Friday, 20 April 2018

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और सत्तारूढ़ दल को लाभ

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पूर्व पी एम मनमोहन सिंह साहब  जब मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग चलाने की मुहिम का विरोध करते हैं तब यह सुस्पष्ट समझना चाहिए कि, वह व्यक्तिगत आधार पर ऐसा कर रहे हैं लेकिन उनके द्वारा कांग्रेस - संस्कृति का हवाला दिया गया है। उनको क्या याद नहीं है कि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्भीक न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब द्वारा 12 जून 1975 को जब तत्कालीन कांग्रेसी पी एम इन्दिरा गांधी के विरुद्ध निर्णय देने पर सर्वोच्च न्यायालय के छह जजों को सुपरसीड करके  ए एन रे  साहब को इसलिए प्रधान न्यायाधीश बनाया गया था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को पलटा जाये। तब क्या वह न्यायपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं था  ? 
वस्तुतः मनमोहन सिंह साहब ही मोदी सरकार के गठन के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए उनके द्वारा  उठाया हर  कदम मोदी सरकार का रक्षा कवच सिद्ध होता है। 
 
 ------ (विजय राजबली माथुर )




Saturday, 14 April 2018

उर्मिलेश व चंद्र भान प्रसाद की नज़रों में डॉ आंबेडकर

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 13 April 2018

जलियाँवाला बाग नरसंहार के 99 वर्ष ------ मृदुला मुखर्जी

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 12 April 2018

कैसे आपने अपने मंदिर, अपने राम, अपनी भावनाएं दरिंदों को सौंप दीं ? ------अशोक कुमार पांडेय / अशोक कुमार चौहान

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 6 April 2018

सुचित्रा सेन : मधुबाला और मीना कुमारी का संगम ------ इकबाल रिजवी








अपने वक्त की बेहद खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्री सुचित्रा सेन अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रूपहले पर्दे पर निभाए अपने किरदारों की बदौलत वो हमेशा जिंदा रहेंगी। उनका जीवन का ज्यादातर हिस्सा रहस्य के साए में घिरा रहा। उनकी अभिनेत्री बेटी मुनमुन सेन और अभिनेत्री नातिन राईमा सेन को भी उस रहस्य और एकांत का दायरा तोड़ने की इजाजत नहीं थी।बिमल रॉय की फिल्म देवदास के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजी गईं रोमा उर्फ सुचित्रा का जन्म 6 अप्रैल 1931 को पाबना (बांग्लादेश) में हुआ था। उनके पिता करूणामोय दास गुप्ता अध्यापक थे। तीन भाइयों और पांच बहनो के बीच सुचित्रा पांचवें नंबर की संतान थीं। 16 साल की उम्र में ही उनकी शादी कोलकाता के जाने माने वकील आदिनाथ सेन के बेटे दिबानाथ सेन के साथ हुई। सुचित्रा ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वो फिल्मों में काम करेंगी लेकिन निर्देशक असित सेन जो उनके पारिवारिक मित्र थे, शिद्दत के साथ महसूस करते थे कि सुचित्रा में बेमिसाल अभिनेत्री के गुण हैं।
बाद में सुचित्रा के पति ने ही उन्हें फिल्मों में काम करने के लिये प्रोत्साहित किया। 21 साल की उम्र में जब उन्होंने रूपहले पर्दे पर कदम रखे उस समय सात माह की मुनमुन सेन उनकी गोद में थी। उनकी पहली फिल्म थी “शेष कोथाय“ लेकिन ये फिल्म 20 साल बाद “श्राबोन संध्या” के नाम से रिलीज हो सकी। उनकी पहली रिलीज फिल्म थी “सात नम्बर कैदी (1953)”। अपनी तीसरी फिल्म “शरे चौत्तर” में उन्हें बांग्ला फिल्म के सुपर स्टार उत्तम कुमार के साथ काम करने का मौका मिला। फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई और इसी फिल्म से बांग्ला सिनेमा को सुचित्रा सेन और उत्तम कुमार की अद्भुत जोड़ी मिली। अगले 25 साल तक 30 फिल्मे एक साथ कर ये जोड़ी बांग्ला सिनेमा पर राज करती रही। साल 1963 में सुचित्रा सेन के करियर की सबसे शानदार बांग्ला फिल्म आई। ”सात पाके बांधा,” सुचित्रा सेन के शानदार अभिनय के लिए उन्हें मॉस्को फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिला। किसी भारतीय अभिनेत्री को वहां पहली बार ये सम्मान मिला था।

हिंदी सिनेमा में सुचित्रा सेन की धमाकेदार एंट्री हुई बिमल रॉय की देवदास से। हांलाकि देवदास में पारो के रोल के लिये बिमल राय की पहली पसंद मीना कुमारी थीं लेकिन वे दूसरी फिल्मों में बेहद व्यस्त थीं फिर बिमल राय की नजरें मधुबाला पर टिकी लेकिन तब तक दिलीप और मधुबाला के रिश्त बेहद तनावपूर्ण दौर में पहुंच चुके थे। आखिरकार मधुबाला जैसी खूबसूरती और मीना कुमारी जैसी ट्रैजिक छवि की तलाश सुचित्रा सेन पर खत्म हुई। साल 1955 में रिलीज हुई देवदास में सुचित्रा सेन ने पारो की भूमिका में जान भर दी।असित सेन की फिल्म “ममता (1966) “ आज भी सुचित्रा सेन और अपने संगीत की वजह से याद की जाती है। इसका एक लोकप्रिय गीत सुचित्रा सेन के बेमिसाल सोंदर्य और अभिनय का सबसे सटीक चित्रण करता है। गीत के बोल हैं – रहें ना रहें हम महका करेंगे बन के कली बन के सबा बाग़े वफा में। लेकिन हिंदी फिल्मों की शिखर अभिनेत्रियों में सुचित्रा का नाम शामिल हुआ फिल्म “आंधी (1975) “ की वजह से।आंधी के बाद जब सुचित्रा को लेकर फिल्म बनाने के लिये कई फिल्मकार उत्सुक भी थे मगर अपना रोल पसंद ना आने की वजह से सुचित्रा ने कोई प्रस्ताव नहीं स्वीकार किया। उधर उनके परिवारिक रिश्ते असहज हो चुके थे। पति अमेरिका चले गए थे फिर वहीं उनकी मौत भी हो गयी। सुचित्रा खुद में सिमटती चली गयीं।1978 में सौमित्र चैटर्जी के साथ आई बांग्ला फिल्म “ प्रणय पाशा “ के फ्लॉप हो जाने के बाद उन्होंने खुद को तन्हाई के अंधेरे में छिपा लिया। उन्होंने घर से बाहर निकलना तक बंद कर दिया। उन्होंने 2005 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड लेने से भी मना कर दिया था क्योंकि वो किसी सार्वजनिक मंच पर नहीं जाना चाहती थीं। खामोशी, तन्हाई और अकेलेपन के बीच जी रही सुचित्रा सेन को 2014 में मौत ने इस दुनिया से हमेशा के लिये दूर कर दिया।
साभार : 
https://www.navjivanindia.com/people/suchitra-sen-an-international-indian-actress?utm_source=one-signal&utm_medium=push-notification

Tuesday, 3 April 2018

तेरी बातें ही सुनाने आए, दोस्त ही दिल को दुखाने आए ------ सुधीर नारायण

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 2 April 2018

ख्वातीनों को इंकलाबी सोच से रूबरू करवाया मजाज ने ------ शादाब रुदौल्वी

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 30 March 2018

अच्छे दिन के भ्रम में यह देश बुरे दिनों में आ गया...! ------ Santosh Bharti

* निर्णायक पदों पर दंभी, मूढ़, कट्टर, पूर्वाग्रही बैठ गये हैं और अपने निर्णयों से पूरे देश को दुख दे रहे हैं, जीवन दुभर कर रहे हैं।
** यह देश बहुत बड़ी तबाही की तरफ जा रहा है...आने वाले दिन बहुत बुरे होने वाले हैं..
*** इस देश का बुद्धिजीवी, सृजनशील, कलाकार, सोचने-समझने वाला, चिंतन-मनन करने वाला वर्ग इस सारे भुलावे में नहीं आया...न अन्ना के, न मोदी के...पर मोदी को उनकी जरूरत थी भी नहीं...आज तक भी भारत का बुद्धिजीवी वर्ग मोदी से दूर है...!
**** मोदी एक अभिशाप बनकर ही आया है...अब तक तो कुछ भी ऐसा नहीं किया कि लगे कि सवा अरब लोगों के जीवन में कोई सकारात्मक असर दिखाई देगा...हर तरफ से निराशाजनक खबरें आ रही हैं...विदेशी नीति हो, देश की सुरक्षा हो, आर्थिक स्थिति हो, सामाजिक सौहाद्र हो...कौन-सा ऐसा क्षेत्र है जिसमें कोई आशा नजर आ रही है?
***** पता नहीं अब इस देश का होगा क्या? समस्याएं तो तेज गति से बढ़ रही हैं...पीने का पानी भी कहां से आयेगा? सुना है अगले तीन-चार मानसून अच्छे नहीं होंगे...प्यास के कारण तड़फ-तड़फ के करोड़ों लोगों की मौत हो सकती है...और मोदी झकाझक कपड़े पहनकर रोड शो करता फिर रहा है, रैलियां कर रहा है...कोई गंभीरता या समझदारी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती.. कभी सोचा न था कि भारत के बुरे दिन यूं आयेंगे???

Santosh Bharti
जिस पद पर शक्ति हो, ताकत हो, जहां बैठ कर कोई व्यक्ति अपने निर्णयों से बहुजन के जीवन को प्रभावित कर सकता हो तो उस पद पर निश्चित रूप से समझदार, संवेदनशील, बुद्धिमान, इंसानियत से भरे हृदय वाले को ही बैठना चाहिए...!

मैं इस देश का दुर्भाग्य ही मानूंगा कि ऐसे निर्णायक पदों पर दंभी, मूढ़, कट्टर, पूर्वाग्रही बैठ गये हैं और अपने निर्णयों से पूरे देश को दुख दे रहे हैं, जीवन दुभर कर रहे हैं।

मेरी नजर में, आज दुनिया में भारत सर्वाधिक बुरे दौर से गुजर रहा है...जिस तरह से हर शक्ति के पद पर कट्टरपंथी बैठ गये हैं...वह भयानक भविष्य के लिए आशंकित करता है...इतिहास गवाह है जब भी किसी देश में किसी जवाबदार पद पर इस तरह की मानसिकता का व्यक्ति जा बैठा...उस देश ने भयंकर तबाही देखी...हिटलर हो कि मुसोलिनी हो कि सद्दाम हो कि जोंग हो...अच्छे दिन के भ्रम में यह देश बुरे दिनों में आ गया...!


मैं लगातार लिखता रहा हूं...यह देश बहुत बड़ी तबाही की तरफ जा रहा है...आने वाले दिन बहुत बुरे होने वाले हैं...आर्थिक संकट, रोजगार, मंहगाई, सामाजिक सौहाद्र, दंगे, अपराध...आंधी आती दिख रही है...इससे बड़ी पेय की जल की समस्या...एक या दो सालों में प्यास से इस देश में करोड़ों लोग मर जायेंगे...बहुत सुना है कि आने वाले दिनों में पानी के लिए युद्ध होंगे...ऐसा कोई युद्ध पाकिस्तान से हो जाये तो हैरानी नहीं होगी...समस्याएं अनेक हैं, दिन-पर-दिन देश भयंकर समस्याओं में उलझ रहा है और शक्ति के पदों पर बैठे लोग अपनी अय्यासी में मशगूल हैं...!
https://www.facebook.com/santosh.bharti.5095/posts/10155622028134037

Santosh Bharti
कुछ साल पहले अचानक अन्ना का नाम खबरों में आया। मैंने अपने जीवनकाल कभी यह नाम नहीं सुना था। और अचानक नाम आया ही नहीं...बकायदा मसीहा, गांधी के समकक्ष खड़ा कर दिया गया...उस समय की सरकार के भ्रष्टाचार को लेकर ऐसा हल्ला मचाया कि यूं लगा कि बस इस सरकार ने तो सब कुछ तबाह ही कर दिया...मैं उस समय से लगातार लिखता रहा कि यह कोई बहुत बड़ी चाल है...पर्दे के पीछे कोई अपार धन लगा रहा था...एक तटस्थ व्यक्ति की छबि खड़ी कर सरकार को घेरना आम जनता पर काफी असर डालता है और डाला भी...

मैं जब भी अन्ना को सुनता तो वह एक साधारण ट्रक ड्रायवर को सुनने जैसा ही होता...कांग्रेस सरकार इस तरह के हमले से निपट नहीं पाई...तील का ताड़ बनाकर कांग्रेस को खूब बदनाम किया गया...ठीक चुनाव के पहले फिर से अचानक एक दुर्जन को पेश किया गया--मोदी, मोदी, मोदी...सारा मीडिया यूं झूमने लगा मानो बस जिस मसीहा की तलाश थी, इंतजार था अवतरण हो ही गया...यह भी एक चाल थी...पर्दे के पीछे से धन लग रहा था...!

फिर चुनाव में अच्छे दिन आने वाले हैं...भारत का आम आदमी जो कि मूलतः आलस्यी है, गैर-जिम्मेदार है, कर्मठ नहीं है...इस सम्मोहन में आ गया कि बस इस आदमी को चुन भर लो, वोट दे दो और दूसरे दिन घर के बाहर मर्सडिज खड़ी होगी, हाथ में आई फोन होगा औैर कुरुप पत्नी उर्वशी बन जायेगी....31 प्रतिशत औसत समझ के लोग ले आये मोदी को...पर्दे के पीछे से जो धन लगा, जो बिजनेस में इन्वेस्ट किया...उनका काम बन गया...चार ही सालों में उन्होंने सूद समेत धन वसूर लिया...!

अब ये दुर्जन कोई मसीहा-वसीहा तो थे नहीं...कुछ कारपोरेट के हाथों की कठपुतली थी...आनन-फानन में ऐसे निर्णय लिये गये ताकि कारपोरेट की तिजोरियां उफन पड़े और ऐसा हुआ भी...नोटबंदी को करार वार इसीलिए था...आम आदमी मर गया, गांव-गांव, नगर-नगर, शहर-शहर करोड़ों लोगों का जीवन उथल-पुथल हो गया...जब देखा कि यह उथल-पुथल गुस्सा बनकर फूट सकता है तो मोदी फिर आ गया--भाइयों-बहनों सिर्फ पचास दिन मुझे दे दो...यदि पचास दिन में सपनों का भारत ने दे दूं तो जिस चौराहे पर कहोगे आ जाउंगा सजा के लिए।’ पचास की जगह पांच सौ दिन बीत गये, जीवन दूभर हो गया...लेकिन गुस्से के उबाल को तरकीब से ठंड़ा कर दिया...फिर चली खरीद-फरोख्त, धन की ताकत...कुटील चालें, खींच-तान...देखते ही देखते देशभर में शासन फैलता चला गया...

एक बात समझने जैसी है कि इस देश का बुद्धिजीवी, सृजनशील, कलाकार, सोचने-समझने वाला, चिंतन-मनन करने वाला वर्ग इस सारे भुलावे में नहीं आया...न अन्ना के, न मोदी के...पर मोदी को उनकी जरूरत थी भी नहीं...आज तक भी भारत का बुद्धिजीवी वर्ग मोदी से दूर है...!

अब अन्ना फिर दिल्ली आये हैं...एक आदमी नहीं फटका...पर्दे के पीछे कोई नहीं है...अन्ना खुद में तो कोई दम न कभी था, न अब है...???

आधुनिक भारत के लोकतंत्र में धन का ऐसा खेल पहले कभी नहीं देखा...दो-तीन कारपोरेट ने एक सत्ता का उलट दी, एक आम मूर्ख को मसीहा बनाकर देश की छाती पर रख दिया...कोबरा पोस्ट का इंस्टिग आया है...छद्मश्री भजप शर्मा और गोबरस्वामी की पाले खोली है...पर देखा कोई असर नहीं हुआ...जरा कल्पना करो कि ऐसी कोई पोल कांग्रेस के खिलाफ कोई खोलता????


मैं देश को लेकर पूरी तरह से निराश हूं....हम बहुत बुरे दौर में आ गये हैं....???
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Santosh Bharti
एक संवेदनशील, समझदार, इंसानियत रखने वाला व्यक्ति कोई भी कदम उठाने के पहले हजार बार विचार करता है कि उसके किसी कदम से किसी को दुख न पहुंच जाये। लेकिन इससे ठीक उल्टा, मूर्ख, दंभी, संवेदनहीन व्यक्ति कुछ भी कर सकता है...अपने खुद को महान बनाने के लिए या सच साबित करने के लिए किसी को भी दुख दे सकता है...पूरे देश, समाज या दुनिया को खतरे में डाल सकता है।

मोदी दूसरी तरह का व्यक्ति है। मैं आज तक भी समझ नहीं पाया कि नोटबंदी जैसा भयावह निर्णय इस व्यक्ति ने कैसे ले लिया? इतना क्रूर निर्णय लेते मोदी ने कुछ सोचा भी? करोड़ों-करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी को मूल रूप से तहस-नहस कर देने वाला निर्णय कैसे लिया गया? आज तक पता नहीं चला कि मोदी ने किसके कहने पर यह निर्णय लिया...किस की सलाह से? और क्यों? खुद मोदी ने जो कारण गिनाये थे उनमें से कोई भी कारण पूरा होता नहीं दिखा--आज तक! अलबत्ता अरबों-अरबों रुपये की चपत लग गई वो अलग और भारत में काम-धंधा कब वापस पटरी पर आयेगा पता नहीं...बेरोजगारी, गरीबी और अभाव के होते अपराध बढ़ रहे हैं, देश दुखी है...फिर इस साल प्रसन्नता की सूची में ग्यारह पायदान लुढ़का....!

मेरे लिए मोदी एक अभिशाप बनकर ही आया है...अब तक तो कुछ भी ऐसा नहीं किया कि लगे कि सवा अरब लोगों के जीवन में कोई सकारात्मक असर दिखाई देगा...हर तरफ से निराशाजनक खबरें आ रही हैं...विदेशी नीति हो, देश की सुरक्षा हो, आर्थिक स्थिति हो, सामाजिक सौहाद्र हो...कौन-सा ऐसा क्षेत्र है जिसमें कोई आशा नजर आ रही है?

उत्तर प्रदेश की खबरें तो बुरी तरह से विचलित करने वाली आ रही हैं....पता नहीं अब इस देश का होगा क्या? समस्याएं तो तेज गति से बढ़ रही हैं...पीने का पानी भी कहां से आयेगा? सुना है अगले तीन-चार मानसून अच्छे नहीं होंगे...प्यास के कारण तड़फ-तड़फ के करोड़ों लोगों की मौत हो सकती है...और मोदी झकाझक कपड़े पहनकर रोड शो करता फिर रहा है, रैलियां कर रहा है...कोई गंभीरता या समझदारी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती.. कभी सोचा न था कि भारत के बुरे दिन यूं आयेंगे???
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08 नवंबर 2016 को यू एस ए में राष्ट्रपति पद का मतदान था और उसी दिन भारत में नोटबंदी की घोषणा हुई। 
वस्तुतः बराक ओबामा साहब हटते - हटते अपने देश की उन कंपनियों को लाभ पहुंचाना चाहते थे जो दूने के कगार पर थीं। उनके भरोसेमंद मित्र ने अपने देश में नोटबंदी करके उन कंपनियों को भरपूर लाभ पहुंचा दिया, ऐसा जर्मन चांसलर ने एक प्रेस कान्फरेंस के दौरान रहस्योद्घाटन किया था। 
------ विजय राजबली माथुर 

Thursday, 29 March 2018

शहर लखनऊ शूटिंग के लिहाज से फ्रेंडली है : तिगमांशु का साक्षात्कार ज़ेबा हसन को

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश