Saturday, 21 March 2020

कोरोना महामारी अथवा साज़िश ------ डॉ विश्वरूप रॉय चौधरी


 सारा खेल समझे
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आज संसार भयभीत है कि कोरोना से उसका बचाव कैसे हो, पर क्या आप वास्तव में भयभीत हैं? अथवा आपको भयभीत होने पर मज़बूर किया जा रहा है भविष्य के व्यवसाय को सुरक्षित करने हेतु, आइये कुछ चरणों में इसे जानने का प्रयत्न करते हैं|

क्या है कोरोना:- 

कोरोना जैसे लगभग ३२०००० वायरस/बैक्टीरिया संसार में हम सबके आस पास रहते हैं और जब कभी भी हमें कोई फ्लू होता है तो वो इनकी ही वजह से होता है, साधारणतः फ्लू उचित भोजन लेने से तीन दिन में स्वतः ही समाप्त हो जाता है| कोरोना भी इसी प्रकार का एक फ्लू है जो किसी भी उत्तम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले को कुछ हानि नहीं पहुंचा सकता| २-४ दिन पूर्व ही "New England Journal of Medicine" ने एक पेपर पब्लिश करके बताया है कि कोरोना से मृत्यु का खतरा मात्र ०.१% है अर्थात १००० लोगों को यदि कोरोना हो तो मात्र एक कि मृत्यु होगी अतः ये साधारण सर्दी-जुकाम-बुख़ार की भांति ही है|

यदि यह साधारण फ्लू ही है तो इतना हल्ला क्यूँ:- दरअसल जिसे आप महामारी समझ रहे हैं वास्तव में वो एक व्यवसायिक संधि है जो अमेरिका और चीन के बीच में हुई है, संधि का आधार है कि कोरोना वायरस को नियंत्रित करने हेतु जो भी उपकरण अथवा दवाइयां अभी अथवा भविष्य में बिकेंगी उनका लाभ चीन और अमेरिका में आपस में बांटा जायेगा और इन सबका निर्माण वो ही पेटेंट कानून के आधार पर कर पाएंगे| अभी आपको ये गप्प लगेगी पर इसकी असलियत जानने हेतु मैं आपको कुछ पीछे ले जाना चाहता हूँ, १९८४ में इसी प्रकार से अमेरिका ने अफवाह फैलाई एचआईवी वायरस की और लोगों को इतना डरा दिया कि यदि किसी पीड़ित का हाथ छू गया, रुमाल छू गया तब भी यह फ़ैल जाएगा| चारों ओर बस एचआईवी का ही भय था और इसी बीच उस समय इन लोगों ने जांच हेतु उपकरण और बचाव हेतु खूब वस्तुएं बेंची, उपरांत इसका टीका बना दिया जो कि अब हर बच्चे को पैदा होने के कुछ समय में ही लगा दिया जाता है, डॉक्टर भी प्रायः किसी भी रोग में इसकी जांच करवाते रहते हैं पर इसके पीछे की सच्चाई ये है कि १९८४ से आजतक एक भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसमें एचआईवी का वायरस पाया गया हो अथवा किसी की मृत्य एचआईवी से हुई हो, यदि ऐसा कोई शोधपत्र आपके पास हो तो अवश्य हमें उपलब्ध करावें, लोग एड्स से मरे हैं पर इसको एड्स से मत जोड़िए क्यूंकि एड्स एक शारीरिक रोग है और एचआईवी एक वायरस दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है| स्मृति में रहे कि एचआईवी के लिए अमेरिका और फ़्रांस ने आपस में संधि की थी| इस प्रकार की ही कहानी टीबी की है| ऐसी और भी बीमारियां हैं पर इन दोनों का ही लगभग हर देश प्रतिवर्ष हज़ारों करोड़ का बजट बनाता है और पैसा अमेरिका के पास जाता है क्यूंकि दवाइयों व उपकरण बनाने के पेटेंट उनके पास हैं, यह उनकी सदैव के लिए बनी एक स्थाई आय है| इसी प्रकार का एक बजट कुछ दिनों में कोरोना का बनेगा और उनके अभी हो रहे कुछ आर्थिक नुकसान से लाखों गुना बढ़के उन्हें प्रतिवर्ष मिलने वाले हैं| यह हानि नहीं उनका इन्वेस्टमेंट है लाइफटाइम फिक्स रिटर्न के लिए|

फिर लोग मर कैसे रहे:- 

आपके मन में प्रश्न होगा कि लोग तो मर रहे हैं, पर कैसे पता चला है कि मरने वाला कोरोना से मरा है| इसकी जांच हेतु बस एक ही परिक्षण होता है जिसे पीसीआर टेस्ट कहते हैं पर संभवतः आपको नहीं पता कि ये जांच प्रामाणिक नहीं है, यह जांच यदि किन्हीं भी १०० स्वस्थ लोगों पर भी की जाएगी तब भी ये उनमें से एक को कोरोना का पॉज़िटिव केस बताएगी क्यूंकि इसके बारे में कहा जाता है कि "PCR test can detect Corona with 99% specificity" और स्वयं इसके निर्माता श्री कैरी मलिस ने कहा था कि "" The PCR test is for genetic sequencing of the virus and not a test for the virus itself". इसके साथ ही यदि आप तमाम देशों में होने वाले परीक्षण और पॉजिटव मिले मामलों का औसत निकालेंगे तो आपको ज्ञात हो जाएगा कि यह किट कैसे कार्य करती है अतः जो लोग मर रहे हैं वो या तो बहुत कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते मर रहे हैं अथवा वो जिन्हें पहले से ही कोई गंभीर रोग है और वो वृद्ध हैं अथवा उन्हें ज़बरदस्ती कोरोना से मरा बताया जा रहा है| प्रतिवर्ष पूरे विश्व में लगभग १ करोड़ ७० लाख लोग वायरस व बैक्टीरियल इन्फेक्शन से मरते हैं पर उनमें से अधिकांश का बाज़ार बन चुका है अतः उन पर कोई चर्चा नहीं है| उदाहरण हेतु टीबी, टीबी से पूरे विश्व में प्रतिवर्ष लगभग १५ लाख लोग मरते हैं और इनमें से ५ लाख तो मात्र भारत में ही मरते हैं पर इसके बचाव हेतु आपको कुछ नहीं बताया जाता क्यूंकि इसके हज़ारों करोड़ का बाज़ार बना हुआ है पर कोरोना टीबी की तुलना में बिल्कुल भी हानिकारक नहीं है पर इसका इतना भयभीत कर देने वाला प्रचार बस इसलिए ही हो रहा है क्यूंकि आप डरेंगे नहीं तो इनकी उपकरण और दवाइयां कौन खरीदेगा? प्रतिवर्ष ऐसे ही बाज़ार खड़े किये जाते हैं कभी स्वाइन फ्लू, कभी बर्ड फ्लू, कभी डेंगू, कभी चिकेनगुनिया, कभी इबोला और कभी कोरोना के नाम पे और इन सबकी दवाएं व उपकरण बनाने के पेटेंट लगभग सदैव अमेरिका के पास ही रहते हैं| क्या आपको लगता है कि ये पहले वाले वायरस - बैक्टीरिया सब कोरोना के भय से कहीं दुबक के बैठ गए हैं नहीं ये भी उतने ही मौजूद हैं बल्कि कोरोना से बहुत अधिक हैं पर उनको इसलिए नहीं दिखाया जा रहा क्यूंकि उनका बाज़ार स्थापित हो चुका है, सरकारें उसका बजट बनाती हैं और सब मिल बांटके खाते हैं| संभवतः अब आपको कुछ खेल समझ आया हो|

फिर क्या करें:- 

कुछ भी न करिए, सबसे पहले तो भयभीत होना बंद करिये| अपना भोजन और रोग प्रतिरोधक क्षमता उचित रखिए कभी भी जीवन में ऐसा कोई रोग आपको नहीं लगेगा|

सैनिटाइज़र का उपयोग करें अथवा नहीं:- सेनेटाइजर का उपयोग आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को और दुर्बल कर देगा और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना हर सामान बेचने में बहुत चतुर तो हैं ही साथ में वो एड सेल भी बखूबी करते हैं। देखिए, हमारे हाथों में सदैव विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया रहते हैं जिन्हें विज्ञान की भाषा में फ्रेंडली अर्थात शरीर हेतु मित्र बैक्टीरिया बोला जाता है जो कि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाये रखने में सहायतार्थ होते हैं, जब आप सेनेटाइजर का उपयोग करते हैं तो दूषित बैक्टीरिया तो आपके पास पहले ही नहीं होता है पर उसके चक्कर में आपके ये मित्र बैक्टीरिया पूर्ण रूप से समाप्त हो जाते हैं और जिसके कारण आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बड़ा आघात लगता है व आप शीघ्र ही बीमार पड़ने लगते हैं और इस प्रकार पहले कंपिनयां आपको सेनेटाइजर बेचती हैं और फिर बाद में वही कंपनियां दवा। दूसरी बात बैक्टीरिया मारने हेतु जो रसायन आपने अपने हाथों में डाला और पश्चात उन्हीं हाथों से कुछ खाया तो निसंदेह वो विष्कारी रसायन आपके शरीर में भी जाएगा जो कि घातक है, क्या आप डिटोल अपने हाथों में चुपड़ के मुंह से चाट सकते हैं??

मास्क पहनें अथवा नहीं:- प्रथम बात तो ये कि यह वायरस वायु में घूमने वाला वायरस नहीं है अतः इसका मास्क से कोई लेना देना नहीं है यह शारीरिक स्पर्श से ही फैलता है दूसरी बात कि यह अथवा कोई भी वायरस इतने सूक्ष्म होते हैं कि वो शरीर के किसी भी छिद्र से भीतर जा सकते हैं यहां तक कि रोमछिद्रों से भी, तो ऐसे में आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ही आपको बचाएगी कोई सेनेटाइजर अथवा मास्क नहीं, उसको मज़बूत रखिए और आनंद में रहिए|

डिसइंफेक्टेंट डालें अथवा नहीं:- 

यह एक मूर्खतापूर्ण कृत्य है, ऐसे विषैले पदार्थ डालने से लोगों के ऊपर और भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, आज से लगभग ३० - ४० वर्ष पूर्व टीबी व अन्य संक्रमित रोगों से बचने हेतु प्रतिदिन सरकारों की ओर से डीडीटी का छिड़काव किया जाता था पर अब ३० वर्ष बाद शोध में ये निकल के सामने आया कि उस डीडीटी के छिड़काव के कारण ही पोलियो नामक खतरनाक बीमारी का जन्म हुआ था अतः इन सबसे दूर रहें तो ही उत्तम है|

विशेष नोट - उपरोक्त में से अधिकांश जानकारियां देश विदेश के जाने माने चिकित्सक व जनमानस की भलाई हेतु "एचआईवी सदी का सबसे बड़ा धोखा" व "हार्ट माफिया" जैसी पुस्तकें लिख चुके श्री विश्वरूप रॉय चौधरी जी के वक्तव्यों से ली गयी हैं|


आशा है ये लेख आपको इन वैश्विक प्रोपगंडा से बचा पाएगा और आप एक भयभीत नहीं बल्कि मज़बूत इंसान बन पाएंगे|
साभार : 

https://www.facebook.com/sudhir.sankrityayan/posts/2647627555465910


 संकलन-विजय माथुर

Saturday, 14 March 2020

कश्मीर की भारतीयता के प्रतीक डॉ फारूख अब्दुल्ला ------ रश्मि त्रिपाठी



Rashmi Tripathi
14-03-2020 
एक वर्सेटाइल पर्सनैलिटी के धनी फारुख अब्दुल्ला साहब ने मुझे हमेशा बहुत आकर्षित किया, चाहे मंत्रमुग्ध होकर उनका रामधुन गाना हो या फिर मस्त होकर बॉलीवुड गानो पर नाचना या खुल कर अपनी बात को रखना ।
पिछले सात महीने से जबसे धारा 370 समाप्त की गई उन पर पीसीए लगाकर उन्हें कैद में रखा गया था,कल उन्हें छोडा गया तो तमाम चर्चाएं शुरु हो गईं, बिना ये सोचे कि एक अस्सी बर्ष का इंसान जो कि सात महीनों की कैद में था उसकी मानसिक स्थिति इस समय क्या होगी ?
मैं इतना जानती हूं कि स्वतंत्रता के बाद कश्मीर को भारत में बने रहने के लिये सबसे ज्यादा प्रयत्न शायद इसी इंसान ने किये ।
और ये देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली है।

मेडिकल साइंस के विद्यार्थी और इंग्लैंड में सफल पेशेवर चिकित्सक रह चुके आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी,डॉ फारूख अब्दुल्ला की ज़िंदगी बहुआयामी और दिलचस्प किरदारों को समेटे हुए है। फारुख के साथ विवाद भी कम नहीं जुड़ते हैं। पर हर स्थिति में ऊपर से बेफिक्र फारुख अब्दुल्ला अंदर से एक भावुक एवं गम्भीर इंसान हैं; और यदि तेवर में आ जाएं तो सामने सन्नाटा  छा जाता है।
उनका एक चिकित्सक से लेकर जम्मू काश्मीर के 3 बार के मुख्यमंत्री तक का सफर; उनके परिवार का सप्रू ब्राह्मण(कौल) से लेकर इस्लाम अपनाने तक का सफर,इंगलैंड परस्ती के फैशन और क्रिकेट से लेकर आम कश्मीरी के जीवन मे घुल-मिल जाने का सफर, और कश्मीर में इस्लाम का परचम उठाने से लेकर माता के जयकारे तथा राम धुन गाने तक का सफर फारुख अब्दुल्ला के एक ऐसे विरोधाभासी किन्तु रोचक व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हैं जिससे आप सहमत न भी हों किन्तु उससे दूरी भी नहीं चाहेंगे।
सन 1890 तक अब्दुल्ला परिवार कश्मीरी ब्राह्मण था।इनका गोत्र सप्रू था और फारुख के परदादा का नाम पंडित राघवराम कौल था।इस्लाम स्वीकार करने के बाद इनके दादा का नाम शेख मुहम्मद इब्राहिम था।एक छोटे कारखाने के मालिक इस परिवार का पश्मीने का कारोबार था।ये लोग शाल-दुशाले के अच्छे व्यापारी थे।
कश्मीर की राजनीति में दखल रखने वाले फारुख के पिता शेख अब्दुल्ला जिनका पंडित नेहरू से अच्छा दोस्ताना था ने,1930 में "मुस्लिम कांफ्रेंस" के नाम से एक राजनीतिक दल की स्थापना की।बाद में देश के अन्य कट्टर मुस्लिम परस्तों से अपनी पृथक क्षवि बनाने के उद्देश्य से 1939 में इस दल का नाम बदल कर "नेशनल कांफ्रेंस" कर दिया गया।यह नाम अभी भी चल रहा है।आज़दी के दौर में नेहरू- गांधी का विश्वास शेख अब्दुल्ला पर था इसलिए उन्हें जम्मू कश्मीर रियासत का प्रधानमंत्री बनाया गया।इसी समय मे एक बार राजा हरिसिंह ने शेख अब्दुल्ला को जब गिरफ्तार करवा दिया तो नेहरु क्रोध में काश्मीर पहुंच गए थे।किन्तु,बाद में शेख अब्दुल्ला पर अंग्रेजों की शह पर पाकिस्तान के लिए जब जासूसी का आरोप लगा तो उन्हें कैद करके बख्शी गुलाम मोहम्मद को कश्मीर की कमान सौंपी गई।बख्शी गुलाम मो, शेख अब्दुल्ला सरकार में गृहमंत्री थे।
बाद में भी शेख अब्दुल्ला गिरफ्तार और रिहा होते रहे और अंत मे नेहरू की मृत्यु के पूर्व नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के बीच एक समझौता हो गया।कश्मीर के प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री में बदल दिया गया। 1983 में अपनी मृत्यु के पूर्व शेख अब्दुल्ला 3 बार कश्मीर के गृहमंत्री भी रहे। पिता शेख अब्दुल्ला की तरह फारुख अब्दुल्ला भी 3 बार कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे। बाद में उनका पुत्र उमर अब्दुल्ला भी जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बना और फारुख अब्दुल्ला कश्मीर का बन्द दायरा छोड़ कर सांसद बने और केंद्र की राहनीति में आ गए। कदाचित वे अपनी क्षवि एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। समय-समय पर विवादों में घिरने वाले इस परिवार पर पाकिस्तान परस्ती के आरोप लगते रहे हैं जिसका कारण-कश्मीर के आंतरिक विशेष हालात अधिक रहे हैं,,,किन्तु यह भी सत्य है कि कश्मीरी अलगाववादी माहौल में फारूख और उनका परिवार भारत से जोड़े रखने की एक कड़ी के रूप में भी देखा और पहंचाना जाता है।
डॉ फारुख अब्दुल्ला को अपनी सेक्युलर छवि प्रदर्शित करने से विशेष लगाव है।उनकी पत्नी इंग्लैड से थींऔर पुत्र उमर अब्दुल्ला ने भी हिन्दू लडकी पायल से शादी की थी, फारुख अब्दुल्ला की बेटी सारा अब्दुल्ला राजस्थान के कद्दावर नेता रह चुके राजेश पायलट के पुत्र और कांग्रेसी सांसद सचिन पायलट की पत्नी है।जबकि उनकी मां भी स्कॉटलैंड मूल से थीं।
इस उम्र में भी युवाओं को मात देने का जज़्बा रखने वाले मस्तमौला फारुख अब्दुल्ला के अनेक वीडियो वायरल होते रहते हैं,जिनमे कभी शराब पीने के मंत्र का पाठ करते,कभी मंच से रामधुन गाते तो कभी तीर्थयात्रियों के साथ माता का जयकारा लगवाने वाले धार्मिक नेता के रूप में दिखाई पड़ जाते हैं। फारुख की गायन में पकड़ है और उम्र के हिसाब से वे डांस करने से भी परहेज नहीं करते हैं।
कुल मिला कर डॉ फारुख अब्दुल्ला एक ऐसे व्यक्तित्व के सियासतदान हैं जिनमे हर उम्र वर्ग के लोग रुचि रखते हैं।
साभार :

https://www.facebook.com/rashmi.tripathi.73113/posts/1548801625295373


Vibha Bharti with Dr Farooq Abdullah




Thursday, 12 March 2020

भारतीय पाप स्टार : भँवरी देवी और तीजन बाई ------ सोना महापात्रा

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 29 February 2020

घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा ------ कोमिका माथुर

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http://epaper.navbharattimes.com/details/97137-77863-2.html






घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा


कोमिका माथुर

अपने इर्द-गिर्द समस्याओं को देखकर हम अक्सर परेशान हो जाते हैं। बुरे ख्याल हमारे मन में आने लगते हैं। लगने लगता है कि अब कुछ ठीक नहीं होगा, सब कुछ खत्म ही हो जाएगा। लेकिन, क्या वाकई ऐसा होता है/ साहिर लुधियानवी ने लिखा है, ‘रात भर का है मेहमां अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा/ रात जितनी भी संगीन होगी, सुबह उतनी ही रंगीन होगी/ गम ना कर गर है बादल घनेरा।’ ये पंक्तियां मन में एक उम्मीद जगाती हैं कि सब ठीक हो जाएगा। उम्मीद ही तो है जो हमें जिंदा रखती है। कम से कम इतिहास तो यही कहता है। पहाड़-सी दिखने वाली हर दिक्कत के बीच से हमने एक रस्ता बनाया है।

‘हॉर्स मैन्योर क्राइसिस’ को याद कीजिए। अब से 130 साल पहले न्यूयॉर्क और लंदन को एक अजीबोगरीब समस्या का सामना करना पड़ा। आज के चमचमाते, रंगीन, फैशनेबल और साफ-सुथरे लंदन की सड़कें तब घोड़ों की लीद से भरने लगी थीं। यही हाल न्यूयॉर्क का भी था। मामला यह था कि एक जगह से दूसरी जगह आने-जाने और सामान पहुंचाने के लिए लोग घोड़ों पर निर्भर थे। घोड़ों को फैक्ट्रियों में जुतना था और खेतों में भी। मालगाड़ियों से ढोकर लाए गए सामान को भी शहर में इधर से उधर ले जाने का काम घोड़ों के ही जिम्मे था। लंदन की सड़कों पर उस वक्त हर रोज 50 हजार से ज्यादा घोड़े सड़कों पर दौड़ रहे थे, इंसान और उनसे कहीं ज्यादा सामान ढोते हुए। और यही घोड़े अपने पीछे ढेर सारी गंदगी भी छोड़ रहे थे। टाइम्स अखबार ने तो यहां तक कह दिया था कि अगले कुछ सालों में लंदन की हर सड़क पर नौ-नौ फीट ऊंची लीद की परत जमी होगी।

यह गंदगी अपने साथ कई और समस्याएं लेकर आ रही थी। मक्खी-मच्छर भिनभिना रहे थे। लोगों को टायफॉयड और दूसरी गंभीर बीमारियां होने लगी थीं। मुर्दा घोड़ों को दफनाना भी कोई छोटा सिरदर्द नहीं था। एक बार अकेले न्यूयॉर्क शहर में 15 हजार घोड़ों की लाशें एक साथ दफनाई गईं। जाहिर है, इंसान की कई जरूरतें पूरी कर रहे घोड़े देखते-देखते उसके लिए बहुत बड़ी मुसीबत बन गए थे। शहरों का यह हाल देख तमाम अफसर और पॉलिसी मेकर सिर पकड़ कर बैठे थे। लेकिन संकट की इस घड़ी में कुछ लोग ऐसे भी थे जो अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा रहे थे। फिर एक दिन सामने आई मोटरगाड़ी। इंसान ने अपनी समस्या का हल खोज लिया था। देखते-देखते शहरों में घोड़े गैरजरूरी होने लगे। गंदगी और बदबू से बेहाल शहर मौत के मुंह से निकल आए थे। सब कुछ ठीक हो गया था, बल्कि पहले से बेहतर। 

ऐसा ही कुछ हुआ था इलेक्ट्रिक लाइटों के साथ भी हुआ था। सदियों से शहरों में स्ट्रीट लैंप जलाते आए कर्मचारियों ने एक बार हड़ताल कर दी। उन्हें पता नहीं था कि दुनिया बदलने जा रही है। फिर बिजली की लाइटें लगीं तो अफवाह फैली कि इनकी रोशनी से आंखें खराब हो सकती हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स तक ने इस पर मुहर लगानी वाली रिपोर्टें छाप दी थीं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। रेलगाड़ियां चलनी शुरू हुईं तो भी ऐसी पचासों अफवाहें फैलीं। इंग्लैंड के डॉक्टर कहने लगे कि रेलगाड़ी में ज्यादा सफर करने से इंसान को दिमागी बीमारियां हो सकती हैं! आज दुनिया के हर कोने में न जाने किस-किस रफ्तार से ट्रेनें दौड़ रही हैं। 

ऐसे ही न जाने कितनी बार दुनिया खत्म हो जाने की बातें हुईं। कहा गया कि फलां साल में कोई धूमकेतु धरती से टकरा जाएगा और सब उलट-पलट हो जाएगा। 2020 आते-आते दुबई या मुंबई शहर डूब जाने की बात अभी कुछ ही समय पहले कही गई थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह धरती, पेड़-पौधे, नदियां, समंदर, पर्वत, इंसान, परिंदे, सब चहचहा हैं। अमेरिकी मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक टोनी रॉबिन्स कहते हैं, ‘हर परेशानी एक तोहफा है। इन तोहफों के बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। जितने भी बड़े आविष्कार हुए, फिर चाहे पहिया हो, बिजली का बल्ब या टेलीफोन, ऐसे ही नामुमकिन से लगने वाले हालात से निकल कर हुए हैं।’ 

इधर, कुछ समय से देश और दुनिया में फिर ऐसे हालात बन रहे हैं कि लगने लगा है जैसे सब खत्म हो जाएगा। चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस अब तक हजारों लोगों की जान ले चुका है। कई देश इस वायरस की जद में हैं। शेयर बाजार इसकी वजह से औंधे मुंह गिर पड़ा है। दुनिया में आर्थिक मंदी लौट आने की बातें शुरू हो गई हैं। वाणिज्य और उद्योग मंडल पीएचडीसीसीआई के मुताबिक, कोरोना वायरस के फैलाव से वैश्विक ग्रोथ 0.3 प्रतिशत तक घट सकती है, यानी करीब 230 अरब डॉलर का नुकसान। वहीं अफ्रीका और मिडल ईस्ट में टिड्डियों ने आतंक मचा रखा है। लाखों एकड़ की खड़ी फसल इन्होंने तबाह कर दी है। कहा जा रहा है कि 20 सालों में यह टिड्डियों का सबसे बड़ा हमला है और जून तक ये टिड्डी दल 500 गुना बड़े हो सकते हैं। पाकिस्तान ने इसे राष्ट्रीय संकट घोषित कर रखा है और भारत में गुजरात और राजस्थान के किसान टिड्डियों की पहली मार झेल चुके हैं। 


टिड्डियों से होने वाली तबाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इनका एक झुंड एक दिन में जितनी फसल को नुकसान पहुंचाता है, उससे 35 हजार लोगों का पेट भर सकता है। क्लाइमेट चेंज और पॉल्यूशन जैसी समस्याओं से भी दुनिया परेशान है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग से लेकर मणिपुर की 8 साल की नन्हीं लिसीप्रिया कंगजुम तक क्लाइमेट चेंज के खिलाफ मोर्चा खोले बैठी हैं। क्या पता जल्द ही इन तमाम परेशानियों का कोई ऐसा कोई समग्र समाधान निकाल आए कि घोड़ों की लीद की तरह ये हमारी याद से भी उतर जाएं। हां, ऐसे युग बदलने वाले तोहफे यूं ही नहीं मिला करते। लीक से हटकर सोचना पड़ता है। मन में एक उम्मीद जगानी पड़ती है। घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा।
http://epaper.navbharattimes.com/details/97137-77863-2.html



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 20 February 2020

बी जे पी के साथ सरकार बनाना मुफ्ती मोहम्मद सईद का गलत फैसला ------ इल्तिजा मुफ्ती

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 19 February 2020

सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की कहानी है तलाक ------ मोनिका शर्मा

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बढ़ते तलाक के पीछे रिश्तों के बदले समीकरण

यूएन की रिपोर्ट में यह बात रेखांकित की गई है कि बीते दो दशकों में महिलाओं के अधिकार काफी बढ़े हैं, लेकिन परिवारों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले घटे नहीं हैं


कुछ समय पहले आई संयुक्त राष्ट्र की ‘प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड्स विमिन 2019-20: ­फैमिलीज इन ए चेंजिंग वर्ल्ड’ रिपोर्ट के मुताबिक  हमारे यहां नाकाम शादियों के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं। बीते दो दशकों के दौरान तलाक के मामले दोगुना हो गए हैं। यूएन की यह रिपोर्ट बताती है कि एकल परिवारों की बढ़ती अवधारणा के कारण देश में एकल दंपतियों वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है। 

यह रिपोर्ट हालांकि पूरी दुनिया की तस्वीर पेश करती है, लेकिन इसमें अलग-अलग क्षेत्रों और देशों की स्थिति को वहां की सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि और कायदे-कानूनों की रोशनी में देखने का प्रयास किया गया है। इसमें कहा गया है कि अगर एसडीजी (सस्टेनेबल डिवेलपमेंट गोल्स) का लक्ष्य हासिल करना है तो परिवार के अंदर जेंडर इक्वलिटी स्थापित करनी होगी। इस लिहाज से दुनिया के अलग-अलग देशों में तलाक बढ़ने की जो भी पृष्ठभूमि हो, भारत के सांस्कृतिक परिवेश में यह कोई सामान्य बात नहीं है। पिछले दो-ढाई दशकों में देश में महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता के मोर्चे पर जो बदलाव आए हैं उनकी तुलना उससे पहले के दशकों से नहीं की जा सकती। आज की  आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और उच्च शिक्षित युवतियां स्वाभाविक रूप से परिवार से जुड़े  फैसलों में भी भागीदारी चाहती हैं। अपनी सोच और समझ को लेकर वे अपनों से स्वीकार्यता चाहती हैं। लेकिन अधिकतर परिवार के अंदर का माहौल इस बदलाव को आत्मसात नहीं कर पा रहा। 

यूएन की इस  रिपोर्ट में यह बात रेखांकित की गई है कि बीते दो दशकों में महिलाओं के अधिकार काफी बढ़े हैं, लेकिन  परिवारों में मानवाधिकार उल्लंघन और लैंगिक असमानता के मामले घटे नहीं हैं। वे लगभग जस के तस हैं। हालांकि परिवार और समाज का पूरा ढांचा अब काफी हद तक बदल गया है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ले चुके हैं। लेकिन इन परिवारों में भी पुरुष पारंपरिक सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इस सोच से उपजी अपेक्षाओं पर आज की महिलाओं का रिस्पॉन्स इतना अलग होता है कि पारंपरिक सोच में उसका फिट बैठना मुश्किल होता है। यह स्थिति उन टकरावों को जन्म देती है जिन्हें संवाद की कमी, असहिष्णुता और संवेदनहीनता जैसे कारक तलाक तक ले जाते हैं।

यही स्थिति अक्सर इस आम शिकायत के रूप में सामने आती है कि उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम पति-पत्नी एक दूसरे की बात सुनना-समझना जरूरी नहीं मानते। एक समय में शादी के रिश्ते में सामंजस्य और समझौते लड़कियों की अनकही जिम्मेदारी हुआ करते थे। तब सामाजिक और आर्थिक निर्भरता के चलते इस जिम्मेदारी को निभाना महिलाओं की मजबूरी बन जाया करती थी। लेकिन शिक्षा के जरिए हासिल आर्थिक आत्मनिर्भरता ने लड़कियों की वह मजबूरी खत्म कर दी है। आज की पढी-लिखी और जॉब करने वाली लड़कियां उम्मीद करती हैं कि रिश्ता निभाने की कोशिश दोनों ओर से की जाए। ऐसे में शादी के बंधन को बचाए रखने के लिए  लड़कियों के  मन को समझने और उनका साथ देने वाली सोच की दरकार है।


नाकाम शादियों की बढ़ती संख्या केवल एक  आंकड़ा भर नहीं है। यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की कहानी है। एक तरफ परिवार टूट रहे हैं लेकिन इसका कोई विकल्प समाज में अभी विकसित नहीं हो पाया है। ऐसे में अगर इसे बचाने और स्वस्थ रूप देने की कोशिश नहीं हुई तो कई पीढ़ियों को इसकी त्रासदी झेलनी पड़ सकती है। यह तथ्य गौर करने लायक है कि भारत में  शादी के पहले 5 साल में ही तलाक की इच्छा रखने वाले युवाओं के हजारों मामले कोर्ट में चल रहे हैं। मामूली अनबन और मनमुटाव भी अब तलाक का कारण बन रहे हैं। जरूरी है कि  अब समाज और परिवार महिलाओं की काबिलियत  तथा आगे बढ़ने की उनकी  इच्छा को  समझे, उसका सम्मान करे।  एक-दूसरे से  तालमेल बैठाने  के भाव के बिना कोई परिवार नहीं चल सकता, यह अब महिलाओं को ही नहीं पुरुषों को भी समझना होगा।

http://epaper.navbharattimes.com/details/94057-76977-2.html

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 10 February 2020

एक निहायत शर्मनाक हादसा ------ रमाशंकर बाजपेयी

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Delhi के Gargi College में छेड़छाड़ का मामला Lok Sabha में उठा है. Congress सांसद गोरव गोगोई ने इसका जिक्र लोकसभा में किया है, गोगोई ने कहा है कि सरकार इसमें क्या कर रही है? शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने जवाब देते हुए कहा है कि बाहरी लोग कॉलेज में घुसे थे.थोड़ी देर पहले दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल यहां पहुंची. राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए कॉलेज में एक टीम भेजने की बात कही है.







 संकलन-विजय माथुर, 
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Saturday, 8 February 2020

हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग गठबन्धन विभाजन का जिम्मेदार ------ मनीष सिंह

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अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए नेहरू लियाकत पैक्ट हुआ था।  पैक्ट की पहली. लाइन में "इर्रिस्पेक्टिव ऑफ रेलीजियन" लिखा था। प्रंधानमंत्री जी ने अपने संसदीय भाषण CAA को उचित साबित करने के लिए इसी नेहरू-लियाकत पैक्ट को आधार बनाया। बीच का वो शब्द स्किप कर गए।


प्रधानमंत्री की स्पीच की तथ्यात्मक मिथ्यावाचन को टेलीग्राफ ने करीने से उजागर किया है। 
 बंगाल मंत्रिमंडल ,1941में हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के वित्तमंत्री बने



Manish Singh
07-02-2020 
विभाजन का जिम्मेदार कौन... क्रोनोलॉजी समझिये। 
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👉विभाजन पर सहमति क्यो दी गयी-इसलिए कि दंगे नही रुक रहे थे.. 
👉दंगे क्यो नही रुक रहे थे- क्योकि पुलिस बैठे देख रही थी
👉पुलिस क्यो बैठे देख रही थी- क्योकि दंगाइयों की सरकार थी
👉 दंगाई सत्ता तक कैसे आये - गठबंधन बनाकर
👉 गठबन्धन किनका था- हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का
👉 इनके लीडर कौन थे- सावरकर और जिन्ना
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1940 में मुस्लिम लीग पृथक पाकिस्तान का प्रस्ताव पास कर चुकी थी। 1941 में हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार के वित्तमंत्री बने।

सिंध की मुस्लिम लीग सरकार ने 1943 में पाकिस्तान बनने का रिजोल्यूशन पास किया। इस सरकार में हिन्दू महासभा के 3 मंत्री थे। प्रस्ताव के बाद भी मंत्रिमंडल में बने रहे।

कांग्रेस कहाँ थी??- विपक्ष में।

गांधी कहां थे??- विभाजन के खिलाफ जान देने की बात कर रहे थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद को कांग्रेस का अध्यक्ष बना रहे थे। जिन्नाह को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत कर रहे थे। महासभाइयों के लिए ये मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी।

गांधी को मारने की कोशिशें तेज हो गयी। 
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1941 में बंगाल के मुख्यमंत्री फजलुल हक, 1950 के दशक में पाकिस्तान के गृहमंत्री हो गए। उनके मंत्रिमंडल के वित्त मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ के फाउंडर प्रेजिडेंट हुए। 1946 आते आते जिन्ना को महासभा के टेक की जरूरत नही रही। महासभाई दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंके गए। लीग ने अपने इलाकों में दंगे करवाकर उसे पाकिस्तान बनवा लिया।

तो श्यामा प्रसाद नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। 
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नीचे एक नक्शा है। खुद से पूछिए की जो इलाके कांग्रेस के थे, वो पाकिस्तान क्यों नही बने। जवाब मिल जाएगा।

नीचे फोटो में भारत का पहला टुकड़े टुकड़े गैंग भी है। फोटो बंगाल मंत्रिमंडल की है, जो केंद्र में खड़े जिन्ना के साथ हैं। शक्लों से नही, कपड़ों से नही, तो टोपियों से पहचान लीजिये। आपका इतिहास का जानकार न होना शर्मनाक नही।


मगर जानने के बाद भी ... ?? डूब मरो। 70 साल आपके बाप-दादे इनसे नफरत क्यो करते रहे, कभी सोचा ???

https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2731672406917059









संकलन-विजय माथुर
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Sunday, 2 February 2020

इनका असल निशाना संविधान है ------ उर्मिलेश

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सन् 1948 की 30 जनवरी को सांप्रदायिक-फासीवादियों ने 'राष्ट्रपिता' पर निशाना साधा। तब से वे लंबे समय तक समाज और सियासत में हाशिए पर रहे! लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वे बड़ी ताकत के साथ उभरे हैं। इस बार 30 जनवरी के शहादत-दिवस को फिर रक्तरंजित किया गया! यह एक असमाप्त सिलसिले का हिस्सा है! इनका असल निशाना संविधान है! 30 जनवरी की हालिया घटना पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का विश्लेषण:


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश