Wednesday, 15 March 2017

क्या उत्तर प्रदेश में कोई संरचनात्मक बदलाव हुआ है? ------ अनिल पदमनाभन

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पद्मनाभन  साहब की नज़र से तीन वर्षों में दो बार ऐसा होना उत्तर प्रदेश के मतदाताओं में संरचनात्मक बदलाव है। क्योंकि देश की जनसंख्या में नौजवानों की आबादी काफी ज़्यादा हो गई है और वह युवा आबादी किसी परंपरा में आसानी से नहीं बंधती।यह स्थिति इन मतदाताओं को अपनी पहचान से परे जाकर अपनी प्राथमिकताए तय करने की राह दिखाती है। 

परंतु मुझे जो जानकारी 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद आज से तीन वर्ष पहले हासिल हुई थी उसके अनुसार प्राथमिकताओं में बदलाव की यह प्रक्रिया 2011 / 12 में शुरू की गई थी। व्हाईट हाउस में तब के प्रेसीडेंट बराक हुसैन ओबामा साहब ने विश्व भर के दलित-पिछड़ों की एक बैठक की थी जिसमें भारत से गए लोगों में लखनऊ विश्वविद्यालय के एक तत्कालीन  हिन्दी अध्यापक भी शामिल हुये थे। उस बैठक में ही यह तय हुआ था कि विश्व भर से किस प्रकार मुस्लिमों  का सत्ता में अस्तित्व समाप्त करना है।उसी योजना के तहत कारपोरेट समर्थक 'भ्रष्टाचार आंदोलन' चलवाया गया था और  उसी योजना का यह परिणाम था कि, 2014 के लोकसभा चुनावों में दलित वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को पड़ा था और लोकसभा में बसपा 'शून्य ' हो गई थी। 2017 का यू पी चुनाव परिणाम उसी व्यवस्था का विस्तार है जिसने दलित वर्ग के साथ - साथ पिछड़े वर्ग का भी वोट बसपा / सपा के बजाए भाजपा को पड़ा है। चुनाव विश्लेषणों से सिद्ध है कि, यू पी विधानसभा में इस बार अगड़े अर्थात सवर्ण वर्ग के विधायक अधिक चुने गए हैं। दलित, पिछड़ा और मुस्लिम प्रतिनिधित्व काफी कम हुआ है। 

आज ईस्ट इंडिया कंपनी सरीखा 'साम्राज्यवाद ' स्थापित करना संभव नहीं है। अतः कारपोरेट कंपनियों द्वारा नियंत्रित तथाकथित राष्ट्रवाद अर्थात अप्रयक्ष साम्राज्यवाद स्थापित किया जा रहा है जो कि, जनतंत्र की समाप्ती एवं अधिनायकतंत्र के आगमन का संकेत प्रस्तुत करता है। 
(विजय राजबली माथुर ) 
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Sunday, 12 March 2017

मरणासन्न भाजपा को संजीवनी देने का काम भी मायावती ने ही किया था ------ कँवल भारती

Kanwal Bharti
मायावती की हार के कारण 

(कँवल भारती)

मायावती की यह आखिरी पारी थी, जिसमें उनकी शर्मनाक हार हुई है. 19 सीटों पर सिमट कर उन्होंने अपनी पार्टी का अस्तित्व तो बचा लिया है, परन्तु अब उनका खेल खत्म ही समझो. मायावती ने अपनी यह स्थिति अपने आप पैदा की है. मुसलमानों को सौ टिकट देकर एक तरह से उन्होंने भाजपा की झोली में ही सौ सीटें डाल दी थीं. रही-सही कसर उन्होंने चुनाव रैलियों में पूरी कर दी, जिनमें उनका सारा फोकस मुसलमानों को ही अपनी ओर मोड़ने में लगा रहा था. उन्होंने जनहित के किसी मुद्दे पर कभी कोई फोकस नहीं किया. तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह आज तक जननेता नहीं बन सकीं. आज भी वह लिखा हुआ भाषण ही पढ़ती हैं. जनता से सीधे संवाद करने का जो जरूरी गुण एक नेता में होना चाहिए, वह उनमें नहीं है. हारने के बाद भी उन्होंने अपनी कमियां नहीं देखीं, बल्कि अपनी हार का ठीकरा वोटिंग मशीन पर फोड़ दिया. ऐसी नेता को क्या समझाया जाय! अगर वोटिंग मशीन पर उनके आरोप को मान भी लिया जाए, तो उनकी 19 सीटें कैसे आ गयीं, और सपा-कांग्रेस को 54 सीटें कैसे मिल गयीं? अपनी नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना आसान है, पर अपनी कमियों को पहिचानना उतना ही मुश्किल. 
अब इसे क्या कहा जाए कि वह केवल टिकट बांटने की रणनीति को ही सोशल इंजिनियरिंग कहती हैं. यह कितनी हास्यास्पद व्याख्या है सोशल इंजिनियरिंग की. उनके दिमाग से यह फितूर अभी तक नहीं निकला है कि 2007 के चुनाव में इसी सोशल इंजिनियरिंग ने उन्हें बहुमत दिलाया था. जबकि वास्तविकता यह थी कि उस समय कांग्रेस और भाजपा के हाशिए पर चले जाने के कारण सवर्ण वर्ग को सत्ता में आने के लिए किसी क्षेत्रीय दल के सहारे की जरूरत थी, और यह सहारा उसे बसपा में दिखाई दिया था. यह शुद्ध राजनीतिक अवसरवादिता थी, सोशल इंजिनियरिंग नहीं थी. अब जब भाजपा हाशिए से बाहर आ गयी है और 2014 में शानदार तरीके से उसकी केन्द्र में वापसी हो गयी है, तो सवर्ण वर्ग को किसी अन्य सहारे की जरूरत नहीं रह गयी, बल्कि कांग्रेस का सवर्ण वोट भी भाजपा में शामिल हो गया. लेकिन मायावती हैं कि अभी तक तथाकथित सोशल इंजिनियरिंग की ही गफलत में जी रही हैं, जबकि सच्चाई यह भी है कि मरणासन्न भाजपा को संजीवनी देने का काम भी मायावती ने ही किया था. उसी 2007 की सोशल इंजिनियरिंग की बसपा सरकार में भाजपा ने अपनी संभावनाओं का आधार मजबूत किया था.
मुझे तो यह विडम्बना ही लगती है कि जो बहुजन राजनीति कभी खड़ी ही नहीं हुई, कांशीराम और मायावती को उसका नायक बताया जाता है. केवल बहुजन नाम रख देने से बहुजन राजनीति नहीं हो जाती. उत्तर भारत में बहुजन आंदोलन और वैचारिकी का जो उद्भव और विकास साठ और सत्तर के दशक में हुआ था, उसे राजनीति में रिपब्लिकन पार्टी ने आगे बढ़ाया था. उससे कांग्रेस इतनी भयभीत हो गयी थी कि उसने अपनी शातिर चालों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और वह खत्म हो गयी. उसके बाद कांशीराम आये, जिन्होंने बहुजन के नाम पर जाति की राजनीति का माडल खड़ा किया. वह डा. आंबेडकर की उस चेतावनी को भूल गए कि जाति के आधार पर कोई भी निर्माण ज्यादा दिनों तक टिका नहीं रह सकता. बसपा की राजनीति कभी भी बहुजन की राजनीति नहीं रही. बहुजन की राजनीति के केन्द्र में शोषित समाज होता है, उसकी सामाजिक और आर्थिक नीतियां समाजवादी होती हैं, पर, मायावती ने अपने तीनों शासन काल में सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयों को बेचा और निजी इकाइयों को प्रोत्साहित किया. उत्पीडन के मुद्दों पर कभी कोई आन्दोलन नहीं चलाया, यहाँ तक कि रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार और जिग्नेश कुमार के प्रकरण में भी पूरी उपेक्षा बरती, जबकि ये ऐसे मुद्दे थे, जो उत्तर प्रदेश में बहुजन वैचारिकी को मजबूत कर सकते थे. 
इन चुनावों में मायावती को मुसलमानों पर भरोसा था, पर मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया, जिसका कारण भाजपा के साथ उनके तीन-तीन गठबंधनों का अतीत है. उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मात्र 4 और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मात्र 2 सीटें मिली हैं, जिसका मतलब है कि उनके जाटव वोट में भी सेंध लगी है. मायावती की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह जमीन की राजनीति से दूर रहती हैं. न वह जमीन से जुड़ती हैं और न उनकी पार्टी में जमीनी नेता हैं. एक सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन का कोई मंच भी उन्होंने अपनी पार्टी के साथ नहीं बनाया है. यह इसी का परिणाम है कि वह बहुजन समाज के हिन्दूकरण को नहीं रोक सकीं. इसी हिन्दूकरण ने लोकसभा में उनका सफाया किया और यही हिन्दूकरण उनकी वर्तमान हार का भी बड़ा कारण है. 
मायावती की इससे भी बड़ी कमी यह है कि वह नेतृत्व नहीं उभारतीं. हाशिए के लोगों की राजनीतिक भागीदारी जरूरी है, पर उससे ज्यादा जरूरी है उनमें नेतृत्व पैदा करना, जो वह नहीं करतीं. इसलिए उनके पास एक भी स्टार नेता नहीं है. इस मामले में वह सपा से भी फिसड्डी हैं.
मायावती के भक्तों को यह बात बुरी लग सकती है, पर मैं जरूर कहूँगा कि अगर उन्होंने नयी लीडरशिप पैदा नहीं की, वर्गीय बहुजन राजनीति का माडल खड़ा नहीं किया और देश के प्रखर बहुजन बुद्धिजीवियों और आन्दोलन से जुड़े लोगों से संवाद कायम करके उनको अपने साथ नहीं लिया, तो वे 11 मार्च 2017 की तारीख को बसपा के अंत के रूप में अपनी डायरी में दर्ज कर लें.
(11 मार्च 2017)

https://www.facebook.com/kanwal.bharti/posts/10202653799143390

ईवीएम मैनैज कर चुनाव में धांधली हुई ------ मायावती, पूर्व मुख्यमंत्री

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http://www.rediff.com/news/report/up-election-alleging-evm-tampering-mayawati-calls-for-fresh-polls/20170311.htm





http://www.nationaldastak.com/story/view/opinion-on-up-election-result



उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती जी ने स्पष्ट कहा है कि, EVM मशीनों को मैनैज किया गया है और केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को यू पी में बहुमत दिलवाया गया है। जैसी की उम्मीद थी चुनाव आयोग ने इन आरोपों को गलत बताया है। चुनावों में पीठासीन अधिकारी रहे लोगों ने EVM मशीनों से छेड़ - छाड़ किए जाने से इंकार किया है। अति जोशीले लोग मायावती जी के ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर रहे हैं। 
1991  सांप्रदायिक दंगों मे जिस प्रकार सरकारी मशीनरी ने एक सांप्रदायिकता का पक्ष लिया है उससे अब संघ की दक्षिण पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित होने का भय व्याप्त हो गया है। 1977 के सूचना व प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी ने आकाशवाणी व दूर दर्शन मे संघ की कैसी घुसपैठ की है उसका हृदय विदारक उल्लेख सांसद पत्रकार संतोष भारतीय ने वी पी सरकार के पतन के संदर्भ मे किया है। आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया उस  घटना को भुला दिया गया है। 
आगरा पूर्वी  ( वर्तमान उत्तरी ) विधान सभा क्षेत्र मे 1985 में मतगणना क्लर्क कालरा ने हाथ का पंजा मोहर लगे मत पत्रों को ऊपर व नीचे गड्डी में कमल मोहर लगे मत पत्रों के बीच छिपा कर गणना करके भाजपा प्रत्याशी सत्यप्रकाश विकल को विजयी घोषित करवा दिया था। पराजित कांग्रेस प्रत्याशी सतीश चंद्र गुप्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने अपनी निगरानी में पुनः मत गणना करवाई और गलती पकड़ने पर भाजपा के सत्य प्रकाश विकल का चुनाव रद्द करके कांग्रेस के सतीश चंद्र गुप्ता को विजयी घोषित कर दिया था। 2014 के लोकसभा चुनावों में बनारस में EVM हेरा फेरी का मामला प्रकाश में आया था किन्तु भाजपा के केंद्र में सरकार बना लेने के बाद मामला दब गया था। अतः सभी राजनीतिक दलों को मायावती जी का सहयोग व समर्थन करना चाहिए।

लेकिन यह भी बिलकुल सच है कि, कांशीराम - मुलायम समझौते के बाद सत्तारूढ़ 'सपा - बसपा गठबंधन' की सरकार को मायावती जी ने भाजपा के सहयोग से तोड़ कर और भाजपा के ही समर्थन से खुद मुख्यमंत्री पद ग्रहण किया था। दो बार और भाजपा के ही समर्थन से सरकार बनाई थी तथा गुजरात चुनावों में मोदी के लिए अटल जी के साथ चुनाव प्रचार भी किया था। भाजपा की नीति व नीयत साफ थी कि, मायावती जी के जरिये मुलायम सिंह जी व सपा को खत्म कर दिया जाये और बाद में मायावती जी व बसपा को यह सब जानते हुये भी मायावती जी भाजपा की सहयोगी रहीं थीं। यदि वह 'सपा - बसपा गठबंधन' मायावती जी ने भाजपा के फायदे के लिए न तोड़ा होता तो आज 2017 में भाजपा द्वारा न तो सपा को और न ही बसपा को हानी पहुंचाने का अवसर मिलता वह केंद्र की सत्ता तक पहुँच ही न पाती। 

Saturday, 11 March 2017

एवीएम में गड़बड़ी दब गयी और भाजपा जीत गई ------ डॉ. मनीषा बांगर

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उत्तर प्रदेश में चुनाव और ईवीएम की गड़बड़ी
Created By : डॉ. मनीषा बांगर Date : 2017-03-11 Time : 16:07:13 PM 

उत्तर प्रदेश में चुनाव और ईवीएम की गड़बड़ी
एवीएम मशीन में गड़बड़ी पहले भी साबित हुई थी और इस चुनाव में भी हुआ| पहले भी कुछ लोगों ने हारने से अद्लातों में EVM मशीन में गड़बड़ी की शिकायत की थी और वे सफल भी हुए| राजनितिक पार्टियों ने कोई रूचि नहीं दिखाई| पिचाले पांच वर्षों में सुरक्षित चुनाव क्षेत्रों से चुनकर आने वाले 84 विधायकों ने उत्तर प्रदेश में कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं किया|


सपा की बेवकूफी का फायदा लेना चाहते थे बीएसपी के लोग| कांग्रेस ने सत्ता भाजपा को सौंपने के बाद सिर्फ दिखावे के लडती है| ये तीनो कारण – एवीएम मशीन की गड़बड़ी पर चुप्पी, विधान सभा में प्रतिनिधित्व नहीं करना, सपा की नाकामियों के बदले मुफ्त में जनता से वोट लेना – ने बौद्धिक गुलामी और कर्म-विहीनता की हदे पार कर दी हैं | मनुवाद विजयी हो गया और हम उसे गलियां देते रहे।


नोटबंदी, बेरोजगारी, महंगाई, उत्पीडन, गरीबी, भ्रष्टाचार, आदि से बुद्धिजीवी और मुर्ख दोनों परेशान हैं और अपनी परेशानी को दूर करने का जो रास्ता चुना वह उत्तर प्रदेश के चुनाव में दिख गया| मानिये या मत मानिये लेकिन सच यह यह है कि मनुवाद ने हमें जकड़ लिया है और हम जिस मूर्खता के साथ अपने राजनितिक प्रतिनिधित्व का जिम्मा देते हैं उसका परिणाम हमारे सामने है| डॉ. आम्बेडकर ने हमें शिक्षित होने के लिए कहा था और हमारी राजनितिक शिक्षा का परिणाम 2014 और 2017 के चुनाव में दिख गया| 


मैं सभी लोगों से निवेदन करती हूँ गुलामी से बहार निकलने के लिए जो रास्ता चुना है उसपर पुनर्विचार करें| समय, समाज और विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है और हम पीछे जा रहे हैं| दोष मूर्खों का नहीं है बल्कि उनका है जो बुद्धिमान और नेता हैं| समाज के बुद्धिमान और नेता अगर पुनर्विचार करें और अपनी गलतियों को सुधार लें तो मामला संभल सकता है |


इस कदम में बजट और आर्थिक विकास के मुद्दे पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के अंतर्गत चुने हुए जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाना और उसका समाधान निकलना| अगर संविधान की इस गरिमा का हमने सम्मान नहीं किया तो वह सब कुछ होगा जो पहले कभी नहीं हुआ और हम उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार में अभी तक जो हुआ है उससे आंकलन लगा सकते हैं – सरकारी नौकरी गयी, बजट में आबंटित पैसा गया, साधन-संपत्ति में हिस्सा गया, अदालतों के निर्णय का सम्मान गया, लोक सभा और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व गया, शिक्षा और स्वास्थ्य के निजीकरण में हमारी शिक्षा और स्वास्थ्य गया | 

 मीडिया ने पिछले दिनों मनुवाद के पक्ष में जो हवा बनाई उसके बाद एवीएम में गड़बड़ी दब गयी और भाजपा जीत गई | वही कहानी दोबारा हुई और हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहे |



साभार : 
http://www.nationaldastak.com/story/view/opinion-on-up-election-result



हालांकि अब उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर और बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती जी ने भी EVM मशीनों से छेड़ - छाड़ की संभावना व्यक्त की है। 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान बनारस में ऐसी ही कारवाई का ज़िक्र खूब हुआ था किन्तु केंद्र में भाजपा की सरकार बन जाने से हुआ कुछ भी नहीं। अब भी इन संभावनाओं और आरोपों पर कुछ भी नहीं होने जा रहा है।
वस्तुतः ऐसी छेड़ - छाड़ हुई अथवा नहीं प्रामाणिक रूप से सिद्ध किया जाना मुश्किल ही है। परंतु यह तो तय है कि, अखिलेश जी ने जो लेपटाप छात्रों को पढ़ने के लिए दिये थे वे गरीब छात्रों ने बेच दिये थे जिनको भाजपा के लोगों ने खरीद लिया था और उनके जरिये सोशल मीडिया पर सपा व अखिलेश जी के ही विरुद्ध धुआ धार प्रचार किया गया था। उनकी सरकार ने जिन कारपोरेट कंपनियों में बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलवाया था उन युवाओं का प्रयोग कारपोरेट कंपनियों ने भाजपा के प्रचार मे जम कर किया था। 
वैसे मायावती जी के आरोप की पुष्टि  नेशनल दस्तक के  इस वीडियो के जरिये तो होती है। लेकिन क्या चुनाव आयोग और अदालतें इसे मानेंगी?
(विजय राजबली माथुर )
   https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1361124220616217

Wednesday, 1 March 2017

'इज्जत' के झूठे दिलासे दरअसल गुलामी की जंजीरें हैं... ------ Bindu Bikash Ojha

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Bindu Bikash Ojha
आज दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की ने कहा- 'घर वाले कहते हैं कि अब कॉलेज-वॉलेज छोड़ो... वे अपनी पसंदीदा टीवी चैनल [पर पसरे आतंक और हंगामे को] देख कर यह फरमान सुनाते हैं..।' इसके आगे शायद उसकी आवाज घुट कर रह गई..। वह शायद यह कहना चाहती थी कि कितनी-कितनी जद्दोजहद के बाद घर की चारदिवारी के बाहर निकल सकने और कॉलेज के जरिए अपना आसमान तलाशने का... अपने भरोसे खड़ा हो सकने का... अपनी तरह से जीने की उम्मीद पालने का मौका मिल सका है... अब शायद वह छिन जाएगा..।

यह दिल्ली में रहने वाले एक परिवार की लड़की का दर्द है...। इस परिवार के दिमाग पर टीवी है, और टीवी में एबीवीपी का आतंक है... उसकी गुंडागर्दी है... थोड़ा बोलने वाली लड़की को दी जाने वाली बलात्कार की धमकी है... बाल पकड़ कर घसीटी जाती लड़कियां हैं... लड़कियों को अपने पैंट खोल कर यौनांग दिखाते स्टूडेंट्स के नाम पर कुछ गुंडे-लुच्चे-लफंगे हैं... और इन सबके बीच अपनी बेटी की फिक्र है...।

इस फिक्र में पता नहीं कितने-कितने पहलू छिपे हैं..। यह फिक्र है कि सत्ता है... यह लड़की के आखिरी हश्र पर तय होगा...। 

जेएनयू में चारों तरफ कंडोम बिखरे पड़े हैं... डीयू में लड़कियों को बलात्कार की धमकी है... सभी कॉलेज में लड़़कियों के 'चरित्र' पर... 'इज्जत' पर आंच है... इसलिए लड़कियों को कॉलेज में नहीं जाना चाहिए...। परिवार की औकात है तो पांच-दस लाख खर्च करके प्राइवेट कॉलेजों में जाइए या फिर बकौल मोहन भागवत तसल्ली से रसोई के काम में कारीगरी हासिल कीजिए...।

इस आईने में दिल्ली से बाहर के राज्यों, जिलों, कस्बों में मौजूद परिवारों के बारे में सोचिए कि वहां बजरिए टीवी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों को लेकर कौन-सी छवि बन रही होगी... और उन घरों की दहलीज से निकल कर कॉलेज के जरिए नए सपने देखना लड़कियों के लिए कितना मुश्किल हुआ होगा..। 

तो क्या एजेंडा यही है कि पिछले बीस-तीस सालों के दौरान लड़कियों ने... और दलित-वंचित जातियों के बच्चों ने कॉलेजों-विश्वविद्यालयों के जरिए जो थोड़ा सिर उठा कर चलने के सपने देखना शुरू किया था, उन्हें वापस अपनी हैसियत पर लौटा देना है...?


नहीं लड़की... बदनामी अगर बदनामी ही है... तो इस बदनामी की कोई भी जोखिम उठा लेना... लेकिन घर की दहलीज के भीतर मत लौटना...। चारदिवारियों में कैद 'इज्जत' के झूठे दिलासे दरअसल गुलामी की जंजीरें हैं... जो जिंदगी के... जीने के हर ख्वाब छीन लेती हैं...।
https://www.facebook.com/bindubikash.ojah/posts/790366574445726?comment_id=790499701099080&comment_tracking=%7B%22tn%22%3A%22R2%22%7D

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Tuesday, 28 February 2017

गुरमेहर ने युद्ध और नफरत की राजनीति पर सोचने को मजबूर किया ------ Girish Malviya

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Girish Malviya
गुरमेहर ने युद्ध और नफरत की राजनीति पर सोचने को मजबूर किया। शहीद की बेटी के वीडियो में कही गई बात एक बार पढ़ने से समझ में न आए, तो बार-बार पढ़िए।-

मैं भारत के जालंधर शहर की रहने वाली हूं.
ये मेरे पिता कैप्टन मनदीप सिंह हैं.
वो 1999 के कारगिल युद्ध में मारे गए थे.
मैं दो साल की थी, जब उनका निधन हुआ.
उनसे जुड़ी बहुत कम यादें हैं मेरे पास.
पिता नहीं होते तो कैसा महसूस होता है, इसकी ज़्यादा यादें हैं मेरे पास.
मुझे याद है कि मैं पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से कितना नफ़रत करती थी, क्योंकि उन्होंने मेरे पिता को मारा था.
मैं मुसलमानों से भी नफ़रत करती थी, क्योंकि मैं सोचती थी कि सभी मुस्लिम पाकिस्तानी होते हैं.
जब मैं छह साल की थी तो बुर्का पहनी एक महिला को चाकू मारने की कोशिश भी की.
किसी अनजान वजह से मुझे लगा कि उसने मेरे पिता को मारा होगा.
मेरी मां ने मुझे रोका और समझाया कि.
पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा, बल्कि जंग ने मारा है.
वक़्त लगा लेकिन आज मैं अपनी नफ़रत को ख़त्म करने में कामयाब रही.
ये आसान नहीं था लेकिन मुश्किल भी नहीं था.
अगर मैं ऐसा कर सकती हूं तो आप भी कर सकती हैं.
आज मैं भी अपने पिता की तरह सैनिक बन गई हूं.
मैं भारत-पाकिस्तान के बीच अमन के लिए लड़ रही हूं.
क्योंकि अगर हमारे बीच कोई जंग ना होती, तो मेरे पिता आज ज़िंदा होते.
मैंने ये वीडियो इसलिए बनाया ताकि दोनों तरफ़ की सरकारें दिखावा करना बंद करें.
और समस्या का समाधान दें.
अगर फ़्रांस और जर्मनी दो विश्व युद्ध के बाद दोस्त बन सकते हैं.
जापान और अमरीका अतीत को पीछे छोड़ आगे देख सकते हैं.
तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
ज़्यादातर भारत और पाकिस्तानी शांति चाहते हैं, जंग नहीं.
मैं दोनों देशों के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रही हूं.
हम तीसरे दर्जे के नेतृत्व के साथ पहले दर्जे का मुल्क़ नहीं बन सकते.
प्लीज़ तैयार हो जाइए. एक-दूसरे से बातचीत कीजिए और काम पूरा कीजिए.
स्टेट प्रायोजित आतंकवाद बहुत हो चुका.
स्टेट प्रायोजित जासूस बहुत हुए.
स्टेट प्रायोजित नफ़रत बहुत हुई.
सरहद के दोनों तरफ़ कई लोग मारे जा चुके हैं.
बस, बहुत हुआ.
मैं ऐसी दुनिया चाहती हूं, जहां कोई गुरमेहर कौर ना हो, जिसे अपने पिता की याद सताती हो.
मैं अकेली नहीं. मेरे जैसे कई हैं.

एक भाई की वाल पर मिला अभी अभी
https://www.facebook.com/girish.malviya.16/posts/1433656299999347?comment_id=1433747266656917&comment_tracking=%7B%22tn%22%3A%22R2%22%7D




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 25 February 2017

स्वामी सहजानंद सरस्वती ------ राम कृष्ण

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राम कृष्ण .
स्वामी सहजानंद सरस्वती
पूरा नाम स्वामी सहजानंद सरस्वती
जन्म 22 फ़रवरी 1889
जन्म भूमि ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 25 जून, 1950
मृत्यु स्थान पटना, बिहार
अभिभावक पिता- बेनी राय
गुरु आदि शंकराचार्य
मुख्य रचनाएँ भूमिहार-ब्राह्मण परिचय, कर्मकलाप आदि
प्रसिद्धि समाज-सुधारक, क्रान्तिकारी, किसान-नेता
विशेष योगदान भारत में किसान आंदोलन शुरू करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को ही जाता है।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी ब्राह्मणों की एकता और संस्कृत शिक्षा के प्रचार पर उनका ज़ोर रहा। सिमरी में रहते हुए सनातन धर्म के जन्म से मरण तक के संस्कारों पर आधारित 'कर्मकलाप' नामक 1200 पृष्ठों के विशाल ग्रंथ की हिन्दी में रचना की।
स्वामी सहजानन्द सरस्वती (जन्म:22 फ़रवरी 1889 ग़ाज़ीपुर - मृत्यु:25 जून, 1950 पटना) भारत के राष्ट्रवादी नेता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। स्वामी जी भारत में 'किसान आन्दोलन' के जनक थे। वे आदि शंकराचार्य सम्प्रदाय के 'दसनामी सन्न्यासी' अखाड़े के दण्डी सन्न्यासी थे। वे एक बुद्धिजीवी, लेखक, समाज-सुधारक, क्रान्तिकारी, इतिहासकार एवं किसान-नेता थे।

आरंभिक जीवन
ऐसे महान सन्न्यासी, युगद्रष्टा और जननायक का जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले के देवा गांव में महाशिवरात्रि के दिन सन् 1889 ई. में हुआ था। स्वामीजी के बचपन का नाम नौरंग राय था। उनके पिता बेनी राय सामान्य किसान थे। बचपन में हीं मां का साया उठ गया। लालन-पालन चाची ने किया। जलालाबाद के मदरसे में आरंभिक शिक्षा हुई। मेधावी नौरंग राय ने मिडिल परीक्षा में पूरे उत्तर प्रदेश में छठा स्थान प्राप्त किया। सरकार ने छात्रवृत्ति दी। पढ़ाई के दौरान ही उनका मन अध्यात्म में रमने लगा। घरवालों ने बच्चे की स्थिति भांप कर शादी करा दी। संयोग ऐसा रहा कि पत्नी एक साल बाद ही चल बसीं। परिजनों ने दूसरी शादी की बात निकाली तो वे भाग कर काशी चले गये।
काशी प्रवास
वहाँ शंकराचार्य की परंपरा के स्वामी अच्युतानन्द से दीक्षा लेकर सन्न्यासी बन गये। बाद के दो वर्ष उन्होंने तीर्थों के भ्रमण और गुरु की खोज में बिताया। 1909 में पुनः काशी पहुंचकर दंडी स्वामी अद्वैतानन्द से दीक्षा ग्रहणकर दण्ड प्राप्त किया और दण्डी स्वामी सहजानंद सरस्वती बने। इसी दौरान उन्हें काशी में समाज की एक और कड़वी सच्चाई से सामना हुआ। दरअसल काशी के कुछ पंड़ितों ने उनके सन्न्यास पर सवाल उठा दिया। उनका कहना था कि ब्राह्मणेतर जातियों को दण्ड धारण करने का अधिकार नहीं है। स्वामी सहजानंद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और विभिन्न मंचों पर शास्त्रार्थ कर ये प्रमाणित किया कि भूमिहार भी ब्राह्मण ही हैं और हर योग्य व्यक्ति सन्न्यास ग्रहण करने की पात्रता रखता है। काफ़ी शोध के बाद उन्होंने भूमिहार-ब्राह्मण परिचय नामक ग्रंथ लिखा जो आगे चलकर ब्रह्मर्षि वंश विस्तर के नाम से सामने आया। इसके ज़रिये उन्होंने अपनी धारणा को सैद्धांतिक जामा पहनाया। सन्न्यास के तदुपरांत उन्होंने काशी और दरभंगा में कई वर्षो तक संस्कृत साहित्य, व्याकरण, न्याय और मीमांसा का गहन अध्ययन किया। साथ-साथ देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों के अध्ययन भी करते रहे।
स्वामी सहजानंद के समग्र जीवन पर नजर डालें तो मोटे तौर पर उसे तीन खंडों में बांटा जा सकता है। पहला खंड है जब वे सन्न्यास धारण करते हैं, काशी में रहते हुए धार्मिक कुरीतियों और बाह्यडम्बरों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते हैं। निज जाति गौरव को प्रतिष्ठापित करने के लिए भूमिहार ब्राह्मण महासभा के आयोजनों में शामिल होते हैं। उनका ये क्रम सन् 1909 से लेकर 1920 तक चलता है। इस दौरान काशी के अलावा उनका कार्यक्षेत्र बक्सर ज़िले का डुमरी, सिमरी और ग़ाज़ीपुर का विश्वम्भरपुर गांव रहता है। काशी से उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण नामक पत्र भी निकाला।
किसान आन्दोलन
महात्मा गांधी ने चंपारण के किसानों को अंग्रेज़ी शोषण से बचाने के लिए आंदोलन छेड़ा था, लेकिन किसानों को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित कर प्रभावी आंदोलन खड़ा करने का काम स्वामी सहजानंद ने ही किया। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में किसान आंदोलन शुरू करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को ही जाता है। एक ऐसा दंडी सन्न्यासी जिसे भगवान का दर्शन भूखे, अधनंगे किसानों की झोपड़ी में होता है, जो परंपारनुपोषित सन्न्यास धर्म का पालन करने की बजाय युगधर्म की पुकार सुन भारत माता को ग़ुलामी से मुक्त कराने के संघर्ष में कूद पड़ता है, लेकिन अन्न उत्पादकों की दशा देख अंग्रेज़ी सत्ता के भूरे दलालों अर्थात देसी ज़मींदारों के ख़िलाफ़ भी संघर्ष का सूत्रपात करता है। एक ऐसा सन्न्यासी, जिसने रोटी को ही भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया।
कांग्रेस से जुड़ाव
स्वामीजी के जीवन का दूसरा अध्याय तब शुरू होता है, जब 5 दिसम्बर 1920 को पटना में कांग्रेस नेता मौलाना मजहरुल हक के आवास पर महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात होती है। गांधीजी के अनुरोध पर वे कांग्रेस में शामिल होते हैं। साल के भीतर हीं वे ग़ाज़ीपुर ज़िला कांग्रेस का अध्यक्ष चुने गये और कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में शामिल हुए। अगले साल उनकी गिरफ्तारी और एक साल की कैद हुई। जेल से रिहा होने के बाद बक्सर के सिमरी और आसपास के गांवों में बड़े पैमाने पर चरखे से खादी वस्त्र का उत्पादन कराया। ब्राह्मणों की एकता और संस्कृत शिक्षा के प्रचार पर उनका ज़ोर रहा। सिमरी में रहते हुए सनातन धर्म के जन्म से मरण तक के संस्कारों पर आधारित 'कर्मकलाप' नामक 1200 पृष्ठों के विशाल ग्रंथ की हिन्दी में रचना की। काशी से कर्मकलाप का प्रकाशन किया।
किसान संगठन
महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन जब बिहार में गति पकड़ा तो सहजानंद उसके केन्द्र में थे। घूम-घूमकर उन्होंने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ लोगों को खड़ा किया। इसी दौरान स्वामी जी को लगा कि बिहार के गांवों में ग़रीब लोग अंग्रेज़ों से नहीं वरन् गोरी सत्ता के इन भूरे दलालों से आतंकित हैं। किसानों की हालत ग़ुलामों से भी बदतर है। युवा सन्न्यासी का मन एक बार फिर से नये संघर्ष की ओर उन्मुख हुआ। वे किसानों को लामबंद करने की मुहिम में जुट गये। 17 नवंबर, 1928 को सोनपुर में उन्हें बिहार प्रांतीय किसान सभा का अध्यक्ष चुना गया। इस मंच से उन्होंने किसानों की कारुणिक स्थिति को उठाया। एक साथ जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने और ज़मीन पर रैयतों का मालिकाना हक दिलाने की मुहिम शुरू की। अप्रैल, 1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में 'अखिल भारतीय किसान सभा' की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद सरस्वती को उसका पहला अध्यक्ष चुना गया। स्वामी सहजानंद ने नारा दिया था-
"जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो क़ानून बनायेगा
ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा।"
कारावास के दौरान
कांग्रेस में रहते हुए स्वामीजी ने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त कराने का अभियान जारी रखा। उनकी बढ़ती सक्रियता से घबड़ाकर अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल में डाल दिया। कारावास के दौरान गांधीजी के कांग्रेसी चेलों की सुविधाभोगी प्रवृति को देखकर स्वामीजी हैरान रह गये। कांग्रेस के नेता कारावास के दौरान सुविधा हासिल करने के लिए छल-प्रपंच का सहारा ले रहे थे। स्वभाव से हीं विद्रोही स्वामीजी का कांग्रेस से मोहभंग होना शुरू हो गया। इस दौरान एक और घटना हुई। 1934 में जब बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तब स्वामीजी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के काम में भाग लिया।लेकिन किसानों जमींदारों के अत्याचार से पीड़ित थे। जमींदारों के लठैत किसानों को टैक्स भरने के लिए प्रताड़ित कर रहे थे। पटना में कैंप कर रहे महात्मा गांधी से मिलकर स्वामीजी ने ये हाल सुनाया। कहते हैं कि गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने के लिए स्वामीजी को कहा। ऐसा सुनना था कि स्वामी सहजानंद गुस्से में लाल हो गये और चले गये। जाते-जाते उन्होंने गांधीजी को कह दिया कि अब आपका और मेरा रास्ता अलग-अलग है। स्वामीजी का मानना था कि जो राजे-रजवाड़े और जमींदार अंग्रेजों की सरपरस्ती कर रहे हैं, उनसे किसानों का भला नहीं हो सकता है। चाहे वो दरभंगा महाराज ही क्यों न हो। इसी प्रकरण के बाद सहजानंद ने कांग्रेस में अपनी सक्रियता कम कर दी और किसान सभा के कार्य में मन-प्राण से जुट गये।
ज़मींदारी विरोधी आंदोलन
स्वामी सहजानन्द सरस्वती के सम्मान में जारी डाक टिकट
स्वामीजी के जीवन का तीसरा चरण तब शुरू होता है जब वे कांग्रेस में रहते हुए किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को हीं जीवन का लक्ष्य घोषित करते हैं। उन्होंने नारा दिया- कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा ज़िन्दाबाद । बाद में यहीं नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया। वे कहते थे - अधिकार हम लड़ कर लेंगे और जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे। उनका ओजस्वी भाषण किसानों पर गहरा असर डालता था। काफ़ी कम समय में किसान आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया। स्वामीजी का प्रांतीय किसान सभा संगठन के तौर पर खड़ा होने के बजाए आंदोलन बन गया। हर ज़िले और प्रखण्डों में किसानों की बड़ी-बड़ी रैलियां और सभाएँ हुईं। बाद के दिनों में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी नेताओं से हाथ मिलाया। सर्वश्री एम जी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंड़ित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुना कार्यजी जैसे वामपंथी और समाजवादी नेता किसान आंदोलन के अग्रिम पंक्ति में। आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी. सुन्दरैया और बंकिम मुखर्जी जैसे तब के कई नामी चेहरे भी किसान सभा से जुड़े थे। वामपंथी रुझान के चलते सीपीआई उन्हें अपना समझती रही और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ भी वे अनेक रैलियों में शामिल हुए। आज़ादी की लड़ाई के दौरान जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो नेताजी ने पूरे देश में 'फ़ारवर्ड ब्लॉक' के ज़रिये हड़ताल कराया।
स्वामी सहजानंद ने पटना के समीप बिहटा में सीताराम आश्रम स्थापित किया जो किसान आंदोलन का केन्द्र बना। वहीं से वे पूरे आंदोलन को संचालित करते रहे। संघर्ष के साथ-साथ स्वामी जी सृजन के भी प्रतीक पुरुष थे। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद स्वामीजी ने सृजन का कार्य जारी रखा। दो दर्जन से ज़्यादा पुस्तकों की रचना की। मेरा जीवन संघर्ष नामक जीवनी लिखी।
अन्तिम समय
जमींदारी प्रथा के ख़िलाफ़ लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून ,1950 को मुजफ्फरपुर में महाप्रयाण कर गये। आज़ादी मिलने के साथ ही सरकार ने क़ानून बनाकर ज़मींदारी राज को खत्म कर दिया। मरणोपरांत ही सही स्वामी जी की सबसे बड़ी मांग पूरी हो गयी, लेकिन किसानों को सुखी-समृद्ध और खुशहाल देखने की उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। वैश्वीकरण की आंधी ने तो अब किसानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर छोड़ दिया है। किसान पहले से कहीं ज़्यादा असंगठित हैं और कर्ज़ के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने को विवश हैं। देश में किसानों के संगठन कई हैं, लेकिन एक भी नेता ऐसा नहीं है, जो किसानों में सर्वमान्य हो और जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हो। ऐसे समय में स्वामी सहजानंद और ज़्यादा याद आते हैं, जिन्होंने किसान को संगठित और शोषण मुक्त बनाने में अपना सम्पूर्ण जीवन बलिदान कर दिया। उनके निधन के साथ हीं भारतीय किसान आंदोलन का सूर्य अस्त हो गया। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में दलितों का सन्न्यासी चला गया। स्वामीजी द्वारा प्रज्जवलित ज्योति की लौ मद्धिम ज़रूर पड़ी है, बुझी नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे किसान-मज़दूर आंदोलन इसके उदाहरण हैं।
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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 10 February 2017

गुरू रविदास ने पाखंड़,आड़म्बर और जातीय भेदभाव की तीव्र निन्दा की ------ रजनीश कुमार श्रीवास्तव

#गुरू रविदास(रैदास)जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ#


Rajanish Kumar Srivastava
 10-02-2017 

संत कुलभूषण कवि रविदास उन महान संतों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इनकी रचनाओं एवं वाणी ने ज्ञानाश्रयी तथा प्रेमाश्रयी भक्ति शाखाओं के मध्य सेतु का कार्य करते हुए भक्ति आन्दोलन को पूर्णता प्रदान की।भक्ति मार्ग के निर्गुण सम्प्रदाय के सर्वप्रमुख संत रैयदास जी एक उच्चकोटि के दार्शनिक,कवि और समाज सुधारक थे।उनका जन्म हिन्दू कैलेंडर के माघ महीने की पूर्णिमा के दिन चमार जाति के मोची परिवार के पिता संतोख दास एवं माता कालसा देवी के घर वाराणसी के पास सीर गोवर्धनपुर में 15 वीं शताब्दी में हुआ था।आप गृहस्थ संत थे और पत्नी लोना देवी और पुत्र विजय दास की जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए आपने धर्म सुधार और समाज सुधार में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।सम्पूर्ण जीवन भेद भाव का दंश झेलने के बावजूद भी आपने हमेशा भाईचारे और शांति का सन्देश दिया।
प्रारम्भिक जीवन में आपने गुरू पंडित शारदानन्द से शिक्षा ली और आगे चलकर आप प्रसिद्ध भक्तिमार्गी संत रामानन्द के शिष्य बने।इस लिहाज से आप संत कबीर के गुरूभाई हुए।गृहत्याग के उपरान्त संत रैयदास ने बेगमपुरा शहर बसाया।आप प्रसिद्ध कवित्री मीराबाई और चित्तौड़ के राजा के आध्यात्मिक गुरू थे।आपकी वाणी का सर्वाधिक प्रभाव सिक्ख धर्म पर पड़ा और संत रविदास के 41 पद "गुरूग्रंथ साहिब" में संकलित किए गये।इसके अलावा दादूपंथ की "पंचवाणी" में भी संत रैयदास की कविताएँ शामिल हैं।पंजाब,राजस्थान,महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में संत रविदास के सर्वाधिक अनुयायी हुए।
गुरू रविदास ने पाखंड़,आड़म्बर और जातीय भेदभाव की तीव्र निन्दा की।उनकी उक्ति थी,"मन चंगा तो कठौती में गंगा" और उनका संदेश था कि,"इंसान जाति-धर्म से नहीं बल्कि अपने कर्म से पहचाना जाता है।अतः उसके कर्म ऊँचे होने चाहिए ,जाति नहीं।" वे सर्वधर्मसद्भाव पर जोर देते थे।उनका मानना था कि राम और रहीम एक ही परमेश्वर के विविध नाम है और वेद,पुराण और कुरान आदि ग्रंथों में एक ही परमेश्वर का गुणगान है।उनका मानना था कि सत्ता,धन और जाति के अभिमान का त्याग करने पर ही ईश्वर की कृपा प्राप्त हो सकती है।गुरू रविदास ने आजीवन कुष्ठ रोग के उपचार में अमूल्य योगदान दिया।मानवता के ऐसे पुजारी,समाज सुधारक और महान दार्शनिक संत रैयदास की जयन्ती पर उनका शत शत नमन।

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10-02-2017