Tuesday, 23 May 2017

हाशिमपुरा के 30 वर्ष पुराने पन्ने ------ विभूति नारायण राय

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Monday, 22 May 2017

राजीव का जवाब था, 'मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं वैसे भी मारा जाऊँगा' ------ प्रस्तोता : जया सिंह

फोटो साभार 
Rajanish Kumar Srivastava
Jaya Singh
22-05-2017 
 
अपनी हत्या से कुछ ही पहले अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी ने कहा था कि अगर कोई अमरीका के राष्ट्रपति को मारना चाहता है तो ये कोई बड़ी बात नहीं होगी बशर्ते हत्यारा ये तय कर ले कि मुझे मारने के बदले वो अपना जीवन देने के लिए तैयार है.
"अगर ऐसा हो जाता है तो दुनिया की कोई भी ताक़त मुझे बचा नहीं सकती."
21 मई, 1991 की रात दस बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में ऐसा ही हुआ. तीस साल की एक नाटी, काली और गठीली लड़की चंदन का एक हार ले कर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तरफ़ बढ़ी. जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए झुकी, कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ.
उस समय मंच पर राजीव के सम्मान में एक गीत गाया जा रहा था.... राजीव का जीवन हमारा जीवन है... अगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहीं है... तो वो जीवन कहाँ का?
वहाँ से मुश्किल से दस गज़ की दूरी पर गल्फ़ न्यूज़ की संवाददाता और इस समय डेक्कन क्रॉनिकल, बंगलौर की स्थानीय संपादक नीना गोपाल, राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं.
नीना याद करती हैं, "मुझे सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा. मैं आमतौर पर सफ़ेद कपड़े नहीं पहनती. उस दिन जल्दी-जल्दी में एक सफ़ेद साड़ी पहन ली. बम फटते ही मैंने अपनी साड़ी की तरफ़ देखा. वो पूरी तरह से काली हो गई थी और उस पर मांस के टुकड़े और ख़ून के छींटे पड़े हुए थे. ये एक चमत्कार था कि मैं बच गई. मेरे आगे खड़े सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे."
नीना बताती हैं, "बम के धमाके से पहले पट-पट-पट की पटाखे जैसी आवाज़ सुनाई दी थी. फिर एक बड़ा सा हूश हुआ और ज़ोर के धमाके के साथ बम फटा. जब मैं आगे बढ़ीं तो मैंने देखा लोगों के कपड़ो में आग लगी हुई थी, लोग चीख रहे थे और चारों तरफ़ भगदड़ मची हुई थी. हमें पता नहीं था कि राजीव गांधी जीवित हैं या नहीं."
श्रीपेरंबदूर में उस भयंकर धमाके के समय तमिलनाडु कांग्रेस के तीनों चोटी के नेता जी के मूपनार, जयंती नटराजन और राममूर्ति मौजूद थे. जब धुआँ छटा तो राजीव गाँधी की तलाश शुरू हुई. उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उनका कपाल फट चुका था और उसमें से उनका मगज़ निकल कर उनके सुरक्षा अधिकारी पीके गुप्ता के पैरों पर गिरा हुआ था जो स्वयं अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे.
बाद में जी के मूपनार ने एक जगह लिखा, "जैसे ही धमाका हुआ लोग दौड़ने लगे. मेरे सामने क्षत-विक्षत शव पड़े हुए थे. राजीव के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता अभी ज़िंदा थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखा. कुछ बुदबुदाए और मेरे सामने ही दम तोड़ दिया मानो वो राजीव गाँधी को किसी के हवाले कर जाना चाह रहे हों. मैंने उनका सिर उठाना चाहा लेकिन मेरे हाथ में सिर्फ़ मांस के लोथड़े और ख़ून ही आया. मैंने तौलिए से उन्हें ढक दिया."
मूपनार से थोड़ी ही दूरी पर जयंती नटराजन अवाक खड़ी थीं. बाद में उन्होंने भी एक इंटरव्यू में बताया, "सारे पुलिस वाले मौक़े से भाग खड़े हुए. मैं शवों को देख रही थी, इस उम्मीद के साथ कि मुझे राजीव न दिखाई दें. पहले मेरी नज़र प्रदीप गुप्ता पर पड़ी... उनके घुटने के पास ज़मीन की तरफ मुंह किए हुए एक सिर पड़ा हुआ था... मेरे मुंह से निकला ओह माई गॉड... दिस लुक्स लाइक राजीव."
वहीं खड़ी नीना गोपाल आगे बढ़ती चली गईं, जहाँ कुछ मिनटों पहले राजीव खड़े हुए थे.
नीना बताती है, "मैं जितना भी आगे जा सकती थी, गई. तभी मुझे राजीव गाँधी का शरीर दिखाई दिया. मैंने उनका लोटो जूता देखा और हाथ देखा जिस पर गुच्ची की घड़ी बँधी हुई थी. थोड़ी देर पहले मैं कार की पिछली सीट पर बैठकर उनका इंटरव्यू कर रही थी. राजीव आगे की सीट पर बैठे हुए थे और उनकी कलाई में बंधी घड़ी बार-बार मेरी आंखों के सामने आ रही थी.
इतने में राजीव गांधी का ड्राइवर मुझसे आकर बोला कि कार में बैठिए और तुरंत यहाँ से भागिए. मैंने जब कहा कि मैं यहीं रुकूँगी तो उसने कहा कि यहाँ बहुत गड़बड़ होने वाली है. हम निकले और उस एंबुलेंस के पीछे पीछे अस्पताल गए जहाँ राजीव के शव को ले जाया जा रहा था."
दस बज कर पच्चीस मिनट पर दिल्ली में राजीव के निवास 10, जनपथ पर सन्नाटा छाया था. राजीव के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज अपने चाणक्यपुरी वाले निवास की तरफ़ निकल चुके थे.
जैसे ही वो घर में दाख़िल हुए, उन्हें फ़ोन की घंटी सुनाई दी. दूसरे छोर पर उनके एक परिचित ने बताया कि चेन्नई में राजीव से जुड़ी बहुत दुखद घटना हुई है.
जॉर्ज वापस 10 जनपथ भागे. तब तक सोनिया और प्रियंका भी अपने शयन कक्ष में जा चुके थे. तभी उनके पास भी ये पूछते हुए फ़ोन आया कि सब कुछ ठीक तो है. सोनिया ने इंटरकॉम पर जॉर्ज को तलब किया. जॉर्ज उस समय चेन्नई में पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी से बात कर रहे थे. सोनिया ने कहा जब तक वो बात पूरी नहीं कर लेते वो लाइन को होल्ड करेंगीं.
नलिनी ने इस बात की पुष्टि की कि राजीव को निशाना बनाते हुए एक धमाका हुआ है लेकिन जॉर्ज सोनिया को ये ख़बर देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. दस बज कर पचास मिनट पर एक बार फिर टेलीफ़ोन की घंटी बजी.
रशीद किदवई सोनिया की जीवनी में लिखते हैं, "फ़ोन चेन्नई से था और इस बार फ़ोन करने वाला हर हालत में जॉर्ज या मैडम से बात करना चाहता था. उसने कहा कि वो ख़ुफ़िया विभाग से है. हैरान परेशान जॉर्ज ने पूछा राजीव कैसे हैं? दूसरी तरफ़ से पाँच सेकेंड तक शांति रही, लेकिन जॉर्ज को लगा कि ये समय कभी ख़त्म ही नहीं होगा. वो भर्राई हुई आवाज़ में चिल्लाए तुम बताते क्यों नहीं कि राजीव कैसे हैं? फ़ोन करने वाले ने कहा, सर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और इसके बाद लाइन डेड हो गई."
जॉर्ज घर के अंदर की तरफ़ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे. सोनिया अपने नाइट गाउन में फ़ौरन बाहर आईं. उन्हें आभास हो गया कि कुछ अनहोनी हुई है.
आम तौर पर शांत रहने वाले जॉर्ज ने इस तरह की हरकत पहले कभी नहीं की थी. जॉर्ज ने काँपती हुई आवाज़ में कहा "मैडम चेन्नई में एक बम हमला हुआ है."
सोनिया ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, "इज़ ही अलाइव?" जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया.
रशीद बताते हैं, "इसके बाद सोनिया पर बदहवासी का दौरा पड़ा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीख़ कर विलाप करते सुना. वो इतनी ज़ोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे कांग्रेस नेताओं को वो आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी. वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफ़ज़ल थे.
उन्होंने मुझे बताया कि सोनिया के रोने का स्वर बाहर सुनाई दे रहा था. उसी समय सोनिया को अस्थमा का ज़बरदस्त अटैक पड़ा और वो क़रीब-क़रीब बेहोश हो गईं. प्रियंका उनकी दवा ढ़ूँढ़ रही थीं लेकिन वो उन्हें नहीं मिली. वो सोनिया को दिलासा देनी की कोशिश भी कर रही थीं लेकिन सोनिया पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था."
इस केस की जाँच के लिए सीआरपीएफ़ के आईजी डॉक्टर डी आर कार्तिकेयन के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल का गठन किया. कुछ ही महीनो में इस हत्या के आरोप में एलटीटीई को सात सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया. मुख्य अभियुक्त शिवरासन और उसके साथियों ने गिरफ़्तार होने से पहले साइनाइड खा लिया.
डॉक्टर कार्तिकेयन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "आप कह सकते हैं हमारी पहली सफलता थी हरि बाबू के कैमरे से उन दस तस्वीरों का मिलना. हमने आम लोगों से सूचनाएं लेने के लिए अख़बारों में विज्ञापन दिया और एक टॉल फ़्री नंबर भी दिया. हमारे पास कुल तीन चार हज़ार टेलीफ़ोन कॉल आए. हर एक कॉल को गंभीरता से लिया गया. हमने चारों तरफ़ छापे मारने शुरू किए और जल्द ही हमें सफलता मिलनी शुरू हो गई."
"पहले दिन से ही मैं इस काम में 24 घंटे, हफ़्ते के सातों दिन बिना किसी आराम के लगा रहा. मैं रोज़ रात के दो बजे काम के बाद कुछ घंटों की नींद लेने के लिए गेस्ट हाउस पहुंचता था. सारी जाँच तीन महीने में पूरी हो गई लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट्स आने में समय लगा लेकिन हत्या की पहली वर्षगाँठ से पहले हमने अदालत में चार्जशीट दाख़िल कर दी थी."
कुछ दिनों बाद सोनिया गांधी ने इच्छा प्रकट की कि वो नीना गोपाल से मिलना चाहती हैं.
नीना गोपाल ने बताया, "भारतीय दूतावास के लोगों ने दुबई में फ़ोन कर मुझे कहा कि सोनिया जी मुझसे मिलना चाहती हैं. जून के पहले हफ्ते में मैं वहां गई. हम दोनों के लिए बेहद मुश्किल मुलाक़ात थी वो. वो बार-बार एक बात ही पूछ रहीं थी कि अंतिम पलों में राजीव का मूड का कैसा था, उनके अंतिम शब्द क्या थे. मैंने उन्हें बताया कि वह अच्छे मूड में थे, चुनाव में जीत के प्रति उत्साहित थे. वो लगातार रो रही थीं और मेरा हाथ पकड़े हुए थीं. मुझे बाद में पता चला कि उन्होंने जयंती नटराजन से पूछा था कि गल्फ़ न्यूज़ की वो लड़की मीना (नीना की जगह) कहां हैं, जयंती मेरी तरफ आने के लिए मुड़ी थीं, तभी धमाका हुआ."
इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्ज़ेंडर ने अपनी किताब 'माई डेज़ विद इंदिरा गांधी' में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटों के भीतर उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के गलियारे में सोनिया और राजीव को लड़ते हुए देखा था.
राजीव सोनिया को बता रहे थे कि पार्टी चाहती है कि 'मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूँ'. सोनिया ने कहा हरगिज़ नहीं. 'वो तुम्हें भी मार डालेंगे'. राजीव का जवाब था, 'मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं वैसे भी मारा जाऊँगा'.
सात वर्ष बाद राजीव के बोले वो शब्द सही सिद्ध हुए थे.
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=306854756420679&id=100012884707896
Jaya Singh ये बी बी सी के अंश है। 

Author :
Jaya Singh 

Thursday, 11 May 2017

हर परिवार पर 10 हज़ार रुपए का बोझ पड़ेगा ------ गिरीश मालवीय


Girish Malviya
 11-05-2017
आप चाहे गरीब हो चाहे मध्यम वर्गीय आपके परिवार पर लगभग दस हजार रूपये देने का बोझ सरकार ने डाल दिया है ....कैसे ?............यह समझने के लिए यह पोस्ट पूरी पढ़े................
लोग अभी खुश हो रहे है कि शेयर बाजार उछल रहा है, और उन्हें लग रहा क़ि अब अच्छे दिन आने वाले है, शेयर बाजार उछलने की असली वजह यह है कि सरकार ने एक अध्यादेश निकाल दिया है बैंकिंग रेगूलेशन एक्ट’ में हुए ताजा बदलाव के जरिए अब खुद आरबीआई ही कंपनियों के ‘फंसे हुए लोन्स और संपत्तियों (बेड एसेट्स)‘ के बारे में फैसला ले सकेगा. ....................
आप को लग रहा होगा क़ि यह तो बहुत अच्छी बात है लेकिन इसे समझने के लिए हमे यह समझना होगा क़ि राजन क्यों रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से हटाए गए...............
दर असल राजन ने आते ही एक निर्णय लिया था कि अब सभी बैंको को बताना पढ़ेगा कि उन्होंने जो लोन उद्योगपतियों को बाटे है उनका स्टेटस क्या है याने कितने की रिकवरी संभव है, और कितने का लोन को वो मान चुके है कि यह पैसे तो गढ्ढे में गए, 2017 के आखिर तक सभी बैंको को अपने सारे बेड लोन को रिकग्नाएज़ करना था............
दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सबसे खतरनाक बात यह है कि भारतीय बैंकिंग का एनपीए उनकी कुल पूंजी से अधिक हो गया है............
भारत की बैंकिंग की संस्कृति जो प्रभावशाली कर्ज़दारों को कर्ज़ चुकाने में चूकने के बावजूद बच निकलने देती है. इसकी ओर आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने ध्यान खींचा था.................
आरबीआई कर्मचारियों को लिखे एक ईमेल में उन्होंने लिखा, था"हम ग़लत करने वालों को तब तक सज़ा नहीं देते जब तक वह छोटा और कमज़ोर न हो. कोई भी अमीर और अच्छे संबंधों वाले, ग़लत काम करने वाले को नहीं पकड़ना चाहता, जिसकी वजह से वह और भी ज़्यादा का नुक़सान करते हैं. अगर हम टिकाऊ मज़बूत वृद्धि चाहते हैं तो दंडाभाव की इस संस्कृति को छोड़ना होगा.".................अपने कड़े रुख के कारण राजन को हटना पड़ा.................
उनके जाने और सरकार व्दारा अपना पपेट रिजर्व बैंक की गद्दी पर बैठाने के बाद बैंकों को अपना एनपीए घोषित करने की बात तो दूर रही अब सरकार ने इस अध्यादेश के जरिये बैंक से जुड़े बड़े अधिकारियो को अपने स्तर पर एनपीए निपटाने के आदेश दे दिए है...............
दंड देने की बात तो भूल ही जाइये,अब आपको यह भी मालूम नही पड़ेगा क़ि किस हिसाब से अधिकारियों ने सेटलमेंट किये है ........
इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिये भारती एयरटेल वालो की कंपनी भारती शिपयार्ड का एनपीए लगभग 10 हजार करोड़ रूपये हो गया था नए अध्यादेश का सहारा लेते हुए अधिकारियो ने यह कर्ज 3 हज़ार करोड़ में एडेलवीस को बेच दिया गया जिसे शुरू में सिर्फ 450 करोड़ देने हैं, बाकी किश्तों में और अब कंपनी का नाम बदल दिया जायेगा .............
अब इसमें पूंजीपतियों को कितना फायदा हुआ यह देखिये ..............एक झटके मे उसका 7 हजार करोड़ देने का बोझ हट गया ..........अब कम्पनी की क़ीमत बढ़ेगी, दाँव लगाने वाले वित्तीय पूँजीपति तगड़ा मुनाफा कमायेंगे..........
और बैंक का 7 हज़ार करोड़ का बट्टे खाते में जाने वाला नुकसान 
उसे आप और हम मिलकर भरेंगे आखिर हमारी देश के प्रति कुछ तो जिम्मेदारी बनती है न............
इन्ही सब बातों को मद्दे नजर रखते हुए पिछले साल संपादक और स्तंभकार टीएन नैनन ने हाल ही में बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार में लिखा था कि बैंकों के बढ़ते एनपीए से नए व्यवसायों के लिए कर्ज़ देने की उनकी क्षमता प्रभावित हुई है. इन फंसे हुए कर्ज़ों का बोझ अंततः भारतीय करदाता पर ही पड़ता है, जो सरकार के नियंत्रण वाले सरकारी बैंकों के अंतिम गारंटर हैं. .............
बैंक संकट पर वो लिखते हैं, "तो क्या किया जा सकता है? आसान विकल्प यह है कि आपके टैक्स का और पैसा लेकर इन्हीं बैंकों को तश्तरी में सजा कर दे दिया जाए. सरकार उन्हें 2.4 लाख करोड़ रुपए देने की बात कर रही है. इसका अर्थ यह हुआ कि हर परिवार पर, चाहे वह ग़रीब हो या अमीर, उस पर 10 हज़ार रुपए का बोझ पड़ेगा."..............

https://www.facebook.com/girish.malviya.16/posts/1516298601735116

Wednesday, 10 May 2017

जस्टिस कर्णन पर दुख तो होता है पर उनसे सहानुभूति नहीं होती ------ कंवल भारती

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इन अखबारी खबरों के मुताबिक जस्टिस कर्णन को अधिकत्तम सजा दी गई है और साधारण औपचारिकताओं का भी निर्वहन नहीं किया गया है जबकि वह अगले महीने ही रिटायर्ड भी होने जा रहे थे। शायद न्यायपालिका के इतिहास में  उनके चरित्र को गिरा कर रखना ही अभीष्ट था। तमाम उद्योगपति, व्यापारी, अपराधी सजा से बचे रह जाते हैं और खुद न्यायाधीश ही सजा के हकदार हो जाते हैं । 
(विजय राजबली माथुर )

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Thursday, 4 May 2017

विपक्ष को ध्वस्त करने का भाजपा का शस्त्र आ आ पा ------ विजय राजबली माथुर

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समाजशास्त्र (सोशियोलाजी ) में ज़िक्र आता है कि, प्राचीन समाजों के इतिहास का अध्यन  करने हेतु प्रतीकों  का अवलोकन करके निष्कर्ष निकाला जाता है। हालांकि, आधिकारिक  रूप से पुष्टि तो इसकी भी नहीं की जा सकती है। बी ए के कोर्स की पुस्तक में दो उदाहरण देकर इसे सिद्ध किया गया है। ( 1 ) जंगल में धुआँ  देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, आग लगी है। ( 2 ) किसी गर्भिणी को देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, संभोग हुआ है। जबकि आधिकारिक रूप से कहने के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है किन्तु ये अनुमान बिलकुल सटीक होते हैं। 
बहुत ही चालाकी से इस पोस्ट में यह कहने से बचा गया है कि, साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के स्वार्थ लोलुप लोग आसानी से आर एस एस की चाल का शिकार खुद - ब - खुद बने थे। ऐसे लोग न घर के होते हैं न घाट के। सन 2011 में जब राष्ट्रपति चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी  और मनमोहन सिंह जी को राष्ट्रपति बना कर प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाने की कवायद शुरू हुई तब जापान की यात्रा से लौटते में विमान में सिंह साहब ने पत्रकारों से कहा था कि, वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि, तीसरी बार भी पी एम बनने के लिए प्रस्तुत है। जब सोनिया जी इलाज के वास्ते विदेश गईं तब सिंह साहब की प्रेरणा से हज़ारे / रामदेव आदि ने कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण में जनलोकपाल आंदोलन खड़ा कर दिया जिसका उद्देश्य संघ/ भाजपा / कारपोरेट जगत को लाभ पहुंचाना था। आज की एन डी ए  सरकार के गठन में सौ से भी अधिक भाजपाई बने कांग्रेसियों का प्रबल योगदान है। 
जनसंघ युग में ब्रिटेन व यू एस ए की तरह दो पार्टी शासन की वकालत उनका उद्देश्य था। उस पर अमल करने का मौका उनको अब मिला है जब भाजपा केंद्र की सत्ता में और आ आ पा उसके विरोध की मुखर पार्टी के रूप में सामने है। आ आ पा का उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी,अंबेडकरवादी आदि समेत सम्पूर्ण विपक्ष को ध्वस्त कर खुद को स्थापित करना है। भाजपा के विपक्ष में आ आ पा और आ आ पा के विपक्ष में भाजपा को दिखाना आर एस एस की रणनीति है। बनारस में मोदी साहब को आसान जीत दिलाने के लिए केजरीवाल साहब ने वहाँ पहुँच कर भाजपा विरोधियों को ध्वस्त कर दिया था और पुरस्कार स्वरूप दिल्ली में थमपिंग मेजारिटी से उनकी सरकार का गठन हो गया तथा कांग्रेस समेत सम्पूर्ण विपक्ष ध्वस्त हो गया। 
अभी भी जो लोग आ आ पा में विश्वास बनाए रखते हैं वे वस्तुतः अप्रत्यक्ष रूप से मोदी और भाजपा को ही मजबूत बनाने में लगे हुये हैं। 

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Tuesday, 2 May 2017

वर्षा डोंगरे के पोस्ट पर सरकारी नोटिस ------ छत्तीसगढ़ खबर

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 "जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का.... 

आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ... ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता । " --- वर्षा डोंगरे

वर्षा डोंगरे के पोस्ट पर सरकारी नोटिस  :

 May 1, 2017 cg khabar 0 Comment varsha dongre, वर्षा डोंगरे






http://www.cgkhabar.com/chhattisgarh-issue-notice-varsha-dongre-20170501/


राय पुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे का नक्सल समस्या पर यह स्टेट्स👇

मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुदबखुद सामने आ जाऐगी... घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं...भारतीय हैं । इसलिए कोई भी मरे तकलिफ हम सबको होत है । लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना... उनकी जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाऐं नक्सली है या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दुध निकालकर देखा जाता है । टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का.... 
आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ... ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता ।
मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था । उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैने स्वयं देखे । मैं भीतर तक सिहर उठी थी...कि इन छोटी छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए...मैनें डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा ।
हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें...।
इसलिए सभी को जागना होगा... राज्य में 5 वी अनुसूची लागू होनी चाहिए । आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए । उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे । आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं । हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक... पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे ...किसान जवान सब भाई भाई है । अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा...। संविधान में न्याय सबके लिए है... इसलिए न्याय सबके साथ हो... 
हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए... लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं । लेकिन हमने इनके सारे ईरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई... आगे भी होगी ।
अब भी समय है...सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे ।
ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे....
जय संविधान जय भारत
रायपुर जेल की डिप्टी जेलर

वर्षा डोंगरे की वाल से

https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1958295831073013&id=100006778455353




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 27 April 2017

Political opposition to the BJP in 2019; Knock Knock -- there's no one there ------ Sarita Rani


Sarita Rani



The Sangh is here to stay. It is not going away in 2019. 
It's followers will be raiding our homes, our shops, are kids, wives and daughters. It is killing people on the roads in broad daylight. No party or leader has stopped them. No one WILL stop them. No one's coming to help us. It is going to get worse, not better.
Now what are we prepared to do to save ourselves?
Sarita Rani
26-04-2017

KNOCK KNOCK - NO ONE'S THERE.
THE SANGH WILL SWEEP 2019. DON'T LET THE OPPOSITION SELL YOU SILLY DREAMS 
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Here's Why :
1. They have the men, they have the might and they have the money too : More, they have the mood on their side. And sheer brilliance.
Performance, facts, data -- these have ceased to matter. Those who think the Sangh is stupid and call this "the Jumla Sarkar," have got the most important communication principle wrong.
I'm told Stanford has repackaged it as moral psychology.
But when people of my generation were educating ourselves, in Aristotlean times, "Jumla" used to be called Rhetoric.
The Sangh is a master of rhetoric.
It knows how to create the EXACT rhetoric, at different levels of information consumers.
That's why it SEEMS to contradict itself. But it really isn't.
It's merely a communication strategy.
They always have the message right on point for whoever they want to connect with. Sometimes this message spills over to other consumers and creates confusion.
The MNC consumers get the swadeshi message, and the "integral humanism" consumers get the "rape dead Muslim women," message.
But the Sangh is aware of the spillover and has a management strategy in place. It uses key spokesmen, at key points, to manage the costs. Sambit Patra and Naina for daily briefings. Kanchan Gupta for more involved conversations. Makarand Paranjpe for academia, Swarajyamag for intellectuals.
The riff-raff are too many to count. Zee News, whose strategy is evolving brilliantly on a daily basis; Rajat Sharma; newspapers they're buying or bullying by the dozens in all languages; Shiv Sena and it's communication factory and so on. .
Yet, when the costs become too high -- as with Smriti Irani -- the doen't hesitate to ruthlessly cut the cord.
They are playing the long con.
It is not stupidity. It is brilliance.
2. The Opposition has NONE of the above. NO OPPOSITION PARTY has the men, the might, the money, the mood or even a tenth of the brilliance the Sangh has.
There is not a single congress worker who will march unless he's paid to. That's the simple fact of the matter.
The Congress is dead in the water. Write its obituary and get on with it.
At the time of our greatest peril, there is a tendency to be most nostalgic.
But nostalgia can sometimes be a friend. Sometimes, it can be an enemy of the future.
THIS TIME, NOSTALGIA IS THE ENEMY.
Nehru is dead. So is Indira Gandhi and Rajiv Gandhi. They are the past.
The Congress was born in the throes of the Freedom Struggle. It is over a 100 years old.
This struggle needs a newer, more youthful leadership. People with fire in their belly. Hungry and angry. Refusing to compromise.
The Congress isn't that party anymore. It hasn't been that party for a few decades. The Congress is the party that made BJP possible; that MAKES BJP possible every single election.
I have friends who are die-hard Congress fans. But if ever there was a time for bitter truths, this is it. Surely, SOME things matter more than loyalty to a party?
3. That leaves the non-Congress Opposition. Well, what about them?
AAP? It lost Delhi Municipal. Kejriwal threatened a "movement" if he lost and made his first major compromise with a 'graceful defeat.'
It WILL be first of many major compromises he will make.
Second Rule of Fight Club -- Don't make threats you don't follow up on.
Then there's the little matter of AAP's non existence in most of India.
Local opposition parties? Either they're lining up to tie-up with the BJP; or they're all fighting with each other. U.P. and Bengal are eminent examples. Delhi is too, by the way. Read the non-EVM reason that Yogendra Yadav gave for Kejriwal's loss.
If you're looking for a viable, existing, political opposition to the BJP in 2019; Knock Knock -- there's no one there.
4. EVMs - I love technology, always have, always will. I normally believe that the solution to the ills of technology is more technology. But on this, I am THAT loony. There are some things that are best analog or brick and mortar.
MONEY and VOTES are two things, I firmly believe, should stay physical. There is evidence and MORE that EVMs are giving out false votes. Yet, we are always given an explanation we believe, because WE WANT TO.
We buy silly arguments like "only some are". But they came "from U.P. and didn't get enough time to rest (purge, puke?)"; But "they were not provided by the EC!"
The worst yesterday: "Tamper-able doesn't mean they were tampered with!!!"
The meme forgets to mention that they were apparently designed so that one cannot prove they were tampered with. (An alleged security feature so stupid, it beggars belief.)
But we are ready to buy any argument that doesn't force us to make hard choices.
POSTSCRIPT
So what are the hard choices?
The first hard choice is to let go of the imagination of hope.
To let go, is not to despair, but to stop pretending.
Reality begins where pretensions stop.
And it is only when we face reality, that we can begin to imagine action at all.
The Sangh is here to stay. It is not going away in 2019. 
It's followers will be raiding our homes, our shops, are kids, wives and daughters. It is killing people on the roads in broad daylight. No party or leader has stopped them. No one WILL stop them. No one's coming to help us. It is going to get worse, not better.

Now what are we prepared to do to save ourselves?

https://www.facebook.com/sarita.rani.01/posts/10154792331543842

Wednesday, 26 April 2017

मौसमी चटर्जी : 26 अप्रैल 1948






 Mausmi Chatterjee Did Rape Scene During Her Pregnancy
प्रेग्नेंसी में इस एक्ट्रेस ने किया था रेप सीन, शूटिंग के दौरान रोई, उल्टियां भी की
dainikbhaskar.com | Apr 19, 2017, 14:37 IST




मुंबई. एक्ट्रेस मौसमी चटर्जी 69 साल की होने जा रही हैं। 26 अप्रैल 1948 को कोलकाता में जन्मीं मौसमी ने कई फिल्मों में काम किया है। लेकिन 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) उनकी सबसे सक्सेसफुल फिल्म मानी जाती है। डायरेक्टर मनोज कुमार की इस फिल्म में मौसमी ने रेप सरवाइवर तुलसी का रोल किया था। फिल्म का रेप सीन हिंदी सिनेमा के सबसे डिस्टर्बिंग सीन्स में गिना जाता है। खास बात यह है कि मौसमी ने प्रेग्नेंसी की हालत में यह सीन किया था।रेप सीन के दौरान रो पड़ी थीं मौसमी...
- 2015 में एक इंटरव्यू में मौसमी ने 'रोटी कपड़ा और मकान' के रेप सीन की शूटिंग का किस्सा शेयर किया था।
- मौसमी ने कहा था, "इस सीन की खूब चर्चा रही थी। लोगों को यह सेंसिटिव लगा था। लेकिन इसकी शूटिंग बहुत मुश्किल थी। सीन में विलेन को मेरा ब्लाउज खींचते दिखाया गया है। मुझे चिंता थी कि यह सीन कैसे शूट होगा। सीन के लिए मैंने दो ब्लाउज पहने थे और विलेन ने ऊपर वाला ब्लाउज खींचा था।"
- इंटरव्यू में मौसमी ने बताया था कि जिस वक्त वे उस रेप सीन की शूटिंग कर रही थीं, उस वक्त उनके बाल बहुत लंबे थे। शूटिंग के दौरान उनके ऊपर ढेर सारा आटा गिर गया। वे पसीने से तर थीं और हर चीज उनसे चिपक जा रही थी। आटा भी उनके बालों में जा चिपका। अपनी हालत देखकर वे सेट पर रोने लगीं।
- मौसमी के मुताबिक, शूटिंग के बाद रात में 10.30 बजे वे घर पहुंचीं और बालों से आटा निकालते-निकालते उन्हें रात के 2 बज गए।
- मौसमी ने यह भी बताया था कि कुछ आटा उनके मुंह में चला गया था, जिसकी वजह से उन्हें खूब उल्टियां हुईं और उनकी हालत खराब हो गई। हालांकि, मौसमी की मानें तो डायरेक्टर मनोज कुमार ने उनकी खूब केयर की।
- मौसमी के मुताबिक, प्रेग्नेंसी की वजह से 'रोटी कपड़ा और मकान' का सॉन्ग 'तेरी दो टकिया की नौकरी' जीनत अमान को दे दिया गया था।
http://bollywood.bhaskar.com/news/ENT-BNE-this-actress-did-rape-scene-in-pregnancy-news-hindi-5578174-PHO.html



इंदिरा चटर्जी  का जन्म 26 अप्रैल  1953 में कोलकाता में हुआ था,  जिनका नाम मशहूर बंगाली फिल्म निर्देशक तरुण मजूमदार द्वारा बदलकर मौसमी चटर्जी कर दिया गया था. चौदह साल की उम्र में मौसमी चटर्जी बालिका वधू बन गईं.
खिलखिलाती सहेलियों के साथ स्कूल जाते हुए. मासूमियत भरी मस्ती और हंसने पर बढ़ा हुआ दांत दिखना, कंधे पर बस्ता टांगे हुए, लंबी- लंबी दो चोटियां उन्हें और भी मासूम बना देता था.
मशहूर बंगाली फिल्म निर्देशक तरुण मजूमदार नायिका के रोल के लिए उन्हें स्कूली लड़की की तलाश थी, जो देखने में मासूम लगे और चंचल भी. तरुण मजूमदार को लगा कि यह छात्रा उस रोल के लिए सही रहेगी. तरुण मजूमदार रोज मौसमी चटर्जी को देखते. उनकी निगाह में मौसमी चटर्जी की मासूमियत इस कदर बस गई कि उन्होंने सोच लिया कि मौसमी ही उनकी फिल्म में बालिका वधू बनेंगी.
उन्होंने जब इंदिरा से पूछा कि मेरी फिल्म में काम करोगी, तब बड़ी मासूमियत से उन्होंने ‘हां’ कह दिया, और पूछा कब से काम शुरू करना है? क्या आज से ही करना होगा? लेकिन मैं स्कूल से छुट्टी नहीं ले सकती. मुझे बाबा (पिताजी) से पूछना पड़ेगा.
सेना में नौकरी करने वाले सख्त स्वभाव वाले इंदिरा के पिता प्रांतोष चट्टोपाध्याय ने साफ मना कर दिया, ‘सवाल ही नहीं उठता. मेरी बेटी पढ़ेगी और खूब पढ़ेगी.’ तब तरुण मजूमदार ने बाबा को मनाने की जिम्मेदारी अपनी पत्नी संध्या राय को सौंपी जो उस समय बंगाल की लोकप्रिय कलाकार थीं. संध्या ने जैसे-तैसे बाबा को मना लिया और इस तरह चौदह साल की उम्र में इंदिरा बालिका वधू बन गई. लेकिन उन्हें अपना नाम बदलना पड़ा.
मौसमी का विवाह बहुत कम उम्र में हो गया था वे जितनी कम उम्र में परदे पर आई, उतनी ही कम उम्र में उनका विवाह भी हो गया. संयोग से प्रसिद्ध गायक हेमंत कुमार ने अपने बेटे रीतेश के लिए मौसमी का हाथ मांग लिया.शादी के बाद वे कोलकाता में रहने लगीं कोलकाता से मुंबई आने पर हेमंत कुमार ने मौसमी से कहा, ‘तुममें अच्छे कलाकार के सभी गुण मौजूद हैं. तुम्हारा चेहरा भी सिल्वर स्क्रीन के लिए एकदम सही है. तुम प्रतिभावान हो, फिल्मों में अभिनय जारी रखो. इस तराह उनके पति ने भी उन्हें हौसला दिया | उस समय तक कई जाने-माने निर्देशक पटकथा लेकर हेमंत कुमार के पास आते थे. तब उन्हें शक्ति सामंत की फिल्म ‘अनुराग’ की कहानी बहुत पसंद आई और 1972 में उन्होंने ‘अनुराग’ में काम करने के लिए शक्ति सामंत को हामी भर दी, लड़की की भूमिका इतने सशक्त ढंग से निभाई कि उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार उन्हें दिया गया. इस फिल्म के सभी गाने खूब लोकप्रिय हुए थे. इस तरह यह सिलसिला चल निकला.
उसके बाद मौसमी ने कई प्रमुख फिल्मों में उस दौर के सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया. ‘रोटी, कपड़ा और मकान’, ‘उधार की जिंदगी’, ‘मंजिल’, ‘बेनाम’, ‘जहरीले इंसान’, ‘हमशक्ल’, ‘सबसे बड़ा रुपइया’ और ‘स्वयंवर’ उल्लेखनीय फिल्में हैं.
उनकी छोटी बेटी पायल भी कैमरे की बारीकियां समझने लगी हैं. हाल ही में मौसमी चटर्जी को बंगाल सिने आर्टिस्ट द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया. मौसमी की बड़ी बेटी मेघा को भी उनकी ही तरह तरुण मजूमदार बंगाली फिल्म ‘भालोबासेर अनेक’ नाम से फिल्मी दुनिया में पदार्पण करवा चुके हैं. यह जानना दिलचस्प होगा कि इस फिल्म में मौसमी ने मेघा की चचेरी बहन की भूमिका अदा की है.

http://www.indiajunctionnews.com/biography-about-moushumi-chatterjee/

Saturday, 22 April 2017

सेहत के पाँच तत्व : अर्थ डे (22 अप्रैल ) ------ शमीम खान

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अर्थ डे (22 अप्रैल ) :





भगवान =भ (भूमि-ज़मीन  )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। 

इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं। 
 मिट्टी  अर्थात ज़मीन अथवा भूमि ,गगन अर्थात आकाश , वायु अर्थात हवा,अनल अर्थात अग्नि,और नीर अर्थात जल या पानी  का जो स्वस्थ्य हेतु सुश्री शमीम खान ने बताए हैं  वस्तुतः उनके अनुसार आचरण करना ही वास्तविक धर्म है। लेकिन मजहबी दूकानदारों और इनके ठेकेदार एथीस्ट्स ने जनता को उलझा रखा है तथा व्यापारियों / उद्योगपतियों के हितार्थ गलत व्याख्याएँ पेश कर राखी हैं। जिस कारण जनता भटक कर शोषण व उत्पीड़न का शिकार होती रहती है। इस लेख से प्रेरित होकर काश लोग अब भी जाग्रत हो जाएँ तो इस पृथ्वी पर सुख,स्वास्थ्य व समृद्धि को प्राप्त किया जा सकता है। 
(विजय राजबली माथुर )

Monday, 17 April 2017

सोशल मीडिया पर मनमानी ------ मैत्रेयी पुष्पा

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वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा की ख्याति न सिर्फ बतौर कथाकार-उपन्यासकार रही, बल्कि अपने लेखन में वह स्त्री अस्मिता की बड़ी पैरोकार बनकर भी उभरी हैं। उनकी सार्वजनिक सक्रियता और बेबाक टिप्पणियों ने भी हिंदी पट्टी में उन्हें अलग मुकाम पर खड़ा किया। हिंदी अकादमी, दिल्ली की उपाध्यक्ष के तौर पर भी उनकी सक्रियता चर्चा में है, सवाल भी उठे। मैत्रेयी के अपने अवदान के साथ समाज व साहित्य में स्त्री की हैसियत, सोशल मीडिया पर साहित्य के अच्छे-बुरे स्वरूप आदि मुद्दों पर हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द्र ने उनसे लंबी बातचीत की:
अपने फेसबुक पेज पर आपने लिखा है, ‘आंधियों को पता है कि इधर के रास्ते आना है उन्हें, और हम भी जानते हैं कि कैसे पेश आया जाएगा’... इसमें कोई खास संदेश पढ़ा जाए?
जीवन के सफर में वे आसानियां नहीं देखीं, जो रास्तों को चलने लायक बना देती हैं। बचपन भी जीने और पढ़ने की जुड़वां चुनौती लेकर आया। पिता को नहीं देखा मैंने, क्योंकि वे तब खत्म हो गए, जब मैं सिर्फ 18 महीने की थी। मां ने किसानी की और फिर अपनी पढ़ाई। स्कूल हम दोनों के ही पास नहीं था। तीन-चार मील के बीहड़ सफर के बाद कक्षा में बैठना नसीब होता। मैं गांव से पढ़ने जाने वाली अकेली लड़की थी। शायद तभी से मेरे छोटे से मन ने दृढ़ता हासिल कर ली और खतरों की चुनौतियों का सामना करती हुई पढ़ती रही। बाबा से कहा करती थी कि स्कूल क्यों नहीं है, सड़क क्यों नहीं है और हमारे घर कच्चे फूस की छान वाले क्यों हैं, पक्के क्यों नहीं? बाबा कहते, सब नसीब के खेल हैं। मेरी समझ के बाहर रही यह बात और मैं नसीब के खिलाफ जाना सीखने लगी। बस तभी से मेरे साथ चल रही हैं ये पंक्तियां ...यह मेरा उद्बोधन गीत है।
सोशल मीडिया पर खास तरह की रचनात्मक सक्रियता दिख रही है। क्या नई रचनाशीलता सोशल मीडिया से निकलेगी, जैसे कभी लघु पत्रिका आंदोलन से निकली थी?
सोशल मीडिया पर रचनाशीलता से ज्यादा रचना पर मनमानी है। कोई कविता अच्छी लगी, शेयर कर ली। बस इतना ही। कूड़ा-कबाड़ा भी कम नहीं होता। लघु पत्रिका आंदोलन व्यावसायिक घरानों की पत्रिकाओं के लोप होते जाने का परिणाम था। उनमें रचनाएं मुकम्मल होती थीं। सोशल मीडिया के लेखन में वह करीनेदारी और गहराइयां कहां? यहां तो ‘जोई सोई कछु गावै’ जैसा ज्यादा है। कुछ पंक्तियों या पैराग्राफ बन जाने से साहित्य नहीं बनता।
ब्लॉगिंग को साहित्य के किस खांचे में रखेंगी...?
ब्लॉग के जरिये साहित्य लिखा जाएगा, यह समझ से परे है, क्योंकि ब्लॉग तो कोई भी लिख रहा है। माना कि साहित्य से जुडे़ लोग भी लिख रहे हैं, तो उनसे इसमें कैसी रचनाशीलता की उम्मीद की जाए? सोचने की बात है कि क्लासिक आज भी क्यों महत्वपूर्ण है? इधर कुछ ऐसी किताबें भी आ रही हैं, जो ब्लॉग लिखते-लिखते बन गईं। वे पढ़ी तो जा रही हैं, लेकिन ये फास्ट-फूड की तर्ज पर ही हैं।
क्या सोशल मीडिया ने रचनाकार का समय चुराया है? साहित्य को यह किस तरह प्रभावित कर रहा है?
सोशल मीडिया ऐसा नशा परोसता है कि चस्का लग जाता है। गंभीर विषयों पर सोचने वाला रचनाकार छोटी-मोटी, हल्की-पतली टिप्पणी करके खुश हो लेता है, क्योंकि वहां तत्काल लाइक मिलने लगता है। यह एक भ्रम में डालता है। रचनाकार को इससे बचना होगा। खासकर तब, जब उसकी रचनाशीलता प्रभावित होने लगे।
आरोप है कि साहित्य का दायरा धीरे-धीरे सिमट रहा है, यह नई पीढ़ी से दूर जा रहा है?
माना जा रहा है कि साहित्य के नाम पर अब सूचनाएं ही रह गई हैं, क्योंकि नए लेखकों का रुझान इंटरनेट ने खींचा है। फेसबुक का प्लेटफॉर्म सहज सुलभ है। इस बात को हम खारिज नहीं कर सकते कि फेसबुक पर लेखक-लेखिकाओं की जो बाढ़ आई है, उनमें से कुछ बहुत अच्छे रचनाकार होकर साहित्य में योगदान कर सकते हैं। लेकिन यह भी तय है कि अच्छे संपादक और समीक्षकों के हट जाने से निखारने और संवारने का काम कौन करेगा? पत्रिकाएं और अखबारों के साहित्यिक पृष्ठ जरूरी हैं। न तो पुराना सब बुरा है और न नया सारा अच्छा।
कभी-कभी लगता है कि साहित्य में स्त्री विमर्श और देह विमर्श के बीच कुछ घालमेल हो गया है?
स्त्री विमर्श बनाम देह विमर्श का नारा चारों ओर सुनाई देता है। राजेंद्र यादव ने स्त्री के लिए देहमुक्ति का आह्वान किया था -‘पुरुष ने स्त्री के खून में यह भावना संस्कार की तरह कूट-कूटकर भर दी कि वह सिर्फ और सिर्फ शरीर है। वह शरीर के सिवा उसकी और किसी पहचान से इनकार करता है।’ पर मैं मानती हूं कि यह विमर्श का प्रथम चरण था। अब आगे आना चाहिए। शरीर के दावे के साथ लोकतांत्रिक समाज का दावा जरूरी है। जो स्थितियां हमारे खिलाफ हैं, हमारा हक छीनती हैं, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व कायम किए हुए हैं, उनके विरुद्ध लड़ना स्त्री विमर्श के फलक का विस्तार करेगा, पर ऐसा दिख नहीं रहा।
आपकी कहती हैं कि ‘राजनीति जैसा क्रूर इलाका कहीं नहीं’? राजनीति से इतनी नफरत क्यों?
हाथ कंगन को आरसी क्या? महाभारत से बड़ा कोई राजनीतिक ग्रंथ नहीं। कृष्ण कहते हैं- ‘मर जाने पर स्वर्ग मिलेगा, जय होने पर भूतल राज/ इससे ही निश्चय भारत, तू हो जा खड़ा युद्ध को आज’। तब से आज तक देखा जाए तो बिना स्वार्थ के संबंधों का कोई वजूद नहीं। हाल के चुनाव में जो दृश्य देखने को मिले, वे महाभारत को ही दोहरा रहे थे। कहीं धृतराष्ट्र, कहीं शकुनि। हां, जयचंदों की कमी न थी। संबंध ही खूनमखून नहीं हुए, देश के लिए बेहतरी के डंकों की चोट में कुटिल चालें चली आईं।
लेकिन आपका हिंदी अकादमी में आना भी तो राजनीति (अरविंद केजरीवाल) से नजदीकी के कारण हुआ?
लोग ऐसा कहते और फैलाते भी हैं कि अरविंद केजरीवाल से नजदीकी मुझे हिंदी अकादमी में लाई। बेशक मुख्यमंत्री ने मेरे नाम का चुनाव किया होगा, पर मेरी जान-पहचान या मिलना-जुलना हरगिज न था। ताज्जुब हुआ था, जब महिला आयोग के लिए मेरा नाम आया, फिर दूसरी बार सरकार आई, तो हिंदी अकादमी के लिए बुला लिया, जबकि मेरी कोई मुलाकात तक नहीं थी। यहां राजनीति नहीं, शायद ईमानदारी का कोई भरोसा या साहित्यकार का सम्मान होगा।
शिकायत है कि हिंदी अकादमी लेखकों, कलाकारों के लिए वह नहीं कर पाई, जिसकी अपेक्षा थी?
कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनमें आप अपना परिश्रम ही नहीं, जिंदगी भी झोंक दें, तब भी लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे। ऐसा ही मामला दिल्ली हिंदी अकादमी का है। हमने साहित्यकारों, नाट्यकर्मियों और पत्रकारों के साथ शिक्षकों के लिए कार्यक्रम किए हैं। छात्रों को अकादमी से जोड़ा। अभी कुछ ही दिनों पहले हिंदू कॉलेज में तीन दिन का साहित्य महोत्सव हुआ, जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया। ऐसे कार्यक्रम कालेजों में ले जाने से छात्र काफी संख्या में साहित्य के प्रति आकर्षित हुए हैं। अकादमी के सम्मान में पूरी ईमानदारी बरती जाती है। रेस्पांस बहुत अच्छा है। हां, कुछ लोग हैं, जिनका मेरे आने के पहले यहां प्रभुत्व रहा होगा, उनका सिक्का चलना जरूर बंद हुआ है।
आपके रचनाकार में एक एक्टिविस्ट हावी दिखाई देता है?
मैं खुद न तो समाज सेविका बनी, न आगे बढ़कर नारे-झंडे लहराने का मन बनाया। हां, परिस्थितियां जरूर ऐसी आ टकराईं कि कभी विरोध करना पड़ा, तो कभी विद्रोह। मैं लड़कों वाले स्कूल-कॉलेज में पढ़ी हूं। पंद्रह साल की उम्र में इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल साहब का दिल इस किशोरी पर आ गया और फिर एक्स्ट्रा क्लास के फरेब के बीच धक्का-मुक्की। दूसरे दिन लड़कों से मिलकर स्ट्राइक! मैंने उन दिनों ही जान लिया, जिस लड़की के पिता-भाई या संरक्षक नहीं होते, उसके सच्चे मित्र सहपाठी होते हैं। मैं एक्टिविस्ट थी नहीं, बना दी गई।
आपकी नई किताबवह सफर था कि मुकाम था ... राजेंद्र यादव पर केंद्रित है। क्या यह गुड़िया भीतर गुड़िया की अगली कड़ी है?
वह सफर था कि मुकाम था... अभी का लेखन है। राजेंद्र यादव का नाम मेरे साथ आते ही लोग चौकन्ने हो जाते हैं। कारण कि स्त्रयिों को लेकर राजेंद्र जी की छवि एक शिकारी की बनती रही है, जिसके पास लुभाने और ललचाने के लिए हंस पत्रिका है। मेरे लिए भी लेखक-लेखिकाओं ने ऐसा ही माना और प्रचारित किया कि पाठक भी यही बात मान लें। मेरा और उनका साथ 23 साल का रहा। मुझे लगा कि जिस विद्वान से मैंने लिखने का प्रशिक्षण पाया, जिसने मेरे उपन्यासों की पांडुलिपियों को मनोयोग से पढ़ा और जिसने उस प्रशिक्षण के दौरान कठोर शिक्षक की भूमिका अदा कर मुझे लिखने के अनुशासन में ढाला, उसके प्रति मेरा व्यवहार क्या हो? संयोग ही था कि मुझे राजेंद्र यादव मिले, जिन्होंने माना और लिखा - ‘मैत्रेयी एक विद्यार्थी की तरह आई।’ तब यह किताब एक स्त्री-पुरुष के संबंध से पहले एक लेखिका के बनने और संपादक के निर्देशन की कहानी है।
इतना व्यापक कथा संसार रचने के बाद भी आपको मनचाहा मुकाम नहीं मिला?
व्यापक कथा संसार रच पाई, यह मेरे अनुभव के खजाने की देन है। अगर इशारा किसी विशेष सम्मान या पुरस्कार की ओर है, तो बताओ कि मेरे अनुभवों का खजाना किसी का कृपाकांक्षी होने के लिए था क्या? मानो या न मानो, लेखन में आई लिखने के लिए। यहीं पता चला कि लिखने का इनाम भी मिलता है। और कुछ इनाम बड़ी भाग-दौड़, जोड़-तोड़ के बाद मिलते हैं...। मैं स्त्री हंू, स्त्री के घर से तो लेखन ही हो जाए यही बहुत, इनाम-खिताब की कौन कहे? हां, पाठक मिले और मिली अच्छी सी रॉयल्टी!
महिला कथा-लेखन की मौजूदा स्थिति से आप संतुष्ट नहीं हैं, क्यों?
महिला रचनाकार कहानियां लिख रही हैं। आप की भाषा में महिला कथाकारों की फौज भी है। होनी भी चाहिए, नहीं तो छोटी से लेकर बड़ी पत्रिकाओं का पेट कैसे भरेगा? मैं संतुष्ट होती हूं या नहीं, इससे क्या फर्क पड़ेगा? फिर भी, मेरा कहना यही रहा है कि देखना चाहिए कि कहां कमी है कि कहानियां पहले की तरह सिर चढ़कर बोलती नहीं। कैसा समय चल रहा है, इससे कोई सरोकार है नहीं। कपड़े, सेक्स और मर्द से रिलेशनशिप जैसे विषय फेडआउट हो चुके हैं।

 












संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 16 April 2017

' हिजड़ा ' नहीं इंसान कहिए --- नेशनल दस्तक / माँ होना सबसे बड़ी पहचान --- गौरी सावंत

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' सुश्री मीना त्रिवेदी ' द्वारा गौरी सांवत के विचार पढ़ने के साथ साथ 'नेशनल दस्तक ' के लिए 'सुश्री श्वेता यादव ' द्वारा लिया गया यह साक्षात्कार भी सुनिए जिससे इन तृतीय लिंग के लोगों की समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है। 











  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 14 April 2017

किसान की क्षमता बढ़ाना उद्देश्य था डॉ बी आर अंबेडकर का ------ प्रकाश अंबेडकर

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 हिंदुस्तान,लखनऊ,14 अप्रैल 2013 के समपादकीय पृष्ठ पर :
 14 अप्रैल,1990 को 'सप्तदिवा',आगरा मे प्रकाशित मेरा लेख : 





संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 12 April 2017

प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गयी है

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Published on Apr 3, 2017
प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना के तहत बैंक किसानों के खातों से बिना पूछे पैसे काट रहे हैं. 

जनवरी 2016 में शुरू की गयी प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गयी है.








   
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 9 April 2017

विशव्यापी आतंकवाद

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Hindustan,Lko.,26-3-2017,Page --- 1 

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 7 April 2017

गलती का नासूर ------ शशांक

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 6 April 2017

kishori amonkar

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    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 2 April 2017