Tuesday, 22 May 2018

आज़ादी की लड़ाई के शहीद देश के पहले और आखिरी पत्रकार : मौलाना मोहम्मद बाक़ीर देहलवी ------ ध्रुव गुप्त

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* अपवादों को छोड़ दें तो मीडिया की प्रतिबद्धता अब देश के आमजन के प्रति नहीं, राजनीतिक सत्ता और उससे जुड़े लोगों के प्रति है। कुछ मामलों में यह प्रतिबद्धता बेशर्मी की तमाम हदें पार करने लगी है।
** आमजन के मसले उठाने वाला पहला उर्दू अखबार 'जम-ए-ज़हांनुमा' 1822 में कलकत्ता से निकला था। 
*** 1837 में दिल्ली से देश का दूसरा उर्दू अखबार निकला। अखबार का नाम था 'उर्दू अखबार दिल्ली' और उसके यशस्वी संपादक थे मौलाना मोहम्मद बाक़ीर देहलवी। '
**** किसी राजनीतिक संगठन के अभाव में इस अखबार ने लोगों को जगाने और आज़ादी के पक्ष में उन्हें संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। 
 ***** न कभी देश के इतिहास ने उन्हें याद किया और न देश की पत्रकारिता ने। यहां तक कि उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि दिल्ली में उनके नाम का एक स्मारक तक नहीं है। आज जब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाली मीडिया की जनपक्षधरता संदिग्ध है और वह विश्वसनीयता के संकट से रूबरू है तो क्या पत्रकारिता के इतिहास के इस विस्मृत नायक के आदर्शों और जज्बे को याद करने की सबसे ज्यादा ज़रुरत नहीं है ?



Dhruv Gupt 
कभी ऐसी थी हमारी पत्रकारिता !
(दिल्ली के प्रतिष्ठित साप्ताहिक अखबार 'दिल्ली की सेल्फी, में पतनशील पत्रकारिता के इस दौर में उन्नीसवीं सदी के पत्रकार और 'उर्दू अखबार दिल्ली' के संपादक मौलाना मोहम्मद बाक़ीर देहलवी की याद जिन्हें उनकी जनपक्षधर पत्रकारिता और स्वाधीनता सेनानियों का मनोबल बढ़ाने के जुर्म में अंग्रेजों ने सज़ा-ए-मौत दी थी। पढना चाहें तो टंकित आलेख नीचे दे रहा हूं)

देश की मीडिया अभी अपनी विश्वसनीयता के सबसे बड़े संकट से गुज़र रही है। अपवादों को छोड़ दें तो मीडिया की प्रतिबद्धता अब देश के आमजन के प्रति नहीं, राजनीतिक सत्ता और उससे जुड़े लोगों के प्रति है। कुछ मामलों में यह प्रतिबद्धता बेशर्मी की तमाम हदें पार करने लगी है। वह इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, उसपर सत्ता और पैसों का दबाव इतना कभी नहीं रहा था जितना आज है। वज़ह साफ़ है। चैनल और अखबार चलाना अब अब कोई मिशन या आन्दोलन नहीं। राष्ट्र के पास जब कोई मिशन, कोई आदर्श, कोई गंतव्य नहीं तो मीडिया के पास भी क्या होगा ? 'जो बिकता है, वही दिखता है' के इस दौर में पत्रकारिता अब खालिस व्यवसाय है जिसपर किसी लक्ष्य के लिए समर्पित लोगों का नहीं, बड़े और छोटे व्यावसायिक घरानों का लगभग एकच्छत्र कब्ज़ा है। उन्हें अपने न्यूज़ चैनल या अखबार चलाने और उससे मुनाफा कमाने के लिए विज्ञापनों से मिलने वाली भारी भरकम रकम चाहिए और यह रकम उन्हें सत्ता और उससे निकटता से जुड़े व्यावसायिक घराने ही उपलब्ध करा सकते हैं। जो मुट्ठी भर लोग मीडिया को लोकचेतना का आईना और सामाजिक सरोकारों का वाहक बनाने की कोशिशों में लगे हैं, उनके आगे साधनों के अभाव में प्रचार-प्रसार और वितरण का गहरा संकट है। कुल मिलाकर मीडिया का जो वर्तमान परिदृश्य है, उसमें दूर तक कोई उम्मीद नज़र नहीं आती।

वैसे इस देश ने अभी पिछली सदी में आज़ादी की लड़ाई के दौरान पत्रकारिता का स्वर्ण काल भी देखा है। देश की आज़ादी, समाज सुधार और जन-समस्याओं को समर्पित ऐसे अखबारों और पत्रकारों की सूची लंबी है। बहुत कम लोगों को पता है कि देश में जनपक्षधर पत्रकारिता के इस दौर की शुरुआत उन्नीसवी सदी में उर्दू के एक अखबार से हुई थी। आमजन के मसले उठाने वाला पहला उर्दू अखबार 'जम-ए-ज़हांनुमा' 1822 में कलकत्ता से निकला था। सामाजिक समस्याओं के प्रति लोगों को जागरूक करने और प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराने में इस अखबार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 'जम-ए-ज़हांनुमा' के पंद्रह साल बाद 1837 में दिल्ली से देश का दूसरा उर्दू अखबार निकला। अखबार का नाम था 'उर्दू अखबार दिल्ली' और उसके यशस्वी संपादक थे मौलाना मोहम्मद बाक़ीर देहलवी। 'उर्दू अखबार दिल्ली' ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर जनचेतना जगाने वाला और देश के स्वाधीनता संग्राम को समर्पित देश का पहला लोकप्रिय अखबार था और मौलवी बाक़ीर पहले ऐसे निर्भीक पत्रकार जिन्होंने हथियारों के दम पर नहीं, कलम के बल पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी और खूब लड़ी। मौलवी बाक़ीर देश के पहले और आखिरी पत्रकार थे जिन्हें स्वाधीनता संग्राम में प्रखर भूमिका के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने मौत की सज़ा दी थी।

1790 में दिल्ली के एक रसूखदार घराने में पैदा हुए मौलवी मोहम्मद बाक़ीर देहलवी चर्चित इस्लामी विद्वान और फ़ारसी, अरबी, उर्दू और अंग्रेजी के जानकार थे। उस दौर के प्रमुख शिया विद्वान मौलाना मोहम्मद अकबर अली उनके वालिद थे। धार्मिक शिक्षा हासिल करने के बाद मौलवी बाक़ीर ने दिल्ली कॉलेज से अपनी पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पहले उसी कॉलेज मे फ़ारसी के शिक्षक की नौकरी की और फिर आयकर विभाग मे तहसीलदार का ओहदा संभाला। इन कामों में उनका मन नहीं लगा। उनकी तलाश कुछ और थी। 1836 में जब सरकार ने प्रेस एक्ट में संशोधन कर लोगों को अखबार निकालने का अधिकार दिया तो 1837 मे उन्होंने देश का दूसरा उर्दू अख़बार ‘उर्दू अखबार दिल्ली’ के नाम से निकाला जो उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। इस साप्ताहिक अखबार के माध्यम से मौलवी बाक़ीर ने सामाजिक मुद्दों पर लोगों को जागरूक करने के अलावा अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति के विरुद्ध जमकर और लगातार लिखा। देश के पहले स्वाधीनता संग्राम के पूर्व दिल्ली और आसपास के इलाके में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ जनमत तैयार करने में 'उर्दू अखबार दिल्ली' की बड़ी भूमिका रही थी। इस अख़बार की ख़ासियत यह थी कि यह कोई व्यावसायिक आयोजन नहीं था। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का हथियार नहीं भी नहीं। यह एक मिशन के तहत ही शुरू हुआ और अपने उद्धेश्य के लिए लड़ते-लड़ते ही बंद हुआ। अखबार के खर्च के लिए उस ज़माने में भी उसकी कीमत दो रुपए रखी गई थी। अखबार छप और बंट जाने के बाद मुनाफे के जो पैसे बच जाते थे, उसे गरीबों और ज़रूरतमंदों में बांट दिया जाता था।

मौलवी बाक़ीर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर रहे थे। 1857 में देश में स्वाधीनता संग्राम के उभार को कमज़ोर करने के लिए अंग्रेजों ने सांप्रदायिक दंगा भड़काने की एक बड़ी साज़िश रची थी। उन्होंने जामा मस्जिद के आसपास बड़े-बड़े पोस्टर चिपका कर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने की कोशिशें की। अखबार के मुताबिक़ उन पोस्टरों में मुसलमानों से हिन्दुओं के खिलाफ़ जेहाद छेड़ने की अपील यह कहकर की गई थी कि 'साहिबे किताब' के मुताबिक मुसलमान और ईसाई दोस्त हैं और बुतपरस्त हिन्दू कभी उनके शुभचिंतक नहीं हो सकते। पोस्टरों में यह भी लिखा गया था कि अंग्रेजों द्वारा अपनी फौज के लिए निर्मित कारतूसों में मुसलमानों की धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए सूअर की चर्बी का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसका सीधा मतलब यह निकलता था कि उनमें गाय की चर्बी का इस्तेमाल होता था। मौलवी बाक़ीर को अंग्रेजों की साज़िश समझने में देर नहीं लगी। उन्होंने इस साजिश को बेनकाब करने में कोई कसर न छोड़ी। अपने अखबार में उन्होंने लिखा - 'अपनी एकता बनाए रखो ! याद रखो, अगर यह मौक़ा चूक गए तो हमेशा के लिए अंग्रेजों की साजिशों, धूर्तताओं और दंभ के शिकार बन जाओगे। इस दुनिया में तो शर्मिंदा होगे ही, यहां के बाद भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे।'

उस दौर में जब देश में कोई सियासी दल नहीं हुआ करता था जो किसी मुद्दे को लेकर जनांदोलन खड़ा कर सके। किसी राजनीतिक संगठन के अभाव में इस अखबार ने लोगों को जगाने और आज़ादी के पक्ष में उन्हें संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। 1857 मे जब स्वतंत्रता सेनानियों ने आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र के नेतृत्व में अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ बग़ावत का बिगुल फूंक दिया तो मौलवी बाक़ीर हाथ में कलम लेकर इस लड़ाई में शामिल हुए। संग्राम को समर्थन देने के लिए जब उनका अखबार अंग्रेजों की नज़र में चढ़ा तो उन्होंने ‘उर्दू अख़बार दिल्ली’ का नाम बदल कर बहादुर शाह जफ़र के नाम पर 'अख़बार उज़ ज़फ़र' कर दिया। अखबार के प्रकाशन का दिन भी उन्होंने बदल दिया। 17 मई, 1857 को इस अखबार ने विद्रोहियों के मेरठ से दिल्ली मार्च के दौरान दिल्ली में उनपर अंग्रेजी फौज के अत्याचार की एक ऐतिहासिक और आंखों देखी रिपोर्ट छापी थी। इस बहुचर्चित रिपोर्ट की विद्रोहियों और दिल्ली के आम लोगों में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति आक्रोश पैदा करने में बड़ी भूमिका रही थी।.लार्ड केनिंग ने 13 जून 1857 को मौलवी साहब के बारे में लिखा था - 'पिछले कुछ हफ्तों में देसी अखबारों ने समाचार प्रकाशित करने की आड़ में भारतीय नागरिको के दिलों में दिलेराना हद तक बगावत की भावना पैदा कर दी है।'

स्वाधीनता संग्राम के दौरान मौलवी बाक़ीर के लिखे कुछ उद्धरण उपलब्ध हैं। उन्होंने लोगों को यह कहकर ललकारा था - 'मेरे देशवासियों, वक़्त बदल गया। निज़ाम बदल गया। हुकूमत के तरीके बदल गए। अब ज़रुरत है कि आप खुद को भी बदलो। अपनी सुख-सुविधाओं में जीने की बचपन से चली आ रही आदतें बदलो ! अपनी लापरवाही और डर में जीने की मानसिकता बदल दो। यही वक़्त है। हिम्मत करो और विदेशी हुक्मरानों को देश से उखाड़ फेको !' विद्रोहियों की हौसला अफ़ज़ाई करते हुए उन्होंने लिखा था - 'जिसने भी दिल्ली पर क़ब्ज़े की कोशिश की वह फ़ना हो गया। वह सोलोमन हों या फिर सिकंदर, चंगेज़ ख़ान हों या फिर हलाकु या नादिऱ शाह - सब फ़ना हो गए। ये फ़िरंगी भी जल्द ही मिट जाएंगे।' बहुआयामी व्यक्तित्व के मौलवी साहब उस दौर के स्वतंत्रता सेनानियों के बीच अपने लेखन के अलावा अपनी जोशीली तक़रीर के कारण भी बहुत लोकप्रिय थे। जब भी विद्रोहियों का हौसला बढ़ाने की ज़रुरत होती थी, मौलवी साहब को उनकी आग उगलती तक़रीर के लिए बुला भेजा जाता था और वे ख़ुशी-ख़ुशी उन निमंत्रणों को स्वीकार भी कर लिया करते थे।

सितम्बर के शुरुआत मे अंग्रेजों की साजिशों और निर्ममता की वज़ह से विद्रोही कमज़ोर पड़ने लगे थे। उनकी पराजयों का सिलसिला भी शुरू हो गया। तबाही सामने दिख रही थी। इसके साथ ही मौलवी बाक़ीर के अखबार के प्रकाशन और वितरण पर भी गंभीर संकट उपस्थित हो गया। अफरातफरी के उस माहौल में अखबार का वितरण मुश्किल हो गया था। 13 सितम्बर 1857 को प्रकाशित अखबार के आखिरी अंक में मौलवी साहब के शब्दों में पराजय का यह दर्द शिद्दत से उभर कर सामने आया था। स्वाधीनता संग्राम में विद्रोहियों की अंतिम पराजय के बाद 14 सितंबर को हज़ारों दूसरे लोगों के साथ मौलवी बाकीर को भी गिरफ्तार कर लिया गया। दो दिनों तक असहनीय यातनाएं देने के बाद 16 सितंबर को उन्हें मेजर विलियम स्टीफेन हडसन के सामने प्रस्तुत किया गया। हडसन ने अंग्रेजी साम्राज्य के लिए बड़ा खतरा मानते हुए बगैर कोई मुक़दमा चलाए उसी दिन उन्हें मौत की सजा सुना दी। उसी दिन मुग़ल साम्राज्य के औपचारिक तौर पर समाप्त होने के पहले ही कलम के इस 69-वर्षीय सिपाही को दिल्ली गेट के मैदान में तोप के मुंह पर बांध कर उडा दिया गया जिससे उनके वृद्ध शरीर के परखचे उड़ गए।


देश की पत्रकारिता के इतिहास में कलम की आज़ादी के लिए मौलवी बाक़ीर का यह बलिदान सुनहरे अक्षरों में लिखने लायक था, मगर दुर्भाग्य से यह नहीं हुआ। आज़ादी की लड़ाई के शहीद देश के उस पहले और आखिरी पत्रकार को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वाकई हक़दार थे। न कभी देश के इतिहास ने उन्हें याद किया और न देश की पत्रकारिता ने। यहां तक कि उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि दिल्ली में उनके नाम का एक स्मारक तक नहीं है। आज जब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाली मीडिया की जनपक्षधरता संदिग्ध है और वह विश्वसनीयता के संकट से रूबरू है तो क्या पत्रकारिता के इतिहास के इस विस्मृत नायक के आदर्शों और जज्बे को याद करने की सबसे ज्यादा ज़रुरत नहीं है ?
साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1729527310457193&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Monday, 21 May 2018

हरपीत कौर, SSP,मुजफ्फरपुर का गाया गीत

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 2009 बैच की तेजतर्रार आईपीएस हरप्रीत कौर 














 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 18 May 2018

बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मालिक साहब ने तेजस्वी यादव को मिलने का समय क्यों दिया ? और क्या कहेंगें ? ------ विजय राजबली माथुर

* मलिक साहब मेरठ कालेज, मेरठ के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे हैं । जिस वर्ष 1969 में मैंने वहाँ प्रवेश लिया उसी वर्ष उन्होने कालेज छोड़ा था किन्तु कालेज से संपर्क लगातार बनाए रखा था।
**इसी सभा में एक बहुत महत्वपूर्ण जानकारी भी सत्यपाल मलिक साहब द्वारा दी गई थी। उन्होने मशहूर शायर ' फिराक गोरखपुरी ' साहब के हवाले से बताया था कि , 1857 से तब तक जितने भी आंदोलन कानपुर - मेरठ के डायगनल से शुरू हुये हैं विफल रहे हैं। जबकि बलिया - आगरा के डायगनल से शुरू हुये सभी आंदोलन सफल रहे हैं। 
*** राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर कैलाश चंद्र गुप्ता जी के अनुसार  उस छात्र - संसद का अवलोकन करने के लिए उस समय के लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह ( जो बाद में राजस्थान के राज्यपाल बने थे ) भी आए थे और उन्होने सत्यपाल मलिक साहब की उनके द्वारा राजनारायन सिंह जी ( जिनहोने  बाद में रायबरेली में इन्दिरा जी को परास्त किया था ) की गई  भूमिका की भूरी - भूरी प्रशंसा की थी। 
**** नेताजी सुभाष जयंती पर निरंतर 1975 तक मेरठ में रहते हुये मैंने उनको सुना और समझा है। अतः मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि, वह अपने पूर्ववर्ती द्वारा लिए गए निर्णय को यूं ही नहीं रद्द कर देंगे इसके लिए तेजस्वी यादव को नीतीश सरकार को बिहार  विधानसभा में पहले परास्त करना होगा तभी वह राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा आमंत्रित किए जा सकेंगे। 


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* बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक साहब ने बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को आज दिनांक 18 मई 2018 को दिन के एक बजे मिलने का समय दिया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने राज्यपाल महोदय से इसलिए मिलने का समय लिया है कि, वह उनके समक्ष बिहार में सबसे बड़ी पार्टी और गठबंधन के आधार पर सरकार बनाने का दावा पेश कर सकें। राज्यपाल महोदय ने तेजस्वी को मिलने का समय दिया है और उनकी पूरी बात भी सुनेंगें  लेकिन चूंकि नीतीश सरकार के गठन का निर्णय उनके पूर्ववर्ती राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी साहब का है इसलिए उसे रद्द करने की कोई संभावना नहीं है। वह संभवतः तेजस्वी यादव से यही कहेंगें कि, विधानसभा पटल पर यदि नीतीश सरकार पराजित हो जाती है तब वह तेजस्वी यादव को सरकार गठन का निमंत्रण दे सकते हैं। * हालांकि त्रिपाठी साहब उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष व हाई कोर्ट के वकील भी  रहे हैं और मलिक साहब भी पूर्व केन्द्रीयमन्त्री और सुप्रीम कोर्ट के वकील रहे हैं। 
* मलिक साहब मेरठ कालेज, मेरठ के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे हैं । जिस वर्ष 1969 में मैंने वहाँ प्रवेश लिया उसी वर्ष उन्होने कालेज छोड़ा था किन्तु कालेज से संपर्क लगातार बनाए रखा था। उनसे संबन्धित खास खास तीन  - चार अवसरों की बात का उल्लेख करना उनकी कार्य - प्रणाली को समझने के लिए आवश्यक है। 
* जब मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह  जी द्वारा छात्र संघों की सदस्यता की अनिवार्यता समाप्त कर ऐच्छिक करने का आदेश जारी किया गया तब पूरे प्रदेश में छात्रों द्वारा सरकार के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया गया था। मेरठ कालेज छात्रसंघ के निवर्तमान अध्यक्ष महावीर प्रसाद जैन ( जिनका संबंध इन्दिरा कांग्रेस से था ) और महासचिव विनोद गौड़ ( जिनका संबंध जनसंघ से था ) छात्रों की विरोध सभा में अपना समर्थन व आशीर्वाद देने आए पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सत्यपाल मलिक साहब ( जिनका संबंध संसोपा से था ) का जोरदार स्वागत किया था। 
* इस सभा में मलिक साहब ने बहुत स्पष्ट कहा था कि, यद्यपि चौधरी चरण सिंह से उनके परिवार के बहुत घनिष्ठ संबंध हैं और उनके परिवार से चौधरी साहब की पार्टी को चंदा भी जाता है ( उनके परिवार की दौराला आदि में चीनी मिलें थीं ) किन्तु वह छात्रों के आंदोलन के साथ हैं और चौधरी साहब के इस निर्णय का पुरजोर विरोध करते हैं।
* इसी सभा में एक बहुत महत्वपूर्ण जानकारी भी सत्यपाल मलिक साहब द्वारा दी गई थी। उन्होने मशहूर शायर  ' फिराक गोरखपुरी ' साहब के हवाले से बताया था कि , 1857 से तब तक जितने भी आंदोलन कानपुर - मेरठ के डायगनल से शुरू हुये हैं विफल रहे हैं। जबकि बलिया - आगरा के डायगनल से शुरू हुये सभी आंदोलन सफल रहे हैं। अतः छात्र - आंदोलन को सफल बनाने के लिए आगरा के छात्रों को शामिल कर उनका सहयोग लेने का सुझाव भी दिया और अपनी ओर से प्रयास का आश्वासन भी। अंततः वह सफल रहे । 
* जिस वर्ष सत्यपाल मलिक साहब ने मेरठ कालेज, मेरठ में प्रवेश लिया उस वर्ष वहाँ छात्रसंघ की ओर से एक छात्र - संसद का आयोजन किया गया था। राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर कैलाश चंद्र गुप्ता जी के अनुसार  उस छात्र - संसद का अवलोकन करने के लिए उस समय के लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह ( जो बाद में राजस्थान के राज्यपाल बने थे ) भी आए थे और उन्होने सत्यपाल मलिक साहब की उनके द्वारा राजनारायन सिंह जी ( जिनहोने  बाद में रायबरेली में इन्दिरा जी को परास्त किया था ) की गई  भूमिका की भूरी - भूरी प्रशंसा की थी। 
*जब पाकिस्तान द्वारा इंडियन एयर लाईन्स के विमान का अपहरण करके लाहौर में फूँक दिया गया था तब मेरठ कालेज से छात्रों व शिक्षकों का एक संयुक्त विरोधन - प्रदर्शन जलूस निकला था जिसका नेतृत्व संयुक्त रूप से प्राचार्य डॉ बी भट्टाचार्य व सत्यपाल मलिक साहब ने किया था। 
*बांग्लादेश की निर्वासित सरकार को मान्यता देने हेतु पूरे देश में सभाएं व गोष्ठियाँ चल रही थीं उसी क्रम में समाजशास्त्र - परिषद द्वारा भी कालेज में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें मुझको छोड़ कर सभी छात्रों व शिक्षकों ने बांग्लादेश को मान्यता दिये जाने का समर्थन किया था । सिर्फ मैंने डॉ राममनोहर लोहिया की पुस्तक ' इतिहास चक्र ' के आधार पर विश्लेषण करते हुये कहा था कि, बांगलादेश भारत के लिए बफर स्टेट नहीं होगा इसलिए मान्यता न दी जाये । 
* सत्यपाल मलिक साहब के साथ मेरठ कालेज छात्रसंघ के उपाध्यक्ष रहे राजेन्द्र सिंह यादव ( जो बाद में वहीं सोशियोलाजी के अध्यापक बने ) ने मलिक साहब से मेरी बांगलादेश को मान्यता के विरोध की बात शिकायत के तौर पर  कही थी। परंतु  मलिक साहब ने मुझसे कहा था कि तुमने डॉ लोहिया की बात का गलत मतलब निकाला है लेकिन फिर भी मैं खुश हूँ कि, सबके विरोध की परवाह किए बगैर अपनी बात पूरी मजबूती से रखी। इस साहस को सदैव बनाए रखना।  
* प्रतिवर्ष  जीमखाना मैदान , मेरठ में 23 जनवरी को आजाद हिन्द  संघ द्वारा आयोजित होने वाली जनसभा में सत्यपाल मलिक साहब को विशिष्ट रूप से आमंत्रित किया जाता था और अपने बेबाक वक्तव्यों से वह जनता को प्रभावित करने में सफल रहते थे। नेताजी सुभाष जयंती पर निरंतर 1975 तक मेरठ में रहते हुये मैंने उनको सुना और समझा है। अतः मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि, वह अपने पूर्ववर्ती द्वारा लिए गए निर्णय को यूं ही नहीं रद्द कर देंगे इसके लिए तेजस्वी यादव को नीतीश सरकार को बिहार  विधानसभा में पहले परास्त करना होगा तभी वह राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा आमंत्रित किए जा सकेंगे। 

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 15 May 2018

बिहार में भाजपा रुक जाएगी लेकिन उत्तर प्रदेश में ? ------ प्रशांत कनौजिया


 * बिहार में तेजस्वी बूथ और गांव लेवल पर  
* *   कांशीराम वाले बसपा की तरह काम नहीं  
* * *   अखिलेश सिर्फ फैंसी रैली करते हैं


Prashant Kanojiya
 बिहार में तेजस्वी बूथ और गांव लेवल पर : 
2019 में होने वाले चुनाव से पहले ही भाजपा 30 फीसदी काम पूरा कर चुकी है. उसने बूथ तक पहुँचने के लिए हर संभव प्रयास किया है. भाजपा जिस प्रकार चुनाव लड़ती है ये कबीले तारीफ है. नैतिकता की बात करने की जरूरत नहीं, क्योंकि राजनीति इसी का नाम है. 2019 लोकसभा चुनाव पर सबसे ज्यादा प्रभाव उत्तर प्रदेश और बिहार डालेंगे. बिहार में तेजस्वी जिस प्रकार गांव स्तर पर काम कर रहे हैं, यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि भाजपा के अलावा अगर कोई दल बूथ और गांव लेवल पर काम कर रहा है, तो वो राजद है.

 कांशीराम वाले बसपा की तरह काम नहीं : 
अब रही बात उत्तर प्रदेश की. मायावती का अपना काडर और वोटबैंक हैं, उसे मेहनत अपने वोटबैंक को बढ़ाने के लिए करना होगा. लेकिन बसपा अब कांशीराम वाले बसपा की तरह काम नहीं कर रही तो ज्यादा कोई फर्क नहीं आपयेगा.

अखिलेश सिर्फ फैंसी रैली करते हैं  : 
अब आते हैं अखिलेश यादव पर. युवा मुख्यमंत्री होने के नाते युवा वर्ग में लोकप्रियता है पर उसे वोट में तब्दील करवाने की क्षमता नहीं है. 2019 का चुनाव नज़दीक है, लकिन पार्टी का बूथ तो छोड़ो विधानसभा पर कोई ठोस काम नहीं हो रहा है. 90 फीसदी जिला अध्यक्ष (सभी इकाई) के लखनऊ में पड़े रहते हैं. उन्हें अभी तक पता नहीं है कि भाजपा की सरकार में वो ठेकेदारी दिलाने या लेने का काम नहीं कर पाएंगे. पार्टी के 90 फीसदी लोग न लोहिया को जानते हैं और न ही समाजवाद का स.


अखिलेश के पास ख़राब सलाहाकारों की फौज है, जिसने डूबने में कोई कसर नहीं छोड़ा. अखिलेश कान के कच्चे हैं और खुद से परखने से ज्यादा सलाहकार कान में बताते हैं उसपर विश्वास करते हैं. शिवपाल की नाराजगी के बाद बूथ लेवल ध्वस्त है. अखिलेश सिर्फ फैंसी रैली करते हैं, गांव स्तर पर नहीं जाते. बूथ से ज्यादा ट्विटर पर भरोसा करते हैं. अखिलेश से कार्यकर्ताओं को मिलने के लिए बड़ा फ़िल्टर पार करना होता है. सामाजिक न्याय पर कंफ्यूज हैं. खुद को कोर वोटर नहीं है, वही वोटर है जो भाजपा और कांग्रेस के पास है.

मुलायम ग्राउंड के आदमी का सुझाव नकार कर चुनाव लड़ कर न जीत पाने वाले रामगोपाल यादव पर ज्यादा भरोसा है, जो ग्राउंड का 1 फीसदी काम भी नहीं जानते. बिहार में भाजपा रुक जाएगी लेकिन उत्तर प्रदेश में अभी हालात के हिसाब से नामुमकिन है.

प्रशांत कनौजिया

साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=2044759595553106&set=a.196023523760065.53567.100000572560879&type=3

Thursday, 10 May 2018

क्रान्तिकारियों की शहादत एक ऐसे मुल्क के सपने के लिए थी जो बराबरी, समानता और शोषण से मुक्त हो ------ जया सिंह



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Jaya Singh
10-05-2018

संघ-भाजपा द्वारा जारी ‘देशभक्ति’ के शोर के बीच हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि देश क्या है? और देशभक्ति किसे कहते हैं? देश कोई कागज़ पर बना नक्शा नहीं होता है, यह बनता है वहाँ के लोगों से, जनता से। और देश भक्ति के असली मायने है जनता से प्यार, इनके दुख तकलीफ़ से वास्ता और इनके संघर्ष में साथ देना। देशभक्ति की बात करते हुए अगर इस देश की आजादी की लड़ाई पर नजर डाली जाय तो आज भी हमारे जेहन में जो नाम आते हैं वे हैं: शहीद भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद, अशफ़ाक-उल्ला, रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। देशभक्ति के लिए देश के अर्थ को समझना बेहद जरूरी है और यह भी जानना जरूरी है कि देश के लिए कुर्बान होने वाले इन शहीदों ने किसके लिए अपनी जान की बाजी लगायी थी? आज यह एक आम आदमी भी समझ सकता है कि देश कागज़ पर बना महज एक नक्शा नहीं होता। न ही केवल जमीन का एक टुकड़ा होता है। देश बनता है वहाँ रहने वाली जनता से। वह जनता जो उस देश की जरूरत का हर एक साजो सामान बनाती है, वह किसान और खेतिहर मजदूर जो अनाज पैदा करते हैं वह जनता जो देश को चलाती है। क्या इस जनता के दुःख-तकलीफ में शामिल हुए बिना, उसके संघर्ष में भागीदारी किये बिना कोई देशभक्त कहला सकता है? भगतसिंह के लिए क्रान्ति और संघर्ष का मलतब क्या था? वह किस तरह के समाज के लिए लड़ रहे थे? 6 जून 1929 को दिल्ली के सेशन जज की अदालत में दिये भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त के बयान से स्पष्ट होता हैः

‘क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है- अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। दुनियाभर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करानेवाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकने-भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं। यह भयानक असमानता और जबर्दस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल पुथल की तरफ लिए जा रहा है। यह स्थिति बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ढ की कगार पर चल रहे हैं।’(भगतसिंह और उनके साथियों के उपलब्ध सम्पूर्ण दस्तावेज, सं- सत्यम, पृष्ठ- 338)

भगतसिंह के लिए देशभक्ति का मतलब था- जनता के लिए शोषणमुक्त समाज बनाने का संकल्प। आज़ादी की लड़ाई में क्रान्तिकारियों की शहादत एक ऐसे मुल्क के सपने के लिए थी जो बराबरी, समानता और शोषण से मुक्त हो। जहाँ नेता और पूँजीपति घपलों घोटालों से देश की जनता को न लूटें।

मगर भाजपा के ‘देशभक्त’ क्या कर रहे हैं? क्या इस देश की जनता को याद नहीं है कि कारगिल के शहीदों के ताबूत तक के घोटाले में इसी भाजपा के तथाकथित देशभक्त फँसे थे। सेना के लिए खरीद में दलाली और रिश्वत लेते हुए भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण पकड़े गए थे। मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला और उससे जुड़ी हत्याएं देश की जनता भूली नहीं होगी। भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव कैमरे पर रिश्वत लेकर यह बोलते हुए पकड़े गए थे कि ‘पैसा खुदा नहीं तो खुदा से कम भी नहीं’। क्या जब देश की जनता महँगाई की मार से परेशान थी तभी मोदी सरकार ने पूँजीपतियों के कर्ज माफी की घोषणाएँ नहीं की? ऐसे हैं ये ‘राष्ट्रवादी’ और यही है संघ और भाजपा की ‘देशभक्ति’।


आज बात-बात पर देशभक्ति का प्रमाण-पत्र बाँटने वाले संघ-भाजपा गिरोह की असलियत जानने के लिए हमें एक बार स्वतन्त्रता आन्दोलन में इनकी करतूतों के इतिहास पर नजर डाल लेनी चाहिए।
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=449748425464644&id=100012884707896

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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Sunday, 6 May 2018

सना परवीन का स्तुत्य एवं अनुकरणीय कृत्य

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 4 May 2018

जिन्ना संघ परिवार की ढाल है ------ राजीव नयन बहुगुणा

*  जिन्ना का जन्म भारतीय मुसलमानों को दारुण दुख देकर उन्हें नुकसान पंहुचाने , और हर तरह की साम्प्रदायिक ताकतों को लाभ पंहुचाने के लिए हुआ है । अब वह मरणोपरांत भी भारतीय मुसलमानों के लिए एक बड़ी आपदा , और संघ परिवार के लिए ढाल बनने जा रहा है । 
** जिन्ना की समझ मे यह बेसिक बात नहीं आयी , कि जिस मुस्लिम क़ौम का एकछत्र भाग्य विधाता होने का वह दावा कर रहा है , भारतीय जुलाहों में सबसे बड़ी तादाद उन्हीं की है । एक व्यक्ति के खादी पहनने से कितने ही मुस्लिम किसानों , कत्तीनों , जुलाहों और दर्ज़ियों का चूल्हा जलता है ।
*** जिन्ना को बढ़िया से जानो और सावरकर को समझो। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार की साझेदार बनी हिन्दू महासभा क्या हिन्दुत्व का झाल बजाने जिन्ना से गलबहियाँ करने गयी थी? 
****   जिन्ना इतिहास का वो अध्याय है जो हिन्दू महासभा की कलई उतारता है। ------ नवेन्दु कुमार 
Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
जैसे जैसे जिन्ना तस्वीर विवाद का रंग गहरा हो रहा है , मेरा यह विश्वास भी सुदृढ होता जा रहा है , कि जिन्ना का जन्म भारतीय मुसलमानों को दारुण दुख देकर उन्हें नुकसान पंहुचाने , और हर तरह की साम्प्रदायिक ताकतों को लाभ पंहुचाने के लिए हुआ है । अब वह मरणोपरांत भी भारतीय मुसलमानों के लिए एक बड़ी आपदा , और संघ परिवार के लिए ढाल बनने जा रहा है । 
उसकी अलीगढ़ के विश्व विद्यालय में लगी एक तस्वीर के सिवा वह भारतीय मुस्लिमों का रहनुमा कभी नहीं रहा । जो मुस्लिम उसे अपना इमाम मानते थे , वे तभी उसके साथ पाकिस्तान चले गए थे , और उन्होंने नरक भोगा । 
वस्तुतः जिन्ना इस सचाई को जान अत्यधिक कुंठित रहता था , कि भारत मे गांधी पर विश्वास करने वाले मुस्लिमों की तादाद उसके मुक़ाबले काफी ज्यादा है । 
जिस प्रकरण पर जिन्ना कांग्रेस से छिटक कर अलग हुआ , वह बहुत मामूली और हल करने योग्य था । कांग्रेस का नेतृत्व गांधी के हाथ मे आने के बाद , इस पार्टी ने खादी और हिंदी को लेकर टेक पकड़ ली थी । कांग्रेस अधिवेशन में जिन्ना की हूटिंग भी सूट बूट पहनने और अंग्रेज़ी में भाषण झाड़ने के कारण हुई थी । वह गुजराती अथवा टूटी फूटी हिंदी में भी भाषण दे सकता था । स्वयं गांधी भी उसी की तरह गुजराती थे , और अंतिम समय तक अशुद्ध व्याकरण वाली हिंदी बोलते रहे । लेकिन उनकी अशुद्ध हिंदी भी व्याकरणाचार्यों पर भारी पड़ती थी । जिन्ना गुजराती में भी भाषण दे सकता था , बजाय इंग्लिश के , जो उसे आती थी । दक्षिण के एक बड़े राष्ट्रीय नेता के कामराज मरते दम तक तमिल बोलते रहे । लेकिन इसके बावजूद उनकी प्रतिष्ठा में कमी न आई । स्वयं गांधी के समधी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी अंग्रेज़ी में वार्तालाप करते थे । उन्हें भी हिंदी नहीं आती थी । गांधी हर बार उन्हें चेतावनी देते थे , कि मैं इस बार आपको अंतिम अवसर दे रहा हूँ । अगली बार आपसे हिंदी में बात करूंगा , अन्यथा कोई बात नहीं करूंगा । यस , नेक्स्ट टाइम श्योर , कह कर राजा जी उन्हें बहला देते । जिन्ना भी यही सब कुछ करते हुए बीच का रास्ता निकाल सकता था । पर उस जैसे दम्भी मनुष्य के लिए यह कैसे सम्भव था ?
रही खादी की बात । सो तन मन से बीमार जिन्ना की समझ मे यह बेसिक बात नहीं आयी , कि जिस मुस्लिम क़ौम का एकछत्र भाग्य विधाता होने का वह दावा कर रहा है , भारतीय जुलाहों में सबसे बड़ी तादाद उन्हीं की है । एक व्यक्ति के खादी पहनने से कितने ही मुस्लिम किसानों , कत्तीनों , जुलाहों और दर्ज़ियों का चूल्हा जलता है ।

शैतान किसी प्रदूषण कारी वाहन की तरह अपने गुज़र जाने के बाद भी अपने पीछे दूषित धुएं की लकीर छोड़ जाता है । जगद्गनियंता इस महा देश को शैतान के आफ्टर इफेक्ट से बचाये ।
जिन्ना को बढ़िया से जानो और सावरकर को समझो। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार की साझेदार बनी हिन्दू महासभा क्या हिन्दुत्व का झाल बजाने जिन्ना से गलबहियाँ करने गयी थी? 
नहीं देश हिंदोस्तान को तोड़ने के षड्यन्त्र का रिहर्सल कर रहे थे सत्ता के भूखे मुस्लिम-हिन्दू विघटन के सियासी सरदार। जिन्ना इतिहास का वो अध्याय है जो हिन्दू महासभा की कलई उतारता है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय में लगे जिन्ना के चित्र को श्रद्धा का नहीं , अपितु इतिहास का विषय मानना चाहिए। इस विश्व विद्यालय की स्थापना सर सैयद अहमद खां ने की थी , जो भले ही अंग्रेजों के हिमायती थे , पर मुस्लिमों में आधुनिक शिक्षा के प्रबल पक्षधर भी थे। इस लिहाज से उनका दृष्टिकोण रूढ़िवादी मौलवियों से भिन्न था। 
जिन्ना का यह चित्र आज कल नहीं लगा , बल्कि 1938 में लग चुका था। जबकि इससे पहले इसी विश्व विद्यालय में महात्मा गांधी का चित्र लग चुका था , जो आज भी है। 
जिन्ना अकस्मात एवं परिस्थिति वश मुस्लिमों का धर्म ध्वजी बना। अन्यथा वह पाश्चात्य रहन सहन का आदी एक वकील था , और ऐसी चीजें खाता पीता था , जिनका नाम सुन कर ही धर्म ग्राही मुस्लिमों को कै आने लगती है। भारत की राजनीति में अनफिट होकर वह लन्दन जा बसा था। क्योंकि उसे न हिंदी आती थी और न उर्दू। उसे लन्दन से कई साल बाद शायर इक़बाल भारत वापस लाये , क्योंकि तब तक द्विराष्ट्र बाद का सिद्धान्त जन्म ले चुका था , और एक मुस्लिम राष्ट्र की पैरवी के लिए जिन्ना जैसे कानून जानने वाले और कुतर्क करने वाले वकील की ज़रूरत थी। 
द्वित्तीय विश्व युद्ध के उपरांत जब राज्यों में सरकारों का गठन हुआ , तो बंगाल में उसकी पार्टी मुस्लिम लीग के साथ हिन्दू महा सभा भी सरकार में साझीदार थी। क्योंकि दोनों देश को तोड़ने में विश्वास रखते थे , और आज भी रखते हैं। 
वह अपने गुजराती सम प्रदेशीय गांघी से बहुत द्वेष रखता था , और उन्हें चिढ़ाता था। उनके सामने वार्ता के लिए बुलाई गई बैठकों में सिगरेट फूंकता रहता था , और उनकी बकरी की ओर ललचाई बुरी नज़रों से देखता था। फिर भी गांधी उसकी क्षुद्रताओं को बर्दाश्त करते थे , और उसे क़ायदे आज़म की संज्ञा उन्हीने दी थी। 
गांघी ने देश विभाजन रोकने का भरसक प्रयत्न किया , लेकिन जब जिन्ना ने गृह युद्ध की धमकी दी तो वह मन मसोस कर रह गए। 
पाकिस्तान बनने के बाद वह तत्काल धर्म निरपेक्ष बन गया , जो असल मे वह था भी। पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में दिए गए अपने पहले भाषण से ही वह वहां के कट्टरपंथियों की किरकिरी बन गया , क्योंकि उसने कहा था कि इस देश मे हर धर्मावलंवी को अपना धर्म मानने की छूट है। इसके कुछ ही समय बाद वह tb से मर गया । अगर न मरता , तो मुस्लिम कट्टर पंथी उसे मारने वाले थे , जैसा कि भारत में हिन्दू कट्टरपंथियों ने गांधी को मारा।
जब वह मरने वाला था , और उसकी बहन उसे कराची से इस्लामाबाद लायी , तो हवाई अड्डे पर उसे रिसीव करने वाला कोई न था। यही नहीं , उसे वहां से हॉस्पिटल तक लाने के लिए एक खटारा एम्बुलेंस भेजी गई , जो रास्ते मे खराब हो गयी , और जिन्ना उसमे तड़पता रहा। 
वह अपने अंतिम दिनों में देश विभाजन की अपनी भूल को महसूस करने लगा था , साथ ही यह भी कि वह अपने लाखों धर्म बन्धु मुस्लिमों की हत्या का उत्तरदायी है। आज भारतीय उप महाद्वीप में मुस्लिम जिन्ना की वजह से ही अब तक आक्रांत हैं। आज देश विभाजित न होता , तो भारत विश्व का नम्बर 1 मुल्क़ होता।
बहरहाल, जिन्ना की तसवीर हमारा क्या बिगाड़ेगी , जब जिन्ना खुद कुछ न बिगाड़ पाया। उसकी तस्वीर लगी रहने दो। वह भारतीय मुसलमानों का आदर्श कभी नहीं रहा , कभी नहीं रहेगा। समय समय पर इतिहास का तापमान परखने के लिए उसकी तस्वीर ज़रूरी है।
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Tuesday, 1 May 2018

यह देश खतरनाक दौर से गुजर रहा है ------ सीमा आज़ाद



Seema Azad
दस्तक मई-जून २०१८ का संपादकीय

यह देश खतरनाक दौर से गुजर रहा है
20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी एक्ट में बदलाव कर उसे ऐसा बना दिया कि उसका दुरूपयोग तो क्या, उपयोग करना भी मुश्किल हो जायेगा। लगभग इसी समय सुप्रीम कोर्ट से ही विवि में विभागवार आरक्षण करने का फैसला आया, जिससे एससी एसटी ही नहीं ओबीसी वर्ग भी आरक्षण से बाहर हो जायेगा। वास्तव में यह शिक्षण संस्थानों में आरक्षण खत्म करने का ही एक नया तरीका है, जो बीएचयू में पहले से ही लागू हो रहा था। जिसे कोर्ट में चुनौती देने पर उसने सही ठहराया और इस मौके की ताक में बैठे मनुवादी यूजीसी ने बीएचयू के तरीके को पूरे देश के शिक्षण संस्थानों पर लागू करने का फरमान तुरन्त जारी कर दिया, जिसके बाद इन वर्गों में आक्रोश के बाद समाज में एक बार फिर सवर्ण और अवर्ण के बीच की खाई अधिक चौड़ी होने लगी। 
इन सबके बीच ही दो तीन खबरों पर और ध्यान दीजिये-राजस्थान में एक दलित युवक को ठाकुर लड़कों ने इसलिए जान से मार दिया, क्योंकि वह उनके सामने घोड़े पर सवार होकर चलता था। कासगंज में एक दलित लड़की की शादी में बारात ठाकुरों की बस्ती से होकर निकलेगा या नहीं और इसमें दूल्हा घोड़ी पर चढ़ेगा या नहीं, यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा और हाईकोर्ट ने इस पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर, अर्जी खारिज कर दी।
इन सभी घटनाओं को देखते हुए कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीशों की टिप्पणी ताजा हो जाती कि ‘देश खतरनाक दौर से गुजर रहा है।’ 
उप्र में ‘इनकाउण्टरों’ की संख्या एक साल के अन्दर ही 1000 की संख्या पार कर चुकी है, मारे जाने वालों में बड़ी संख्या मुसलमानों और पिछड़ी जातियों की है। विभिन्न जांचों में ये इनकाण्टर फर्जी साबित होते जा रहे हैं, फिर भी मुख्यमंत्री विधानसभा में यह बयान दे रहे हैं कि ‘इनकाउण्टर जारी रहेंगे, इसके खिलाफ बोलने वाले खुद अपराधी कहे जायेंगे।’ यानि उप्र में भी गुजरात और छत्तीसगढ़ के शासन का तरीका अपनाया जाने लगा है, सेना-पुलिस का प्रमोशन और सत्ता का रथ लोगों की लाशों पर चढ़कर आगे बढ़ रहा है। धीरे-धीरे यह तरीका पूरे देश में लागू किया जा रहा है। संविधान की शपथ लेकर संविधान की धज्जियां उड़ाना, खुद को कानून से ऊपर रखना और विरोधियों को संविधान विरोधी, अपराधी और देशद्रोही बताना सत्ता की मुख्य कार्यवाही होती जा रही है। हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले आतंकवादि के मुकदमों को कमजोर कर, उनके बाहर निकलने का रास्ता बनाना और आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम नौजवानों को जेल में डालते जाना और फासी पर लटकाना, यह आज की राजनीति की स्वाभाविक सी दिखने वाली घटना लगने लगी है।
सैद्धांतिक भाषा में यह फासीवाद है, जो कि विश्व आर्थिक मंदी की एक अभिव्यक्ति है, जिससे निपटने के लिए पूंजीपतियों के नुमाइन्दे सत्ताधीश लोगों के अन्तर्विरोधों को बढ़ाने और इससे फायदा उठा कर सत्ता में आने और बने रहने का जतन करती है। फासीवाद को सैद्धांतिक रूप से परिभाषित करने वाले ज्यॉर्जी दिमित्रोव का कहना है-
‘‘साम्प्रदायिक फासीवाद हमेशा अपने समय की वर्चस्वशाली साम्राज्यवादी शक्ति के हितों से जीवनी शक्ति हासिल करता है, फिर उसके हितों की सेवा करता है.....’’
‘‘........फासीवाद का मुख्य वाहक है राष्ट्रवाद। हर जगह फासीवाद जनसमुदाय की राष्ट्रवादी भावनाओं को अपने हाथ का खिलौना बनाता है और सत्ता में आने के लिए उन्माद भरे आन्दोलन छेड़ता है।’’
आगे उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी आर्थिक स्थिति से उत्पन्न फासीवाद हर देश में अलग-अलग तरीके से आता है। जाहिर है उस देश की राजनैतिक सामाजिक स्थिति के हिसाब से आता है और ऊपर की घटनायें भारत में यहां की राजनैतिक आर्थिक स्थिति के अनुरूप आये फासीवाद का ही नमूना है, जो मनुवादी, ब्राह्मणवादी, साम्प्रदायिक फासीवाद है। यानि भारत का साम्प्रदायिक फासीवाद साम्राज्यवादी दमन के लिए यहां के मनुवादी व्यवस्था को अपना अवलम्ब बनाये हुए है। भारतीय फासीवाद के इस स्वरूप पर बात करने के लिए पहले फासीवाद के स्रोत- साम्राज्यवादी पूंजी के आर्थिक संकट की बात करते हैं।
मार्क्सवाद को समृद्ध करते हुए लेनिन ने पूंजी के साम्राज्यवादी स्वरूप की व्याख्या करने वाली पुस्तक ‘साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्था’ लिखी। जिसमें उन्होंने मंदी दर मंदी गुजरने के बाद वैश्विक स्तर पर पूंजी के एकाधिकारी चरित्र को समझाया है, जिसमें बड़े कॉरपोरेट बड़ी पूंजी के रूप में छोटे कॉरपोरेट यानि छोटी पूंजी को निगलते जाते हैं। अधिक से अधिक मुनाफे के लिए प्राकृतिक संसाधनों और श्रम की लूट अपने चरम पर पहुंच जाती है, जिससे पूरी दुनिया में अराजकता की स्थिति खड़ी हो जाती है और पूंजी का दमन जनता पर बढ़ जाता है साथ ही तीखा हो जाता है। इस दमन को आसान बनाने के लिए पूंजी की एकाधिकारी शक्तियां लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़े करने वाले रास्तों को तलाशती हैं, जिनमें साम्प्रदायिकता उनका चिर-परिचित और स्वाभाविक तरीका है। उतना ही स्वाभाविक, जितना कि ऐसी अराजक स्थिति से निपटने का एक ही रास्ता है- पूंजी के एकाधिकारी स्वरूप और मुनाफे की अर्थव्यवस्था को खत्म करना। 
भारत में पूंजी के इस फासीवादी स्वरूप को लागू कराने का ठोस आधार देने का काम करने वाली विचारधारा ‘मनुवाद’ सैकड़ों सालों से मौजूद है, जिसने लोगों को वर्णव्यवस्था की जातीय श्रेणीबद्धता में बांट रखा है और समाज के एक बड़े शोषित हिस्से को एक ‘वर्ण’ के रूप में आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक तौर पर संकरे हाशिये पर ढकेलकर रखा है। इसने लोगों को वर्ण और जातियों के आधार पर शासक और शोषितों में बांट रखा है। इसने मुसलमानों और वर्णव्यवस्था के बाहर के लोगों को ‘म्लेच्छ’ घोषित कर रखा है। इसने महिलाओं को इंसान होने का दर्जा देने की बजाय हर उम्र में किसी पुरूष की सम्पत्ति या संरक्षिता घोषित कर रखा है। संविधान के माध्यम से इन्हें कुछ जनवादी अधिकार दिलाने की कोशिश अम्बेडकर ने की, लेकिन आज की फासीवादी सत्ता उन अधिकारों को भी छीनने पर अमादा है। यानि भारत की ब्राह्णवादी मनुवादी व्यवस्था साम्राज्यवादी पूंजी के मंदी के संकट को हल करने की जमीन मुहैया करा रही है। मनुवाद के माध्यम से वह समाज में पहले से शोषण झेल रही एक बड़ी आबादी को उनके शिक्षा, रोजगार, भोजन, आवास और कई अन्य अधिकारों से पल्ला झाड़ सकती है, क्योंकि सवर्णांे का एक बड़ा तबका उनके साथ नहीं आयेगा, बल्कि खुद सरकार के साथ मिल कर इस तबके को हाशिये पर ढकेलने में तत्पर हो रहा है। 
वास्तव में साम्राज्यवादी पूंजी के एकाधिकारी स्वरूप अख्तियार करने की स्थिति में राजनीति, समाज और संस्कृति में भी इसकी अभिव्यक्ति एकाधिकार के ही रूप में होती है। यानि समाज में मुनाफे की एकाधिकारी होड़ ‘एक राष्ट्र’ के विचार से आगे बढ़ता हुआ, एक धर्म, एक वर्ण, एक लिंग, एक झण्डा, ‘राष्ट्रभक्ति’ की एक ही अभिव्यक्ति, एक गीत, एक भाषा, एक रंग, एक नेता या मुखिया तक जा पहुंचता है, जिसे हम आज घटित होता देख भी रहे हैं। 
भारतीय संविधान ने भले ही सबको जनवाद देने का दावा किया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं रह सका, क्योंकि उसने दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों आदिवासियों और महिलाओं को जनवादी अधिकार देने वाले आर्थिक आधार मुहैया नहीं कराये। आज भी ज्यादातर दलित और पिछड़े भूमिहीन हैं, जबकि ऊपरी दो वर्णों के पास उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा जमीनें और सम्पत्ति हैं। महिलाओं को तो सम्पत्ति में संवैधानिक अधिकार भी काफी संघर्षों के बाद मिला। जाति, वर्ण, लिंग, धर्म के आधार पर इनकी जनवाद की लड़ाई अभी बाकी ही थी, कि साम्प्रदायिक फासीवाद ने इन सबके संवैधानिक अधिकारों को भी छीनने की शुरूआत कर दी है। यहां की मनुवादी ब्राह्मणवादी सोच और इसका आज तक मौजूद मजबूत आर्थिक आधार इनके अधिकारों को छीनने में सहयोगी की भूमिका में नजर आ रहा है, भले ही पूंजी के दमन की प्रवृति उनको भी नहीं बख्श रही है, लेकिन वे इसमें ही खुश हैं कि वे किसी से ‘ऊपर’ है, किसी के बरख्श ‘शासक’ हैं। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यहां ‘ब्राह्मणवाद’ से तात्पर्य ब्राह्मण जाति से नहीं, बल्कि जातियों की उस श्रेणीबद्धता से है, जिसमें हर जाति के नीचे एक जाति है। और हर जाति किसी जाति से अपने को श्रेष्ठ या ब्राह्मण समझती है, वह उसके यहां का खाना नहीं खाती है, न ही उनके यहां वैवाहिक रिश्ता बनाती है। सबसे ऊपरी वर्ण की जातियां अगर कई जातियों से श्रेष्ठ हैं, तो सबसे निचले वर्ण की जातियां भी कई जातियों से खुद को श्रेष्ठ या उनके मुकाबिल खुद को शुद्ध या ब्राह्मण मानती हैं। 
भारत की इस पृष्ठभूमि में दमनकारी एकाधिकारी साम्राज्यवादी पूंजी हमारे देश में इस मनुवादी ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था के कंधे पर सवार होकर तबाही मचा रही है, यह कंधा उसे वह आधार मुहैया करा रहा है, जिसके बल पर वह यहां अपने मरणासन्न साम्राज्य का विस्तार कर रही है। भारतीय फासीवाद की यही विशेषता है। इस बात को इस तरह से कहना भी सही होगा कि भारतीय जनता पार्टी, जो कि मनुवादी ब्राह्मणवाद का सबसे सच्चा प्रतिनिधित्व करती है, को भारत की जनता ने नहीं, बल्कि वेंटिलेटर पर पहुंच चुकी साम्राज्यवादी पूंजी ने अपने लिए चुना है, जो भारत में अपनी वैचारिकी के कारण फासीवादी दमन को सबसे अच्छे तरीके से लागू करवा सकती है। इसका यह मतलब नहीं है कि सरकारों को चुनने में जनता की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन उसकी यह भूमिका आज के साम्राज्यवादी समय में ‘आभासी’ हो गयी है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में कांग्रेस और भाजपा के बीच फेसबुक वाला झगड़ा है, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे की पोल खोली, कि किसने चुनाव के समय किस कॉरपोरेट की मदद लोगों का दिमाग तैयार करने के लिए ली है। ‘फेसबुक’ और तमाम सोशल साइट्स लोगों की निजी जानकारियों को चुनावों के समय बेचकर लोगों का ‘माइण्डसेट’ तैयार करने का काम कर रही हैं। फेसबुक के संचालक मार्क जुकरबर्ग ने इसे अमेरिकी कांग्रेस में स्वीकार किया है। इसके अलावा बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा चुनावी पार्टियों को अरबों, खरबों का चन्दा, निजी विमान से लेकर हर तरह की सुविधा देने की खबरें भी अब कहीं न कहीं से लीक हो ही जाती है, जिनसे पता चल जाता है कि किस समय बिजनेस घराने किस पार्टी के पक्ष में जनता के बीच पैसा बहा रहे हैं। 2014 में उनकी पहली पसन्द मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ही थी, इसलिए उसकी जीत हुई। दरअसल साम्राज्यवादी पूंजी सरकार चुनकर उन पर पानी की तरह रूपये बहाकर जनता से उन्हें चुनवाने का प्रचार अभियान चलाती है, पिछले कई चुनावों के अन्दर की खबरें पढ़ें, तो यह बात साफ हो जाती है। आज आधार कार्ड द्वारा हर व्यक्ति की जानकारी डिजीटल बना देने से चुनावों में ‘जनमत’ तैयार कर लेना और भी आसान हो गया है, यह बात खुद सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड पर होने वाली बहस के दौरान कहा। 2014 के चुनावों में केन्द्र में भाजपा ‘प्रचंड बहुमत’ (यह शब्द भी कॉरपोरेटी मीडिया का दिया हुआ है, जो कि जीती हुई पार्टी के पक्ष में माहौल बनाता है, और विरोधी पक्षों को डराता है) से इसलिए आयी, क्योंकि एक तो साम्राज्यवादी नीतियों को लागू करते जाने के कारण जनता कांग्रेस ने नाराज चल रही थी, दूसरे उसके पास लोगों पर दमन करने वाली लोगों को बांटकर दमन को ‘मैनेज’ कर लेने वाली साम्प्रदायिक फासीवादी विचारधारा भाजपा के मुकाबिल कमजोर थीं। फिलहाल भाजपा उनकी पहली पसन्द है। चुनाव से ही एक के बदले दूसरे दल को चुन कर इस फासीवाद को हरा देने की बात सोचने वाले दरअसल फासीवाद को विश्व के वित्तीय संकट से जोड़कर न देखकर उसे देश की एक अलग-थलग परिघटना के रूप में देखने की गलती कर रहे हैं। अव्वल तो भाजपा ही इस पूंजीवादी संकट से निपटने के लिए पूंजीपतियों की पहली पसन्द है, जिसे चुनावों से शिकस्त देना मुश्किल है, लेकिन यदि अत्यधिक दमन से उपजी जागरूकता की वजह से भाजपा सत्ता से बाहर हो भी गयी, तो वह इतनी मजबूत हो गयी है कि सत्ता से बाहर रहकर भी वह कारपोरेटी पूंजी के हितों को साधती रह सकती है। 
कांग्रेस और दूसरे चुनावी दल भी साम्राज्यवादी पूंजी के हितों को साधने में एक दूसरे से होड़ लेते दिख रहे हैं, इसलिए इनका जनता के प्रति साधुभाव रखना असम्भव है। इसे नहीं भुलाया जा सकता कि 1991 में साम्राज्यवादी हमला तेज होने के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही बाबरी मस्जिद ढहाई गयी, कई बड़े दंगे हुए, आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम नौजवानों को फंसाने का सिलसिला शुरू हुआ और गौरक्षा के नाम पर झज्जर जैसा काण्ड भी हुआ। घटनायें और भी है, जो कांग्रेस के मनुवादी ब्राह्मणवादी चरित्र का बयान करती हैं, भले ही भाजपा का यह चरित्र अधिक बर्बर और उजागर है। इसलिए इस दौर में एक चुनावी दल को हराकर दूसरे को जिताकर राहत पा लेने की बात सोचना इस खतरनाक दौर को सिर्फ पार्टियों के चरित्र को फासीवाद के कारण तक सीमित कर देना है। इस तर्क से भी सोचें तो भाजपा को हराकर कांग्रेस को सत्ता में ले आने पर भी भाजपा और उनके अनुसंगी संगठन समाज में बने ही रहेंगे और अपना काम करते रहेंगे। कांग्रेस उन पर रोक लगायेगी ऐसा सोचना भी नासमझी है, उल्टे पिछली घटनायंे बताती हैं कि कांग्रेस सहित दूसरे चुनावी दल उनके साम्प्रदायिक कर्मांे को अपने हित के लिए इस्तेमाल ही करती रही है। 
दरअसल फासीवाद को हराना केवल सत्ता में बैठी एक पार्टी को हराना भर नहीं है। यह निहायत निष्क्रिय सोच है, जिससे कुछ नहीं बदलने वाला। इस फासीवाद को टक्कर देने का मतलब है समाज में अराजकता फैलाने वाली इस अर्थव्यवस्था के खिलाफ चल रही लड़ाई का हिस्सा बनना, उसके लिए जरूरी है कि मनुवादी व्यवस्था को पोषित करने वाली सत्ता को समाज से समाप्त कर देने के लिए लड़ना, जो लोगों को छूत-अछूत में बांटने का काम कर रही है।
सीमा आज़ाद

Friday, 27 April 2018

कैशलेस सिस्टम में बढ़ा फ़्राड

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश