Sunday, 30 January 2011

Thursday, 27 January 2011

Wednesday, 19 January 2011

Clinging to Delusion in Soltitude




इस कविता पर जो मेरा मन कहे पर प्राप्त टिप्पणियाँ -


इस कविता पर क्रान्तिस्वर पर प्राप्त टिप्पणियाँ-


सलिल वर्मा  जी की  मेल-


मूल कविता -


Some where in the midst of Darkness
I was lost
Alone Alone in the mob
Howling and Shouting for  existence and
attention 
My prayers and pleas echoed in that 
Big      arena,
Lost,unheared,unnoticed   and   ignored 
in   Vioelence,
Apparently, in  that feggy  season 
 Some  one unknown,held my  hands 
Which  were  stuiched  out  for  help
 we  sailed  through   the   crowd,
Some where, Some where   away  from  that
lost  world
My  angel led  me   to  the  door  from
where  brightness  of  light  piered
My  eyes ,slowly it  enlightened

My dreams,   I started living  my
dreams, trying to  make  there  true
Approaching     with   passion  and
leest   towards  the  door ,     I wished
to  cross  it  , before  ,before  .....
I   was  bowed    down
Alas  !  The Angel  was  lost ,the  door
was  closed   for ever   and   ever .
Emptiness  gazed, Silence  prevailed
every  where ,

I  ,I   was  sturned  and  lost  again ,
I  am  lost  till   now  ,
Clinging  to  the  delusion  that  the
angel   will   come   again.......






सलिल जी द्वारा किया गया अनुवाद-
माथुर साहब,
अपने सामर्थ्य के अनुसार शैली जी की अंग्रेज़ी कविता का अनुवाद एवम् रूपांतरण करने की चेष्टा की है.
कृपया देख लें कहाँ तक सफल हो पाया हूँ. कोशिश की है कि मूल कविता की आत्मा अक्षुण्ण रहे:



नीम तारीकी के बीच इक रोज़ मैं
गुम हो गया इक भीड़ में
बस चीखताचिल्लातालोगोंको बुलाता
खोजता था मैं वजूद अपनाजो गुम था.

हर दुआ मेरीयुँही बस गूँजती थी
कोई सुनवाई नहीं थी,
और कोई ध्यान भी देता नहीं था.

धुंद के मौसम में तब
चुपचाप एक अनजान ने
थामी मेरी बाहें
लिये मुझको,
निकलता वो गया उस भीड़ से.

अनजान और बेहिस से उस माहौल से
पहुँचा दिया उस दर पे मुझको उस फ़रिश्ते ने
जहाँ था रौशनी का एक दरिया बह रहा
आँखों को मेरी कर रहा रौशन.

वहाँ थे ख़्वाब मेरे..
मैं लगा ख़वाबों को जीने
सच उन्हें करने
इसी ख़्वाहिश में मैंने
जोड़ ली इक और ख़्वाहिश
पार कर लेने की उस दर को
मगर इसके क़बल कि लाँघता दहलीज़ मैं
था वो फ़रिश्ता जा चुका
और बंद थे दर रौशनी के
बस वहाँ पसरा हुआ था
एक ख़ालीपन
और इक ख़ामोशी चारों ओर थी बिखरी पड़ी बस!!
आशीष बनाए रखें.
सलिल

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Monday, 17 January 2011

Sunday, 16 January 2011