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Tuesday, 10 November 2015

संघी भारतीय संस्कृति में विश्वास ही नहीं रखते इनका गणवेश तक विदेशी है विचारधारा भी आयातित है*** संध्या नवोदिता

***संघियों  की भाषा शैली है...........माँ- बहन की भद्दी गालियाँ, स्त्री का चरित्र हनन, द्विअर्थी संवाद ...खुद इनकी अपनी वाल भी अश्लीलता से भरी होती है | अश्लील तस्वीरें, अश्लील चुटकुले, फूहड़ मज़ाक जो स्त्रियों को लेकर होते हैं और अपनी वाल की इस सडांध भरी गंदगी को वे किसी देवी देवता की तस्वीर से ढंकने का प्रयास करते हैं ......वेद इन्होने कभी पढ़ा नहीं| पढ़ी तो इन्होने मानस और गीता भी नहीं| वरना गार्गी, अपाला, द्रोपदी की तर्क शक्ति ये जानते तो स्त्रियों की वाल पर अपनी कुंठा का वमन न कर रहे होते| इनके लिए स्त्री केवल भोग की वस्तु है ***संघ की ड्रेस काली टोपी, खाकी निक्कर ये सब विदेशी हैं| ये लोग भारतीय संस्कृति में विश्वास ही नहीं रखते| इनका गणवेश तक विदेशी है| विचारधारा भी आयातित है***



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मुझे संघियों से क्या समस्या है ? क्योंकि वे निहायत पिछड़ी और सामन्ती मानसिकता के होते हैं | उनसे इस मंच पर बहुत संवाद करने का प्रयास किया है, पर वे तर्क और तथ्य के बजाय फ़ौरन गाली गलौज, चरित्र हनन और अश्लीलता पर उतर आते हैं |
माँ- बहन की भद्दी गालियाँ, स्त्री का चरित्र हनन, द्विअर्थी संवाद ही इनकी भाषा शैली है |
ये वेद वेद बस चिल्लाते ही हैं, वेद इन्होने कभी पढ़ा नहीं| पढ़ी तो इन्होने मानस और गीता भी नहीं| वरना गार्गी, अपाला, द्रोपदी की तर्क शक्ति ये जानते तो स्त्रियों की वाल पर अपनी कुंठा का वमन न कर रहे होते| इनके लिए स्त्री केवल भोग की वस्तु है, ये उसे फैसलों में शामिल नहीं करते|
कम से कम मेरा अनुभव तो यही है | मुझे दर्जनों संघियों को ब्लॉक करना पड़ा है| खुद इनकी अपनी वाल भी अश्लीलता से भरी होती है | अश्लील तस्वीरें, अश्लील चुटकुले, फूहड़ मज़ाक जो स्त्रियों को लेकर होते हैं और अपनी वाल की इस सडांध भरी गंदगी को वे किसी देवी देवता की तस्वीर से ढंकने का प्रयास करते हैं |
इसका कारण उनके संस्कारों में है. अक्सर वे निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि के बेरोजगार नौजवान या अधेड़ हैं| या फिर अपने व्यवसाय में बहुत सफल लोग नहीं हैं | वे अपने काम में सफल नहीं हैं | और बहुत बार खाली दिमाग शैतान का घर होता है, सो वे खूब खुराफाती हैं |
अपनी कम अकली और गैर तार्किक सोच के कारण वे ठस्स दिमाग के हैं| उनका आई क्यू स्तर कम है| वे गणित और विज्ञान और दुनिया की तमाम भाषाओं से अपरिचित हैं| वे दारू पीते हैं , जगराता करते हैं, सड़क पर निकलते हैं लडकी छेड़ते हैं, फेसबुक पर आते हैं अश्लील टिप्पणी करते हैं| रिश्तेदारों के घर जाते हैं अपने माँ बाप को जलील करते हैं| वे अपने मोहल्ले में अराजक गुंडे की पहचान लिए होते हैं|
आप उन्हें हिन्दू न समझें| इस देश का बहुसंख्यक हिन्दू बहुत उदार और सर्व धर्म समभाव वाला है | ऐसे हिन्दुओं के कारण ही भारत का राष्ट्रीय चरित्र सुरक्षित है| यही हिन्दू हैं जिनके कारण यह देश कई संस्कृतियों और कई धर्मो का देश है| यही हिन्दू हैं जिनके कारण यह देश महकता है |
बहुसंख्यक हिन्दू तो संघियों को पसंद ही नहीं करता| उनसे एक सुरक्षित दूरी बना के चलता है| वह अपने बच्चों को कूप मण्डूक स्कूलों में नहीं पढ़ाता और ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देता है| वह अपने बच्चों को एक उदार और ज़िम्मेदार नागरिक बनाता है| वह दंगों और साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलता है| वह धार्मिक है, मंदिर जाता है पर गैर धर्मियों से नफरत नहीं करता, वह विधर्मियों को मारने काटने की वकालत नहीं करता| यही वह हिन्दू है जो वैज्ञानिक भी है, साहित्य भी रचता है, फ़िल्में बनाता है और स्त्रियों से बराबरी से बात भी करता है|
पर नौजवान अगर संघी सोच के बने तो इसमें सिर्फ उनका कुसूर नहीं है| गैर तार्किक शिक्षा और बेरोजगारी तमाम नौजवानों को बम, गोला, बारूद में तब्दील कर रही है| अगर इन्हीं नौजवानों को बेहतर शिक्षा के साथ मनचाहा काम मिला होता, कुछ सर्जनात्मक टास्क जीवन में होता तो ये एक पल यहाँ न रहते|
तार्किक होने के लिए पढ़ना पड़ता है| बहुत सारा इतिहास, विज्ञान, भूगोल, राजनीति, दर्शन कला.... जब कोई भी खूब पढता है, दुनिया को जानता और समझता है तो वह खुद ही संकीर्णता से ऊपर उठ जाता है|
प्रेम करें... लेकिन संघ में तो प्रेम होता ही नहीं | वहां स्त्री सदस्य नहीं बन सकती| वहां स्त्री पुरुष बराबर दर्जे पर नहीं होते| वहाँ स्त्री को तर्क का अधिकार ही नहीं, जब सदस्यता ही नहीं, तो तर्क कैसा? संघ के सरसंघचालक हमेशा पुरुष ही होते हैं, वह भी एक ख़ास किस्म के ब्राह्मण के लिए पद आरक्षित है| वहां सरसंघ चालक चुना नहीं जाता, बल्कि मनोनीत होता है| संघ लोकतंत्र में यकीन नहीं रखता|
और दूसरा संघ की ड्रेस काली टोपी, खाकी निक्कर ये सब विदेशी हैं| ये लोग भारतीय संस्कृति में विश्वास ही नहीं रखते| इनका गणवेश तक विदेशी है| विचारधारा भी आयातित है|
ये ठेठ सामन्ती मूल्य हैं| इनमे पला व्यक्ति कैसे किसी का आदर करना सीखेगा| वह रिजिड ही होगा|

Saturday, 12 January 2013

'भ्रष्ट जर्जर पूंजीवादी' संस्कृति का खुलासा ---विजय राजबली माथुर

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हमारे भारतीय जनता पार्टी के तथाकथित जागरुक साथिओ की आज अखबारों में खबर और फोटो छापी है और लिखा है की इन्होने पकिस्तान को घर में बैठ कर चेतावनी भी दी है |आज कुछ अखबार नयी दुनिया में यह फोटो भी छापी है जिसमे भाजपा के नेताओं ,कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के साथ राज्योत्सव के कार्यक्रमों में अपने निकृष्ट कर्मो के लिए पुरस्कार लेती आमदुला ,डौंडी कन्या आश्रम की अधीक्षिका अनिता ठाकुर है |भारतीय जनता पार्टी और संघ के नेताओ और नीतिओ की खासियत यही है की ये लोग अफवाह उड़ाने ,मुद्दे भड़काने और अपने ऊपर लगे आरोपों को दबाने और आम आदमी का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाते है चाहे वो स्थानीय स्थर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर |कंदर ,डौंडी के साथ ही आने वाले दिनों में पुरे राज्य के आश्रम और केंद्र जिनमे बहुत से भाजपा के समर्थित लोगो के स्वयंसेवी संस्थाओ के द्वारा संचालित होती है उनकी कारगुजारिओ को दबाने के ऐसे बहुत से प्रयास जारी है |
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उपरोक्त स्कैन कटिंग एवं फेसबुक नोट यह सोचने पर बाध्य करता है कि,भारतीय संस्कृति-भारतीय संस्कृति का राग अलापने वाली पार्टी के शासन मे सरकारी विद्यालय के सरकारी छात्रावास मे हुये जिन कारनामों का खुलासा हुआ है उनको पढ़ सुन कर कौन कहेगा कि यही भारतीय संस्कृति है?वस्तुतः उस शासक पार्टी का प्रेरक RSS है जिसका वास्तविक अर्थ ही है-'रियूमर स्पीचुएटेड सोसाईटी'। अर्थात अफवाहे फैलाना ही उनका मुख्य कार्य है और वही उनका मूल उद्देश्य भी है। 
 
16 दिसंबर के वीभत्स कांड पर घड़ियाली आँसू बहाने वाले RSS/भाजपा के अपने शासित राज्य मे सरकारी संरक्षण मे हुये घृणित एवं निंदनीय जघन्य कुकृत्य की जितनी भी भर्त्सना की जाये कम है। जनता को अब तो समझ लेना चाहिए कि भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन को कमजोर करने हेतु ही सांप्रदायिक RSS व मुस्लिम लीग का गठन ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने शासन को और अधिक समय तक बनाए रखने हेतु करवाया था। आज भी पाकिस्तान और भारत तथा बांग्लादेश मे भी ऐसे तत्व साम्राज्यवाद के हितों के संरक्षणार्थ फिरकापरस्त बयानबाजी और हरकतें करते रह कर जनता को भटकाते आ रहे हैं। 
 
अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहते हुये जनता को ऐसे सभी तत्वों को जड़-मूल से ठुकरा देना चाहिए। 
 


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर