Thursday, 21 September 2017

कामकाजी महिलाओं के साहस और संघर्ष की असीमा भट्ट द्वारा व्यक्त गाथा पर बुजुर्गवार की अभद्र टिप्पणी

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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Wednesday, 20 September 2017

धोखेबाज़ी का बड़ा चेहरा : नीतीश कुमार ------ रहीम खान

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यह समाचार NDA के पास ६० प्रतिशत वोट होने की सूचना देता है. मूलतः NDA के पास बहुमत हेतु लगभग १७ हज़ार से अधिक वोट कम हैं. यह ६० प्रतिशत का आंकडा विरोध पछ में फूट का द्योतक है. लकड़ी को काटने के लिए लोहे की हथौड़ी में लकड़ी का ही हत्था डाला जाता है ठीक इसी प्रकार विरोधी दलों में फूट डाल कर सिर्फ विरोधी दलों ही नहीं देश के संविधान व् लोकतंत्र को काटने का उपक्रम किया गया है. नीतीश कुमार, नवीन पटनायक सरीखे मुख्यमंत्री जो इस अभियान का हत्था बने हैं वे निजी हितों की खातिर देश के संविधान को नष्ट कर लोकतंत्र के खात्मे व् आर एस एस की असैनिक तानाशाही स्थापित करने की कोशिश को सहयोग कर रहे हैं. N.T.रामाराव ने तेलगू गौरव के नाम पर P.V.नरसिंघा राव का समर्थन किया था उसी तर्ज़ पर नितीश कुमार को भी बिहार गौरव के नाम पर मीरा कुमार का ही समर्थन करना चाहिए था. कभी बिहार का ही हिस्सा रहे उड़ीसा के नवीन पटनायक को भी अपने अतीत के गौरव की खातिर मीरा कुमार का ही समर्थन करना चाहिए था. इतिहास के काले अध्याय में अपना नाम न लिखवाने के लिए इन जैसे लोगों को पुनर्विचार करके NDA प्रत्याशी को हराने के लिए आगे आना चाहिए. https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1475997325795572&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3

Navendu Kumar
बिहारी अस्मिता का पाठ पढ़ाते रहे आप।...और खुद ही चल दिये महफ़िल छोड़ कर। बिहार की बेटी बुला रही- लौट आइए!...
ऐसे कैसे होगा 'संघ मुक्त भारत'? आपका ही दिया हुआ नारा है न यह? लोगों ने तो सोच लिया था कि आप खुद ही बनेंगे देश के समेकित विकास और मिल्लत-ओ-भाईचारे की राजनीति के केंद्र। आपने राष्ट्रीय राजनीति में बिहार की अस्मिता और बिहारीपन की बखान की। देश को बिहार मॉडल से विकास के नये मानदण्ड खड़े किये। उस बिहार और विकास की बिहारी शैली जो नीतीश शैली और प्रारूप के तौर पर जानी गयी, उसका ढोल भी बजाया-बजवाया। 
गुजरात मॉडल और एक क्षेत्रीय अस्मिता के काट में 12 करोड़ बिहारियों की अस्मिता और गौरव-गुमान को काट में आपने देश के सामने ला खड़ा किया। जब हमारे ही सूबे के मुखिया के 'डीएनए में ही गड़बड़ी है' की बात एक गैर बिहारी ने उठायी तो भले ही वह देश का प्रधान ही क्यों न हो, बिहार ने इसे अपनी अस्मिता पर हमला के तौर पर लिया और आपकी ललकार के साथ खड़ा हो कर उसे प्रचंड रूप से पटखनी दे दी। रुक गया उसके देश दिग्विजय का राजनीतिक रथ। आपके साथ जब बिहार का बिहारीपना है तो फिर आप क्यों किसी पराई सोच और उसकी राजनीति-रणनीति के आसरे रहेंगें। आप तो खुद ही नीतीश हैं। दूसरों की नीति-नहान में क्यों डुबकी लगा रहे या गोते खाने जायेंगें?
एक चुनाव 2015 में हुआ जिसमें आपको खांटी बिहारी और बिहारीपन के बनवारी के रूप में लोगों ने देखा। एक ये चुनाव है राष्ट्रपति का चुनाव, जिसमें एक बिहारन खड़ी है। उसके ज़रिए देश की शतरंजी सियासत पर बिहारी माटी और बेटी की प्रतिष्ठा दांव पर पड़ी है। आपको खुद के व्यक्तिगत राजनीति से अलग हो सामूहिक सदभावी राजनीति के लिए सोचना तो पड़ेगा। एक बिहारन को कैसे अकेला छोड़ सकते हैं आप? 
देश आजाद होने के बाद 70 सालों में ये कोई दूसरा मौका आया है जब किसी बिहारी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया गया है। वरना बिहार के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी औपनिवेशिक व्यवहार ही होता आया है। आप ये ज़्यादा जानते और इसकी समझ रखते हैं। वर्ना बिहार भी देश को कई प्रधानमंत्री देने की क़ूवत रखता रहा है। आप खुद ही पीएम मटेरियल हैं, ये आपके राजनीतिक विरोधियों तक ने कहा है।...पीएम मटेरियल का मतलब यह भी होता है कि जो दूसरों का गेम न खेले बल्कि खुद अपना गेम खेल दूसरों की गेम बजा दे। गुजरात चुनाव के बिछे मोहरों को आप क्यों खेलें? पटेलों की नाराजगी के विकल्प में कोली जाति के 18-24 प्रतिशत कमल छाप वोट के लिए आपका तीर किसी के धनुष पर क्यों चढ़े?
चुनाव सीधे यानि प्रत्यक्ष तौर पर हार या जीत तो होता है। पर परोक्ष रूप से चुनाव जीत कर हारने और हार में जीत की इबारत भी गढ़ जाते हैं। याद होगा सबको कि प्रतिभा ताई पाटिल के राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के कट्टर विरोधी होने के बावजूद शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे ने इस आधार पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को वोट और समर्थन दिया था कि वह महाराष्ट्र की बेटी है। किसी और के बारे में वे भला सोच भी कैसे सकते हैं! तो फिर बिहार के नीतीश कुमार बिहार की बेटी के बारे में ऐसा क्यों और कैसे नहीं कर सकते! जेडीयू के बड़े नेता केसी त्यागी जब कोविद जी को बिहार के अच्छे राज्यपाल होने के नाते समर्थन देने की बात करते हैं तो फिर अब जबकि बिहार की ही बेटी मीरा कुमार मैदान में विपक्ष के साझा प्रत्याशी के तौर पर सामने आ चुकीं हैं तो फिर क्या सोचना! 
वोट संख्या बल के आधार पर भले रामनाथ कोविद जीत जाएं और विपक्ष हार जाए तो भी हारेंगे नीतीश। इस लड़ाई में अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीरा कुमार और विपक्ष का साथ दिया तो विपक्ष भले हारे, जीतेंगे नीतीश। तब ये सिद्ध हो जायेगा कि ज़ुबानी जमा खर्च ही नहीं, बिहारी अस्मिता के नायक हैं नीतीश! इतना ही नहीं विपक्ष के नायक और धुरी भी हैं नीतीश। पहले भी में लिख चुका हूं कि अभी भारतीय राजनीति में सबकी आस हैं नीतीश कुमार। सत्ता पक्ष की भी ज़रूरत और साझा विपक्ष की उम्मीद भी। कहाँ कोई है ऐसा राजनेता जिसकी मनुहार मोदी-शाह की जोड़ी भी करे और जिससे गुहार सोनिया-लालू भी करें।
देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव की अभी भी ये स्थिति है कि नीतीश कुमार अगर मीरा कुमार के साथ खड़े हो गये तो विपक्ष की हार भी जीत के आनंद में बदल जा सकता है और सत्ता पक्ष की जीत, जान निकलने के हाल में पहुंच जाए। क्योंकि राजनीतिक गोलबंदी और पोलिटिकल इंजीनियरिंग के भी मास्टरमैन हैं नीतीश कुमार। फिर तो वी वी गिरी और संजीवा रेड्डी के प्रेसिडेंशल इलेक्शन की तरह लोकतंत्र और राजनीति में याद किया जाएगा 2017 का प्रेसिडेंशल इलेक्शन भी। इससे आगे की बात ये कि 2019 का संसदीय चुनाव हो या 2020 का बिहार चुनाव, सवाल तो ये रहेगा ही कि किस नीतीश को तब याद किया जाएगा!£

राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति पर एक बिहारी की टिप्पणी ]]
https://www.facebook.com/navendu.kumarsinha/posts/1145551852217488

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 19 September 2017

शरीर रचना ------ हफीज किदवई

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 18 September 2017

शबाना आज़मी : नूपुर शर्मा और ध्रुव गुप्त की नज़रों से






17 -09-2017 
तुमको देखा तो ये ख़याल आया ! :

आधुनिक भारतीय सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में से एक शबाना आज़मी ने भारतीय सिनेमा में संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय के जो नए आयाम जोड़े, उसकी मिसाल भारतीय सिनेमा में तो क्या, विश्व सिनेमा में भी कम ही मिलती है।अभिनय में गहराई ऐसी कि एक-एक ख़ामोशी सौ-सौ लफ़्ज़ों पर भारी। शालीनता ऐसी जो हज़ार अदाओं पर भारी। परदे पर उनकी ज़ुबान कम, आंखें ज्यादा संवाद करती हैं। महान शायर कैफ़ी आज़मी की इस बेटी को फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट, पुणे से ग्रेजुएशन के बाद जो पहली फिल्म मिली, वह थी ख्वाजा अहमद अब्बास की 'फ़ासला', लेकिन परदे पर पहले रिलीज हुई श्याम बेनेगल की 'अंकुर'। इस फिल्म की सफलता और ख्याति ने उन्हें उस दौर की दूसरी महान अभिनेत्री स्मिता पाटिल के साथ तत्कालीन समांतर और कला सिनेमा का अनिवार्य हिस्सा बना दिया। शबाना ने चार दशक लंबे फिल्म कैरियर में पचास से ज्यादा हिंदी, बंगला और अंग्रेजी फिल्मों में अपने अभिनय के झंडे गाड़े, जिनमें कुछ यादगार फिल्में हैं - अंकुर, मंडी, परिणय, निशांत, शतरंज के खिलाड़ी, स्पर्श, तहजीब, अर्थ, खंडहर, जुनून, मासूम, मृत्युदंड, गॉडमदर, मकड़ी, आर्तनाद, धारावी, दिशा,नमकीन, थोड़ी सी बेवफ़ाई, दस कहानियां, फायर, लिबास, कल्पवृक्ष, भावना, पार,अवतार, उमराव जान, एक ही भूल, साज़, हनीमून ट्रेवल्स, मटरू की बिजली का मंडोला, पतंग, द मोर्निंग रागा, 15 पार्क अवेन्यू, द मिडनाइट चिल्ड्रेन, द बंगाली नाईट, साइड स्ट्रीट्स आदि। व्यावसायिक दबाव में जिन कुछ बेमतलब की फिल्मों में उन्होंने ग्लैमरस भूमिकाएं की, उन्हें वे शायद ख़ुद भूल जाना चाहेंगी। शबाना आज़मी देश की ऐसी पहली अभिनेत्री हैं जिन्हें फिल्मों में अभिनय के लिए पांच राष्ट्रीय और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। अभिनय के अलावा स्त्रियों और बच्चों के अधिकारों और मानवीय समस्याओं के लिए लड़ने वाली एक योद्धा के रूप में भी उनका कम योगदान नहीं रहा है।

जन्मदिन (18 सितंबर) पर आपके लंबे, सृजनशील और यशस्वी जीवन के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं, शबाना ! #ShabanaAzmi:
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1488278874582039&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1

श्रेष्ठा की श्रेष्ठता

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Sunday, 17 September 2017

सबसे ज़्यादा घातक हथियार वाला USA जिम्मेदार है उत्तर कोरियाई बम के लिए ------ अजेय कुमार

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 15 September 2017

यह सादगी थी तब और आज ? ------ विजय राजबली माथुर

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बात शायद 1959  या 60  की रही होगी;अजय और मैं बाबू  जी के साथ  साईकिल से ६-सप्रू मार्ग भुआ के घर से लौट रहे थे.बर्लिंगटन होटल के पास पहुंचे ही थे की पता चला नेहरु जी आ रहे हैं.बाबू  जी ने प्रधान मंत्री को दिखाने के विचार से रुकने का निर्णय लिया जबकि घर के पास पहुच चुके थे.नेहरु जी खुली जीप में खड़े होकर जनता का अभिवादन करते और स्वीकार करते हुए ख़ुशी ख़ुशी अमौसी एअरपोर्ट से आ रहे थे.आज जब विधायकों,सांसदों तो क्या पार्षदों को भी शैडो के साए में चलते देखता हूँ तो लगता है कि नेहरु जी निडर हो कर जनता के बीच कैसे चलते थे ? जनता उन्हें क्यों चाहती थी ? हुसैनगंज चौराहे पर मेवा का स्वागत फाटक बनवाने वाले चौरसिया जी का भतीजा मेरे क्लास में पढता था.नेहरु जी की सवारी जा चुकी थी और जनता आराम से मेवा तोड़ कर ले जा रही थी कहीं कोई पुलिस का सिपाही नहीं था और फ़ोर्स भी तुरंत हट चूका था.यह था उस समय के शासक और जनता का रिश्ता.आज क्या वैसा संभव है?हुसैनगंज चौराहे पर ही मुहर्रम का जुलूस या गुड़ियों का मेला दिखाने भी बाबु जी ले जाते थे.इक्का-दुक्का सिपाही ही होते होंगे आज सा भारी पुलिस फ़ोर्स तब नज़र नहीं आता था.
विधान सभा पर २६ जनवरी को गवर्नर विश्वनाथ दास द्वारा ध्वजारोहण भी बाबू  जी ने साईकिल के कैरियर और गद्दी पर दोनों भाइयों को खड़ा करके आसानी से दिखा दिया था क्या आज वैसा संभव है? आज तो साईकिल देखते ही पुलिस टूट पड़ेगी.उस समय तो एक निजी विवाह समारोह में भी विधान सभा के लॉन में एक चाय पार्टी में बाबा जी के साथ शामिल होने का मौका मिला था.वह समारोह संभवतः राय उमानाथ बली के घर का था.आज तो उस छेत्र में दो लोग दो पल ठहर भी जाएँ तो तहलका मच जायेगा.यह है हमारे लोकतंत्र की मजबूती !

न्यू हैदराबाद से पहले तो मामा जी खन्ना विला में रहते थे जिसे स्व.वीरेन्द्र वर्मा ने किराए पर ले रखा था और मामा जी वर्मा जी के किरायेदार थे.वर्मा जी तब संसदीय सचिव थे और उनके पास रिक्शा में बैठ कर दो मंत्री चौ.चरण सिंह और चन्द्र भानु गुप्ता अक्सर आते रहते थे.तब यह सादगी थी और आज के मंत्री.......?




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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 10 September 2017

विचार विचारवान को खत्म कर देने पर बहुत तेजी से बढ़ कर लोक में समा जाता है ------ देवेंद्र सुरजन



