Saturday, 23 September 2017

पापा की सीख पर चल रहीं मलिका दुआ ------ गरिमा शर्मा

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 21 September 2017

कामकाजी महिलाओं के साहस और संघर्ष की असीमा भट्ट द्वारा व्यक्त गाथा पर बुजुर्गवार की अभद्र टिप्पणी

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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Wednesday, 20 September 2017

धोखेबाज़ी का बड़ा चेहरा : नीतीश कुमार ------ रहीम खान

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यह समाचार NDA के पास ६० प्रतिशत वोट होने की सूचना देता है. मूलतः NDA के पास बहुमत हेतु लगभग १७ हज़ार से अधिक वोट कम हैं. यह ६० प्रतिशत का आंकडा विरोध पछ में फूट का द्योतक है. लकड़ी को काटने के लिए लोहे की हथौड़ी में लकड़ी का ही हत्था डाला जाता है ठीक इसी प्रकार विरोधी दलों में फूट डाल कर सिर्फ विरोधी दलों ही नहीं देश के संविधान व् लोकतंत्र को काटने का उपक्रम किया गया है. नीतीश कुमार, नवीन पटनायक सरीखे मुख्यमंत्री जो इस अभियान का हत्था बने हैं वे निजी हितों की खातिर देश के संविधान को नष्ट कर लोकतंत्र के खात्मे व् आर एस एस की असैनिक तानाशाही स्थापित करने की कोशिश को सहयोग कर रहे हैं. N.T.रामाराव ने तेलगू गौरव के नाम पर P.V.नरसिंघा राव का समर्थन किया था उसी तर्ज़ पर नितीश कुमार को भी बिहार गौरव के नाम पर मीरा कुमार का ही समर्थन करना चाहिए था. कभी बिहार का ही हिस्सा रहे उड़ीसा के नवीन पटनायक को भी अपने अतीत के गौरव की खातिर मीरा कुमार का ही समर्थन करना चाहिए था. इतिहास के काले अध्याय में अपना नाम न लिखवाने के लिए इन जैसे लोगों को पुनर्विचार करके NDA प्रत्याशी को हराने के लिए आगे आना चाहिए. https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1475997325795572&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3

Navendu Kumar
बिहारी अस्मिता का पाठ पढ़ाते रहे आप।...और खुद ही चल दिये महफ़िल छोड़ कर। बिहार की बेटी बुला रही- लौट आइए!...
ऐसे कैसे होगा 'संघ मुक्त भारत'? आपका ही दिया हुआ नारा है न यह? लोगों ने तो सोच लिया था कि आप खुद ही बनेंगे देश के समेकित विकास और मिल्लत-ओ-भाईचारे की राजनीति के केंद्र। आपने राष्ट्रीय राजनीति में बिहार की अस्मिता और बिहारीपन की बखान की। देश को बिहार मॉडल से विकास के नये मानदण्ड खड़े किये। उस बिहार और विकास की बिहारी शैली जो नीतीश शैली और प्रारूप के तौर पर जानी गयी, उसका ढोल भी बजाया-बजवाया। 
गुजरात मॉडल और एक क्षेत्रीय अस्मिता के काट में 12 करोड़ बिहारियों की अस्मिता और गौरव-गुमान को काट में आपने देश के सामने ला खड़ा किया। जब हमारे ही सूबे के मुखिया के 'डीएनए में ही गड़बड़ी है' की बात एक गैर बिहारी ने उठायी तो भले ही वह देश का प्रधान ही क्यों न हो, बिहार ने इसे अपनी अस्मिता पर हमला के तौर पर लिया और आपकी ललकार के साथ खड़ा हो कर उसे प्रचंड रूप से पटखनी दे दी। रुक गया उसके देश दिग्विजय का राजनीतिक रथ। आपके साथ जब बिहार का बिहारीपना है तो फिर आप क्यों किसी पराई सोच और उसकी राजनीति-रणनीति के आसरे रहेंगें। आप तो खुद ही नीतीश हैं। दूसरों की नीति-नहान में क्यों डुबकी लगा रहे या गोते खाने जायेंगें?
एक चुनाव 2015 में हुआ जिसमें आपको खांटी बिहारी और बिहारीपन के बनवारी के रूप में लोगों ने देखा। एक ये चुनाव है राष्ट्रपति का चुनाव, जिसमें एक बिहारन खड़ी है। उसके ज़रिए देश की शतरंजी सियासत पर बिहारी माटी और बेटी की प्रतिष्ठा दांव पर पड़ी है। आपको खुद के व्यक्तिगत राजनीति से अलग हो सामूहिक सदभावी राजनीति के लिए सोचना तो पड़ेगा। एक बिहारन को कैसे अकेला छोड़ सकते हैं आप? 
देश आजाद होने के बाद 70 सालों में ये कोई दूसरा मौका आया है जब किसी बिहारी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया गया है। वरना बिहार के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी औपनिवेशिक व्यवहार ही होता आया है। आप ये ज़्यादा जानते और इसकी समझ रखते हैं। वर्ना बिहार भी देश को कई प्रधानमंत्री देने की क़ूवत रखता रहा है। आप खुद ही पीएम मटेरियल हैं, ये आपके राजनीतिक विरोधियों तक ने कहा है।...पीएम मटेरियल का मतलब यह भी होता है कि जो दूसरों का गेम न खेले बल्कि खुद अपना गेम खेल दूसरों की गेम बजा दे। गुजरात चुनाव के बिछे मोहरों को आप क्यों खेलें? पटेलों की नाराजगी के विकल्प में कोली जाति के 18-24 प्रतिशत कमल छाप वोट के लिए आपका तीर किसी के धनुष पर क्यों चढ़े?
चुनाव सीधे यानि प्रत्यक्ष तौर पर हार या जीत तो होता है। पर परोक्ष रूप से चुनाव जीत कर हारने और हार में जीत की इबारत भी गढ़ जाते हैं। याद होगा सबको कि प्रतिभा ताई पाटिल के राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के कट्टर विरोधी होने के बावजूद शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे ने इस आधार पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को वोट और समर्थन दिया था कि वह महाराष्ट्र की बेटी है। किसी और के बारे में वे भला सोच भी कैसे सकते हैं! तो फिर बिहार के नीतीश कुमार बिहार की बेटी के बारे में ऐसा क्यों और कैसे नहीं कर सकते! जेडीयू के बड़े नेता केसी त्यागी जब कोविद जी को बिहार के अच्छे राज्यपाल होने के नाते समर्थन देने की बात करते हैं तो फिर अब जबकि बिहार की ही बेटी मीरा कुमार मैदान में विपक्ष के साझा प्रत्याशी के तौर पर सामने आ चुकीं हैं तो फिर क्या सोचना! 
वोट संख्या बल के आधार पर भले रामनाथ कोविद जीत जाएं और विपक्ष हार जाए तो भी हारेंगे नीतीश। इस लड़ाई में अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीरा कुमार और विपक्ष का साथ दिया तो विपक्ष भले हारे, जीतेंगे नीतीश। तब ये सिद्ध हो जायेगा कि ज़ुबानी जमा खर्च ही नहीं, बिहारी अस्मिता के नायक हैं नीतीश! इतना ही नहीं विपक्ष के नायक और धुरी भी हैं नीतीश। पहले भी में लिख चुका हूं कि अभी भारतीय राजनीति में सबकी आस हैं नीतीश कुमार। सत्ता पक्ष की भी ज़रूरत और साझा विपक्ष की उम्मीद भी। कहाँ कोई है ऐसा राजनेता जिसकी मनुहार मोदी-शाह की जोड़ी भी करे और जिससे गुहार सोनिया-लालू भी करें।
देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव की अभी भी ये स्थिति है कि नीतीश कुमार अगर मीरा कुमार के साथ खड़े हो गये तो विपक्ष की हार भी जीत के आनंद में बदल जा सकता है और सत्ता पक्ष की जीत, जान निकलने के हाल में पहुंच जाए। क्योंकि राजनीतिक गोलबंदी और पोलिटिकल इंजीनियरिंग के भी मास्टरमैन हैं नीतीश कुमार। फिर तो वी वी गिरी और संजीवा रेड्डी के प्रेसिडेंशल इलेक्शन की तरह लोकतंत्र और राजनीति में याद किया जाएगा 2017 का प्रेसिडेंशल इलेक्शन भी। इससे आगे की बात ये कि 2019 का संसदीय चुनाव हो या 2020 का बिहार चुनाव, सवाल तो ये रहेगा ही कि किस नीतीश को तब याद किया जाएगा!£

राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति पर एक बिहारी की टिप्पणी ]]
https://www.facebook.com/navendu.kumarsinha/posts/1145551852217488

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 19 September 2017

शरीर रचना ------ हफीज किदवई

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 18 September 2017

शबाना आज़मी : नूपुर शर्मा और ध्रुव गुप्त की नज़रों से






17 -09-2017 
तुमको देखा तो ये ख़याल आया ! :

आधुनिक भारतीय सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में से एक शबाना आज़मी ने भारतीय सिनेमा में संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय के जो नए आयाम जोड़े, उसकी मिसाल भारतीय सिनेमा में तो क्या, विश्व सिनेमा में भी कम ही मिलती है।अभिनय में गहराई ऐसी कि एक-एक ख़ामोशी सौ-सौ लफ़्ज़ों पर भारी। शालीनता ऐसी जो हज़ार अदाओं पर भारी। परदे पर उनकी ज़ुबान कम, आंखें ज्यादा संवाद करती हैं। महान शायर कैफ़ी आज़मी की इस बेटी को फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट, पुणे से ग्रेजुएशन के बाद जो पहली फिल्म मिली, वह थी ख्वाजा अहमद अब्बास की 'फ़ासला', लेकिन परदे पर पहले रिलीज हुई श्याम बेनेगल की 'अंकुर'। इस फिल्म की सफलता और ख्याति ने उन्हें उस दौर की दूसरी महान अभिनेत्री स्मिता पाटिल के साथ तत्कालीन समांतर और कला सिनेमा का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। शबाना ने चार दशक लंबे फिल्म कैरियर में पचास से ज्यादा हिंदी, बंगला और अंग्रेजी फिल्मों में अपने अभिनय के झंडे गाड़े, जिनमें कुछ यादगार फिल्में हैं - अंकुर, मंडी, परिणय, निशांत, शतरंज के खिलाड़ी, स्पर्श, तहजीब, अर्थ, खंडहर, जुनून, मासूम, मृत्युदंड, गॉडमदर, मकड़ी, आर्तनाद, धारावी, दिशा,नमकीन, थोड़ी सी बेवफ़ाई, दस कहानियां, फायर, लिबास, कल्पवृक्ष, भावना, पार,अवतार, उमराव जान, एक ही भूल, साज़, हनीमून ट्रेवल्स, मटरू की बिजली का मंडोला, पतंग, द मोर्निंग रागा, 15 पार्क अवेन्यू, द मिडनाइट चिल्ड्रेन, द बंगाली नाईट, साइड स्ट्रीट्स आदि। व्यावसायिक दबाव में जिन कुछ बेमतलब की फिल्मों में उन्होंने ग्लैमरस भूमिकाएं की, उन्हें वे शायद ख़ुद भूल जाना चाहेंगी। शबाना आज़मी देश की ऐसी पहली अभिनेत्री हैं जिन्हें फिल्मों में अभिनय के लिए पांच राष्ट्रीय और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। अभिनय के अलावा स्त्रियों और बच्चों के अधिकारों और मानवीय समस्याओं के लिए लड़ने वाली एक योद्धा के रूप में भी उनका कम योगदान नहीं रहा है।

जन्मदिन (18 सितंबर) पर आपके लंबे, सृजनशील और यशस्वी जीवन के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं, शबाना ! #ShabanaAzmi:
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1488278874582039&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1

श्रेष्ठा की श्रेष्ठता

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Sunday, 17 September 2017

सबसे ज़्यादा घातक हथियार वाला USA जिम्मेदार है उत्तर कोरियाई बम के लिए ------ अजेय कुमार

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 15 September 2017

यह सादगी थी तब और आज ? ------ विजय राजबली माथुर

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बात शायद 1959  या 60  की रही होगी;अजय और मैं बाबू  जी के साथ  साईकिल से ६-सप्रू मार्ग भुआ के घर से लौट रहे थे.बर्लिंगटन होटल के पास पहुंचे ही थे की पता चला नेहरु जी आ रहे हैं.बाबू  जी ने प्रधान मंत्री को दिखाने के विचार से रुकने का निर्णय लिया जबकि घर के पास पहुच चुके थे.नेहरु जी खुली जीप में खड़े होकर जनता का अभिवादन करते और स्वीकार करते हुए ख़ुशी ख़ुशी अमौसी एअरपोर्ट से आ रहे थे.आज जब विधायकों,सांसदों तो क्या पार्षदों को भी शैडो के साए में चलते देखता हूँ तो लगता है कि नेहरु जी निडर हो कर जनता के बीच कैसे चलते थे ? जनता उन्हें क्यों चाहती थी ? हुसैनगंज चौराहे पर मेवा का स्वागत फाटक बनवाने वाले चौरसिया जी का भतीजा मेरे क्लास में पढता था.नेहरु जी की सवारी जा चुकी थी और जनता आराम से मेवा तोड़ कर ले जा रही थी कहीं कोई पुलिस का सिपाही नहीं था और फ़ोर्स भी तुरंत हट चूका था.यह था उस समय के शासक और जनता का रिश्ता.आज क्या वैसा संभव है?हुसैनगंज चौराहे पर ही मुहर्रम का जुलूस या गुड़ियों का मेला दिखाने भी बाबु जी ले जाते थे.इक्का-दुक्का सिपाही ही होते होंगे आज सा भारी पुलिस फ़ोर्स तब नज़र नहीं आता था.
विधान सभा पर २६ जनवरी को गवर्नर विश्वनाथ दास द्वारा ध्वजारोहण भी बाबू  जी ने साईकिल के कैरियर और गद्दी पर दोनों भाइयों को खड़ा करके आसानी से दिखा दिया था क्या आज वैसा संभव है? आज तो साईकिल देखते ही पुलिस टूट पड़ेगी.उस समय तो एक निजी विवाह समारोह में भी विधान सभा के लॉन में एक चाय पार्टी में बाबा जी के साथ शामिल होने का मौका मिला था.वह समारोह संभवतः राय उमानाथ बली के घर का था.आज तो उस छेत्र में दो लोग दो पल ठहर भी जाएँ तो तहलका मच जायेगा.यह है हमारे लोकतंत्र की मजबूती !

न्यू हैदराबाद से पहले तो मामा जी खन्ना विला में रहते थे जिसे स्व.वीरेन्द्र वर्मा ने किराए पर ले रखा था और मामा जी वर्मा जी के किरायेदार थे.वर्मा जी तब संसदीय सचिव थे और उनके पास रिक्शा में बैठ कर दो मंत्री चौ.चरण सिंह और चन्द्र भानु गुप्ता अक्सर आते रहते थे.तब यह सादगी थी और आज के मंत्री.......?




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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 10 September 2017

विचार विचारवान को खत्म कर देने पर बहुत तेजी से बढ़ कर लोक में समा जाता है ------ देवेंद्र सुरजन



Devendra Surjan
कल रात से रीढ़ में फिर से बहुत दर्द है लेकिन उससे ज़्यादा दर्द एक पोस्ट पढ़कर हुआ जिसमे लिखा है गौरी लंकेश का असली नाम पैट्रिक था और वो मूलतः ईसाई थी और उसे ईसाई धर्म प्रचार करने के लिए पैसे देते थे इसलिए उसने उनके लिए गौरी लंकेश पैट्रिक अखबार शुरू किया था. एक और बुद्धिजीवी ने लिखा है गौरी ने अपने नाम के आगे लंकेश रखा था इसी से पता चलता है कि उसकी मानसिकता क्या है. और एक अति विद्वान ने लिख मारा कि उसे दफनाया गया है फिर तो वो पक्की ईसाई है. भारत के कन्नड़ मूल के महान हिंदी नाटककार बी वी कारंत की किस्मत अच्छी थी कि समय रहते चले गए. 
गौरी के बारे में मैं कुछ नहीं लिखना चाहता क्योंकि सोशल मीडिया के पोस्ट पढ़कर लगता है कि भारत के हिंदी क्षेत्र में पिछले बीस पच्चीस सालों से पढाई बंद है. पढाई लिखाई पर पाबन्दी है. ऐसे में क्या लिखा जाय और क्यों? गौरी ईसाई समुदाय से नहीं बल्कि लिंगायत समुदाय से थी जो शिव को मानता है. लंकेश परिवार दावणगेरे में हर साल नन्दितावरी शिव मंदिर जाता है, हाल ही में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इस बारे में खबर छपी थी की इंद्रजीत (गौरी के भाई) ने मंदिर जाकर अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाया। 
वीरशैव या लिंगायत समुदाय वैदिक काल से ब्राह्मणों के हिन्दू धर्म पर कब्जे और कुरीतियों का विरोध करता आया है. वे मृतक को ध्यान मुद्रा में दफनाते हैं वे विश्वाश करते हैं "स्थरावक्कलीवुन्तु जङ्गमागक्कलीविल्ला" (मतलब जो स्थिर है वह मर जाता है और चलायमान ही जीता है) वे वैदिक काल की सभी कुरीतियों का विरोध करते हैं मसलन केवल ब्राह्मण ही वेद पढ़ें, स्त्रियां मंदिर में न जाएँ, ब्राह्मणों के अलावा कोई पूजा न करे वगैरा। ये लंकेश संभवतया लिंगेश का अपभ्रंश है क्योंकि वीरशैव इष्टलिंग को ही मानते हैं. वे शिव के उपासक हैं. क्या ये हिन्दू विरोध है? 
लंकेश (पैट्रिक)/पत्रिका गौरी ने नहीं उसके पिता पाल्यदा लंकेशप्पा ने 1980 में शुरू किया था. इस अखबार को निकालने से पहले गौरी के पिता ने कर्नाटक का चप्पा चप्पा छाना और दलितों, गरीबों की स्थिति पर अखबार को फोकस किया। यह अखबार गाँधी जी के "हरिजन" अख़बार की तरह आज भी कोई विज्ञापन नहीं लेता केवल सब्सक्रिप्शन पर ही चल रहा है. इसका सर्क्युलेशन लगभग 4.5 लाख है और पाठक संख्या लगभग 25 लाख.है.
सन 2000 में उनकी मौत के बाद गौरी ने इसका संपादन संभाला। उसके पिता एक सुप्रसिध्द लेखक थे जिन्होंने मूर्खता की पराकाष्ठा को पार करते हुए अंगरेजी साहित्य में मास्टर्स डिग्री हासिल की और बैंगलोर विश्विद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता शुरू कर (हाँ बिलकुल बैंगलोर के माध्यम से विज्ञापन, घूमने के लिए गाड़ी और सरकारी मकान लेने के लिए) दी. उन्होंने अपना गंवारपन जारी रखते हुए करीब दस नाटक लिखे, तीन उपन्यास, छै लघु-कथा संकलन जो कन्नड़ की लोक, संस्कृति और परम्पराओं पर आधारित थीं. और तो और 429 ईसा पूर्व के नाटक Oedipus Tyrannus या Oedipus Rex का रूपांतरण किया। उस मूढ़मति के चार काव्य संकलन भी हैं. और मरने के बाद पांच काव्य संकलन छपे. उसने अपनी मातृभूमि के प्लाट काट कर बेचने और कॉलोनी बनाकर बिल्डर बनने के बजाय कन्नड़ संस्कृति पर तीन फिल्मे भी बनाई। उस मूर्ख के उपन्यास बिरुकु (The Fissure) को पूरे भारत भर के बुद्धिजीवी, जो ईसाईयों और कॉंग्रेस के गुलाम हैं, ने सराहा। गौरी की एक और गलती थी कि उसकी एक बहिन जानी मानी फिल्मकार, गीतकार और पटकथा लेखक है. उसका नाम कविता लंकेश है और वो भी संभवतया रावण खानदान से ताल्लुक रखती है, उसने 1999 में एक फिल्म बनाई दीवारी जिसे, राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड मिले। उसने आर के नारायणन जैसे मूर्खों के उपन्यास मालगुडी पर भी फिल्म बनाई उसकी बच्चों पर बनी फिल्म बिम्बा को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उसने पांच फिल्मे बनाई जिसमे प्रीती प्रेम प्रणय को सर्वश्रेष्ठ क्षेत्रीय भाषा की फिल्म होने का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उस वक्त साहित्य प्रेमी आदरणीय अटल जी प्रधानमंत्री थे. 
जाहिर है उस वक्त ऐसी मूर्ख महिला फिल्मकारों की ज़्यादा छानबीन नहीं की गई होगी। पर अभी 2013 में उसकी फिल्म करिया कान बिट्टा को सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का अवार्ड मिल जाना आश्चर्य की बात है. और तो और ऐसे बिना पढ़े लिखे परिवार की सदस्य को ऑस्कर फिल्म चयन की ज्यूरी में रखा गया. वह कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय फिल्म फेस्टिवल की ज्यूरी में रहती थी. उसने महान नालायक तमिल लेखक जिन्होंने पता नहीं किस ईसाई से प्रेरणा लेकर अपना नाम रामास्वामी अय्यर कृष्णमूर्ति के बजाय विष्णु अवतार के नाम पर कल्कि रख लिया था, उनकी कथा पर एक संगीत-नाटक तनानम तनानम की पटकथा लिखी और निर्देशित भी किया। मूर्ख पिता की "राष्ट्रद्रोही" संतान बच्चों के लिए एक रिसोर्ट भी चलाती है जिसका नाम ग्रामीण कैम्प है. इसमें बच्चे कन्नड़ के पारम्परिक खेलों को सीखते और खेलते हैं. वह नालायक पता नहीं कैसे अँग्रेजी साहित्य में फर्स्ट क्लास एम् ए है और एडवरटाइजिंग में डिप्लोमा लेकर बैठी है. 
गौरी का एक भाई भी है इंद्रजीत है वह भी पत्रकार और फिल्मकार है. सुना है वह भी उतना ही बिना पढ़ा लिखा और नालायक है जितना परिवार के दूसरे सदस्य। वह कर्नाटक की तरफ से क्रिकेट भी खेल चुका है. वह एक खेल पत्रिका ऑल राउंडर निकालता था जिसका सर्क्युलेशन पांच लाख था. बाद में उसने अपने पिता की रावण लंकेश पत्रिका (पत्रिके) को ज्वाइन कर लिया। पर मूर्ख मूर्ख होते हैं उसे बाप की पत्रिका में सब एडिटर की पोस्ट पर क्यों आना चाहिए था. अब जाकर मैनेजिंग एडिटर बना है. उसने भी करीब सात फिल्मे बनाई जिनमे ऐश्वर्या को फिल्मफेयर अवार्ड मिला है. मैंने हाल ही में गलती से उसकी फिल्म Luv U Alia देखी है. 
गौरी ने गौरी लंकेश पत्रिका (पत्रिके) इसलिए शुरू किया क्योंकि उसका उसके भाई से झगड़ा शुरू हो गया था. सुना है दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई थी. चूँकि इंद्रजीत लंकेश पत्रिका (पत्रिके) का प्रकाशक था उसे गौरी के एक रिपोर्ट को छपने की अनुमति देने पर आपत्ति थी जिसमे उसने, इंद्रजीत के मुताबिक, नक्सलवाद का पक्षपात झलक रहा था. इंद्रजीत ने गौरी पर ऑफिस से कम्प्यूटर चुराने जैसे आरोप लगाए थे. दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस कर एक दूसरे के आरोपों का खंडन भी किया था. गौरी ने सीधे अपने पिता के अखबार से शुरुआत नहीं की वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया में थी बाद में प्रसिद्ध पत्रकार चिदानंद राजघट्टा (जिससे शादी और तलाक हुआ)** के साथ दिल्ली आ गई फिर बाद में दिल्ली से बैंगलोर आई और संडे मैगज़ीन में करीब नौ दस साल पत्रकार रही. गौरी ने ईनाडु टी वी में भी काम किया. जिस लिंगायत समुदाय से वह थी उसे वह opressed मानती थी और कहती थी हिन्दू धर्म में महिलाओं को दोयम दर्जा दिया गया है.
मैंने पिछले बीस सालों में लगभग 5000 stories लिखी हैं, कई लोग मुझसे कहते हैं कि बहुत सी रिपोर्ट भाजपा सरकार की तरफ हैं. लेकिन मैंने वही लिखा है जो देखा है और विश्वास किया है. इसकी सजा भी मुझे मिल रही है. लेकिन मैं किसी वामपंथी विचार धारा को अपना नहीं सकता भले ही वह कितनी भी तार्किक हो. न ही मैं जल्दबाजी में लिखे गए अर्थशास्त्र को अपना सकता. मैंने नोटबंदी या जी एस टी की कमियों को उजागर करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है. सरकार कोई भी हो. मुझे मालूम है और विश्वास है कि चाँद पर इंसान 1969 में तो जा ही नहीं जा सकता था क्योंकि टेक्नोलॉजी नहीं थी. अब नासा अगर कोई विचारधारा है तो जो मर्जी आये करे.
पत्रकार लेखक, कवि, साहित्यकार अपने में जीता है. वह अपने विचार किसी पर थोपता नहीं है. वह इस उम्मीद में लिखता है कि समाज की आगे की पंक्ति के लोग इसे पढ़ेंगे और कुछ सुधार करेंगे। उसके साथ समस्या यह होती है की वह अपने परिवेश में लगातार सुधार चाहता है और ये सुधार पचास दिनों में नहीं समय की गति से चाहता है. उसे ख़त्म कर देने पर वह बहुत तेजी से बढ़ता है और लोक में समा जाता है. फिर उसे नष्ट करना असंभव हो जाता है, राम, बुद्ध, कृष्ण, गांधी प्रचंड शक्तियों के नष्ट करने के प्रयासों के बाद लोक में समाते गए.अब वे हर घर में हैं. भले वह घर किसी भी धर्म को मानता हो. . एक अदनी सी गौरी अमर हो गई.

Schaschikkantte Trriviedy via Bhupendra Gupta Agam

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश