Saturday, 21 December 2013

मार्क्स वाद को सफल बनाना है तो अंबेडकर से कुछ सीखिए---बिजेन्द्र सिंह

न्यूयार्क और वाशिंगटन में तय नीति के अंतर्गत भाजपा में मोदी को आगे बढ़ा कर इन्दिरा कांग्रेस का मार्ग सुगम किया गया है। 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण'का लाभ सीधा-सीधा कांग्रेस को मिलेगा और जनता फिर वैसे ही लूटी जाएगी। यही समय है कि वामपंथियों को आगे आकर संसदीय राजनीति को मजबूत करना चाहिए। वरना तो 'चिड़ियाँ चुग गईं खेत'...ही होगा।

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  •  Sir, note karen, Bampanthi jab tak desh ki most oppressed classes- Dalit,Minorities and OBCs ko leadership tak nahi pahuchne dete, tab tak kabhi bhi in vargon ka biswas prapt nahi kar sakte. Marx oppressed classes ko leader dekhna chahate the, aap unko follower se aage nahi aane dete hen. Marxvad ko safal banana hai to Ambedkar se kuchh sikhiye. Shoshiton men Ab tak Ambedkar se unche kad ka kabil, samajhdar aur imandaar leader nahi hua.Apni soch me parivartan laiye. Aapki boddhik imandaari ka ye imtahan kaa samaya hai. Kripaya mujhe galat na samjha jaye. Meri sat pratishat bafadari Karl Marx aur desh ke sarvahara ke prati hai, Ismen Mujhe koi shak nahi hai.Is liye likha ki men bhi aapki tarah kranti ko safal dekhna chahate hun.
     
    ( सर, नोट करें, बामपंथि जब तक देश की मोस्ट अप्रेस्ड क्लासेज - दलित,माइनोरिटीज़ एंड  ओ बी सीज़  को लीडरशिप तक नही पहुचने देते, तब तक कभी भी इन वर्गों का विश्वास  प्राप्त नही कर सकते।  मार्क्स अप्रेस्ड क्लासेज़  को लीडर देखना चाहते थे, आप उनको फॉलोवर से आगे  नही आने देते हें।   मार्क्स वाद को सफल बनाना है तो अंबेडकर से कुछ सीखिए।  शोषितों में अब तक अंबेडकर से उँचे कद का काबिल, समझदार और ईमानदार लीडर नही हुआ। अपनी सोच मे परिवर्तन लाइए. आपकी बोद्धिक ईमानदारी का ये इम्तहान का समय है।  कृपया मुझे ग़लत ना समझा जाए।  मेरी शत प्रतिशत बफादारी कार्ल मार्क्स और देश के सर्वहारा के प्रति है, इसमें मुझे कोई शक नही है। इस लिए लिखा की में भी आपकी तरह क्रांति को सफल देखना चाहते हूँ। )
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    मैं भी बिजेन्द्र सिंह जी के दृष्टिकोण से शतशः सहमत हूँ  किन्तु एक नज़र खुद को दलित वर्ग का विद्वान बताने वालों के परस्पर विवाद पर भी नज़र दाल लें: 
    डॉ लालजी निर्मल
जाति के वर्तमान स्वरुप के रहते आप हजरत गंज या रामपुर के मुख्य चौराहे पर बाल्मीकि चाट भंडार खोल लीजिये , शुरू करिए दुसाध कांटिनेंटल रेस्टोरेंट ,इतना ही नहीं पासवान मिस्ठान भंडार की स्वीकार्यता भी देख लीजिये । निजी क्षेत्र में दलित की स्वीकार्यता ६ माह भी नहीं हो पाएगी । मिडिया और न्याय पालिका में वंचितों की उपस्थिति आपसे छिपी नहीं है । जमीनों में अपनी भागीदारी जग जाहिर है, ले दे कर आरक्षण के कारण हम सब आज कंप्यूटर चलाने की स्थिति में हो पाए है | जाति की प्रासंगिकता देखिये, सामान्य निर्वाचन क्षेत्रो से कोई दलित आज भी निर्वाचित हो कर नहीं आ सकता ।मन्दिरो में पड़ा लाखो टन सोना एक जाति विशेष की संपत्ति बनी हुई है । जाति को कमजोर करके ही विभिन्न क्षेत्रो में भागीदारी मिल सकती है । जाति की कट्टर उपस्थिति के बीच दलितों की आर्थिक स्वावलंबन की कल्पना दिवा स्वप्न ही तो है |

डा. निर्मल जी के सन्दर्भ में ---
जाति के विनाश के बिना कुछ नहीं हो सकता, यह सही है. पर जाति हमने नहीं बनाई, इसलिए इसको मिटाने में हम अपनी उर्जा-शक्ति क्यों नष्ट करें? हम अपने आर्थिक विकास पर धयान क्यों नहीं दें .
 https://www.facebook.com/nitendra.adarsh/posts/536508573077790

Parmanand Arya:
 समाजशास्त्र में एक सिध्दान्त होता हे, संस्कृतिकरण का सिद्धान्त इसके मुताबिक जो शोषित और दलित जातियां या व्यक्ति अपने वर्गीयचिन्तन और सरोकारों से मुक्त होते हैं ऐसे लोग सामाजिक और आर्थिक तरक्की करने के बाद अपने रीति-रिवाजों,ऐतिहासिक परम्पराओं से पिन्ड छुडाना चाहते हैं,अर्थात सांस्कृतिक तौर पर उसी चिन्तनधारा का अनुकरण करते हें जिससे वह अभी तक सताए और दबाए जा रहे थे. यही है--सांस्कृतिक अनुकरण जिसके कारण हम पाते हैं कि आज दलितों और वंचितों का उतना उत्पीडन ब्राह्मण जातियां नहीं करतीं जितना कि पिछडे वर्गों द्वारा किया जा रहा है..... धर्म-परम्पराएं, ब्राह्मणवाद.. इसी प्रवर्ति को प्रोत्साहित और प्रेरित करता है और अपने फायदे के लिेए उन्हे इस्तमाल करता है...... इसी के तहत गुजरात के दंगों में दलित के खिलाफ दलित ( मुसलमानों के खिलाफ आदिवासी जातियों ) का इस्तमाल किया गया था.... यही प्रवत्ति आप बहुएं जलाने, व उत्पीडन के मामलों में भी देख सकते हैं जहां बहुएं जलाने या उनके उत्पीडन में ससुराल में सास.ननद आदि महिलाओं की भूमिका अपने पुरुष सहयोगियों से कहीं ज्यादा बढ चढ कर होती है....
“समाज का वंचित वर्ग अंतिम कतार से निकल कर मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है लेकिन आज भी दलित-पिछड़ों के साथ किसी न किसी रूप में भेदभाव बरकरार है। दलित अधिकारी के सरकारी कार्यालय से सेवानिवृत्ति होने ओर उस कुर्सी पर बैठने वाला अधिकारी कमरे को गंगा जल से पवित्र करवाता है। शिक्षा संस्थान भी जाति प्रेम से अछूते नहीं है। लखनऊ यूनीवर्सिटी इसका अदाहरण बना है।“

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(यह वाक्यांश बताता है कि समाज में धड़ल्ले से संविधान विरोधी/गैर कानूनी कार्य चलते हैं जिनको तथाकथित वैज्ञानिक/प्रगतिशील लोगों के संरक्षण की ठोस प्राप्ति भी होती है। समाज की मुख्य धारा में जुड़ना चाहने का मतलब गलत बातों को अपनाना कतई नहीं होना चाहिए किन्तु पढे-लिखे ओहदेदार लोग भी ऐसा ही कर रहे हैं जिसकी ही परिणति हैं ऐसे निंदनीय कृत्य। 

एक सरकारी निगम में कार्यरत परिचित अधिशासी अभियंता महोदय जो खुद को दलित भी मानते हैं और पोंगा-पंथियों के दीवाने भी बने हुये हैं क्यों ढ़ोंगी ब्रहमनवाद के पीछे भागते हैं मैं समझ न सका?आगरा में वह तब मेरे संपर्क में आए थे जब इन ब्रहमन वादियों द्वारा ही उत्पीड़न का शिकार चल रहे थे। मैंने उनका ज्योतिषयात्मक समाधान ‘वेदिक विधि’से करवाया और उनको पोंगा-पंथी ब्राहमनवाद से बचने का लगातार परामर्श दिया। किन्तु वह समाधान मुझसे प्राप्त करते हुये भी लगातार ब्राह्मण वादियों के इशारे पर भी चलते आ रहे हैं इसका खुलासा 23 जनवरी 2013 को तब हुआ जब उन्होने अपने नए घर मे ‘गृह-प्रवेश’ के अवसर पर मुझसे ‘वास्तु-हवन’ के साथ-साथ ‘सत्यनारायन कथा’ भी करवा देने को कहा। मैंने उनको स्पष्ट कह दिया कि वह किसी दूसरे से हवन करवा लें मुझसे ढोंग नहीं हो सकता। चूंकि यह बात उन्होने ऐन दिन के दिन काही थी अतः बिना ‘सत्यनारायन कथा’ करवाए मुझसे हवन तो करवा लिया किन्तु उनके रिश्तेदार व परिवारीजन कथा न होने से ‘रुष्ट’ रहे। वे लोग ढ़ोंगी मूर्ती पूजा भी करते हैं पंडितों के फेर में भी फंसे रहते हैं। क्या यही है समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का मतलब?यदि उस गलत को समर्थन देंगे जो आधारित ही है शोषण और उत्पीड़न पर तो फिर कसूर किसका है?
यदि शोषण-उत्पीड़न का विरोध करना है तो सबसे पहले ढोंग-वाद पर प्रहार करना होगा,बताना होगा जो सदियों से चल रहा है वह गलत है न कि खुद उसी में शामिल होकर खुश होना चाहिए।---विजय राजबली माथुर)



Friday, 20 December 2013

देवयानी विवाद पर जैसे को तैसा व्यवहार होना चाहिए---विजय राजबली माथुर

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जिस प्रकार के समाचार प्रकाशित हो रहे हैं उनसे ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार यह दिखाना चाहती है कि वह अमेरिका के विरुद्ध सख्त कदम उठा रही है। किन्तु यह सिर्फ जनता को धोखा देने वाली बात है क्योंकि एक तबका खुद देवयानी खोबरगड़े को दोषी ठहरा रहा है तभी अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता ने बड़ी बुलंदगी से कह दिया है कि अमेरिका न तो केस वापिस लेगा और न ही माफी माँगेगा। 

एक समय भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति जानसन ने 'लेडीबर्ड' सम्बोधन से अपनी पत्नी के साथ की थी। लेकिन बाद में इन्दिरा जी ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन द्वारा भेजे 7वां बेड़ा के बंगाल की खाड़ी में पहुँचने से पहले ही 'बांगला देश' को आज़ाद करवा लिया था। सोवियत रूस से 20 वर्षीय 'शांति एवं मैत्री संधि' की थी। अब न वह सोवियत रूस है और न ही वैसा भारतीय नेतृत्व। 

होना तो यह चाहिए था कि कोलकाता व मुंबई स्थित अमेरिकी बाणिज्य दूतों को गिरफ्तार करके पालम हवाई अड्डे से वापिस अमेरिका भेज दिया जाता और देवयानी खोबरगड़े को वापिस भारत बुलवा लिया जाता। देवयानी को वापिस न भेजने पर अमेरिका से राजनयिक संबंध तोड़ लेने की बात भारत सरकार को कहनी चाहिए थी। वर्ल्ड बैंक के पूर्व कारिंदा पी एम साहब क्या इतनी हिम्मत दिखा सकेंगे?अन्यथा क्या यह भी आगामी लोकसभा चुनावों में इन्दिरा कांग्रेस को कमजोर करने की उनकी कोई दूरगामी चाल है?
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Saturday, 7 December 2013

ईमानदारी की कहानी प्रवीण कुमार सिंह जी की जुबानी

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Wednesday, 27 November 2013

देशद्रोही आधार कार्ड योजना को तत्काल रद्द कराने हेतु व्यापक जनांदोलन चलाये जाने की आवश्यकता है---विजय राजबली माथुर

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हिंदुस्तान ,लखनऊ

Supply subsidised LPG without Aadhaar’

ANDHRA PRADESH NELLORE

The CPI city unit staged a protest at the district collectorate here on Monday demanding that the poor and lower middle class families be given subsidised LPG gas cylinders without insisting on Aadhaar cards and bank accounts. CPI city secretary Sk. Muneer said that most of the uneducated workers do not have bank accounts and Aadhaar cards.
Petroleum Ministry has created a confusion to deprive the poor people. They have made AADHAAR CARD mandatory for disbursement of subsidy on LPG cylinder purchase.

I am shocked with this decision.


Already, the common people are hard pressed by the restriction of subsidized LPG cylinders to nine per year. Now this AADHAAR CARD issue will be another cause of harassment to the common people.


It is the responsibility of the Central Government to prepare the AADHAAR CARD. Only 15% people of our State have got AADHAAR CARD. How will the rest of the people get their LPG subsidies if AADHAAR CARD is made mandatory?

It is also known that the Hon’ble Supreme Court has not favoured linking of AADHAAR CARD to disbursement of benefits under various government schemes.

We strongly protest this sort of arbitrary action on the part of the Petroleum Ministry to deprive the poor people of their legitimate right and demand immediate roll back of this anti-people decision.

For every matter, a new card is coming. Then how many cards will one have? Will one wear a “garland of cards” – Ration Card, Voter Identity Card, Health Card, BPL Card, PAN Card …?


I want one uniform card to cater to all provisions and meet all
requirements of the people.
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जबकि भाकपा संसदीय दल के नेता समेत सभी बड़े कामरेड्स 'आधार कार्ड'द्वारा जनता के शोषण-उत्पीड़न और देश की संप्रभुत्ता पर आघात की ओर ध्यान दिलाये जाने पर भी नज़रें फेर कर मनमोहन सरकार के संकट मोचक को उनके बाद पी एम बनवाने की कवायद में जुटे हुये हैं ; तब हम मुख्यमंत्री दीदी ममता बनर्जी का साधारण जनता के हक में लिए गए इस निर्णय और समर्थन का हार्दिक स्वागत करते हैं।  यही तो है असली कामरेशिप।नेल्लोर(आंध्र प्रदेश ),CPI के जिलमंत्री कामरेड एस के मुनीर साहब भी बधाई के पात्र हैं जो उन्होने जनता की पीड़ा को समझा। 
इस देशद्रोही  आधार कार्ड योजना को तत्काल रद्द कराने हेतु व्यापक जनांदोलन चलाये जाने की आवश्यकता है।

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Tuesday, 19 November 2013

किसी को व्यक्तिगत नुकसान पहुंचाना न हमारा उद्देश्य है न ही लक्ष्य---विजय राजबली माथुर

आज ही एक सज्जन ने लिखा कि किसी का टैग हटाने या उसे अंफ्रेंड करने या ब्लाक करने व उसकी घोषणा करने की ज़रूरत नहीं होती है। आज ही एक दूसरे 'ज्जन ने पाखंडियों के फोटो टैग कर दिये तो क्यों न उनको हटाते?और क्यों न यह सबको बताया जाये कि पाखंडवाद के प्रबल विरोधी को इस प्रकार के फोटो टैग करने का औचित्य क्या हो सकता है?जबकि वह प्रोफेसर साहब CPM के बड़े नेता भी हैं।
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  • Madan Mohan Tiwari जी मैंने ही लिखा था कि कुछ लोग बार बार सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि ऐसा करने पर अन्फ्रेंड कर दूंगा या ब्लाक कर दूंगा.हर व्यक्ति के अपने विचार हो सकते हैं.बार बार ऐसे पोस्ट्स पढ़ना कम से कम मुझे तो अच्छा नहीं लगता है.वैसे भी हर पोस्ट को हर व्यक्ति .. तो पढ़ नहीं पाता है.जिसने घोषणा पढ़ ली वह तो टैग नहीं करेगा,जिसने न पढ़ पाई वह घोषणा के बावजूद भी कर सकता है.ऎसी स्थिति में टेग्ड फोटो में ही अन टेग करने के,रिमूव करने के या रिपोर्ट करने के आप्शन होते हैं,उनका इस्तेमाल किया जा सकता है या जिस व्यक्ति ने टैग किया है उस को सीधे मेसेज भेज कर ऐसा न करने को कहा जा सकता है.वैसे मुझे आज तक यह समझ नहीं आ पाया है कि टैग करने का मतलब या उद्देश्य क्या होता है.बहुत पहले जब मैं फेसबुक से नया नया जुड़ा था मैंने एक दो पोस्ट डाल कर यह जानना भी चाहा था कि टैगिंग का मतलब क्या है,पर किसी ने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया.

  • Deepak Kumar Vijay raj ji aap me bahut jyada ghamand hai. koi communist itna jyada ghmandi nahi hota.
  • Vijai RajBali Mathur दीपक कुमार एवं गिरिधारी गोस्वामी ने खुद ही फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजे थे और खुद ही कुराफ़ात करने लगे अतः दोनों को ब्लाक करना अपरिहार्य हो गया। घोषणा करना इसलिए आवश्यक है कि ख्वंखाह पाखंडी ठग आशाराम का फोटो क्यों मुझे टैग किया था?किस आधार पर मुझमें घमंड होने ...See More
  • Madan Mohan Tiwari आपकी यह बात इसलिए ठीक लगी क्योंकि आपने जिसको ब्लाक किया उसका नाम भी लिया और ब्लाक करने का कारण भी बताया.अन्य लोग तो केवल माहौल बनाने व अपना महत्व बताने के लिए ही घोषनाएं करते हैं.
  • Vijai RajBali Mathur सम्मानीय मदन मोहन तिवारी जी किसी को भी ब्लाक करने का कारण तो सदा ही बताता रहा हूँ परंतु नाम सिर्फ यह सोच कर उजागर नहीं करता था कि उसका भविष्य इससे प्रभावित न हो। उदाहरणार्थ प्रस्तुत मामले में (जो आपको ठीक लगा)प्रोफेसर गिरिधारी गोस्वामी तो रांची विश्वविद्यालय में वरिष्ठ अध्यापक और धाकड़ CPM नेता हैं उनका भले ही कुछ प्रभावित न हो;परंतु दीपक कुमार जो नोयडा में इंजीनियर हैं एक नौजवान हैं और भविष्य में जाब परिवर्तन कर सकते हैं तब उनसे इनटरवीयू में सवाल उठ सकता है जो उनके करियर के लिए ठीक न होगा। मुझसे असहमति है इस कारण मैं उनको ब्लाक करके अलग हो जाता हूँ लेकिन मैंने पहले नाम उजागर नहीं किया था क्योंकि मैं किसी का भी भविष्य नहीं बिगाड़ना चाहता भले ही उसने मुझे व्यक्तिगत नुकसान भी पहुंचाया हो। आपके कमेन्ट के कारण दोनों नाम उजागर करने पड़े हैं इसलिए यदि किसी को भविष्य में कोई नुकसान होता है तो मैं नहीं आपका कमेन्ट उत्तरदाई होगा। मैं आपके द्वारा ब्लाक किए गए व्यक्ति का नाम हमेशा उजागर करने के सिद्धान्त से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ।एक और उदाहरण डॉ मोहन श्रोत्रिय साहब का दे सकता हूँ कि वह तो रिटायर्ड प्रोफेसर होने के कारण अप्रभावित रहेंगे। उनको झूठ बोलने व कम्युनिस्ट होते हुये भी पाखंडी -पोंगापंथी ब्रहमनवाद का समर्थक होने के कारण ब्लाक किया था। परंतु भाकपा संसदीय दल के नेता आदरणीय कामरेड गुरुदास दासगुप्ता जी के विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग करने वाले एआईएसए/माले कार्यकर्ता का नाम इसलिए नहीं उजागर करना चाहूँगा कि वह अभी छात्र है और उसके आगे लंबा भविष्य पड़ा है। फेसबुक पर ब्लाक करके अपने से अलग कर दिया इतना ही पर्याप्त है ,उसका नाम उजागर करके क्यों उसका भविष्य बिगाड़ा जाये ?भले ही आपके हिसाब से वह गलत बात मानी जाये परंतु मैं नैतिक दृष्टि से वैसा नहीं कर सकता।  हमारे विचार नहीं मिलते तो हम फेसबुक पर अलग हो जाते हैं लेकिन किसी को व्यक्तिगत नुकसान पहुंचाना न हमारा उद्देश्य है न ही लक्ष्य।
    a few seconds ago · Like

    Madan Mohan Tiwari Vijai RajBali Mathur jii:न तो मैंने कभी आपकी ब्लाक करने या अन्फ्रेंड करने जैसी पहले कोई पोस्ट पढी थी न ही मेरा आशय आपको लक्ष्य बना कर कुछ लिखने का था.वास्तव में मैंने कभी नहीं पढ़ा था.वैसे भी हर पोस्ट हर व्यक्ति पढ़ भी नही सकता है.होम में जो 10-15 पोस्ट शुरू की आती हैं उन्हें ही पढ़ पाना संभव है.या फिर किसी व्यक्ति विशेष की टाइम लाइन में जाकर पढ़ सकते हैं.मैंने यह कभी नहीं कहा कि ब्लाक करने वाले व्यक्ति का नाम सार्वजनिक किया जाए .मैंने तो यह लिखा था,आप पुरानी पोस्ट पढ़ लीजिये कि जिसे जो अन्फ्रेंड करना चाहे कर दे,ब्लॉक करना चाहे कर दे,पर उसका ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता क्या है.वैसे भी कोई न तो किसी को समझा सकता है,न ही किसी को अपनी बातें मानने को बाध्य कर सकता है.लोग विचार प्रकट करते हैं,कुछ लोग पसंद करते हैं कुछ नहीं.
    जहां के लोग पढे-लिखे होने के बावजूद 'घोर पाखंडी'हों वहाँ ऐसी ही लूट होती है---

    पटना जंक्शन के बाहर ये महाशय स्टेशन आने-जाने वाले लोगों में विदेशी सैलानी या बेवकूफों की तलाश में रहते हैं. जैसे ही इनको इनका शिकार मिलता है ये प्रेम-पूर्वक उसके पास जाते हैं और बिना कोई सवाल जवाब किये उसके माथे पर तिलक लगा देते है, इसके बाद मंत्रोचारण करते हुए उसकी कलाई में लाल-पीले रंग का धागा बाँध देते हैं. उसके बाद इस काम के मेहनताने की बोली ₹101 (न्यूनतम) लगाते हैं. इसे मनमाफिक दक्षिणा मिले तो ठीक नहीं तो जितना प्यार से ये तिलक लगाकर धागा बांधते हैं उतने ही क्रोधित होकर श्राप देना भी शुरू कर देते हैं, इनके चुंगल में फंसे शिकार मजबूर होकर इनसे बार्गेनिंग कर इन्हें ₹51, 21, 11या ₹5 देकर पीछा छुड़ाते हैं

    • Giridhari Goswami पाखंडी ये नहीं,वे लोग हैं जो इनसे तिलक लगवाते. ये तो आरक्षण का मारा बेचारा गरीब ब्राम्हण दो जून के जुगाड़ में कोई हल्का फुल्क रास्ते में चल पड़ा है. मैं काशी विश्वनाथ,और जगन्नाथ पूरी जैसे मंदिरों में बिना टिका लगवाए और बिना पचास पैसे दान किये घूम आया. कहा गया है की 'मूर्खों के जेब में पैसे हों तो क्या अक्लमंद भूखा मरेगा?'
    • Vijai RajBali Mathur जी हाँ गांठ के पूरे और अक्ल के अधूरे ही लुटते हैं।

Friday, 1 November 2013

पद्मश्री के॰पी॰ सक्सेना का महाप्रयाण हिन्दी भाषा एवं साहित्य की आपूरणीय क्षति है --- सुधाकर अदीब

हिन्दी गौरव, पद्मश्री के॰पी॰ सक्सेना ने आज 31 अक्टूबर 2013 को प्रातः 8.45 बजे इस सरायफ़ानी को आखिरकार अलविदा कहा। उनका महाप्रयाण हिन्दी भाषा एवं साहित्य की आपूरणीय क्षति है और मेरे लिए तो यह व्यक्तिगत क्षति भी है। एक बेहद गंभीर, भावुक, आस्थावान और स्नेहमय व्यक्तित्व का नाम के पी सक्सेना। हिन्दी व्यंग्य के अप्रतिम एवं स्वर्णिम हस्ताक्षर का नाम के पी सक्सेना। अपनी चटकीली अदायगी में व्यंग्य रचनाओं को पढ़कर बेतरह गुदगुदाने वाले केपी (ये उनके प्रशंसकों का दिया प्यार भरा नाम था) अपने निजी जीवन में उतने ही संजीदा व्यक्ति थे।... भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनन्य पुजारी ... रामकथा के मर्मज्ञ विद्वान ... दार्शनिक ... चिंतक ... वैज्ञानिक ... उन्हें नजदीक से जानने वाले उन्हें उनकी बहुत सी ख़ूबियों सहित जानते-बूझते थे।

वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हस्तलिपि फूलों से भी सुंदर। हिन्दी अंग्रेज़ी और उर्दू तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले केपी ने अभिव्यक्ति के जितने भी दृश्य और श्रव्य माध्यम हो सकते हैं सबमें उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। पत्र-पत्रिकाएँ-काव्यमंच-आकाशवाणी-दूरदर्शन और हिन्दी फिल्म जगत सभी जगह उन्होने हिन्दी के इस तरह झंडे गाड़े जो किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं। लखनऊ का अदब तो केपी सक्सेना का लोहा मानता ही था उनकी कलम की मुरीद मुंबई फिल्म इंडस्ट्री भी हुई जब अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होने 'हलचल' 'लगान' 'स्वदेश' और 'जोधा अकबर' जैसी सफल फिल्मों के खूबसूरत और दमदार संवाद लिखे। उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' सम्मान प्रदान किया और हाल ही में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उन्हें 'हिन्दी गौरव' देकर स्वयं गौरवान्वित हुआ। वास्तव में केपी सक्सेना का व्यक्तित्व और कृतित्व किसी भी सम्मान और पुरस्कार से बड़ा था।

... और उर्दू भाषा और अवध की तहज़ीब के तो वह ऐसे विशेषज्ञ कि ' बीवी नातियों वाली' से लेकर नई नवेली दोशीज़ाएँ भी केपी की शीरीं ज़ुबान पर फ़िदा हुए बिना रह ही नहीं सकतीं। तभी तो केपी के दोस्त 'मिर्ज़ा' उनसे यूं ही परेशान थोड़े ही रहते थे।

केपी सर से मेरा प्रथम संपर्क सन 2003 में मेरे तृतीय उपन्यास 'हमारा क्षितिज' के लोकार्पण से कुछ दिन पूर्व हुआ। वह मेरे अनुरोध पर फ़ैज़ाबाद में इस उपन्यास के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। इस समारोह में ज़ाहिर है कि केपी हीरो थे और मैं था उनका साइड हीरो। लोकार्पण के बाद सभी दर्शकों ने उनसे उनका कोई व्यंग्य सुनाने कि फ़र्माइश की। केपी ने प्रारम्भ में काफी नानुकुर की और कहा कि वह 20 वर्षों से सार्वजनिक मंचों से व्यंग्य पाठ करना छोड़ चुके हैं। फिर भी हमारे भारी आग्रह पर उन्होने अपना " इन्कम टैक्स का छापा पड़ने वाला " सुप्रसिद्ध व्यंग्य सुनाया अपने चिर-परिचित अंदाज़ में । उनका एक-एक वाक्य और जनता लोट-पोट। क़हक़हों का वह दौर चला कि हँसते हँसते लोगों की आँखों में आँसू आ गए। ... अब क्या कहूँ ? उन्हीं महान व्यंग्यकार केपी सक्सेना को मैंने ज़ार ज़ार रोते हुए भी देखा है। मेरा चौथा उपन्यास 'मम अरण्य' गतवर्ष 2012 में आया। इस उपन्यास के 'सीता कि अग्नि परीक्षा' विषयक प्रसंग को मुझसे सुनकर केपी मेरे समक्ष फूट फूट कर रोये। तब मैंने कुछ-कुछ जाना उनके भीतर के उस अत्यंत भावुक और गंभीर इंसान को।

इसी वर्ष 2013 में प्रकाशित अपने पांचवें हिन्दी उपन्यास 'शाने तारीख़' कि पाण्डुलिपि भी लेकर उनके पास गया। अब वे बेहद बीमार थे। पर शेरशाह सूरी पर उपन्यास है, जानकार वह बेहद खुश हुए और उन्होने उसके कुछ अंश सुनकर मुझे ढेरों आशीर्वाद दिये। अब वही दुआएं मेरा सरमाया हैं । 81 वर्ष की उम्र में भी साहित्य जगत के सदाबहार 'देवानन्द' के॰पी॰ सक्सेना हमेशा अमर रहेंगे। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।
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जहां एक ओर डॉ सुधाकर अदीब साहब का वर्णन के पी सक्सेना साहब के सकारात्मक एवं भावुक पक्ष पर प्रकाश डालता है वहीं हिंदुस्तान में प्रकाशित वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है की बाटनी जैसे साईन्स के विषय के ज्ञाता होकर भी सक्सेना साहब पोंगा-पंथ में विश्वास(हनुमान को इष्ट देव मानते थे) रखते थे।काफी सम्मान अर्जित करने के बाद भी उनको उत्तर प्रदेश द्वारा सम्मानित किए जाने की ख़्वाहिश थी। हो सकता है हिंदुस्तान का वर्णन सही हो।  हमारे लखनऊ का वह गौरव   थे अतः हम उन पर नाज़ कर सकते हैं। 
(विजय राजबली माथुर)

Thursday, 31 October 2013

राजेन्द्र यादव जी की स्मरण गोष्ठी

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समाचार फोटो वीरेंद्र यादव जी की वाल से साभार
कल शाम लखनऊ में आयोजित आदरणीय  राजेंद्र यादव जी की स्मृति में सम्पन्न गोष्ठी में व्यक्त विचार इस समाचार कटिंग के माध्यम से वीरेंद्र यादव जी ने अपनी वाल पर शेयर किए थे। इसके अतिरिक्त 'हिंदुस्तान',लखनऊ के लाईव अंक में एक समाचार और जुड़ा हुआ है कि वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि अब 'हंस' का उत्तराधिकारी कौन?
हिंदुस्तान लाईव,लखनऊ,पृष्ठ-26,दिनांक 31-10-2013


इस प्रश्न की आवश्यकता क्या थी ?जबकि राजेन्द्र यादव जी की फेसबुक वाल पर उनकी सुपुत्री सुश्री रचना यादव जी ने यह स्टेटस दे दिया था। :


मेरे पिता श्री राजेंद्र यादव के अचानक हम सब को छोड़ कर चले जाने पर आप सभी दोस्तों ने जितने शोक संदेश, संवेदना और श्रद्धांजलि अर्पित की है, मैं एवं हंस परिवार के सभी कार्यकर्ता आप सभी के आभारी हैं. इस समय हम सब को आप सभी के स्नेह, शुभकामनाओ और साथ की बहुत आवश्यकता है. पापा के हम सब में विश्वास और आपके इसी प्यार के भरोसे हम हंस की गरिमा को बनाये रखने कि कोशिश करेंगे और आप तक पहुँचाते रहेंगे.
परम् धन्यवाद सहित
रचना यादव एवं हंस परिवार


6 · ·
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पहले मेरा विचार इस गोष्ठी में उपस्थित होकर वक्ताओं को सुनने का था।  मुझे फेसबुक पर फ्रेंड स्वीकार करने में राजेन्द्र यादव जी ने बिलकुल भी संकोच नहीं किया था;  मैं तो उनको एक महान साहित्यकार के रूप में जानता था  जबकि मैं  खुद उनके लिए अनजान व्यक्ति था।परंतु फिर यह सोच कर जाना स्थगित कर दिया कि वहाँ तो बड़े- बड़े लोग होंगे और थे भी जिनमें सिर्फ  इप्टा के राकेश जी ही अभिवादन का ठीक से जवाब देते हैं बाकी लोग तो आश्चर्य से देखते हैं कि यह मामूली आदमी यहा कैसे?जब हिंदुस्तान में 'हंस' के उत्तराधिकारी के बारे में जिज्ञासा का समाचार पढ़ा तो लगा कि मैंने वहाँ उपस्थित न होकर अच्छा ही किया।
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Monday, 28 October 2013

भारत में विदेशी शासन के लिए केवल हिन्दूधर्म ही जिम्मेदार है---पी. सी. हादिया/कँवल भारती


आरक्षण पर एक विहंगम दृष्टि
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आरक्षण पर अभी हाल में पी. सी. हादिया की पुस्तक ‘रिजर्वेशन, अफरमेटिव एक्शन एंड इनक्लुसिव पालिसी’ पढने को मिली, जो आरक्षण के पक्ष-विपक्ष और परिणाम पर एक विहंगम दृष्टि डालती है. आरक्षण पर हर पहलू से गम्भीर विचार करने वाली यह मुझे पहली पुस्तक लगी. इस किताब में 18 अध्याय हैं और इसका फोरवर्ड गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस वाई, आर. मीना ने लिखा है. किताब के परिचय में हादिया लिखते हैं कि भारत में हिन्दूधर्म और मनुस्मृति के समय से ही शूद्रों, अछूतों और आदिवासियों पर राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक शासन करने के लिए सारी सत्ताओं और विशेषाधिकारों का आरक्षण द्विजों के लिये मौजूद रहा है. ये विशेषाधिकार सिर्फ उन पर शासन करने के लिए ही नहीं थे, बल्कि उनको अधिकारों से वंचित करने के लिए भी थे. वह लिखते हैं कि भारत अतीत में जो विदेशी हमलावरों से अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर सका, उसका यही कारण था कि एक वर्ण विशेष को ही लड़ने का अधिकार था, शेष दूसरी जातिओं के लोगों को राज्य की सेनाओं से बाहर रखा जाता था. अगर सेना में भारी संख्या में दलित जातिओं की भरती की जाति, तो भारत विदेशी शासकों का गुलाम नहीं बनता. इसलिए हादिया लिखते हैं कि भारत में विदेशी शासन के लिए केवल हिन्दूधर्म ही जिम्मेदार है.
हादिया आगे बहुत ही रोचक जानकारी देते हैं कि सिपाही-विद्रोह के बाद जब रानी विक्टोरिया ने कम्पनी राज समाप्त कर भारत का शासन अपने हाथों में लिया, तो उन्होंने ब्रिटिश सेवाओं में भर्ती के लिए जाति और धर्म के भेदभाव को कोई मान्यता नहीं दी थी. इस के तहत सतेन्द्र नाथ टैगोर पहले भारतीय थे, जो 1863 में काविनेनटेड सिविल सर्विस में चुने गये. यही वह सर्विस थी, जो बाद में इण्डियन सिविल सर्विस के नाम से जानी गयी. वह आंबेडकर के हवाले से बताते हैं कि ‘आईसीएस में भारतीय युवकों को प्रोत्साहित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नौ छात्रों को, जो सभी उच्च जातियों के थे, छात्रवृत्ति देकर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा था. लेकिन सरकार के इन प्रयासों के बावजूद आईसीएस में भारतीयों की संख्या में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई थी, क्योंकि भारतीयों की मेरिट उस लेबिल की थी नहीं. 1920 में ICS की 35 प्रतिशत सीटें भारतीयों के लिए आरक्षित कर दी गयी थीं और 1922 के बाद से भारत में ही ICS की परिक्षाएं भी होने लगी थी. पर, इस आरक्षण के बावजूद अपर कास्ट हिन्दू 1942 में कुल आरक्षित 1056 सीटों में से 363 पर ही अपनी योग्यता दिखा पाए थे.’ इससे हमें पता चलता है कि भारत में ब्रिटिश राज के अंतर्गत अपर कास्ट हिन्दू आरक्षण का लाभ ले रहे थे. लेखक कहता है कि अगर आरक्षण न होता, तो ICS में उनकी उपस्थिति इतनी भी नहीं होती. लेकिन यह विडंबना ही है कि जब अंग्रेज भारत छोड़ कर गये, तो देश पर शासन करने की सम्पूर्ण सत्ता इन्हीं (अयोग्य) हिन्दुओं के हाथों में आयी.
किताब का दूसरा अध्याय उस हौवा पर है, जो योग्यता के नाम पर खड़ा किया गया है. यह इस किताब का सबसे पठनीय और महत्वपूर्ण अध्याय है. इस अध्याय में उन तमाम छल-प्रपंचों पर चर्चा की गयी है, जिन्हें परिक्षाओं में उच्चतम नम्बर प्राप्त करने के लिए अपर कास्ट हिन्दुओं ने बनाया हुआ है. इस अध्याय में भारत के विभिन्न न्यायलयों में आरक्षण पर दिए गये अनेक महत्वपूर्ण फैसलों का भी तार्किक विश्लेषण किया गया है. लेखक ने इस अध्याय में formal समानता और proportional समानता दोनों किस्म की समानताओं पर चर्चा की है, जो बहुत ही तर्कपूर्ण है. अध्याय का अंत डा. आंबेडकर के इस कथन से होता है कि ‘यदि अगर सभी समुदायों को समानता के स्तर पर लाना है, तो इसका सिर्फ एक ही हल है कि असमानता से पीड़ित लोगों को समानता के स्तर पर लाया जाये.’
इस किताब का अंतिम अध्याय reservation sans tears है, जो बहुत ही महत्वपूर्ण है. मैं समझता हूँ कि अभी तक आरक्षण के इतने सारे पहलुओं पर सम्यक चिन्तन और विमर्श आप कहीं नहीं पाएंगे, जो इस अध्याय में है. यह अध्याय भारत के पूर्व राष्ट्रपति के आरनारायण की इस चेतावनी से समाप्त होता है, जो उन्होंने 25 जनवरी 2000 को कहा था कि ‘पीड़ित लोगों के कोप से बचो.’
26 अक्टूबर 2013

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर

Saturday, 26 October 2013

गणेशशंकर विद्यार्थी ---Indrabhuwan Tripathi



जन्म- 26 अक्टूबर, 1890, प्रयाग; मृत्यु- 25 मार्च, 1931) एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। भारत के 'स्वाधीनता संग्राम' में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। अपनी बेबाकी और अलग अंदाज से दूसरों के मुँह पर ताला लगाना एक बेहद मुश्किल काम होता है। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। गणेशशंकर विद्यार्थी भी ऐसे ही पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम की ताकत से अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला दी थी। गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसक समर्थकों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आज़ादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।

जीवन परिचय

गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 में अपने ननिहाल प्रयाग (आधुनिक इलाहाबाद) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक के पद पर नियुक्त थे और उर्दू तथा फ़ारसी ख़ूब जानते थे। गणेशशंकर विद्यार्थी की शिक्षा-दीक्षा मुंगावली (ग्वालियर) में हुई थी। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फ़ारसी का अध्ययन किया।

व्यावसायिक शुरुआत
गणेशशंकर विद्यार्थी अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण एण्ट्रेंस तक ही पढ़ सके। किन्तु उनका स्वतंत्र अध्ययन अनवरत चलता ही रहा। अपनी मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने पत्रकारिता के गुणों को खुद में भली प्रकार से सहेज लिया था। शुरु में गणेश शंकर जी को सफलता के अनुसार ही एक नौकरी भी मिली थी, लेकिन उनकी अंग्रेज़ अधिकारियों से नहीं पटी, जिस कारण उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी।

सम्पादन कार्य

इसके बाद कानपुर में गणेश जी ने करेंसी ऑफ़िस में नौकरी की, किन्तु यहाँ भी अंग्रेज़ अधिकारियों से इनकी नहीं पटी। अत: यह नौकरी छोड़कर अध्यापक हो गए। महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता पर रीझे हुए थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास 'सरस्वती' के लिए बुला लिया। विद्यार्थी जी की रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। यह एक ही वर्ष के बाद 'अभ्युदय' नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। इसके बाद सन 1907 से 1912 तक का इनका जीवन अत्यन्त संकटापन्न रहा। इन्होंने कुछ दिनों तक 'प्रभा' का भी सम्पादन किया था। 1913, अक्टूबर मास में 'प्रताप' (साप्ताहिक) के सम्पादक हुए। इन्होंने अपने पत्र में किसानों की आवाज़ बुलन्द की।

लोकप्रियता
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं पर विद्यार्थी जी के विचार बड़े ही निर्भीक होते थे। विद्यार्थी जी ने देशी रियासतों की प्रजा पर किये गये अत्याचारों का भी तीव्र विरोध किया। गणेशशंकर विद्यार्थी कानपुर के लोकप्रिय नेता तथा पत्रकार, शैलीकार एवं निबन्ध लेखक रहे थे। यह अपनी अतुल देश भक्ति और अनुपम आत्मोसर्ग के लिए चिरस्मरणीय रहेंगे। विद्यार्थी जी ने प्रेमचन्द की तरह पहले उर्दू में लिखना प्रारम्भ किया था। उसके बाद हिन्दी में पत्रकारिता के माध्यम से वे आये और आजीवन पत्रकार रहे। उनके अधिकांश निबन्ध त्याग और बलिदान सम्बन्धी विषयों पर आधारित हैं। इसके अतिरिक्त वे एक बहुत अच्छे वक्ता भी थे।

साहित्यिक अभिरूचि

पत्रकारिता के साथ-साथ गणेशशंकर विद्यार्थी की साहित्यिक अभिरूचियाँ भी निखरती जा रही थीं। आपकी रचनायें 'सरस्वती', 'कर्मयोगी', 'स्वराज्य', 'हितवार्ता' में छपती रहीं। आपने ‘सरस्वती‘ में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में काम किया था। हिन्दी में "शेखचिल्ली की कहानियाँ" आपकी देन है। "अभ्युदय" नामक पत्र जो कि इलाहाबाद से निकलता था, से भी विद्यार्थी जी जुड़े। गणेश शंकर विद्यार्थी ने अंततोगत्वा कानपुर लौटकर "प्रताप" अखबार की शुरूआत की। 'प्रताप' भारत की आज़ादी की लड़ाई का मुख-पत्र साबित हुआ। कानपुर का साहित्य समाज 'प्रताप' से जुड़ गया। क्रान्तिकारी विचारों व भारत की स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया था-प्रताप। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रेरित गणेशशंकर विद्यार्थी 'जंग-ए-आज़ादी' के एक निष्ठावान सिपाही थे। महात्मा गाँधी उनके नेता और वे क्रान्तिकारियों के सहयोगी थे। सरदार भगत सिंह को 'प्रताप' से विद्यार्थी जी ने ही जोड़ा था। विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा प्रताप में छापी, क्रान्तिकारियों के विचार व लेख प्रताप में निरन्तर छपते रहते।[3]

भाषा-शैली

गणेशशंकर विद्यार्थी की भाषा में अपूर्व शक्ति है। उसमें सरलता और प्रवाहमयता सर्वत्र मिलती है।






संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर