Thursday, 5 July 2018

सरकार और पूंजीपति केवल अपने हितों के ------ डॉ प्रमोद पाहवा



Parmod Pahwa
05-07-2018 
सरकार पर बाज़ार वाद का दबाव :-

कांग्रेस प्रवक्ता पर की गई अभद्र टिप्पणी के कारण उठाये गए सख्त कदम और उनके पीछे के दबावों पर एक विश्लेषण।

* फेसबुक तथा ट्वीटर सभी को निशुल्क अपने विचार व्यक्त करने एवं अनजान लोगों से जुड़ने की सुविधा उपलब्ध कराता है।

*फिर भी अथाह आय करता है जो विज्ञापनों के माध्यम से होती हैं।

*सामान्यता 30 से 40 आयुवर्ग के व्यक्ति ही अधिकतम खरीददारी करते हैं तो उनके द्वारा विज्ञापन देखना एवम प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहना ही आय का साधन है।

*गत कुछ समय से गालीबाजो/ट्रोल्स के कारण प्रबुद्ध वर्ग fb से विदा लेता जा रहा था और निम्न आयवर्ग के बच्चों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था।

*fb से ट्वीटर की ओर गया हुआ ट्रेफ़िक जब कम्पनियों की चिंता का कारण बनना शुरू हुआ तो भारत सरकार पर असहिष्णुता के आरोप लगने शुरू हो गए जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि चिंताजनक रूप से खराब कर रहे थे।

*हम सभी जानते है कि दोनों सोशल मीडिया कम्पनियों की मालकियत किस देश की है एवम मोदी सरकार किस दबाव में काम करती हैं।

*ऐसे में सरकार के पास कोई और चारा नहीं रहा कि सायबर ट्रोल्स के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करे।

*कुछ अच्छा लिखने वालों की गैर मौजूदगी पर कम्पनियों की तुरन्त निगाह रहती हैं। ऐसे में यदि आने वाले समय में कथित आईटी सेल के अपने ही लोगो के विरुद्ध सरकार कार्यवाही करने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

◆उदाहरण के लिए रवीश कुमार के प्राइम टाइम में सबसे अधिक सरकार की ही आलोचना होती हैं लेकिन सबसे अधिक विज्ञापन पतञ्जलि के ही होते है। 
क्योकि सरकार और पूंजीपति किसी के नही केवल अपने हितों के लिए होते है तो ऐसा तो होना ही था ! 
बाज़ार से बिगाड़ कर तो हज़ूर की भी हिम्मत नहीं है जो दो कदम चल सके◆
साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=241155223338127&set=a.200468104073506.1073741829.100023309529257&type=3
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Wednesday, 4 July 2018

सरकारों को जनता की कसौटियों पर खरा उतरना होता है न कि, जनता को सरकारों की ------ विषाद कुमार

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 3 July 2018

डिप्लोमेटिक ब्लाईंडनेस है मोदी सरकार की विदेश नीति ------ रहीस सिंह

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 2 July 2018

अमरीका भारत के बुरे वक़्त में काम कभी नहीं आया ------ शेष नारायण सिंह

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आज भारत के जिन इलाकों में भी अशांति है , वह सब अमरीकी दखलंदाजी की वजह से ही है . कश्मीर में जो कुछ भी पाकिस्तान कर रहा है उसके पीछे पूरी तरह से अमरीका का पैसा लगा है . पंजाब में भी आतंकवाद पाकिस्तानी फौज की कृपा से ही शुरू हुआ था . पूर्वोत्तर भारत में जो आतंकवादी पाकिस्तान की कृपा से सक्रिय हैं , उन सबको को पाकिस्तान उसी पैसे से मदद करता था जो उसे अमरीका से अफगानिस्तान में काम करने के लिए मिलता था  :: 
Shesh Narain Singh
02-07-2018 






साभार : 
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1756971584389244&id=100002292570804

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 27 June 2018

पैसा और पॉवर का मुक़ाबला सोशल मीडिया और सच की ताकत से ------ एकता जोशी



एकता जोशी
26-06-2018 

मीडिया की  पोल खोल !!

आपके कई लोग पिछले कई दिनों से पूछ रहे है की- मीडिया हमारा आन्दोलन क्यों नहीं दिखा रहा? बात एकदम सही है। आईये जानते है हर एक मीडिया चैनल और उनके मालिको का सच।

Zee news:
यह चैनल का मालिक सुभाष चंद्रा है।सुभाष चंद्रा नरेन्द्र मोदी के काफी करीबी व्यक्ति है। 2014 चुनाव में इन्होने न सिर्फ बीजेपी को पैसे दिए थे बल्कि खुद मोदी की हरयाणा में हुई हर चुनावी रैली में उपस्थित रहे थे।

इस चैनल के दुसरे अहम् व्यक्ति है- सुधीर चौधरी। जो जी न्यूज़ का एंकर है। और आप भी इन्हें जानते होगे। यह व्यक्ति पत्रकार के नाम पर कलंक है। यह दलाल 2012 में उद्योगपति नवीन जिंदल से 100 करोड़ की रिश्वत मांगते कैमरे में कैद हुआ था। और फिर तिहाड़ जेल की हवा भी खा चूका है। JNU छात्र कन्हैया कुमार का फर्जी नारों वाला विडियो भी इसीने बनवाया था।
इनकी मोदी भक्ति से खुश मोदी सरकार ने इन्हें z श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करवाई है।

IndiaTV :
यह चैनल का मालिक रजत शर्मा है। आप सभी इन्हें अच्छे से पहचानते होंगे। रजत शर्मा के पिता BJP के नेता थे। खुद रजत शर्मा ABVP के अध्यक्ष रह चुके है,और इनकी पत्नी आजभी बीजेपी की नेता है। इस चैनल की हर न्यूज़ मोदी को महान दिखाने के एंगल से बनायीं जाती है। हर न्यूज़ में मोदी-भक्ति दिखाई देती है। कहा जाता है इस चैनल का पूरा खर्च बीजेपी उठाती है। मोदी सरकार ने रजत शर्मा को Editor's Guild का अध्यक्ष बनाया है।

Aaj Tak:
यह चैनल India Today ग्रुप का एक हिस्सा है। जिनके मालिक अरुण पूरी है। इस ग्रुप द्वारा India Today नाम की मैगज़ीन प्रकाशित की जाती है। अगर आप एक बार भी इस मैगज़ीन को पढोगे या एक दिन के लिए आज तक/Headlines Today चैनल देखोगे तो आपको पता चल जायेगा की इस ग्रुप की वफ़ादारी किस तरफ है।

Times Now, IBN7, CNN-IBN-
यह तीनों चैनल TV18 ग्रुप का हिस्सा है। जिनके मालिक मुकेश अम्बानी है। मुकेश अम्बानी और नरेन्द्र मोदी के आपसी रिश्तो के बारे में जितना कहा जाये उतना कम होगा।

News24- 

यह चैनल के मालिक कोंग्रेस नेता राजीव शुक्ला है। जो अरुण जेटली के काफी अच्छे दोस्त भी है।

उपर दिये गये चैनल्स के साथ-साथ देशके बाकि बचे हुये लगभग हर चैनल्स और आज देशमें मौजूद 95% से ज्यादा अखबारों (न्यूजपेपर) के मालिक मनुवादी ब्राह्मण और बनिया लोगही हैं।

क्या अब भी आपको लगता है की यह लोग कभी भी मोदी सरकार के खिलाफ कोई खबर पुरे जोर से दिखायेगे??! या मनुवादियो के खिलाफ कुछ दिखायेंगें? ब्राह्मणवादविरोधी आंदोलन, आंबेडकरवादी आंदोलन, फुले,शाहू,आंबेडकरवादी विचार कभी अपने चैनल्स पे दिखायेंगें? अपने न्यूजपेपर्स या मैगजिनमें छापेंगें? वो ऐसा कभी नहीं करेंगें।

यह घिनोना सच जानकर हमें निराश नहीं होना है। क्योंकि अगर इन लोगो के पास पैसा और पॉवर है तो हमारे पास भी सोशल मीडिया और सच की ताकत है।

आप सभी से निवेदन है की एक बने रहिये, बिखर मत जाना। मीडिया आपके इस विराट आन्दोलन को दिखाये या ना दिखाये, आपको कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए । आप और हम सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग करेंगे और सच की मशाल कायम करेंगे। याद रखे अगर हम मनुवादियो को सत्ता में ला सकते है तो उन्हें उखाड़ भी सकते है।

#आपकी एकता
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=210792949545734&set=a.108455693112794.1073741829.100018450913469&type=3

एकता जोशी

Sunday, 24 June 2018

हम हंसी तलाशते रहे, गुम हो गई मुस्कान भी ------ अनीता गौतम








Anita Gautam

कुछ मैंने भी कहा है...!Anita Gautam
(अब तक फेसबुक पर लिखे अपने शब्दों को इकट्ठा कर दिया है।)
अनिता गौतम.
1) हवाओं को कभी अपना पैगाम भेजोगे
हर पन्ने पर हमारा ही नाम लिखोगे...!

2) तुम्हारा आना, मुस्कुराना और ख्वाबों को सजाना
गले से लगाकर वो प्यार जताना,
सब बीते जमाने की बात हो गई है।
अब तो तन्हाई ही हमसफर है, 
और खामोशी ही तुम्हारी 
सबसे अनमोल सौगात हो गई है।।

3) दोस्ती-दुश्मनी का कोई मतलब नहीं रहा।
जब जी रहे हैं सभी, सिर्फ अपने लिये यहां।।

4) ऐ दीये! तू ‘उनके’ ही घर रौशन कर 
मेरा आंगन तो ‘उनकी’ यादों से ही जगमग है।

5) ये सिमटी धरती, ये विस्तृत नजारे,
मुस्कुराता चांद, ये झिलमिल सितारे
सब अपने से लगते हैं. . . 
जब आप हमें अपना कहते हैं ।

6) इंतजार कर लेंगे, इकरार कर के तो जाओ.
खामोश नजरों से, इजहार करके तो जाओ।

7) सितारों के बीच मुस्कुराता चांद तन्हा सा क्यों है,
क्यों उसकी निगाहें धरा पर ही टिकी रहती,
कोई तो है जिसकी तलाश उसे आज भी है....?

8) तुम्हारी खामोशी सितम बन गयी है,
कहीं मर न जायें सितम सहते सहते।।

9) देखों तुम्हारे रुठने से मौसम भी बदल जाते हैं,
गर मुस्कुरा सको तो मंजर कुछ और हो !

10) तुमसे दूर होकर जीना कब चाहा हमने। 
गर तुम जी सको तो इजाजत है तुम्हें।।

11) हसीन लम्हों को सासों में बसा लो,
कौन जाने कब ये सांस थम जाये !!!

12) कोई दर्द से तड़प रहा या किसी की रूह भटक रही है,
किसी के अपने छूट रहे हैं या किसी के ख्वाब टूट रहे हैं?

13) ता उम्र अपनी चाहतों का हिसाब मांगते रहे । 
तेरी एक मधुर मुस्कान ने कर्जदार बना दिया ।।

******                                                          ******                                                                 ******




  14) दिल तो पहले ही ले लिया...
फिर कहते ...
दिल से दिल की बात समझो !!!

15) थोड़ा हम ऊपर जायें, थोड़ा आसमान झुक जाये,
कुछ इस तरह धरा - गगन का मिलन हो जाये|

16) चाहा भी मरना, तो मर न सके
ये सांसें तुम्हारी अमानत जो थी।

17) शिकवे -शिकायतों ने बढ़ा दी दूरियां,
बेवफा तो हम दोनों ही न थे ।।

18) जजबात को शब्दों का मोहताज न बना,
झुकी नजरें भी मोहब्बत को बयां करती हैं।

19) हमारी ही दुआओं से आप कामयाब हैं
हम आम ही रहे, पर आप तो “खास” हैं।

20) गम-ए-जिन्दगी की बर्बादियों का हिसाब करोगे
हर खाने में बस ‘मोहब्बत’ को पाओगे
सितम किसका था, दरकिनार कर
इल्जाम सिर्फ ‘उन’ पर लगाओगे।

21) तुम बेवफा नहीं यह तो धड़कनें भी कहती हैं
अपनी मजबूरियों का कोई पैगाम तो दिया होता।

22) अधूरी मोहब्बत "दास्तान" बनती है ,
तो मुकम्मल प्यार "अफसाना...।"

23) भरी महफिल में भी तन्हा ही रहे हम,
एक तेरे साथ ने महफिल सजा दिया।।

24) यूं तो नजारों में हजारों रंग बिखरे हैं
हर रंग फीका है, एक तुम्हारे बिना !

