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Wednesday, 2 October 2019

गांधी जी की 150 वीं जयंती

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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Sunday, 18 October 2015

आज़ादी और विवेक के पक्ष में : -- कौशल किशोर


Kaushal Kishor
17-10-2015 
प्रिय मित्र,
पांच लेखक-संगठनों -- प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद -- ने दिल्ली में बैठक कर लेखकों की ओर से जारी प्रतिरोध पर एक साझा बयान जारी किया है, साथ ही इस महीने की 20 और 23 तारीख के लिए साझा कार्यक्रम भी तय किये हैं. आप यह बयान और कार्यक्रम की घोषणा देख सकते हैं. -- कौशल किशोर, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच , उत्तर प्रदेश
आज़ादी और विवेक के पक्ष में :
प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद का साझा बयान
और आगामी कार्यक्रमों की सूचना
देश में लगातार बढ़ती हुई हिंसक असहिष्णुता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ पिछले कुछ समय से जारी लेखकों के प्रतिरोध ने एक ऐतिहासिक रूप ले लिया है. 31 अगस्त को प्रोफेसर मल्लेशप्पा मादिवलप्पा कलबुर्गी की हत्या के बाद यह प्रतिरोध अनेक रूपों में प्रकट हुआ है. धरने-प्रदर्शन, विरोध-मार्च और विरोध-सभाएं जारी हैं. इनके अलावा बड़ी संख्या में लेखकों ने साहित्य अकादमी से मिले अपने पुरस्कार विरोधस्वरूप लौटा दिए हैं. कइयों ने अकादमी की कार्यकारिणी से इस्तीफ़ा दिया है. कुछ ने विरोध-पत्र लिखे हैं. कई और लेखकों ने वक्तव्य दे कर और दीगर तरीक़ों से इस प्रतिरोध में शिरकत की है.
दिल्ली में 5 सितम्बर को 35 संगठनों की सम्मिलित कार्रवाई के रूप में प्रो. कलबुर्गी को याद करते हुए जंतर-मंतर पर एक बड़ी प्रतिरोध-सभा हुई थी. इसे ‘विवेक के हक़ में’ / ‘इन डिफेन्स ऑफ़ रैशनैलिटी’ नाम दिया गया था. आयोजन में भागीदार लेखक-संगठनों – प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद -- ने उसी सिलसिले को आगे बढाते हुए 16 सितम्बर को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उनसे यह मांग की गयी थी कि अकादमी प्रो. कलबुर्गी की याद में दिल्ली में शोक-सभा आयोजित करे. विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान, रेखा अवस्थी, अली जावेद, संजय जोशी और कर्मशील भारती द्वारा अकादमी के अध्यक्ष से मिल कर किये गए इस निवेदन का उत्तर बहुत निराशाजनक था. एक स्वायत्त संस्था के पदाधिकारी सत्ता में बैठे लोगों के खौफ़ को इस रूप में व्यक्त करेंगे और शोक-सभा से साफ़ इनकार कर देंगे, यह अप्रत्याशित तो नहीं, पर अत्यंत दुखद था. अब जबकि अकादमी की इस कायर चुप्पी और केन्द्रीय सत्ता द्वारा हिंसक कट्टरपंथियों को प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीके से दिए जा रहे प्रोत्साहन के खिलाफ लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाने से लेकर त्यागपत्र और सार्वजनिक बयान देने जैसी कार्रवाइयां लगातार जारी हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि लेखक समाज इन फ़ासीवादी रुझानों के विरोध में एकजुट है. वह उस राजनीतिक वातावरण के ख़िलाफ़ दृढ़ता से अपना मत प्रकट कर रहा है जिसमें बहुसंख्यावाद के नाम पर न केवल वैचारिक असहमति को, बल्कि जीवनशैली की विविधता तक को हिंसा के ज़रिये कुचल देने के इरादों और कार्रवाइयों को ‘सामान्य’ मान लिया गया है.
विरोध की स्वतःस्फूर्तता और व्यापकता से साफ़ ज़ाहिर है कि इस विरोध के पीछे निजी उद्देश्य और साहित्यिक ख़ेमेबाज़ियाँ नहीं हैं, भले ही केन्द्रीय संस्कृति मंत्री ऐसा आभास देने की कोशिश कर रहे हों. इस विरोध के अखिल भारतीय आवेग को देखते हुए मंत्री का यह आरोप भी हास्यस्पद सिद्ध होता है कि विरोध करने वाले सभी लेखक एक ही विचारधारा से प्रेरित हैं, कि वे सरकार को अस्थिर करने की साज़िश में शामिल हैं. सब से दुर्भाग्यपूर्ण है उनका यह कहना कि लेखक लिखना छोड़ दें, फिर देखेंगे. लेखक लिखना छोड़ दें -- यही तो दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के हत्यारे भी चाहते हैं. केंद्र सरकार इन हत्याओं की निंदा नहीं करती, लेकिन प्रतिरोध करने वाले लेखकों की निंदा करने में तत्पर है. इससे यह भी सिद्ध होता है कि मौजूदा राजनीतिक निज़ाम के बारे में लेखकों के संशय निराधार नहीं हैं. ये वही संस्कृति मंत्री हैं, जिन्होंने दादरी की घटना के बाद हत्यारी भीड़ को चरित्र का प्रमाणपत्र इस आधार पर दिया था कि उसने हत्या करते हुए शालीनता बरती थी और एक सत्रह साल की लडकी को छुआ तक नहीं था. लम्बे अंतराल के बाद, स्वयं राष्ट्रपति के हस्तक्षेप करने पर, प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी भी तो उसमें उत्पीड़क और पीड़ित की शिनाख्त नहीं थी. उसमें सबके लिए शांति के उपदेश के सिवा और कुछ न था. सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष बिहार के चुनावों के दौरान लगातार बयान दे रहे हैं कि दादरी के तनाव का असली कारण पुलिस की 'एकतरफ़ा' कार्रवाई है. यह सुनियोजित भीड़ द्वारा की गयी हत्या के लिए मृतक को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं तो और क्या है!
लेखकों ने बार बार कहा है कि उनका विरोध किसी एक घटना या एक संस्था या एक पार्टी के प्रति नहीं है. उनका विरोध उस राजनीतिक वातावरण से है जिसमें लेखकों को, और अल्पसंख्यकों तथा दलितों समेत समाज के सभी कमज़ोर तबकों को, लगातार धमकियां दी जाती हैं, उन पर हमले किए जाते हैं, उनकी हत्या की जाती है और सत्तातंत्र रहस्यमय चुप्पी साधे बैठा रहता है. कुछ ही समय पहले तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन को इन्हीं परिस्थितियों में विवश हो कर अपनी लेखकीय आत्महत्या की घोषणा करनी पड़ी थी. ऐसे में साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है कि वे आगे आयें और नागरिक आज़ादियों के दमन के इस वातावरण के विरुद्ध पहलक़दमी लें. हम लेखक-संगठन लेखकों के इस विरोध अभियान के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं. हम साहित्य अकादमी से मांग करते हैं कि वह न केवल इस दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण की कठोर निंदा करे, बल्कि उसे बदलने के लिए देश भर के लेखकों के सहयोग से कुछ ठोस पहलकदमियां भी ले.
लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के इस विरोध की एकजुटता को अधिक ठोस शक्ल देने के लिए हमने आनेवाली 20 तारीख को ‘आज़ादी और विवेक के हक़ में प्रतिरोध-सभा’ करने का फ़ैसला किया है. प्रतिरोध-सभा उस दिन अपराह्न 3 बजे से प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के सभागार में होगी. 23 तारीख को, जिस दिन साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी की बैठक है, हम बड़ी संख्या में श्रीराम सेन्टर, सफ़दर हाशमी मार्ग से रवीन्द्र भवन तक एक मौन जुलूस निकालेंगे और वहाँ बैठक में शामिल होने आये सदस्यों को अपना ज्ञापन सौंपेंगे, ताकि अकादमी की कार्यकारिणी मौजूदा सूरते-हाल पर एक न्यायसंगत नज़रिए और प्रस्ताव के साथ सामने आये.
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (जनवादी लेखक संघ)
अली जावेद (प्रगतिशील लेखक संघ)
अशोक भौमिक (जन संस्कृति मंच)
हीरालाल राजस्थानी (दलित लेखक संघ)
अनीता भारती (साहित्य संवाद)