Wednesday, 19 July 2017

.....और इस तरह ये मामला दफन हो गया ------ श्वेता यादव

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इस सरकारी अधिकारी को भी महिला के शोषण में सहयोग अन्य महिला से ही मिला और प्राईवेट अधिकारियों को भी. लोहे की कुल्हाड़ी में लकड़ी का हत्था लगा कर ही लकड़ी काटी  जाती है, लोहा काटने में भी लोहे की ही आरी  प्रयुक्त होती  है. शोषण से बचने हेतु  महिलाओं को अपनों से ही अधिक सावधान होना होगा . 



w.facebook.com/sweta.yadav.980/posts/744217139120356










    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 8 July 2017

BJP has NO chance of ever coming to power in W. Bengal in the foreseeable future ------ Parvati Goenka


 Her personal humility & modesty is admirable. A woman who has been in politics now for about 40 years, a M.P. for at least 5 terms, a Central Minister on 3 occasions and a two-term Chief Minister now continues to be pretty unpretentious and down-to-earth at a personal level, as vouched for by people who know her.


Parvati Goenka 
As someone who grew up mostly in W.Bengal & Kolkata and as someone who has no commitments to or lasting affiliations with any Indian political party, I can tell you a few home truths about Mamata Banerjee:
1. I can't think of any other politician, male or female, in India currently, who has the kind of sheer guts and raw courage that she has.
2. She is extremely feisty and as someone who did most of her early politics as a streetfighter (starting as a student union leader, Chhatra Parishad (Youth Congress) '74 - '75 she believes in leading from the front. It is a wonder that she is alive and functional today because at least a couple of attacks on her while she was leading protest marches on the streets during the reign of the CPM were designed to kill her and nearly succeeded. One of them hospitalized her for about 6 months.
3. No other politician in W. Bengal currently has the drawing power that she has. 'Didi' can start a streetcorner rally, without accompanying police escorts or bodyguards and still pull in a crowd of many thousands in a short period without any manipulation or crowd gathering techniques.
4. Her personal humility & modesty is admirable. A woman who has been in politics now for about 40 years, a M.P. for at least 5 terms, a Central Minister on 3 occasions and a two-term Chief Minister now continues to be pretty unpretentious and down-to-earth at a personal level, as vouched for by people who know her.
5. She can be impulsive, mercurial, short-tempered and too blunt on occasions. However with age and her stint as the C.M. for nearly 7 years now, she has mellowed & matured in those respects. She is said to be totally honest personally though the same can't be said for several of her party bigwigs.
6. She is totally hands-on as an administrator and as a politician and a doer in every sense of the term. She extensively tours districts and knows intimately what is happening at the grassroots level there.
Political predictions are hazardous and pointless in most cases but, given the above and the whole nature of the W. Bengal population, I don't think the BJP has any chance of ever coming to power in W. Bengal in the foreseeable future unless she commits some serious missteps or she is 'eliminated'. However they can cause many problems sporadically with their brand of communal politics and their doctrine of sowing the seeds of divisiveness and hate with a view to consolidating their base. 

https://www.facebook.com/parvati.goenka.1/posts/411162092614350
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(विजय राजबली माथुर )
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Thursday, 6 July 2017

राग देश क्या सन्देश ला रही है ? ------ विजय राजबली माथुर

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राग देश क्या सन्देश ला रही है ?   इन दोनों  इंटरव्यू  से यह बताने की कोशिश  की गई है कि, हमारे देश को सिर्फ गांधी जी   की अहिंसा से ही आज़ादी नहीं मिल गई है उसके लिए हज़ारों सैनिकों  ने अपनी कुर्बानी दी थी. यह बात सच तो है लेकिन राज्यसभा TV के माध्यम  से फिल्म बनवाकर NDA सरकार इस समय गांधी जी पर प्रहार करके स्वतंत्रता आन्दोलन पर उनके प्रभाव को आने वाली पीढ़ियों से छिपाना चाहती है. यह भी कि, नेताजी सुभाष की INA से लड़ने के लिए आर एस एस ने अंग्रेज फ़ौज के लिए सिपाही भर्ती करवाए थे. नेताजी को हीरो के रूप में लाकर आर एस एस नियंत्रित सरकार जनता में अपनी छवी बेहतर करना चाहती है.
 (विजय राजबली माथुर )




Wednesday, 5 July 2017

सुहाने सपने, स्याह हकीकत ------ उपमा सिंह / असीमा भट्ट

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Monday, 3 July 2017

हिंदुस्तान की हिंदुस्तानियत ख़त्म हो रही है : रूपरेखा वर्मा ------ मुलायम यादव

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Saturday, 1 July 2017

NOT IN My Name को बालीवुड का फुल सपोर्ट ------ प्रशांत जैन

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http://epaper.navbharattimes.com/paper/1-10@9-01@07@2017-1001.html

Friday, 30 June 2017

आस जो नीली पीली होती रहती है , मौसम में तब्दीली होती रहती है ------ Er S D Ojha


Er S D Ojha
पढ़े लिखे को फारसी क्या ...
मुगल काल में फारसी का बोल बाला था . फारसी पढ़ने वाला कभी बेकार नहीं रहता था . यही कारण था कि हिन्दुओं की कायस्थ बिरादरी ने फारसी को तरजीह दी . फारसी पढ़े लिखे होने के कारण कायस्थ लोग मुगल काल में बादशाहों व नवाबों के यहां मुनीम लग गये . उन्हें तनख्वाह के अतिरिक्त मनसबदारी व जागीरें भी मिलीं. तभी मुहावरा बना -पढ़े फारसी ,बेचें तेल.मतलब कि फारसी पढ़ा लिखा व्यक्ति तेल बेचने जैसा निकृष्ट काम कर हीं नहीं सकता . फारसी पढ़े लिखों की भाषा बन गयी .इसलिए एक और मुहावरा गढ़ा गया - पढ़े लिखे को फारसी क्या ? अर्थात् आदमी पढ़ा लिखा है तो फारसी जरूर जानता होगा .
आम तौर पर फारसी के साथ अरबी का नाम लिया जाता है , परंतु अरबी का फारसी से दूर का रिश्ता भी नहीं है . फारसी हिंद ईरानी भाषा है , इसलिए यह संस्कृत के निकट है. फारसी में संस्कृत के कुछ शब्द मूल रूप से मिलते हैं तो कुछ अपभ्रंश के रुप में -
मूल रुप
संस्कृत फारसी हिंदी
कपि कपि बानर 
नर नर पुरूष
दूर दूर दूर
दन्त. दन्त दांत
गौ गौ (गऊ) गाय
नव नव. नया
अपभ्रंश रुप
संस्कृत फारसी हिंदी
हस्त दस्त हाथ
शत सद सौ
अस्ति अस्त है
मद मय शराब
मातृ मादर मां
भ्रातृ बिरादर भाई
दुहितृ दुख्तर बेटी
फारसी पारस से बना है . ईरान के पारस का राजनीतिक उन्नयन सबसे पहले हुआ , इसलिए यूनानियों ने पूरे क्षेत्र को हीं पर्सिया कहना शुरू किया . पर्सिया से पारस बना. सातवीं सदी के अंत तक पारस पर अरबों का अधिकार हो गया था . अरबी भाषा के वर्णमाला में 'प' अक्षर नहीं है . वे प को फ कहते हैं . इसलिए अरबों ने पारस को फारस कहना शुरू किया . वहां बोली जाने वाली भाषा को फारसी नाम दिया गया . बाद में इस पूरे क्षेत्र को आर्यों के नाम पर आर्याना या ईरान कहा जाने लगा . वस्तुत: यहां के लोग आर्यन मूल के हैं . कभी हिमालय से उतर कर ये लोग पारस के मैदानों में विखर गये थे . इनके अवेस्ता धर्म ग्रंथ की कई छंद वेदों से मिलते जुलते हैं . कई तो वेदों के महज अनुवाद है . पहले ईरानियों की जेंद लिपि थी .बाद में इन्होंने अरबी लिपि को अपनाया .
फारसी आज विश्व के तकरीबन दस करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है . यह उजबेकिस्तान , अफगानिस्तान , ईरान , बहरीन व तजाकिस्तान के अतिरिक्त समस्त विश्व में बसे ईरानियों की भाषा है . यह अफगानिस्तान , ईरान व तजाकिस्तान की राज भाषा है . फारसी व हिंदी की कई कहावतें भी सांझी हैं. कुछ कहावतें यहां दी जा रहीं है , जिन्हें देखकर आपको लगेगा कि ये तो भारत की कहावतें हैं -
1) खरबूजा को देख खरबूजा रंग बदलता है .
2) जो ऊपर जाता है , वह नीचे गिरता है.
3) खूश्बू को इत्र बेचने वाले की सिफारिश नहीं चाहिए.
4) जो आज अण्डा चोरी करता है ,कल वह ऊंट भी चोरी करेगा .
5) नकल के लिए भी अकल की जरूरत होती है .
6) झूठे की याददाश्त बहुत कमजोर होती है .
7) तलवार का जख्म भर जाता है , पर जुबान का जख्म नहीं भरता .
8) मौन के वृक्ष पर शांति के फल लगते हैं .
9) एक झूठ हजार सच का नाश कर देता है .
10) बांटने से सुख दूना व दु:ख आधा हो जाता है.
आज दो तरह की फारसी प्रचलन में है . एक को "जुबान - ए - कूचा " और दूसरी को " जुबान - ए - अदबी " कहा जाता है . जुबान-ए-कूचा आम जन की भाषा है , जबकि जुबान-ए - अदबी साहित्य की भाषा है , जिसमें अब अरबी के शब्द जबरदस्ती घुसेड़े जाने लगे हैं . आश्चर्य की बात यह कि जिस फारसी भाषा का परचम कभी पूरे एशिया पर लहराया था , वही भाषा अब अरबी की बैशाखी मांग रही है . खैर, दिन रात बदलते हैं , हालात बदलते हैं . शायर एम ए कदीर के शब्दों में -
आस जो नीली पीली होती रहती है ,
मौसम में तब्दीली होती रहती है .
https://www.facebook.com/sd.ojha.3/posts/1865608650431679

Thursday, 22 June 2017

ऐसा कहना कि वर्तमान में मोदी का कोई विकल्प नहीं है देश के 125 करोड़ टैलेन्टेड भारतीयों का अपमान हैं ------ रजनीश श्रीवास्तव

 देश 125 करोड़ भारतीयों का है।यहाँ के 30 करोड़ लोग मोदी जी से ज्यादा शिक्षित और गुणी हैं।इनमें से कोई भी मोदी जी से कहीं बेहतर भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है।..................मोदी जी बिन बुलाए पाकिस्तान जाकर भारतीय सैनिकों के खून से सना नवाज शरीफ के जन्मदिन का केक खाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री निकले।यही नहीं जब नवाज शरीफ ने आई एस आई की मदद से रिटर्न गिफ्ट के रूप में भारत को पठानकोट आतंकी हमला दिया तो भारत की कातिल पाकिस्तान की इसी आई एस आई को पठानकोट बुला कर कातिल से जाँच कराने वाले भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने।......................भाजपा में लगभग दो सौ से ज्यादा सांसद ऐसे होंगे जो मोदी जी से ज्यादा पढ़ेलिखे और काबिल हैं और मौका मिले तो मोदी जी से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे।.....कल कोई और होगा और यकीन मानिए मोदी जी से कहीं बेहतर होगा------------------


Rajanish Kumar Srivastava
#क्या देश नरेन्द्र मोदी के अलावा सक्षम प्रधानमंत्री पाने के मामले में विकल्पहीन हो गया है?#
एक सधी हुई रणनीति के तहत अक्सर भाजपा भक्त यही प्रश्न करते हैं कि माना मोदी जी बहुत सारे वादे पूरा नहीं कर पा रहे हैं व शासन में कुछ कमियाँ हैं तो आप ही बताईये कि वर्तमान में मोदी का क्या विकल्प है।प्रायोजित ढ़ंग से वही स्थिति बनाने की कोशिश की जा रही है कि जैसे "मोदी इज़ इंडिया एण्ड़ इंडिया इज़ मोदी"। जैसा कभी स्व० इन्दिरा गाँधी के लिए कहा जाता था कि,"इन्दिरा इज़ इंडिया एण्ड़ इंडिया इज़ इन्दिरा"।
आइए आज इतिहास के आईने से वर्तमान का जवाब तलाशते हैं।
ये देश 125 करोड़ भारतीयों का है।यहाँ के 30 करोड़ लोग मोदी जी से ज्यादा शिक्षित और गुणी हैं।इनमें से कोई भी मोदी जी से कहीं बेहतर भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है।केवल लोकलुभाना भाषण देने से सक्षम प्रधानमंत्री नही हो जाता।मोदी जी जब विपक्ष में थे तो ऐसा ललकारते थे कि लगता था कि उनके सत्ता में आते ही पाकिस्तान विश्व के नक्शे से गायब हो जाएगा और चीन चूहे की तरह बिल में दुबक जाएगा।हुआ बिल्कुल उल्टा मोदी जी बिन बुलाए पाकिस्तान जाकर भारतीय सैनिकों के खून से सना नवाज शरीफ के जन्मदिन का केक खाने वाले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री निकले।यही नहीं जब नवाज शरीफ ने आई एस आई की मदद से रिटर्न गिफ्ट के रूप में भारत को पठानकोट आतंकी हमला दिया तो भारत की कातिल पाकिस्तान की इसी आई एस आई को पठानकोट बुला कर कातिल से जाँच कराने वाले भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने।इसके विपरीत जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे तो विद्वानों को यह चिन्ता सताती थी कि नेहरू के बाद कौन? और फिर नेहरू जी की मृत्यु के बाद लाईम लॉईट से दूर रहने वाले अत्यन्त साधारण ,सौम्य और मितभाषी आदरणीय लाल बहादुर शास्त्री जी देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने और ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल बने।इसी तरह जब अचानक असमय ही लाल बहादुर शास्त्री जी कालकवलित हो गये तो यह समझ में नहीं आ रहा था कि चुनौती की इस घड़ी में देश को कौन सम्हालेगा।उस समय तक यद्यपि इन्दिरा गाँधी जी सांसद और कैबिनेट मंत्री का अनुभव रखती थीं लेकिन उनको बोलते हुए बहुधा नहीं पाया जाता था
वो मौन रहना पसन्द करती थीं।मोरारजी देसाई और श्री जयप्रकाश नारायण जी उन्हें #गूँगी गुड़िया# कहा करते थे।यही गूँगी गुड़िया इन्दिरा गाँधी जी जब भारत की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने पाकिस्तान का इतिहास और भूगोल दोनों एक साथ बदल दिया और एक नये देश बांग्लादेश को जन्म दे दिया।इसी तरह अनिच्छा से राजनीति में आए मितभाषी और भद्र युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने देश को कम्प्यूटर,संचार और डिजिटल क्रांति के माध्यम से 21 वी सदी में प्रवेशित करा दिया।इसी तरह एक अर्थशास्त्री और मौन रहने वाले मनमोहन सिंह जिनमें नेतागिरी का कोई गुण नहीं था ने राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी दो बार लगातार प्रधानमंत्री बनने का कारनामा कर दिखाया और मौन रहकर देश को आर्थिक प्रगति और उदारीकरण की राह दिखाई।आज मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं कल कोई और होगा और यकीन मानिए मोदी जी से कहीं बेहतर होगा।भाजपा में लगभग दो सौ से ज्यादा सांसद ऐसे होंगे जो मोदी जी से ज्यादा पढ़ेलिखे और काबिल हैं और मौका मिले तो मोदी जी से कहीं बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे।यह टैलेंट से भरा देश है और यहाँ प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है।ऐसा कहना कि वर्तमान में मोदी का कोई विकल्प नहीं है देश के 125 करोड़ टैलेन्टेड भारतीयों का अपमान हैं।जो देश विश्व गुरू बनने की क्षमता रखता है जिसके वैज्ञानिक नासा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हों, जिस देश का इसरो अपने योग्यतम वैज्ञानिकों के दम पर विश्व कीर्तिमान रच रहा हो।जो देश योग्यतम वैज्ञानिकों,शिक्षाविदों, प्रशासकों आदि से भरापुरा हो वह प्रधानमंत्री के सन्दर्भ में कभी भी विकल्पहीन नहीं हो सकता है।ऐसा कहने वाले कि वर्तमान में मोदी का कोई विकल्प नहीं है, प्रतिभाओं से भरे देश का अपमान करते हैं।कृपया निराशावादी ना बने।ये महान देश ना कभी रूका है ना कभी रूकेगा।

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Monday, 19 June 2017

उनकी अकर्मण्यता या मिलीभगत से कितने निर्दोष लोग कितना बड़ा अन्याय झेलते हैं ? ------ सुधांशु रंजन

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सुधांशु रंजन जी का यह लेख नौकरशाही की अंदरूनी असलियत को उजागर करता है। दोषी नौकरशाह को बचाने के लिए वर्तमान और निवर्तमान नौकरशाह एकमत हैं। लेकिन जिस ईमानदार महिला IAS को हत्या की धमकियाँ माफिया खुलेआम दे रहा है उसके पक्ष में नौकरशाही मौन है उसके लिए क्यों आवाज़ नहीं उठ रही ?  
(विजय राजबली माथुर )

Sunday, 18 June 2017

यह ' अपराध ' उन युवाओं का कैसे हो गया ? ------ नवीन जोशी

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Friday, 2 June 2017

विवाह संस्था लिव इन रिलेशन,नारी स्वातंत्र्य

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अफगानिस्तान तो बच गया क्योँ की वहां EVM से चुनाव नही हुआ था,बाकी भारत का देखते है ------ डॉक्टर_रिजी_रिज़वान/ अश्वनी श्रीवास्तव


Ashwani Srivastava
1996 में जब तालिबान की सरकार अफगानिस्तान में बनी तब इस्लाम के मानने वालों को लगा कि अब तो मानो अबु बकर सिद्दीक की खिलाफत आ चुकी है, हर तरफ इंसाफ ही इंसाफ होगा... धर्म के नाम पे चलने वाला मूवमेंट सत्ता में आ गया था। किसी का हक नही मारा जाएगा, किसी के साथ अन्याय नही होगा। इसी विश्वाश के साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने तालिबानी आंदोलन को समर्थन दे दिया, पाकिस्तान तो पहले से समर्थन में था।
किन्तु हुआ इसका उल्टा.. तालिबान को हर तरफ शिर्क बिदअत कुफ्र बेपर्दगी अश्लीलता अधर्म नजर आने लगा। चरमपंथ उस स्तर पे जा पंहुचा था कि किसी औरत को बिना बुर्खे के देख लेते तो भीड़ उसपे दुराचार का आरोप लगाकर सरेआम कत्ल कर देती। शक के आधार पे किसी का भी कत्ल कर देना आम बात थी।
तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर में कोई योग्यता नही थी, ना ही उसके चेलों में देश चलाने लायक कुछ था। अफगानिस्तान की जनता ने सिर्फ धर्म की ठेकेदारी का लेबल देखकर इन्हें शीर्ष पे बैठाया.. इन्होंने उसी जनता को डसना शुरू कर दिया।
तालिबान का उदय कोई अचानक से नही हुआ, बल्कि ये अफगानिस्तान के गर्भाशय में कई वर्षो से पल रहा था। इसकी सरंचना कट्टरपंथी इस्लाम की बुनियाद पे थी। तालिबान ने पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि को बुरी तरह धूमिल किया।
अंतः कुछ ही वर्षो बाद 2001 में इसका सर कुचलने शुरुआत हुई। सर कुचलने में नाटो सेना का सहयोग इस्लामिक मुल्कों ने किया मगर नाटो भी खून के प्यासे निकले, उनके दिलों दिमाग में मौत का इतना खौफ था कि उन्होंने अफगानिस्तान के आम नागरिकों को मारना शुरू कर दिया। ये तालिबानियों से बड़े विध्वंशकारी बनकर उभरे।
अब आप तालिबान की कहानी को भारत में ढूंढिये...
* तालिबानी शाशन में भीड़ इंसाफ करती थी,सजा देती थी.. भारत में भी आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है
* तालीबानी व्यवस्था में हर व्यक्ति जो तालिबान का समर्थक था उसे ये अधिकार था कि वो लोगो को अपने हिसाब से हांक सके.. यहां भी एंटी रोमियो, गौ रक्षक जैसे दर्जन भर संघटन "पुलिस और आर्मी" का काम करते है। जो काम प्रसाशन का होता है वो ड्यूटी ये करते है।
*तालिबान में उन्मादी भीड़ को प्रसाशन का समर्थन हुआ करता था। यहां भी उपद्रवी भीड़ के साथ पुलिस मूकदर्शक बनी देखी गयी है। पुलिस की मौजूदगी में कत्ल होते है यहां.. पत्थरबाजी, दंगे फसाद आगज़नी होती है।
*मुल्ला उमर के संघटन तालिबान का समर्थन बहुसंख्यक धर्मांध लोगो ने सिर्फ इसलिए किया क्योकि उन्हें लगा की अब शुद्ध 24 कैरेट खलीफा राज आएगा दुनिया में.. यहां भी बहुसंख्यको को हिन्दुराष्ट्र का सब्जबाज़ दिखाया गया है और वे मन मग्न होकर देख भी रहे है।
* तालिबान अपनी धार्मिक मान्यताएं लोगो पे थोपता था, ऐसा ही कुछ यहां भी हो रहा है। आपकी हांड़ी में क्या पका है इसका जायज़ा सरकार और उसकी छाँव में पल रहे संघटन लेते फिर रहे है। वहां बुर्खे टोपी पाजामे में धार्मिक भावनाएं हुआ करती थी और यहां लोगो की हांडियों में धार्मिक भावनाएं होती है।
* तालिबानी मोमिन का प्रमाणपत्र जेब में रखते थे, इस्लाम प्रमाणित ना होने पे कत्ल कर देते थे.. यहां देशभक्ति के प्रमाणपत्र जेब में रखे जाते है और प्रमाणित ना होने पे कत्ल कर दिया जाता है। ये देशभक्त कभी भी घूसखोरों के घर जाकर नही जलाते, इनका निशाना हमेशा पिछड़े कुचले लोग होते है जिन्हें पता भी नही की भारत की सीमा शुरू कहाँ से होती है और खत्म कहाँ..
* तालिबान ने शीर्ष पदों पे उन्हें बैठाया जो अपने धर्म के सबसे बड़े कट्टर थे।
*तालिबान का अंतिम लक्ष्य पुरे में विश्व में अपने धर्म को श्रेष्ठ बताकर सभी पे थोपना था। उनके कट्टरपंथी इस्लाम ने उन्हें महज 5 साल बाद धूल फांकने पे मजबूर कर दिया।
*अफगानिस्तान तो बच गया 5 साल बाद,क्योँ की वहां EVM से चुनाव नही हुआ था,बाकी भारत का देखते है।
#डॉक्टर_रिजी_रिज़वान
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=747580388747992&id=100004881137091

Thursday, 1 June 2017

निजी स्वार्थों के चंगुल से राजनीति को निकालने के लिए सांसदों के वेतन -भत्ते समाप्त हों ------ रोहित कौशिक

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साभार : 

नवभारत टाईम्स, लखनऊ, 31-05-2017, पृष्ठ --- 12 

Wednesday, 31 May 2017

भारत के नागरिकों को रूस के राष्ट्रपति की शुभकामनायें ------ व्लादिमीर पुतिन

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साभार : 
नवभारत टाईम्स, लखनऊ, 31-05-2017, पृष्ठ --- 12 

Tuesday, 23 May 2017

हाशिमपुरा के 30 वर्ष पुराने पन्ने ------ विभूति नारायण राय

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Monday, 22 May 2017

राजीव का जवाब था, 'मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं वैसे भी मारा जाऊँगा' ------ प्रस्तोता : जया सिंह

फोटो साभार 
Rajanish Kumar Srivastava
Jaya Singh
22-05-2017 
 
अपनी हत्या से कुछ ही पहले अमरीका के राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी ने कहा था कि अगर कोई अमरीका के राष्ट्रपति को मारना चाहता है तो ये कोई बड़ी बात नहीं होगी बशर्ते हत्यारा ये तय कर ले कि मुझे मारने के बदले वो अपना जीवन देने के लिए तैयार है.
"अगर ऐसा हो जाता है तो दुनिया की कोई भी ताक़त मुझे बचा नहीं सकती."
21 मई, 1991 की रात दस बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में ऐसा ही हुआ. तीस साल की एक नाटी, काली और गठीली लड़की चंदन का एक हार ले कर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तरफ़ बढ़ी. जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए झुकी, कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ.
उस समय मंच पर राजीव के सम्मान में एक गीत गाया जा रहा था.... राजीव का जीवन हमारा जीवन है... अगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहीं है... तो वो जीवन कहाँ का?
वहाँ से मुश्किल से दस गज़ की दूरी पर गल्फ़ न्यूज़ की संवाददाता और इस समय डेक्कन क्रॉनिकल, बंगलौर की स्थानीय संपादक नीना गोपाल, राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं.
नीना याद करती हैं, "मुझे सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा. मैं आमतौर पर सफ़ेद कपड़े नहीं पहनती. उस दिन जल्दी-जल्दी में एक सफ़ेद साड़ी पहन ली. बम फटते ही मैंने अपनी साड़ी की तरफ़ देखा. वो पूरी तरह से काली हो गई थी और उस पर मांस के टुकड़े और ख़ून के छींटे पड़े हुए थे. ये एक चमत्कार था कि मैं बच गई. मेरे आगे खड़े सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे."
नीना बताती हैं, "बम के धमाके से पहले पट-पट-पट की पटाखे जैसी आवाज़ सुनाई दी थी. फिर एक बड़ा सा हूश हुआ और ज़ोर के धमाके के साथ बम फटा. जब मैं आगे बढ़ीं तो मैंने देखा लोगों के कपड़ो में आग लगी हुई थी, लोग चीख रहे थे और चारों तरफ़ भगदड़ मची हुई थी. हमें पता नहीं था कि राजीव गांधी जीवित हैं या नहीं."
श्रीपेरंबदूर में उस भयंकर धमाके के समय तमिलनाडु कांग्रेस के तीनों चोटी के नेता जी के मूपनार, जयंती नटराजन और राममूर्ति मौजूद थे. जब धुआँ छटा तो राजीव गाँधी की तलाश शुरू हुई. उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उनका कपाल फट चुका था और उसमें से उनका मगज़ निकल कर उनके सुरक्षा अधिकारी पीके गुप्ता के पैरों पर गिरा हुआ था जो स्वयं अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे.
बाद में जी के मूपनार ने एक जगह लिखा, "जैसे ही धमाका हुआ लोग दौड़ने लगे. मेरे सामने क्षत-विक्षत शव पड़े हुए थे. राजीव के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता अभी ज़िंदा थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखा. कुछ बुदबुदाए और मेरे सामने ही दम तोड़ दिया मानो वो राजीव गाँधी को किसी के हवाले कर जाना चाह रहे हों. मैंने उनका सिर उठाना चाहा लेकिन मेरे हाथ में सिर्फ़ मांस के लोथड़े और ख़ून ही आया. मैंने तौलिए से उन्हें ढक दिया."
मूपनार से थोड़ी ही दूरी पर जयंती नटराजन अवाक खड़ी थीं. बाद में उन्होंने भी एक इंटरव्यू में बताया, "सारे पुलिस वाले मौक़े से भाग खड़े हुए. मैं शवों को देख रही थी, इस उम्मीद के साथ कि मुझे राजीव न दिखाई दें. पहले मेरी नज़र प्रदीप गुप्ता पर पड़ी... उनके घुटने के पास ज़मीन की तरफ मुंह किए हुए एक सिर पड़ा हुआ था... मेरे मुंह से निकला ओह माई गॉड... दिस लुक्स लाइक राजीव."
वहीं खड़ी नीना गोपाल आगे बढ़ती चली गईं, जहाँ कुछ मिनटों पहले राजीव खड़े हुए थे.
नीना बताती है, "मैं जितना भी आगे जा सकती थी, गई. तभी मुझे राजीव गाँधी का शरीर दिखाई दिया. मैंने उनका लोटो जूता देखा और हाथ देखा जिस पर गुच्ची की घड़ी बँधी हुई थी. थोड़ी देर पहले मैं कार की पिछली सीट पर बैठकर उनका इंटरव्यू कर रही थी. राजीव आगे की सीट पर बैठे हुए थे और उनकी कलाई में बंधी घड़ी बार-बार मेरी आंखों के सामने आ रही थी.
इतने में राजीव गांधी का ड्राइवर मुझसे आकर बोला कि कार में बैठिए और तुरंत यहाँ से भागिए. मैंने जब कहा कि मैं यहीं रुकूँगी तो उसने कहा कि यहाँ बहुत गड़बड़ होने वाली है. हम निकले और उस एंबुलेंस के पीछे पीछे अस्पताल गए जहाँ राजीव के शव को ले जाया जा रहा था."
दस बज कर पच्चीस मिनट पर दिल्ली में राजीव के निवास 10, जनपथ पर सन्नाटा छाया था. राजीव के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज अपने चाणक्यपुरी वाले निवास की तरफ़ निकल चुके थे.
जैसे ही वो घर में दाख़िल हुए, उन्हें फ़ोन की घंटी सुनाई दी. दूसरे छोर पर उनके एक परिचित ने बताया कि चेन्नई में राजीव से जुड़ी बहुत दुखद घटना हुई है.
जॉर्ज वापस 10 जनपथ भागे. तब तक सोनिया और प्रियंका भी अपने शयन कक्ष में जा चुके थे. तभी उनके पास भी ये पूछते हुए फ़ोन आया कि सब कुछ ठीक तो है. सोनिया ने इंटरकॉम पर जॉर्ज को तलब किया. जॉर्ज उस समय चेन्नई में पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी से बात कर रहे थे. सोनिया ने कहा जब तक वो बात पूरी नहीं कर लेते वो लाइन को होल्ड करेंगीं.
नलिनी ने इस बात की पुष्टि की कि राजीव को निशाना बनाते हुए एक धमाका हुआ है लेकिन जॉर्ज सोनिया को ये ख़बर देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. दस बज कर पचास मिनट पर एक बार फिर टेलीफ़ोन की घंटी बजी.
रशीद किदवई सोनिया की जीवनी में लिखते हैं, "फ़ोन चेन्नई से था और इस बार फ़ोन करने वाला हर हालत में जॉर्ज या मैडम से बात करना चाहता था. उसने कहा कि वो ख़ुफ़िया विभाग से है. हैरान परेशान जॉर्ज ने पूछा राजीव कैसे हैं? दूसरी तरफ़ से पाँच सेकेंड तक शांति रही, लेकिन जॉर्ज को लगा कि ये समय कभी ख़त्म ही नहीं होगा. वो भर्राई हुई आवाज़ में चिल्लाए तुम बताते क्यों नहीं कि राजीव कैसे हैं? फ़ोन करने वाले ने कहा, सर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और इसके बाद लाइन डेड हो गई."
जॉर्ज घर के अंदर की तरफ़ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे. सोनिया अपने नाइट गाउन में फ़ौरन बाहर आईं. उन्हें आभास हो गया कि कुछ अनहोनी हुई है.
आम तौर पर शांत रहने वाले जॉर्ज ने इस तरह की हरकत पहले कभी नहीं की थी. जॉर्ज ने काँपती हुई आवाज़ में कहा "मैडम चेन्नई में एक बम हमला हुआ है."
सोनिया ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, "इज़ ही अलाइव?" जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया.
रशीद बताते हैं, "इसके बाद सोनिया पर बदहवासी का दौरा पड़ा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीख़ कर विलाप करते सुना. वो इतनी ज़ोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे कांग्रेस नेताओं को वो आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी. वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफ़ज़ल थे.
उन्होंने मुझे बताया कि सोनिया के रोने का स्वर बाहर सुनाई दे रहा था. उसी समय सोनिया को अस्थमा का ज़बरदस्त अटैक पड़ा और वो क़रीब-क़रीब बेहोश हो गईं. प्रियंका उनकी दवा ढ़ूँढ़ रही थीं लेकिन वो उन्हें नहीं मिली. वो सोनिया को दिलासा देनी की कोशिश भी कर रही थीं लेकिन सोनिया पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था."
इस केस की जाँच के लिए सीआरपीएफ़ के आईजी डॉक्टर डी आर कार्तिकेयन के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल का गठन किया. कुछ ही महीनो में इस हत्या के आरोप में एलटीटीई को सात सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया. मुख्य अभियुक्त शिवरासन और उसके साथियों ने गिरफ़्तार होने से पहले साइनाइड खा लिया.
डॉक्टर कार्तिकेयन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "आप कह सकते हैं हमारी पहली सफलता थी हरि बाबू के कैमरे से उन दस तस्वीरों का मिलना. हमने आम लोगों से सूचनाएं लेने के लिए अख़बारों में विज्ञापन दिया और एक टॉल फ़्री नंबर भी दिया. हमारे पास कुल तीन चार हज़ार टेलीफ़ोन कॉल आए. हर एक कॉल को गंभीरता से लिया गया. हमने चारों तरफ़ छापे मारने शुरू किए और जल्द ही हमें सफलता मिलनी शुरू हो गई."
"पहले दिन से ही मैं इस काम में 24 घंटे, हफ़्ते के सातों दिन बिना किसी आराम के लगा रहा. मैं रोज़ रात के दो बजे काम के बाद कुछ घंटों की नींद लेने के लिए गेस्ट हाउस पहुंचता था. सारी जाँच तीन महीने में पूरी हो गई लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट्स आने में समय लगा लेकिन हत्या की पहली वर्षगाँठ से पहले हमने अदालत में चार्जशीट दाख़िल कर दी थी."
कुछ दिनों बाद सोनिया गांधी ने इच्छा प्रकट की कि वो नीना गोपाल से मिलना चाहती हैं.
नीना गोपाल ने बताया, "भारतीय दूतावास के लोगों ने दुबई में फ़ोन कर मुझे कहा कि सोनिया जी मुझसे मिलना चाहती हैं. जून के पहले हफ्ते में मैं वहां गई. हम दोनों के लिए बेहद मुश्किल मुलाक़ात थी वो. वो बार-बार एक बात ही पूछ रहीं थी कि अंतिम पलों में राजीव का मूड का कैसा था, उनके अंतिम शब्द क्या थे. मैंने उन्हें बताया कि वह अच्छे मूड में थे, चुनाव में जीत के प्रति उत्साहित थे. वो लगातार रो रही थीं और मेरा हाथ पकड़े हुए थीं. मुझे बाद में पता चला कि उन्होंने जयंती नटराजन से पूछा था कि गल्फ़ न्यूज़ की वो लड़की मीना (नीना की जगह) कहां हैं, जयंती मेरी तरफ आने के लिए मुड़ी थीं, तभी धमाका हुआ."
इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्ज़ेंडर ने अपनी किताब 'माई डेज़ विद इंदिरा गांधी' में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटों के भीतर उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के गलियारे में सोनिया और राजीव को लड़ते हुए देखा था.
राजीव सोनिया को बता रहे थे कि पार्टी चाहती है कि 'मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूँ'. सोनिया ने कहा हरगिज़ नहीं. 'वो तुम्हें भी मार डालेंगे'. राजीव का जवाब था, 'मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं वैसे भी मारा जाऊँगा'.
सात वर्ष बाद राजीव के बोले वो शब्द सही सिद्ध हुए थे.
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=306854756420679&id=100012884707896
Jaya Singh ये बी बी सी के अंश है। 

Author :
Jaya Singh 

Thursday, 11 May 2017

हर परिवार पर 10 हज़ार रुपए का बोझ पड़ेगा ------ गिरीश मालवीय


Girish Malviya
 11-05-2017
आप चाहे गरीब हो चाहे मध्यम वर्गीय आपके परिवार पर लगभग दस हजार रूपये देने का बोझ सरकार ने डाल दिया है ....कैसे ?............यह समझने के लिए यह पोस्ट पूरी पढ़े................
लोग अभी खुश हो रहे है कि शेयर बाजार उछल रहा है, और उन्हें लग रहा क़ि अब अच्छे दिन आने वाले है, शेयर बाजार उछलने की असली वजह यह है कि सरकार ने एक अध्यादेश निकाल दिया है बैंकिंग रेगूलेशन एक्ट’ में हुए ताजा बदलाव के जरिए अब खुद आरबीआई ही कंपनियों के ‘फंसे हुए लोन्स और संपत्तियों (बेड एसेट्स)‘ के बारे में फैसला ले सकेगा. ....................
आप को लग रहा होगा क़ि यह तो बहुत अच्छी बात है लेकिन इसे समझने के लिए हमे यह समझना होगा क़ि राजन क्यों रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से हटाए गए...............
दर असल राजन ने आते ही एक निर्णय लिया था कि अब सभी बैंको को बताना पढ़ेगा कि उन्होंने जो लोन उद्योगपतियों को बाटे है उनका स्टेटस क्या है याने कितने की रिकवरी संभव है, और कितने का लोन को वो मान चुके है कि यह पैसे तो गढ्ढे में गए, 2017 के आखिर तक सभी बैंको को अपने सारे बेड लोन को रिकग्नाएज़ करना था............
दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सबसे खतरनाक बात यह है कि भारतीय बैंकिंग का एनपीए उनकी कुल पूंजी से अधिक हो गया है............
भारत की बैंकिंग की संस्कृति जो प्रभावशाली कर्ज़दारों को कर्ज़ चुकाने में चूकने के बावजूद बच निकलने देती है. इसकी ओर आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने ध्यान खींचा था.................
आरबीआई कर्मचारियों को लिखे एक ईमेल में उन्होंने लिखा, था"हम ग़लत करने वालों को तब तक सज़ा नहीं देते जब तक वह छोटा और कमज़ोर न हो. कोई भी अमीर और अच्छे संबंधों वाले, ग़लत काम करने वाले को नहीं पकड़ना चाहता, जिसकी वजह से वह और भी ज़्यादा का नुक़सान करते हैं. अगर हम टिकाऊ मज़बूत वृद्धि चाहते हैं तो दंडाभाव की इस संस्कृति को छोड़ना होगा.".................अपने कड़े रुख के कारण राजन को हटना पड़ा.................
उनके जाने और सरकार व्दारा अपना पपेट रिजर्व बैंक की गद्दी पर बैठाने के बाद बैंकों को अपना एनपीए घोषित करने की बात तो दूर रही अब सरकार ने इस अध्यादेश के जरिये बैंक से जुड़े बड़े अधिकारियो को अपने स्तर पर एनपीए निपटाने के आदेश दे दिए है...............
दंड देने की बात तो भूल ही जाइये,अब आपको यह भी मालूम नही पड़ेगा क़ि किस हिसाब से अधिकारियों ने सेटलमेंट किये है ........
इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिये भारती एयरटेल वालो की कंपनी भारती शिपयार्ड का एनपीए लगभग 10 हजार करोड़ रूपये हो गया था नए अध्यादेश का सहारा लेते हुए अधिकारियो ने यह कर्ज 3 हज़ार करोड़ में एडेलवीस को बेच दिया गया जिसे शुरू में सिर्फ 450 करोड़ देने हैं, बाकी किश्तों में और अब कंपनी का नाम बदल दिया जायेगा .............
अब इसमें पूंजीपतियों को कितना फायदा हुआ यह देखिये ..............एक झटके मे उसका 7 हजार करोड़ देने का बोझ हट गया ..........अब कम्पनी की क़ीमत बढ़ेगी, दाँव लगाने वाले वित्तीय पूँजीपति तगड़ा मुनाफा कमायेंगे..........
और बैंक का 7 हज़ार करोड़ का बट्टे खाते में जाने वाला नुकसान 
उसे आप और हम मिलकर भरेंगे आखिर हमारी देश के प्रति कुछ तो जिम्मेदारी बनती है न............
इन्ही सब बातों को मद्दे नजर रखते हुए पिछले साल संपादक और स्तंभकार टीएन नैनन ने हाल ही में बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार में लिखा था कि बैंकों के बढ़ते एनपीए से नए व्यवसायों के लिए कर्ज़ देने की उनकी क्षमता प्रभावित हुई है. इन फंसे हुए कर्ज़ों का बोझ अंततः भारतीय करदाता पर ही पड़ता है, जो सरकार के नियंत्रण वाले सरकारी बैंकों के अंतिम गारंटर हैं. .............
बैंक संकट पर वो लिखते हैं, "तो क्या किया जा सकता है? आसान विकल्प यह है कि आपके टैक्स का और पैसा लेकर इन्हीं बैंकों को तश्तरी में सजा कर दे दिया जाए. सरकार उन्हें 2.4 लाख करोड़ रुपए देने की बात कर रही है. इसका अर्थ यह हुआ कि हर परिवार पर, चाहे वह ग़रीब हो या अमीर, उस पर 10 हज़ार रुपए का बोझ पड़ेगा."..............

https://www.facebook.com/girish.malviya.16/posts/1516298601735116

Wednesday, 10 May 2017

जस्टिस कर्णन पर दुख तो होता है पर उनसे सहानुभूति नहीं होती ------ कंवल भारती

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इन अखबारी खबरों के मुताबिक जस्टिस कर्णन को अधिकत्तम सजा दी गई है और साधारण औपचारिकताओं का भी निर्वहन नहीं किया गया है जबकि वह अगले महीने ही रिटायर्ड भी होने जा रहे थे। शायद न्यायपालिका के इतिहास में  उनके चरित्र को गिरा कर रखना ही अभीष्ट था। तमाम उद्योगपति, व्यापारी, अपराधी सजा से बचे रह जाते हैं और खुद न्यायाधीश ही सजा के हकदार हो जाते हैं । 
(विजय राजबली माथुर )

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Thursday, 4 May 2017

विपक्ष को ध्वस्त करने का भाजपा का शस्त्र आ आ पा ------ विजय राजबली माथुर

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समाजशास्त्र (सोशियोलाजी ) में ज़िक्र आता है कि, प्राचीन समाजों के इतिहास का अध्यन  करने हेतु प्रतीकों  का अवलोकन करके निष्कर्ष निकाला जाता है। हालांकि, आधिकारिक  रूप से पुष्टि तो इसकी भी नहीं की जा सकती है। बी ए के कोर्स की पुस्तक में दो उदाहरण देकर इसे सिद्ध किया गया है। ( 1 ) जंगल में धुआँ  देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, आग लगी है। ( 2 ) किसी गर्भिणी को देख कर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि, संभोग हुआ है। जबकि आधिकारिक रूप से कहने के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता है किन्तु ये अनुमान बिलकुल सटीक होते हैं। 
बहुत ही चालाकी से इस पोस्ट में यह कहने से बचा गया है कि, साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा के स्वार्थ लोलुप लोग आसानी से आर एस एस की चाल का शिकार खुद - ब - खुद बने थे। ऐसे लोग न घर के होते हैं न घाट के। सन 2011 में जब राष्ट्रपति चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी  और मनमोहन सिंह जी को राष्ट्रपति बना कर प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाने की कवायद शुरू हुई तब जापान की यात्रा से लौटते में विमान में सिंह साहब ने पत्रकारों से कहा था कि, वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि, तीसरी बार भी पी एम बनने के लिए प्रस्तुत है। जब सोनिया जी इलाज के वास्ते विदेश गईं तब सिंह साहब की प्रेरणा से हज़ारे / रामदेव आदि ने कारपोरेट भ्रष्टाचार के संरक्षण में जनलोकपाल आंदोलन खड़ा कर दिया जिसका उद्देश्य संघ/ भाजपा / कारपोरेट जगत को लाभ पहुंचाना था। आज की एन डी ए  सरकार के गठन में सौ से भी अधिक भाजपाई बने कांग्रेसियों का प्रबल योगदान है। 
जनसंघ युग में ब्रिटेन व यू एस ए की तरह दो पार्टी शासन की वकालत उनका उद्देश्य था। उस पर अमल करने का मौका उनको अब मिला है जब भाजपा केंद्र की सत्ता में और आ आ पा उसके विरोध की मुखर पार्टी के रूप में सामने है। आ आ पा का उद्देश्य कांग्रेस, कम्युनिस्ट, समाजवादी,अंबेडकरवादी आदि समेत सम्पूर्ण विपक्ष को ध्वस्त कर खुद को स्थापित करना है। भाजपा के विपक्ष में आ आ पा और आ आ पा के विपक्ष में भाजपा को दिखाना आर एस एस की रणनीति है। बनारस में मोदी साहब को आसान जीत दिलाने के लिए केजरीवाल साहब ने वहाँ पहुँच कर भाजपा विरोधियों को ध्वस्त कर दिया था और पुरस्कार स्वरूप दिल्ली में थमपिंग मेजारिटी से उनकी सरकार का गठन हो गया तथा कांग्रेस समेत सम्पूर्ण विपक्ष ध्वस्त हो गया। 
अभी भी जो लोग आ आ पा में विश्वास बनाए रखते हैं वे वस्तुतः अप्रत्यक्ष रूप से मोदी और भाजपा को ही मजबूत बनाने में लगे हुये हैं। 

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Tuesday, 2 May 2017

वर्षा डोंगरे के पोस्ट पर सरकारी नोटिस ------ छत्तीसगढ़ खबर

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 "जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का.... 

आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ... ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता । " --- वर्षा डोंगरे

वर्षा डोंगरे के पोस्ट पर सरकारी नोटिस  :

 May 1, 2017 cg khabar 0 Comment varsha dongre, वर्षा डोंगरे






http://www.cgkhabar.com/chhattisgarh-issue-notice-varsha-dongre-20170501/


राय पुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे का नक्सल समस्या पर यह स्टेट्स👇

मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुदबखुद सामने आ जाऐगी... घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं...भारतीय हैं । इसलिए कोई भी मरे तकलिफ हम सबको होत है । लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना... उनकी जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाऐं नक्सली है या नहीं इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दुध निकालकर देखा जाता है । टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5 वी अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमींन को हड़पने का.... 
आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है । नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं । सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है । आदिवासी जल जंगल जमींन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है । वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केशों में चार दिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है । तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाऐ... ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहता है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहता है । जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केशों में जेल में ठूस दिया जाता है । अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है । ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता ।
मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था । उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैने स्वयं देखे । मैं भीतर तक सिहर उठी थी...कि इन छोटी छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए...मैनें डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा ।
हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें...।
इसलिए सभी को जागना होगा... राज्य में 5 वी अनुसूची लागू होनी चाहिए । आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए । उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे । आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं । हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक... पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे ...किसान जवान सब भाई भाई है । अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा...। संविधान में न्याय सबके लिए है... इसलिए न्याय सबके साथ हो... 
हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए... लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं । लेकिन हमने इनके सारे ईरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई... आगे भी होगी ।
अब भी समय है...सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे ।
ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे....
जय संविधान जय भारत
रायपुर जेल की डिप्टी जेलर

वर्षा डोंगरे की वाल से

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश