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Published on Apr 3, 2017 प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना के तहत बैंक किसानों के खातों से बिना पूछे पैसे काट रहे हैं. जनवरी 2016 में शुरू की गयी प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गयी है. संकलन-विजय माथुर,
फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) "लो जी! मैने सारी मूर्खता की लिस्ट खोल दी, अब आप मनचाही मूर्खता भुनाने का मन बना सकते हैं। इन सबमें तरक्की की पूरी गारंटी है, बस आपको अपने ईमान की गारंटी खोनी है। वे चौक कर बोले, ना बाबा ना और कुछ खोने को कह दो मंजूर है पर ईमान नहीं खो सकेंगे। मैं मुस्कराई शर्माजी ईमान के अलावा और है क्या आपके पास ? जो खोने को कह दूँ। मेरे दिये विवरण से शर्माजी मूर्खता की जटिलता को समझ गये। वे बोले- मूर्खता भुनाने का कौषल मुझमें नहीं। मैं यूँ ही सही।"
वीना सिंह
व्यंग्य लेख: वीना सिंह भई! किसी को मूर्ख बनाना तो फिर भी आसान है पर मूर्खता भुनाना सरल काम नहीं है। लेकिन जिसको भी मूर्खता भुनाना आ गया समझ लो भइया वह छा गया। अभी तक का रिकार्ड तो यही बताता है कि छाए वही हैं, अपनी पहचान बनाये वही हैं जो मूर्खता भुनाने का हुनर सीख गये है। बुद्धिमानों की तो आजकल कद्र ही नहीं होती, मूर्ख ही हाईलाइट होते रहते हैं। तो शर्माजी ने सोचा कि अब मूर्खता सीखी जाए और भुनाई जाए। हां जी! शर्माजी अपनी बुद्धिमानी से त्रस्त हैं। कह रहे हैं मैं पढ़ाई लिखाई में टापर रहा हूं पर आज तक पापड़ बेल रहा हूं। मूर्ख लोग अपनी मूर्खता भुना रहे है। सुख सुविधाओं भरा जीवन बिता रहे हैं और मैं अपना ज्ञान तक नहीं भुना रहा हूं। अपनी डिग्रियों भरी फाइल लिए यहां-वहां घूम रहा हूं। इससे तो अच्छा मैं मूर्ख ही होता। मैने कहा नहीं शर्माजी केवल मूर्ख होने से काम नहीं चलताए भुनाना आना भी जरूरी है। फिर समझ लो जीवन में उमंग और तरंग है। अब तो उन्होंने मूर्ख बनने तथा मूर्खता भुनाने की ठान ली। बोले बताओ ऐसे मूर्खों का पता ठिकाना, मैं उनकी शरण में जाकर यह हुनर सीख लूंगा। अपना बचाव करते हुए मैने कहा- वैसे मैं मूर्ख तो नहीं हूं पर कुछ मूर्खों के पते ठिकाने जानती जरूर हूं । अपने देश में मूर्ख तो वैसे तरह-तरह के हैं पर मैं कुछ खास मूर्खों के नाम गिनाती हूं जो हम सबके रोज मर्रा के कामों में आते है। हम इनसे चाह कर भी बच नहीं पाते हैं। मूर्ख बन ही जाते है। अब आप ज्योतिषी जी को ही ले लीजिए, इनके पास दूसरों के जीवन का भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों का पूरा लेखा जोखा होता है। यह दूसरों का जीवन चक्र बताते बताते अपनी कई पीढ़ियों का जीवन चक्र सुधार लेते हैं। शरण में गये शरणार्थियों के जीवन की व्याधियों को दूर करने के लिए तंत्र-मंत्र टोना-टोटका में सिद्धि प्राप्त हितैषियों के पास भेज देते है (जैसे डॉक्टर अपने मरीज को चेकअप के बाद टेस्टिंग के लिए दूसरे के पास रेफर कर देता हैं) फिर दोनों मिल बांट कर खाते हैं। इसी तरह धार्मिक संत, कथावाचक, संन्यासी, स्वामीजी, गुरूजी आदि अपने मुंह से बोला एक-एक शब्द भुनाते हैं। यह तथाकथित धर्मात्मा लोगों की आत्मा में घुस कर खूब धन और यश कमाते हैं। अनायास ही भगवान का दर्जा पा जाते हैं। लोगों का आनन-फानन पैसा काले धन की तरह छुपाते हैं और भोग विलासिता भरा सुखमय जीवन बिताते हैं। यह सब बड़ी-बड़ी कोठियों के मालिक होते हैं और दिखावे में एक छोटी कुटी व सादा भोजन में ही सुख शांति बताते हैं। पढ़ते एक किताब तक नहीं और खुद को षास्त्रों का ज्ञाता जताते है। इसके अतिरिक्त गांव के नीम हकीम हैं (झोलाछाप डॉक्टर)। भई! इनके क्या कहने ? यह बड़े-बड़े सर्जनों पर भी भारी हैं। इनकी तो बात ही निराली है इनके थैले में हर मर्ज का इलाज है (यानि यह डॉक्टर बाबू छोटी बड़ी हर मर्ज के एक्सपर्ट हैं।) समझ लो इनका थैला जिन्न का चिराग है जब इससे इलाज निकलता है, मरीज को समाप्त और डॉक्टर जी को मालामाल कर देता है। इसके अलावा यदि आपको सबसे बड़ी मूर्खता भुनानी हो तो नेताजी बनने की ठान लीजिए, मतलब देश की बागड़ोर की जिम्मेदारी ले लीजिए। बड़ा काम है पर मूर्खता से आसान है। ज्ञान, ध्यान से परे इसमें कूटनीति ही महान है। दिमाग़ के घोड़े चाहें बांध लो बस जुबान को सरपट दौड़ाना है। सबको सुमधुर बातों से लुभाना है। सारी मूर्खताओं में यह बेजोड़ है। चाहुदिषाओं में इसका षोर है। इससे अलग विज्ञापन व्यापार, हाट-बाजार, ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार आदि में भी अनेकों मूर्खता भुनाने के उपाय हैं। लो जी! मैने सारी मूर्खता की लिस्ट खोल दी, अब आप मनचाही मूर्खता भुनाने का मन बना सकते हैं। इन सबमें तरक्की की पूरी गारंटी है, बस आपको अपने ईमान की गारंटी खोनी है। वे चौक कर बोले, ना बाबा ना और कुछ खोने को कह दो मंजूर है पर ईमान नहीं खो सकेंगे। मैं मुस्कराई शर्माजी ईमान के अलावा और है क्या आपके पास ? जो खोने को कह दूँ। मेरे दिये विवरण से शर्माजी मूर्खता की जटिलता को समझ गये। वे बोले- मूर्खता भुनाने का कौषल मुझमें नहीं। मैं यूँ ही सही। http://dastaktimes.org/archives/151490
भुवन शोम फिल्म के माध्यम से निर्देशक ने हास्य नाटकीयता के द्वारा यह सिद्ध किया है कि, एक सिद्धांतनिष्ठ कडक प्रशासनिक अधिकारी को भी नारी सुलभ ममता द्वारा व्यावहारिक धरातल पर नर्म मानवीय व्यवहार बरतने हेतु परिवर्तित किया जा सकता है। रेलवे के प्रशासनिक अधिकारी भुवन शोम के रूप में उत्पल दत्त जी व ग्रामीण नारी गौरी के रूप में सुहासिनी मुले जी ने मार्मिक अभिनय किया है। प्रारम्भिक अभिनेत्री होते हुये भी परिपक्व अभिनेता उत्पल दत्त जी के साथ सुहासिनी मुले जी का अभिनय सराहनीय है। यह गौरी का ही चरित्र था जिसने उसके पति जाधव पटेल का निलंबन रद्द करने को भुवन शोम जी को प्रेरित कर दिया।
UTPAL DUTT BIO
Utpal Dutt (Bangla: উত্পল দত্ত) (March 29, 1929 – August 19, 1993) was an Indian actor, director and writer. He was primarily an actor in Bengali Theatre, but he also acted in many Bengali and Hindi films. He received National Film Award for Best Actor in 1970 and three Filmfare Best Comedian Awards वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के भुवन शोम के लिए राष्ट्रीय फिल्म ..
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पद्मनाभन साहब की नज़र से तीन वर्षों में दो बार ऐसा होना उत्तर प्रदेश के मतदाताओं में संरचनात्मक बदलाव है। क्योंकि देश की जनसंख्या में नौजवानों की आबादी काफी ज़्यादा हो गई है और वह युवा आबादी किसी परंपरा में आसानी से नहीं बंधती।यह स्थिति इन मतदाताओं को अपनी पहचान से परे जाकर अपनी प्राथमिकताए तय करने की राह दिखाती है। परंतु मुझे जो जानकारी 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद आज से तीन वर्ष पहले हासिल हुई थी उसके अनुसार प्राथमिकताओं में बदलाव की यह प्रक्रिया 2011 / 12 में शुरू की गई थी। व्हाईट हाउस में तब के प्रेसीडेंट बराक हुसैन ओबामा साहब ने विश्व भर के दलित-पिछड़ों की एक बैठक की थी जिसमें भारत से गए लोगों में लखनऊ विश्वविद्यालय के एक तत्कालीन हिन्दी अध्यापक भी शामिल हुये थे। उस बैठक में ही यह तय हुआ था कि विश्व भर से किस प्रकार मुस्लिमों का सत्ता में अस्तित्व समाप्त करना है।उसी योजना के तहत कारपोरेट समर्थक 'भ्रष्टाचार आंदोलन' चलवाया गया था और उसी योजना का यह परिणाम था कि, 2014 के लोकसभा चुनावों में दलित वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को पड़ा था और लोकसभा में बसपा 'शून्य ' हो गई थी। 2017 का यू पी चुनाव परिणाम उसी व्यवस्था का विस्तार है जिसने दलित वर्ग के साथ - साथ पिछड़े वर्ग का भी वोट बसपा / सपा के बजाए भाजपा को पड़ा है। चुनाव विश्लेषणों से सिद्ध है कि, यू पी विधानसभा में इस बार अगड़े अर्थात सवर्ण वर्ग के विधायक अधिक चुने गए हैं। दलित, पिछड़ा और मुस्लिम प्रतिनिधित्व काफी कम हुआ है। आज ईस्ट इंडिया कंपनी सरीखा 'साम्राज्यवाद ' स्थापित करना संभव नहीं है। अतः कारपोरेट कंपनियों द्वारा नियंत्रित तथाकथित राष्ट्रवाद अर्थात अप्रयक्ष साम्राज्यवाद स्थापित किया जा रहा है जो कि, जनतंत्र की समाप्ती एवं अधिनायकतंत्र के आगमन का संकेत प्रस्तुत करता है। (विजय राजबली माथुर ) *********************************************** फेसबुक कमेंट्स :