Showing posts with label लोकतंत्र. Show all posts
Showing posts with label लोकतंत्र. Show all posts

Monday, 4 June 2018

पुलिस संवेदनहीन क्यों ? : रिटायर्ड IPS की नजरों से ------ ध्रुव गुप्त

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 
इतनी संवेदनहीन क्यों है हमारी पुलिस ?
(सौजन्य अखबार 'सुबह सवेरे')



Dhruv Gupt
04-06-2018 

अभी कुछ ही दशक पहले की बात है कि गांव-मुहल्लों में पुलिस के सिपाही को भी देखकर लोग रास्ता बदल लेते थे या घरों में छुप जाते थे। बच्चों में तो भगदड़ ही मच जाती थी जिन्हें होश संभालने के पहले से ही पुलिस से डरना सिखाया जाता था। 'भागो, पुलिस आई' उस दौर का मुहाबरा था। यह देश के मानस में अंग्रेजों की सामंती पुलिस की स्मृतियों का अवशेष था। अभी का मुहाबरा है - 'मारो, पुलिस आई !' पुलिस के प्रति अविश्वास और गुस्सा आज इतना गहरा हो चला है कि गालियां तो आम बात है, उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर लोग पत्थर उठा लेते हैं। गलतियां न भी हो तो गैरकानूनी हरकतें रोकने के दौरान भी पुलिस को मार ही खानी पड़ती है। पिछले कुछ सालों में पुलिस और पुलिस प्रतिष्ठानों पर हमले बेतहाशा बढे हैं। पुलिस का दुर्भाग्य है कि देश की आज़ादी के बाद उसे इन्हीं दो अतियों के बीच काम करना पड़ा है। पुलिस का ही क्यों, यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी दुर्भाग्य की बात है कि लोकतंत्र में पुलिस की त्राता, मित्र और सहयोगी की जो छवि बननी चाहिए थी, वह कभी बन ही नहीं पाई। पुलिस और नागरिकों के बीच का यह फासला और अविश्वास भारतीय समाज में उद्दंडता और अराजकता बढ़ने की प्रमुख वजहों में एक है।

हमारी पुलिस पर सबसे बड़े आरोप भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के हैं। पुलिस में भ्रष्टाचार तो है और उसकी जड़ें भी बहुत गहरी फैली हुई हैं। लेकिन भ्रष्टाचार सिर्फ पुलिस की समस्या नहीं है। देश की लगभग हर संस्था आज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। जब देश की राजनीतिक व्यवस्था ही भ्रष्टाचार से संचालित हो तो उसकी शाखाओं और संस्थाओं से ईमानदारी की उम्मीद करना फ़िज़ूल है। यह छुपी हुई बात नहीं है कि पुलिस में बड़े पदों पर राजनीति से प्रेरित पदस्थापनाएं होती हैं। जो राजनेताओं को जितना खुश कर सके उसको उतना ही प्रमुख और मलाईदार पद। कुछ प्रदेशों में तो पुलिस जिलों की नीलामी तक होती है। इसका असर पुलिस के अधीनस्थ पदों पर पड़ना स्वाभाविक है। चंद अपवादों को छोड़ दें तो विधि-व्यवस्था की सबसे बुनियादी संस्था थानों के प्रभारी अधिकारियों के पद राजनीतिक पैरवी और पैसों के बल पर बांटे जाते है। ऐसे पुलिस अधिकारियों की जनपक्षधरता कैसी और कितनी होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। जबतक राजनीतिक व्यवस्था की ईमानदारी, जनपक्षधरता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता स्थापित नहीं होगी, पुलिस तो क्या किसी भी संस्था से ईमानदारी की अपेक्षा दिवास्वप्न ही साबित होगी। जिले का पुलिस नेतृत्व अगर ईमानदार है, आमलोगों से उसका सीधा संवाद है और जनता का भरोसा उसके प्रति बना हुआ है तो स्थिति में थोड़ा-बहुत तात्कालिक सुधार ही लाया जा सकता है।

पुलिस की छवि बिगाड़ने में जिस चीज का सबसे बड़ा योगदान है, वह है उसकी संवेदनहीनता। कुछ हद तक अमानवीयता भी। आम तौर पर हालत यह है कि अपनी फ़रियाद लेकर आम लोग थानों में जाने से डरते हैं। रसूखदार और संपन्न लोगों को वहां कोई कठिनाई नहीं होती। उन्हें सम्मान भी मिलता है और उनकी बात भी सुनी जाती है। अपवादों को छोड़ दें तो आम लोगों के पास अगर राजनीतिक पैरवी और गांठ में पैसे न हो तो उन्हें कोई सुनता नहीं। केस दर्ज भी हो गया तो कार्रवाई नहीं होती। स्त्रियां रात में तो क्या, दिन के उजाले में भी थाने का दरवाजा खटखटाने का साहस आज भी कम जुटा पाती हैं। केसों की तफ्तीश में लापरवाही और मनमर्जी, संदेह के आधार पर या बिना आरोप साबित हुए मनमानी गिरफ्तारी, गिरफ्तारियों में पहुंच और पैसों का अंतहीन खेल, पुलिस कस्टडी में महिलाओं से दुर्व्यवहार, आरोपियों की निर्मम पिटाई और पिटाई से मौत, अपराधी बताकर लोगों की नकली मुठभेड़ में हत्या, राजनीतिक पक्षपात, उद्दंडता और जनता से दुर्व्यवहार ऐसी आम शिकायतें हैं जो लोगों को पुलिस से लगातार दूर कर रही है। इसका असर विधि-व्यवस्था पर ही नहीं, पुलिस की कार्यक्षमता पर भी पड़ा है। आम लोगों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध के अभाव में उसे अपराध और अपराधियों के बारे में अपेक्षित सूचनाएं नहीं मिलतीं। उग्र प्रदर्शनों, सड़क जाम और दंगों की स्थिति में उसे लोगों का सहयोग नहीं मिलता। जनसहयोग से जो समस्याएं बातचीत से हल हो सकती हैं, जनसहयोग के अभाव में शान्ति की बहाली के लिए बल-प्रयोग और कभी-कभी पुलिस फायरिंग का भी सहारा लेना पड़ता है। लब्बोलुबाब यह कि पुलिस की विश्वसनीयता के अभाव में स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है और राजनीतिक नेतृत्व इन बुरे हालात से आंखें चुराए बैठा है।

आखिर हमारी पुलिस इस कदर संवेदनहीन क्यों हैं ? सरकार के सभी अंग संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाएं तो देश चल जाएगा, लेकिन पुलिस अगर संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाय तो देश नहीं चल सकता। पुलिस के कंधे पर भ्रष्टाचार और अराजकता से लड़ने और और जनता में व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करने की महती ज़िम्मेदारी है। भारत की पुलिस अपने गठन से लेकर अबतक जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं पर कभी खरी नहीं उतरी है। ऐसा नहीं है कि पुलिस की छवि सुधारने और उसकी कार्यप्रणाली को लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए कोशिशें नहीं हुई है। पुलिस आयोगों के गठन से लेकर उनके प्रशिक्षण का स्तर और उनकी सुविधाएं बेहतर करने के कई कदम उठाए गए हैं, मगर आधे-अधूरे मन से। देश के लगभग हर राज्य में पुलिस के वेतन-भत्ते बढ़े हैं, अपराधियों से लड़ने के लिए उन्हें इंटरनेट फ्रेंडली और डिजिटल बनाया गया है तथा आधुनिक हथियार भी उपलब्ध कराए गए हैं। इन उपायों से पुलिस के छानबीन के तरीकों में तब्दीली जरूर आई है और आपराधिक मामलों में उसकी सफलता का प्रतिशत भी बढ़ा है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है पुलिस की संवेदनहीनता और अमानवीयता। यह समस्या पुलिस के उच्च अधिकारियों में कम, अधीनस्थ अधिकारियों और सिपाहियों में ज्यादा है। दुर्भाग्य से आम लोगों का पाला पुलिस के बड़े अधिकारियों से कम, निचले अधिकारियों और सिपाहियों से ही ज्यादा पड़ता है।

पुलिस की असंवेदनशीलता का एक कारण उसपर काम का जरूरत से ज्यादा बोझ, अवकाश की कमी और उनसे उपजा तनाव भी है जो कुछ परिस्थितियों में अवसाद का रूप भी ले लेता है। यह स्थिति तभी बदल सकती है जब चौबीसों घंटे उन्हें तनाव में रखने के बजाय पुलिस के काम के घंटे सीमित किये जायं। उप निरीक्षक और सहायक उप निरीक्षक स्तर तक के पुलिस के लगभग सभी अधिकारियों को अपने परिवार के साथ रहने की सुविधा हासिल है। बुरी हालत किसी भी थाने, पुलिस पोस्ट या पुलिस लाइन में नियुक्त सिपाहियों की होती हैं जो आम तौर पर एक ही कमरे में पशुओं की तरह रहने को विवश होते हैं। उन्हें परिवार के साथ रहने की इजाजत तो नहीं ही होती हैं। अधिकारियों द्वारा विधि-व्यवस्था की बढ़ती समस्याओं की तुलना में सिपाहियों की सीमित संख्या के कारण उनकी छुट्टियों में भी कंजूसी बरती जाती है। सभी सिपाहियों को घर देना तो संभव नहीं है, अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए उन्हें उदारता से छुट्टियां देकर उनके तनाव को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। विधि-व्यवस्था संधारण के दौरान अपना दायित्व निभा रहे पुलिसकर्मियों के साथ भीड़ का दुर्व्यवहार भी उन्हें गुस्से से भर देता है। दुर्घटनाओं के बाद सड़क जाम की स्थिति में बिना दोष के भी पत्थर पुलिस को ही खाने पड़ते हैं। प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्रों में जाने से रोकना पुलिस का कानूनी दायित्व है। दुर्भाग्य से पुलिस को सबसे ज्यादा ईंट-पत्थर इन प्रदर्शनकारियों से ही खाने पड़ते हैं। इन परिस्थितियों में निचले स्तर के पुलिस वालों में गुस्सा और प्रतिशोध की भावना पैदा होती है जिसकी परिणति अक्सर बर्बर लाठीचार्ज और पुलिस फायरिंग में होती है। धीरे-धीरे यह गुस्सा पुलिसकर्मियों का स्वभाव बन जाता है।

गड़बड़ी की शुरुआत दरअसल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों की चयन-प्रक्रिया से ही हो जाती है। उनके चयन में मानसिक नहीं, शारीरिक बल और क्षमता को आधार बनाया गया है। शारीरिक स्वास्थ पुलिस की सेवा में एक आवश्यक तत्व है, लेकिन चयन में प्रत्याशियों के मानसिक और भावनात्मक स्तर की उपेक्षा के दुखद परिणाम सामने आये हैं। कुछ स्तरों पर लिखित परीक्षाएं भी ली जाती हैं, लेकिन उनसे प्रत्याशियों की रटंत क्षमता का ही पता चलता है, योग्यता और संवेदनाओं का नहीं। रही-सही कसर उनके प्रशिक्षण के दौरान पूरी हो जाती है। यहां तमाम जोर चुने गए पुलिसकर्मियों की शारीरिक क्षमता और परेड तकनीक के विकास और क़ानून की किताबों की पढ़ाई पर ही होता है। आधुनिक हथियारों और वैज्ञानिक अनुसंधान के इस दौर में पुलिस का पहलवान होना जरूरी नहीं है। होना यह चाहिए था कि इन चीजों के अलावा उनके भीतर की मानवीयता और संवेदना को जगाने के लिए उन्हें मानविकी, मसलन समाजशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला जैसे विषयों की भी शिक्षा दी जाती। जिनके हाथ में आपने हथियार थमाए हैं, संवेदनाओं की सबसे ज्यादा ज़रुरत उनको ही है। यह न हो तो हथियार हमेशा गलत जगह पर ही चलेंगे। व्यवहारिक प्रशिक्षण के दौरान उन्हें थानों के हृदयहीन माहौल में बिठाने के अलावा पिछड़े क्षेत्र में गरीबों, दलितों और न्याय की आस लगाए लोगों की बस्तियों में भी कुछ वक्त बिताने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि आम लोगों की तकलीफों और संघर्षों से उनका निकट का परिचय रहे। उन्हें यह महसूस कराया जाय कि वे शासक नहीं सेवक हैं और अपने सेवा-काल में उनका पाला दुश्मनों से नहीं, अपने ही लोगों से पड़ना है।


सक्षम और मानवीय पुलिस-व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्तों में एक है। यह लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को मजबूत करती है। अगर इसका अभाव है तो समाज में अशांति है। अशांति है तो कोई भी विकास संभव नहीं है। अंग्रेजों से विरासत में मिली पुलिस-व्यवस्था में सुधार कर उसे संवेदनशील और लोगों की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य से यह कभी हमारी प्राथमिकता-सूची में भी शामिल नहीं रहा। पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए बनाये गए पुलिस आयोगों की अनुशंसाओं को आधा-अधूरा ही लागू किया गया। पुलिस को एक मानवीय संगठन बनाने की जगह उसे देह-हाथ से मजबूत संवेदनहीन और बर्बर लोगों का संगठन बनाकर रख दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि आज पुलिस और जनता साथ-साथ नहीं, आमने-सामने खड़े हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और जल्दी बदलनी चाहिए। पुलिस सुधार के लिए सरकार को तत्काल कदम तो उठाने ही होंगे। उससे भी बड़ी जरूरत इस बात की है कि पुलिस और आमजन के बीच के फासले कम करने के ईमानदार प्रयास किये जायं। यह दोतरफा प्रक्रिया है। इसके लिए पुलिस को जनता के प्रति अपना सामंती व्यवहार बदलना होगा। लाठियों और गालियों से तौबा कर अपने व्यवहार और संवेदनशीलता से लोगों का विश्वास अर्जित करना होगा। अपनी वर्तमान संरचना में यह काम पुलिस खुद-ब-खुद नहीं करेगी। राजनीतिक व्यवस्था अगर ईमानदार और इच्छाशक्ति से भरी है तो वह उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकती है। जनता तो एक बेहतर और मित्रतापूर्ण पुलिस व्यवस्था की आस ही लगाए बैठी है। जिस दिन उसकी उम्मीदें पूरी होती दिखेंगी, वह पुलिस को अपने सर-आंखों पर बिठा लेगी।
साभार : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1742963082446949&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
***************************************************************
फेसबुक कमेंट्स : 


Monday, 22 June 2015

कोई भी बदलाव आएगा तो जनता के चरित्रगत बदलाव के साथ ही आएगा--- विभांशु दिव्याल

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )




संवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं - विभांशु दिव्याल:
इधर मैं पारस्परिक संवाद और सहकार या आपसदारी की बात लगातार उठाता रहा हूं। मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि ये बातें सुनने-पढ़ने में भले अच्छी लगें पर इन्हें मानेगा कौन! कुछ कहते हैं कि राजनीतिक दलों के बीच गुप्त संवाद और सहकार पहले से ही चल रहा है। सतह पर जो वाक्विरोध दिखता है, दरअसल वह उनके बीच की नूराकुश्ती है जो आम जनता को ठगने या मूर्ख बनाने के लिए चलाई जा रही है। कुछ और मित्र सवाल उठाते हैं कि संवाद क्यों और किनके बीच, जबकि जनता स्वयं भ्रष्ट है जो बार-बार धूतरे और भ्रष्टों के हाथ में अपने भविष्य की चाबी थमा देती है। कुछ और मानते हैं कि जब अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को इस देश की राजनीति इतिहास के कूड़ेदान में डाल सकती है तो छोटे-छोटे संवादों और हल्की-फुल्की आपसदारियों की तो औकात ही क्या! मेरे ये मित्र जो कुछ कह रहे हैं उसमें पूरी-पूरी सचाई है। इस दौर का यथार्थ यही है। भ्रष्ट राजनीतिक-धार्मिक-सांस्कृतिक कुसंस्कारों के विरुद्ध किसी विवेकपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेपी प्रयास को आगे बढ़ाने वालों को या तो अनसुना कर दिया जाता है या फिर उन्हें पागल करार दे दिया जाता है। और अगर ऐसे प्रयास करने वाले ज्यादा जिद्दी हुए, ज्यादा आक्रामक और ज्यादा संघर्षशील हुए तो इनमें से किसी की हत्या करा दी जाती है, किसी को जलाकर मार दिया जाता है और ऐसा कुछ नहीं हुआ तो तमाम झूठे आपराधिक आरोपों में फंसा दिया जाता है। यदि हस्तक्षेपी प्रयास करने वाला थोड़ा प्रभावशाली हुआ तो उसको ध्वस्त करने के लिए उस पर बलात्कार जैसे अपराध के मुकदमे लगा दिए जाते हैं। ऐसा कोई कुकर्म नहीं है जो सत्ता के इर्द-गिर्द न हो रहा हो और ऐसा भी कोई कुकर्म नहीं है जो सत्ताधारी या सत्ताकांक्षी अपने को चुनौती देने वाले के विरुद्ध न कर डालते हों। लेकिन प्रश्न तो यह है कि क्या दुज्रेय दिखने वाली बेहूदगी के विरुद्ध बात करना ही बंद कर दिया जाए, क्या परिवर्तन के विचारों और प्रयासों को तिलांजलि दे दी जाए और यह मानकर कि ऐसे प्रयास कभी सफल नहीं होंगे, चुप होकर बैठ जाया जाए?मेरा मानना है कि चुप बैठकर हम परिवर्तन की संभावना को लावारिस नहीं छोड़ सकते। तमाम विपरीत और बेहया परिस्थितियों के बावजूद सार्थक हस्तक्षेप के स्वरों को मौन नहीं कर सकते। यह सही है कि भ्रष्ट और संवेदनहीन सत्ता जनता के भ्रष्ट संबंधों के बल पर ही कायम होती है या फिर जनता को भ्रष्ट, विचारविहीन और संवदेनाविहीन बनाकर कायम की जाती है। हमारे इस कथित लोकतंत्र में जनता को बरगलाने-फुसलाने, उसे भ्रष्ट बनाने और उसको जाति-धर्म जैसे खेमों में विभाजित कर शक्तिविहीन बनाने के प्रयास व्यावहारिक राजनीति के चरित्रगत हिस्से हैं। अगर आज सबसे कठिन काम कोई है तो वह है जनता को उसके भ्रष्ट संबंधों और क्षुद्र स्वार्थो से बाहर निकालना और उसे मौजूदा राजनीति के असली चरित्र के प्रति जागरूक और समझदार बनाना। लेकिन यह भी सही है कि इस कठिन काम को सिरे चढ़ाए बिना हम किसी भी सार्थक बदलाव की कल्पना नहीं कर सकते। कोई भी बदलाव आएगा तो जनता के चरित्रगत बदलाव के साथ ही आएगा।अगर जनता में चरित्रगत बदलाव लाना है, यानी जनता को स्वयं उसकी अपनी कमजोरियों और वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक ढांचे की विकृतियों के विरुद्ध सचेत और समझदार बनाना है तो इसके लिए प्राथमिक तौर पर पारस्परिक स्वस्थ संवाद के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। हम किसी भी स्तर पर कहीं भी किसी भी स्वस्थ बदलाव की बात करें तो उसके लिए संवाद जरूरी है। संवाद से ही वह समझदारी पैदा होती है जिसके जरिए हम अपनी बात दूसरों को समझा पाते हैं और दूसरों की बात समझ पाते हैं। जनता के बीच संवाद की संस्कृति पैदा करके हम उसके अंदर वह विवेक पैदा कर सकते हैं जिससे वह समझ सके कि कहां क्या गलत है और क्या सही, क्या करने में उसका भला है और क्या करने में बुरा, किसके साथ खड़ा होना हितकारी है और किसके साथ खड़े होना अहितकारी, कौन लोग सचमुच देश-समाज को आगे ले जा सकते हैं और कौन नहीं, उसकी अपनी कौन-सी रीति-नीतियां स्वयं उसके लिए घातक हैं और कौन-सी वे रीति-नीति हो सकती हैं जिनको अपनाने से उसका भला हो सकता है और उसकी समस्याएं सुलट सकती हैं।मगर किसी भी ऐसे निष्कर्षशील स्वस्थ संवाद के लिए वह मूलभूत संवेदना जरूरी है जिसकी नींव पर संवाद खड़ा होता है और सहकार या आपसदारी पैदा होती है। यह मूलभूत संवेदना है, दूसरों को भी अपनी तरह इंसान मानने और समझने की। यानी यह मानने की कि प्रकृतिप्रदत्त मानवीय प्रवृत्तियों के साथ जिस तरह के इंसान हम हैं, उसी तरह के इंसान दूसरे भी हैं। जिस तरह सामाजिक व्यवहारों के बीच हम स्वयं को रखते हैं, दूसरे भी वैसे ही रखते हैं। जिस तरह हम अपने परिवार को प्रेम करते हैं, दूसरे भी करते हैं। जैसी भौतिक और सामाजिक सुरक्षा हम अपने लिए चाहते हैं, वैसी ही दूसरे भी चाहते हैं। अपने लिए जिस तरह की सुख-समृद्धि का सपना हम देखते हैं, वैसे ही दूसरे भी देखते हैं। जिस तरह का व्यवहार हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही दूसरे भी हमसे चाहते हैं। जिस तरह हम अपनी जाति, धर्म, क्षेत्रगत पहचानों को प्यार करते हैं, उसी तरह दूसरे भी अपनी पहचानों को प्यार करते हैं। अगर आप अपनी धर्म-संस्कृति को श्रेष्ठ मानते हैं तो उसी तरह दूसरे भी अपने धर्म अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ समझते हैं। कुल मिलाकर अपनी मानवीय संरचना में जिस तरह के हम हैं, दूसरे भी उसी तरह के हैं। दूसरों को अपनी तरह मानने की यह वह संवेदना या चेतना है जो स्वस्थ संवाद और सहकार को संभव बनाती है और बेहतर भविष्य के रास्ते खोलती है। मगर यह चेतना भी स्वत: निर्मित नहीं होती। इसके निर्माण और फैलाव के लिए भी संवाद और सहकार यानी आपसदारी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं। संवाद और आपसदारी की प्रक्रिया तो चलनी ही चाहिए, पता नहीं कब किस प्रयास की चिंगारी मशाल का रूप ले ले।
https://www.facebook.com/vibhanshu.divyal/posts/1023237994353669
**************************************************************************
फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणियाँ :




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 21 November 2014

जातीय गृह-युद्ध की आहट सुनिए लोकतंत्र के प्रति ईमानदार हो जाइये--- Subhash Chandra

सवर्ण जातियां,विशेष रूप से जातियों में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण मित्र गौर करें
+
कृपया निम्न दो समकालीन घटनाओं पर आप गम्भीरता से चिन्तन मनन करें

====================================================
पोस्ट पर कमेन्ट या लाइक न भी करें पर चिन्तन मनन ज़रूर करें
+
एक तरफ संत रामपाल हैं जो ब्राह्मण -वेद-पुराण का खंडन करते हैं , विरोध करने वाले आर्य समाजियों की हत्या के उन पर आरोप हैं इस के बाद भी वो कोर्ट हाज़िर नही हो रहे हैं उनके निम्न जाति के कमांडो ट्रेनिंग प्राप्त भक्त हथियार बंद होकर पुलिस-प्रशासन से क्षमता भर सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं - ये लोकतंत्र में स्तब्ध कर देने वाली घटना है
+
दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी हैं जो सवर्णों को विदेशी आर्य /सगे नही हैं आदि आदि कहकर समाज की जातीय विद्वेष को स्पष्ट विभाजक रेखा बना रहे हैं
+
इन दोनों घटनाओं के सन्दर्भ में हमें ये समझना पड़ेगा कि रामपाल जैसे दबंग संत देश में सदियों से चले आ रहे धार्मिक जातिभेद की आनुवांशिक बीमारी की वज़ह से ही पैदा हुए हैं और उन्हें समाज और धर्म से अपमानित शूद्र जातियों के नागरिकों के बड़े समूह का मानसिक आर्थिक समर्थन उन्हें प्राप्त है
+
जीतन राम मांझी भले ही वोट की राजनीति के लिए ऐसा कर रहे हों पर सोशल मीडिया से लेकर हर छोटी जाति के संगठन में इस बयान को छोटी जातियों के स्वाभिमान और देश पर असली मालिक होने की हैसियत के रूप में देखा जा रहा है इसकी बानगी आप मांझी के समर्थन में सोशल मीडिया पर समर्थन की उमड़ती भीड़ के रूप में देख सकते हैं
+
मेरा निवेदन सिर्फ इतना है कि
+
बहुसंख्यक जातियों का अपमान करने वाले धार्मिक जातिभेद की गन्दगी का इलाज़ करके सबको सम्मान देने वाले स्वस्थ समाज निर्माण की ओर कदम जल्द नहीं उठाये गये तो जातिभेद के गटर से हजारों लाखों रामपाल और जीतन राम मांझी पैदा होने से आप नही रोक सकते
जो भारत को गृह युद्ध की विभीषिका की ओर ले जायेंगे और लोकतंत्र को लहुलुहान करेंगे

+
एक अंधेरी सुरंग में हमारा देश समाज प्रवेश कर रहा है। यह शुभ संकेत नहीं हो सकते
+
जातीय गृह-युद्ध की आहट सुनिए लोकतंत्र के प्रति ईमानदार हो जाइये

https://www.facebook.com/rajubhaiya1978/posts/828387797225472 
********************************************************************

1947 में जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत को आज़ादी दी तो अमेरिकी इशारे पर भारत का विभाजन करके सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया था। अब एक लंबे अरसे से अमेरिकी साम्राज्यवाद भारत को 25-30 हिस्सों में विभक्त करने की योजना पर चलता आ रहा है। कभी मेंका गांधी को आगे किया गया था जिनको भाजपा उपाध्यक्ष विजय राजे सिंधिया का खुला समर्थन था। फिर कांशी राम को आगे किया गया था उनको भी भाजपा का समर्थन था और मायावती को भी। लेकिन ये लोग सफल न हो सके। 2011 में हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितार्थ और कारपोरेट के संरक्षणार्थ सत्ता विरोधी आंदोलन चलाया था जिसे तत्कालीन पी एम मनमोहन सिंह जी का भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिला था और उसी के परिणाम स्वरूप आज मोदी जी सत्ताशीन हैं। अब अमेरिकी योजना को सफल बनाने हेतु मूल निवासी आंदोलन चलाया जा रहा है जो आर्य को जाति/धर्म का प्रतीक यूरोपीय निष्कर्षों के आधार पर बताता है। 

'आर्य' =  आर्ष =श्रेष्ठ अर्थात जिन मनुष्यों के 'कर्म' श्रेष्ठ हों वे सब जाति /देश/काल से परे आर्य -आर्ष-श्रेष्ठ हैं। लेकिन शोषण-उत्पीड़न-ढोंग-पाखंड के सिद्धांतकार ब्राह्मणों ने जातिगत -व्यवस्था जो चला रखी है वह ही साम्राज्यवादियों के मंसूबे सफल करेगी। प्रत्येक राजनीतिक दल का नेतृत्व ब्राह्मण जातीय लोगों ने हथिया रखा है और वे अपने-अपने दल को शोषको व लुटेरों के पक्ष में नीतियाँ बनाने हेतु प्रेरित कर लेते हैं। 'सत्य ' बोलने और ढोंग - पाखंड का विरोध करने वालों को उत्पीड़ित किया जाता है। परिस्थितियाँ साम्राज्यवादियो के अनुकूल हैं।  
(विजय राज बली माथुर ) 
**********************************
Coment on Facebook :