Monday, 18 June 2018

सत्ता पर घमंड चढ़ा तो बर्बाद हुई आबादी ------ चंद्रशेखर जोशी


Chandrashekhar Joshi
18-06-2018 
सत्ता पर घमंड चढ़ा तो बर्बाद हुई आबादी
--

भारत में एक भयावह घटना हुई। लूटपाट मची, हत्याएं हुईं, भूख से बिलखती जानें गईं। गांवों में जंगल उग आए। बिहार की धरती से मानव आबादी आधी से अधिक उजड़ गई। इसका एक कारण बना मध्यम घर के घमंडी व्यक्ति का सत्ता पाना।
...बात जरा पुरानी है। एक ब्रिटिश शासक था, राबर्ट क्लाइब। इसे इतिहास की कई किताबों में महान भी कहा गया है। अपनी धरती के लिए यह वाकई महान कारनामा कर गया। भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना का श्रेय क्लाइब को ही जाता है। यह सामान्य घर का था पर बेहद लालची, चालबाज, घमंडी, क्रूर और धोखेबाज था।
...किस्सा ऐसा कहते हैं कि क्लाइव 18 वर्ष की उम्र में मद्रास के बंदरगाह में ईस्ट इंडिया कंपनी में क्लर्क बनकर आया। 1746 में जब मद्रास अंग्रेजों के हाथ से निकल गया तो वह नौकरी छोड़कर भाग गया। बाद में उसे मद्रास के पास ही सेंट डेविड किले में सैनिक की नौकरी मिल गई। इन दिनों फ्रांसीसी और अंग्रेजों के बीच भारत को जीतने के लिए युद्ध छिड़े रहते थे। भारत के नवाबों की सल्तनतें कमजोर पड़ रही थीं, मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन हो रहा था। खैर इन सल्तनतों के उजड़ने की लंबी कहानी है। 
...क्लाइव जब सेंट डविड के किले में सैनिक बना तो उसने कुछ छोटी-मोटी लड़ाइयों में हिस्सा लिया। करीब दो साल बाद फ्रांस और इंग्लैंड के बीच एक समझौता हो गया और क्लाइव फिर क्लर्की करने चला गया। कुछ दिनों वह बंगाल रहा और फिर मद्रास चला गया। उस समय कर्नाटक की नवाबी के लिये दो रियासतों में संघर्ष चल रहा था। मुहम्मद अली ने अंग्रेजों से समझौता किया तो पूरे कर्नाटक में लड़ाई छिड़ गई। चंदा साहब के आक्रमण से मुहम्मद अली को बचाने के लिए अंग्रेजों ने क्लाइव के नेतृत्व में एक सेना भेज दी। इस युद्ध में चंदा साहब को फ्रांसीसी मदद कर रहे थे। लंबी लड़ाई के बाद मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बन गया। यहीं से क्लाइव की धाक जम गई। क्लाइब के जयकारे लगने लगे, विलियम पिट ने क्लाइब को स्वर्ग से जन्मा सेनापति बताया। ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालक मंडल ने उसे भारी-भरकम तलवार देकर सम्मानित किया। इसके बाद वह इंग्लैंड चला गया। दो साल बाद अंग्रेजों ने उसे फिर लेफ्टिनेंट कर्नल बना कर भारत बुलाया। इससे क्लाइब का घमंड बढ़ता गया। वह पूरे भारत को जीतने की तमन्ना पालने लगा। उसके ठाटबाट बेतरतीब बढ़ गए। राजकोष की बड़ी रकम उसके ऐशोआराम में खर्च होने लगी। अब उसकी नीयत फ्रांसीसियों को खदेड़ कर भारत के राजे-रजवाड़ों की संपत्ति को कब्जाने पर टिक गई।
...ऐसा हुआ कि 9 अप्रैल 1756 को बंगाल और बिहार के सूबेदार की मृत्यु हो गई। सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बन गया। नवाबी हासिल करने के बाद सिराजुद्दौला ने सलामन जंग के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई शुरू कर दी। वह अपने मकसद में कामयाब रहा पर वापस मुर्शिदाबाद लौट गया। इनदिनों कलकत्ते की आबादी काफी बढ़ चुकी थी, यह शहर व्यापारिक केंद्र बन गया था। अधिकांश व्यापार पर अंग्रेजों का कब्जा था। 5 जून को सिराजुद्दौला की सेना कलकत्ते पर आक्रमण करने चली गई। सिराजुद्दौला की सेना को देख कलकत्ता के गवर्नर, कमांडर और अधिकतर अंग्रेज दुर्ग छोडक़र समुद्री रास्ते से भाग निकले। बहुत कम संघर्ष के बाद कलकत्ता पर नवाब का कब्जा हो गया। ऐसा बताते हैं कि 20 जून को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने नगर पर पूर्ण कब्जा कर लिया। 
...इस दिन एक अजीब घटना हुई, हालांकि इस पर इतिहासकारों में मतभेद हैं। बताते हैं कि जो अंग्रेज शहर में बच गए उन्हें सिराजुद्दौला के सैनिकों ने बंदी बना लिया। 146 अंग्रेज बंदियों को किले की एक छोटी सी कोठरी में कैद कर दिया गया। तीन दिन बाद जब कोठरी खोली गई तो केवल 23 लोग ही जीवित मिले। जीवितों में से एक जॉन जेड हॉलवेल भी था। बाद में हॉलवेल ने ही इस कोठरी की दास्तान बताई और इसे कलकत्ते की काल कोठरी का नाम दिया गया। तब से काल कोठरी अत्याचारों के लिए जानी जाती है। काल कोठरी का किस्सा बताने वाला भरोसे लायक था नहीं। जो भी हो, इस किस्से ने क्लाइब के अत्याचारों के लिए जमीन तैयार कर दी। जब सिराजुद्दौला के आक्रमण की खबर मद्रास पहुंची तो अंग्रेजों ने क्लाइव के नेतृत्व में एक सेना कलकत्ता भेज दी।
...क्लाइव को जब पता चला कि सिराजुद्दौला से उसके आदमी असंतुष्ट हैं तो वह षड्यंत्र रचने लगा। उसने सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर, साहूकार जगत सेठ, मानिक चन्द्र, व्यापारी राय दुर्लभ तथा अमीन चन्द्र के साथ एक गुप्त समझौता किया। मीरजाफर को कई लालच दिए गए और प्लासी की लड़ाई में मीरजाफर अपनी फौज से गद्दारी कर गया। इस षड्यंत्र से अंग्रेजों ने प्लासी के युद्ध में जीत हासिल कर ली। 
...घमंडी क्लाइब की इस जीत ने बंगाल और बिहार का ही नहीं, पूरे भारत का भाग्यचक्र बदल दिया। क्लाइब के दिमाग आसमान चढ़ गए। देश में दौलत की छीना-झपटी मची। घूसखोरी चली और भारीभरकम नजराने वसूले गए। बेईमानी और लूटमार व्यापार के बराबर का धंधा बन गया। किसानों पर कई तरह के कर लगा दिए। अफसर बेरहमी से कर वसूलते और जो न दे सके उसे भयावह यातना देकर धरती से विदा कर देते।
...इसका परिणाम यह हुआ कि 1770 में बंगाल और बिहार में भयानक अकाल पड़ गया। भूख से तड़प कर मरने वालों की कोई गितनी न रही। खाल पर लिपटी हड्डियों को श्मशान तक पहुंचाने वाला भी कोई न बचा। खेत बंजर पड़ गए, मवेशी चारे के बिना मर गए। भूख और यातनाओं से बिहार की एक तिहाई आबादी खत्म हो गई। उपजाऊ खेत और मकान जंगल ने ढक दिए। इसका खयाल करना दुखदाई है, लेकिन सच है। सत्ताखोरों का मन तब भी न भरा। ईस्ट इंडिया कंपनी और सरकार अर्द्धजीवित मानव कंकालों से मालगुजारी वसूल करती रही। अधमरे लोगों पर कर और बढ़ा दिए गए, जोर-जबर्दस्ती वसूली चलती रही। बिहार के करीब एक दर्जन गांवों से छह दशक बाद जंगल हटे।
...क्लाइब के अत्याचार यहीं नहीं थमे। उस पर सबकुछ जीतने की धुन सवार थी। मैसूर का हैदर अली अंग्रेजों का कट्टर दुश्मन था। उसने अंग्रेजों को कई बार हराया। उसका बेटा टीपू सुल्तान भी अंग्रेजों से लड़ता रहा। मैसूर के दो युद्धों में कई साल बीते, मानवता बिलखती रही। क्लाइब के षड्यंत्र अंग्रेजों के लिए करगर साबित हुए। उन्होंने लालच दिया, युद्ध लड़े, धोखेबाजी की और अंतत: पूरे देश को गुलाम बना लिया।

..इसके राज में क्या-क्या न हुआ, इस घमंडी की याद भी दुखद.
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=399292030582454&id=100015049811954

Wednesday, 13 June 2018

आज़ादी की लड़ाई में कौन शामिल था और कौन गद्दार थे ? ------ एकता जोशी

* अंग्रेजों ने हिन्दू महासभा और आरएसएस पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया - क्यों ??? 
 *हेडगेवार ने 1925 में 'रायल सीक्रेट सर्विस' का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' किया। 
*  अंग्रेजों ने सिर्फ 33 साल की श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसलिए VC बना दिया था , ताकि गांधी के आह्वान पर हज़ारों की तादाद में विश्वविद्यालय के होनहार छात्रों द्वारा आज़ादी के लड़ाई में शामिल होने से रोका जा सकें।
* श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई।
*  1940-41 में ही संघ ने घोषणा की कि कोई भी हिन्दू 'आज़ाद हिन्द सेना' में भर्ती न हो।
* श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई।

एकता जोशी
RSS का असली इतिहास और गृहयुद्ध का प्रयास

1. मुंजे , हेडगेवार का गुरु था।

2. मुंजे 1920 से 1948 तक हिंदू महासभा का अध्यक्ष रहा।

3. हेडगेवार ने 1925 में 'रायल सीक्रेट सर्विस' का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' किया।

4. 1928 में जब देश के हिन्दू मुसलमान मिलकर अंग्रेज़ों के खिलाफ देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे तब "सावरकर" ने खुलेआम यह ऐलान किया था कि भारत में दो राष्ट्र, हिन्दू और मुसलमान बसते हैं, भारत के बँटवारे का विचार यहीं से जन्म लेता है।

5. 1930-31 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन से लौटते हुए मुंजे इटली के तानाशाह मुसोलिनी से मिला।

6. इसमें उसने भारत को इटली का गुलाम बना देने का वायदा किया।

7. आरएसएस का ढांचा और शाखाओं की रचना 1931 में मुंजे ने की।

8. संघियों ने 1930-31 में भगतसिंह के खिलाफ गवाही दी।

9. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को १९३४ में अंग्रेजों ने कलकत्ता विवि का कुलपति बनाया। उन दिनों बंगाल में बहुत से वरिष्ठ शिक्षाविदों का नजरअंदाज कर अंग्रेजों ने सिर्फ 33 साल की श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसलिए VC बना दिया था , ताकि गांधी के आह्वान पर हज़ारों की तादाद में विश्वविद्यालय के होनहार छात्रों द्वारा आज़ादी के लड़ाई में शामिल होने से रोका जा सकें।

10. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाई।

11. सावरकर ने 1940-41 नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी का साथ छोड़ा।

12. 1940-41 में ही संघ ने घोषणा की कि कोई भी हिन्दू 'आज़ाद हिन्द सेना' में भर्ती न हो।

13. 1940-41 में ही सावरकर ने 'आज़ाद हिन्द सेना' के खिलाफ अंग्रेजों की सेना में हिन्दुओं की भर्ती की।

14. 1942 में अटल बिहारी बाजपाई ने देश के क्रांतिकारियों के खिलाफ गवाही दी और २ क्रांतिकारियों को 'कालापानी की सजा' हुई।

15. 11 फरवरी 1943, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था

"a Hindu rally that if Muslims wanted to live in Pakistan they should "pack their bag and baggage and leave India"

16. महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1942 में 9 अगस्त को जब 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया, तो हिंदु महासभा ने उसका विरोध किया था।

17. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के नेतृत्व में बनी सरकार के मंत्री के रूप में अंग्रेज सरकार को 26 जुलाई 42 को पत्र लिखकर कहा था कि युद्धकाल में ऐसे आंदोलन का दमन कर देना किसी भी सरकार का फ़र्ज़ है।

18. 1941-42 में हिंदु महासभा मुस्लिम लीग के साथ बंगाल मे फजलुल हक़ सरकार में शामिल थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस सरकार में वित्त मंत्री थे।

19. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में बंगाल को विभाजित कर देने की मांग रखी।

20. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में कहा, "बिना गृहयुद्ध के हिंदु-मुस्लिम समस्या का हल नहीं"।

21. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1947 में सरत बोस के बंगाल को एक करने के प्रयास का विरोध किया।

बताइए आज़ादी की लड़ाई में कौन शामिल था और कौन गद्दार थे ?

आज यह देशप्रेम का प्रमाणपत्र बाँटने वाले अंग्रेजों की कभी आलोचना और निन्दा क्युँ नहीं करते ?

सोचिएगा

ध्यान दें - अंग्रेजों ने हिन्दू महासभा और आरएसएस पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया - क्यों ???

प्वाईंट नंबर 20  पर ध्यान दीजिए "श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में कहा, "बिना गृहयुद्ध के हिंदु-मुस्लिम समस्या का हल नहीं"

और संघी आजतक यही कोशिश लगातार कर रहे हैं ,

कभी मंदिर-मस्जिद तो कभी गाय , लव जिहाद और धर्मान्तरण के नाम पर.
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=201291583829204&set=a.108455693112794.1073741829.100018450913469&type=3

Friday, 8 June 2018

Martyrdom and Its Benefits ------ Sarita Rani

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 






Sarita Rani
Martyrdom and Its Benefits
-------------------------------------

It has been Narendra Damordas Modi's everlong wish to be a martyr. Since 2002 September, an untold number of men have gone to jail, accused of just one crime -- wanting to kill him.

Perhaps a list is now due of at least some of them. Shamsher Pathan (dead); Sadiq Jamal Mahtar (dead), Adam Bhai Ajmeri (16 years in jail and acquitted), Maulana Abdul Kayum Mufti (16 years in jail and acquitted), Abdulla Miya Yasin Miya (12 years in jail and acquitted), two unnamed accused (killed in a shootout their names were never discovered), Chand Khan (unknown years in jail, acquitted).

Two weeks ago a few men were caught by the Gujarat ATS. When that story didn't float, it seems yet another threat has risen to his life - this time from Varavara Rao and his cohorts. While ML-gangs are known to have exterminated class enemies and certainly Mr Modi will qualify as one, none of them are known to have taken "Cash from Congress" for mercenary hits.

The fact is The Sangh doesn't quite know what to do with Mr Modi. They are locked with him in a deadly embrace.

While Mr Modi garners votes, he also garners immeasurable ridicule from a constituency the Sangh would like on it's side -- believing, yet somewhat sane, pro-liberalization and pro-Business Hindus.

To get or retain this constituency -- they have to let Mr Modi go.

And yet. And yet.

How does the Sangh make this switch - Get rid of Modi without also losing his obvious mass base?

I believe the reference to the Rajiv Gandhi Assassination is a red herring. It did nothing for the Congress.

Indira's Gandhi's assassination on the other hand, created a unbridled wave of violence AND sympathy for Rajiv that put him firmly on the Prime Minister's chair for the next five years.

The thing to remember now and for always will be this -- the only person or organization that will benefit directly from Mr Modi's assassination will be the Sangh and the BJP.


It's a simple principle of Criminal Justice : Cui Bono? Who Benefits?
https://www.facebook.com/sarita.rani.01/posts/10155870244618842


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
*******************************************************************************
फेसबुक कमेंट्स ; 

एक साधारण इंसान का असाधारण कार्य ------ अपूर्वानंद

******



अंकित सक्सेना के पिता ने पिछले हफ़्ते इफ़्तार का आयोजन किया। इफ़्तार जब एक हिंदू आयोजित करता है तो उसे छद्म धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। लेकिन अंकित सक्सेना के पिता को ऐसा अपशब्द कहने की हिमाक़त शायद इस शब्द को चलन में लाने वाले लालकृष्ण आडवाणी भी न कर पाएं।अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना एक साधारण इंसान हैं। लेकिन उन्होंने पिछले महीनों में जो किया है, वह असाधारण है। उनके बेटे को उसकी प्रेमिका के परिवारवालों ने, जो मुसलमान हैं, गला काट कर मार डाला था। इसलिए कि उसने हिंदू होते हुए उनकी लड़की से प्यार करने की हिम्मत की थी। दिन-दहाड़े एक नौजवान की इस तरह की गई हत्या ने सबको दहला दिया। लेकिन इस तरह की हत्याएं देखने का आदी भारत का समाज है। मुसलमान का हिंदू से या दलित का तथाकथित उच्च-जाति से प्रेम-संबंध होना असंभव है और यह दोनों ही समुदायों के लिए अपमानजनक है। विशेषकर आपकी लड़की को उस समुदाय में नहीं जाना चाहिए जिसे आप हीन समझते हैं या अपना शत्रु मानते हैं, उसकी लड़की को आप किसी तरह ले आएं तो आपकी जीत मानी जाएगी। इसीलिए जो मुसलमानों पर यह इल्ज़ाम लगाते हैं कि वे अपने नौजवानों को तैयार करके हिंदू लड़कियों को फुसलाने की साज़िश में लगाते हैं, वे ही यह भी कहते हैं कि उनकी लड़की ले आओ।रक्त या जाति या धर्म की शुद्धता के अतार्किक आग्रह के कारण रोज़ाना भारत में कई अंकित मारे जाते हैं। इस हत्या को समाज की स्वीकृति भी प्राप्त है। पिछले कुछ सालों में “लव जिहाद” का हव्वा खड़ा करके मुसलमान युवकों को निशाना बनाया जाता रहा है। इसलिए जब अंकित की हत्या हुई तो अचानक भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को लगा कि यह एक अच्छा मौक़ा है।अंकित के पिता और मां को घेरने की और इस हत्या को मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए इस्तेमाल करने की पूरी कोशिश की गई। लेकिन दिल्ली और भारत उनकी प्रतिक्रिया देखकर दंग रह गया। उन्होंने इस हत्या के लिए पूरे मुसलमान समुदाय को ज़िम्मेवार मानने से इंकार कर दिया। यहां तक कि अंकित के नाम पर निकाले गए जुलूस में जाने से भी मना कर दिया।यशपालजी ने बड़ी सादगी से कहा कि उन्हें अपने बेटे के लिए इंसाफ़ चाहिए ,लेकिन आख़िर वे इसका हिसाब सारे मुसलमानों से क्यों लें! आख़िर यह हत्या मुसलमानों की ओर से तो नहीं की गई थी! यह एक परिवार की अहमकाना समझ का भयावह परिणाम था, उसके लिए सारे मुसलमान क्योंकर जवाबदेह हों!जो यशपाल सक्सेना ने कहा वही ठीक है और वही समझदारी की बात है। लेकिन यह समझ आज भारत में दुर्लभ है। इसलिए यशपालजी एक अजूबा नज़र आने लगे। फिर भी उन्होंने इंसानियत की अपनी ज़िद नहीं छोड़ी। उनका स्टैंड कोई सनक या झक न था, यह इससे साबित हुआ की महीनों गुजर जाने के बाद भी वे अपनी जगह पर क़ायम हैं।यशपाल सक्सेना वैसे इंसान हैं, जैसा हर व्यक्ति के होने की चाह महात्मा गांधी या नेहरू की थी। जो किसी भी विषय पर ठंडे दिमाग़ से सोचकर निर्णय करे। ऐसा दिमाग़ ही भीड़ बनने से ख़ुद को रोक सकता है और दूसरों को भी भीड़ बनाने से रोक सकता है।
यशपाल सक्सेना की इस इंसानियत को उनके बेटे के दोस्तों का सहारा भी मिला। उनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। यह सहारा बहुत ज़रूरी था। उसके साथ उनके पड़ोसियों के अलावा हर्ष मंदर और उनके साथियों ने भी हाथ बढ़ाया। यह एक नई बिरादरी है। यह बिरादरी समझ की बिरादरी है। यूरोप में हिटलर के उदय और यहूदी संहार को समझने की कोशिश करते हुए विद्वानों ने कहा कि यह इस वजह से मुमकिन हो सका कि जर्मन समाज ने अपनी इंसानियत की समझ को स्थगित कर दिया था। जर्मन विचारक अडोर्नो ने कहा कि इस अवस्था से बचने का एक ही उपाय है कि प्रत्येक व्यक्ति ठहर कर ख़ुद सोचने का प्रयास करे और दूसरों की समझ को अपना न बना ले। यह काम शिक्षा का है। लेकिन शिक्षा यही नहीं करती।यशपाल ऐसा कैसे कर पाए जो खासे पढ़े-लिखे लोग नहीं कर पाते? वे उस प्रलोभन से ख़ुद को कैसे बचा सके जिससे कासगंज में मारे गए नौजवान चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता ख़ुद को नहीं बचा सके? उन्होंने अपने बेटे को शहीद, देशभक्त घोषित करने की मांग की, उसकी मौत के लिए मुसलमानों को ज़िम्मेवार ठहराया। यह सब कुछ यशपाल भी कर सकते थे। यही आज का चलन है। लेकिन उन्होंने धारा के ख़िलाफ़ तैरने का जोखिम लिया।यशपाल सक्सेना ने रमजान के मौक़े पर अपने मुसलमान पड़ोसियों के लिए इफ़्तार का आयोजन किया। अपने बेटे के न रहने की तकलीफ़ को उन्होंने घृणा का इंधन नहीं बनने दिया। लेकिन जैसा हमने कहा, इसके लिए एक व्यापक बिरादरी बनाने की आवश्यकता है। यह एक बड़ा पड़ोस निर्माण करने की चुनौती है। यह चुनौती यशपाल सक्सेना के साथ और लोगों ने भी स्वीकार की और उसकी ओर हिंदुस्तान का ध्यान भी गया है।इंसानियत अक्सर ख़बर नहीं बनती, लेकिन यशपाल सक्सेना इस वक़्त भी बड़ी ख़बर हैं। उस समय उनकी बात करना और भी ज़रूरी है जिस समय जनसंहार के लिए दिमाग़ तैयार करने के कारख़ाने में पूर्व राष्ट्राध्यक्ष के भ्रमण को उदारता का बड़ा प्रमाण माना जा रहा हो।

https://www.navjivanindia.com/opinion/it-is-important-that-the-humanity-of-yashpal-saxena-should-be-a-big-news?utm_source=one-signal&utm_medium=push-notification

Monday, 4 June 2018

भारतीय स्त्री की गरिमा, ममता, सहृदयता, विवशता, तकलीफ और संघर्ष को जीवंतता से जिया नूतन ने ------ ध्रुव गुप्त




सुनो छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी !
 
पारंपरिक भारतीय सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नूतन हिन्दी सिनेमा की एक बेहद प्रतिभाशाली और भावप्रवण अभिनेत्री रही हैं। परदे पर भारतीय स्त्री की गरिमा, ममता, सहृदयता, विवशता, तकलीफ और संघर्ष को जिस जीवंतता से उन्होंने जिया है, उसे देखना एक दुर्लभ सिनेमाई अनुभव रहा है। वे हिंदी सिनेमा की पहली अभिनेत्री थी जो चेहरे से ही नहीं, बल्कि हाथ-पैर की उंगलियों से भी अभिनय कर सकती थी। अपने दौर में 'मिस इंडिया' रह चुकी नूतन ने कम उम्र में ही अपने फिल्मी सफर की शुरूआत 1950 में अपनी मां और चौथे दशक की अभिनेत्री शोभना समर्थ द्वारा निर्देशित फिल्म 'हमारी बेटी' से की थी, लेकिन उन्हें ख्याति मिली 1955 की फिल्म 'सीमा' से जिसमें बलराज सहनी उनके नायक थे। इस फिल्म में नूतन ने चोरी के झूठे इल्जाम में जेल में दिन काट रही एक विद्रोहिणी नायिका का सशक्त किरदार निभाया था। नूतन ने सत्तर से ज्यादा फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा बिखेरा था,, जिनमें कुछ प्रमुख फ़िल्में हैं - सीमा, हमलोग, आखिरी दाव, मंजिल, पेइंग गेस्ट, दिल्ली का ठग, बारिश, लैला मजनू, छबीली, कन्हैया, सोने की चिड़िया, अनाड़ी, छलिया, दिल ही तो है, खानदान, दिल ने फिर याद किया, रिश्ते नाते, दुल्हन एक रात की, सुजाता, बंदिनी, लाट साहब, यादगार, तेरे घर के सामने, सरस्वतीचंद्र, अनुराग, सौदागर, मिलन, देवी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, साजन की सहेली आदि। 'सुजाता' में अछूत कन्या के किरदार, 'सरस्वतीचंद्र' में नाकाम प्रेमिका और पीड़ित पत्नी के भावपूर्ण अभिनय और 'बंदिनी' में अभिनय की संपूर्णता के लिए वे सदा याद की जाएगी। अस्सी के दशक में नूतन ने 'मेरी जंग', 'नाम' और 'कर्मा' जैसी कुछ फिल्मों में चरित्र भूमिकाएं निभाई थी। उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें आधा दर्ज़न 'फिल्मफेयर' पुरस्कार हासिल हुए थे। पुण्यतिथि (21 फरवरी) पर इस विलक्षण अभिनेत्री को श्रधांजलि, उनकी फिल्म 'बंदिनी' के गीत की पंक्तियों के साथ !

मत खेल जल जाएगी
कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की
चिर संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल...
मन मीत तेरी हर पुकार
मेरे साजन हैं उस पार, मैं इस पार
अबकी बार, ले चल पार
ओ रे माझी, ओ रे मांझी !

  


*************************************************************
facebook Comments :

पुलिस संवेदनहीन क्यों ? : रिटायर्ड IPS की नजरों से ------ ध्रुव गुप्त

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 
इतनी संवेदनहीन क्यों है हमारी पुलिस ?
(सौजन्य अखबार 'सुबह सवेरे')



Dhruv Gupt
04-06-2018 

अभी कुछ ही दशक पहले की बात है कि गांव-मुहल्लों में पुलिस के सिपाही को भी देखकर लोग रास्ता बदल लेते थे या घरों में छुप जाते थे। बच्चों में तो भगदड़ ही मच जाती थी जिन्हें होश संभालने के पहले से ही पुलिस से डरना सिखाया जाता था। 'भागो, पुलिस आई' उस दौर का मुहाबरा था। यह देश के मानस में अंग्रेजों की सामंती पुलिस की स्मृतियों का अवशेष था। अभी का मुहाबरा है - 'मारो, पुलिस आई !' पुलिस के प्रति अविश्वास और गुस्सा आज इतना गहरा हो चला है कि गालियां तो आम बात है, उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर लोग पत्थर उठा लेते हैं। गलतियां न भी हो तो गैरकानूनी हरकतें रोकने के दौरान भी पुलिस को मार ही खानी पड़ती है। पिछले कुछ सालों में पुलिस और पुलिस प्रतिष्ठानों पर हमले बेतहाशा बढे हैं। पुलिस का दुर्भाग्य है कि देश की आज़ादी के बाद उसे इन्हीं दो अतियों के बीच काम करना पड़ा है। पुलिस का ही क्यों, यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी दुर्भाग्य की बात है कि लोकतंत्र में पुलिस की त्राता, मित्र और सहयोगी की जो छवि बननी चाहिए थी, वह कभी बन ही नहीं पाई। पुलिस और नागरिकों के बीच का यह फासला और अविश्वास भारतीय समाज में उद्दंडता और अराजकता बढ़ने की प्रमुख वजहों में एक है।

हमारी पुलिस पर सबसे बड़े आरोप भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के हैं। पुलिस में भ्रष्टाचार तो है और उसकी जड़ें भी बहुत गहरी फैली हुई हैं। लेकिन भ्रष्टाचार सिर्फ पुलिस की समस्या नहीं है। देश की लगभग हर संस्था आज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। जब देश की राजनीतिक व्यवस्था ही भ्रष्टाचार से संचालित हो तो उसकी शाखाओं और संस्थाओं से ईमानदारी की उम्मीद करना फ़िज़ूल है। यह छुपी हुई बात नहीं है कि पुलिस में बड़े पदों पर राजनीति से प्रेरित पदस्थापनाएं होती हैं। जो राजनेताओं को जितना खुश कर सके उसको उतना ही प्रमुख और मलाईदार पद। कुछ प्रदेशों में तो पुलिस जिलों की नीलामी तक होती है। इसका असर पुलिस के अधीनस्थ पदों पर पड़ना स्वाभाविक है। चंद अपवादों को छोड़ दें तो विधि-व्यवस्था की सबसे बुनियादी संस्था थानों के प्रभारी अधिकारियों के पद राजनीतिक पैरवी और पैसों के बल पर बांटे जाते है। ऐसे पुलिस अधिकारियों की जनपक्षधरता कैसी और कितनी होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। जबतक राजनीतिक व्यवस्था की ईमानदारी, जनपक्षधरता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता स्थापित नहीं होगी, पुलिस तो क्या किसी भी संस्था से ईमानदारी की अपेक्षा दिवास्वप्न ही साबित होगी। जिले का पुलिस नेतृत्व अगर ईमानदार है, आमलोगों से उसका सीधा संवाद है और जनता का भरोसा उसके प्रति बना हुआ है तो स्थिति में थोड़ा-बहुत तात्कालिक सुधार ही लाया जा सकता है।

पुलिस की छवि बिगाड़ने में जिस चीज का सबसे बड़ा योगदान है, वह है उसकी संवेदनहीनता। कुछ हद तक अमानवीयता भी। आम तौर पर हालत यह है कि अपनी फ़रियाद लेकर आम लोग थानों में जाने से डरते हैं। रसूखदार और संपन्न लोगों को वहां कोई कठिनाई नहीं होती। उन्हें सम्मान भी मिलता है और उनकी बात भी सुनी जाती है। अपवादों को छोड़ दें तो आम लोगों के पास अगर राजनीतिक पैरवी और गांठ में पैसे न हो तो उन्हें कोई सुनता नहीं। केस दर्ज भी हो गया तो कार्रवाई नहीं होती। स्त्रियां रात में तो क्या, दिन के उजाले में भी थाने का दरवाजा खटखटाने का साहस आज भी कम जुटा पाती हैं। केसों की तफ्तीश में लापरवाही और मनमर्जी, संदेह के आधार पर या बिना आरोप साबित हुए मनमानी गिरफ्तारी, गिरफ्तारियों में पहुंच और पैसों का अंतहीन खेल, पुलिस कस्टडी में महिलाओं से दुर्व्यवहार, आरोपियों की निर्मम पिटाई और पिटाई से मौत, अपराधी बताकर लोगों की नकली मुठभेड़ में हत्या, राजनीतिक पक्षपात, उद्दंडता और जनता से दुर्व्यवहार ऐसी आम शिकायतें हैं जो लोगों को पुलिस से लगातार दूर कर रही है। इसका असर विधि-व्यवस्था पर ही नहीं, पुलिस की कार्यक्षमता पर भी पड़ा है। आम लोगों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध के अभाव में उसे अपराध और अपराधियों के बारे में अपेक्षित सूचनाएं नहीं मिलतीं। उग्र प्रदर्शनों, सड़क जाम और दंगों की स्थिति में उसे लोगों का सहयोग नहीं मिलता। जनसहयोग से जो समस्याएं बातचीत से हल हो सकती हैं, जनसहयोग के अभाव में शान्ति की बहाली के लिए बल-प्रयोग और कभी-कभी पुलिस फायरिंग का भी सहारा लेना पड़ता है। लब्बोलुबाब यह कि पुलिस की विश्वसनीयता के अभाव में स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है और राजनीतिक नेतृत्व इन बुरे हालात से आंखें चुराए बैठा है।

आखिर हमारी पुलिस इस कदर संवेदनहीन क्यों हैं ? सरकार के सभी अंग संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाएं तो देश चल जाएगा, लेकिन पुलिस अगर संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाय तो देश नहीं चल सकता। पुलिस के कंधे पर भ्रष्टाचार और अराजकता से लड़ने और और जनता में व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करने की महती ज़िम्मेदारी है। भारत की पुलिस अपने गठन से लेकर अबतक जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं पर कभी खरी नहीं उतरी है। ऐसा नहीं है कि पुलिस की छवि सुधारने और उसकी कार्यप्रणाली को लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए कोशिशें नहीं हुई है। पुलिस आयोगों के गठन से लेकर उनके प्रशिक्षण का स्तर और उनकी सुविधाएं बेहतर करने के कई कदम उठाए गए हैं, मगर आधे-अधूरे मन से। देश के लगभग हर राज्य में पुलिस के वेतन-भत्ते बढ़े हैं, अपराधियों से लड़ने के लिए उन्हें इंटरनेट फ्रेंडली और डिजिटल बनाया गया है तथा आधुनिक हथियार भी उपलब्ध कराए गए हैं। इन उपायों से पुलिस के छानबीन के तरीकों में तब्दीली जरूर आई है और आपराधिक मामलों में उसकी सफलता का प्रतिशत भी बढ़ा है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है पुलिस की संवेदनहीनता और अमानवीयता। यह समस्या पुलिस के उच्च अधिकारियों में कम, अधीनस्थ अधिकारियों और सिपाहियों में ज्यादा है। दुर्भाग्य से आम लोगों का पाला पुलिस के बड़े अधिकारियों से कम, निचले अधिकारियों और सिपाहियों से ही ज्यादा पड़ता है।

पुलिस की असंवेदनशीलता का एक कारण उसपर काम का जरूरत से ज्यादा बोझ, अवकाश की कमी और उनसे उपजा तनाव भी है जो कुछ परिस्थितियों में अवसाद का रूप भी ले लेता है। यह स्थिति तभी बदल सकती है जब चौबीसों घंटे उन्हें तनाव में रखने के बजाय पुलिस के काम के घंटे सीमित किये जायं। उप निरीक्षक और सहायक उप निरीक्षक स्तर तक के पुलिस के लगभग सभी अधिकारियों को अपने परिवार के साथ रहने की सुविधा हासिल है। बुरी हालत किसी भी थाने, पुलिस पोस्ट या पुलिस लाइन में नियुक्त सिपाहियों की होती हैं जो आम तौर पर एक ही कमरे में पशुओं की तरह रहने को विवश होते हैं। उन्हें परिवार के साथ रहने की इजाजत तो नहीं ही होती हैं। अधिकारियों द्वारा विधि-व्यवस्था की बढ़ती समस्याओं की तुलना में सिपाहियों की सीमित संख्या के कारण उनकी छुट्टियों में भी कंजूसी बरती जाती है। सभी सिपाहियों को घर देना तो संभव नहीं है, अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए उन्हें उदारता से छुट्टियां देकर उनके तनाव को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। विधि-व्यवस्था संधारण के दौरान अपना दायित्व निभा रहे पुलिसकर्मियों के साथ भीड़ का दुर्व्यवहार भी उन्हें गुस्से से भर देता है। दुर्घटनाओं के बाद सड़क जाम की स्थिति में बिना दोष के भी पत्थर पुलिस को ही खाने पड़ते हैं। प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्रों में जाने से रोकना पुलिस का कानूनी दायित्व है। दुर्भाग्य से पुलिस को सबसे ज्यादा ईंट-पत्थर इन प्रदर्शनकारियों से ही खाने पड़ते हैं। इन परिस्थितियों में निचले स्तर के पुलिस वालों में गुस्सा और प्रतिशोध की भावना पैदा होती है जिसकी परिणति अक्सर बर्बर लाठीचार्ज और पुलिस फायरिंग में होती है। धीरे-धीरे यह गुस्सा पुलिसकर्मियों का स्वभाव बन जाता है।

गड़बड़ी की शुरुआत दरअसल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों की चयन-प्रक्रिया से ही हो जाती है। उनके चयन में मानसिक नहीं, शारीरिक बल और क्षमता को आधार बनाया गया है। शारीरिक स्वास्थ पुलिस की सेवा में एक आवश्यक तत्व है, लेकिन चयन में प्रत्याशियों के मानसिक और भावनात्मक स्तर की उपेक्षा के दुखद परिणाम सामने आये हैं। कुछ स्तरों पर लिखित परीक्षाएं भी ली जाती हैं, लेकिन उनसे प्रत्याशियों की रटंत क्षमता का ही पता चलता है, योग्यता और संवेदनाओं का नहीं। रही-सही कसर उनके प्रशिक्षण के दौरान पूरी हो जाती है। यहां तमाम जोर चुने गए पुलिसकर्मियों की शारीरिक क्षमता और परेड तकनीक के विकास और क़ानून की किताबों की पढ़ाई पर ही होता है। आधुनिक हथियारों और वैज्ञानिक अनुसंधान के इस दौर में पुलिस का पहलवान होना जरूरी नहीं है। होना यह चाहिए था कि इन चीजों के अलावा उनके भीतर की मानवीयता और संवेदना को जगाने के लिए उन्हें मानविकी, मसलन समाजशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला जैसे विषयों की भी शिक्षा दी जाती। जिनके हाथ में आपने हथियार थमाए हैं, संवेदनाओं की सबसे ज्यादा ज़रुरत उनको ही है। यह न हो तो हथियार हमेशा गलत जगह पर ही चलेंगे। व्यवहारिक प्रशिक्षण के दौरान उन्हें थानों के हृदयहीन माहौल में बिठाने के अलावा पिछड़े क्षेत्र में गरीबों, दलितों और न्याय की आस लगाए लोगों की बस्तियों में भी कुछ वक्त बिताने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि आम लोगों की तकलीफों और संघर्षों से उनका निकट का परिचय रहे। उन्हें यह महसूस कराया जाय कि वे शासक नहीं सेवक हैं और अपने सेवा-काल में उनका पाला दुश्मनों से नहीं, अपने ही लोगों से पड़ना है।


सक्षम और मानवीय पुलिस-व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्तों में एक है। यह लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को मजबूत करती है। अगर इसका अभाव है तो समाज में अशांति है। अशांति है तो कोई भी विकास संभव नहीं है। अंग्रेजों से विरासत में मिली पुलिस-व्यवस्था में सुधार कर उसे संवेदनशील और लोगों की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य से यह कभी हमारी प्राथमिकता-सूची में भी शामिल नहीं रहा। पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए बनाये गए पुलिस आयोगों की अनुशंसाओं को आधा-अधूरा ही लागू किया गया। पुलिस को एक मानवीय संगठन बनाने की जगह उसे देह-हाथ से मजबूत संवेदनहीन और बर्बर लोगों का संगठन बनाकर रख दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि आज पुलिस और जनता साथ-साथ नहीं, आमने-सामने खड़े हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और जल्दी बदलनी चाहिए। पुलिस सुधार के लिए सरकार को तत्काल कदम तो उठाने ही होंगे। उससे भी बड़ी जरूरत इस बात की है कि पुलिस और आमजन के बीच के फासले कम करने के ईमानदार प्रयास किये जायं। यह दोतरफा प्रक्रिया है। इसके लिए पुलिस को जनता के प्रति अपना सामंती व्यवहार बदलना होगा। लाठियों और गालियों से तौबा कर अपने व्यवहार और संवेदनशीलता से लोगों का विश्वास अर्जित करना होगा। अपनी वर्तमान संरचना में यह काम पुलिस खुद-ब-खुद नहीं करेगी। राजनीतिक व्यवस्था अगर ईमानदार और इच्छाशक्ति से भरी है तो वह उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकती है। जनता तो एक बेहतर और मित्रतापूर्ण पुलिस व्यवस्था की आस ही लगाए बैठी है। जिस दिन उसकी उम्मीदें पूरी होती दिखेंगी, वह पुलिस को अपने सर-आंखों पर बिठा लेगी।
साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1742963082446949&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
***************************************************************
फेसबुक कमेंट्स : 


Friday, 1 June 2018

पगड़ी संभाल चुनाव आयोग : तेरी रहबरी का सवाल है ------ शेष नारायण सिंह

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गयी है. कैराना और भंडारा-गोंदिया उपचुनाव में ईवीएम में बड़े पैमाने पर खामियां पाई गयीं औअर और चुनाव आयोग ने खुद स्वीकार किया  है कि करीब बीस प्रतिशत मशीनें खराब थीं और करीब १२२ बूथों पर फिर से  मतदान करवाए गए  .  कैराना में  ७३ बूथों पर दोबारा वोट डालने का आदेश दे दिया गया . यानी एक से डेढ़ लाख वोटों को के बारे में संदेह की बात को चुनाव आयोग ने स्वीकार करके वहां दोबारा मतदान का  फैसला कर लिया  . उत्तर प्रदेश में तो बीजेपी समेत सभी पार्टियों ने ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की शिकायत चुनाव आयोग के  सक्षम अधिकारियों से की थी.   यही राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग की सेवाओं की उपभोक्ता होती हैं . जब  सभी पार्टियां ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही  हैं तो  सबके लिए चिंता की बात  है और लोकतंत्र की मूल अवधारणा को ही सवालों के घेरे में ले लिया गया है .
कैराना और गोंदिया में मतदान शुरू होते ही  ईवीएम में गड़बड़ी की ख़बरें आने लगी थीं. बीजेपी  की तरफ से किसी जेपीएस राठौर नाम के व्यक्ति ने लखनऊ में बाकायदा चिट्ठी लिखकर मशीनों की खराबी की शिकायत की दी थी. दिन में ही  विपक्षी पार्टियों के नेता भी नई दिल्ली में निर्वाचन सदन गए और ईवीएम में खराबी की  शिकायत चुनाव आयोग के पास पंहुचाया . उन लोगों ने तो और भी आरोप लगाया , सरकार और चुनाव आयोग की नीयत पर सवाल उठाया लेकिन उसकी सत्यता या असत्यता के बारे में  टिप्पणी करना किसी पत्रकार के लिए उचित नहीं होगा. लेकिन इतनी बात तय है कि चुनाव आयोग ने बड़ी  संख्या में बूथों पर दोबारा मतदान करवाने का आदेश  दे दिया. .विपक्षी पार्टियों की तरफ से की गयी शिकायत में अधिकारियों द्वारा ईवीएम मशीनों में  हेराफेरी की शिकायत की गयी थी . इस बात को थोडा बल इस लिए मिल गया  है कि चुनाव् आयोग ने गोंदिया के कलेक्टर को वहां से हटाने का आदेश दे दिया है . चुनाव आयोग ने मौके पर तैनात आब्ज़र्वरों  के सुझाव के आधार पर यह सारी कारर्वाई की . चुनाव आयोग की तरफ से कहा गया कि आब्ज़र्वरों ने  ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों का अध्ययन किया और उन्होंने पाया कि उनमें गड़बड़ी थी इसलिए दुबारा मतदान का आदेश दिया गया है . आयोग की तरफ से कई ऐसी भी तर्क दे दिए गए  जो चुनाव आयोग की क्षमता पर सवालिया निशान उठा देते है . बताया गया कि इन मशीनों के बारे में चुनाव संपन्न कराने वाले कर्मचारियों को सही प्रशिक्षण नहीं दिया गया था और मशीनें  भयानक गर्मी के कारण भी सही कम नहीं कर पाईं. हालांकि आयोग की तरफ से कहा गया कि वी वी पी ए टी  मशीनों में ही गड़बड़ी पायी गयी लेकिन शंका के बीज तो चुनाव आयोग ने डाल ही दिए हैं .मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने एक अखबार को बताया कि वी वी पी ए टी मशीनों  में खराबी कोई नई बात नहीं है लेकिन उसको तुरंत सुधार लिया जाता  है . उन्होंने यह भी दावा किया कि २०१९ का चुनाव  पूरी तरह से ईवीएएम  और वीवीपीएटी के ज़रिये  ही करवाया जाएगा .
२८ मई को संपन्न हुए   उपचुनावों के दौरान जो कुछ भी हुआ वह लोकतंत्र के लिए निश्चित रूप से  नुकसानदेह साबित होगा. पहली बार चुनाव आयोग का खुद का इक़बालिया बयान आया है कि बड़े पैमाने पर  मशीनों में गड़बड़ी पाई गयी है .  तरह तरह के आरोप प्रत्यारोप हवा में हैं लेकिन इतना तो तय है कि आचुनाव योग ने खुद स्वीकार करके मामले को बहुत ही गंभीर बना दिया है . एक बार फिर बैलट पेपर से चुनाव करवाने की मांग उठ रही  है . लेकिन जिन लोगों ने मतदान के दौरान उमीदवारों के गुंडों को बूथ में घुसकर ज़बरदस्ती बैलट पेपरों पर मुहर लगाते देखा है उनको मालूम है कि वह रास्ता तो बिलकुल सही नहीं है, खासकर जब लोकतांत्रिक मान्यताओं वाले राजनेता चुनाव प्राक्रिया से बाहर हो  रहे हैं और संसद और विधान सभाओं में ऐसे लोग भरते जा रहे हैं जिनके आपराधिक रिकार्ड सारी दुनिया को मालूम हैं .
ऐसा नहीं है कि पहली बार मतदान के तरीकों की विश्वसनीयता पर राजनीतिक पार्टियों ने सवाल उठाया है. खासकर   विपक्षी पार्टियां इस तरह की बातें अक्सर करती रही  हैं लेकिन चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ऐसी थी कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता था . आज की भारतीय जनता पार्टी अपने पूर्व अवतार में भारतीय जनसंघ नाम से जानी जाती थी। 60 के दशक में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद जब कांग्रेस पार्टी कमजोर हुई तो जनसंघ एक महत्वपूर्ण पार्टी के रूप में उभरी। जनसंघ के बड़े नेता थे, प्रो. बलराज मधोक। 1967 में इनके नेतृत्व में ही जनसंघ ने चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था और उत्तर भारत में कांग्रेस के विकल्प के रूप में आगे बढ़ रही थी लेकिन 1971 के लोकसभा चुनावों में पार्टी बुरी तरह से हार गई।बलराज मधोक भी चुनाव हार गए, उनकी पार्टी में घमासान शुरू हो गया। अटल बिहारी वाजपेयी नए नेता के रूप में उभरे और बलराज मधोक को जनसंघ से निकाल दिया गया । पार्टी से निकाले जाने के पहले बलराज मधोक ने 1971 के चुनावों की ऐसी व्याख्या की थी जिसे समकालीन राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी बहुत ही कुतूहल से याद करते है। 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और उनकी पार्टी भारी बहुमत से विजयी रहीथी.  भारतीय जनसंघ को भारी नुकसान हुआ लेकिन प्रो मधोक हार मानने को तैयार नहीं थे।
उन्होंने एक आरोप लगाया कि चुनाव में प्रयोग हुए मतपत्रों में रूस से लाया गया ऐसा केमिकल लगा दिया गया था जिसकी वजह से, वोट देते समय मतदाता चाहे जिस निशान पर मुहर लगाता था, मुहर की स्याही खिंचकर इंदिरा गांधी के चुनाव निशान, गाय बछड़ा पर ही पहुंच जाती थी। उन्होंने कहा कि इस तरह का काम कांग्रेस और चुनाव आयोग ने पूरे देश में करवा रखा था। बलराज मधोक ने कहा कि वास्तव में कांग्रेस चुनाव जीती नहीं है, केमिकल लगे मतपत्रों की हेराफेरी की वजह से कांग्रेस को बहुमत मिला है। मधोक के इस सिद्घांत को आम तौर पर हास्यास्पद माना गया।
अपने भारतीय जनता पार्टी अवतार  में भी पार्टी ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाया था. लोकसभा चुनाव 2009 के बाद भी कांग्रेस को सीटें उसकी उम्मीद से ज्यादा ही मिली थीं . बीजेपी के नेताओं की उम्मीद से तो दुगुनी ज्यादा सीटें कांग्रेस को मिली थीं. बीजेपी वाले चुनाव नतीजों के आने के बाद दंग रह गए। कुछ दिन तो शांत रहे लेकिन थोड़ा संभल जाने के बाद पार्टी के सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आरोप लगाया कि चुनाव में जो इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन इस्तेमाल की गई उसकी चिप के साथ बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई थी लिहाजा कांग्रेस को आराम से सरकार चलाने लायक बहुमत मिल गया और आडवाणी जी प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए। उसके बाद तेलुगू देशम और राष्ट्रीय जनता दल ने भी यही बात कहना शुरू कर दिया।
उसी साल दक्षिण मुंबई से शिवसेना के पराजित उम्मीदवार मोहन रावले ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी  और प्रार्थना की कि पंद्रहवीं लोकसभा का चुनाव रद्द कर दिया जाय। उनका आरोप था कि ईवीएम से चुनाव करवाने में पूरी तरह से हेराफेरी की गई है। अपने चुनाव क्षेत्र के बारे में तो उन्होंने लगभग पूरी तरह से ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी पर भरोसा जताया  और वहां के चुनाव को रद्द करने की मांग की थी..
हालांकि यह भी सच है कि ईवीएम का आविष्कार लोकतंत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है। ईवीएम शुरू होने कारण  बाहुबलियों और बदमाशों की बूथ कैप्चर करने की क्षमता लगभग पूरी तरह से काबू में आ गई थी. बैलट पेपर के जमाने में इनकी ताकत बहुत ज्यादा होती थी.  बंडल के बंडल बैलट पेपर लेकर बदमाशों के कारिंदे बैठ जाते थे और मनपसंद उम्मीदवार को वोट देकर विजयी बना देते थे। शुरू में ऐसा माना जाता था कि ईवीएम के लागू होने के बाद यह संभव नहीं है। मशीन को डिजाइन इस तरह से किया गया है कि एक वोट पूरी तरह से पड़ जाने के बाद ही अगला वोट डाला जा सकता है। ऐसी हालत में अगर पूरी व्यवस्था ही बूथ कैप्चर करना चाहे और किसी भी उम्मीदवार का एजेंट विरोध न करे तभी उन्हें सफलता मिलेगी। सबको मालूम है कि अस्सी के दशक में गुडों ने जब राजनीति में प्रवेश करना शुरू किया तब से जनता के वोट को लूटकर लोकतंत्र का मखौल उड़ाने का सिलसिला शुरू हुआ था,क्योंकि बूथ कैप्चर करने की क्षमता को राजनीतिक सद्गुण माना जाने लगा था। इसके चलते हर पार्टी ने गुंडों को टिकट देना शुरू कर दिया था। इन मशीनों के कारण शुरुआती दौर में  बहुत कम बाहुबली चुनाव जीतने में सफल हो पाते थे . लोग मानने लगे थे कि बदमाशों के चुनाव हारने में ईवीएम मशीन का भी बड़ा योगदान होता था. चुनाव आयोग दावे भी करता था कि सब सही है .तत्कालीन चुनाव  आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने एक सेमिनार में दावा किया था  कि ई.वी.एम. लगभग फूल-प्रूफ है। इसकी किसी भी गड़बड़ी को कभी भी जांचा परखा जा सकता था .
लेकिन अब वह बात नहीं है .कैराना और गोंदिया में जो हुआ और चुनाव आयोग ने जिस तरह से अपनी गलती मानी उसके बाद उसकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में  है . चुनाव आयोग को अपनी रहबरी की हैसियत को फिर से स्थापित करने की  कोशिश करनी चाहिए .

*********************************************
लेकिन  : 
केंद्रीय गृहमंत्री व उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दोनों के बयान बताते हैं कि, वे 2019 में व्यापक EVM हेराफेरी करने वाले हैं ------
( विजय राजबली माथुर ) 

Wednesday, 30 May 2018

शर्म के चार साल ! ------ हरि शंकर व्यास

 *  हिंदूओं का पृथ्वीराज चौहान गधों से प्रेरणा लेता है! ...
 **   हार्ड वर्क की डुगडुगी बजा कर पकौड़ा बेचने को रोजगार सृजन बताता है। जिसका अर्थशास्त्र नोटबंदी है, बैंकों का लगातार दिवालिया होना है। जिसके राज ने सवा सौ करोड़ नागरिकों पर यह चाबुक चलाया कि तुम सब चोर हो, टैक्स नहीं देते हो इसलिए तुम लोग पहले लेन-देन का व्यवहार सुधारो। कैसलेश बनो! 
 ***  चार सालों के अनुभव ने अपनी यह थीसिस बनाई है कि हिंदूओं को राज करना नहीं आता। 90 साल के हिंदू आईडिया अनुष्ठान का यदि यह हश्र है तो बतौर कौम ... हिंदूओं को क्या सोचना नहीं चाहिए? पर .... हिंदू सोच भी कैसे सकते हैं? ....  सरस्वती का जो श्राप है और भक्ति जो नियति है!



Sunil Katiyar
29 - 05- 2018 
यह नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा...!!!
--------------------------------------------
नया इंडिया के संपादक श्री हरिशंकर व्यास जी की छवि हिन्दूत्व पत्रकार की है। उन्होंने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चार साल के कार्यकाल को शर्मनाक बताया है। अंधभक्त अब उन्हें भी गालियाँ देंगे, लेकिन तर्क के साथ यदि व्यास के सवालों का जबाव हो तो स्वागत है।
पढ़िए व्यास का आलेख

शर्म के चार साल!

हरि शंकर व्यास

इसलिए कि इन चार सालों में दुनिया ने जाना, समझा, देखा कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता! मेरे इस निष्कर्ष से कोई सहमत हो या न हो लेकिन चार साल की जो दास्तां है उससे क्या दुनिया ने यह नहीं जाना कि भारत का प्रधानमंत्री, हिंदूओं का पृथ्वीराज चौहान गधों से प्रेरणा लेता है! वह हार्वड मतलब ज्ञान का सम्मान करने के बजाय हार्ड वर्क की डुगडुगी बजा कर पकौड़ा बेचने को रोजगार सृजन बताता है। जिसका अर्थशास्त्र नोटबंदी है, बैंकों का लगातार दिवालिया होना है। जिसके राज ने सवा सौ करोड़ नागरिकों पर यह चाबुक चलाया कि तुम सब चोर हो, टैक्स नहीं देते हो इसलिए तुम लोग पहले लेन-देन का व्यवहार सुधारो। कैसलेश बनो! इधर चाबुक, उधर इनकम टैक्स, सरकारी एजेंसियों के नोटिसों का वह सिलसिला जिसने उद्यमशीलता, काम की इच्छा और जोश सबको सोख डाला है।

सोचें, एक फुदकती, दौड़ती आर्थिकी के खून को सोख कर उसे डायलिसिस पर ला डालने का जो अर्थशास्त्र नरेंद्र मोदी-अरूण जेतली ने पिछले चार सालों में दिखलाया है वैसा दुनिया के किसी देश में क्या पहले कहीं देखने को मिला और यदि नहीं तो इससे क्या दुनिया में मैसेज नहीं बना होगा कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता!

तभी मैं नोटबंदी की घोषणा और उसके असर को समझते हुए यह थीसिस लिए हुए हूं कि इससे बड़ा हिंदूओं से दूसरा कोई विश्वासघात नहीं हो सकता कि आए थे हिंदूओं का मान बढ़ाने मगर उलटे आपने उन्हे चोर करार दिया। आए थे मुसलमानों को ठीक करने और ठोक दे रहे हंै हिंदू व्यापारियों को! आए थे हिंदूओं को एकजुट बनाने के लिए और करोड़ो-करोड़ हिंदूओं को टीवी चैनलों से जयचंद, राष्ट्रद्रोही करार करवा दे रहे हैं। आए थे पाकिस्तान को ठीक करने और चीन को औकात दिखलाने के लिए लेकिन बिना गैरत के लाहौर जा कर नवाज शरीफ के यहां पकौड़े खा लिए तो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ झूला झुले!

क्या तो अर्थ नीति, क्या सुरक्षा नीति, क्या विदेश नीति और क्या समाज नीति और क्या धर्म नीति और क्या शासन नीति!

हां, है कोई बात जिससे झलका हो कि 90 साल से जिस संघ ने हिंदू वैकल्पिक राजनैतिक ख्याल में अपने प्रचारक तैयार किए, विचार बनाए और नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया के विकल्प में हिंदुओं ने मोदी के आईडिया ऑफ इंडिया को 2014 में जो अभूतपूर्व जनादेश दिया तो उसके बाद देश के चाल, चेहरे, चरित्र में बुनियादी परिवर्तन का कोई काम हुआ है! जो मौलिक हो, कांग्रेस से चुराया हुआ नहीं हो?

एक काम, एक बात कोई बताए जो देश की बुनियादी तासीर के सत्व-तत्व को बदलने वाली हो। वहीं नौकरशाही वाला ढर्रा, नौकरशाही की फाइलों में बनती योजनाओं, उससे बनते फर्जी-झूठे आंकड़े और जनता रामभरोसे! आंकडों, योजनाओं की फेहरिस्त, जुमलों को ले कर नरेंद्र मोदी, अमित शाह के रट्टे में कुछ भी मौलिक, नया नहीं है। पंडित नेहरू की विशाल पंचवर्षीय योजनाओं से ले कर अटलबिहारी वाजपेयी के शाईनिंग इंडिया आज के वक्त से ज्यादा जनता की फील लिए हुए आंकड़े बने थे।

और नोट करें, तब किसी ने यह नहीं सुना कि पकौड़े बेचो, पान की दुकान खोलो तो देश बनेगा या यह कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्री अपनी कर्मवीरता इन बातों से साबित करेंगे कि वे कितने घंटे काम करते हैं या कितने पुश अप, दंड-बैठक लगाते हैं।

सचमुच शर्म के इन चार सालों में वह सब है जो हम हिंदूओं को बुद्वीविहीनता, कर्महीनता में कनवर्ट कर दे रहा है। 2014 में मुझे उम्मीद थी कि हिंदूओं के बुद्वी युग, कर्म युग और साहस युग में प्रवेश का वक्त आया! मगर सोचंे, इन चार सालों में क्या हुआ? मानों नरेंद्र मोदी के राज के साथ सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा सभी का हम हिंदुओं को श्राप लगा जो भारत से, भारत के विचार-बहस और नेरैटिव से बुद्वी विलुप्त हुई पड़ी है और उसकी जगह संकल्प है हिंदुओं को मूर्ख बनाने का। उन्हे भक्त बनाने का, उन्हे डराने का। तभी आज जो बुद्वी, विचार, सोच के संस्कार लिए हुए है उनका न पढ़ने का मन होता है, न टीवी चैनल देखने का होता है और न बहस में हिस्सा लेने का।

भारत में आज बुद्वी रूठ गई है। सरस्वती का श्राप ऐसा लगा है कि जिन नरेंद्र मोदी की जुबां चार साल पहले भरोसे, विश्वास, कर्म के तर्क लिए हुए थी वह अब काली हुई, चिल्लाती हुई, बेसुरी, बेतरतीब घटिया जुमलों को उगलती लगती है तो उनके साथ उनके भक्तों की सोशल मीडिया पर दशा सिर्फ रूदाली और गालियों वाली हो गई है। देवी सरस्वती रूठ गई हंै इसलिए हिंदू आज सरस्वती, बुद्वी का पुजारी नहीं मूर्खताओं में जी रहा तो लक्ष्मीजी का रूठना भी नोटबंदी की बुद्वीहीनता के चलते जैसे जो हुआ इसे बूझना मुश्किल नहीं है। साहस युग याकि देवी दुर्गा के रूठने, उनके श्राप की हकीकत यह है कि इन चार सालों में प्रमाणित हुआ है कि दुनिया के सर्वाधिक कायर, गुलाम, डरपोक जीव यदि कोई है तो वह हिंदू है।

हां, यह शर्म का सबसे बड़ा बिंदु है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह नाम के दो लोगों ने अपनी सत्ता भूख में ऐसा आंतक बना डाला कि संघ हो, उसके संगठन हो, भाजपा के नेता हो सब साष्टांग लेटे हुए है। मैं पहले भी इस बात को लिख चुका हूं कि सत्ता से हिंदू कितना डरता है। हिंदू की हजार साल की गुलामी ने उसके ऐसे डीएनए बना डाले है कि उसमें देवी दुर्गा की निडरता का आर्शीवाद फल ही नहीं सकता। कितने कायर है हम हिंदू यह पिछले चार सालों में न केवल मीडिया, उद्योगपतियों, अफसरों, जजों, समाजसेवियों, धर्मगुरूओं ने जाहिर किया है बल्कि इसे सर्वाधिक किसी ने जाहिर किया है तो वह संघ परिवार और भाजपाई हिंदूओं ने किया है। सोचंे, चार सालों के मोदी-शाह के राज में ऑमेजन-वालमार्ट-रिटेल की जो परिघटना है उससे क्या संघ, उसके स्वदेशी संगठनों को हिल नहीं जाना चाहिए था। पर चू करने की हिम्मत तक नहीं। मोदी-शाह का चार साल का व्यवहार सचमुच में संघ की कथित सामाजिकता, पारिवारिकता, बुर्जगों का मान-सम्मान, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया की ईंट-ईंट पर बुलडोजर है। क्या नहीं लगता कि चार साल में लालकृष्ण आडवाणी, डा मुरलीमनोहर जोशी सहित तमाम बुजुर्गों की जो अनदेखी हुई, जो उनका असम्मान हुआ वह संघ, भाजपा के कथित संस्कारों के लिए जहां शर्मनाक है वहीं इस जमात के चुपचाप सहते जाने की कायरता का प्रतिमान भी है?

मगर कायर, गुलाम, भक्त के डीएनए और यह बुद्वीहीनता कि इस पृथ्वीराज के साथ ही हिंदूओं का मरना-जीना है वाली सोच में राष्ट्रवादी हिंदू भी उतना ही डरा हुआ है जितना आम हिंदू हाकिम के आगे डरा हुआ रहता है।

डर, गुलामी, भक्ति क्योंकि हिंदू का इतिहास अनुभव है इसलिए इसमें अस्वभाविकता नहीं। मगर इनसे भी गंभीर चार साल का त्रासद मसला यह है कि मोदी-शाह राज मतलब हिंदू शर्म का यह अनुभव कि हिंदूओं को राज करना नहीं आता!

हां, 15 अगस्त 1947 से ले कर 26 मई 2018 का भारत राष्ट्र-राज्य का बार-बार रेखांकित होता तथ्य है कि अवसर बार-बार आए। सबकों मिले लेकिन वह उम्मीदों, वक्त-दुनिया के विकास, उसकी चाल की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। वह भयावह तौर पर जाया हुआ और तभी चार सालों के अनुभव ने अपनी यह थीसिस बनाई है कि हिंदूओं को राज करना नहीं आता। 90 साल के हिंदू आईडिया अनुष्ठान का यदि यह हश्र है तो बतौर कौम हम हिंदूओं को क्या सोचना नहीं चाहिए? पर हम हिंदू सोच भी कैसे सकते हैं? हमें सरस्वती का जो श्राप है और भक्ति जो नियति है!
साभार : 
https://www.facebook.com/sunil.katiyar.1401/posts/447790599001823
******************************************
फेसबुक कमेंट्स : 

Tuesday, 29 May 2018

बड़बोले सांप्रदायिक के संचालन में है ' द वायर ' का मीडियबोल ------ विजय राजबली माथुर

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )


पत्रकारिता  के  अपनी मूलभावना से भटकाव  को उजागर करने के लिए द वायर  ने जिस मीडियाबोल कार्यक्रम को चलाया है उसका उद्देश्य अच्छा होते हुये भी यह कार्यक्रम संचालक महोदय के मौलिक रूप से सांप्रदायिक झुकाव के कारण निष्पक्ष नहीं रह पाता है।
एपिसोड 50 में ज़्यादातर ध्यान पंडित राव साहब पर दिया गया जबकि जावेद अंसारी साहब को बीच - बीच में हस्तक्षेप करना पड़ा तब उनकी बात सामने आ पाई। इसी एपिसोड पर एक टिप्पणी में रिटायर्ड IPS ध्रुव गुप्ता जी के दिल्ली की सेलफ़ी में प्रकाशित एक लेख का लिंक दिया जिसमें ब्रिटिश काल में उर्दू के एक निर्भीक पत्रकार के बलिदान का ज़िक्र था उस पर कार्यक्रम के संचालक द्वारा यह टिप्पणी करना उनके सांप्रदायिक दृष्टिकोण को और मजबूती से दर्शाता है ------ 
उनकी यह टिप्पणी दर्शाती है कि, ध्रुव गुप्तजी का उर्दू पत्रकार की शहादत वाला लेख उनको बेहद चुभा तभी तो उनके साथ - साथ मुझे भी  'सजा ए मौत ' शब्द से लपेट दिया। यदि 1857 में मुझे मौत की सजा मिल चुकी थी फिर उनके एपिसोड पर टिप्पणी क्या मेरी मृतात्मा ने की थी ? 
लेकिन बड़ी चालाकी से से यह महाशय खुद को सत्तारूढ़ सांप्रदायिक शक्तियों से अलग दिखाने के लिए विशिष्ट अंदाज पेश करते हैं जिस पर एपिसोड 51 में ओम थानवी साहब ने कड़ाई से उनका प्रतिरोध किया जिस पर वह चुप्पी साध गए । इससे पूर्व के कई एपिसोड्स में वह बाजपेयी जी के प्रेस सलहकार रहे टंडन जी को अत्यधिक तवज्जो देते रहे हैं जो उनके सांप्रदायिक दृष्टिकोण को उजागर करता है।