो मान ही नहीं सकते, किन्तु 'एथीस्ट ' भी उस पर प्रहार करने में सबसे आगे हैं। वस्तुतः पोंगापंथ और एथीज़्म में कोई अंतर है ही नहीं दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
" आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे  अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी  अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-

1- जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनके द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता था वह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
3-जो लोग विभिन व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको  'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
4-जो लोग विभिन्न  सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने तथा इनकी शिक्षा प्रदान करने के योग्य माना जाता था।

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि,'ब्राह्मण','क्षत्रिय','वैश्य' और 'क्षुद्र' सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ  ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था। ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे।

 कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके  शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता  आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाती-व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है।

यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।"
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/blog-post_16.html

यह उद्धृण एक पुराने लेख से है। परंतु समस्या यह है कि 'मूल निवासी आंदोलन' भी 'मूल सिद्धान्त' को नहीं मानता और आयातित विचारों को ही महत्व देता है।  वस्तुतः पाँच हज़ार वर्ष पूर्व महाभारत काल के बाद 'धर्म' ='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का लोप हो गया और उसके स्थान पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर-शोषण-उत्पीड़न' को धर्म कहा जाने लगा। 'वेदों' का जो मूल मंत्र -'कृणवंतों  विश्वमार्यम  ...' था अर्थात समस्त विश्व को 'आर्य'=आर्ष=श्रेष्ठ बनाना था उसे ब्राह्मणों द्वारा शासकों की मिली-भगत से ठुकरा दिया गया। 'अहं','स्वार्थ','उत्पीड़न'को महत्व दिया जाने लगा। 'यज्ञ'=हवन में जीव हिंसा की जाने लगी। इन सब पाखंड और कुरीतियों के विरुद्ध गौतम बुद्ध ने लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व बुलंद आवाज़ उठाई और लोग उनसे प्रभावित होकर पुनः कल्याण -मार्ग पर चलने लगे तब शोषकों के समर्थक शासकों एवं ब्राह्मणों ने षड्यंत्र पूर्वक महात्मा बुद्ध को 'दशावतार' घोषित करके उनकी ही पूजा शुरू करा दी। 'बौद्ध मठ' और 'विहार' उजाड़ डाले गए बौद्ध साहित्य जला डाला गया। परिणामतः गुमराह हुई जनता पुनः 'वेद' और 'धर्म' से विलग ही रही और लुटेरों तथा ढोंगियों की 'पौ बारह' ही रही।

यह अधर्म को धर्म बताने -मानने का ही परिणाम था कि देश ग्यारह-बारह सौ वर्षों तक गुलाम रहा। गुलाम देश में शासकों की शह पर ब्राह्मणों ने  'कुरान' की तर्ज पर 'पुराण' को महत्व देकर जनता के दमन -उत्पीड़न व शोषण का मार्ग मजबूत किया था जो आज भी बदस्तूर जारी है। पुराणों के माध्यम से भारतीय महापुरुषों का चरित्र हनन बखूबी किया गया है। उदाहरणार्थ 'भागवत पुराण' में जिन राधा के साथ कृष्ण की रास-लीला का वर्णन है वह राधा 'ब्रह्म पुराण' के अनुसार भी  योगीराज श्री कृष्ण की मामी  ही थीं जो माँ-तुल्य हुईं परंतु पोंगापंथी ब्राह्मण राधा और कृष्ण को प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं । आप एक तरफ भागवत पुराण को पूज्य मानेंगे और समाज में बलात्कार की समस्या पर चिंता भी व्यक्त करेंगे तो 'मूर्ख' किसको बना रहे हैं?चरित्र-भ्रष्ट,चरित्र हींन लोगों के प्रिय ग्रंथ भागवत के लेखक के संबंध में स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि वह गर्भ में ही क्यों नहीं मर गया था जो समाज को इतना भ्रष्ट व निकृष्ट ग्रंथ देकर गुमराह कर गया। क्या छोटा और क्या मोटा व्यापारी,उद्योगपति व कारपोरेट जगत खटमल और जोंक की भांति दूसरों का खून चूसने  वालों के भरोसे पर 'भागवत सप्ताह' आयोजित करके जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का उपक्रम करता रहता है जबकि प्रगतिशील,वैज्ञानिक विचार धारा के 'एथीस्टवादी' इस अधर्म को 'धर्म' की संज्ञा देकर अप्रत्यक्ष रूप से उस पोंगापंथ को ही मजबूत करते रहते हैं।

एक और आंदोलन है 'मूल निवासी' जो आर्य को 'ब्रिटिश साम्राज्यवादियों' द्वारा  कुप्रचारित षड्यंत्र के तहत  यूरोप की एक आक्रांता जाति ही मानता है । जबकि आर्य विश्व के किसी भी भाग का कोई भी व्यक्ति अपने आचरण व संस्कारों के आधार पर बन सकता है। आर्य शब्द का अर्थ ही है 'आर्ष'= 'श्रेष्ठ' । जो भी श्रेष्ठ है वह ही आर्य है। आज स्वामी दयानन्द सरस्वती का आर्यसमाज ब्रिटिश साम्राज्य के हित में गठित RSS द्वारा जकड़ लिया गया है इसलिए वहाँ भी आर्य को भुला कर 'हिन्दू-हिन्दू' का राग चलने लगा है। बौद्धों के विरुद्ध हिंसक कृत्य करने वालों को सर्व-प्रथम बौद्धों ने 'हिन्दू' संज्ञा दी थी फिर फारसी शासकों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में इस शब्द का प्रयोग यहाँ की गुलाम जनता के लिए किया था जिसे RSS 'गर्व' के रूप में मानता है। अफसोस की बात यह है कि प्रगतिशील,वैज्ञानिक लोग भी इस 'सत्य' को स्वीकार नहीं करते हैं और RSS के सिद्धांतों को ही मान्यता देते रहते हैं। 'एथीस्ट वादी' तो 'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,अस्तेय और ब्रह्मचर्य' का विरोध ही करते हैं तब समाज को संवेदनशील कौन बनाएगा?

यदि हम समाज की दुर्व्यवस्था से वास्तव में ही चिंतित हैं और उसे दूर करना चाहते हैं तो अधर्म को धर्म कहना बंद करके वास्तविक धर्म के मर्म को जनता को स्पष्ट समझाना होगा तभी सफल हो सकते हैं वर्ना तो जो चल रहा है और बिगड़ता ही जाएगा।

सत्य क्या है?:

'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,अस्तेय और ब्रह्मचर्य'।

अध्यात्म=अध्ययन +आत्मा =अपनी 'आत्मा' का अध्ययन।

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)।

खुदा=चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।

गाड=G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना ही इन तत्वों का कार्य है इसलिए ये ही GOD भी हैं।

व्यापारियों,उद्योगपतियों,कारपोरेट कारोबारियों के हितों में गठित रिलीजन्स व संप्रदाय जनता को लूटने व उसका शोषण करने हेतु जो ढोंग-पाखंड-आडंबर आदि परोसते हैं वह सब 'अधर्म' है 'धर्म' नहीं। अतः अधर्म का विरोध और धर्म का समर्थन जब तक साम्यवादी व वामपंथी नहीं करेंगे तब तक जन-समर्थन हासिल नहीं कर सकेंगे बल्कि शोषकों को ही मजबूत करते रहेंगे जैसा कि 2014 के चुनाव परिणामों से सिद्ध भी हो चुका है। "
http://krantiswar.blogspot.in/2014/06/blog-post_17.html

 जातिवाद के संबंध में जगदीश चंदर जी कहते हैं -"इसका अंत समाजवाद, कम्युनिज्म, (साम्यवाद ) के द्वारा ही होना है, उसको लाने का प्रयास जोरों से करें ???"
1917 से 1991 तक साम्यवाद रूस में रहा और वहाँ विफल ही इसलिए हुआ कि वहाँ 'धर्म='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य'।" का कोई स्थान नहीं था वह एथीज़्म पर आधारित था जबकि मजहब या रिलीजन धर्म नहीं होते हैं और मार्क्स ने रिलीजन/मजहब का विरोध किया था उसे 'धर्म ( 'सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य') का विरोध बता कर एथीस्ट संप्रदाय स्वतः ही ढ़ोंगी संप्रदाय को मजबूत करता रहा और ;साम्यवाद' ढह गया। सरकारी संस्थानों को वहाँ खरीदने वाले वहीं के भ्रष्ट कर्मचारी और नेता थे जिनके पास जनता के शोषण से अकूत संपदा संग्रहीत थी। यदि धर्म का विरोध नहीं होता तो साम्यवाद आज भी बदस्तूर जारी होता। रूस के पतन से सबक सीख कर भारत में साम्यवाद को सही तरीके से लाने के प्रयास किए जाएँ तभी सफलता हासिल हो सकती है अन्यथा नहीं।
(विजय राजबली माथुर )

Saturday, 12 January 2013

'भ्रष्ट जर्जर पूंजीवादी' संस्कृति का खुलासा ---विजय राजबली माथुर

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हमारे भारतीय जनता पार्टी के तथाकथित जागरुक साथिओ की आज अखबारों में खबर और फोटो छापी है और लिखा है की इन्होने पकिस्तान को घर में बैठ कर चेतावनी भी दी है |आज कुछ अखबार नयी दुनिया में यह फोटो भी छापी है जिसमे भाजपा के नेताओं ,कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के साथ राज्योत्सव के कार्यक्रमों में अपने निकृष्ट कर्मो के लिए पुरस्कार लेती आमदुला ,डौंडी कन्या आश्रम की अधीक्षिका अनिता ठाकुर है |भारतीय जनता पार्टी और संघ के नेताओ और नीतिओ की खासियत यही है की ये लोग अफवाह उड़ाने ,मुद्दे भड़काने और अपने ऊपर लगे आरोपों को दबाने और आम आदमी का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाते है चाहे वो स्थानीय स्थर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर |कंदर ,डौंडी के साथ ही आने वाले दिनों में पुरे राज्य के आश्रम और केंद्र जिनमे बहुत से भाजपा के समर्थित लोगो के स्वयंसेवी संस्थाओ के द्वारा संचालित होती है उनकी कारगुजारिओ को दबाने के ऐसे बहुत से प्रयास जारी है |
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उपरोक्त स्कैन कटिंग एवं फेसबुक नोट यह सोचने पर बाध्य करता है कि,भारतीय संस्कृति-भारतीय संस्कृति का राग अलापने वाली पार्टी के शासन मे सरकारी विद्यालय के सरकारी छात्रावास मे हुये जिन कारनामों का खुलासा हुआ है उनको पढ़ सुन कर कौन कहेगा कि यही भारतीय संस्कृति है?वस्तुतः उस शासक पार्टी का प्रेरक RSS है जिसका वास्तविक अर्थ ही है-'रियूमर स्पीचुएटेड सोसाईटी'। अर्थात अफवाहे फैलाना ही उनका मुख्य कार्य है और वही उनका मूल उद्देश्य भी है। 
 
16 दिसंबर के वीभत्स कांड पर घड़ियाली आँसू बहाने वाले RSS/भाजपा के अपने शासित राज्य मे सरकारी संरक्षण मे हुये घृणित एवं निंदनीय जघन्य कुकृत्य की जितनी भी भर्त्सना की जाये कम है। जनता को अब तो समझ लेना चाहिए कि भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन को कमजोर करने हेतु ही सांप्रदायिक RSS व मुस्लिम लीग का गठन ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने शासन को और अधिक समय तक बनाए रखने हेतु करवाया था। आज भी पाकिस्तान और भारत तथा बांग्लादेश मे भी ऐसे तत्व साम्राज्यवाद के हितों के संरक्षणार्थ फिरकापरस्त बयानबाजी और हरकतें करते रह कर जनता को भटकाते आ रहे हैं। 
 
अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहते हुये जनता को ऐसे सभी तत्वों को जड़-मूल से ठुकरा देना चाहिए। 
 


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Tuesday, 4 December 2012

प्रधान मंत्री का चयन विदेश से होगा ---विजय राज बली माथुर

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हिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक-03/12/2012 ,पृष्ठ-14
एक लंबे अरसे से अमेरिकी मीडिया राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए अपनी पसंद बताता रहा है। अब ब्रिटिश मीडिया ने भी चिदम्बरम और मोदी का नाम प्रस्तुत कर दिया है। इस संबंध मे विस्तृत विवरण हिमांशु कुमार जी ने अपने ब्लाग पर दिया है-
http://dantewadavani.blogspot.in/2012/12/blog-post_3.html 

हिमांशु जी का विश्लेषण सटीक और व्यवहारिकता को दर्शाता है। 

साम्राज्यवादियो ने भारत विभाजन सांप्रदायिकता के सहारे से अपने हितों हेतु ही करवाया था और शुरू से ही पाकिस्तान तो उनके खुले चंगुल मे चला जबकि भारत मे लोकतन्त्र का आवरण रखा गया। नेहरू जी साम्राज्यवादियो की पसंद थे किन्तु शास्त्री जी नहीं इसी लिए उनको मार्ग से हटा दिया गया। दोबारा सत्ता मे आने के बाद इन्दिरा जी भी खुल कर साम्राज्यवादियो के हितों का संरक्षण करती रहीं,उनके बाद भी साम्राज्यवादियो को कोई दिक्कत न हो इस हेतु अपने शिष्य आतंकवादियों के सहारे से उनकी हत्या करा दी गई जिससे उनके पुत्र राजीव जी सहानुभूति की लहर पर सवार होकर सुगमता से सत्तासीन हो गए जिन्होने सरकार को एक कारपोरेट उद्योगपति के रूप मे  ढाल दिया।उनकी भी  हत्या अपने शिष्य आतंकवादियो  के सहारे से करने के बाद नरसिंघा राव जी के लिए रास्ता बन सका जिनको वित्तमंत्री मनमोहन जी को बनाना पड़ा पूरी स्वतन्त्रता के साथ पद से हटने के बाद उन्होने अपने THE INSIDER मे  कुबूल किया कि हम स्वतन्त्रता के 'भ्रम जाल 'मे जी रहे हैं।

वी पी सिंह,देवगौड़ा और गुजराल सरकारों का पतन साम्राज्यवादियो ने कारपोरेट घरानों की मदद से करा दिया।एन डी ए शासन यद्यपि साम्राज्यवादियों के लिए मुफीद रहा किन्तु जनता मे वह अलोकप्रिय  होने के कारण यू पी ए को साम्राज्यवादियों  का समर्थन मिल गया जबकि परिवर्तन दिखाने को उसे बामपंथी समर्थन हासिल करना पड़ा। फिर निर्लज्जता के साथ बामपंथियों को हटा कर खुले रूप मे साम्राज्यवादियों के हितार्थ परमाणु सम्झौता किया गया। 

आज जब यू पी ए /एन डी ए अलग-अलग बोतल मे एक ही शराब हो चुके हैं इनके एक-एक प्रतिनिधि को भारत के प्रधानमंत्री हेतु विदेशी मीडिया के जरिये प्रस्तुत किया जा रहा है। 

चूंकि सोनिया जी खुद और अपनी किसी संतान को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहती हैं जैसा कि उनके अपने पीहर वाले भी चाहते हैं। इसलिए मनमोहन जी के बाद चिदम्बरम साहब का नाम उभरा है। चिदम्बरम साहब सोनिया जी के बहुत पुराने वफादार भी हैं। राजीव जी के शासन मे जब उनके ममेरे भाई अरुण नेहरू साहब ने गृह-मंत्री के रूप मे सोनिया जी की फाईल सी बी आई से तैयार कारवाई थी तब उनको हार्ट अटेक पड़ने पर गृह-राज्यमंत्री के रूप मे चिदम्बरम साहब ने राजीव जी को वह फाईल दिखा दी थी जिसके बाद अरुण नेहरू साहब का मंत्रालय बादल दिया गया था। विभिन्न सरकारों मे वित्तमंत्री के रूप मे वह साम्राज्यवादियों के हित-साधन करते रहे है इसलिए उनकी पसंद भी है और सोनिया जी की भी। 

साम्यवादियों-बामपंथियों का इस समय यह गुरुतर दायित्व है कि वे राष्ट्र-हित मे देश की जनता को जाग्रत करके अपने नेतृत्व मे सरकार गठन का प्रयास करे न कि किसी अन्य को समर्थन दे।   






 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर