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Wednesday, 1 March 2017

'इज्जत' के झूठे दिलासे दरअसल गुलामी की जंजीरें हैं... ------ Bindu Bikash Ojha

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Bindu Bikash Ojha
आज दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की ने कहा- 'घर वाले कहते हैं कि अब कॉलेज-वॉलेज छोड़ो... वे अपनी पसंदीदा टीवी चैनल [पर पसरे आतंक और हंगामे को] देख कर यह फरमान सुनाते हैं..।' इसके आगे शायद उसकी आवाज घुट कर रह गई..। वह शायद यह कहना चाहती थी कि कितनी-कितनी जद्दोजहद के बाद घर की चारदिवारी के बाहर निकल सकने और कॉलेज के जरिए अपना आसमान तलाशने का... अपने भरोसे खड़ा हो सकने का... अपनी तरह से जीने की उम्मीद पालने का मौका मिल सका है... अब शायद वह छिन जाएगा..।

यह दिल्ली में रहने वाले एक परिवार की लड़की का दर्द है...। इस परिवार के दिमाग पर टीवी है, और टीवी में एबीवीपी का आतंक है... उसकी गुंडागर्दी है... थोड़ा बोलने वाली लड़की को दी जाने वाली बलात्कार की धमकी है... बाल पकड़ कर घसीटी जाती लड़कियां हैं... लड़कियों को अपने पैंट खोल कर यौनांग दिखाते स्टूडेंट्स के नाम पर कुछ गुंडे-लुच्चे-लफंगे हैं... और इन सबके बीच अपनी बेटी की फिक्र है...।

इस फिक्र में पता नहीं कितने-कितने पहलू छिपे हैं..। यह फिक्र है कि सत्ता है... यह लड़की के आखिरी हश्र पर तय होगा...। 

जेएनयू में चारों तरफ कंडोम बिखरे पड़े हैं... डीयू में लड़कियों को बलात्कार की धमकी है... सभी कॉलेज में लड़़कियों के 'चरित्र' पर... 'इज्जत' पर आंच है... इसलिए लड़कियों को कॉलेज में नहीं जाना चाहिए...। परिवार की औकात है तो पांच-दस लाख खर्च करके प्राइवेट कॉलेजों में जाइए या फिर बकौल मोहन भागवत तसल्ली से रसोई के काम में कारीगरी हासिल कीजिए...।

इस आईने में दिल्ली से बाहर के राज्यों, जिलों, कस्बों में मौजूद परिवारों के बारे में सोचिए कि वहां बजरिए टीवी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों को लेकर कौन-सी छवि बन रही होगी... और उन घरों की दहलीज से निकल कर कॉलेज के जरिए नए सपने देखना लड़कियों के लिए कितना मुश्किल हुआ होगा..। 

तो क्या एजेंडा यही है कि पिछले बीस-तीस सालों के दौरान लड़कियों ने... और दलित-वंचित जातियों के बच्चों ने कॉलेजों-विश्वविद्यालयों के जरिए जो थोड़ा सिर उठा कर चलने के सपने देखना शुरू किया था, उन्हें वापस अपनी हैसियत पर लौटा देना है...?


नहीं लड़की... बदनामी अगर बदनामी ही है... तो इस बदनामी की कोई भी जोखिम उठा लेना... लेकिन घर की दहलीज के भीतर मत लौटना...। चारदिवारियों में कैद 'इज्जत' के झूठे दिलासे दरअसल गुलामी की जंजीरें हैं... जो जिंदगी के... जीने के हर ख्वाब छीन लेती हैं...।
https://www.facebook.com/bindubikash.ojah/posts/790366574445726?comment_id=790499701099080&comment_tracking=%7B%22tn%22%3A%22R2%22%7D

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Wednesday, 5 November 2014

किसी राष्ट्र के लिए परम वैभव क्या होगा ?---अरविंद राज स्वरूप

अरविंद राज स्वरूप ,सह सचिव, भाकपा , उ . प्र .

श्री मोहन भागवत जी किसी राष्ट्र के लिए परम वैभव क्या होगा ?
कल आगरा में श्री भागवत ने संघ के कार्यकर्ताओ को संबोधित किया। कहा " संघ ही देश को परम वैभव दिला सकता है"(जागरण 4-11-2014 कानपुर)
21वीं शताब्दी में किसी राष्ट्र/देश के लिए वैभव की क्या परिभाषा होगी।
सामान्य एवं मान्य समझ के अनुसार जिस समाज/ देश में:
# मानव द्वारा मानव का शोषण न हो।
# सामाजिक एवं आर्थिक न्याय हो।
# सामाजिक असमानता पनपने के सारे कारण समाप्त कर दिए गए हों।
# प्रत्येक धर्मावलम्बी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता हो और उक्त धार्मिक निजता में राज्य का सरोकार उसी हद तक हो जिससे विभिन्न धार्मिक समूहों में यदि कोई विरोधाभाव पैदा हो तो उसका निवारण हो सके।
# महिलाओ को बराबरी का हक़ और सम्मान मिले।

यदि भारत का संविधान देखा जाये तो उसके' राज्य की निति के निदेशक तत्वों 'में भारत को परम वैभव शाली राज्य बनाने के बहुत से सूत्र दिए गए हैं।
क्या आपका आशय उसी वैभव से है भागवत जी?
लेकिन आपने अपने संबोधन में जो दो उदहारण प्रस्तुत किये हैं उनकी दशा तो वैभव हीन सम्माज की है।
जापान: 

 दूसरे विश्वयुद्ध में जापान का टोजो, हिटलर - मुसोलिनी की धुरी  का हिस्सा था। वहा का विकास पूंजीवादी पूंजी प्रधान विकास है और बावजूद 12 करोड़ की आबादी के आर्थिक असमानताए और विषमताए विद्यमान हँ। गरीबी और अमीरी का बड़ा अंतर है। जिनी की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार वहाँ गरीबी की दर 8%है। यह बात अलग है की वहाँ के गरीब भारत के अमीरों के बाराबर हों।
इजराइल:
82 लाख की आबादी का एक ऐसा देश है जो सिर्फ और सिर्फ अमरीका और अन्य धनी मुल्को की वजेह और मदद से चौधरी बना बैठा है। वहाँ के एक एक उद्योग में विदेशी बहु राष्ट्रीय कंपनियों का पैसा लगा है।
अरब देशो के नवाब शेख बेहद अमीर हैं पर उन देशो के आम लोग तो गरीब हैं और वो अधिकतर उन्ही लोगो को मारता है और संघ के सबसे बड़े पदाधिकारी द्वारा परम वैभव के ऐसे आदर्श प्रस्तुत किये जा रहे हैं ! क्या मानवता से कोई सरोकार नहीं है?
भागवत जी ! यह कैसा वैभव है?और न ही यह स्थिति भारत के " वसुधैव कुटुम्बकम"के दर्शन को अभिव्यक्त करती है।
वास्तव में संघ प्रमुख जी आप बड़े बड़े प्रचंड शब्दों का प्रयोग करके उस सच्चाई को छिपाना चाहते हैं जो है पूंजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण। आप उक्त उदाहारणों से केवल उन्ही की प्रशस्ति का गायन कर रहे हैं और इस पुरातन सभ्यता और संस्कृति के देश वासियों को ऐसे ही वैभव और श्री विहीन सामाज की ओर उन्मुख होने का सन्देश दे रहे हैं !ये कैसा देश प्रेम है?
देश का नौजवान श्री भागवत से यह भी पूछना और जानना चाहता है की देश के परम वैभव की एक घड़ी 15 अगस्त 1947 थी जब देश अंग्रेजो की दास्ता से मुक्त हुआ।
जवाब दे संघ की उस परम वैभव तक पहुचने में 1925(जन्म काल से) 1947 तक क्यो उसकां कोई योगदान नहीं था!