Devendra Surjan
कल रात से रीढ़ में फिर से बहुत दर्द है लेकिन उससे ज़्यादा दर्द एक पोस्ट पढ़कर हुआ जिसमे लिखा है गौरी लंकेश का असली नाम पैट्रिक था और वो मूलतः ईसाई थी और उसे ईसाई धर्म प्रचार करने के लिए पैसे देते थे इसलिए उसने उनके लिए गौरी लंकेश पैट्रिक अखबार शुरू किया था. एक और बुद्धिजीवी ने लिखा है गौरी ने अपने नाम के आगे लंकेश रखा था इसी से पता चलता है कि उसकी मानसिकता क्या है. और एक अति विद्वान ने लिख मारा कि उसे दफनाया गया है फिर तो वो पक्की ईसाई है. भारत के कन्नड़ मूल के महान हिंदी नाटककार बी वी कारंत की किस्मत अच्छी थी कि समय रहते चले गए. 
गौरी के बारे में मैं कुछ नहीं लिखना चाहता क्योंकि सोशल मीडिया के पोस्ट पढ़कर लगता है कि भारत के हिंदी क्षेत्र में पिछले बीस पच्चीस सालों से पढाई बंद है. पढाई लिखाई पर पाबन्दी है. ऐसे में क्या लिखा जाय और क्यों? गौरी ईसाई समुदाय से नहीं बल्कि लिंगायत समुदाय से थी जो शिव को मानता है. लंकेश परिवार दावणगेरे में हर साल नन्दितावरी शिव मंदिर जाता है, हाल ही में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इस बारे में खबर छपी थी की इंद्रजीत (गौरी के भाई) ने मंदिर जाकर अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाया। 
वीरशैव या लिंगायत समुदाय वैदिक काल से ब्राह्मणों के हिन्दू धर्म पर कब्जे और कुरीतियों का विरोध करता आया है. वे मृतक को ध्यान मुद्रा में दफनाते हैं वे विश्वाश करते हैं "स्थरावक्कलीवुन्तु जङ्गमागक्कलीविल्ला" (मतलब जो स्थिर है वह मर जाता है और चलायमान ही जीता है) वे वैदिक काल की सभी कुरीतियों का विरोध करते हैं मसलन केवल ब्राह्मण ही वेद पढ़ें, स्त्रियां मंदिर में न जाएँ, ब्राह्मणों के अलावा कोई पूजा न करे वगैरा। ये लंकेश संभवतया लिंगेश का अपभ्रंश है क्योंकि वीरशैव इष्टलिंग को ही मानते हैं. वे शिव के उपासक हैं. क्या ये हिन्दू विरोध है? 
लंकेश (पैट्रिक)/पत्रिका गौरी ने नहीं उसके पिता पाल्यदा लंकेशप्पा ने 1980 में शुरू किया था. इस अखबार को निकालने से पहले गौरी के पिता ने कर्नाटक का चप्पा चप्पा छाना और दलितों, गरीबों की स्थिति पर अखबार को फोकस किया। यह अखबार गाँधी जी के "हरिजन" अख़बार की तरह आज भी कोई विज्ञापन नहीं लेता केवल सब्सक्रिप्शन पर ही चल रहा है. इसका सर्क्युलेशन लगभग 4.5 लाख है और पाठक संख्या लगभग 25 लाख.है.
सन 2000 में उनकी मौत के बाद गौरी ने इसका संपादन संभाला। उसके पिता एक सुप्रसिध्द लेखक थे जिन्होंने मूर्खता की पराकाष्ठा को पार करते हुए अंगरेजी साहित्य में मास्टर्स डिग्री हासिल की और बैंगलोर विश्विद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता शुरू कर (हाँ बिलकुल बैंगलोर के माध्यम से विज्ञापन, घूमने के लिए गाड़ी और सरकारी मकान लेने के लिए) दी. उन्होंने अपना गंवारपन जारी रखते हुए करीब दस नाटक लिखे, तीन उपन्यास, छै लघु-कथा संकलन जो कन्नड़ की लोक, संस्कृति और परम्पराओं पर आधारित थीं. और तो और 429 ईसा पूर्व के नाटक Oedipus Tyrannus या Oedipus Rex का रूपांतरण किया। उस मूढ़मति के चार काव्य संकलन भी हैं. और मरने के बाद पांच काव्य संकलन छपे. उसने अपनी मातृभूमि के प्लाट काट कर बेचने और कॉलोनी बनाकर बिल्डर बनने के बजाय कन्नड़ संस्कृति पर तीन फिल्मे भी बनाई। उस मूर्ख के उपन्यास बिरुकु (The Fissure) को पूरे भारत भर के बुद्धिजीवी, जो ईसाईयों और कॉंग्रेस के गुलाम हैं, ने सराहा। गौरी की एक और गलती थी कि उसकी एक बहिन जानी मानी फिल्मकार, गीतकार और पटकथा लेखक है. उसका नाम कविता लंकेश है और वो भी संभवतया रावण खानदान से ताल्लुक रखती है, उसने 1999 में एक फिल्म बनाई दीवारी जिसे, राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड मिले। उसने आर के नारायणन जैसे मूर्खों के उपन्यास मालगुडी पर भी फिल्म बनाई उसकी बच्चों पर बनी फिल्म बिम्बा को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उसने पांच फिल्मे बनाई जिसमे प्रीती प्रेम प्रणय को सर्वश्रेष्ठ क्षेत्रीय भाषा की फिल्म होने का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उस वक्त साहित्य प्रेमी आदरणीय अटल जी प्रधानमंत्री थे. 
जाहिर है उस वक्त ऐसी मूर्ख महिला फिल्मकारों की ज़्यादा छानबीन नहीं की गई होगी। पर अभी 2013 में उसकी फिल्म करिया कान बिट्टा को सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का अवार्ड मिल जाना आश्चर्य की बात है. और तो और ऐसे बिना पढ़े लिखे परिवार की सदस्य को ऑस्कर फिल्म चयन की ज्यूरी में रखा गया. वह कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय फिल्म फेस्टिवल की ज्यूरी में रहती थी. उसने महान नालायक तमिल लेखक जिन्होंने पता नहीं किस ईसाई से प्रेरणा लेकर अपना नाम रामास्वामी अय्यर कृष्णमूर्ति के बजाय विष्णु अवतार के नाम पर कल्कि रख लिया था, उनकी कथा पर एक संगीत-नाटक तनानम तनानम की पटकथा लिखी और निर्देशित भी किया। मूर्ख पिता की "राष्ट्रद्रोही" संतान बच्चों के लिए एक रिसोर्ट भी चलाती है जिसका नाम ग्रामीण कैम्प है. इसमें बच्चे कन्नड़ के पारम्परिक खेलों को सीखते और खेलते हैं. वह नालायक पता नहीं कैसे अँग्रेजी साहित्य में फर्स्ट क्लास एम् ए है और एडवरटाइजिंग में डिप्लोमा लेकर बैठी है. 
गौरी का एक भाई भी है इंद्रजीत है वह भी पत्रकार और फिल्मकार है. सुना है वह भी उतना ही बिना पढ़ा लिखा और नालायक है जितना परिवार के दूसरे सदस्य। वह कर्नाटक की तरफ से क्रिकेट भी खेल चुका है. वह एक खेल पत्रिका ऑल राउंडर निकालता था जिसका सर्क्युलेशन पांच लाख था. बाद में उसने अपने पिता की रावण लंकेश पत्रिका (पत्रिके) को ज्वाइन कर लिया। पर मूर्ख मूर्ख होते हैं उसे बाप की पत्रिका में सब एडिटर की पोस्ट पर क्यों आना चाहिए था. अब जाकर मैनेजिंग एडिटर बना है. उसने भी करीब सात फिल्मे बनाई जिनमे ऐश्वर्या को फिल्मफेयर अवार्ड मिला है. मैंने हाल ही में गलती से उसकी फिल्म Luv U Alia देखी है. 
गौरी ने गौरी लंकेश पत्रिका (पत्रिके) इसलिए शुरू किया क्योंकि उसका उसके भाई से झगड़ा शुरू हो गया था. सुना है दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई थी. चूँकि इंद्रजीत लंकेश पत्रिका (पत्रिके) का प्रकाशक था उसे गौरी के एक रिपोर्ट को छपने की अनुमति देने पर आपत्ति थी जिसमे उसने, इंद्रजीत के मुताबिक, नक्सलवाद का पक्षपात झलक रहा था. इंद्रजीत ने गौरी पर ऑफिस से कम्प्यूटर चुराने जैसे आरोप लगाए थे. दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस कर एक दूसरे के आरोपों का खंडन भी किया था. गौरी ने सीधे अपने पिता के अखबार से शुरुआत नहीं की वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया में थी बाद में प्रसिद्ध पत्रकार चिदानंद राजघट्टा (जिससे शादी और तलाक हुआ)** के साथ दिल्ली आ गई फिर बाद में दिल्ली से बैंगलोर आई और संडे मैगज़ीन में करीब नौ दस साल पत्रकार रही. गौरी ने ईनाडु टी वी में भी काम किया. जिस लिंगायत समुदाय से वह थी उसे वह opressed मानती थी और कहती थी हिन्दू धर्म में महिलाओं को दोयम दर्जा दिया गया है.
मैंने पिछले बीस सालों में लगभग 5000 stories लिखी हैं, कई लोग मुझसे कहते हैं कि बहुत सी रिपोर्ट भाजपा सरकार की तरफ हैं. लेकिन मैंने वही लिखा है जो देखा है और विश्वास किया है. इसकी सजा भी मुझे मिल रही है. लेकिन मैं किसी वामपंथी विचार धारा को अपना नहीं सकता भले ही वह कितनी भी तार्किक हो. न ही मैं जल्दबाजी में लिखे गए अर्थशास्त्र को अपना सकता. मैंने नोटबंदी या जी एस टी की कमियों को उजागर करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है. सरकार कोई भी हो. मुझे मालूम है और विश्वास है कि चाँद पर इंसान 1969 में तो जा ही नहीं जा सकता था क्योंकि टेक्नोलॉजी नहीं थी. अब नासा अगर कोई विचारधारा है तो जो मर्जी आये करे.
पत्रकार लेखक, कवि, साहित्यकार अपने में जीता है. वह अपने विचार किसी पर थोपता नहीं है. वह इस उम्मीद में लिखता है कि समाज की आगे की पंक्ति के लोग इसे पढ़ेंगे और कुछ सुधार करेंगे। उसके साथ समस्या यह होती है की वह अपने परिवेश में लगातार सुधार चाहता है और ये सुधार पचास दिनों में नहीं समय की गति से चाहता है. उसे ख़त्म कर देने पर वह बहुत तेजी से बढ़ता है और लोक में समा जाता है. फिर उसे नष्ट करना असंभव हो जाता है, राम, बुद्ध, कृष्ण, गांधी प्रचंड शक्तियों के नष्ट करने के प्रयासों के बाद लोक में समाते गए.अब वे हर घर में हैं. भले वह घर किसी भी धर्म को मानता हो. . एक अदनी सी गौरी अमर हो गई.

Schaschikkantte Trriviedy via Bhupendra Gupta Agam

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 9 September 2017

गौरी लंकेश पर 'प्रसन्ना ' का साक्षात्कार अमितेश द्वारा

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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09-09-2017 

Friday, 8 September 2017

साझा संघर्ष को आगे बढ़ाना ही गौरी लंकेश को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ------ कौशल किशोर



Kaushal Kishor 

Yesterday (07-09-2017 )  at 12:14pm 
बेखौफ, बेबाक पत्रकार
गौरी लंकेश की हत्या, निश्चित तौर पर दाभोलकर,
कलबुर्गी और पंसारे की हत्या की श्रंखला का हिस्सा
है । इसे हमे पूरी ताकत से निपटना होगा वरन सच
कहने वालों,लिखने वालों की हत्याएं होती रहेंगी ।
आज लखनऊ में, गांधी चबूतरे पर लखनऊ का नागरिक समाज जिसमे सामाजिक संगठनों ,महिला संगठनों ट्रेड यूनियनों,छात्रों,लेखको एवम पत्रकारों ने भारी संख्या में हिस्सेदारी की और अपने रोष को व्यक्त किया।
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते हुए बोलना ही नही ,इस कट्टरपंथी और फासीवादी सत्ता के खिलाफ एक जुट होकर उतारना होगा ।
अब हम चुप रहे तो जिंदा लाश बन जाएंगे ।
जन संस्कृति मंच ने इस घटना के विरोध में बयान जारी किया और देश भर में हो रहे प्रतिवाद संघर्ष के साथ एकजुटता जाहिर की ....
तानाशाही, गैर-संवैधानिक, गैर-लोकतान्त्रिक ताकतों के खिलाफ साझा संघर्ष को आगे बढ़ाना ही गौरी लंकेश को सच्ची श्रद्धांजलि होगी
कन्नड पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ जन संस्कृति मंच का बयान
लखनऊ, 6 सितम्बर. 5 सितंबर को कन्नड की अनभय दिलेर पत्रकार गौरी लंकेश की बंगलुरु स्थित उनके आवास पर गोली मार कर हत्या कर दी गई। गौरी कन्नड में 'लंकेश पत्रिके' नाम की पत्रिका की संपादक थीं। अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए वे पत्रकारिता को लोकतन्त्र, न्याय और धर्मनिरपेक्षता की मशाल की तरह थामने वाली आवाज थीं। तमाम दक्षिणपंथी धमकियों के बावजूद वे इस मुल्क की जम्हूरियत को अपनी कलम के जरिये मजबूत करने वाली निर्भीक पत्रकार थीं। हाल ही में उन्होंने गुजरात के राज्यप्रायोजित नरसंहार की डिजाइन उघाड़ने वाली राणा अयूब की किताब  'गुजरात फाइल्स ' का कन्नड में तर्जुमा किया था। वे लगातार महिलाओं, अल्पसंख्यकों, दलितों और अन्य हाशिये के तबकों के सवाल मजबूती से उठाती रहीं। भाजपा और संघ परिवार की तीखी आलोचक गौरी लगातार उनके निशाने पर रहीं, उनको तमाम तरह की धमकियाँ मिलती रहीं, पर उन्होंने सच और साहस का दामन मजबूती से थामे रखा। अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल पर वे लगातार लिखती-बोलती रही थीं।
गौरी लंकेश की हत्या बढ़ती असहिष्णुता के साथ इस बात का भी प्रमाण है कि मुल्क का लोकतन्त्र भीषण खतरे में है। भिन्न विचार ही लोकतन्त्र की आत्मा होते हैं, उनका गला घोंटा जा रहा है। उनकी हत्या विवेकवादी, धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और हिंदुत्वविरोधी लेखकों की दिन-दहाड़े हो रही हत्याओं की अगली कड़ी है। 2013 में महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर, 2015 में गोविंद पनसारे और 2016 में एमएम कलबुर्गी की हत्या की गयी। इन हत्याओं का तरीका एक है। कर्नाटक पुलिस के मुताबिक कलबुर्गीकी हत्या में जिस पिस्तौल का इस्तेमाल हुआ, उसी से पनसारे की हत्या की गयी थी. यह भी पता चल चुका है कि जिन दो पिस्तौलों का इस्तेमाल पनसारे की हत्या करने के लिए किया गया था, उन्हीं में से एक से दाभोलकर को भी मारा गया था. यानी इन सभी हत्याओं के तार एक-दूसरे से जुड़े हैं।
गौरी लंकेश ने लिखा था कि "हमारे पास यूआर अनंतमूर्ति,कलबुर्गी, मेरे पिता पी लंकेश, पूर्ण चंद्र तेजस्वी जैसे लोग थे. वे सभी जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के आलोचक थे लेकिन उन पर कभी हमला नहीं किया गया." पर मौजूदा दौर में संघ गिरोह जिस तरह का माहौल बना रहा है उसमें हत्यारों को खुली छूट मिली हुई है। उनके सर पर सत्ता का वरदहस्त है। पर वे सच से डरते हैं। वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे लोग उनसे डरना बंद कर देंगे। इसीलिए वे उन सब आवाजों को खामोश कराना चाहते हैं जो इन निहत्थों को एकजुट करना चाहती हैं। इसीलिए वे एक अकेली दुबली-पतली महिला के जिस्म में सात-सात गोली उतार देते हैं। कर्नाटक के चुनाव सिर पर हैं और वे खून की बारिश से मतदान की फसल काटने की फिराक में हैं।
पर जैसा कि गौरी लंकेश ने अपने एक ट्वीट में लिखा, 'हम हमारे सबसे बड़े दुश्मन को जानते हैं। उसके खिलाफ एकजुट होना 'हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। हम उनके समतामूलक समाज के सपने को साझा एकजुट लड़ाई के जरिये गति दे सकते हैं।
हत्यारों को अविलंब सजा की मांग करते हुए जन संस्कृति मंच ने विभिन्न शहरों और इलाकों में गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ प्रतिवाद दर्ज कराया है। जसम दोस्ताना ताकतों के साथ मुल्क में तानाशाही, गैर-संवैधानिक, गैर-लोकतान्त्रिक ताकतों के खिलाफ साझा संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा। शायद यही गौरी लंकेश को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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Thursday, 7 September 2017

देश की प्रकृति के प्रतिकूल वातावरण - सृजन है हत्याओं का कारण ------ विजय राजबली माथुर

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यदि भारत के मानचित्र और शिव की परिकल्पना को एक साथ अध्यन करेंगे तो हम पाएंगे कि, यह शिव हमारा देश भारत ही तो है। शिव के मस्तक पर अर्द्ध चंद्र यह हमारा हिमाच्छादित हिमालय ही तो है।शिव की जटा से निकलती गंगा का प्रतीक त्रिवृष्टि ( अब तिब्बत ) स्थित मानसरोवर झील से गंगा का उद्गम बताता है। शिव का वाहन नंदी (बैल ) हमारे देश के कृषि प्रधान होने का द्योतक है।  त्रिशूल इस बात का द्योतक है कि, जब वात - पित्त - कफ शरीर को धारण करने के बजाए शरीर को  दूषित करने लगें तो उनका शमन करना आवश्यक है। सर्प, बैल, बिच्छू, बाघ -  चर्म आदि की परिकल्पना शिव के साथ करने का अभिप्राय यह है कि, हमारा देश परस्पर विरोधी जीवों के मध्य सामंजस्य बना कर चलने वाला है। शिव के साथ पार्वती ( देश की प्रकृति ) की परिकल्पना  इस देश की प्रकृति व पर्यावरण के संरक्षण के उद्देश्य को परिलक्षित करती है। 
जब हम कहते है : ' ॐ नमः शिवाय ' तब उसका अभिप्राय होता है - 'सैलूटेशन टू दैट लार्ड द बेनीफेक्टर आफ आल '। लेकिन आज हमारे देश में इस देश की प्रकृति के विरोधी अधार्मिक लोगों का बोलबाला है जो शिव - पार्वती और उनके गणों की परिकल्पना के विपरीत आचरण कर रहे हैं। ऐसे ही लोग नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसारे, एम एम कलबूरगी व अब गौरी लंकेश की हत्याओं के लिए उत्तरदाई हैं। किन्तु देश का यह दुर्भाग्य ही है कि, ऐसे ही लोग खुद के धार्मिक होने का दावा कर रहे हैं जिसकी पुष्टि एथीज़्म को मानने वाले भी करते है जबकि ऐसे लोगों को पाखंडी और अधार्मिक घोषित करके उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए था।






संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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Saturday, 2 September 2017

यूँ ही नहीं कोई प्रियंका से हनीप्रीत बनता ! ------ मोनिका भारद्वाज



Monika Bhardwaj
Monika Bhardwaj
- 0 9 - 2017 

यूँ ही नहीं कोई प्रियंका से हनीप्रीत बनता !
बहुत बार दुःख होता है कि भला कैसे किसी रसूख वाले व्यक्तित्व के सामने एक महिला अपनी गरिमा सरेंडर कर सकती है। हर क्षेत्र में बहुत से ऐसे उदहारण हैं जहाँ या तो महिलायें सब कुछ जानते बूझते व्यक्तिगत लालच में अनर्गल व्यवहार करती हैं या किसी बहकावे में आकर शोषक का साथ देती हैं। आखिर क्यों महिलायें इन बाबों, मठाधीशों, राजनीतिज्ञों, महंतों, अभिनेताओं, बिजनसमैन, साहित्यकारों, पत्रकारों, अफसरों, संस्थाधीशों, निर्देशकों के चंगुल में फंस जाती हैं। ऐसे दुराचारियों के साथ वो महिलायें भी बराबर की दोषी हैं। क्या इन अल्पबुद्धियों को जरा भी एहसास नहीं होता कि कैसे ऐसे व्यक्ति दुनिया दिखाने के भ्रम में इनकी उंगली पकड़ने के बहाने कब इनका शरीर पकड़ लेते हैं।
क्या वे उनके रसूख की सहायता से अपना जीवन संवारना चाहती हैं या फिर वो सच में इतनी भोली होती हैं कि उन्हें स्वयं नहीं पता चलता की सामने वाला उनका इस्तेमाल कर रहा है। अगर पहला पक्ष है तो ये घोर निंदनीय एवं शर्मनाक है। अपने अस्तित्व को दांव पर लगा कर पायी इज़्ज़त कीचड़ से भी बदतर है। पर दूसरे पक्ष पर विचार जरुरी है। हो सकता है शुरूआती दौर में उन्हें आभास न हो पाए पर एक वक़्त के बाद तो उन्हें पता चल ही जाता है कि उपरोक्त व्यक्ति वास्तव में कितने पानी में है।
दरअसल अपने अभावों के शून्य को भरने के लिए आप किसी बेहतर और पूर्ण इंसान की खोज करती हैं। वें अभाव कुछ भी, किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। पर औरते क्यों नहीं समझती की उन अभावों की एवज में उन्हें सिर्फ ठगा ही जाता है। और जरा ये बताइये कि आपकी किसी भी रिक्तता को भरने के लिए दैहिकता से होकर ही क्यों गुजरना पड़ता है ? सबसे जरुरी जब हमें सब पता चल जाता है तो हम आवाज क्यों नहीं उठाती हैं ? अगर गलती दोनों तरफ से है तो खुद को समझाइये। लेकिन तब भी चाहे कुछ आ जाए उस स्थिति से भागो मत। चूँकि बहुत बार परिवार, समाज और हमारी इज़्ज़त आड़े आ जाती है। तो भी रहो इनके बीच। इन्हें जवाब दो। इन्हें लताड़ों। एहसास दिलाओ जो हुआ सही नहीं हुआ। और आगे किसी और के साथ न किया जाए। लेकिन अगर गलती सिर्फ सामने वाले की है तो उसे बख्शिए मत। किसी भी कीमत पर चुप मत बैठिये। यकीन मानिये जब आप सहीं हैं तो विपरीत परस्थितियों में भी जीत सिर्फ आपकी ही होगी।
लेकिन अंततः सवाल वही ! कि मात्र किसी रसूख के आगे औरत बिछ कैसे सकती है ? आपकी उच्चतम अंक अर्हता आपकी योग्यता का इंडेक्स नहीं हो सकता। आपकी योग्यता आपके विवेक, आपकी बुद्धि और आपकी आवाज में है। शोषण हो जाना और बेवजह मूक बधिर बन कर करवाने में फर्क है। जब तक आपको अंदाजा होता है तब तक बहुत देर हो जाती है। इसलिए जागरूकता ही बचाव है।
साभार : 
https://www.facebook.com/monikabugana/posts/739678499568703

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Wednesday, 30 August 2017

कारपोरेट कल्चर ने ध्वस्त किया है सिनेमा के स्तर को ------ अमोल गुप्ते

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 29 August 2017

' कल्चर एंड मार्केट मैरेज ' कहा है पूर्णिमा जोशी ने ढोंगवाद के प्रचार को ------ विजय राजबली माथुर

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हिंदू की पत्रकार पूर्णिमा जोशी जी ने बड़ी बेबाकी व निष्पक्षता से बताया कि, आज जो ढोंग - पाखंड बढ़ा है उसको बढ़ाने में मीडिया खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया - TV चेनल्स आदि का बड़ा योगदान है और ऐसा नब्बे के दशक के बाद नव - उदारीकरण के बाद उसकी स्व्भाविक परिनिति के रूप में हुआ है। बाजारीकरण के इस दौर को उनके द्वारा ' Culture & Market मैरेज ' की संज्ञा दी गई। इसमें TRP, मुनाफा का ध्यान है मानवता और मानवीय मूल्यों का नहीं ------









20 दिसंबर 1991 को प्रदर्शित महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म 'सड़क ' वेश्या वृत्ती के गैर कानूनी कारोबार को उजागर करने और ध्वस्त करने की एक साहसिक प्रेरणा देती है। नायक रवि ( संजय दत्त ) का सहयोग न मिलता तो क्या पूजा ( पूजा भट्ट ) जिसे उसके अपने चाचा ने ही इस नर्क में धकेला था क्या बच सकती थी ? अब से 26 वर्ष पूर्व आई इस फिल्म से जनता ने कोई सबक नहीं लिया और ढोंगियों के फेर में युवतियाँ फँसती रही हैं या उनके रिशतेदारों द्वारा ही फंसाई जाती रही हैं। 
राम रहीम मामले में भी साध्वियाँ और उनके परिवार स्वेच्छा से ही फंसे थे। किन्तु साहसी पत्रकार जो शहीद भी हुआ यदि छाप कर सार्वजनिक न करता और जज व CBI अधिकारी साहस न दिखाते तब यह न्याय मिलना संभव न होता ? किन्तु नारीवादी नेत्रियों को पुरुषों को उनका श्रेय देना गवारा न हुआ। 
इन सांगठनिक महिलाओं से कहीं ज़्यादा जागरूक और निष्पक्ष  है निर्भीक पत्रकार यह युवती :



ये महिला संगठन यदि अब भी जनता को जाग्रत करें और इन ढोंगियों से महिलाओं व युवतियों को बचाएं तो देश व समाज का भला हो सकता है।
'सड़क ' की तरह संदेषपरक फिल्में अब नहीं बन रही हैं तब क्या ये महिला संगठन भी जनता को जाग्रत करने में अक्षम हैं ? 
वस्तुतः इन संगठनों के पदाधिकारी साधन - सम्पन्न परिवारों से संबन्धित हैं जिनको गरीब और विप्पन परिवार की महिलाओं व युवतियों से क्या सहानुभूति हो सकती है ? सिवाय अपनी छवी चमकाने के। 

यदि सच में ये संगठन खुद जागरूक होते और जनता को जागरूक करने के इच्छुक होते तो सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते और घर - घर जाकर लोगों को पुरोहित वाद के चंगुल से बचने को प्रेरित करते। महिलाओं के दमन के लिए रचे गए पर्वों - बर मावस, करवा चौथ आदि आदि न करने के लिए महिलाओं को समझाते , भागवत आदि सत्संगों के नाम पर व्याप्त लूट से बचने को आगाह करते, मृत्यु - भोज आदि गरीबों को कंगाल बनाने वाली कुरीतियों से बचने को कहते, पंडितों - पुजारियों को दान देने का निषेद्ध करते । लेकिन इन संगठनों पर ब्राह्मण वादी वर्चस्व होने के कारण ये ऐसा न करके मात्र प्रतिकात्मक प्रदर्शन करके अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

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Monday, 28 August 2017

सड़क पर भीड़ तंत्र और 'सड़क ' का संदेश ------ विजय राजबली माथुर

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नर - नारी की समानता की आवाज़ उठाने वाली महिला नेत्रियों का एकपक्षीय दृष्टिकोण उजागर : 

यदि शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति अपने अखबार में आवाज़ न उठाते 


और यदि CBI अधिकारी दबाव के बावजूद निर्भीकता व निष्पक्षता न बरतते एवं जज साहब भी निर्भीक व निष्पक्ष निर्णय न देते तो साध्वी को न्याय कहाँ से मिलता ? किन्तु इन लोगों के पुरुष होने के कारण पुरुष विरोधी महिला नेत्रियों ने एक शब्द भी कहना मुनासिब नहीं समझा। ऐसी ही नर - नारी समानता समाज को चाहिए क्या ?
20 दिसंबर 1991 को प्रदर्शित महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म 'सड़क ' वेश्या वृत्ती के गैर कानूनी कारोबार को उजागर करने और ध्वस्त करने की एक साहसिक प्रेरणा देती है। नायक रवि ( संजय दत्त ) का सहयोग न मिलता तो क्या पूजा ( पूजा भट्ट ) जिसे उसके अपने चाचा ने ही इस नर्क में धकेला था क्या बच सकती थी ? अब से 26 वर्ष पूर्व आई इस फिल्म से जनता ने कोई सबक नहीं लिया और ढोंगियों के फेर में युवतियाँ फँसती रही हैं या उनके रिशतेदारों द्वारा ही फंसाई जाती रही हैं। 

राम रहीम मामले में भी साध्वियाँ और उनके परिवार स्वेच्छा से ही फंसे थे। किन्तु साहसी पत्रकार जो शहीद भी हुआ यदि छाप कर सार्वजनिक न करता और जज  व CBI अधिकारी साहस न दिखाते तब यह न्याय मिलना संभव न होता किन्तु नारीवादी नेत्रियों को पुरुषों को उनका श्रेय देना गवारा न हुआ। 
ये महिला  संगठन यदि अब भी जनता को जाग्रत करें और इन ढोंगियों से महिलाओं व युवतियों को बचाएं तो देश व समाज का भला हो सकता है।
'सड़क ' की तरह संदेषपरक फिल्में अब नहीं बन रही हैं लेकिन मुकेश भट्ट ने इसका सीकवल बनाने की घोषणा की है जिसमें आलिया भट्ट की भूमिका संजय दत्त व पूजा भट्ट की बेटी के रूप मे होगी।  







  

  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 21 August 2017

साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना क्यों फल-फूल रही है ? ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी


Jagadishwar Chaturvedi
21-08-2017 

शिक्षा में साम्प्रदायिकता और स्टीरियोटाइप : 

आप देश में कहीं पर भी जाइए आपको विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों में एक बड़ा तबक़ा मिलेगा जो सहज और स्वाभाविक तौर पर साम्प्रदायिकचेतना और जातिचेतना संपन्न है । स्थानीय तौर पर अनेक मसलों पर ये लोग साम्प्रदायिक या जातिवादी नजरिए से सोचते हैं । इस तरह की चेतना कांग्रेस के जमाने में भी थी और आज भी है।लेकिन भाजपा-आरएसएस का प्रचार यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षकों में वामदलों का , वाम विचारधारा का वर्चस्व है।आरएसएस का यह प्रचार एकदम निराधार और सफेद झूठ है।मैं जब पढता था तब और जब पढाने लगा तब भी अधिकांश शिक्षकों में साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना के मैंने जेएनयू से लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय तक साक्षात दर्शन किए हैं।सवाल यह है शिक्षकों में यह चेतना कहाँ से आती है? हम अपनी शिक्षा और शिक्षकों को साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना से मुक्त क्यों नहीं कर पाए ? असल में हमारी शिक्षा परिवर्तन विरोधी है , परिवर्तनकामी को शिक्षा में शक की नजर से देखते हैं।
एक अन्य बुनियादी सवाल यह है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय और कॉलेज तर्क और विवेक के आधार पर चल रहे हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से चल रहे हैं ? शिक्षक अपने विद्यार्थियों को तर्क,विवेक और वैज्ञानिक नजरिए से पढाते हैं या स्टीरियोटाइप नजरिए से पढाते हैं? अंदर की हकीकत यह है कि हम अपने विद्यार्थी को स्टीरियोटाइप पद्धति से पढाते हैं।वास्तविकता यह है कि हमारे विकास और परिवर्तन की गारंटी स्टीरियोटाइप नजरिया नहीं है। हमें यदि बदलना है और नया समाज बनाना है तो तर्क और विवेक के आधार पर चीजों को देखने,समझने और परखने के संस्कार पैदा करने होंगे।ये चीजें ही शिक्षा की सार्थकता की गारंटी हैं।
विश्वविद्यालय और कॉलेज का नाम आते ही पहला शब्द ज़ेहन में आता है वह है ज्ञान या नॉलेज।सवाल यह है हम ज्ञान कैसे अर्जित करते हैं ? ज्ञान कैसे संप्रेषित करते हैं ? जानना या खोज की भूख पैदा करना बेहद जरुरी है लेकिन हमारा समूचा पठन -पाठन ज्ञान की भूख पैदा नहीं करता,खोज की इच्छा पैदा नहीं करता इसके विपरीत हमने यह मान लिया है कि हमें किसी तरह डिग्री हासिल करनी है, नौकरी हासिल करनी है और इसके लिए जितना जरुरी है उतना ही पढो, रट लो और फिर काम पर निकल लो! यानी ज्ञान के साथ हमने प्रयोजनमूलक संबंध बनाया है ज्ञानकेन्द्रित संबंध नहीं बनाया है।शिक्षा में प्रयोजनमूलक दृष्टि हमें पुराने संस्कारों ,मूल्यों और संबंधों से मुक्त करने में मदद नहीं करती यही वजह है कि हम जैसे पढने आते हैं डिग्री पाने के बाद भी वैसे ही बने रहते हैं। यही दशा शिक्षकों की भी है। वे शिक्षित होकर भी अवैज्ञानिक बातें करते हैं, तर्कहीन और अविवेकपूर्ण बातें करते हैं ,अपरिवर्तित बने रहते हैं। 
असली शिक्षा वह है जो मनुष्य को बदले, मनुष्य के अंदर बैठे पशुबोध को नष्ट करे। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम न तो बदलते हैं और न हमारे अंदर का पशुबोध मरता है बल्कि शिक्षित होने के बाद यह प्रबल और शक्तिशाली हो जाता है।यथास्थिति बनी रहती है और इसे बनाने में स्टीरियोटाइप पठन-पाठन की केन्द्रीय भूमिका है।यही वह बुनियादी जगह है जहाँ पर साम्प्रदायिक और जातिवादी चेतना फल-फूल रही है।

साभार:
https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1751594058202627

Thursday, 17 August 2017

गले लगाने का न्यौता कहीं धृतराष्ट्र आलिंगन तो नहीं ! ------ प्रो . अपूर्वानन्द

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

संवेदनहीन लोकतन्त्र को आक्सीजन की आवश्यकता ------ अवधेश कुमार

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश