Wednesday, 18 October 2017

प्रणब मुखर्जी कहते हैं ' ए एम यू राष्ट्रवाद का सबसे सही उदाहरण है

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उच्च शिक्षा संस्थानों में मौलिक अनुसंधानो  को महत्व न देना पिछड़ने का कारण है  : 


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  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 14 October 2017

' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति को नहीं समझ कर विपक्ष अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चला रहा है ------ विजय राजबली माथुर

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Arvind Raj Swarup Cpi
16 hrs
हिंदू राष्ट्रवादी सम्पादक हरिशंकर व्यास ने अपने अख़बार ‘नया इंडिया’ में आज लिखा है -

“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।

“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!

“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!

“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।

“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।

“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।

“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।

“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।

“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!


“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1984164238468371




वरुण गांधी (भाजपा सांसद ), हरिशंकर व्यास ( जिनका  लेख अरविंद राज स्वरूप CPI के वरिष्ठ नेता द्वारा उद्धृत किया गया है )  और  हज़ारे साहब के साक्षात्कार पर ध्यान दें  तो स्पष्ट होता है कि , संघ की पसंद के पी एम मोदी  की सरकार के विरुद्ध अभियान में भी अग्रणी संघ के नेता और विचारक ही हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघन सिन्हा  आदि नेताओं व विचारकों के कदम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। विपक्ष के जो नेता या विचारक मुखर होते हैं उनके विरुद्ध क्रिमिनल  व सिविल केस चलाये जाते हैं या उनकी हत्या करा दी जाती है। यह है ' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति जिसे वर्तमान विपक्ष के नेता और दल नहीं समझ रहे हैं  जो कि, भारतीय राजनीति से उनके सफाये की योजना है। 
संघ ने सत्ता ( शासन और प्रशासन दोनों ) पर  मजबूत पकड़ बनाने के बाद  अब विपक्ष पर भी पकड़ बनाना शुरू कर दिया है जिससे मोदी सरकार के पतन  की दशा में बनने वाली सरकार में भी संघ की मजबूत पकड़ बरकरार रहे। 
यदि वर्तमान विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस + CPM समेत सम्पूर्ण वामपंथ + ममता बनर्जी समेत समस्त क्षेत्रीय दलों ने एक साथ न लड़ कर अलग - अलग लड़ा या आ आ पा (AAP) को अपने साथ जोड़ा तो तय है कि, बनने वाली सरकार  पर भी संघ का ही नियंत्रण रहेगा। 
------ विजय राजबली माथुर 





Monday, 9 October 2017

विनोद दुआ के अनुसार ट्रोल्स अच्छे हैं लेकिन एजुकेटेड इललिटरेट्स का क्या किया जाये ?

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विनोद पूर्ण परिचित शैली में विनोद दुआ जी ने ' ट्रोल्स ' को अच्छा बताते हुये उनकी उपेक्षा करना ही इस समस्या का समाधान बताया है। लेकिन फेसबुक पर तमाम एजुकेटेड इल लिटरेट्स भी सक्रिय हैं जो सत्ताधीशों के हितार्थ समाज और जनता को गुमराह करने की हरकतें करते रहते हैं उनकी भी उपेक्षा कर देने से उनके हौंसले बुलंद रहेंगे और समाज व जनता वास्तविक तथ्यों से अनभिज्ञ ही रहेगी। 







'भागवत पुराण ' और उसके रचियता संबन्धित जब उत्तर लिख कर पोस्ट करना चाहा तब तक इन साहब ने स्क्रीन शाट पर आपत्ति जता कर फेसबुक पर ब्लाक कर दिया लिहाजा उनको काउंटर ब्लाक करने के बाद उत्तर इस ब्लाग - पोस्ट के माध्यम से देने का विकल्प ही बचा था। 


वरिष्ठ पत्रकार और प्रगतिशील - कम्युनिस्ट विचारों का वाहक होने का दावा करने वाले यह साहब दिमागी तौर पर संकीर्ण पोंगापंथी नज़र आते हैं तभी तो ' भागवत ' पुराण का समर्थन करते हैं और उसको वैदिक ग्रंथ बताते हैं। 1857 की क्रांति में सक्रिय भाग लेने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में 'आर्यसमाज ' की स्थापना 'कृण्वंतोंविश्वमार्यम ' अर्थात सम्पूर्ण विश्व को 'आर्ष ' = श्रेष्ठ बनाने हेतु की थी। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'सत्यार्थ प्रकाश ' के पृष्ठ : 314 - 315 पर  एकादशसमुल्लास : में भागवत पुराण में वर्णित अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों के संबंध में स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार दिये गए हैं, यथा ------ 
" वाहरे  वाह ! भागवत के बनाने वाले लालभुजक्कड़ ! क्या कहना ! तुझको ऐसी ऐसी मिथ्या बातें लिखने में तनिक भी लज्जा और शर्म न आई, निपट अंधा ही बन गया ! ........... शोक है इन लोगों की रची हुई इस महा असंभव लीला पर , जिसने संसार को अभी तक  भ्रमा रखा है। भला इन महा झूठ बातों को वे अंधे पोप और बाहर भीतर की फूटी आँखों वाले उनके चेले सुनते और मानते हैं। बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, ये मनुष्य हैं या अन्य कोई ! ! !  इन भागवतादि  पुराणों  के बनाने वाले जन्मते ही ( वा ) क्यों नहीं गर्भ  ही में  नष्ट  हो गए ? वा जन्मते समय मर क्यों न गए  ? क्योंकि इन पापों से बचते तो आर्यावर्त्त देश दुखों से बच जाता । " 

एजुकेटेड इललिटरेट्  उक्त तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार महोदय को सही बात न जानना होता है न ही समझना उनको तो बस झूठ का प्रचार करके सत्ताधीशों का बचाव करना होता है। स्क्रीन शाट लेने का अभिप्राय  यह होता है कि, विचार ज्यों के त्यों  सार्वजनिक हों उनमें कोई मिलावट न हो पाये। अब जब स्वमभू  विद्वान साहब स्क्रीन शाट लेने का विरोध करते हैं तो सिद्ध होता है कि, उनके विचारों में उनके मन में छल - कपट छिपा हुआ था और वह अपनी पोस्ट को संशोधित  कर या हटा सकते थे जो कि, स्क्रीन शाट लेने से उनकी हेराफेरी  को उजागर कर देगा। 
उनके ही शहर  मुंबई  निवासी  गण मान्य  नेता  द्वारा वरिष्ठ पत्रकार रोहिणी सिंह  की फेसबुक पोस्ट का स्क्रीन शाट प्रयोग करना गलत कैसे हो सकता है ? फिर इन झूठेरे  विद्वान को आपत्ति का आशय समझने में किसी को भी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। : 

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09-10-2017








Sunday, 8 October 2017

वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल, लिंग - भेद से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं ------ विजय राजबली माथुर


वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही  वस्तुतः साम्यवाद का  भी मूलाधार  है ।   ............... 
जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। 


https://www.facebook.com/prakash.sinha.942/posts/821903144665645



विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों ,उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। 


' ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् ' यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने.अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था.(अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है).श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था.लेकिन कालांतर में पोंगा-पंडितों ने अपने निजी स्वार्थ में इस रक्षा-सूत्र-बंधन  अर्थात जनेऊ धारण करने के पावन-पर्व को राखी बांधने-बँधवाने तथा बहन-भाई के बीच सीमित कर दिया .
 उपनयन अर्थात जनेऊ के लाभों से साधारण जनता को छल पूर्वक वंचित कर दिया गया है.
 उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा.
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा.
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष -गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था.आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं?
विश्वास-सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य 
अविश्वास-सत्य को स्वीकार न  करना 
 अंध-विश्वास--विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना 
विज्ञान-किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं.
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं.वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं.यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं.परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता,परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर)क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है.इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते.यही समस्या है.

लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका  विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो।  
अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए। 



वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल, लिंग - भेद से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। 
उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -

'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।


'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =


हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।


'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=


हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। ।


'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=


सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान ।
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों कोई  न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। ।
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।   


ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही  वस्तुतः साम्यवाद का  भी मूलाधार  है ।


उर्दू भारतीय भाषा और हिन्दी की पूरक है

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उर्दू  भाषा का जन्म भारत में ही हुआ है और यह यहाँ के जीवन में खूब रस - बस चुकी है। लखनऊ में जन्म होने और नौ वर्ष की उम्र व कक्षा चार तक की पढ़ाई वहीं करने के कारण और घर में जो बोल चाल रही उसके कारण मुझे यह फर्क ही नहीं समझ आया कि, हम लोग जो बोलते हैं वह हिन्दी- उर्दू मिश्रित बोली है। इसका पता लखनऊ छोडने के बीस वर्ष बाद 'करगिल ' में 1981 में तब चला जब होटल मुगल शेरटन, आगरा से डेपुटेशन पर वहाँ ' होटल हाई लैण्ड्स ' गए थे। एक रोज़ मेनेजर साहब समेत सभी साथी सुबह टहलते - टहलते टी बी हास्पिटल तक पहुँच गए थे। वहाँ के सी एम ओ साहब ने हम लोगों से परिचय जानने के लिहाज से बातचीत की। मुझसे परिचय जानने के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कि, आप तो आगरा के लगते नहीं , आप तो लखनऊ के लगते हैं। मैंने उनसे पूछा कि, डॉ साहब मैं हूँ तो लखनऊ का ही लेकिन आपने कैसे पहचाना ? तो श्रीनगर निवासी उन डॉ साहब का कहना था बाकी सबसे अलग आपकी ज़बान में एक श्रीनगी  है जो केवल लखनऊ में ही पाई जाती है। 
अपनी बचपन से सीखी बोलचाल की भाषा के ही कारण लखनऊ छोडने के बीस वर्ष बाद भी लखनवी के रूप में पहचाना गया तो इसका कारण मैनेजर साहब व साथियों की निगाह में कारण मेरे हिन्दी का उर्दू मिश्रित होना था जबकि अन्य की हिन्दी बृज भाषा या पंजाबी मिश्रित थी। अलग से उर्दू लिपि, भाषा या साहित्य न पढ़ने के बावजूद अगर हमारी हिन्दी को उर्दू मिश्रित समझा गया तो मेरे लिए उर्दू अलग भाषा कैसे हो सकती है ? 
अतः नभाटा का उपरोक्त लेख हो या द वायर में नूपुर शर्मा जी के कार्यक्रम हम लोग पसंद के साथ देखते - पढ़ते हैं। प्रस्तुत वीडियो में नूपुर शर्मा जी ने उर्दू भाषा के कलाकार टाम आल्टर   साहब को जो  श्रद्धांजली अर्पित की है उससे काफी कुछ सीखने की प्रेरणा मिलती है। : 






  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Saturday, 7 October 2017

बी जे पी को विरोध नहीं चाहिए --- शरद यादव / वि​कल्प न होने की बात डिक्टेटरशिप है --- विनोद दुआ

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जहां मोदी समर्थक पत्रकार विपक्ष का नेता न होने की बात कह कर सरकार की खामियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं वहीं वास्तविक पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करने वाले विनोद दुआ जी का अभिमत है कि, विकल्प हीनता की बात लोकतान्त्रिक नहीं डिक्टेटरशिप की बात है। 




संकलन - विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 6 October 2017

जनता दीदउ के झांसे में न फंसे ------

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प्रोफेसर बलराज मधोक  ( DAV कालेज , जम्मू )  द्वारा आर एस एस की दीक्षा में दी जाने वाली दक्षिणा को प्रश्नांकित करने के कारण जब  हटाया गया तब पंडित दीन दयाल उपाध्याय को जनसंघ का अध्यक्ष बनाया गया था। विचारधारा के बारे में उपरोक्त वीडियोज़ में विस्तृत चर्चा है। परंतु वह निर्विवाद रूप से एक ईमानदार व सादगी पसंद व्यक्ति थे। लेकिन 1967 में बनी संविद ( ULP ) सरकारों में शामिल जनसंघी मंत्री भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुये थे। उनके संबंध में एक जांच रिपोर्ट लेकर उस पर विचार करने हेतु जब वह 1968 में  रेल यात्रा कर रहे थे ऐसे भ्रष्ट मंत्रियों की योजना के अंतर्गत उनकी हत्या कर मुगल सराय के रेलवे यार्ड में फेंक दिया गया था और  42 वर्षीय अटल बिहारी बाजपेयी को उनके स्थान पर नियुक्त कर दिया गया था। 
अब जब उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों जगह भाजपा ( पूर्ववर्ती जनसंघ ) की  पूर्ण बहुमत की सरकारें हैं उनकी जघन्य हत्याकांड की जांच करके दोषियों को दंड देने के बजाए उनको महिमामंडित करने के सरकारी उपाय किए जा रहे हैं जिसके लिए सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ - साथ सरकारी कोष ( जनता से वसूले गए कर ) का भी दुरुपयोग किया जा रहा है। न ही विपक्षी दल जनता को जागरूक कर रहे हैं और न ही खुद कोई आवाज़ उठा रहे हैं। प्रबुद्ध नागरिकों का कर्तव्य है कि, वे शासन - सत्ता के इस आलोकतांत्रिक दुरुपयोग के विरुद्ध आवाज़ उठाएँ। महिमामंडन करने के बजाए उनकी हत्या की जांच कर आज  50 वर्ष बाद जीवित बचे अपराधियों को कडा दंड दिया जाये। 





  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 5 October 2017

वाल्मीकि जयंती पर ------

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महात्मा गांधी जी के जन्मदिवस को  अंतर्राष्ट्रीय जगत में ' अहिंसा दिवस ' के रूप में मनाया जाता  है जो कि, एक आदर्श स्तुत्य कदम है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि, उनके अपने देश में सरकार उसे नहीं मनाती है क्योंकि उसका अहिंसा पर नहीं हिंसा पर विश्वास है इसलिए सरकार ने इसे स्वच्छता दिवस के रूप में घोषित करके गांधी जी के अहिंसा के सिद्धान्त को झाड़ू से बुहार देने की गुहार लगाई है । सरकार की यह झाड़ू यह भी संकेत देती है कि, कमल के मुरझाने पर उसकी जगह झाड़ू वाली पार्टी सत्ता पर काबिज होगी जोकि उसके मंसूबों को बखूबी पूरा करती रहेगी। 
गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों में विश्वास रखने वाले देश के प्रबुद्ध लोगों का कर्तव्य है कि वे जनता को जागरूक करके जनतंत्र की रक्षा के लिए आगे आयें ------ आज वाल्मीकि जयंती है । महर्षि वाल्मीकि को सफाई कर्मियों के समुदाय तक सीमित करके रख दिया गया है। 
मोदी की भाजपा सरकार 'स्वच्छ भारत ' अभियान महात्मा गांधी के नाम पर चलाती है परंतु महर्षि वाल्मीकि के नाम पर बनी जाति के सफाई कर्मियों  की दुर्दशा को सुधारने की उसकी कोई इच्छा नहीं है। 
सफाई कर्मियों की सुरक्षा और विकास के बगैर  स्वच्छता अभियान न केवल बेमानी है बल्कि इस समुदाय के लिए प्रताड़णा समान है । विस्तृत एवं सराहनीय परिचर्चा इस वीडियो में देखी जा सकती है : 

   

संकलन- विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 3 October 2017

जर्जर होते जनतंत्र के चौथे स्तम्भ को बचाने की मुहिम

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कभी अकबर इलाहाबादी  ने  कहा था : 
'' खींचो न तीर कमानों को न तलवार निकालो। 
   जब तोप मुक़ाबिल हो  तब अखबार निकालो। । "
रेलवे की रु 50 /- मासिक की नौकरी छोड़ कर इलाहाबाद में 'सरस्वती ' के रु 20/- मासिक पर  संपादक बनने वाले आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी का कथन था कि, साहित्य में वह शक्ति छिपी होती है जो तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती । 
अखबारों के संपादक साहित्यकार लोग ही होते थे जो न केवल खबरों को पाठकों तक पहुंचाते थे बल्कि वे जनता को सतत जागरूक भी करते थे और स्वतन्त्रता आंदोलन में सहयोग करने हेतु प्रेरित करते थे। 
समय समय पर विदेशी सत्ता ने अखबारों को नियंत्रित करने के जो प्रयास किए और आज़ादी के बाद भी 'प्रेस ' पर जो हमले हुये उनका विस्तृत वर्णन " भारत में पत्रकारिता पर हमला कोई नई बात नहीं " वीडियो में किया गया है। 
2014 के बाद गठित मोदी नीत भाजपा सरकार के शासन में जन सरोकार रखने वाले पत्रकारों की हत्या, चरित्र हनन, धमकी, मानहानी मुकदमे आदि की बाढ़ आ गई है। गांधी जयंती पर दिल्ली  सहित देश के विभिन्न प्रेस क्लबों पर पत्रकारों ने मानव श्रंखला बना कर विरोध प्रदर्शन किया। पत्रकारों की चर्चा में भी इस समस्या पर विमर्श हुआ । द वायर हिन्दी द्वारा इस दिशा में सराहनीय कार्य सम्पन्न हुये। लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ 'पत्रकारिता ' की स्वतन्त्रता व पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना लोक अर्थात जनता का भी कर्तव्य बनता है अतः उसे आगे आ कर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि, अपराधी तत्वों को नियंत्रित व दंडित करे। 


 


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश