Monday, 11 December 2017

दिलीप साहब का जन्मदिन मुबारक हो ------ विजय राजबली माथुर

  
दिलीप साहब का जन्मदिन मुबारक हो। हम उनके सुंदर,स्वस्थ,सुखद,समृद्ध उज्ज्वल भविष्य एवं दीर्घायुष्य की मंगल कामना करते हैं।






दिलीप साहब से मुलाक़ात ---

 1981 में मैं पाँच माह के डेपुटेशन पर अन्य लोगों के साथ होटल मुगल शेरेटन,आगरा से होटल हाई लैण्ड्स,कारगिल भेजा गया था। किन्तु एक साथी के साथ मैं जूलाई में बीच में ही वापिस लौट आया था। 
उस समय होटल मुगल में 'विधाता ' की शूटिंग सुभाष घई साहब के निर्देशन में चल रही थी। लॉबी में हो रही 'कुणाल महल ' की दिलीप साहब शूटिंग मैंने भी देखी थी। स्टाफ केफेटेरिया में पद्मिनी कोल्हापूरे के डायलाग-"मक्के की रोटी "की शूटिंग भी मैंने देखी थी। लेकिन ज़्यादातर मैं आफिस से गायब होकर शूटिंग देखने वालों में शामिल नहीं रहता था। एक रोज़ मेनेजमेंट ने पूरे स्टाफ के साथ फिल्म -टीम को चाय पर गार्डेन में आमंत्रित किया था। जेनरल मेनेजर सरदार नृपजीत सिंह चावला साहब ने वरिष्ठ अभिनेता जनाब यूसुफ खान साहब से मेरा परिचय कराते हुये कहा था -" दिलीप साहब मीट आवर सीनियर मोस्ट एम्प्लाई विजय माथुर " । दिलीप साहब ने बड़े ही उत्साह और आत्मीयता के साथ मुझसे हाथ मिलाया था। हमारे दूसरे साथी मुकेश भटनागर का परिचय जी एम साहब ने शम्मी कपूर साहब से करवाया था। ये दोनों महान अभिनेता जी एम साहब के अगल-बगल चल रहे थे। 
आज दिलीप साहब के जन्मदिन पर उनसे मुलाक़ात की बात पुनः याद आ गई  एक बार पुनः 
हम उनके सुंदर,स्वस्थ,सुखद,समृद्ध उज्ज्वल भविष्य एवं दीर्घायुष्य की मंगल कामना करते हैं।

(विजय राजबली माथुर)

Sunday, 10 December 2017

बाबरी मस्जिद जैसा मुद्दा उछाला गया और खूब शोर मचाया गया जिसमें आर्थिक नीतियों कि गूंज छिप गयी ! ------ Archana Tabha

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आर्थिक नीतियों को तो अब लोकल और वैश्विक पूंजीपतियों के लिए ही बहना था पर अचानक कैसे ? तो इसके लिए बाबरी मस्जिद जैसा मुद्दा उछाला गया और खूब शोर मचाया गया जिसमें आर्थिक नीतियों कि गूंज छिप गयी ! यह दृष्टिकोण है Archana Tabha का जिनहोने  एक फेसबुक पोस्ट के जरिये इसे आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बखूबी समझाया है : 
Archana Tabha
https://www.facebook.com/archana.gautam1/posts/1577436305636959



बाबरी विध्वंस के 25 साल बाद इस घटना के बारे में एबीवीपी से छात्र नेता सतिंदर अवाना, आइसा की कंवलप्रीत कौर और एनएसयूआई के अक्षय लाकड़ा से बातचीत.
इससे स्पष्ट होता है कि, भले ही संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्षता पर ज़ोर दिया गया हो किन्तु आज़ादी के 70 वर्षों बाद आज देश में आर एस एस / भाजपा द्वारा सांप्रदायिकता का घृणित प्रचार युवा पीढ़ी को कुंठित कर चुका है। जो छात्र जनहितकारी विचार धारा वाले संगठनों से संबन्धित हैं वे तो देश के भविष्य के प्रति चिंतित हैं किन्तु आर एस एस / ए बी वी पी से संबन्धित छात्र कुछ भी सोचने - समझने की शक्ति से वंचित होने के कारण केवल कुतर्कों के बल पर मुद्दों से भटकाने का कार्य करते हैं।


संकलन-




विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

शशि कपूर का मेनरीज्म एक संदर्भ बिन्दु बना रहेगा

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 6 December 2017

डॉ अंबेडकर का परिनिर्वाड़ दिवस और विध्वंस की राजनीति

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आस्था और विश्वास के नाम पर गुमराह करके  भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर डॉ भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाड़ दिवस पर 25 वर्ष पूर्व 06 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिरा दिया गया था और आज भी वही राग अलापा जा रहा है उस पर नूपुर शर्मा जी का दृष्टिकोण है कि, ' भूखे भजन होय न गोपाला ' अतः  उन्होने  भव्य मंदिर के स्थान पर भव्य चिकित्सालय व विद्यालय के निर्माण की मांग रखी है  जो सर्वथा उचित है और उसका समर्थन प्रत्येक भारतीय को करना चाहिए । 










संविधान निर्मात्री समिति के चेयरमेन डॉ भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाड़ दिवस पर 25 वर्ष पूर्व 06 दिसंबर 1992 को अयोध्या में  राम मंदिर  / बाबरी मस्जिद के ढांचे को तब गिरा दिया गया था जब उत्तर प्रदेश में भाजपा बहुमत की सरकार सत्तासीन थी। यह मात्र एक ढांचे का विध्वंस नहीं था बल्कि यह संकेत था कि, भाजपा और उसके प्रणेता आर एस एस डॉ अंबेडकर द्वारा रचित  जिस संविधान को नहीं मानते हैं  उसे ध्वस्त कर देंगे। दस वर्ष बाद 2002 में गोधरा का वीभत्सकांड भी इसी मुहिम का ही हिस्सा था । इसी आधार पर 2014 में केंद्र में भी भाजपा सत्तारूढ़ हो सकी है एवं कारपोरेट घरानों की सेवा सुगमतापूर्वक कर रही है उसे साधारण जनता के दुखों को दूर करने की लेशमात्र भी चिंता नहीं है जैसा कि, नूपुर शर्मा जी की पोस्ट व उस पर प्राप्त प्रतिक्रिया से भी स्पष्ट होता है। : 



संकलन-विजय माथुर

Monday, 4 December 2017

हत्यारी गन कल्चर ------ नूपुर शर्मा / अजेय कुमार





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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 2 December 2017

वित्तमंत्री पर पूर्व वित्तमंत्री द्वारा दिमाग न इस्तेमाल करने का आरोप

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 30 November 2017

क्या सिर्फ कोई पुरुष ही महाभिनिष्क्रमण कर सकता है,कोई लड़की नहीं,कोई स्त्री नहीं ? ------ सुजाता

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द  वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ  वरदराजन  का दृष्टिकोण है कि , अखिला उर्फ हादिया के निजी मामले में न्यायालयों  का हस्तक्षेप हाल ही में दिये गए सर्वोच्च न्यायालय के निजता के अधिकार संबंधी निर्णय का उल्लंघन करता है : 





  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 28 November 2017

पीड़ित परिवार की आवाज पर पर्दा डालने में जुट गए ------ नवनीत मिश्र , इंडिया संवाद

चूंकि फडणवीस इंडियन एक्सप्रेस के कार्यक्रम में शरीक होने आए, इस नाते उन्हें खुश करने के लिए इंडियन एक्सप्रेस ने जज मौत पर क्लीनचिट वाला खुलासा किया। चूंकि जज की मौत नागपुर के गेस्ट हाउस में हुई थी। अगर मौत का मामला संदिग्ध है तो महाराष्ट्र सरकार भी इस केस में घिरती नजर आ रही थी। ऐसे में देखा जाए तो इंडियन एक्सप्रेस ने इस प्लांटेड खबर के जरिए खुद जज बनकर फडणवीस और उनके बॉस यानी अमित शाह को क्लीन चिट देने की कोशिश की।...........दि कारवां मैग्जीन की स्टोरी तब खारिज होती जब जज के पिता, बहन, भांजी में से कोई यह स्पष्टीकरण देता कि मौत सामान्य है। इंडियन एक्सप्रेस भूल गया कि पीड़ित परिवार न्याय मांग रहा है। परिवार तो सिर्फ न्यायिक जांच की मांग कर रहा है। संविधान ने हर पीड़ित को यह अधिकार दिया है कि वह जांच की मांग करे। न्यायिक जांच से पहले ही सरकार का जवाब लेकर इंडियन एक्सप्रेस उस दिन आया, जिसन दिन उसके कार्यक्रम में फडणवीस मुख्य अतिथि रहे।


 
Rani Rajesh
इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर दो खबरें ध्यान खींचती हैं। एक तरफ जज लोया की संदिग्ध मौत पर उठते सवालों पर पर्दा डालने वाली खबर है, दूसरी तरफ मुस्कुराते फडणवीस की तस्वीर वाली फोटो है। क्या इन दो खबरों में कोई कनेक्शन है। क्या फडणवीस को खुश करने के लिए सबसे दिलेर अखबार ने अपनी साख की भी ऐसी-तैसी कर ली। ऐसे कई सवाल सोमवार को खबरी बिरादरी में चर्चा-ए-खास रहे।

जो संदेह के घेरे में है, जिन जजों की भूमिका संदिग्ध है। जिन पर सवाल उठ रहे हैं। उन्हीं से बातकर छाप दी पूरी कहानी जो पीड़ित परिवार है, उससे इंडियन एक्सप्रेस ने बात करने की जरूरत ही नहीं समझी। जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले में उठ रहे जिन सवालों का जवाब महाराष्ट्र सरकार को देना चाहिए, संदेह के घेरे में आए लोगों को देना चाहिए, उन सवालों का आधा-अधूरा जवाब लेकर किस हड़बड़ी में इंडियन एक्सप्रेस सामने आया। यह समझ से परे है। पूरी स्टोरी पढ़िए तो दिखेगा कि दि कारवां ने अपनी स्टोरी में जो सवाल उठाए हैं, उसका जवाब देने की इंडियन एक्सप्रेस कोशिश कर रहा है। मगर आधी-अधूरी और गलत तरीके से।
जो साथी जज खुद संदेह के घेरे में हैं, उनके और उनके साथियों जुबानी छाप दी पूरी कहानी। ईसीजी की रिपोर्ट छापी, वो भी जज की मौत से एक दिन पहले की। एक दिसंबर को पांच बजे सुबह जज लोया हास्पिटल में भर्ती होते हैं, इंडियन एक्सप्रेस ईसीजी की जो रिपोर्ट छापकर दावा करता है कि जज का इसीजी न होने का दावा झूठा है, वह रिपोर्ट एक दिन पहले 30 नवंबर की है। यानी जज के भर्ती होने से पहले ही ईसीजी हास्पिटल में तैयार हो गई थी। कमाल है साहब। इस मामले में जब इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सवाल उठने लगे तो अखबार ने डैमेज कंट्रोल के लिए खबर अपडेट की। जिसमें हास्पिटल की ओर से सफाई पेश करते हुए लिखा गया है कि 30 नवंबर की तिथि गलती से अंकित हो गई थी। चूंकि मामला हाईप्रोफाइल है तो ऐसी गलतियां आसानी से कोई क्यों स्वीकार कर लेगा।
इंडियन एक्सप्रेस की एनकाउंटर रिपोर्ट ने जज की मौत का रहस्य और गहरा कर दिया। इस रिपोर्ट पर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। लोग चौंक रहे हैं कि जो संपादक राजकमल पिछले साल मौदी की मौजूदगी में जर्नलिज्म ऑफ करेज का पाठ पढ़ा रहे थे, उन्हीं के संपादन में इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार सरकार बहादुर की सेवा में तनकर खड़ा हो गया।
इंडियन एक्सप्रेस के सोमवार के अंक हाथ में लीजिए। पहले पन्ने पर नजर डालिए। दो खबरें प्रमुखता के साथ लगी मिलेंगी। सेकंड लीड के तौर पर जज लोया की संदिग्ध मौत को झुठलाने वाली खबर प्रकाशित है। जिसमें अंग्रेजी मैग्जीन द कारवां की रिपोर्ट में उल्लिखित पीड़ित परिवार के तमाम दावे को नकारा गया है। बीच में एक अन्य खबर लगी है। यह इंडियन एक्सप्रेस समूह के कार्यक्रम की खबर है। जिसमें एक तस्वीर छपी है। इस तस्वीर में देवेंद्र फडणवीस मुंबई के 26-11 हमले की बरसी पर पीड़ित परिवारों के बीच मौजूद हैं। जिस दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इंडियन एक्सप्रेस के इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनते हैं, उसी दिन यह खबर प्लांट होती है। कोई भी खबर पढ़कर यह बता देगा इसमें संदेह के घेरे में खड़े सभी लोगों को क्लीनचिट देने की कोशिश हुई है।
एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं- चूंकि फडणवीस इंडियन एक्सप्रेस के कार्यक्रम में शरीक होने आए, इस नाते उन्हें खुश करने के लिए इंडियन एक्सप्रेस ने जज मौत पर क्लीनचिट वाला खुलासा किया। चूंकि जज की मौत नागपुर के गेस्ट हाउस में हुई थी। अगर मौत का मामला संदिग्ध है तो महाराष्ट्र सरकार भी इस केस में घिरती नजर आ रही थी। ऐसे में देखा जाए तो इंडियन एक्सप्रेस ने इस प्लांटेड खबर के जरिए खुद जज बनकर फडणवीस और उनके बॉस यानी अमित शाह को क्लीन चिट देने की कोशिश की।
वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि दि कारवां मैग्जीन की स्टोरी तब खारिज होती जब जज के पिता, बहन, भांजी में से कोई यह स्पष्टीकरण देता कि मौत सामान्य है। इंडियन एक्सप्रेस भूल गया कि पीड़ित परिवार न्याय मांग रहा है। परिवार तो सिर्फ न्यायिक जांच की मांग कर रहा है। संविधान ने हर पीड़ित को यह अधिकार दिया है कि वह जांच की मांग करे। न्यायिक जांच से पहले ही सरकार का जवाब लेकर इंडियन एक्सप्रेस उस दिन आया, जिसन दिन उसके कार्यक्रम में फडणवीस मुख्य अतिथि रहे। सवाल उठता है कि क्या जर्नलिज्म ऑफ करेज की बात करन वाले संपादक राजकमल झा फडणवीस और उनके बॉस को खुश करने के लिए पीड़ित परिवार की आवाज पर पर्दा डालने में जुट गए।
नवनीत मिश्र
इंडिया संवाद

https://www.facebook.com/rani.karmarkar.7/posts/783020708551046

Wednesday, 22 November 2017

यदि गुजरात में मोदी - शाह की भाजपा परास्त होती है तो ........... ------ विजय राजबली माथुर







वरिष्ठ पत्रकार गण विनोद दुआ, नीरजा चौधरी, आरफा खानम शेरवानी और जयप्रकाश गुप्त कांग्रेस के संभावित नए अध्यक्ष राहुल गांधी की  संभावनाओं पर जो विचार व्यक्त कर रहे हैं उनमें प्रमुख है उनके नेतृत्व में गुजरात चुनावों में 22 वर्षीय भाजपा शासन को उखाड़ पाने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगा उनका राजनीतिक भविष्य। परंतु कांग्रेस और भाजपा की आज की स्थिति को समझने के लिए इनके अतीत पर प्रकाश डालना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। 

सन 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों को बता दिया कि भारत के मुसलमानों और हिंदुओं को लड़ा कर ही ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित  रखा जा सकता है। लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से 1885 में स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य का सेफ़्टी वाल्व कांग्रेस 1875 में स्वामी दयानन्द द्वारा  स्थापित आर्यसमाज के अनुयायियों के कारण  राष्ट्र वादियों  के कब्जे मे जाने लगी थी। बाल गंगाधर 'तिलक'का प्रभाव बढ़ रहा था और लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल के सहयोग से वह ब्रिटिश शासकों को लोहे के चने चबवाने लगे थे। अतः 1905 ई मे हिन्दू और मुसलमान के आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया गया । हालांकि बंग-भंग आंदोलन के दबाव मे 1911 ई मे पुनः बंगाल को एक करना पड़ा परंतु इसी दौरान 1906 ई मे ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को फुसला कर मुस्लिम लीग नामक सांप्रदायिक संगठन की स्थापना करा दी गई और इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप 1920 ई मे हिन्दू महा सभा नामक दूसरा सांप्रदायिक संगठन भी सामने आ गया। 1932 ई मे मैक्डोनल्ड एवार्ड के तहत हिंदुओं,मुसलमानों,हरिजन और सिक्खों के लिए प्रथक निर्वाचन की घोषणा की गई। महात्मा गांधी के प्रयास से सिक्ख और हरिजन हिन्दू वर्ग मे ही रहे और 1935 ई मे सम्पन्न चुनावों मे बंगाल,पंजाब आदि कई प्रान्तों मे लीगी सरकारें बनी और व्यापक हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैलते चले गए।

1917 ई मे हुयी रूस मे लेनिन की क्रान्ति से प्रेरित होकर भारत के राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर मे 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी'की स्थापना करके पूर्ण स्व-राज्य के लिए क्रांतिकारी आंदोलन शुरू कर दिया और सांप्रदायिकता को देश की एकता के लिए घातक बता कर उसका विरोध किया। कम्यूनिस्टों से राष्ट्रवादिता मे पिछड्ता पा कर 1929 मे लाहौर अधिवेन्शन मे जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस का लक्ष्य भी पूर्ण स्वाधीनता घोषित करा दिया। अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग,हिन्दू महासभा के सैन्य संगठन आर एस एस (जो कम्यूनिस्टों का मुकाबिला करने के लिए 1925 मे ही अस्तित्व मे आ गया ) और कांग्रेस के नेहरू गुट को प्रोत्साहित किया एवं कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया । सरदार भगत सिंह जो कम्यूनिस्टों के युवा संगठन 'भारत नौजवान सभा'के संस्थापकों मे थे भारत मे समता पर आधारित एक वर्ग विहीन और शोषण विहीन समाज की स्थापना को लेकर अशफाक़ उल्ला खाँ व राम प्रसाद 'बिस्मिल'सरीखे साथियों के साथ साम्राज्यवादियों से संघर्ष करते हुये शहीद हुये सदैव सांप्रदायिक अलगाव वादियों की भर्तस्ना करते रहे।

1980 मे संघ के सहयोग से सत्तासीन होने के बाद इंदिरा गांधी ने सांप्रदायिकता को बड़ी बेशर्मी से उभाड़ा। 1980 मे ही जरनैल सिंह भिंडरावाला के नेतृत्व मे बब्बर खालसा नामक घोर सांप्रदायिक संगठन खड़ा हुआ जिसे इंदिरा जी का आशीर्वाद पहुंचाने खुद संजय गांधी और ज्ञानी जैल सिंह पहुंचे थे। 1980 मे ही संघ ने नारा दिया-भारत मे रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा जिसके जवाब मे काश्मीर मे प्रति-सांप्रदायिकता उभरी कि,काश्मीर मे रहना होगा तो अल्लाह -अल्लाह कहना होगा। और तभी से असम मे विदेशियों को निकालने की मांग लेकर हिंसक आंदोलन उभरा।

पंजाब मे खालिस्तान की मांग उठी तो काश्मीर को अलग करने के लिए अनुच्छेद  370 को हटाने की मांग उठी और सारे देश मे एकात्मकता यज्ञ के नाम पर यात्राएं आयोजित करके सांप्रदायिक दंगे भड़काए गए । माँ की गद्दी पर बैठे राजीव गांधी ने अपने शासन की विफलताओं और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने हेतु संघ की प्रेरणा से अयोध्या मे विवादित रामजन्म भूमि/बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर हिन्दू सांप्रदायिकता एवं मुस्लिम वृध्दा शाहबानों को न्याय से वंचित करने के लिए संविधान मे संशोधन करके मुस्लिम सांप्रदायिकता को नया बल प्रदान किया।
1991 के  सांप्रदायिक दंगों मे जिस प्रकार सरकारी मशीनरी ने एक सांप्रदायिकता का पक्ष लिया है उससे तभी  संघ की दक्षिण पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित होने का भय व्याप्त हो गया था। 1977 के सूचना व प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी ने आकाशवाणी व दूर दर्शन मे संघ की कैसी घुसपैठ की है उसका हृदय विदारक उल्लेख सांसद पत्रकार संतोष भारतीय ने वी पी सरकार के पतन के संदर्भ मे किया है। आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया ज़्यादा पुरानी  घटना  नहीं है। 1991 के कांग्रेसी वित्तमंत्री  मनमोहन सिंह ने जिन उदारीकृत आर्थिक नीतियों को लागू किया था उनको न्यूयार्क जाकर एल के आडवाणी ने उनकी नीतियों का चुराया जाना बताया था। पी एम के रूप में अपनाई उनकी नीतियों को ही मोदी सरकार आज भी बढ़ा रही है। 

पुलिस और ज़िला प्रशासन मजदूर के रोजी-रोटी के हक को कुचलने के लिए जिस प्रकार पूंजीपति वर्ग का दास बन गया है उससे संघी तानाशाही आने की ही बू मिलती है।जिस प्रकार सत्तारूढ़ भाजपा के मंत्री और नेता जनता को धमका कर वोट हासिल करना चाहते हैं उससे इस बात की पुष्टि भी होती है। आसन्न गुजरात चुनाव के संदर्भ में अधिकांश लोगों का अभिमत है कि, वहाँ कांग्रेस द्वारा भाजपा को परास्त करना सर्वथा असंभव है ।

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 मेरा अपना सुद्र्ढ़ अभिमत है कि जिस प्रकार 1980 में इन्दिरा कांग्रेस और फिर 1984 में राजीव गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस को आर एस एस का पूर्ण समर्थन मिला था भाजपा के स्थान पर कुछ उसी प्रकार से गुजरात चुनावों में राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही कांग्रेस को पुनः आर एस एस का समर्थन मिलने जा रहा है। जिस प्रकार पी एम मोदी ने भाजपा को नियंत्रण में लेने के बाद आर एस एस को नियंत्रित करने का अभियान चला रखा है उससे आर एस एस नेतृत्व उनको कमजोर करने का मार्ग ढूंढ रहा था। यू एस ए के हितार्थ  लागू की गई नोटबंदी फिर गलत तरीके से लागू की गई जी एस टी पर जिस प्रकार आर एस एस व भाजपा नेता मोदी सरकार पर हमलावर हुये हैं और आर एस एस के आनुषंगिक संगठन  भामस द्वारा मोदी सरकार के विरुद्ध दिल्ली में प्रदर्शन किया गया है उससे ऐसे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। 

यदि गुजरात में मोदी - शाह की भाजपा परास्त होती है तो वह राहुल गांधी के चमत्कार या कांग्रेस के  बढ़ते प्रभाव का दिग्दर्शक न होकर आर एस एस की वह रणनीति होगी जिसके द्वारा वह सत्ता और विपक्ष दोनों को अपने नियंत्रण में लाकर भविष्य के लिए अपना मार्ग निष्कंटक बनाना चाहता है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो मेनका व वरुण गांधी को कांग्रेस में शामिल करवाकर मेनका गांधी को कांग्रेसी पी एम के रूप में  सुनिश्चित करना आर एस एस का लक्ष्य होगा। इस प्रकार देश को आगामी लोकसभा  चुनावों में मोदी से तो मुक्ति मिल जाएगी लेकिन आर एस एस का शिंकजा और मजबूत हो जाएगा।