Saturday, 25 February 2012
Friday, 24 February 2012
कर्तव्य विमुख मतदाता
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आखिरकार भद्र कहे जाने वाले ,बात-बात मे अव्यवस्था का शोर मचाने तथा राजनीति और राजनीतिज्ञों को कोसने वाले तथाकथित विशिष्ट जनो ने अपने मतदान कर्तव्य का पालन न करके जतला दिया है की वे केवल ढ़ोल बजाने वाले लोग हैं और उनसे किसी कर्तव्य पालन की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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| (हिंदुस्तान,लखनऊ,22/02/2011) |
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Sunday, 19 February 2012
अपने कर्तव्य का पालन करें
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आज के हिंदुस्तान मे लखनऊ के स्थानीय संपादक महोदय की यह अपील समसामयिक है। लखनऊ और उत्तर प्रदेश के दूसरे स्थानों पर जहां आज मतदान चल रहा है बुद्धिजीवियों को भी आलसी प्रवृति त्याग कर अपना 'वोट' जरूर डालने जाना चाहिए। ऐसा न करके वे अपने कर्तव्य से विरत रहेंगे ,फिर उन्हें राजनीति और राजनीतिज्ञों को भी नहीं कोसना चाहिए क्योंकि गलत लोगों का चुना जाना उनकी ही कर्तव्य हीनता का नतीजा होगा।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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| Hindustan-Lucknow--19/02/2012 |
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Sunday, 12 February 2012
अपराधीकरण और भ्रष्टाचार का कारण
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उत्तर प्रदेश मे भी मतदान के दो चरण सम्पन्न हो चुके हैं और खुशी की बात है कि पहले के मुक़ाबले मतदान प्रतिशत बढ़ा है। भद्र जनों द्वारा अपने कर्तव्य (मतदान) का पालन न करने के कारण आज राजनीति पर अपराधी और भ्रष्ट लोग हावी हो चुके हैं। चुनाव आयोग के अथक प्रयासों ने जनता मे जागरूकता उत्पन्न कर दी है इसलिए अधिक लोगों ने वोट डाले हैं।
लेकिन हमारे विद्वानों जैसे कविवर सोम ठाकुर साहब और डॉ जितेंद्र रघुवंशी जो इप्टा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं लोगों से निवेदन करते हैं कि जनता अपने प्रतिनिधि के तौर पर 'संस्कृति ' प्रेमियों को चुने जिससे संस्कृति की भी रक्षा हो सके। बाकी चरणों के चुनावों मे जहां कहीं भी ऐसे प्रत्याशी हों बुद्धिजीवी लोग उन्हें जिताने का भरसक प्रयास करें तभी यह संभव हो पाएगा।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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| 30/01/2012 |
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| 29/01/2012 |
उत्तर प्रदेश मे भी मतदान के दो चरण सम्पन्न हो चुके हैं और खुशी की बात है कि पहले के मुक़ाबले मतदान प्रतिशत बढ़ा है। भद्र जनों द्वारा अपने कर्तव्य (मतदान) का पालन न करने के कारण आज राजनीति पर अपराधी और भ्रष्ट लोग हावी हो चुके हैं। चुनाव आयोग के अथक प्रयासों ने जनता मे जागरूकता उत्पन्न कर दी है इसलिए अधिक लोगों ने वोट डाले हैं।
लेकिन हमारे विद्वानों जैसे कविवर सोम ठाकुर साहब और डॉ जितेंद्र रघुवंशी जो इप्टा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं लोगों से निवेदन करते हैं कि जनता अपने प्रतिनिधि के तौर पर 'संस्कृति ' प्रेमियों को चुने जिससे संस्कृति की भी रक्षा हो सके। बाकी चरणों के चुनावों मे जहां कहीं भी ऐसे प्रत्याशी हों बुद्धिजीवी लोग उन्हें जिताने का भरसक प्रयास करें तभी यह संभव हो पाएगा।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Tuesday, 7 February 2012
कम्युनिस्टों ने नही भुलाया गांवों को
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पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी साहब ने गवों की उपेक्षा की बात उठाई है। सी पी आई ने अपने घोषणा पत्र मे स्पष्ट रूप से 15 मुद्दों को केवल 'खेती और किसानों के लिए' ही रखा है। यदि बुद्धिजीवी गाँव वालों को समझा कर जाति- वाद से परे हट कर कम्युनिस्ट प्रत्याशियों को जितवाने मे मदद करें तो गाँव वालों को भी खुशी नसीब हो सकती है।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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| HINDUSTAN--07/02/2012 |
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Saturday, 4 February 2012
भाकपा द्वारा इलेक्ट्रानिक मीडिया की शिकायत
4 फरवरी 2012
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श्री उमेश सिन्हा
मुख्य निर्वाचन अधिकारी
उत्तर प्रदेश
लखनऊ
विषय: निजी टी.वी. चैनल्स द्वारा पेड न्यूज प्रसारित किये जाने के सम्बंध में
महोदय,
निर्वाचन आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद तमाम निजी टी.वी. चैनलों द्वारा पेड न्यूज का प्रसारण किया जा रहा है। इसके लिये उन्होंने कई तरीके निकाल रखे हैं। न्यूज के नाम पर कांग्रेस, बसपा, भाजपा एवं सपा के नेताओं के भाषणों का लाइव प्रसारण किया जा रहा है और भाषणों को बार-बार दोहरा कर दिखाया जा रहा है। इसी तरह इन दलों के नेताओं के ऊपर 10-10, 15-15 मिनट के फीचर प्रसारित किये जा रहे हैं। 3 फरवरी को एक राष्ट्रीय चैनल ने श्रीमती प्रियंका गांधी का भाषण सीधे प्रसारित किया और बार-बार दोहराया जबकि वे किसी सार्वजनिक पद पर भी नहीं हैं। इसी तरह इसी दिन एक प्रादेशिक चैनल ने मुख्यमंत्री मायावती का भाषण सीधे प्रसारित किया और उसे कई बार दिखाया। इसी तरह के कई अन्य हथकंडे अपनाये जा रहे हैं।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जो राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त 6 राजनैतिक दलों में से एक है और उत्तर प्रदेश में 51 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, की गतिविधियों को किसी चैनल पर कोई जगह नहीं दी जा रही है।
इस मामले में हमारे द्वारा पहले भी 24 जनवरी को इसकी शिकायत आपको भेजी गयी थी, जिस पर किसी कार्यवाही की सूचना हमें आज तक प्राप्त नहीं हुई है।
यह सीधे तौर पर ‘पेड न्यूज’ का मामला है, जिसकी गंभीरता से जांच करा कर कठोर कार्यवाही की जानी चाहिये।
आशा है कि आप शीघ्र ठोस कदम उठायेंगे।
सधन्यवाद।
भ व दी य
(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
प्रतिलिपि: मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग, नई दिल्ली।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी
उत्तर प्रदेश
लखनऊ
विषय: निजी टी.वी. चैनल्स द्वारा पेड न्यूज प्रसारित किये जाने के सम्बंध में
महोदय,
निर्वाचन आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद तमाम निजी टी.वी. चैनलों द्वारा पेड न्यूज का प्रसारण किया जा रहा है। इसके लिये उन्होंने कई तरीके निकाल रखे हैं। न्यूज के नाम पर कांग्रेस, बसपा, भाजपा एवं सपा के नेताओं के भाषणों का लाइव प्रसारण किया जा रहा है और भाषणों को बार-बार दोहरा कर दिखाया जा रहा है। इसी तरह इन दलों के नेताओं के ऊपर 10-10, 15-15 मिनट के फीचर प्रसारित किये जा रहे हैं। 3 फरवरी को एक राष्ट्रीय चैनल ने श्रीमती प्रियंका गांधी का भाषण सीधे प्रसारित किया और बार-बार दोहराया जबकि वे किसी सार्वजनिक पद पर भी नहीं हैं। इसी तरह इसी दिन एक प्रादेशिक चैनल ने मुख्यमंत्री मायावती का भाषण सीधे प्रसारित किया और उसे कई बार दिखाया। इसी तरह के कई अन्य हथकंडे अपनाये जा रहे हैं।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जो राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त 6 राजनैतिक दलों में से एक है और उत्तर प्रदेश में 51 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, की गतिविधियों को किसी चैनल पर कोई जगह नहीं दी जा रही है।
इस मामले में हमारे द्वारा पहले भी 24 जनवरी को इसकी शिकायत आपको भेजी गयी थी, जिस पर किसी कार्यवाही की सूचना हमें आज तक प्राप्त नहीं हुई है।
यह सीधे तौर पर ‘पेड न्यूज’ का मामला है, जिसकी गंभीरता से जांच करा कर कठोर कार्यवाही की जानी चाहिये।
आशा है कि आप शीघ्र ठोस कदम उठायेंगे।
सधन्यवाद।
भ व दी य
(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
प्रतिलिपि: मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग, नई दिल्ली।
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Monday, 23 January 2012
स्वतत्रता संग्राम और नेताजी
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उपरोक्त चित्र अमेरिका मे स्थापित स्वतन्त्रता की देवी का है। जार्ज वाशिंगटन के नेतृत्व मे लार्ड करनावालिस को परास्त कर अमेरिका को आजाद किया गया था । यह साम्राज्यवाद पर स्वतन्त्रता की विजय थी। लेकिन आज वही अमेरिका स्वतन्त्रता का सबसे अधिक हनन करने वाला और क्रूर साम्राज्यवादी देश हो गया है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने लेनिन से प्रभावित होकर आजाद भारत मे 'समाजवादी' व्यवस्था स्थापित करने की कल्पना की थी।
अमेरिका ने पाकिस्तान समेत अनेक देशों मे तानाशाही का समर्थन किया है। अभी-अभी हमारे देश मे रामदेव/अन्ना आंदोलनों के माध्यम से अर्द्ध सैनिक तानाशाही की भूमिका सृजित करने का असफल प्रयास अमेरिका के इशारे पर राष्ट्र-द्रोही तत्वों द्वारा किया गया था।
आज नेताजकी सुभाष बोस की जयंती है इस अवसर पर हम भारतीयों को संकल्प लेना चाहिए की हम सदैव अपनी स्वाधीनता की रक्षा करेंगे और नेताजी द्वारा सुझाए समाजवाद के मार्ग पर चलने का प्रयास करेंगे। नेताजी का फारवर्ड ब्लाक उत्तर प्रदेश के इन चुनावों मे भकपा के साथ बाम-पंथी मोर्चा का महत्वपूर्ण घटक है। हम यू पी की जनता का आह्वान करते हैं कि नेताजी के मार्ग का अनुसरण करते हुये बाम-पंथी मोर्चा के प्रत्याशियों को जीता कर विधानसभा मे भेजें।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
उपरोक्त चित्र अमेरिका मे स्थापित स्वतन्त्रता की देवी का है। जार्ज वाशिंगटन के नेतृत्व मे लार्ड करनावालिस को परास्त कर अमेरिका को आजाद किया गया था । यह साम्राज्यवाद पर स्वतन्त्रता की विजय थी। लेकिन आज वही अमेरिका स्वतन्त्रता का सबसे अधिक हनन करने वाला और क्रूर साम्राज्यवादी देश हो गया है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने लेनिन से प्रभावित होकर आजाद भारत मे 'समाजवादी' व्यवस्था स्थापित करने की कल्पना की थी।
अमेरिका ने पाकिस्तान समेत अनेक देशों मे तानाशाही का समर्थन किया है। अभी-अभी हमारे देश मे रामदेव/अन्ना आंदोलनों के माध्यम से अर्द्ध सैनिक तानाशाही की भूमिका सृजित करने का असफल प्रयास अमेरिका के इशारे पर राष्ट्र-द्रोही तत्वों द्वारा किया गया था।
आज नेताजकी सुभाष बोस की जयंती है इस अवसर पर हम भारतीयों को संकल्प लेना चाहिए की हम सदैव अपनी स्वाधीनता की रक्षा करेंगे और नेताजी द्वारा सुझाए समाजवाद के मार्ग पर चलने का प्रयास करेंगे। नेताजी का फारवर्ड ब्लाक उत्तर प्रदेश के इन चुनावों मे भकपा के साथ बाम-पंथी मोर्चा का महत्वपूर्ण घटक है। हम यू पी की जनता का आह्वान करते हैं कि नेताजी के मार्ग का अनुसरण करते हुये बाम-पंथी मोर्चा के प्रत्याशियों को जीता कर विधानसभा मे भेजें।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Monday, 16 January 2012
प्रतिबंध और मर्यादा
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15 जनवरी,2012 के हिंदुस्तान मे श्री शशि शेखर ने सोशल साईट्स पर प्रतिबंध की चर्चाओं के बीच मर्यादाओं का प्रश्न उठाया है जो वाजिब है। फेसबुक और ब्लाग्स पर राजनीति और राजनेताओं का जबर्दस्त मखौल उड़ाया जा रहा है। नेताओं के अश्लील कार्टून पेश किए जा रहे हैं। यह सब जान-बूझ कर इसलिए किया जा रहा है जिससे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट किया जा सके। रामदेव/अन्ना आंदोलनों की विफलता के बाद रामदेव स्याही कांड सभी भाजपा की सोची समझी साजिश का हिस्सा हैं।
आर एस एस /भाजपा द्वारा इस प्रकार के आंदोलन/हरकतें लोकतन्त्र को नष्ट करके अर्द्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित करने के कुचक्र का अंग हैं। परंतु सोशल साईट्स द्वारा भ्रामक प्रचार करके जनता को गुमराह किया जा रहा है। राष्ट्र-हित मे इस सब को मर्यादित किया उपयुक्त होगा।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
15 जनवरी,2012 के हिंदुस्तान मे श्री शशि शेखर ने सोशल साईट्स पर प्रतिबंध की चर्चाओं के बीच मर्यादाओं का प्रश्न उठाया है जो वाजिब है। फेसबुक और ब्लाग्स पर राजनीति और राजनेताओं का जबर्दस्त मखौल उड़ाया जा रहा है। नेताओं के अश्लील कार्टून पेश किए जा रहे हैं। यह सब जान-बूझ कर इसलिए किया जा रहा है जिससे संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट किया जा सके। रामदेव/अन्ना आंदोलनों की विफलता के बाद रामदेव स्याही कांड सभी भाजपा की सोची समझी साजिश का हिस्सा हैं।
आर एस एस /भाजपा द्वारा इस प्रकार के आंदोलन/हरकतें लोकतन्त्र को नष्ट करके अर्द्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित करने के कुचक्र का अंग हैं। परंतु सोशल साईट्स द्वारा भ्रामक प्रचार करके जनता को गुमराह किया जा रहा है। राष्ट्र-हित मे इस सब को मर्यादित किया उपयुक्त होगा।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
Monday, 9 January 2012
अन्ना-आंदोलन क्या था? -दूसरों की नजर से
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http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/11414106.cms
अपने इंटरव्यू में उन्होंने शांति भूषणका भी मामला उठाया।
टीम अन्ना के कर्णधार भले ही इसे लोकतांत्रिक भावनाओं के चरम बिंदु के तौर पर रेखांकित कर रहे हों, वास्तव में यह राजनीतिक फूहड़पन की इंतिहा है।
यह उसी एनजीओवादी सोच का एक और उदाहरण है, जिससे यह आंदोलन शुरू से ग्रस्त रहा है और जिसकी वजह से तमाम संभावनाओं के बावजूद यह मौजूदा दुर्गति को प्राप्त हो गया है।
चुनावी राजनीति में किसी एक या दूसरे दल की पूंछ पकड़कर उनकी राजनीति को आगे बढ़ाना एक बात है और जनता की रोजाना की जिंदगी से जुड़े ठोस मुद्दों को उठाते हुए चुनावी राजनीति को जनपक्षधरता की ओर मोड़ने की कोशिश अलग बात। दूसरी श्रेणी में पड़ने वाले आंदोलन बेशक, पहली श्रेणी के आंदोलनों से अलग हैं लेकिन इन्हें गैर राजनीतिक कतई नहीं कहा जा सकता। राजनीति को सुधारना गैरराजनीतिक काम भला कैसे हो सकता है?
दरअसल, यह एनजीओवादी नजरिया कभी जनता की ताकत में भरोसा करता नहीं है। इसका पूरा भरोसा तंत्र और तंत्र से जुड़े ताकतवर लोगों में होता है। उसकी कोशिश बस उन ताकतवर लोगों को जनता की ताकत का भय दिखाकर उनसे मनचाहा फैसला करा लेना भर होता है।
आप ध्यान दें तो पाएंगे कि इस आंदोलन के दौरान शुरू से जनता की ताकत की बातें तो बहुत की गईं, लेकिन करप्शन जैसे मसले पर भी टीम अन्ना (अन्ना को कम से कम फिलहाल संदेह का लाभ देना पड़ेगा) की कोशिश जनता की ताकत जगाने के बदले मौजूदा तंत्र (सरकार) से एक खास कानून हासिल कर लेने तक सीमित रही। बहस को कभी लोकपाल बिल से आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया।
इसी नजरिए का नतीजा था कि जैसे ही बिल लोकसभा से पारित होता दिखा, यह कहा जाने लगा कि अब तो बिल पास हो गया, अब बात को आगे बढ़ाने से फायदा ही क्या? यानी? आपकी तमाम कोशिश के बाद भी और जनता के तमाम आग्रह के बाद भी अगर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही, वह वैसा ही बेकार बिल लाई जैसे पहले ला रही थी, तो जनता के आंदोलन को और तेज करने की जरूरत थी या उसे बिना शर्त वापस ले लेने की? मगर, एनजीओवादी नजरिया दूर तक नहीं सोचता। न ही जनता की ताकत के भरोसे सरकार से सचमुच टकराने की हिम्मत करता है। वह बस गीदड़ भभकियों से काम निकाल लेना चाहता है। अगर न निकले तो आखिरी मौके पर विरोधी के सामने घुटने टेक देने का विकल्प हमेशा खुला रखता है।
आप जरा याद कीजिए जेपी आंदोलन के दौरान क्या कभी यह सवाल आंदोलन के सामने आया था कि अब तो आपात काल की घोषणा हो गई, अब आंदोलन करके क्या फायदा? नहीं आया था और इसका कारण यह था कि वह आंदोलन सचमुच जनता की ताकत के भरोसे शुरू किया गया था, जनता की ताकत का डर दिखाकर सरकार से थोड़ा सा कुछ हासिल कर लेने के लिए नहीं।
बहरहाल, ताजा सवाल जो जनता की ओर टीम अन्ना ने उछाला है, उस पर भी एक नजर डाल ली जाए। यह भी एनजीओवादी नजरिए का ही कमाल है कि वह जनता को देवाधिदेव का दर्जा देकर भी अंदर ही अंदर खुद को उससे अलग कोई चीज माने रहता है। इसीलिए वह जनता का जिक्र ऐसे करता है जैसे वह उससे एकदम अलग सी कोई चीज हो। तथ्य यह है कि कोई भी आंदोलन जनता ही करती है। बेशक, देश की पूरी जनता नहीं करती। लेकिन, जो भी लोग आंदोलन में शामिल होते हैं, वह जनता का ही हिस्सा होते हैं। जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ता है, जनता का अधिक से अधिक हिस्सा उसमें शामिल होता जाता है। ऐसे में यह कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी आंदोलन का नेतृत्व उसमें शामिल पूरी जनता का कम से कम उस आंदोलन के संदर्भ में सबसे ज्यादा समझदार, अनुभवी हिस्सा होता है। इसीलिए वह आंदोलन को नेतृत्व दे रहा होता है।
अब अगर संकट के समय यह हिस्सा अपना दायित्व छोड़ अचानक बाकी लोगों से पूछने लगे कि आप बताएं हमें क्या करना है तो इसका साफ मतलब यह है कि नेतृत्व का वह हिस्सा या तो आंदोलन को डुबोने या खत्म कर देने का फैसला कर चुका है या फिर वह उसे कोई ऐसा मोड़ देने की साजिश में उलझा है जिसकी जिम्मेदारी वह खुद अपने सिर नहीं लेना चाहता।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/11414106.cms
अन्ना जो कर रहे, वह पॉलिटिकल रेप हैः ठाकरे
8 Jan 2012, 2257 hrs IST,भाषामुंबई।। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने टीम अन्ना परहमला करते हुए उसके सदस्यों को ' अयोग्य लोगों का हुजूम' करार दिया है। इस बार ठाकरे ने किरण बेदी , अरविंदकेजरीवाल और मनीष सिसोदिया को अपने निशाने परलिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अन्ना जो कुछ कर रहे हैंवह ' पॉलिटिकल रेप ' है। पार्टी मुखपत्र ' सामना ' में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है , 'टीम अन्ना के बीच मतभेद हैं। केजरीवाल , बेदी औरसिसोदिया बेकार लोग हैं। ' शिवसेना प्रमुख ने टीम अन्नाद्वारा आयोजित अनशन को ' फाइव स्टार , कॉर्पोरेट अनशन' बताया है। ठाकरे ने कहा , ' वे लोग मामूली चीजों के लिए अनशन कररहे हैं। यह और कुछ नहीं बल्कि पॉलिटिकल रेप है। ' उन्होंनेसवाल किया कि क्या सचमुच में देश को लोकपाल बिल कीजरूरत है। ठाकरे ने कहा कि टीम अन्ना सरकार के साथधोखाधड़ी कर रही है। |
क्या आंदोलन को डुबो देगी टीम अन्ना?
प्रणव प्रियदर्शी Friday January 06, 2012आखिर अन्ना का आंदोलन घूम-फिरकर वहीं पहुंच गया जहां से शुरू हुआ था। इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही टीम ने जनता से ही पूछा है कि वह बताए अब क्या किया जाए। इस टीम का तर्क है कि चूंकि यह जनता का आंदोलन है, इसलिए जनता से यह सवाल पूछना सर्वथा जायज है कि अब इस चौराहे से किधर को चला जाए।
टीम अन्ना के कर्णधार भले ही इसे लोकतांत्रिक भावनाओं के चरम बिंदु के तौर पर रेखांकित कर रहे हों, वास्तव में यह राजनीतिक फूहड़पन की इंतिहा है।
चुनावी राजनीति में किसी एक या दूसरे दल की पूंछ पकड़कर उनकी राजनीति को आगे बढ़ाना एक बात है और जनता की रोजाना की जिंदगी से जुड़े ठोस मुद्दों को उठाते हुए चुनावी राजनीति को जनपक्षधरता की ओर मोड़ने की कोशिश अलग बात। दूसरी श्रेणी में पड़ने वाले आंदोलन बेशक, पहली श्रेणी के आंदोलनों से अलग हैं लेकिन इन्हें गैर राजनीतिक कतई नहीं कहा जा सकता। राजनीति को सुधारना गैरराजनीतिक काम भला कैसे हो सकता है?
मगर, टीम अन्ना ने अपने आंदोलन को शुरू से गैर राजनीतिक कहा। हालांकि इस मामले में नीयत पर शक करना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना फिर भी कहा जा सकता है कि राजनीति को गंदी चीज मानकर उससे दूर रहने वाले मध्यमवर्ग को रिझाने के मकसद से ऐसा दुराव-छिपाव करना एनजीओवादी नजरिए की एक विशेषता रही है।
दरअसल, यह एनजीओवादी नजरिया कभी जनता की ताकत में भरोसा करता नहीं है। इसका पूरा भरोसा तंत्र और तंत्र से जुड़े ताकतवर लोगों में होता है। उसकी कोशिश बस उन ताकतवर लोगों को जनता की ताकत का भय दिखाकर उनसे मनचाहा फैसला करा लेना भर होता है।
आप ध्यान दें तो पाएंगे कि इस आंदोलन के दौरान शुरू से जनता की ताकत की बातें तो बहुत की गईं, लेकिन करप्शन जैसे मसले पर भी टीम अन्ना (अन्ना को कम से कम फिलहाल संदेह का लाभ देना पड़ेगा) की कोशिश जनता की ताकत जगाने के बदले मौजूदा तंत्र (सरकार) से एक खास कानून हासिल कर लेने तक सीमित रही। बहस को कभी लोकपाल बिल से आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया।
इसी नजरिए का नतीजा था कि जैसे ही बिल लोकसभा से पारित होता दिखा, यह कहा जाने लगा कि अब तो बिल पास हो गया, अब बात को आगे बढ़ाने से फायदा ही क्या? यानी? आपकी तमाम कोशिश के बाद भी और जनता के तमाम आग्रह के बाद भी अगर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही, वह वैसा ही बेकार बिल लाई जैसे पहले ला रही थी, तो जनता के आंदोलन को और तेज करने की जरूरत थी या उसे बिना शर्त वापस ले लेने की? मगर, एनजीओवादी नजरिया दूर तक नहीं सोचता। न ही जनता की ताकत के भरोसे सरकार से सचमुच टकराने की हिम्मत करता है। वह बस गीदड़ भभकियों से काम निकाल लेना चाहता है। अगर न निकले तो आखिरी मौके पर विरोधी के सामने घुटने टेक देने का विकल्प हमेशा खुला रखता है।
आप जरा याद कीजिए जेपी आंदोलन के दौरान क्या कभी यह सवाल आंदोलन के सामने आया था कि अब तो आपात काल की घोषणा हो गई, अब आंदोलन करके क्या फायदा? नहीं आया था और इसका कारण यह था कि वह आंदोलन सचमुच जनता की ताकत के भरोसे शुरू किया गया था, जनता की ताकत का डर दिखाकर सरकार से थोड़ा सा कुछ हासिल कर लेने के लिए नहीं।
बहरहाल, ताजा सवाल जो जनता की ओर टीम अन्ना ने उछाला है, उस पर भी एक नजर डाल ली जाए। यह भी एनजीओवादी नजरिए का ही कमाल है कि वह जनता को देवाधिदेव का दर्जा देकर भी अंदर ही अंदर खुद को उससे अलग कोई चीज माने रहता है। इसीलिए वह जनता का जिक्र ऐसे करता है जैसे वह उससे एकदम अलग सी कोई चीज हो। तथ्य यह है कि कोई भी आंदोलन जनता ही करती है। बेशक, देश की पूरी जनता नहीं करती। लेकिन, जो भी लोग आंदोलन में शामिल होते हैं, वह जनता का ही हिस्सा होते हैं। जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ता है, जनता का अधिक से अधिक हिस्सा उसमें शामिल होता जाता है। ऐसे में यह कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी आंदोलन का नेतृत्व उसमें शामिल पूरी जनता का कम से कम उस आंदोलन के संदर्भ में सबसे ज्यादा समझदार, अनुभवी हिस्सा होता है। इसीलिए वह आंदोलन को नेतृत्व दे रहा होता है।
अब अगर संकट के समय यह हिस्सा अपना दायित्व छोड़ अचानक बाकी लोगों से पूछने लगे कि आप बताएं हमें क्या करना है तो इसका साफ मतलब यह है कि नेतृत्व का वह हिस्सा या तो आंदोलन को डुबोने या खत्म कर देने का फैसला कर चुका है या फिर वह उसे कोई ऐसा मोड़ देने की साजिश में उलझा है जिसकी जिम्मेदारी वह खुद अपने सिर नहीं लेना चाहता।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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