25) साथ जीने की कसम से बंधे हैं ये जिस्मों- जां,
एक बार आ जाओं... तो ये दम निकले ।।

26) आंसुओं के संग बह गयीं हैं बद्दुआयें सारी
जो लग जाती तो तुम बिखर जाते ।।

27) तुम्हारी हर बात याद आई
जब भी तुम्हें भुलाना चाहा।।

28) कहानी हमारी अधूरी है तुम बिन …
बस इक झलक की है दरकार बाकी !

29) चांद, सितारे... बहार, नजारे
सब तुम्हारी याद दिलाते हैं,
तुम कहते हो तुम्हें भुला दू !

30) तुम्हारे वादे पर है, हमें पूरा ऐतबार
तभी तो आज भी है तुम्हारा इंतजार।।

31) अनगिनत ख्वाहिशों के बीच जी रहे हैं लोग,
मैंने तो बस एक तुम्हारी ख्वाहिश की है।

32) तुम्हें भुलाने की बहुत कोशिश की ...
कहते हैं हर कोशिश कामयाब नहीं होती!

33) मैंने कब कहा मंजिल आसान थी ,
आपके साथ ने बस रास्ते बना दिये !

34) बारिश की बूंदे भी साजिश का शिकार हैं
कहीं मोती हैं, तो कहीं अश्कों की धार हैं।

35) दिल में हो या दिल के करीब हो ... ???
दिल अपना तो हो !

36) लिखा तो हमने अपनी हथेलियों पर, आपका ही नाम था,
डबडबाई नजर ने धुंधली की, बहते आंसुओं ने धो दिया।।

37) गम- ए- जिन्दगी की पहेलियों को सुलझाते रहे तुम 
खुली किताब थी मैं, कोई पन्ना, पलट लिया होता !!!

38) मुझे समझाने की जिद, और जुदा हो गये हम
काश . . .कि कभी मुझे भी समझ लिया होता !!!

39) आसमान में सितारों की तरह बिखरी हैं तुम्हारी यादें
किसे आंचल में समेटे किसे जाने की इजाजत दे दे !

40) हजार जिन्दगी इस मौत पर कुर्बान. . . .
जनाजे को तेरे कंधे का सहारा जो मिल गया !

41) गम छुपाते रहे, आपकी खुशी में साथ निभाते रहे।
दिल रोया, आंखे बरसी, फिर भी मुस्कुराते रहे।।

42) चांद ,सितारे, बहार और नजारे
सब उनके हमसफर हैं , 
जिनपर आपकी नजर है।

43) मुझे चाहोगे, इजाजत तो लेते,
जब चाहा , फिर निभा तो देते।

44) अनचाहे, अनजाने रिश्तों पर कितने इल्जाम?
सुना है मोहब्बत के भी उसूल होते हैं !!!

45) आज भी है दिल को तुम्हारा इंतजार,
सुना है लोग तुम्हारी वफा की कसमें खाते हैं।

46) आपसे सारी शिकायते खतम हो गई..
जब सुना, प्यार में तो लोग अक्सर बदल जाते हैं।

47) हर सांस तुम्हारे नाम थी, तुमसे ही हर शाम थी,
हम हंसी तलाशते रहे, गुम हो गई मुस्कान भी ।

48) दिल टूटा, हर ख्वाब आंसू बन कर बह गये, 
अब तो बस तुम्हारी यादें हैं और तन्हाई है।

49) तुमसे दूर होकर भी, जी रहे हैं हम,
कहते हैं दूरियों से प्यार बढ़ता है ।।

50) यहां न सही तुम संग, वहां घर अपना बसायेंगे,
सुना है, सितारों के आगे जहां और भी है।।

51) बेइरादा मिली जब नजर, मुस्कुरा उठे आप,
आज नजरों में बसकर भी, अजनबी बने हो।

52) बेवफा गर इंसान है, 
फिर वक्त क्युं बदनाम है ?

53) वक्त की जो है बेवफाई, 
इल्जाम इंसान के हिस्से में क्यों है आई ???

54) यूं हमारी राहें, आज जुदा-जुदा न होती,
गर तुमने, 
कुछ मुझको सुना होता, कुछ अपनी कही होती ।।

55) प्यार दिल से करो ....... जिस्म से नहीं।
खूबसूरत जिस्म में भी पत्थर दिल मिल जाते हैं।।

56) पंख फैलाओ , ऊंचाई तक जाओ ।
गढ़ो नया आसमान, भरो ऊंची उड़ान।।

57) तुम कहते हो , हमारी यादें सताती हैं तुम्हें,
प्यार करने की जिद भी तो तुम्हारी ही थी।।

58) विरान सी है जिन्दगी, तुम्हारे बिना, 
दिल लगाकर रिश्ता भी निभाया होता।

59) वफा की बात न करते , हमें इल्जाम न देते,
कभी हम साथ गुजरे थे, इसे गर याद कर लेते ।।

60) वे कौन होते हैं जो वादे पर मरते है,
हमसे तो कोई वादा भी नहीं करते हैं।

61) न ये अदा है , न मोहब्बत का इजहार
नजरें तो आपके अदब में झुक जाती हैं।

62) अमावश की रात को 'दीये' की दरकार है 
पूनम की रात तो चांद से ही गुलजार है।।

63) तेरे बाद ये समझा, तेरे बाद ये जाना, 
कि जिन्दगी तुझसे थी इतनी हसीं !!!

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https://www.facebook.com/anita.gautam.39/posts/1108362262586078



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Saturday, 23 June 2018

जनतंत्र प्रहरी न्यायमूर्ती चेलमेश्वर साहब का जन्मदिन मुबारक हो

न्यायमूर्ती चेलमेश्वर साहब का जन्मदिन मुबारक हो। हम उनके सुंदर, सुखद,स्वस्थ, समृद्ध और दीर्घायुष्य जीवन की मंगलकामना करते हैं। 
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 21 June 2018

‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है...’ :डेविड अब्राहम ------ इकबाल रिजवी





आज भी याद आते हैं, ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है...’ गाने वाले जॉन चाचा : 

डेविड अब्राहम और अमोल पालेकर (फिल्म बातों बातों में)

डेविड की जिंदगी में फिल्म ‘बूट पालिश’ (1954) मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने बच्चों से प्यार करने वाले दयालु जॉन चाचा का किरदार निभाया। पर्दे पर उनका गाया गीत ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…’ बरसों तक रेडियो पर बजता रहा।
खेलों की दुनिया में कोई बड़ा मौका नहीं मिला, वकालत चली नहीं, बस शौक में फिल्मों में अभिनय क्या किया वही उनका कैरियर बन गया। उनका नाम था डेविड। कद तो महज पांच फुट तीन इंच था, लेकिन छोटा कद उन्हें फिल्मों में लंबी पारी खेलने से नहीं रोक पाया।21 जून 1909 को महाराष्ट्र के ठाणे में जन्मे डेविड अब्राहम एक संपन्न यहूदी परिवार से संबंध रखते थे। उनकी परवरिश मुंबई में हुई, जहां उनके पिता रेलवे में इंजीनियर थे। उन्हें कसरत करने का खासा शौक था और घरवालों की ख्वहिश के चलते कानून की पढ़ाई पूरी की, लेकिन इस दौरान उनकी खेलों में रूचि बढ़ती गयी। वे न सिर्फ वेटलिफ्टिंग करने लगे बल्कि कई प्रतियोगिताएं भी जीतीं। कानून की पढ़ाई के बाद डेविड अदालत में बैठने लगे, मगर कई महीने तक कोई केस ही नहीं मिला। उन्होंने नौकरी ढूंढने की भी जीतोड़ कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। खेलों की दुनिया ने उन्हें शोहरत तो जरूर दी लेकिन इतना पैसा नहीं मिला कि खेलों को अपना कैरियर बना पाते।कालेज के दिनों में डेविड इंडियन पीपुल्स थियेटर से जुड़े थे। उसी दौर के एक दोस्त ने उनके मन में फिल्मों के प्रति दिलचस्पी जगायी। डेविड काम की तलाश में बहुत परेशान थे और कुछ पैसे कमाने के लिए वे फिल्मों में काम करने को राजी हो गए। 1937 में फिल्म ‘जम्बो’ में उन्हें छोटा सा रोल मिला। इसमें युवा डेविड को एक बूढ़े प्रोफेसर का किरदार निभाना पड़ा। इसके बाद एक दो और फिल्मों में उन्होंने कुछ छोटे छोटे रोल किए। फिर फिल्म ‘नया संसार’ (1940) में उन्हें अहम रोल मिला और उनकी पहचान एक अभिनेता के रूप में बनी। 1944 में आई फिल्म ‘द्रौपदी’ में शकुनी का किरदार निभा कर डेविड ने अपने अभिनय की नयी रेंज का प्रदर्शन किया।संवाद याद करने, कैमरे का सामना करने और फिल्म यूनिट में लोगों के साथ बात चीत करना डेविड को इतना भाता था कि फिर उन्होंने किसी और दूसरे काम के बारे में सोचा ही नहीं। फिल्मी दुनिया को ही उन्होंने हमेश के लिये अपना परिवार बना लिया। डेविड को जो भी रोल मिलते थे, वे स्वीकर कर लेते थे। इससे उनकी अच्छी आमदनी तो हुई ही साथ ही हर तरह के रोल निभाने का मौका भी मिला। फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास डेविड के बड़े प्रशंसक थे और अपनी कई फिल्मों में उन्हें मौका दिया।डेविड एक चरित्र अभिनेता के रूप मे स्थापित हो चुके थे। तभी उनकी जिंदगी में फिल्म ‘बूट पालिश’ (1954) का अध्याय जुड़ा। इस फिल्म में उन्होंने बच्चों से प्यार करने वाले दयालु जॉन चाचा का किरदार निभाया। पर्दे पर उनका गाया गीत ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…’ बरसों तक रेडियो पर बजता रहा। इस फिल्म के लिये डेविड को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। यह फिल्म उनके जीवन में मील का पत्थर बन गयी। सालों तक लोग उन्हें जॉन चाचा कह कर बुलाते रहे।

डेविड फिल्मों से जरूर जुड़े, लेकिन खेलों के प्रति उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई। वे महाराष्ट्र वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन के 30 साल तक अध्यक्ष रहे। 1952 में हेलसिंकी में हुए ओलंपिक में वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता के जज भी बने। बात चीत में तेज तर्रार डेविड ने खेलों की कमेंट्री भी की और फिल्मी प्रशंसकों से अधिक खेल के प्रशंसकों में लोकप्रिय रहे। उन्हें सरकारी और गैरसरकारी कार्यक्रमों के संचालन का काम भी मिलने लगा। फिल्म फेयर के पहले अवार्ड का संचालन डेविड ने ही किया था।निजी जीवन में भी डेविड का हास्य बोध बहुत जबरदस्त था। डेविड ने सवा सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी चर्चित फिल्मों में हाथी मेरे साथी, बातों बातों में, अभिमान, कालीचरण, गोलमाल, खट्टा मीठा, सत्यकाम और खूबसूरत शामिल हैं। डेविड ने जीवन भर शादी नहीं की। 1979 में डेविड ने इजराइल में बसने का फैसला लिया, इसी सिलसिले में वे अपने रिश्तेदारों के पास टोरंटो गए। 28 दिसंबर 1981 को वहां उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 2 जनवरी 1982 को डेविड का निधन हो गया।

https://www.navjivanindia.com/people/david-the-unforgotten-hindi-film-actor-who-become-john-chacha

Monday, 18 June 2018

सत्ता पर घमंड चढ़ा तो बर्बाद हुई आबादी ------ चंद्रशेखर जोशी


Chandrashekhar Joshi
18-06-2018 
सत्ता पर घमंड चढ़ा तो बर्बाद हुई आबादी
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भारत में एक भयावह घटना हुई। लूटपाट मची, हत्याएं हुईं, भूख से बिलखती जानें गईं। गांवों में जंगल उग आए। बिहार की धरती से मानव आबादी आधी से अधिक उजड़ गई। इसका एक कारण बना मध्यम घर के घमंडी व्यक्ति का सत्ता पाना।
...बात जरा पुरानी है। एक ब्रिटिश शासक था, राबर्ट क्लाइब। इसे इतिहास की कई किताबों में महान भी कहा गया है। अपनी धरती के लिए यह वाकई महान कारनामा कर गया। भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना का श्रेय क्लाइब को ही जाता है। यह सामान्य घर का था पर बेहद लालची, चालबाज, घमंडी, क्रूर और धोखेबाज था।
...किस्सा ऐसा कहते हैं कि क्लाइव 18 वर्ष की उम्र में मद्रास के बंदरगाह में ईस्ट इंडिया कंपनी में क्लर्क बनकर आया। 1746 में जब मद्रास अंग्रेजों के हाथ से निकल गया तो वह नौकरी छोड़कर भाग गया। बाद में उसे मद्रास के पास ही सेंट डेविड किले में सैनिक की नौकरी मिल गई। इन दिनों फ्रांसीसी और अंग्रेजों के बीच भारत को जीतने के लिए युद्ध छिड़े रहते थे। भारत के नवाबों की सल्तनतें कमजोर पड़ रही थीं, मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन हो रहा था। खैर इन सल्तनतों के उजड़ने की लंबी कहानी है। 
...क्लाइव जब सेंट डविड के किले में सैनिक बना तो उसने कुछ छोटी-मोटी लड़ाइयों में हिस्सा लिया। करीब दो साल बाद फ्रांस और इंग्लैंड के बीच एक समझौता हो गया और क्लाइव फिर क्लर्की करने चला गया। कुछ दिनों वह बंगाल रहा और फिर मद्रास चला गया। उस समय कर्नाटक की नवाबी के लिये दो रियासतों में संघर्ष चल रहा था। मुहम्मद अली ने अंग्रेजों से समझौता किया तो पूरे कर्नाटक में लड़ाई छिड़ गई। चंदा साहब के आक्रमण से मुहम्मद अली को बचाने के लिए अंग्रेजों ने क्लाइव के नेतृत्व में एक सेना भेज दी। इस युद्ध में चंदा साहब को फ्रांसीसी मदद कर रहे थे। लंबी लड़ाई के बाद मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बन गया। यहीं से क्लाइव की धाक जम गई। क्लाइब के जयकारे लगने लगे, विलियम पिट ने क्लाइब को स्वर्ग से जन्मा सेनापति बताया। ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालक मंडल ने उसे भारी-भरकम तलवार देकर सम्मानित किया। इसके बाद वह इंग्लैंड चला गया। दो साल बाद अंग्रेजों ने उसे फिर लेफ्टिनेंट कर्नल बना कर भारत बुलाया। इससे क्लाइब का घमंड बढ़ता गया। वह पूरे भारत को जीतने की तमन्ना पालने लगा। उसके ठाटबाट बेतरतीब बढ़ गए। राजकोष की बड़ी रकम उसके ऐशोआराम में खर्च होने लगी। अब उसकी नीयत फ्रांसीसियों को खदेड़ कर भारत के राजे-रजवाड़ों की संपत्ति को कब्जाने पर टिक गई।
...ऐसा हुआ कि 9 अप्रैल 1756 को बंगाल और बिहार के सूबेदार की मृत्यु हो गई। सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बन गया। नवाबी हासिल करने के बाद सिराजुद्दौला ने सलामन जंग के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई शुरू कर दी। वह अपने मकसद में कामयाब रहा पर वापस मुर्शिदाबाद लौट गया। इनदिनों कलकत्ते की आबादी काफी बढ़ चुकी थी, यह शहर व्यापारिक केंद्र बन गया था। अधिकांश व्यापार पर अंग्रेजों का कब्जा था। 5 जून को सिराजुद्दौला की सेना कलकत्ते पर आक्रमण करने चली गई। सिराजुद्दौला की सेना को देख कलकत्ता के गवर्नर, कमांडर और अधिकतर अंग्रेज दुर्ग छोडक़र समुद्री रास्ते से भाग निकले। बहुत कम संघर्ष के बाद कलकत्ता पर नवाब का कब्जा हो गया। ऐसा बताते हैं कि 20 जून को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने नगर पर पूर्ण कब्जा कर लिया। 
...इस दिन एक अजीब घटना हुई, हालांकि इस पर इतिहासकारों में मतभेद हैं। बताते हैं कि जो अंग्रेज शहर में बच गए उन्हें सिराजुद्दौला के सैनिकों ने बंदी बना लिया। 146 अंग्रेज बंदियों को किले की एक छोटी सी कोठरी में कैद कर दिया गया। तीन दिन बाद जब कोठरी खोली गई तो केवल 23 लोग ही जीवित मिले। जीवितों में से एक जॉन जेड हॉलवेल भी था। बाद में हॉलवेल ने ही इस कोठरी की दास्तान बताई और इसे कलकत्ते की काल कोठरी का नाम दिया गया। तब से काल कोठरी अत्याचारों के लिए जानी जाती है। काल कोठरी का किस्सा बताने वाला भरोसे लायक था नहीं। जो भी हो, इस किस्से ने क्लाइब के अत्याचारों के लिए जमीन तैयार कर दी। जब सिराजुद्दौला के आक्रमण की खबर मद्रास पहुंची तो अंग्रेजों ने क्लाइव के नेतृत्व में एक सेना कलकत्ता भेज दी।
...क्लाइव को जब पता चला कि सिराजुद्दौला से उसके आदमी असंतुष्ट हैं तो वह षड्यंत्र रचने लगा। उसने सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर, साहूकार जगत सेठ, मानिक चन्द्र, व्यापारी राय दुर्लभ तथा अमीन चन्द्र के साथ एक गुप्त समझौता किया। मीरजाफर को कई लालच दिए गए और प्लासी की लड़ाई में मीरजाफर अपनी फौज से गद्दारी कर गया। इस षड्यंत्र से अंग्रेजों ने प्लासी के युद्ध में जीत हासिल कर ली। 
...घमंडी क्लाइब की इस जीत ने बंगाल और बिहार का ही नहीं, पूरे भारत का भाग्यचक्र बदल दिया। क्लाइब के दिमाग आसमान चढ़ गए। देश में दौलत की छीना-झपटी मची। घूसखोरी चली और भारीभरकम नजराने वसूले गए। बेईमानी और लूटमार व्यापार के बराबर का धंधा बन गया। किसानों पर कई तरह के कर लगा दिए। अफसर बेरहमी से कर वसूलते और जो न दे सके उसे भयावह यातना देकर धरती से विदा कर देते।
...इसका परिणाम यह हुआ कि 1770 में बंगाल और बिहार में भयानक अकाल पड़ गया। भूख से तड़प कर मरने वालों की कोई गितनी न रही। खाल पर लिपटी हड्डियों को श्मशान तक पहुंचाने वाला भी कोई न बचा। खेत बंजर पड़ गए, मवेशी चारे के बिना मर गए। भूख और यातनाओं से बिहार की एक तिहाई आबादी खत्म हो गई। उपजाऊ खेत और मकान जंगल ने ढक दिए। इसका खयाल करना दुखदाई है, लेकिन सच है। सत्ताखोरों का मन तब भी न भरा। ईस्ट इंडिया कंपनी और सरकार अर्द्धजीवित मानव कंकालों से मालगुजारी वसूल करती रही। अधमरे लोगों पर कर और बढ़ा दिए गए, जोर-जबर्दस्ती वसूली चलती रही। बिहार के करीब एक दर्जन गांवों से छह दशक बाद जंगल हटे।
...क्लाइब के अत्याचार यहीं नहीं थमे। उस पर सबकुछ जीतने की धुन सवार थी। मैसूर का हैदर अली अंग्रेजों का कट्टर दुश्मन था। उसने अंग्रेजों को कई बार हराया। उसका बेटा टीपू सुल्तान भी अंग्रेजों से लड़ता रहा। मैसूर के दो युद्धों में कई साल बीते, मानवता बिलखती रही। क्लाइब के षड्यंत्र अंग्रेजों के लिए करगर साबित हुए। उन्होंने लालच दिया, युद्ध लड़े, धोखेबाजी की और अंतत: पूरे देश को गुलाम बना लिया।

..इसके राज में क्या-क्या न हुआ, इस घमंडी की याद भी दुखद.
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