Saturday, 31 October 2015

यह साहित्य ही है जो इस पूरी प्रक्रिया का अपने दम पर प्रतिरोध कर रहा है ------ प्रियदर्शन

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम  करके पढ़ सकते हैं ) 



http://www.jansatta.com/entertainment/nation-has-bestowed-national-award-will-not-return-it-vidya-balan/46879/



** कोई समय ऐसा नहीं रहा जब लेखकों ने गलत का प्रतिरोध न किया हो --- प्रियदर्शन

चाहे 1975 हो या 1984 या 2002 या फिर 2015, लेखक हर दौर के गलत का उतना ही तीखा प्रतिरोध करते रहे हैं


प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या से लेकर दादरी तक पर लेखकों के संगठित प्रतिरोध के बाद साहित्य अकादेमी ने जो बयान जारी किया है, उसे वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने क्रांतिकारी बताया है. पुरस्कारों, अनुवादों और दो पत्रिकाओं के बीच ऊंघती अकादेमी ने शायद पहली बार लेखकीय विरोध के दबाव में वक्तव्य जारी कर अपने जीवित होने के प्रमाण दिए हैं. बेशक, लेखकों की यह शिकायत अपनी जगह जायज है कि उसने यह वक्तव्य देने में बहुत देर की और यह बहुत कम है. लेकिन उनका यह प्रतिरोध इस मायने में सफल है कि उसने अभिव्यक्ति की आज़ादी और बहुलतावादी सह अस्तित्व के मुद्दे पर देशव्यापी ध्यान खींचा है.

इस दौरान लेखकों को लगातार यह तोहमत झेलनी पड़ी कि उनका पूरा विरोध प्रायोजित है. उनसे बार-बार यह सवाल पूछा गया कि इसके पहले उन्होंने इमरजेंसी या ऐसी दूसरी बड़ी घटनाओं का विरोध क्यों नहीं किया. यह तोहमत फिर से यही साबित करती है कि हम मूलतः ऐसे छिछले समाज में बदलते जा रहे हैं जो बीते हुए संघर्षों को याद तक नहीं करता, क्योंकि उसके लिए राजनीति और सत्ता सबसे बड़े मूल्य, सबसे बड़ा सच हैं.

19 महीनों के इस पूरे दौर में राजनीतिक नेताओं के अलावा सबसे ज़्यादा उत्पीड़न लेखकों और पत्रकारों ने ही झेला. तब भी हिंदी लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने पद्मश्री वापस की और कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत ने पद्मभूषण लौटाया.

जो लोग पूछ रहे हैं कि इमरजेंसी के दौरान लेखकों और बुद्धिजीवियों की क्या भूमिका थी, वे पलट कर उन किताबों को पढ़ लें जिनमें आपातकाल के ढेर सारे ब्योरे हैं. 19 महीनों के इस पूरे दौर में राजनीतिक नेताओं के अलावा सबसे ज़्यादा उत्पीड़न लेखकों और पत्रकारों ने ही झेला. तब भी हिंदी लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने पद्मश्री वापस की और कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत ने पद्मभूषण लौटाया. लेकिन इमरजेंसी के उस दौर में सम्मान लौटाना तो एक मामूली बात थी, फणीश्वर नाथ रेणु और नागार्जुन के अलावा हंसराज रहबर, गिरधर राठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र मोहन, डॉ रघुवंश, कुमार प्रशांत, कुलदीप नैयर जैसे कई बड़े लेखक और पत्रकार थे, जिन्हें इमरजेंसी के दौरान जेल तक काटनी पड़ी थी.

नेताओं के अलावा यह लेखकों, पत्रकारों और प्राध्यापकों की ही जमात थी जिसने इमरजेंसी के ख़िलाफ़ सबसे तीखी लड़ाई लड़ी. कहने की ज़रूरत नहीं कि यह कांग्रेस विरोधी लहर थी जिसमें संघ के लोग भी शरीक थे. लेकिन अब वे याद करने को तैयार नहीं हैं कि लेखकों की जो बिरादरी आज उनके खिलाफ खड़ी है वह इमरजेंसी के ख़िलाफ़ लड़ाई में उनके साथ भी थी.

इसी दौर में भवानी प्रसाद मिश्र जैसे गांधीवादी कवि भी थे जिन्होंने आपातकाल के विरोध में रोज सुबह-दोपहर-शाम एक कविता लिखने का निश्चय किया था और यथासंभव इसे निभाया भी. बाद में इन कविताओं का संग्रह ‘त्रिकाल संध्या’ के नाम से प्रकाशित हुआ जिसकी कुछ कविताएं अपने ढंग से सत्ता और इंदिरा पर बेहद तीखी चोट करती हैं.

भवानी प्रसाद मिश्र जैसे गांधीवादी कवि भी थे जिन्होंने आपातकाल के विरोध में रोज सुबह-दोपहर-शाम एक कविता लिखने का निश्चय किया था और यथासंभव इसे निभाया भी.

1984 की सिख विरोधी हिंसा के विरोध में भी खुशवंत सिंह जैसे कांग्रेस समर्थक लेखक तक ने पद्मभूषण वापस कर दिया था. बेशक, वह हिंसा ख़ौफ़नाक और शर्मनाक दोनों थी, लेकिन उसे राज्य की वैचारिकी का वैसा समर्थन नहीं था जैसा इन दिनों कई तरह के हिंसक और हमलावर विचारों को मिलता दिखाई पड़ता है. फिर भी अपने-अपने शहरों में लेखकों ने प्रतिरोध किए, राहत देने की कोशिश की और उस विवेक का बार-बार आह्वान किया जो लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है.

चाहें तो याद कर सकते हैं कि उसी दौर में अवतार सिंह पाश जैसा क्रांतिकारी कवि हुआ जिसने इंदिरा गांधी की मौत के बाद बेहद तीखी कविता लिखी – ‘मैंने उसके ख़िलाफ़ जीवन भर लिखा और सोचा है / आज उसके शोक में सारा देश शरीक है तो उस देश से मेरा नाम काट दो. / मैं उस पायलट की धूर्त आंखों में चुभता हुआ भारत हूं / अगर उसका अपना कोई भारत है तो उस भारत से मेरा नाम काट दो.’ यह अलग बात है कि अवतार सिंह पाश को कविता पढ़ते हुए आतंकवादियों ने गोली मार दी.

इस पूरे दौर में लेखकीय और बौद्धिक प्रतिरोध अपने चरम पर दिखता है. पंजाब में गुरुशरण सिंह जैसा नाटककार है जो जनवादी मूल्यों के पक्ष में और आतंकवादियों के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ लड़ता रहा. इसी दौर में सफ़दर हाशमी मारे जाते हैं और पूरे देश की सांस्कृतिक आत्मा जैसे सुलग उठती है. छोटे-बड़े शहरों के नुक्कड़ों पर प्रतिरोध की सभाएं सजने लगती हैं. 1989 में जब गैरकांग्रेसी दल राष्ट्रीय बंद का आह्वान करते हैं तो राजनीतिक दलों के समानांतर सांस्कृतिक जत्थे भी पुलिस की लाठियां सहते हैं और जेल जाते हैं. 1992 में मुंबई के दंगों में राजदीप सरदेसाई अपनी रिपोर्ट्स में कांग्रेस और एनसीपी की विफलता पर सवाल खड़े करते हैं और श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट इन खबरों का भरपूर हवाला देती है.

अवतार सिंह पाश जैसा क्रांतिकारी कवि हुआ जिसने इंदिरा गांधी की मौत के बाद बेहद तीखी कविता लिखी – ‘मैंने उसके ख़िलाफ़ जीवन भर लिखा और सोचा है / आज उसके शोक में सारा देश शरीक है तो उस देश से मेरा नाम काट दो.

जाहिर है, यह सारा विरोध कांग्रेसी सरकारों के ख़िलाफ़ था जिसमें बेशक, कुछ समाजवादी और वाम वैचारिकी की भूमिका थी, मगर उसका राजनीतिक या सत्तामूलक समर्थन नहीं था. लेकिन नब्बे के दशक में जब बीजेपी ने सांप्रदायिकता के राक्षस को नए सिरे से खड़ा किया तो विरोध की धुरी कांग्रेस से मुड़कर उसकी तरफ़ चली आई. 2002 की गुजरात की हिंसा के ख़िलाफ़ बहुत सारी कविताएं लिखी गईं. मंगलेश डबराल की सुख्यात कविता ‘गुजरात के मृतक का बयान’ जितनी बड़ी राजनीतिक कविता है, उससे कहीं ज़्यादा बडी मानवीय कविता है.

मंगलेश अपनी मद्धिम आवाज़ में लिखते हैं- ‘और जब मुझसे पूछा गया तुम कौन हो / क्या छिपाए हो अपने भीतर एक दुश्मन का नाम / कोई मज़हब कोई ताबीज / मैं कुछ नहीं कह पाया मेरे भीतर कुछ नहीं था / सिर्फ एक रंगरेज़ एक मिस्त्री एक कारीगर एक कलाकार / जब मैं अपने भीतर मरम्मत कर रहा था किसी टूटी हुई चीज़ की / जब मेरे भीतर दौड़ रहे थे / अल्युमिनियम के तारों की साइकिल के नन्हे पहिये / तभी मुझ पर गिरी एक आग, बरसे पत्थर / और जब मैंने आख़िरी इबादत में अपने हाथ फैलाये / तब तक मुझे पता नहीं था बंदगी का कोई जवाब नहीं आता.‘ गुजरात की इसी हिंसा के त्रासद पहलुओं को लेकर असगर वजाहत ‘शाह आलम की रूहें’ जैसी नायाब किताब तैयार कर देते हैं.

बहरहाल, लेखकीय प्रतिरोध की यह सूची बहुत लंबी है और वह सिर्फ भाजपा विरोधी नहीं है. कुछ ही साल पहले हिंदी के वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को लेकर दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार के रवैये से नाराज़ सात लेखकों ने अपने हिंदी अकादमी सम्मान लेने से इनकार कर दिया था. जाहिर है, लेखन सत्ता का वह प्रतिपक्ष बनाता है जिससे कभी कांग्रेस नाराज़ होती है कभी भाजपा.

यह कांग्रेस विरोधी लहर थी जिसमें संघ के लोग भी शरीक थे. लेकिन अब वे याद करने को तैयार नहीं हैं कि लेखकों की जो बिरादरी आज उनके विरोध में खड़ी है वह इमरजेंसी के ख़िलाफ़ लड़ाई में उनके साथ भी थी.

एक ऐसे दौर में जब बाज़ार की चमक-दमक एक हिंसक भव्यता के साथ एक समृद्ध भारत का मिथक रच रही है, जब आर्थिक संपन्नता को छोड़कर बाकी सारे मूल्य पुराने मानकर छोड़ दिए गए हैं, जब घर-परिवार और समाज तार-तार होते दिख रहे हैं, जब सारी लोकतांत्रिक संस्थाएं क्षरण की शिकार हैं, जब ज्ञान के दूसरे अनुशासन – समाजशास्त्र, इतिहास या अर्थशास्त्र – सत्ता की जी हुजूरी करते नज़र आ रहे हैं, तब यह साहित्य ही है जो इस पूरी प्रक्रिया का अपने दम पर प्रतिरोध कर रहा है.


लेकिन उसकी खिल्ली उड़ाई जा रही है, उसे पहचान और मान्यता देने से इनकार किया जा रहा है, उसे बिल्कुल अप्रासंगिक सिद्ध किया जा रहा है. मगर उसकी मद्धिम आवाज़ जब एक सामूहिक लय धारण करती है, जब उसका कातर प्रतिरोध अपने पुरस्कार छोड़ने का इकलौता सुलभ विकल्प आज़माता है, तब सत्ता के पांव कांपते हैं और वह उसे अविश्वसनीय साबित करने में जुट जाती है. यह पूछते हुए कि इससे पहले तुमने विरोध क्यों नहीं किया.
 साभार : **
 http://www.satyagrah.com/society-and-culture/writers-always-protest-what-was-wrong/

Jagdish Chander : 
भारत में 1992 से अब तक हजारों पत्रकारों पर जानलेवा हमले किये गये जिनमे से 37 पत्रकारों की निर्मम हत्या कर दी गई।
1- संदीप कोठारी, फ्रीलांस,जबलपुर, मध्य प्रदेश, 21 जून 2015,
2- जगेन्द्र सिंह, फ्रीलांस, उत्तर प्रदेश, शाहजहांपुर, 8 जून 2015,
3- MVN शंकर, आंध्र प्रभा, आंध्र प्रदेश, भारत में 26 नवंबर 2014,
4- तरुण कुमार आचार्य, कनक टीवी, सम्बाद ओडिशा, 27 मई 2014,
5- साई रेड्डी, देशबंधु, बीजापुर जिले, भारत में 6 दिसम्बर 2013,
6- नरेंद्र दाबोलकर, साधना, पुणे, 20 अगस्त 2013,
7- राजेश मिश्रा, मीडिया राज, रीवा, मध्य प्रदेश, 1 मार्च 2012
8- साई रेड्डी, देशबंधु, बीजापुर जिले, 6 दिसम्बर 2013
9- राजेश वर्मा, आईबीएन 7, मुजफ्फरनगर, 7 सितंबर 2013,
10- द्विजमणि सिंह, प्रधानमंत्री समाचार, इम्फाल, 23 दिसम्बर 2012,
11- विजय प्रताप सिंह, इंडियन एक्सप्रेस, इलाहाबाद, 20 जुलाई 2010,
12- विकास रंजन, हिंदुस्तान, रोसेरा, नवंबर 25, 2008
13- जावेद अहमद मीर, चैनल 9, श्रीनगर, 13 अगस्त 2008,
14- अशोक सोढ़ी, डेली एक्सेलसियर, सांबा, 11 मई 2008,
15- मोहम्मद मुसलिमुद्दीन, असोमिया प्रतिदिन, बारपुखरी, 1 अप्रैल, 2008
16- प्रहलाद गोआला, असोमिया खबर, गोलाघाट, 6 जनवरी 2006,
17- आसिया जीलानी, स्वतंत्र, कश्मीर, भारत में 20 अप्रैल 2004,
18- वीरबोइना यादगिरी, आंध्र प्रभा, मेडक, भारत में 21 फ़रवरी 2004,
19- परवेज मोहम्मद सुल्तान, समाचार और फीचर एलायंस, श्रीनगर, 31 जनवरी 2003,
20- राम चंदर छत्रपति, पूरा सच, सिरसा, 21 नवंबर 2002,
21- मूलचंद यादव, फ्रीलांस, झांसी, 30 जुलाई 2001,
22- प्रदीप भाटिया, हिंदुस्तान टाइम्स, श्रीनगर, 10 अगस्त 2000,
23- एस गंगाधर राजू, इनाडू, टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997
24- एस कृष्णा, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,
25- जी राजा शेखर, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,
26- जगदीश बाबू, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,
27- पी श्रीनिवास राव, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,
28- सैदान शफी, दूरदर्शन टीवी, श्रीनगर, 16 मार्च, 1997,
29- अल्ताफ अहमद, दूरदर्शन टीवी, श्रीनगर, 1 जनवरी, 1997,
30- पराग कुमार दास, असोमिया, असम, 17 मई, 1996,
31- गुलाम रसूल शेख, रहनुमा-ए-कश्मीर और केसर टाइम्स, कश्मीर, 10 अप्रैल 1996,
32- मुश्ताक अली, एजेसीं फ्रांस-प्रेस और एशियन न्यूज इंटरनेशनल, श्रीनगर, 10 सितम्बर 1995,
33- गुलाम मोहम्मद लोन, फ्रीलांसर, कंगन, 29 अगस्त 1994,
34- दिनेश पाठक, सन्देश, बड़ौदा, 22 मई 1993,
35- भोला नाथ मासूम, हिंदुस्तान समाचार, राजपुरा, 31 जनवरी 1993
36- एम एल मनचंदा, ऑल इंडिया रेडियो, पटियाला, 18 मई 1992,
37- राम सिंह आजाद आवाज़, डेली अजीत, जालंधर, 3 जनवरी 1992,

Jagdish Chander :

October 20 at 9:17pm · Delhi · Edited · 
देश के साहित्यकारों के द्वारा पुरूस्कार सरकार और अकेडिमियों को वापस लौटाए जा रहे हैं , यह वे लेखक हैं, जो देश के बुद्धिजीवी लेखकों और साहित्यकारों पर हुए हमलों के विरोधस्वरूप, प्राप्त पुरुष्कार जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अकैडिमियों और भारत सरकार द्वारा भिन्न भिन्न समय में उनके द्वारा समाज और राष्ट्र तथा शिक्षा के क्षेत्र के विकास में उनकी लेखनी द्वारा किये गए सहयोग, और उनके उच्च विचारों के एवज में दिए गए हैं, उक्त उपहारों को लौटा कर देश के साहित्यकार , लेखकों , बुद्धिजीवियों, और साहित्यकारों पर कटट्रपंथियों के द्वारा लगातार किये जा रहे हमलों, आक्रमण के विरोधस्वरूप सभी साहित्यकारों से एक जुटता की मांग कर रहे हैं, साहित्यकारों द्वारा सरकार से पानसरे, कलबुर्गी, दावोलकर के हत्यारों की सज़ा की भी मांग की गई है !
यह तो सच है कि विचार कभी मरते नहीं हैं, वे अजर और अमर है, जो लोग साहित्यकारों के उपहार लौटाने के साथ साथ प्राप्त धन को लौटाने की बात कर रहे हैं, वे यह नहीं जानते कि देश और दुनिया के बुद्धिजीवियों, लेखकों, और साहित्यकारों के द्वारा लिखित विचारों के द्वारा जितना नैतिक और आर्थिक सहयोग उनके ज्ञान और बुद्धि से मुखरित विचारों से हुआ है, जिसके एवज में उपहार स्वरुप दिए गए धन की कोई भी मान्यता नहीं , उन साहित्यकारों के विचारों और लिखित ज्ञान से जितना धन सरकार और समाज में आप और हम , सदियों तक कमाएँगे वह धन साहित्यकार और लेखक का ही होगा, ज्ञान और साहित्य पर जिस दिन पेटेंट की मुहर लगने लग जाएगी उस दिन साहित्यकारों के विचारों के वे विरोधी लोग इस शब्द को लिखने की समझ भी नहीं रखेंगे , कि " साहित्यकार पुरुष्कार के साथ साथ तथाकथित प्राप्त धन को भी वापस करें " वह दिन ज्ञान सुनने के एवज में शूद्रों के कानों में पिघला हुआ शीसा उड़ेलने सी बात होगी " या उस दिन अभिब्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध की सी बात होगी, संविधान को गलत ठहराना, बार बार हिंसात्मक कार्यवाहियां करना और हिंसा को लोकतांत्रिक ठहराना, शांति की गलत ब्याख्या करना , ऐसे विचार लम्बे समय तक जीवित नहीं रहते , उम्मीद है कि इस बार भी हम इस घृणित अध्याय को समाप्त कर सकेंगे सम्पूर्ण समाज को पानसरे, कलबुर्गी, दावोलकर के हत्यारों की सज़ा की मांग के साथ एकजुट होना चाहिये .
उधर दुनिया के लगभग १५० देशों के लेखकों और साहित्यकारों और साहित्यक अकैडिमियो ने भी भारत में लेखकों और साहित्यकारों पर हुए हमलों का विरोध किया है और भारत सरकार को विरोधस्वरूप भारतीय लेखकों, साहित्यकारों, द्वारा देश में बढ़ती असहिषुणता के विरोध में पुरुष्कार लौटा रहे लेखकों और कलाकारों के साथ १५० देशों के लेखकों ने एकजुटता दिखाई है , उन्होंने वर्तमान सरकार से अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बेहतर सुरक्षा प्रदान करने की अपील की है ? कनाडा के क्यूबेक शहर में लेखकों के वैश्विक संघ पेन इंटरनेशनल ने भारत सरकार से एम एम कुलबुर्गी , नरेंद्र दाभोलकर और गोविन्द पंसारी के हत्यारों की गिरफ्तारी की भी मांग की है । 
********************************************************************
वस्तुतः साहित्य समाज का 'दर्पण' होता है। आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी के अनुसार साहित्य में वह शक्ति छिपी रहती है जो तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। तोप, तलवार और बम 
अतः जो लोग साहित्यकारों के पुरस्कार  वापसी के विरोधी हैं वे भीरु व कायर ही हैं। 

संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 29 October 2015

सही वक्त पर एंट्री और एग्ज़िट करते थे जुगल किशोर --- - वीर विनोद छाबड़ा

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
******


Vir Vinod Chhabra.
28-10-2015  at 11:01am · 
ज़िंदगी के मंच से रांग एग्ज़िट मार गए जुगल किशोर! 
- वीर विनोद छाबड़ा 
२५ अक्टूबर की शाम बहुत ग़मगीन थी। दिवंगत साथी जुगल किशोर को याद करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लखनऊ के तमाम सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और साहित्यकार और उनसे सरोकार रखने वाले भारतेंदु नाट्य अकादेमी में जुटे थे। जुगल के अकस्मात् चले से जाने से हर शख़्स शोक में डूबा था। 
संचालन करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महसचिव राकेश भी आंसू नहीं रोक पा रहे थे। आज वो व्यवस्थित नहीं थे। वो बता रहे थे - कल तक जो सामने था आज नेपथ्य में चला गया है। पिछले ४० साल में मैंने उसमें एक बहुत अच्छे अभिनेता, निर्देशक, प्रशिक्षक, लेखक और इंसान के रूप में देखा। 
जुगल को नाटक का ककहरा पढ़ाने वाले सुप्रसिद्ध वरिष्ठ प्रशिक्षक और रंगकर्मी राज बिसारिया ने कहा - वो मेरा बच्चा था। महबूब था। बरसों पहले इंटर पास एक दुबले-पतले नौजवान के रूप में भरपूर स्प्रिट के साथ आया था। उसकी स्प्रिट को सलाम। उसकी मसखरी का पात्र हमेशा मैं रहा। जो जितना दूर जाता है उतना ही पास रहता है। दुःख-दर्द बहुत गहरा होता है। उसकी ज़ुबान नहीं होती। आज का दिन रोने का नहीं, जश्न मनाने है। उसकी याद में खुद को मज़बूत करने का है। नाटक करो। यह ज़िंदगी का आईना है। अपने दौर में जुगल जितना कर गया, उसे मैं सलाम करता हूं। अपने फ़न से वो सबको हराता रहा, लेकिन खुद मौत से हार गया। जुगल हमारी सांसो में रहेगा। 
सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव की नज़र में रंगकर्म समाज का आईना है और जुगल ने इस सरोकार से सदैव रिश्ता बनाये रखा। इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जीवंत रिश्ता रखा। साहित्य से बहुत गहरा जुड़ाव रहा उनका। सदैव संभावना खोजा करते थे कि अमूक साहित्यिक कृति का नाट्य रूपांतरण कैसे तैयार किया जाये। खुद को समृद्ध करने के लिए साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मौजूद रहते। सिनेमा में जाने के बावजूद वो रंगमंच से प्रतिबद्ध रहे। संस्कृति के लिए आज का समय बहुत ख़राब है। ऐसे में एक बहुत अच्छे साथी का चले जाना बहुत ही कष्टप्रद है। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने कहा - अभी तक सुना था कि मौत बहुत बेरहम होती है। चुपके से आती है। लेकिन आज देख भी लिया। सुबह उसने संगीत नाटक अकादमी का ईनाम मिलने की मुबारक़बाद दी और शाम को रुला दिया। जुगल का जाना रंगमंच की क्षति है, समाज की भी क्षति है। उसके साथ कई नाटकों में काम किया। हंसी मज़ाक और गप्पें मारना बहुत अच्छा लगता था। यह संयोग है कि वो नाटकों में मौत का बहुत शानदार अभिनय करता रहा। उसका जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। मैंने एक दोस्त खोया है। 
वरिष्ठ रंगकर्मी आतमजीत सिंह ने बताया - जुगल का जाना एक दर्दभरी घटना है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई गंभीर रंगमंच चल रहा है। वो बड़ा स्तंभ था। उनका स्थान किसी के लिए लेना मुश्किल है। जुगल को याद करने का तरीका यही होगा कि नाटक चलता रहे। 
सुप्रसिद्ध लेखक-कवि नलिन रंजन सिंह ने बताया कि बहुत नज़दीकी रिश्ता था जुगल से। एक हंसता हुआ चेहरा। ज़िंदादिल इंसान थे वो। जब भी मिले, नए लोगों को रंगमंच से जोड़ने की संभावनाएं हमेशा तलाशते हुए। चिंतित रहते थे कि नई पीढ़ी रंगमंच के दायित्व का कैसे निर्वहन करेगी। ज़रुरत है कि उनकी चेतना से जुड़ कर या वैचारिक रूप से या लेखन के माध्यम से आगे बढ़ाया जाये। 
अलग दुनिया के केके वत्स ने बताया - सिनेमा से जुड़ने के बावजूद जुगल ने लखनऊ नहीं छोड़ा। याद नहीं आता कि उनका किसी से कोई मतभेद रहा हो। जुगल की याद में प्रत्येक वर्ष २५ हज़ार का एक पुरुस्कार मंच पर सामने या नेपथ्य में शानदार काम करने केलिए दिया जाएगा। इसकी शुरुआत उनके जन्मदिन २५ फरवरी से होगी। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ अभिनेता अरुण त्रिवेदी का कहना था - मेरा जुगल से पिछले ३५-३६ साल से दिन-रात का साथ रहा। हम भारतेंदु नाट्य अकादमी में लगभग एकसाथ आये। रंगमंच से जुड़ी अनेक व्याधियों और कष्टों को एकजुटता से झेला। स्टेज ही नहीं बाहर भी हम एकसाथ रहे। प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद हमने अकादमी की प्रस्तुतियों पर कोई आंच नहीं आने दी, उसकी शान को कभी धूमिल नहीं होने दिया। जुगल अपनी स्टाईल में बिना बताये और बिना किसी से सेवा कराये, चुपके से बहुत दूर चले गए। 
तरुण राज ने कहा - जो रोज़ मिलते हैं, वो दिल में समा जाते हैं। पिछले हफ़ते ही जुगल ने कहा था, बहुत साल हो चुके हैं अब बैठकें नहीं होतीं। इस सिलसिले को फिर से क़ायम किया जाये। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी वेदा राकेश ने कहा - बहुत पुराना साथ है जुगल से। उन दिनों रंगमंच के काम से जब भी कहीं जाना होता था तो जुगल अपनी साईकिल लिये हाज़िर मिलते। वो हीरो हुआ करते हम लोगों के। बहुत चंचल और शैतान थे। अपने साथियों का बहुत ख्याल रखते थे वो। यह गुण उनकी आदतों में शामिल थे। मैं उनकी मुस्कान, उसके खुशनुमा चेहरे और बोलती आंखों को याद करते रहना चाहूंगी। 
वरिष्ठ रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज ने कहा - मुश्किल ही नहीं बहुत मुश्किल है जुगल के बारे में बात करना। वो बहुत अच्छा नहीं, बहुत ख़राब एक्टर था। बिना बताये चला गया। जिस तरीके से गया, वो तो बहुत ही ख़राब था। गज़ब का परफेक्शनिस्ट एक्टर था वो। अपने से बहुत प्यार करता था। शायद इसलिये भी बहुत अच्छा एक्टर था। जितनी देर काम करता था अपने पर बहुत ध्यान देता रहा। हर एक्ट के बाद पूछता था, कैसा रहा? हमें जब भी किसी कार्यक्रम में जाना होता था तो जुगल को फ़ोन करते थे कि पहुंच रहे हो न। लेकिन आज तो उसी की याद में आना था। कोई फ़ोन नहीं कर पाये। 
वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप घोष ने बताया - मैं पिछले ४० साल से जानता था जुगल को। बंदे में बहुत दम था। उसकी सोच बहुत बड़ी थी। मैंने उसे बहुत अच्छी एक्टिंग करते हुए देखा है। बहुत कम होते ऐसे एक्टर। 
युवा रंगकर्मी और समाजसेवी दीपक कबीर ने बताया - बहुत कुछ सीखा है मैंने जुगलजी से। नाटक को लेकर बहुत चिंतित देखा है उनको। सेलेब्रटी होने के बावजूद उनमें ईगो नहीं था। कहीं भी बैठ जाते। सादगी की मिसाल थे वो। सामजिक कार्यकर्ता भी थे वो। इसीलिए कार्यक्रमों में उनको अक्सर बुलाया जाता था। लेकिन वो बोलने के इच्छुक कतई नहीं रहे। एक दिन बोले, आजकल हम कंडोलेंस बहुत करते हैं। क्या यही करते रहेंगे ज़िंदगी भर? 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना ने बताया - जुगल बहुत पुराने साथी थे उनके। ज़बरदस्त पोटेंशियल था उनमें। जब पहली बार देखा तो हम तभी समझ गए थे कि लंबी रेस का घोड़ा हैं जुगल। परकाया में घुस कर एक्टिंग करते थे वो। वो अक्सर कहा करते थे कि लोग एक्टिंग करना चाहते हैं, पढ़ना नहीं चाहते हैं। मैंने उनके हाथ में हमेशा कोई न कोई किताब देखी। वो किसी भी विषय से संबंधित होती थी। उनकी टाईमिंग गज़ब की थी, लेकिन यह आख़िरी वाली टाईमिंग बिलकुल पसंद नहीं आई। 
वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल सिन्हा ने बताया - जुगल अक्सर फ़ोन करते थे। बहुत लंबी लंबी बातें होती थीं। साथ-साथ उठना-बैठना बहुत रहा। लेकिन हमने नाटक साथ-साथ नहीं किया था। एक दिन फ़ोन आया कि एक रोल है। मैं सकुचाया। जुगल ज़बरदस्त ही एक्टर ही नहीं, प्रशिक्षक भी थे। मेरी अपनी सीमायें थीं। डर लगाकि मैं उन्हें संतुष्ट नहीं करा पाया तो? खुद को जुगल के सामने एक्सपोज़ नहीं करना चाहता था। लेकिन जुगल ने मुझे सहज कर दिया। पिछले दो-तीन महीने से मैं जुगल के संपर्क में नहीं था। मुझे इसका ताउम्र मलाल रहेगा। 
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी चित्रा मोहन ने कहा - जुगल की ढेर यादें हैं। जब वो अंदर ही अंदर बहुत भर जाते थे तो एकदम से फट पड़ते थे। घंटा-डेढ़ घंटा लगातार बोलते रहते। ऐसी-वैसी ढेर बातें कर जाते। बहुत पसेज़िव थे वो। मंच पर हमेशा सही वक्त पर एंट्री और एग्ज़िट करते थे। लेकिन ज़िंदगी के मंच पर रांग एग्ज़िट कर गए।
---

२८-१०-२०१५
https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1689171241316498?pnref=story

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

बीजेपी दलित, पिछड़ा आरक्षण के विरोध का नेतृत्व करती रही है --- प्रीतमजी



Pritam Jee
29-10-2015  Edited ·
नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के इस चुनावी पिछड़ा प्रेम को समझने के लिए गुजरात के बारे में समझ लेना आवश्यक होगा. गुजरात में जब दलित आरक्षण लागू किया गया था तो उस वक़्त ब्राह्मण, पाटीदार और बनिया वर्ग का ज़बरदस्त विरोध सामने आया जिसने बाद में 1981 में दलित विरोधी आंदोलन का रूप लिया और बीजेपी ने इस दलित विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व किया था.
इस दलित विरोधी आन्दोलन ने दंगों की शक्ल अख्तियार की और गुजरात के 19 में से 18 जिलों में दलितों को निशाना बनाया गया. इन दंगों में मुस्लिमों ने दलितों को आश्रय दिया और उनकी मदद भी की. वास्तव में दलित, पिछड़ा और आदिवासी गुजरात की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या बनाते हैं.
इसी को अपने साथ मिलाकर 1980 में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की थी. यह गठजोड़ जिसे अंग्रेजी के खाम यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम कहा जाता है, ने पहली बार ब्राह्मण और पाटीदारों को सत्ता के केंद्र से दूर कर दिया.
हालांकि इसके ठीक बाद बीजेपी ने 1980 में अपने कट्टर हिन्दुत्ववादी एजेंडे पर काम करना शुरू किया और आडवानी की रथ यात्रा ने उस प्रक्रिया को तेज़ किया, जिसमें सवर्ण और उच्च जाति के लोगों ने सत्ता से दूर होने के आधार पर एकजुट होकर आरक्षण विरोधी आन्दोलन को चलाया. साथ ही इसने गुजरात के भगवाकरण के लिए भी परिस्थितियां पैदा की.
1980 में कांग्रेस की जीत के बाद बीजेपी ने दलित विरोधी रणनीति में परिवर्तन कर इसे सांप्रदायिक रंग दिया और अब निचली जाति के दलित, आदिवासी समूह को मुस्लिमों के विरुद्ध खड़ा किया. इसी कारण 1981 में आरक्षण विरोधी आन्दोलन ने 1985 में सांप्रदायिक हिंसा का रूप धारण कर लिया और इसे आडवानी ने अपनी रथयात्रा से और भी उन्मादी और हिंसक बनाया. 1990 में जब आडवानी रथ यात्रा के ज़रिए देश में जहर घोल रहे थे, उस वक़्त गुजरात में उनके सिपहसलार नरेन्द्र मोदी थे जो गुजरात बीजेपी महासचिव थे.
बीजेपी न केवल दलित, पिछड़ा आरक्षण के विरोध का नेतृत्व करती रही है, बल्कि सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार ने गुजरात में इस आरक्षण के लाभ को भी सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग से रोका है. ‪#‎आरक्षण‬
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=778207368971928&id=100003480153767


 संकलन-विजय माथुर

Wednesday, 21 October 2015

सहज ही अपना बनाने की कला में सबसे आगे बिहार वाले --- -- -वीर विनोद छाबड़ा

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
***




Vir Vinod Chhabra
20-10-2015 
सहज ही अपना बनाने की कला में सबसे आगे बिहार वाले। 
-वीर विनोद छाबड़ा 
कुछ देर पहले मेरे मित्र विजयराज बली  माथुर ने ईटीवी बिहार के हवाले से पोस्ट डाली है कि बिहार की एक रैली में अपेक्षित भीड़ नहीं जुटी। इससे खिसिया कर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बिहारियों को बेवकूफ़ कह डाला।
इस बयान का नफ़ा-नुक्सान कितना होगा यह तो चुनाव पंडित जानें। लेकिन मुझे बिहारियों को बेवकूफ कहने पर दिली तकलीफ़ हुई। मुझे तो लगता है बिहारियों से ज्यादा चतुर कोई और है ही नहीं। सत्तर के शुरुआती दशक में लखनऊ यूनिवर्सिटी में मेरा कई बिहारी छात्रों से साबका पड़ा। सबसे ज्यादा मुझे आकर्षित किया इनकी भोजपुरी भाषा ने। शीरीं ज़बान। इतनी मिठास तो उर्दू बोलने वाले भी नहीं घोल सके। दो बिहारियों को बोलते हुए सुनता था तो कभी मन नहीं हुआ कि ये चुप हों।
भोजपुरी का मैं सबसे पहली बार तब क़ायल हुआ जब १९६२ में 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' देखी थी। वो स्कूली दिन थे। उसके बाद कई भोजपुरी फ़िल्में देखीं। लेकिन पहली बार 'भोजपुरी लाईव' लखनऊ यूनिवर्सिटी में ही सुनी।
मैं इंदिरा नगर में अस्सी के दशक की शुरुआत में ही आ गया था। यह इलाका तब निर्मित हो रहा था। एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी कहा गया था तब इसे। साठ प्रतिशत श्रमिक बिहार के सासाराम आदि क्षेत्रों से ही संबंधित थे। मेरा घर बनाने वाले भी बिहार के थे। बगल में गोमती नगर भी इन्हीं बिहारियों की मेहनत से बना।
नौकरी शुरू की तो वहां भी बिहार से आये कर्मचारियों की खासी संख्या थी। अपने अड़ोस-पड़ोस में भी खासी संख्या में हैं। सब स्थाई निवासी हो गए हैं यहां के। मेरे पड़ोसी सासाराम से हैं। अपने घर का नाम भी सासाराम निवास रखे हैं। मैंने इनमें एक विशेषता देखी है कि किसी को सहज ही 'विधिवत' अपना बना लेते हैं। व्यवहार से भी और ज़बान से भी। इस मामले में पंजाबियों से ये निश्चित ही बीस हैं।
आप अगर उनके मित्र हैं तो संकट के समय दीवार बन जायेंगे। लड़ने-भिड़ने के साथ-साथ ज़रूरत पड़ने पर जान भी दे देंगे। मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, लेकिन सुनी हुई बात है कि बिहार के लोग हिसाब-किताब में बहुत तेज होते हैं। कभी कहा जाता था कि आईएएस में बिहार के लोग ही ज्यादा हुआ करते थे। और इसके अलावा साहित्यिक पुस्तकें और पत्र-पत्रिकायें यहीं खरीदी और पढ़ी जाती थीं। सैकड़ों साल पहले शिक्षा का केंद्र यहीं नालंदा में ही तो था। कूटनीति सिखाने वाले चाणक्य की जन्मभूमि और कर्मभूमि बिहार ही तो है। यहीं के कौटिल्य ने ही अर्थशास्त्र पढ़ाया है। गणित के मर्मज्ञ आर्यभट्ट को भला कौन भूल सकता है।
यह बिहार ही है जहां बोलचाल में सबसे ज्यादा अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग होता है। दिवंगत शरद जोशी भी कह गए हैं कि अंग्रेज़ कौम और अंग्रेज़ी अगर ख़त्म भी हो जाए तो भी कब्र में लेटी अंग्रेज़ों की आत्मा को यह सुख रहेगा कि अंग्रेज़ी बिहार में ज़िंदा है। और फिर क्रांतियों का जनक तो बिहार रहा ही है। कई बार रथों के रास्ते भी रोके हैं और बदले हैं इसने।
यूं एनडीटीवी के रवीश के प्राईम टाईम को देखते हुए लगता है मैं उसे देख नहीं रहा हूं उनके साथ बिहार घूम रहा हूं। आदमी चाहे छोटा हो या बड़ा, ये बिहार वाले जहां भी जाते हैं, अपनी हाड़-तोड़ मेहनत और बौद्धिकता से उस प्रदेश और उस देश के नमक का हक़ ज़रूर अदा करते हैं। 

---
२०-१०-२०१५


https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1687131944853761



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 19 October 2015

क्यों ये हमको उलझाए रखना चाहते हैं --- अरुण सेठी

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) :
**

Arun Sethi 
18-10-2015 at 3:07pm
ज़रा गौर करिये. मालूम हो तो ठीक, नी तो पढ़िये समझीये. पीछे क्या चल रहा है देश में. क्यों ये खट्टर-पट्टर रोज हमको उलझाए रखना चाहते हैं.
खबर है जिस अमरीका की हम कसमें खाते हैं. उस अमरीका के कुछ लोगों ने ब्रिटेन की महारानी को लिखा है कि आप हमारे देश को अपने हाथ में ले लो. ये सच है आज अमरीका वो अमेरिका नहीं रहा है. आज के अमरीका के बारे में हिलेरी क्लिंटन ने दो साल पहले बोला था. चुनाव लड़ते नेता हैं लेकिन लड़वाते धन-माफिया हैं. रशिया ने हफ्ते भर में बता दिया कि ड्रग, आतंक, केमिकल के खिलाफ जो इराक, अफगान, सीरिया ओमान में हुआ उसके पीछे क्या था. अमरीका में आज तक क़ानून व्यवस्था कोर्ट चुस्त-दुरुस्त है. इसलिए दिखता नहीं है वरना वही सब कुछ हो रहा है. जो हमारे देश में आज बेखौफ खुल्लम-खुल्ला चल रहा है.
मेरी इनसे कोई पुश्तैनी दुश्मनी नहीं, ना इन्होंने कभी मेरे घर पर पत्थर फेंके, ना ये कोई मेरे बाजूवाले केमिस्ट से दवा लेते. ज़रा समझने की कोशिश करो.
इनकी जिद है. दुनियां में सिर्फ दो रहे. इम्प्लायर एंड इम्प्लाई, सेलर एंड बायर... बस. कोई किसान नहीं, कोई दुकानदार नहीं. जमीं इनकी, खेत इनके, दुकान इनकी, पानी इनका, नदी इनकी, पहाड़ इनका, बिजली इनकी, पेट्रोल इनका, गेस इनकी, रेल इनकी और सरकार भी इनकी. सब इनका
खबर है पानी में करोड़ों कमाए.. श्याम बिहारी अग्रवाल कांट्रेक्टर “रेल नीर” नें रेलवे में दस साल में पानी पिलाकर करोड़ों कमाए. घर में नोटों से भरी पेटियां ही पेटियां मिली है.
शायद इसीलिए रेल्वे मंत्री सुरेश प्रभु ने तीन दिन पहले कहा था. देश में रेल चलाना बहुत मुश्किल है. मतलब अब तो अदानी या अंबानी ही चला सकते है.
कुछ दिन पहले रेल्वे का डीजल का ठेका सरकार ने अंबानी को दे दिया कल पॉवर सप्लाई का ठेका अदानी को दे दिया. आप देखीये हमारे पैसों से खड़ी रेल हमारा देश, हमारा कोयले की खदानें, गेस की खदान, हमारी निकालने वाली ONGC, COAL INDIA, हमारी नेशनल थर्मल पॉवर, और सरकार डीजल और बिजली अंबानी और अदानी से लेगी. इन लोगों ने देश की कमाऊ पूत कंपनियों को पिछले दस-पन्द्रह सालों में सिस्टमेटिकली बरबाद किया फिर इनको तबाह किया. ताकि इन्हें बेचा और सस्ते में बेचा जा सके और ये ही इनके सब अदानी अंबानी खरीद कर हमको लूटें
आज की एक और खुश खबर :
उत्तर मध्य रेलवे ने चुनिंदा स्टेशनों को जिसमे आगरा ,इलाहबाद ,कानपूर से लेकर मुरैना ,और उरई तक शामिल रहेंगे ,को हवाई-अड्डों जैसी सुविधाएँ देने का प्लान बनाया है ! ये स्टेशन 45 साल के लिए लीज पर दिए जाएंगे ,ये सुविधाएँ वे देंगे जो स्टेशन को लीज पर लेंगे! ये सब बेवक़ूफ़ बनने के धंधे हैं ये कुछ नहीं देंगे. पानी साफ़, स्वच्छ मिलेगा पर क्या मिल रहा है पूछो खंडवावासियों से
शहडोल नगर में रिलायंस की तमाम मशीनें घूम रही हैं शहर आबादी के बीचों-बीच मीथेन गेस के लिए ड्रिलिंग हो रही है. धूल, धुंआ, आवाज शोर, गेस की स्मेल, आग की वजह से लोगों का जीना दूभर हो गया है कंपन और आग के कारण लोग दहशत में हैं लेकिन कोई नेता, कोई कलेक्टर, कोई पुलीस आफिसर की हिम्मत नहीं कि चुन भी कर ले क्यों...क्योंकि कंपनी विकास के पापा की जो है
दोस्तों गर आप बिजनेसमेन हो तो बैंक से ली लिमिट पर आपको 12.30 से 12.70% रेट ऑफ इंटरेस्ट चार्ज होता है किसानों की तो हर तरफ से मरण है उनको 16% लेकिन कार पर 10% रेडूय्सींग. क्यों? क्योंकि कार बनाने वाला हमको पलका के कर्जे में करने वाला देश पर अहसान कर रहा है. इसलिए अम्बानियों को अदानियों को कर्जे मे, इंटरेस्ट में, टेक्स में, जमीनों में सरकार छूट देती है और नुक्सान हो जाये तो हमारे से टेक्स में वसूले पैसों से उनके नुक्सान की भरपाई करती है.
ये है इनके सबका साथ; सबका विकास का नारा 
अब सब में कौन-कौन हैं. ये आप समझ सकते हो. और विकास तो देख ही रहे है किस किस का हो रहा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड नें इस साल रिकार्ड कमाई करी पहली बार पर गेलन क्रूड से पेट्रोल निकालने में ऐसी भारी कमाई हुई है. लेकिन पेट्रोल डीजल वहीँ खड़े हैं या बड रहे हैं. बाजार, किरसान रो रहा है ये हंस रहे हैं.


संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 18 October 2015

आज़ादी और विवेक के पक्ष में : -- कौशल किशोर


Kaushal Kishor
17-10-2015 
प्रिय मित्र,
पांच लेखक-संगठनों -- प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद -- ने दिल्ली में बैठक कर लेखकों की ओर से जारी प्रतिरोध पर एक साझा बयान जारी किया है, साथ ही इस महीने की 20 और 23 तारीख के लिए साझा कार्यक्रम भी तय किये हैं. आप यह बयान और कार्यक्रम की घोषणा देख सकते हैं. -- कौशल किशोर, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच , उत्तर प्रदेश
आज़ादी और विवेक के पक्ष में :
प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद का साझा बयान
और आगामी कार्यक्रमों की सूचना
देश में लगातार बढ़ती हुई हिंसक असहिष्णुता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ पिछले कुछ समय से जारी लेखकों के प्रतिरोध ने एक ऐतिहासिक रूप ले लिया है. 31 अगस्त को प्रोफेसर मल्लेशप्पा मादिवलप्पा कलबुर्गी की हत्या के बाद यह प्रतिरोध अनेक रूपों में प्रकट हुआ है. धरने-प्रदर्शन, विरोध-मार्च और विरोध-सभाएं जारी हैं. इनके अलावा बड़ी संख्या में लेखकों ने साहित्य अकादमी से मिले अपने पुरस्कार विरोधस्वरूप लौटा दिए हैं. कइयों ने अकादमी की कार्यकारिणी से इस्तीफ़ा दिया है. कुछ ने विरोध-पत्र लिखे हैं. कई और लेखकों ने वक्तव्य दे कर और दीगर तरीक़ों से इस प्रतिरोध में शिरकत की है.
दिल्ली में 5 सितम्बर को 35 संगठनों की सम्मिलित कार्रवाई के रूप में प्रो. कलबुर्गी को याद करते हुए जंतर-मंतर पर एक बड़ी प्रतिरोध-सभा हुई थी. इसे ‘विवेक के हक़ में’ / ‘इन डिफेन्स ऑफ़ रैशनैलिटी’ नाम दिया गया था. आयोजन में भागीदार लेखक-संगठनों – प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद -- ने उसी सिलसिले को आगे बढाते हुए 16 सितम्बर को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उनसे यह मांग की गयी थी कि अकादमी प्रो. कलबुर्गी की याद में दिल्ली में शोक-सभा आयोजित करे. विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान, रेखा अवस्थी, अली जावेद, संजय जोशी और कर्मशील भारती द्वारा अकादमी के अध्यक्ष से मिल कर किये गए इस निवेदन का उत्तर बहुत निराशाजनक था. एक स्वायत्त संस्था के पदाधिकारी सत्ता में बैठे लोगों के खौफ़ को इस रूप में व्यक्त करेंगे और शोक-सभा से साफ़ इनकार कर देंगे, यह अप्रत्याशित तो नहीं, पर अत्यंत दुखद था. अब जबकि अकादमी की इस कायर चुप्पी और केन्द्रीय सत्ता द्वारा हिंसक कट्टरपंथियों को प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीके से दिए जा रहे प्रोत्साहन के खिलाफ लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाने से लेकर त्यागपत्र और सार्वजनिक बयान देने जैसी कार्रवाइयां लगातार जारी हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि लेखक समाज इन फ़ासीवादी रुझानों के विरोध में एकजुट है. वह उस राजनीतिक वातावरण के ख़िलाफ़ दृढ़ता से अपना मत प्रकट कर रहा है जिसमें बहुसंख्यावाद के नाम पर न केवल वैचारिक असहमति को, बल्कि जीवनशैली की विविधता तक को हिंसा के ज़रिये कुचल देने के इरादों और कार्रवाइयों को ‘सामान्य’ मान लिया गया है.
विरोध की स्वतःस्फूर्तता और व्यापकता से साफ़ ज़ाहिर है कि इस विरोध के पीछे निजी उद्देश्य और साहित्यिक ख़ेमेबाज़ियाँ नहीं हैं, भले ही केन्द्रीय संस्कृति मंत्री ऐसा आभास देने की कोशिश कर रहे हों. इस विरोध के अखिल भारतीय आवेग को देखते हुए मंत्री का यह आरोप भी हास्यस्पद सिद्ध होता है कि विरोध करने वाले सभी लेखक एक ही विचारधारा से प्रेरित हैं, कि वे सरकार को अस्थिर करने की साज़िश में शामिल हैं. सब से दुर्भाग्यपूर्ण है उनका यह कहना कि लेखक लिखना छोड़ दें, फिर देखेंगे. लेखक लिखना छोड़ दें -- यही तो दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के हत्यारे भी चाहते हैं. केंद्र सरकार इन हत्याओं की निंदा नहीं करती, लेकिन प्रतिरोध करने वाले लेखकों की निंदा करने में तत्पर है. इससे यह भी सिद्ध होता है कि मौजूदा राजनीतिक निज़ाम के बारे में लेखकों के संशय निराधार नहीं हैं. ये वही संस्कृति मंत्री हैं, जिन्होंने दादरी की घटना के बाद हत्यारी भीड़ को चरित्र का प्रमाणपत्र इस आधार पर दिया था कि उसने हत्या करते हुए शालीनता बरती थी और एक सत्रह साल की लडकी को छुआ तक नहीं था. लम्बे अंतराल के बाद, स्वयं राष्ट्रपति के हस्तक्षेप करने पर, प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी भी तो उसमें उत्पीड़क और पीड़ित की शिनाख्त नहीं थी. उसमें सबके लिए शांति के उपदेश के सिवा और कुछ न था. सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष बिहार के चुनावों के दौरान लगातार बयान दे रहे हैं कि दादरी के तनाव का असली कारण पुलिस की 'एकतरफ़ा' कार्रवाई है. यह सुनियोजित भीड़ द्वारा की गयी हत्या के लिए मृतक को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं तो और क्या है!
लेखकों ने बार बार कहा है कि उनका विरोध किसी एक घटना या एक संस्था या एक पार्टी के प्रति नहीं है. उनका विरोध उस राजनीतिक वातावरण से है जिसमें लेखकों को, और अल्पसंख्यकों तथा दलितों समेत समाज के सभी कमज़ोर तबकों को, लगातार धमकियां दी जाती हैं, उन पर हमले किए जाते हैं, उनकी हत्या की जाती है और सत्तातंत्र रहस्यमय चुप्पी साधे बैठा रहता है. कुछ ही समय पहले तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन को इन्हीं परिस्थितियों में विवश हो कर अपनी लेखकीय आत्महत्या की घोषणा करनी पड़ी थी. ऐसे में साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है कि वे आगे आयें और नागरिक आज़ादियों के दमन के इस वातावरण के विरुद्ध पहलक़दमी लें. हम लेखक-संगठन लेखकों के इस विरोध अभियान के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं. हम साहित्य अकादमी से मांग करते हैं कि वह न केवल इस दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण की कठोर निंदा करे, बल्कि उसे बदलने के लिए देश भर के लेखकों के सहयोग से कुछ ठोस पहलकदमियां भी ले.
लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के इस विरोध की एकजुटता को अधिक ठोस शक्ल देने के लिए हमने आनेवाली 20 तारीख को ‘आज़ादी और विवेक के हक़ में प्रतिरोध-सभा’ करने का फ़ैसला किया है. प्रतिरोध-सभा उस दिन अपराह्न 3 बजे से प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के सभागार में होगी. 23 तारीख को, जिस दिन साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी की बैठक है, हम बड़ी संख्या में श्रीराम सेन्टर, सफ़दर हाशमी मार्ग से रवीन्द्र भवन तक एक मौन जुलूस निकालेंगे और वहाँ बैठक में शामिल होने आये सदस्यों को अपना ज्ञापन सौंपेंगे, ताकि अकादमी की कार्यकारिणी मौजूदा सूरते-हाल पर एक न्यायसंगत नज़रिए और प्रस्ताव के साथ सामने आये.
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (जनवादी लेखक संघ)
अली जावेद (प्रगतिशील लेखक संघ)
अशोक भौमिक (जन संस्कृति मंच)
हीरालाल राजस्थानी (दलित लेखक संघ)
अनीता भारती (साहित्य संवाद)

Thursday, 15 October 2015

बाल वीरांगना मुद्दू तीर्थाहल्ली ने पुरस्कार वापिस कर दिग्गजों को पछाड़ा

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 



http://navbharattimes.indiatimes.com/state/other-states/other-cities/class-11-girl-to-return-karnataka-literary-award/articleshow/49346597.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral&utm_campaign=Award141015

नवोदित साहित्यकार  11 वीं कक्षा की छात्रा  मुद्दू तीर्थाहल्ली ने  इन चर्चाओं के बीच कि  पुरस्कार वापसी व्यर्थ है बेझिझक साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटा कर अपने ' शौर्य  ' को दिखा दिया है। अब बुज़ुर्गों को इस बालिका से प्रेरणा लेकर इस अभियान में आगे आना चाहिए। 


(संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश)

मुलायम का बयान साफ करता है कि वे हैं आरएसएस के एजेंट --- मोहम्मद शोएब

केंद्र सरकार के इशारे पर मानवाधिकार आयोग सदमे से मरे किसान की मौत को
बता रहा स्वाभाविक मौत- रिहाई मंच

बिना किसान के घर गए मानवाधिकार आयोग ने लगा दी रिपोर्ट
मुलायम का बयान साफ करता है कि वे हैं आरएसएस के एजेंट
मैनपुरी के मुस्लिम विरोधी हिंसा के मास्टरमाइंड संजीव यादव का सपा से
निलम्बन न होना मुलायम के बयान को सही साबित करता है
दलितों और मुसलमानों के हत्यारे रणवीर सेना के संस्थापक के बेटे को बिहार
में सपा द्वारा चुनाव लड़ाना शर्मनाक


लखनऊ 14 अक्टूबर 2015। रिहाई मंच ने केंद्र सरकार पर किसान विरोधी होने
का आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार किसानों की आत्महत्या के मामलों की
जांच में लीपा-पोती में लिप्त है और किसानों की फसल बर्बाद हो जाने के
बाद हुई मौतों को प्राकृतिक साबित करने पर तुली हुई है। मंच ने बिहार
चुनाव में बिहार के सैकड़ों दलितों और मुसलमानों के हत्यारे रणवीर सेना
के संस्थापक बरमेश्वर मुखिया के बेटे इंदू भूषण सिंह को सपा द्वारा तरारी
विधान सभा सीट से चुनाव लड़ाने को सपा के दलित और मुसलमान विरोधी राजनीति
का ताजा उदाहरण बताया है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के नेता राजीव यादव ने
कहा है कि 14 अप्रैल 2014 को आजमगढ़ के पल्हनी ब्लाक के सराय सादी गांव
के किसान रामजन्म राजभर की तुफान और ओला वृष्टि के कारण फसल नुकसान होने
पर सदमे से हुई मौत पर केंद्र सरकार अधिकारीयों से झूठे रिपोर्ट लगवा रही
है कि किसान की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। उन्होंने बताया कि इस घटना
पर रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम द्वारा सवाल उठाने पर राष्ट्रीय
मानवाधिकार आयोग द्वारा इसकी जांच कृष्ण कांत नामक अधिकारी से कराई और
संगठन को अपनी रिपोर्ट भी भेजी है। जिसमें मौत को प्राकृतिक बताई गई है।
राजीव यादव ने कहा कि रिपोर्ट आ जाने के बाद जब इंसाफ मुहिम के तहत
किसानों की बदहाली का सवाल उठाने वाले मसीहुद्दीन संजरी के नेतृत्व में
विनोद यादव, अनिल यादव और तारिक शफीक ने पीडि़त परिवार के घर का दौरा
किया तो पीडि़त परिवार के लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि यहां तो कोई
भी जांच करने आया ही नहीं था तो रिपोर्ट कैसे लगा दी गई। उन्होंने सवाल
उठाया कि किसान रामजनम की मौत के बाद स्थानीय मजिस्ट्रेट के कोश से दो
लाख रुपए की लिखित आर्थिक सहायता का आश्वासन देने के बावजूद आज तक अखिलेश
यादव सरकार द्वारा सहायता न देना सरकार के किसानों को ठगने की नीति को
उजागर करता है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने मुलायम सिंह के इस बयान कि सपा और
भाजपा की विचारधारा देशभक्ति के सवाल पर बिल्कुल एक जैसी है को मुलायम
सिंह द्वारा सच्चे दिल से दिया गया बयान बताया है। उन्होंने कहा कि उम्र
के इस पड़ाव पर जो सच उन्होंने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है उसको
जनता पहले से जानती है कि वे संघ परिवार के एजंेट हैं और इसीलिए बाबरी
मस्जिद को तोड़ने और मुसलमानों की हत्याओं को देशभक्ति बताने वाले भाजपा
नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी को उनकी पिछली
सरकार ने रायबरेली कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि इन तीनों की बाबरी
मस्जिद ढ़हाने में कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को
राष्ट्रविरोधी मानने और उनके कत्लेआम को देशभक्ति बताने वाली संघ परिवार
की विचारधारा में यकीन रखने के कारण ही शायद उन्होंने कानपुर में हुई
मुस्लिम विरोधी हिंसा के मास्टरमाइंड रहे तत्कालीन एसएसपी एसी शर्मा
जिनकी उस घटना में संल्पितता की जांच के लिए जस्टिस माथुर कमीशन बनाया
गया था कि रिपोर्ट को उन्होंने लगातार सिर्फ दबाए ही नहीं रखा बल्कि
कानपुर के मुसलमानों के इस हत्यारे को डीजीपी भी बना दिया।

रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि पिछले दिनों मैनपुरी के तीनी करहाल इलाके
में गोकशी के झूठे अफवाह के बाद हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में मुख्य
भूमिका निभाने वाले नगर पंचायत अध्यक्ष और सपा नेता संजीव यादव का अभी तक
सपा से निलम्बन न होना और पुलिस की तहरीर में सपा नेता के भाई टीटू
द्वारा किरोसिन तेल और डीजल लाकर मुस्लिमों और पुलिस की गाड़ीयों को
जलाने की बात आना भी साबित करता है कि सपा मुखिया की संघी मार्का
देशभक्ति मुसलमानों की सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है। मोहम्मद शुऐब
ने कहा कि मुलायम सिंह के पैतृक क्षेत्र में उनके नगर पंचायत अध्यक्ष और
इस मुस्लिम विरोधी हिंसा के मास्टरमाइंड संजीव यादव द्वारा 2012 में
चुनाव के दौरान खुलेआम यह घोषणा करना कि उसे मुसलमानों का वोट नहीं
चाहिए, भी मुलायम सिंह द्वारा भाजपा से अपनी वैचारिक नजदीकी के कबूलनामे
को सही साबित करता है। रिहाई मंच अध्यक्ष ने कहा कि सपा के तथाकथित
मुस्लिम चेहरे आजम खान को मुलायम सिंह के इस बयान पर अपनी स्थिति स्पष्ट
करनी चाहिए।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
(प्रवक्ता, रिहाई मंच)
09415254919

Wednesday, 14 October 2015

क़लम के मज़दूर हैं मुद्रा राक्षस --- -वीर विनोद छाबड़ा

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )




क़लम के मज़दूर हैं मुद्रा राक्षस। :
-वीर विनोद छाबड़ा 
आज यूपी बैंक इम्प्लॉईज़ यूनियन ने आल इंडिया बैंक इम्प्लॉईज़ यूनियन के प्रेरणा स्त्रोत कामरेड प्रभात कार की १०६वीं जन्मतिथि के अवसर पर स्मृति जन-सम्मान समारोह २०१५ आयोजित किया।
इस अवसर पर जनपक्षधर लेखक मुद्राराक्षस जी को सम्मानित किया जाना था। परंतु दुर्भाग्यवश समारोह शुरू होने से ठीक पहले मुद्राजी अस्वस्थ हो गए। उन्हें कार में ही सम्मानित करके तुरंत अस्पताल में भर्ती करा दिया गया।
मुद्राजी की अस्वस्था के दृष्टिगत कार्यक्रम को संक्षिप्त करते हुए अध्यक्ष सुभाष बाजपाई ने कहा कि बैंक यूनियन का यह सौभाग्य है कि एक चिंतक के जन्मदिन के अवसर पर मुद्राजी चिंतक, ट्रेड यूनियन लीडर और बहुआयामी जनपक्षधर लेखक को सम्मानित किया गया है।
मुद्राजी के साथ विगत लंबे समय से जुड़े दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध रंगकर्मी विलायत जाफ़री ने बताया कि १९४७ में जब पार्टीशन हुआ तो हालात बहुत ख़राब थे। मज़हब को आधार बनाते हुए बच्ची का एडमिशन नहीं हो पा रहा था। ऐसे आड़े वक़्त में मुद्राजी बहुत काम आये। वो क्रांतिकारी थे ,शायद ही कोई रहा हो जिनसे उनका झगड़ा न हुआ हो। लेकिन मुझसे कभी नहीं हुआ। जब मैं लखनऊ आया तो उनसे बहुत मुलाक़ातें हुई। दूरदर्शन के लिए बहुत काम किया उन्होंने। जब आंदोलन में कहीं जाते तो मुझे एक पर्ची पकड़ा देते - मेरे परिवार का ख्याल रखना। अच्छा इंसान ही अच्छा लेखक होता है। आज मुद्राजी को सम्मानित करके बहुत ख़ुशी हुई।
मुद्राजी से पिछले लगभग चालीस वर्षों से जुड़े सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव को आपातकाल का वो दौर आया जब उत्पीड़ित होकर मुद्राजी लखनऊ आये थे। वो मेरे जैसे लेखकों के निर्माण का दौर था। मुद्रा जी को अपने बीच पाना बड़ी उपलब्धि थी। उनकी आत्मीय प्रवृति ने पीढ़ियों का अंतर मिटा दिया। शायद ही कोई दिन गुज़रता हो जब उनसे भेंट न होती हो। आपातकाल को लेकर उन्होंने एक उपन्यास लिखा -शांतिभंग। अन्याय और चिंतन के हर मौके पर वो हस्तक्षेप वाली स्थिति में मिले। प्रतिरोध में रहे सदैव। इसी कारण बहुत नुकसान और कष्ट में रहे। वो क़लम के मज़दूर थे। रोज़ कुआं खोदो और पानी पियो वाली स्थिति रही उनकी।
यूपी बिजली कर्मचारी संघ के अध्यक्ष कामरेड सदरूदीन राणा बैंक इम्प्लॉईज़ यूनियन को बधाई देते हुए कहा आज मुल्क में सांस्कृतिक और साहित्यिक हालात बहुत खराब हैं। ऐसे में मुद्राजी को सम्मानित करके बैंक यूनियन ने बहुत दिलेरी का काम किया है। एक शेर है - मौत से बचने की एक तरकीब है, लोगों के ज़हन में ज़िंदा रहो।
वरिष्ठ कहानीकार शकील सिद्दीकी ने मुद्राजी के साथ बिताये पलों को याद किया। जब-जब मुद्राजी लखनऊ आये तो मैं ट्रेड यूनियन और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा था। जल्द ही मुद्राजी से भी जुड़ गया। मुद्राजी ने हर क्षेत्र में जितने साहसिक क़दम उठाये, उतने किसी ने नहीं। उनमें प्रतिरोध की ज्वाला कभी कम नहीं हुई। उन्होंने ज़ुल्मों की मुख़ालफ़त की, रहनुमाई की, धरने दिए। ज़िस ऊर्जा और आदर्शों को लेकर वो दिल्ली से लखनऊ आये थे उससे सभी को बहुत फ़ायदा हुआ।
कार्यक्रम का संचालन बैंक यूनियन के मंत्री डॉ वीके सिंह ने करते हुए कहा कि मुद्राजी ने एक कथा में कहा है बैंक में एक मशीन होगी जिसे चलाने के लिए एक आदमी होगा और रखवाली के लिए एक कुत्ता होगा।
अंत में सभी ने मुद्राजी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की।
समारोह में जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय, कौशल किशोर, डॉ विजयबली माथुर आदि अनेक गणमान्य लेखक,साहित्यप्रेमी व चिंतक मौजूद थे। 

---
१३-१०-२०१५


https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1685574755009480?pnref=story

(यह वीर विनोद भाई साहब का स्नेह हो सकता है जो उन्होने मेरे नाम के पूर्व डॉ लिख दिया है। हालांकि मैंने उनसे तो अपने 'आयुर्वेदरत्न' होने व वैद्य के रूप में भी रजिस्टर्ड होने तक का ज़िक्र  नहीं किया है।  --- विजय राजबली माथुर )

Monday, 12 October 2015

नवरात्र नौ औषद्धियों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा का पर्व --- विजय राजबली माथुर

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 



कल से शुरू होने वाले नवरात्र में इन नौ औषद्धियों के प्रयोग से शरीर को नीरोग रखने का प्राविधान  था किन्तु 'विकास' के इस पूंजीवादी युग में 'पूंजी' की 'पूजा' होने लगी है। इन नौ दिनों में कान-फोडू भोंपू बजा कर ध्वनि प्रदूषण फैलाया जाएगा। लोगों को गुमराह करके व्यापारी वर्ग के हित साधे जाएँगे। पुजारी वर्ग जो ब्राह्मण जाति से आता है इन व्यापारियों का महिमा-मंडन करेगा। 'ढ़ोंगी' व 'एथीस्ट ' मिल कर इस पोंगा पंथ को 'धर्म ' की संज्ञा से नवाजेंगे । जनता उल्टे उस्तरे से मूढ़ी जाएगी उसका शोषण जारी रहेगा। कोई 'सत्य ' बोलना नहीं चाहता बल्कि सत्य कहने वाले का उपहास ज़रूर उड़ाते हैं खास तौर पर ढ़ोंगी व एथीस्ट।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=955047921223851&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3&theater

वस्तुतः ऋतु परिवर्तन के समय प्राचीन मनीषियों ने चार नवरात्र का प्राविधान किया था जिनमें से दो को ब्राह्मणों ने अपने लिए 'गुप्त' रूप से मनाने के लिए  सुरक्षित कर लिया था। शेष जनता के लिए  ग्रीष्म व शरद काल  के नवरात्र सार्वजनिक रूप से बताए गए थे। कल दिनांक 13 अक्तूबर से प्रारम्भ ये शरद कालीन नवरात्र हैं। ढ़ोंगी-पाखंडी पद्धति से ये मनाए जा रहे हैं। जगह-जगह रास्ता रोक कर 'देवी जागरण' के नाम पर जनता को ठगा जा रहा है। कुंवारी कन्याओं के पूजने का आडंबर किया जाता है परंतु समाज में उनकी स्थिति इस ढ़ोंगी पूजा की पोल खोल देती है। 

क्या होना चाहिए :

वास्तव में हवन-यज्ञ पद्धति ही पूजा की सही पद्धति है। क्यों? क्योंकि 'पदार्थ- विज्ञान ' (MATERIAL SCIENCE ) के अनुसार  हवन की आहुती  में डाले गए   पदार्थ अग्नि द्वारा  परमाणुओं  (ATOMS ) में विभक्त कर दिये जाते हैं। वायु  इन परमाणुओं को प्रसारित  कर देती है। 50 प्रतिशत परमाणु यज्ञ- हवन कर्ताओं को अपनी नासिका द्वारा शरीर के रक्त में प्राप्त हो जाते हैं। 50 प्रतिशत परमाणु वायु द्वारा बाहर प्रसारित कर दिये जाते हैं जो सार्वजनिक रूप से जन-कल्याण का कार्य करते हैं। हवन सामग्री की जड़ी-बूटियाँ औषद्धीय रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य रक्षा का कार्य सम्पन्न करती हैं। यह   हवन 'धूम्र चिकित्सा' का कार्य करता है। अतः ढोंग-पाखंड-आडंबर-पुरोहितवाद छोड़ कर अपनी प्राचीन हवन पद्धति को अपना कर नवरात्र मनाए जाएँ तो व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व दुनिया का कल्याण संभव है। काश जनता को जागरूक किया जा सके !

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

विभ्रम के दौर में विवेक वांछित है --- विजय राजबली माथुर

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 

'सूर्या' की पूर्व संपादक के पुत्र के नाम से छपा यह लेख RSS की किसी चाल का हिस्सा भी हो सकता है कि असंतुष्टों को वरुण के पक्ष मे लामबंद करके उनके प्रतिरोध की वास्तविक 'धार' को 'कुंद' कर दिया जाये। 
या यह भी हो सकता है कि वरुण और उनकी माता को अब भाजपा में वांछित लक्ष्य प्राप्त होने की संभावना न दीख रही हो और वे भविष्य के लिए उससे अलगाव की भूमिका बना रहे हों। यदि ये वास्तव में उनके विचार परिवर्तन का संकेत हो तो वे सोनिया कांग्रेस में प्रविष्ट होकर जनता को आकृष्ट करने में सफल भी हो सकते हैं। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि 'तुर्कमान गेट कांड' व 'आपात काल' वरुण के पिता की दिमागी उपज थे।



https://www.facebook.com/photo.php?fbid=954950374566939&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3




जिस समाचार-पत्र के संस्थापक संपादक महात्मा गांधी रहे हों जिनहोने ;सविनय अवज्ञा आंदोलन' का सूत्रपात किया था उसी पत्र का समपादकीय अब 'चारण विरुदावली' गा रहा है तो स्पष्ट है कि, 'विकास' का दावा करने वाले 'चारित्रिक पतन' को प्राप्त हो चुके हैं।
सत्ता पर फर्क पड़े न पड़े परंतु 'विरोध' तो दर्ज हो ही रहा है।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 8 October 2015

कथा सम्राट प्रेमचंद के संबंध में डॉ रामविलास शर्मा ने क्या कहा ?

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 


10 अक्तूबर को जन्में  विचारक-आलोचक डॉ राम विलास शर्मा जी ने कथा सम्राट प्रेमचंद जी के संबंध में जो विचार व्यक्त किए वे 08 अक्तूबर प्रेमचंद जी की पुण्यतिथि पर इस स्कैन कापी के माध्यम से प्रस्तुत हैं। 

प्रेमचंद जी गांधीवाद से साम्यवाद की ओर अग्रसर हुये थे जबकि डॉ रामविलास शर्मा जी साम्यवादी चिंतक व विचारक ही नहीं थे वरन सेंट जोन्स कालेज , आगरा  के अध्यापक व भाकपा के सक्रिय सदस्य भी थे। लेकिन सुंदर होटल, राजा-की-मंडी स्थित भाकपा  कार्यालय में उनके विचारों का विरोध व्यक्त करने के लिए उनके ऊपर साईकिल की चेन से घातक प्रहार किए गए थे। उन हमलावरों में से एक  लगातार 9-9 वर्षों  तक दो बार जिलामंत्री रहे और दूसरे 3 वर्षों तक। डॉ रामविलास शर्मा को अपनी ज़िंदगी बचाने हेतु आगरा छोड़ कर दिल्ली में बसना पड़ा था। 

यह विडम्बना ही है कि आंतरिक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को कुचलने वालों को सम्मानित करने वाली पार्टी को आज फासिस्ट सरकार के विरुद्ध अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा के संघर्ष में साथ देना पड़ रहा है क्योंकि उसके अपने एक शीर्ष नेता कामरेड गोविंद पानसारे की हत्या फासिस्ट शक्तियों द्वारा की जा चुकी है। लेकिन उनके स्थान पर एक शीर्ष समिति में जिनको लिया गया है वह अश्लीलता व बाजारवाद के प्रबल समर्थक हैं जिनका दृष्टिकोण है कि, ओ बी सी व दलित वर्ग से आए कामरेड्स से सिर्फ काम लो लेकिन उनको कोई पद न दो इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में वह दो-दो बार पार्टी को विभाजित भी करा चुके हैं। एक राष्ट्रीय सचिव के विरुद्ध दो-दो बार पार्टी छोडने की अफवाहें उड़वा चुके हैं । मीडिया में उनका सहायक पुत्र मुलायम सिंह जी से घनिष्ठ रूप से संबन्धित है (निम्न चित्र से स्पष्ट है )जो उनके इशारे पर वरिष्ठ पार्टी कामरेड्स के विरुद्ध जब-तब ऐसे कार्य  आसानी से सम्पन्न करवा देता है और किसी के विरुद्ध मुलायम जी के कान भी भर देता है। 


***ऐसा सिर्फ एक ही साम्यवादी दल में ही नहीं वरन प्रत्येक साम्यवादी दल या सम्पूर्ण वामपंथ में है कि उसका नेतृत्व 'ब्राह्मण' जाति में जन्में या 'ब्राह्मण वादियों' के हाथों में है। युवा कामरेड्स में इसके प्रति असंतोष भी है जिसका प्रमाण प्रस्तुत दो फोटो कापियों से मिल जाएगा। 
https://www.facebook.com/ashishkumaranshu/posts/10156310439200157?fref=nf&pnref=story&__mref=message


युद्ध एक कला भी है और विज्ञान भी। जब फासिस्ट /सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी शक्तियों से लड़ना है तब उनका मुक़ाबला न करके अपनी ही पार्टी में घमासान  मचा देने का साफ मतलब यह है कि शत्रु को मजबूती प्रदान की जाये। शत्रु को  शक्ति  देने वाला व्यक्ति या संगठन शत्रु-कृपा से अपना अस्तित्व तो बचाए रख सकता है किन्तु विचार धारा नहीं। यही दुर्भाग्य साम्यवादी/वामपंथी खेमे को ग्रसित किए हुये है जिससे निकल कर ही प्रेमचंद जी एवं डॉ रामविलास शर्मा जी के दृष्टिकोण व चिंतन को मूर्त रूप प्रदान करते हुये अपने संगठन व विचार धारा को आज मजबूत किए जाने  व युवा वर्ग को आकर्षित किए जाने की महती आवश्यकता है। 
(विजय  राजबली माथुर)

Sunday, 4 October 2015

समकालीन कविता का सशक्त हस्ताक्षर : :वीरेन डंगवाल ---- -वीर विनोद छाबड़ा




*********
:वीरेन डंगवाल को अलविदा नहीं कह पायेंगे। 
-वीर विनोद छाबड़ा 

२८ सितंबर २०१५ को हिंदी के सुविख्यात कवि वीरेन डंगवाल का कैंसर से लड़ते हुए निधन हो गया था। उनकी याद में दिनांक ०३ अक्टूबर को लखनऊ के इप्टा ऑफिस में स्मृति सभा आयोजित हुई। 

सभा की अध्यक्षता सुविख्यात कवि नरेश सक्सेना ने की। 

सभा का संचालन करते हुए कवि चंद्रेश्वर पांडे ने वीरेन जी को समकालीन कविता का सशक्त हस्ताक्षर बताया। उनकी कविता में राष्ट्रीय चेतना को लेकर सच्ची कविता सामने आती है, छद्म राष्ट्रीयता का भंड़फोड़ करती है। वो सिर्फ कविता से नहीं जुड़े थे। शिक्षक भी रहे। पत्रकारिता से भी जुड़े। अमर उजाला कानपुर के संपादक भी रहे। कई जाने-माने विदेशी कवियों की रचनाओं का भारतीयकरण करते हुए अनुवाद भी किया। वो कहा करते थे मनुष्य को नष्ट कर सकते हो, लेकिन पराजित नहीं। 

कवि श्याम अंकुरण ने बताया वीरेन जी को शासन ने कुचलने की बहुतेरी कोशिश की। लेकिन वो डटे रहे। उनकी कविता का ग़ालिब, त्रिलोचन से गहरा रिश्ता रहा। जन संस्कृति मंच की स्थापना में उनकी अहम भूमिका थी। उनकी कविताओं के अनुवाद कई भाषाओँ में हुए। अमृत प्रभात इलाहाबाद में स्तंभ लिखते रहे। उनकी कवितायेँ अलग रास्ता चुनती दिखती थीं। उनका मानना था कि इस देश को छोड़ कर नहीं जाना है इसे वापस पाना है। उनकी कविताओं में उनकी राजनैतिक चेतना झलकती थी। उनकी कविता हल्के फुल्के अंदाज़ से शुरू होती ज़रूर थी लेकिन अंत ऐसा नहीं होता था। ईश्वर को कटघरे में खड़ा करके गंभीर सवाल पूछते हैं। 
समकालीन जनमत के संपादक और यूपी कम्युनिस्ट पार्टी (एमएल) के महामंत्री रामजी राय ने उन्हें याद करते हुए कहा कि साथियों को बड़ी आत्मीयता से दोस्त, पार्टनर और प्यारे से संबोधित करते हुए वीरेन अपने और दूसरों के बीच दीवार ढहाते थे। उनका व्यवहार अनौपचारिक था। उनकी कविता में अंतरंग मित्र की भाषा है। सख्ती भी है उनमें। व्यंग्य और कटाक्ष भी। आदमी ही आदमी को निर्मित करता है। वो कविता को पिपहरी कहते थे, जैसे बिस्मिल्लाह खां कहते थे मैं शहनाई नहीं बजता पिपहरी बजाता हूं। उनकी कविता में सपने की पीछे की सच्चाई होती थी। सामान्यबोध की अभिव्यक्ति है। वीरेन को अलविदा नहीं कह पाएंगे। 
सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि वीरेन अलग कवि थे। कविता के माध्यम से सामाजिक चेतना लाये। उनके व्यक्तित्व से उनकी कविता को अलग करना मुश्किल है। आत्मीय और निश्छल थे। कुछ ओढ़े हुए नहीं मिले। जैसे वो थे वैसी ही कविता थी। कैंसर के बावजूद वो साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहे, पूरी जीवंतता और प्रतिबद्धता से जुड़े रहे। ऐसे व्यक्ति का जाना किसी कड़ी का टूट जाना है। बेहद दुःखद है। 
कवियत्री कात्यायनी ने कहा वीरेन जी हमेशा कुछ नया लेकर आते थे। उनसे मिल कर कभी नहीं लगा वो बहुत बड़े हैं। वो ऊर्जा देकर जाते थे। बिना शोर-शराबे के अलग ही छवि बनाई। अपने लोगों की मिट्टी की गंध मिली उनकी कविता में। उनको व्याख्यापित करना कठिन है। आशावाद अंतरधारा के रूप में बहा। उनका व्यवहार उनकी कविताओं में प्रवाहित होता रहा। 


इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश को आज के दौर में उनका जाना बहुत दुखद लगा। उनकी कविता आज के परिदृश्य को बखूबी अंकित करती है। वो कविताओं में चिंतक के रूप में दिखते हैं। शिक्षक और पत्रकार के रूप में भी। वो सदैव सांप्रदायिकता पर चोट करते रहे। 

युवा कहानीकार, गायन और कविता से जुड़े हरी ओम ने बताया कि वीरेन जी  ग्लैमर से दूर रहे। उनकी कविताओं पर भले तालियां नही बजती थीं लेकिन इसके बावजूद वो जेएनयू में सबके दिलों को खींचते रहे। आज जब कुतर्क नहीं बचा, सिर्फ़ हिंसा बची है तो उनकी बहुत याद आती है। वो खास कवि थे और खास कवितायें करते थे। लोकप्रियता के लिए कविता नहीं की। कविता में समोसा और जलेबी को शामिल करके उन्होंने आमजन की चिंता तलाशी। 

कहानीकार प्रियदर्शन मालवीय ने बताया कि वीरेन जी ने मूल्यों और सिद्धांतों के लिये बड़े-बड़े पद त्याग दिए। वो पारिवारिक व्यक्ति भी थे। पिता की बीमारी के दृष्टिगत उन्होंने जेएनयू की प्रोफ़ेसरी ठुकरा दी। 'अमर उजाला' को बतौर संपादक उन्होंने सांप्रदायिकता से शिद्द्त से बचाये रखा। लेकिन जब मालिकान का बहुत दबाव पड़ा तो उन्होंने जाना ही बंद कर दिया। वो कहते थे सांप्रदायिकता अवैध निर्माण है। वो जातिवाद के भी विरोधी थे। कैंसर के बावजूद उनकी आवाज़ बुलंद थी। वो कहते रहे सरकस के हाथी की तरह सीधा नहीं बनो। 
कवियत्री वंदना मिश्र ने बताया कि वीरेन जी उनके पारिवारिक मित्र थे। उनका जाना नहीं खला, लेकिन एक दोस्त के जाने का बेहद दुःख है। कवि चला गया लेकिन कविता ज़िंदा है।

कवि और पत्रकार अजय सिंह को वीरेन की कविता अमरीकी साम्राज्य और मोदी राज के ऊपर वामपंथी विज्ञप्ति की तरह सामने आती है, उनकी ऐसी-तैसी करती है, जनवादी कविता है। वो दोस्ताना हैं, पाठक को साथ लेकर चलते हैं। विलक्षण प्रतिभा थी उनमें। सीखे हुए को जनप्रिय लोक कवि में रचा। वो यथास्थिति को तोड़ते हैं। साधारण को असाधारण बनाती है। वो वंचित को केंद्रीय स्तर पर लाते है। नए सिरे से दुनिया को देखते हैं। शोषण और अन्याय के विरूद्ध आवाज़ बुलंद करते हैं। चिल्ल-पों नहीं करते। आधुनिक हिंदी कविता को जनमुख बनाने में उनका बहुत योगदान है। 

समालोचक अनिल त्रिपाठी ने बताया कि वीरेन जी ने बिलकुल सहज और आसान शब्दों में बहुतों की बात कही। आत्मीयता के स्तर पर वो बहुत बड़े इंसान थे। उनका 'प्यारे' कहना बहुत अलग होता था। युवा लेखकों की किताब खरीद कर पढ़ते थे। नए लोगों को बहुत प्यार करते थे। 
कवि भगवान स्वरूप कटियार ने कहा कि वीरेन जी का जाना बहुत बड़ा नुकसान है। 
कवि रविकांत ने कहा कि उनकी कविता जन-साधारण की कविता है। जनसामान्य की बात जनभाषा में होनी चाहिये। 


लेखिका प्रज्ञा ने कहा कि वीरेन जी को थोड़ा पढ़ा है। लेकिन जितना भी पढ़ा है वो जुड़ाव के लिए पर्याप्त है। उनको पढ़ कर मालूम हुआ कि मानसिक तरंगें कहां तक ले जाती हैं। 

अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रख्यात कवि नरेश सक्सेना का वीरेन जी के बारे में कथन था कि व्यक्तित्व का दायरा छोटा नहीं होता। अपने कर्मों से वो लंबे काल तक जाना जाता है। वीरेन ने जो कर्मठता दिखाई है उसे याद रखना चाहिए। सत्तर के दशक से पहले वो युवा होने के बावजूद लोकप्रिय थे। वरिष्ठ कवि भी उनसे मिलने जाते थे। वो सौंदर्यबोध को बहुत ध्यान रखते थे। गद्य में भी लिखते थे तो लय बनाये रखते थे। एक हसंता हुआ, मस्तमौला कवि चला गया। वीरेन को उनके व्यक्तित्व के लिए भी याद रखा जाना चाहिए।
---

०३-१०-२०१५साभार :

https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1682745838625705
*******************************************************************************
कल इस स्मृति सभा में बोलते हुये सभा अध्यक्ष नरेश सक्सेना साहब ने वीरेन  डंगवाल  जो उनसे उम्र में 10 वर्ष छोटे थे को 'सत्य ' व 'सिद्धान्त ' का कठोर पालक भी बताया। इन गुणों ने ही उनको महान बनाने में मदद की। वीरेन जी ने कभी भी अपने संपादक होने का एहसास करा कर किसी से कोई लाभ उठाने की कोशिश नहीं की भले ही उनको कष्ट उठाना पड़ा। भोपाल से लौटते वक्त की एक घटना का उल्लेख करते हुये उन्होने कहा कि सारी रात उनकी सीट पर बैठ कर बातें करते हुये गुज़ार दी किन्तु न खुद कहा और न ही सक्सेना साहब को टिकट निरीक्षक से यह कहने दिया कि वह 'अमर उजाला' के संपादक हैं अन्यथा  वेटिंग कनफर्म करके उनको सीट आबंटित हो सकती थी । अन्य वक्ताओं ने भी डंगवाल साहब के व्यक्तिगत पक्ष को उज्वल बताया जिस कारण वह उज्वल समय की कल्पना कर सके। 

स्मृति सभा में वीर विनोद छाबड़ा, चंदरेश्वर पांडे, श्याम अंकुरण, रामजी राय, अजय सिंह,डॉ हरिओम , इप्टा के राष्ट्रीय महामंत्री राकेश, प्रदीप घोष, राम किशोर, अनीता श्रीवास्तव, प्रज्ञा पांडे, कात्यायनी, वंदना मिश्रा, वीरेंद्र यादव, भगवान स्वरूप कटियार, अनिल त्रिपाठी, दिनकर कपूर, विजय राजबली माथुर  आदि अनेक लोग उपस्थित थे।    
(संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश )