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Wednesday, 13 May 2020

20 साल बाद क्यों याद किया Y2K को मोदी ने ------ रवीश कुमार

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20 साल बाद क्यों याद किया Y2K को मोदी ने, 21 वीं सदी का पहला ग्लोबल झूठ था Y2K

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई के अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि इस सदी की शुरूआत में दुनिया में Y2K संकट आया था, तब भारत के इंजीनियरों ने उसे सुलझाया था। प्रधानमंत्री ने जाने-अनजाने में कोरोना संकट की वैश्विकता की तुलना Y2K जैसे एक बनावटी संकट से कर दी। एक ऐसे संकट से जिसके बारे में बाद में पता चला कि वो था ही नहीं। जिन्होंने इसके बारे में सुना होगा वो इसकी पूरी कहानी भूल चुके होंगे और जो 1 जनवरी 2000 के बाद पैदा हुए, मुमकिन है उन्हें कहानी पता ही न हो। Y2K का मतलब YEAR 2000 है जिसे संक्षेप Y2K लिखा गया।

Y2K इस सदी का पहला ग्लोबल फेक न्यूज़ था जिसे मीडिया के बड़े-बड़े प्लेटफार्म ने गढ़ने में भूमिका निभाई। जिसकी चपेट में आकर सरकारों ने करीब 600 अरब डॉलर से अधिक की रकम लुटा दी। इस राशि को लेकर भी अलग अलग पत्रकारों ने अपने हिसाब से लिखा। किसी ने 800 अरब डॉलर लिखा तो किसी ने 400 अरब डॉलर लिख दिया। तब फेक न्यूज़ कहने का चलन नहीं था। HOAX यानि अफवाह कहा जाता था। Y2K संकट पर ब्रिटेन के पत्रकार निक डेविस ने एक बेहद अच्छी शोधपरक किताब लिखी है जिसका नाम है फ्लैट अर्थ न्यूज़( FLAT EARTH NEWS),यह किताब 2008 में आई थी।

Y2K को मिलेनिम बग कहा गया। अफवाहें फैलाई गईं और फैलती चली गईं कि इस मिलेनियम बग के कारण 31 दिसंबर 2000 की रात 12 बजे कंप्यूटर की गणना शून्य में बदल जाएगी और फिर दुनिया में कंप्यूटर से चलने वाली चीज़ें अनियंत्रित हो जाएंगी। अस्पताल में मरीज़ मर जाएंगे। बिजली घर ठप्प हो जाएंगी। परमाणु घर उड़ जाएंगे। आसमान में उड़ते विमानों का एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट जाएगा और दुर्घटनाएं होने लगेंगी। मिसाइलें अपने आप चलने लगेंगी। अमरीका ने तो अपने नागरिकों के लिए ट्रैवल एडवाइज़री जारी कर दी।

इसी के जैसा भारत के हिन्दी चैनलों में एक अफवाह उड़ी थी कि दुनिया 2012 में ख़त्म हो जाएगी। जो कि नहीं बल्कि लोगों में उत्तेजना और चिन्ता पैदा कर चैनलों ने टी आर पी बटोरी और खूब पैसे कमाए। इसकी कीमत पत्रकारिता ने चुकाई और वहां से हिन्दी टीवी पत्रकारिता तेज़ी से दरकने लगी। मंकी मैन का संकट टीवी चैनलों ने गढ़ा। कैराना के कश्मीर बन जाने का झूठ गढ़ा था।

कई सरकारों ने Y2K संकट से लड़ने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया। भारत भी उनमें से एक था। आउटलुक पत्रिका में छपा है कि भारत ने 1800 करोड़ खर्च किए थे। Y2K को लेकर कई किताबें आईं और बेस्ट सेलर हुईं। इस संकट से लड़ने के लिए बड़ी बड़ी कंपनियों ने फर्ज़ी कंपनियां बनाईं और सॉफ्टवेयर किट बेच कर पैसे कमाए। बाद में पता चला कि यह संकट तो था ही नहीं, तो फिर समाधान किस चीज़ का हुआ?

भारत की साफ्टवेयर कंपनियों ने इस संकट का समाधान नहीं किया था। बल्कि इस अफवाह से बने बाज़ार में पैसा बनाया था। ये वैसा ही था जैसे दुनिया की कई कंपनियों ने एक झूठी बीमारी की झूठी दवा बेच कर पैसे कमाए थे। जैसे गंडा ताबीज़ बेचकर पैसा बना लेते हैं। बेस्ट सेलर किताबें लिखकर लेखकों ने पैसे कमाए थे और एक ख़बर के आस-पास बनी भीड़ की चपेट में मीडिया भी आता गया और वो उस भीड़ को सत्य की खुराक देने की जगह झूठ का चारा देने लगा ताकि भीड़ उसकी खबरों की चपेट में बनी रहे।

31 दिसंबर1999 की रात दुनिया सांस रोके कंप्यूटर के नियंत्रण से छुट्टी पाकर बेलगाम होने वाली मशीनों के बहक जाने की ख़बरों का इंतज़ार कर रही थी। 1 जनवरी 2000 की सुबह प्रेसिडेंट क्लिंटन काउंसिल ऑन ईयर 2000 कंवर्ज़न के चेयरमैन जॉन कोस्किनेन एलान करते हैं कि अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है। उन तक ऐसी कोई जानकारी नहीं पहुंची है कि Y2K के कारण कहीं सिस्टम ठप्प हुआ हो। Y2K कोई कहानी ही नहीं थी। कोई संकट ही नहीं था। 21 वीं सदी का आगमन झूठ के स्वागत के साथ हुआ था। उस दिन सत्य की हार हुई थी।

पत्रकार निक डेविस ने अपनी किताब में लिखा है कि ठीक है कि पत्रकारिता के नाम पर भांड, दलाल, चाटुकार, तलवे चाटने वाले पत्रकारों ने बेशर्मी से इस कहानी को गढ़ा, उसमें कोई ख़ास बात नहीं है। ख़ास बात ये है कि अच्छे पत्रकार भी इसकी चपेट में आए और Y2K को लेकर बने माहौल के आगे सच कहने का साहस नहीं कर सके। निक डेविस ने इस संकट के बहाने मीडिया के भीतर जर्जर हो चके ढाचे और बदलते मालिकाना स्वरूप की भी बेहतरीन चर्चा की है। कैसे एक जगह छपा हुआ कुछ कई जगहों पर उभरने लगता है फिर कॉलम लिखने वालों लेकर पत्रकारों की कलम से धारा प्रवाह बहने लगता है।


Y2K की शुरूआत कनाडा से हुई थी। 1993 के मई महीने में टॉरोंटो शहर के फाइनेंशियल पोस्ट नाम के अखबार के भीतर एक खबर छपी। 20 साल बाद मई महीने में ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सदी के पहले ग्लोबल फेक न्यूज़ को याद किया। तब कनाडा के उस अखबार के पेज नंबर 37 पर यह खबर छपी थी। सिंगल कॉलम की ख़बर थी। बहुत छोटी सी। खबर में थी कि कनाटा के एक टेक्नालजी कंसल्टेंट पीटर जेगर ने चेतावनी दी है कि 21 वीं दी की शुरूआत की आधी रात कई कंप्यूटर सिस्टम बैठ जाएंगे। 1995 तक आते आते यह छोटी सी ख़बर कई रूपों में उत्तरी अमरीका, यूरोप और जापान तक फैल गई। 1997-1998 तक आते आते यह दुनिया की सबसे बड़ी खबर का रुप ले चुकी थी। बड़े-बड़े एक्सपर्ट इसे लेकर चेतावनी देने लगी और एक ग्लोबल संकट की हवा तैयार हो गई।

Y2K ने मीडिया को हमेशा के लिए बदल दिया। फेक न्यूज़ अपने आज के स्वरुप में आने से पहले कई रुपों में आने लगा। मीडिया का इस्तमाल जनमत बनाकर कोरपोरेट अपना खेल खेलने लगा। फेक न्यूज़ के तंत्र ने लाखों लोगों की हत्या करवाई। झूठ के आधार पर इराक युद्ध गढ़ा गया जिसमें 16 लाख लोग मारे गए। तब अधिकांश मीडिया ने इराक से संबंधित प्रोपेगैंडा को पैंटागन और सेना के नाम पर हवा दी थी। मीडिया हत्या के ग्लोबल खेल में शामिल हुआ। इसलिए कहता हूं कि मीडिया से सावधान रहें। वो अब लोक और लोकतंत्र का साथी नहीं है। आपके समझने के लिए एक और उदाहरण देता हूं.

ब्रिटेन की संसद ने एक कमेटी बनाई । सर जॉन चिल्कॉट की अध्यक्षता में। इसका काम था कि 2001 से 2008 के बीच ब्रिटेन की सरकार के उन निर्णयों की समीक्षा करना था जिसके आधार पर इराक युद्ध में शामिल होने का फैसला हुआ था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन पहली बार किसी युद्ध में शामिल हुआ था। इस कमेटी के सामने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की पेशी हुई थी। द इराक इनक्वायरी नाम से यह रिपोर्ट 2016 में आ चुकी है। 6000 पन्नों की है।
इस रिपोर्ट में साफ लिखा है कि इराक के पास रसायनिक हथियार होने के कोई सबूत नहीं थे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने संसद और देश से झूठ बोला। उस वक्त ब्रिटेन में दस लाख लोगों का प्रदर्शन हुआ था इस युद्ध के खिलाफ। मगर मीडिया सद्दाम हुसैन के खिलाफ हवा बनाने लगा। टोनी ब्लेयर की छवि ईमानदार हुआ करती थी। उनकी इस छवि के आगे कोई विरोध प्रदर्शन टिक नहीं सका। सभी को लगा कि हमारा युवा प्रधानमंत्री ईमानदार है। वो गलत नहीं करेगा। लेकिन उसने अपनी ईमानदारी को धूल की तरह इस्तमाल किया और लोगों की आंखों में झोंक दिया। इराक में लाखों लोग मार दिए गए।

सिर्फ एक अखबार था डेली मिरर जिसने 2003 में टोनी ब्लेयर के ख़ून से सने दोनों हाथों की तस्वीर कवर पर छापी थी। बाकी सारे अखबार गुणगान में लगे थे। जब चिल्काट कमेटी की रिपोर्ट आई तो गुणगान करने वाले अखबारों ने ब्लेयर को हत्यारा लिखा। जिस प्रेस कांफ्रेंस में यह रिपोर्ट जारी हो रही थी, उसमें इराक युदध में शहीद हुए सैनिकों के परिवार वाले भी मौजूद थे। जिन्होंने ब्लेयर को हत्यारा कहा। आप पुलवामा के शहीदों के परिवार वालों को भूल गए होंगे। उन्हें किसी सरकारी आयोजन देखा भी नहीं होगा।


बहरहाल मीडिया का तंत्र अब क़ातिलों के साथ हो गया है। इराक युद्ध के बाद भी लाखों लोगों का अलग अलग तरीके से मारा जाना अब भी जारी है। Y2K का संकट अनजाने में फैल गया। इसने कंप्यूटर सिस्टम को ध्वस्त नहीं किया बल्कि बता दिया कि इस मीडिया का सिस्टम ध्वस्त हो चुका है। आप दर्शक और पाठक मीडिया के बदलते खेल को कम समझते हैं। तब तक नहीं समझेंगे जब तक आप बर्बाद न हो जाएंगे। भारत में अब मीडिया के भीतर फेक न्यूज़ और प्रोपेगैंडा ही उसका सिस्टम है। प्रधानमंत्री मोदी से बेहतर इस सिस्टम को कौन समझ सकता है। आपसे बेहतर गोदी मीडिया को कौन समझ सकता है। दुनिया के लिए Y2K संकट की अफवाह 1 जनवरी 2000 को समाप्त हो गई थी लेकिन मीडिया के लिए खासकर भारतीय मीडिया के लिए Y2K संकट आज भी जारी है आज भी वह झूठ के जाल में आपको फांसे हुए है।

https://www.facebook.com/ravish.kumar.359/posts/10157272204023133

रवीश जी ने लिखा है : 

प्रधानमंत्री ने जाने-अनजाने में कोरोना संकट की वैश्विकता की तुलना Y2K जैसे एक बनावटी संकट से कर दी। एक ऐसे संकट से जिसके बारे में बाद में पता चला कि वो था ही नहीं। " 

जी हाँ यह कोरोना संकट भी वैसी ही परिघटना है जो  event  201 के रूप में 18-10-2019 को यू एस ए के न्यूयार्क में दिए गए प्रिजेंटेशन में परिकल्पित की गई थी। आर एस एस से जुड़े रहे राजीव दीक्षित के दो  अनुयाई --- एक वीरेंद्र सिंह और दूसरे डॉ बिसवरूप राय चौधरी के अतिरिक्त आर एस एस के प्रति झुकाव वाले सुदर्शन चेनल के सुरेश चौहान ने इस परिकल्पना का पर्दाफाश पहले ही कर दिया है अगर पी एम ने इसकी तुलना Y2K से की है  तो यह पर्दाफाश  की एक तरह से पुष्टि ही है। 
https://www.youtube.com/watch?v=F7pan4j6P0A



https://www.centerforhealthsecurity.org/event201/videos.html?fbclid=IwAR3sllnJkShJ9Tmq1vkyPXxXlyAF







Seg-1
https://youtu.be/Vm1-DnxRiPM

seg-2
https://youtu.be/QkGNvWflCNM

Seg-3
https://youtu.be/rWRmlumcN_s

Seg-4
https://youtu.be/LBuP40H4Tko

Seg-5
https://youtu.be/0-_FAjNSd58




संकलन-विजय माथुर

Thursday, 23 May 2019

बड़बोले दक्षिण पंथी नेताओं का बोलबाला ------ अजेय कुमार

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 2 March 2019

न मोदी न इमरान, ट्रंप ही शक्तिमान ! ------ ध्रुव गुप्त

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सबहि नचावत ट्रंप गुसाई !
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अब थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव और युद्ध की आशंकाओं के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक घोषणा की कि भारत कुछ बड़ा करने वाला है। अगले ही दिन भारतीय वायु सेना के विमानों ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर जैश के प्रशिक्षण केंद्र पर भीषण बमबारी की। जवाब में पाकिस्तानी विमानों ने भी भारत में घुसकर सेना के कैम्प के पास बम छोड़ा और अपना एक विमान के नष्ट हो जाने के बावजूद भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन को अपनी हिरासत में लेने में पाकिस्तानी सेना सफल रही। भारत द्वारा जवाबी हमले की आशंकाओं के बीच ट्रंप ने एक बार फिर कहा कि पाकिस्तान से कुछ अच्छी खबर आने वाली है। अगले ही दिन इमरान खान ने अपनी एसेंबली में अभिनंदन को बिना शर्त रिहा करने की घोषणा कर दी। अभिनंदन कल भारत को सौंप दिया गया और इस तरह भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की आशंका फिलहाल टल गई।

कठपुतलियों के इस दिलचस्प खेल में जीता-हारा तो कोई नहीं, लेकिन सबको कुछ न कुछ हासिल जरूर हुआ। अपने पांच साल के कार्यकाल में लगभग कुछ नहीं करने के बावजूद हमारे मोदी सर और अमित शाह जी को प्रचंड राष्ट्रवाद की आंधी में 'अपना बूथ सबसे मजबूत' कर लेने में बहुत हद तक सफलता मिल गई। इमरान खान आतंक को प्रश्रय देने के तमाम आरोपों और सबूतों के बीच दुनिया में कुछ हद तक अपनी उदारवादी छवि गढ़ने में कामयाब हुए। तरह-तरह के अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे पाकिस्तान के लिए एक बार फिर विदेशी सहायता और क़र्ज़ के दरवाज़े खुल जाएंगे। भारत को गर्व करने के लिए अरसे बाद आतंक के विरुद्ध देश की एक आक्रामक छवि और अभिनंदन के रूप में अपना नया हीरो मिला। और सबसे बड़ी बात यह कि मंदी की मार झेल रहे अमेरिका और उसके मित्र यूरोपीय देशों के हथियार उद्योग के लिए भारत-पाकिस्तान की भावी सामरिक तैयारियों के मद्देनज़र एक बार संभावनाओं के द्वार खुल गए।

तो पिछले पंद्रह दिनों तक चले इस 'हाई वोल्टेज' ड्रामे का सबक - न मोदी न इमरान, ट्रंप ही शक्तिमान !


-- Dhruv Gupt
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=2125905824152671&set=a.379477305462207&type=3


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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Thursday, 28 February 2019

वेनेजुएला को चाहिए विश्व समर्थन ------ भारत डोगरा

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 31 December 2018

चीन, तिब्बत और ट्रम्प का यू एस ए ------ सतीश कुमार

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 5 July 2018

सरकार और पूंजीपति केवल अपने हितों के ------ डॉ प्रमोद पाहवा



Parmod Pahwa
05-07-2018 
सरकार पर बाज़ार वाद का दबाव :-

कांग्रेस प्रवक्ता पर की गई अभद्र टिप्पणी के कारण उठाये गए सख्त कदम और उनके पीछे के दबावों पर एक विश्लेषण।

* फेसबुक तथा ट्वीटर सभी को निशुल्क अपने विचार व्यक्त करने एवं अनजान लोगों से जुड़ने की सुविधा उपलब्ध कराता है।

*फिर भी अथाह आय करता है जो विज्ञापनों के माध्यम से होती हैं।

*सामान्यता 30 से 40 आयुवर्ग के व्यक्ति ही अधिकतम खरीददारी करते हैं तो उनके द्वारा विज्ञापन देखना एवम प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहना ही आय का साधन है।

*गत कुछ समय से गालीबाजो/ट्रोल्स के कारण प्रबुद्ध वर्ग fb से विदा लेता जा रहा था और निम्न आयवर्ग के बच्चों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था।

*fb से ट्वीटर की ओर गया हुआ ट्रेफ़िक जब कम्पनियों की चिंता का कारण बनना शुरू हुआ तो भारत सरकार पर असहिष्णुता के आरोप लगने शुरू हो गए जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि चिंताजनक रूप से खराब कर रहे थे।

*हम सभी जानते है कि दोनों सोशल मीडिया कम्पनियों की मालकियत किस देश की है एवम मोदी सरकार किस दबाव में काम करती हैं।

*ऐसे में सरकार के पास कोई और चारा नहीं रहा कि सायबर ट्रोल्स के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करे।

*कुछ अच्छा लिखने वालों की गैर मौजूदगी पर कम्पनियों की तुरन्त निगाह रहती हैं। ऐसे में यदि आने वाले समय में कथित आईटी सेल के अपने ही लोगो के विरुद्ध सरकार कार्यवाही करने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

◆उदाहरण के लिए रवीश कुमार के प्राइम टाइम में सबसे अधिक सरकार की ही आलोचना होती हैं लेकिन सबसे अधिक विज्ञापन पतञ्जलि के ही होते है। 
क्योकि सरकार और पूंजीपति किसी के नही केवल अपने हितों के लिए होते है तो ऐसा तो होना ही था ! 
बाज़ार से बिगाड़ कर तो हज़ूर की भी हिम्मत नहीं है जो दो कदम चल सके◆
साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=241155223338127&set=a.200468104073506.1073741829.100023309529257&type=3
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Monday, 4 December 2017

हत्यारी गन कल्चर ------ नूपुर शर्मा / अजेय कुमार





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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 8 November 2017

कारपोरेट को मजबूत करने, काला धन सफ़ेद करने की कवायद थी --- नोटबंदी

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गतवर्ष की नोटबंदी के संबंध में  जर्मनी की चांसलर साहिबा ने यू एस ए की ही प्रेस के हवाले से यह रहस्योद्घाटन किया था कि, भारत में की गई नोटबंदी अमेरिकी दबाव में की गई थी। वस्तुतः ओबामा साहब रिटायर होने वाले थे और यू एस ए में आठ नवंबर 2016 को अगले राष्ट्रपति चुनाव हेतु मतदान चल रहा था जिस दिन भारत में नोटबंदी का ऐलान किया गया। यू एस ए में डिजिटल कंपनियों का व्यापार चौपट हो चुका था और उनके बंद होने की नौबत आ रही थी लेकिन भारत की नोटबंदी ने उनका अस्तित्व बचा लिया क्योंकि यहाँ कैशलेस और डिजिटल लेन - देन के लिया जनता को बाध्य कर दिया गया था। पुराने बड़े नोट बैंकों में जमा हो चुके थे और नई करेंसी बाज़ार में आई नहीं थी। गरीब जनता कराह रही थी और बड़े कारपोरेट घराने मस्ती में अपना धंधा कर रहे थे। क्योंकि : 
डिजिटल पेमेंट्स पर इतने चार्जेस
नई दिल्ली
कैश में लेन-देन की हमारी आदत को बड़ा झटका नोटंबदी के बाद लगा जब हमें डिजिटल पेमेंट्स के लिए मजबूर होना पड़ा। ऑनलाइन पेमेंट्स से लेकर मोबाइल वॉलिट और ऑनलाइन ट्रांसफर तो हमने शुरू कर दिया लेकिन क्या हमें पता है कि हमें इसके लिए कितना टैक्स या चार्ज चुकाना पड़ता है।
https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/the-real-cost-of-digital-transactions-and-payments/articleshow/61546862.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral
    

संकलन-विजय माथुर

Tuesday, 8 March 2016

महिला दिवस पर जानें समृद्ध देश में महिला उपेक्षा की दास्तान ------ हेली बेरी से

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश