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Sunday, 1 November 2015

जो व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध के स्वर नहीं उठाता वह लेखक ही नहीं होता ------ वीर विनोद छाबड़ा

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सुशीला पूरी जी उदघाटन भाषण देते हुये 



इस रिपोरताज के लेखक वीर विनोद छाबड़ा साहब दूसरी पंक्ति में सबसे दायें ध्यान मग्न 



Vir Vinod Chhabra
01-11-2015  
समकालीन कविता - कविता फूल खिलने की तरह है
-वीर विनोद छाबड़ा 
३१ अक्टूबर से लखनऊ में समकालीन कविता पर केंद्रित एक कार्यक्रम हुआ। आयोजन जनवादी लेखक संघ ने किया। 
उद्घाटन सत्र में सुप्रसिद्ध कवियत्री और लेखिका सुशीला पुरी ने अपने स्वागत भाषण में कहा - कविता के बिना जीवन संभव नहीं है। मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं। संस्कृति के केंद्र लखनऊ में। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए बताया - १९३६ में प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में प्रेमचंद ने कहा था, साहित्य का मयार बदलना है। जो समझ में आने से पहले पहुंच जाए वो कविता है। कविता को किसान-मज़दूर के बीच जाना चाहिए, भले उसे समझ में न आये। लेकिन प्रयास तो होना चाहिए। आज की स्थिति में हस्तक्षेप ज़रूरी है। प्रतिरोध का एक ढंग है, पुरुस्कार लौटना। सरकार को मैसेज देना है। और यह निष्फल नहीं हुआ। सरकार परेशान है। मैं भी आक्रोशित हूं। एक पुरुस्कार मेरे पास भी है। मैंने इसे बचा कर रखा है। किसी सही मौके पर विरोध दर्ज कराऊंगा। भीड़ का हिस्सा नहीं बनूंगा। कितना अच्छा हुआ कि बुद्ध पांच हज़ार साल पहले पैदा हुए। आज पैदा होते तो उनका वही हश्र होता जो आज कुलबुर्गी का हुआ है। बहुत सारे लोग हैं जो कविता को इग्नोर करते हैं, लेकिन कविता भी बहुत लोगों को इग्नोर करती है। इस माहौल में कविता होना बहुत मुश्किल है। बेहतर होगा कि पॉपुलर भाषा में लिखी जाये। लोकगीतों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाई जाए। कविता वही होती है जो आसानी से लोगों तक पहुंच जाये। आज डिमांड बहुत बड़ी है। बहुत बड़ा दौर है। पिछले पचास साल से समकालीन कविता का अंदाज़, भाषा, और विषयवस्तु में काफ़ी बदलाव आया है। ज़रूरत है समकालीन कविता का नाम भी बदला जाए। नामकरण हो। आज बोलने में भी डर लगता है। पंजाबी के मशहूर कवि सुरजीत पातर कहते हैं मैं पहली पंक्ति लिखता हूं और डर जाता हूं राजा के सिपाहियों से.…पंक्ति लिखता हूं काट देता हूं.… कितनी पंक्तियों की हत्या करता हूं.… उनकी आत्मायें मंडराती हैं.… आप कवि हैं या कविताओं के हत्यारे? 
उद्घाटन समारोह के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि राजेश जोशी बताते हैं - बौद्धिक संपदा आमतौर पर वाम या डेमोक्रेट्स के हाथ में रही है। कांग्रेस के राज्य में कोई दिक्कत नहीं रही क्योंकि उनके पास कोई विचारधारा ही नहीं थी। आज बीजेपी सत्ता में है। उसके पास बौद्धिक संपदा संभालने के लिये बौद्धिक गुण नहीं हैं। कोई अनुभव भी नहीं है। अहम जगह पर मिडियाकर किस्म के लोग बैठाये गए हैं। क़ाबिल लोग हैं ही नहीं। सर्जरी करके हाथी के सिर लगाने की बात करते हैं। कोई उनसे पूछे, हमेशा जानवरों के सर ही क्यों लगाये गए? सीनियर मंत्री जी कहते हैं जेएनयू में नक्सली भरे पड़े हैं। वहां बीएसएफ बैठा देनी चाहिए। धर्म की सत्ता लाने की कोशिश चल रही है। लोकतंत्र का अंत हो, धर्मनिरपेक्षता का अंत हो। जागरूक लोग प्रतीक्षा नहीं करते। जनजागृति करते हैं। टकराव की स्थिति बेहतरी के लिए है। हमें हमारी कविता को नया नाम देने की ज़रूरत है। मुश्किल है काम, लेकिन करना ज़रूरी है। 
कार्यक्रम का संचालन सुप्रसिद्ध कवि और लेखक नलिन रंजन सिंह ने किया।
उद्घाटन सत्र के पश्चात एक परिचर्चा हुई - समकालीन कविता, संवेदना और दृष्टि। इसकी अध्यक्षता इब्बार रब्बी ने की। 
सुप्रसिद्ध कवियत्री और लेखिका प्रीति चौधरी कहती हैं - जब भी कविता की बात होती है तो लगता है मनुष्य ही कविता है। जिसमें मनुष्यता है, वही कविता करता है और समझता है। बौद्धिक संपदा कभी ज़िम्मेदार लोगों के हाथ में रही। लेकिन आज ऐसा नहीं है। इसीलिए प्रतिरोध हो रहा है। ज्ञान संवेदना की और ले जाता है और संवेदना ज्ञान की ओर ले जाती है। आज जब समय की विभीषिका की बात होती है तो मुझे लगता है गहरी रात है। भूमंडलीकरण की रात है। संकट है, लेकिन मैं निराश नहीं हूं। संकट मित्र के भेष में है। पता नहीं चलता कि नायक कब खलनायक में बदल जाता है। चौंका देता है। हम सब एक बिंदु पर रुक जाते हैं। मैं मनुष्य हूं लेकिन स्त्री होना ज्यादा संवेदनशील है। स्त्रियां आज स्त्रियों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। कविता ने सांप्रदायिकता को छोड़ा है, बहुत सारी ऐसी जगह हैं जहां कविता नहीं पहुंची है। जब किसी कविता से प्रेम करते हैं तो उसे जादू बना देते हैं, इबादत करने लगते हैं। लेकिन जब उस कवि से मिलते हैं तो लगता है यह तो बहुत कमजोर आदमी है, घृणा योग्य है। रह वही जाता है जो रचा जाता है। संप्रेषणीयता बहुत सीमित क्यों है? प्रभावशाली लोग इससे अपरिचित क्यों हैं? साहित्य नीति नहीं बना सकता। हमें ही किसानों के बीच जाना होगा। भूमंडलीकरण की रात है। कविता लिखना कठिन है लेकिन आज की पीढ़ी ने उसे स्वीकार किया है। अंधेरा कितना घना क्यों न हो, कविता कभी ख़त्म नहीं होती है। 
समालोचक, चिंतक और कवि जीतेंद्र श्रीवास्तव ने कहा - आज़ादी के बाद से सब समकालीन है। १९८० के बाद की कविता भी समकालीन है। लेकिन १९९० के बाद के समय ने कविता को बहुत प्रभावित किया है। मंडल और कमंडल इसी काल में आया। भूमंडलीकरण का परिवारों पर प्रभाव पड़ा। एकल परिवारों का चलन बढ़ा। बाबरी मस्जिद विध्वंस भी इस दौर की बड़ी घटना है। धर्मवाद और जातिवाद गहरा हुआ। दलितों के विरुद्ध हिंसा को याद रखना होगा। इन्हीं के बीच से कविता निकल कर आई है। मुख्य धारा की कविता। आज की स्थिति यह है कि जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है और जनता की ही चीज़ों को और उनके अधिकारों को छीन रही है। समकालीन तभी होंगे जब समकालीन लोगों के साथ खड़े होंगे, उनके लिए लड़ रहे होंगे। कवियों के सरोकार का विस्तार हो रहा है। समय को परिभाषित किया जा रहा है और समय से परिभाषित हो रहे हैं। यह स्वांता-सुखाय का दौर नहीं है। पैसे के लिए लिखा जा रहा है। लेकिन बहुत से लोग सर्व-कल्याण से जुड़े हैं। यह पहले भी था और अब भी है। वृहत्तर चिंताओं से जुड़ रही है आज की कविता। दलित व स्त्री विमर्श की कविता आई है। बहुत मुखर हो कर सामने आई है। इसे उसी वर्ग ने लिखा है। सांप्रदायिकता के विरुद्ध कविता आई है। यही संवेदना की दृष्टि है। आज जो लोग भारतीय दर्शन की बात करते हैं वो भारतीयता को जानते ही नहीं। परस्पर विरोधों के साथ चली है भारतीयता। यदि एक दृष्टि हावी होगी तो वो भारतीयता नहीं होगी। समकालीन कविता समझ रही है। सहचर्य व सौंदर्यबोध बड़ी उपलब्धियां हैं। दाम्पत्य जीवन को कविता में खूबसूरती रखा गया है। भविष्य का जीवन द्रव्य है। आत्महत्या बढ़ी हैं। परिवार विघठित हुए हैं। एकल परिवार बढे हैं। कविता के पास मध्यवर्गीय परिवार है। लेकिन गांव नहीं है। लेकिन कविता की विश्वसनीयता बढ़ी है। 
सुप्रसिद्ध कवि अनिल कुमार सिंह ने कहा समकालीन कविता को लेकर भ्रम है। समकालीन का एक्सटेंशन हो रहा है। युवा शब्द का भी एक्सटेंशन हो रहा है। आज जो फासिस्ट उभार है वो चिंतित कर रहा। यह नया नहीं है। ऐसा पिछले २५-३० साल से चल रहा। मंडल-कमंडल और बाबरी मस्जिद विध्वसं भी फासीवादी था। इसने कविता को बहुत प्रभावित किया। बौद्धिक संपदा पर वाम का प्रभाव रहा है। इसी के बीच में रहे हैं ऐसे तत्व जो फासिस्ट रहे हैं। गंभीर प्रयास होना चाहिए। बने-बनाये फ्रेम में नहीं बैठे रहना चाहिए। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि और प्रोफ़ेसर सदानंद शाही ने कहा - लगता है कबीर भी हमारे समकालीन हैं। समकालीनता नाम बहुत लंबा खिंच गया है। कुछ नया होना चाहिए। अब तक हमने काम चलाऊ नाम रखे हैं। पचास का दशक, साठ का दशक.…नब्बे का दशक। सोवियत संघ के विघटन से प्रतिबद्धता का दबाव कम हुआ है। यह शुभ है। कवि का दायरा बढ़ा है। आदिवासी कविता ने हमें झिंझोड़ा है। उसके सपनों में रहा है - एक जोड़ी बैल और खेत। पेड़ की जगह पेड़ हो और समुंद्र की जगह समुंद्र। विकास का रोड-रोलर चीज़ों को एक जगह नहीं रहने देता। यह मिथक भी टूट रहा है कि भारत कृषि प्रधान देश है। भारत एक धर्म प्रधान देश है, ये मिथक भी नहीं रहा। भारत एक पाखंड प्रधान देश है। जीवन के हर हिस्से में पाखंड है। देखना होगा कि समकालीन कविता में प्रतिरोध कितना है और पाखंड कितना। राजेश जोशी ग़लत नहीं कहते हैं कि जो अपराधी नहीं होगा, वो मारा जायेगा। यह सच्चाई है। समकालीन कविता की उपलब्धि है। कलजुग के चौथे चरण में आदमी इतना छोटा हो जायेगा कि लग्घी से घंटा तोड़ेगा। आज वही समय है। कविता आज एक फूल के खिलने की तरह है, जिससे अंधरे के पहाड़ दरक जाएं। 
प्रथम पंक्ति के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी ने कहा - हमारे सामने संकट है और उससे निपटना भी है। फासीवाद की चुनौती है। हो सकता है सब ख़त्म भी हो जाए। पुरुस्कार वापसी से सरकार बौखलाई हुई है। जवाब साहित्य अकादेमी नहीं दे रही है राजनेता दे रहे हैं। आरएसएस द्वारा दिया जा रहा है। कहते हैं लेखक राजनीति कर रहे हैं। अगर राजनीति इतनी ही ख़राब है आप क्यों राजनीति में हैं? कांग्रेसी होने का आरोप लगाते हैं। अगर तुम्हें आएसएस का होने में गर्व है तो दूसरों को भी वाम और कांग्रेसी होने का गर्व क्यों नहीं हो सकता? अगर मैं कुछ लौटा रहा हूं बौखलाहट क्यों है। यह कविता का विषय है कि मैं प्रेम नहीं कर रहा हूं। यह लोग कहते हैं पुरुस्कार लौटाने से देश की छवि ख़राब होती है। लेकिन क्या हत्याएं करने से शर्म नहीं आती? नाक नहीं कटती? प्रेमचंद ने कहा था साहित्य मशाल है। ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में खुशवंत सिंह ने पद्मश्री लौटाई थी। लेखक इमरजेंसी के विरोध में जेल भी गए। सुप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति राय ने साहित्य अकादेमी पुरुस्कार लेने से ही मना कर दिया था। जिसको कुछ ख़राब लगता है वही क़लम उठाता है। मीरा को भी विरोध का सामना करना पड़ा। ज़हर का प्याला भेजा गया था उसको। बीफ़ का विरोध करने वाले ही उसके सबसे बड़े निर्यातक व्यापारी हैं। मौजूदा सरकार ने उन्हें सब्सिडी दी है। निर्यात बढ़ाया जा रहा। सच्चाई से लोगों को रूबरू कराने की सख़्त ज़रूरत है। 
इस सत्र का संचालन सुप्रसिद्ध अजीत प्रियदर्शी ने किया। 
समारोह में वीरेंद्र यादव, रविंद्र वर्मा, नवीन जोशी, तद्भव के अखिलेश, शक़ील सिद्दीक़ी, केके चतुर्वेदी, अशोक गर्ग, रामकिशोर, दीपक कबीर आदि अनेक जाने-माने लेखक, कवि और साहित्य से सरोकार रखने वाली हस्तियां मौजूद थीं। 
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०१-११-२०१५
https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1690240527876236
 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 15 August 2015

इस्मत चुग़ताई - खुद बदनामियों झेल कर औरत को उसका हक़ दिलाया। -वीर विनोद छाबड़ा

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इस्मत चुग़ताई - खुद बदनामियों झेल कर औरत को उसका हक़ दिलाया।
-वीर विनोद छाबड़ा
लखनऊ में तारीख़ १४ अगस्त २०१५ में इस्मत चुग़ताई के जन्म शताब्दी समारोह के सिलसिले में इप्टा, लखनऊ ने 'महत्व इस्मत चुग़ताई' कार्यक्रम आयोजित किया। अध्यक्षता जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर और उर्दू इल्म-ओ-अदब में बहैसियत समालोचक दख़ल रखने वाले शारिब रुदौलवी ने की। अलावा उनके मंच पर आबिद सुहैल, रतन सिंह, सबीहा अनवर, वीरेंद्र यादव और शबनम रिज़वी की मौज़ूदगी थी।
इप्टा के राष्ट्रीय सचिव राकेश ने संचालन करते हुए इस्मत चुग़ताई की ज़िंदगी पर रौशनी डालते हुए बताया इस्मत आपा के अफ़साने 'लिहाफ़' ने अदबी दुनिया में ज़बरदस्त हलचल पैदा की। ये अफ़साना औरत की आज़ादी की बात तो करता ही है, पूरे समाज का रचनात्मक आत्मलोचन भी करता है.…उन पर उनके भाई अज़ीम बेग चुग़ताई का और उनके लेखन का ख़ासा असर था। इस्मत ने अज़ीम बेग को पार करके उर्दू अदब में खुद को स्थापित किया। ख़ुद अज़ीम बेग को भी इसका डर था। इस्मत कहती थीं कि क़लम मेरे हाथ में जब आ जाती है तो मैं लिखती ही जाती हूं.…वो १९४७ में मुल्क़ की तक़सीम से पैदा हुए फ़सादात से गुज़री। तक़सीम मुल्क़ की ही नहीं हुई बल्कि अवाम के दिलों की भी हुई.…वो कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी और सआदत अली मंटो की कड़ी हैं। प्रोग्रेसिव लेखन की अगुवा रहीं। उनका लेखन ऑटोबायोग्राफ़िकल रहा है। उनके अफ़साने बताते हैं वो किसी से भी बात कर लेती हैं। चाहे वो धोबी हो या मोची या सफ़ाई वाला या कामवाली बाई या अस्तबल का साइंस…एक बार मंटो से किसी ने पूछा था कि अगर मंटो की शादी इस्मत से हो गयी होती तो? मंटो ने जवाब दिया था कि निक़ाहनामे पर दस्तख़त करते-करते उनमें इतनी लानत-मलानत होती कि यह वहीं टूट जाती।
करामात हुसैन डिग्री कॉलेज की पूर्व प्रिसिपल और उर्दू की वरिष्ठ लेखिका सबीहा अनवर ने इस्मत आपा के साथ वक़्त वक़्त पर बिताये दिनों को भावुक अंदाज़ से याद किया। इस्मत आपा की राय बेहद बेबाक होती थी। वो दिखावटी बात नहीं करती थीं। प्रैक्टिकल, मुंहफट और आज़ाद ख़्याल। उन्हें दुनिया में होने वाली हर घटना की जानकारी लेने की फ़िक्र रहती। उस पर अपना नज़रिया ज़ाहिर करती…वो जब कभी लखनऊ आतीं तो मेरे घर ज़रूर आती, क़याम भी फ़रमाती। जब भी मिलीं बड़े ख़लूस से मिलीं। उन्हें मिलने, देखने और सुनने वालों का सिलसिला सुबह से शाम चला करता। भीड़ लगी रहती। वो बेबाक बोलने से बाज़ न आतीं। उनकी शैली व्यंग्यात्मक होती। एक बार बोलीं कि मेरी मां को उसके दसवें बच्चे ने बिलकुल तंग नहीं किया क्योंकि वो पैदा होते ही मर गया....कोई न कोई कंट्रोवर्सी वाला बयान दे देतीं और फंस जाती। अख़बारनवीसों को इसी का इंतज़ार रहता। एक दिन कह बैठीं कि मरने के बाद दफ़न करने के बजाये मुझे जलाया जाए.…जब मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ा सोचा-समझ कर बयान दिया करें तो उन्होंने कहा, मैं तुम्हारे जैसी समझदार नहीं हूं। जो दिल में है वही कहूंगी। मैं सच कहने से डरती नहीं…बहुत ज़िद्दी थीं वो। बोलने पर आतीं तो बेलगाम हो जातीं। यादों का कभी ख़त्म न होने वाला ख़जाना था उनकी झोली में। अपने मरहूम शौहर शाहिद लतीफ़ और भाई अज़ीम बेग का बहुत ज़िक्र करतीं थीं। लेकिन दुःख साझे नहीं करतीं थीं.…'जुनून' की शूटिंग में मिलीं। मैंने पूछा कहां एक्टिंग में फंस गयीं। तो बोलीं क्या जाता है मेरा? फ़ाईव स्टार होटल और शानदार खाना है। मौज मस्ती है.…चटपटे खाने की बहुत शौक़ीन थीं। खाते वक़्त खूब बातें करतीं। एक बार मुझसे बोलीं बड़ी मक्कार हो तुम। हस्बैंड को रवाना करके खूब बढ़िया-बढ़िया खाना खाती हो और गप्पें मारती हो.…छोटी-छोटी बातों का बहुत ध्यान रखतीं। पूरा सूटकेस पलट देतीं। समझौते नहीं कर सकतीं थीं.…मैंने ऊपरी तौर पर उन्हें ज़िंदगी से भरपूर देखा। लेकिन अंदर से मायूस और तनहा पाया। उन्होंने अपनी बेटियों का ज़िक्र बहुत कम किया। हां, नाती को कभी-कभी याद ज़रूर कर लेतीं। किसी को उनकी फ़िक़्र नहीं होती थी कि वो कहां हैं, कैसी हैं और कब लौटेंगी …उन दिनों वो हमारे घर पर रुकीं थीं। उनके लिए बंबई से फ़ोन आया। फलां फ्लाईट से फ़ौरन रवाना कर दें। मैं और मेरे पति अनवर उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने गए। वहीं बंबई जा रहे एक दोस्त मिल गए। हमने इस्मत आपा को उनके सिपुर्द कर दिया, इस ताक़ीद के साथ कि रास्ते भर उनका हर क़िस्म का ख्याल रखें और एयरपोर्ट से घर के लिए टैक्सी भी कर दें। दोस्त ने लौट कर बताया कि वो बलां की ज़िद्दी निकलीं। बंबई एयरपोर्ट पर उन्हें लेने कोई नहीं आया। टैक्सी करके सीधा बांद्रा चली गयीं अपने एक दोस्त के घर।
प्रसिद्ध लेखिका शबनम रिज़वी ने इस्मत आपा के अफ़सानों और नावेलों के किरदारों पर बड़े विस्तार से रौशनी डाली। वो खुद अव्वल दरजे की ज़िद्दी थीं। उनके किरदारों में अजीबो-ग़रीब ज़िद्द और इंकार साफ़ दिखता है। मुहब्बत करने वाला नफ़रत का इज़हार करता है। खेल-खेल में बात शुरू होती है। फिर नफ़रत में तब्दील हो जाते हैं। हमला करते हैं। मगर आख़िर आते-आते भावुक हो जाते हैं.…उनके किरदार वक़्त के साथ बदलते भी रहते हैं.… महिलाओं के लिए बहुत लिखा।
हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव ने रशीद जहां, अतिया हुसैन और कुर्तनलैन हैदर की पंक्ति में इस्मत चुग़ताई को रखते हुए बहुत बड़ी लेखिका बताया। यह सब लखनऊ के आधुनिक आईटी कॉलेज की पढ़ी हुईं थीं। उन्होंने अपने समाज की चिंता के साथ महिलाओं की आज़ादी की बात की है। उनकी प्रसिद्ध कृति 'लिहाफ़' में शोषण के परिप्रेक्ष्य की सिर्फ़ बात नहीं है। उनमें फ़िक्र है कि हालात क्या हैं, रिश्ते क्या हैं और ऐसे रिश्ते क्यों हैं और उनके किरदारों के शौक क्या हैं?…उन्होंने सेक्सुल्टी की बात की। उस भाषा में बात की जो उनके समाज के मिडिल क्लास में बोली जाती है। और उन विषयों पर लिखा जिन पर कभी किसी की निग़ाह नहीं गयी थी.…वो मूल्यों के साथ जुडी रहीं। कभी किसी तहरीक़ के साथ जुड़ कर नहीं लिखा। थोपी हुई बातें नहीं मानीं। जो मन में आया, लिखा…उनके अफ़सानों में १९४७ के पार्टीशन से उपजे सांप्रदायिक दंगों का दर्द है। दिलों में दरारें पड़ने का दर्द है। ऐसे संगीन माहौल में एक लेखक का फ़र्ज़ बनता है कि वो हस्तक्षेप करे। और इस्मत आप ने पूरे समर्पण के साथ बखूबी किया…वो पाखंड की धज्जियां उड़ाती हैं। 'कच्चे धागे' कहानी में उनकी यह फ़िक्र और उनकी विचारधारा दिखती है कि वो किसके साथ खड़ी हैं। बापू की जयंती के रोज़ आत्माएं शुद्द हो रही हैं। गंदी और घिनौनी। मगर लालबाग़ और परेल के इलाकों में एक भी तकली नाचती नज़र नहीं आती है। पच्चीस हज़ार श्रमिक कामगार मैदान में जमा हैं। छटनी की धार से ज़ख्मी मज़दूर, फीसों से कुचले विद्यार्थी, महंगाई के कारक और शिक्षक उम्मीद भरी नज़रों से आज़ाद मुल्क के रहनुमाओं को ताक रहे हैं। इंसान इंसान से नहीं हैवान से लड़ेगा। कामगार मैदान के चारों ओर पुलिस का पहरा है। मगर नाज़ायज़ शराब पर नहीं है, काले बाज़ार और चोर उच्चकों पर नहीं है। मैं इनके साथ हूं। भले मैं इस तूफ़ान में कतरा हूं और हर कतरा एक तूफ़ान है.…आज बहुमतवादी आतंक है। मूल्यों का क्षरण हो रहा है। ऐसे में इस्मत आपा की और उनके समर्पित लेखन की सख़्त ज़रूरत है।
मशहूर सीनियर उर्दू अफ़सानानिगार रतन सिंह ने इस्मत आपा को याद करते हुए बताया कि वो बेहद संजीदा औरत थीं। एक वाक़या याद है। एक जलसे में उनको सुनने और देखने वालों से हाल भरा हुआ था। मैं जगह न मिलने की वज़ह से पीछे एक कोने में खड़ा था। इस्मत आपा ने देखा। ज़ोर से बोलीं। पीछे क्यों खड़े हो? आगे आओ। इसके पीछे उनका मक़सद था, नई पीढ़ी के अदीबों आगे आओ। सीनियर अदीब जूनियर के लिए रास्ता साफ़ करो। एक जनरेशन दूसरी जेनरेशन को तैयार करती थी। हमें उनके काम को आगे बढ़ाना चाहिये…आज मुल्क़ में कोई ऐसा रिसाला नहीं है जिसमें पूरे मुल्क़ के अदब को देखा जा सके। कहानी के मामले में हमारा हिंदुस्तान बहुत आगे है।
मशहूर सीनियर उर्दू अफ़सानानिगार और सहाफ़ी आबिद सुहैल ने बताया कि इस्मत आपा सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में मशहूर थीं.… पहली मरतबे उन्हें १९६२ में देखा था। लखनऊ के बर्लिंग्टन होटल में एक जलसा हुआ। बेशुमार नौजवान अदीब जमा हुए इस्मत आपा को देखने और सुनने। उन्होंने अपील की। घर से बाहर निकलो। लोगों से मिलो, उन्हें देखो और लिखो…इस्मत आपा शादी के कुछ दिनों बाद तक अपने शौहर शाहिद लतीफ़ के नाम से लिखती रहीं। बाद में अपने नाम से लिखा…औरत जब चुटकी लेती है तो मर्द कसमसा कर रहा जाता है। इस्मत आपा इसमें माहिर थीं.…एक जलसे में जाने से पहले शाहिद ने उनसे कहा, मेरी कहानी के मुतल्लिक कुछ नहीं कहेंगी। मुंह बिलकुल बंद रखना। लेकिन वो अपना वादा नहीं निभा सकीं। कहानी की बखिया उधेड़ कर रख दी। वापसी पर शाहिद ड्राइव कर रहे थे और इस्मत उनका चेहरा देख रहीं थीं कि शाहिद कुछ बोलेंगे। लेकिन बिलकुल ख़ामोश रहे.....एक वाकया रामलाल के घर पर हुआ। हम सब वहां पहुंचे। रामलाल वो तमाम खतूत संभालने और खंगालने में लगे थे जिन्हें तमाम अदीबों ने उन्हें लिखे थे। इस्मत बोलीं यह सब बेकार मेहनत क्यों कर रहे हो। तुम्हारे जाने के बाद सब ख़त्म हो जायेगा। कोई इन्हें संभाल नहीं रखेगा… इस्मत के अफ़सानों में डायलॉग बहुत कम हैं। कहानी बनाई नहीं जाती, बल्कि चलती रहती है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष और ,जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर और उर्दू समालोचक शारिब रुदौलवी की निग़ाह में इस्मत चुग़ताई की कहानियां के ख़ास तरह की थीं। तरक़्क़ीपसंद अफ़साने लिखे। फ़िक्री कहानियां लिखीं, जिनकी बुनियाद मसायल हैं। मसायल में इंसान के काम की अहमियत है.…उर्दू में भंगी समाज पर सिर्फ़ दो अफ़साने लिखे गए हैं। एक कृष्ण चंदर ने लिखा - कालू भंगी। और दूसरा लिखा इस्मत ने - दो हाथ। यह इस्मत की ही हिम्मत थी कि उन्होंने उस किरदार की समाज में अहमियत बताई…उनके अफ़सानों को पढ़ कर लोग हैरान होते थे जब उन्हें यह पता चलता था कि ये खातून ने लिखे हैं। उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी.…अफ़साना तो कोई भी लिख सकता है। सवाल यह है कि मसला क्या है? इस्मत ऐसे मसायल लेकर चलती हैं जिनमें औरत की जद्दोजहद पूरी शिद्दत के साथ पेश की जाती है। उसे समाज में हक़ दिलाती हैं। इस्मत ने बदनामियों को झेल कर औरत को उसका मुक़ाम दिलाया। आज़ादी दिलाई… अफ़साने आते रहेंगे और अफ़सानानिगार भी। लेकिन इस्मत का आना मुश्किल है।
और आख़िर में मैं। इस्मत आपा वाक़ई अद्भुत थीं। वो मेरे मरहूम वालिद, उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार रामलाल. की दोस्त थीं। हमारे घर पर रहीं भी.…मैंने उन्हें पहली मरतबे १९६२ में देखा था। वो चारबाग़ वाले हमारे घर आईं थीं। बेहद खूबसूरत। मैं तो उन पर फ़िदा हो गया था। उस वक़्त मेरी उम्र १२ साल थी.…१९८७ में वो हमारे इंदिरा नगर घर आयीं। दो रोज़ रहीं भी। उनसे मैंने सिनेमा के बारे बहुत लंबी बात की। खास तौर पर दिलीप कुमार के बारे में। उनके शौहर शाहिद लतीफ़ ने दिलीप कुमार को 'शहीद' और 'आरज़ू' में डायरेक्ट किया था। इसकी कहानी इस्मत आपा ने लिखी थी। उन्होंने गुरुदत्त की 'बहारें फिर भी आयेंगी' भी डायरेक्ट की थी.…एक बार जब मैं बंबई घूमने गया था तो इस्मत आपा से तो घर पर मुलाक़ात हुई लेकिन शाहिद लतीफ़ साहब से मिलने हमें श्री साउंड स्टूडियो जाना पड़ा, जहां वो चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी के लिए 'जवाब आएगा' के शूटिंग कर रहे थे.…इस्मत आपा बहुत बिंदास थीं और जो बात उन्हें पसंद नहीं थी तो लाख बहस के वो हां नहीं करती थीं। मैंने उनसे कहा रामायण सीरियल का राम अरुण गोविल मुझे फूटी आंख नहीं सुहाता। इस पर वो बहुत नाराज़ हुईं… वो थ्री कैसल विदेशी सिगरेट पी रही थी। मैं उन्हें ललचाई आंखो से देख रहा था। वो समझ गयीं। अपने पर्स से एक डिब्बी निकाल कर मुझे पकड़ा दी। मैंने इसे किसी से शेयर नहीं किया। रोज़ एक एक करके पी डाली…उनके इंतक़ाल की ख़बर ने हतप्रद कर दिया। बड़ा अजीब लगता है और ख़ालीपन सा भी, जब कोई ऐसा गुज़र जाए जिसे बहुत करीब से देखा और समझा हो। और फिर इस्मत आपा तो हमारे परिवार की थीं।
कार्यक्रम में साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता से जुड़े जुगल किशोर, के.के.चतुर्वेदी, सुशीला पुरी, विजय राज बली, ऋषि श्रीवास्तव आदि तमाम जानी-मानी हस्तियों मौजूद थीं।
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१५-०८-२०१५
 साभार :

 https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1666357396931216?pnref=story

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश