अर्थव्यवस्था और रिया-सुशांत फिल्म का काला जादू कुछ ही सप्ताह पहले तक देश भर में लगे लॉकडाउन की भयावहता के दृश्य छाये हुए थे। शहरों में काम करने वाले गांवों के मजदूर इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आये थे, कि मीडिया को अपना कैमरा उधर घुमाना ही पड़ गया। हर जगह यही चर्चा थी कि खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को लॉकडाउन ने और खस्ताहाल बनाया है या यह खस्ताहाल स्थिति लॉकडाउन की वजह से आयी है। दोनों की स्थितियों के लिए सरकार पर सवाल उठ रहे थे। नौजवानों के अन्दर कितना गुस्सा भर चुका है यह 5 सितम्बर की थाली-ताली से समझा जा सकता है। हर जगह यह चिन्ता थी कि अब आगे क्या होगा, भविष्य की भयावहता डरा रही थी। मार्च 2020 के पहले वाले जीवन में लोग जब अपने रूटीन काम से ऊब जाते थे, तो सब कुछ भुलाने के लिए सीरियल या फिल्म देख लिया करते थे। फिल्म देखने के दौरान और उसके आगे-पीछे के समय में भी काफी देर तक इंसान अपनी परेशानियों से बाहर निकलकर फिल्म की चमकीली दुनिया में, पोशाक और मेकअप में खोया रहता है। लेकिन अभी फिल्मे बंद हैं और टीवी पर कितना भी चीन पाकिस्तान चिल्लाया जाय, अर्थव्यवस्था के रसातल में जाने का असर दिख ही जाता है। ऐसी स्थिति में सुशांत-रिया मामला एक ऐसी फिल्म के रूप में लोगों के सामने पेश कर दिया गया है, जिसमें हीरो-हिरोइन, खलनायक-खलनायिका, प्यार-धोखा, सेक्स और सस्पेंस सब कुछ है। बताने की जरूरत नहीं कि इस फिल्म का प्रोड्यूसर सरकार और वितरक मीडिया है। इन मीडिया वितरकों के माध्यम से यह फिल्म/सीरियल घर-घर में देखा जा रहा है। लोगों ने अपनी-अपनी समझ के हिसाब से नायक/नायिका और खलनायक/खलनायिका चुन लिया है। देश की अर्थव्यवस्था के गर्त में जाने की चर्चा इसके बहुत पीछे छूट गयी है। इसका असर इतना व्यापक है कि काफी समय तक जो लोग इस फिल्म के प्रकोप से बच रहे थे या भाग रहे थे, वे भी इसे देखने के लिए और अपने नायक/नायिका, खलनायक/खलनायिका चुनने के लिए मजबूर हो गये हैं। फिल्म की महिला पात्र के साथ जिस तरीके का ट्रीटमेंट किया जा रहा है, प्रगतिशील लोगों का उसके पक्ष में आवाज उठना स्वाभाविक है, आवाज उठी भी। इसके पहले भी मीडिया कईयों के साथ यूं ही गिद्ध चाल दिखा चुका है। रिया पर इस तरीके से टूट पड़ने का दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद एक पुराना दृश्य फिर से घूम रहा है, जब 2007 में बच्चों से यौनकर्म कराने के आरोप में एक शिक्षिका को भीड़ और मीडिया ने न सिर्फ घसीटा, बल्कि उसके कपड़े भी फाड़ दिये थे। याद करेंगे तो और कई ऐसे दृश्य और घटनायें याद आयेंगे। मीडिया के इस गिद्ध चरित्र को भी नायक पक्ष के लोगों ने सही माना, दूसरी ओर इसके बाद ही रिया के पक्ष में लिखने बोलने वालों की संख्या बढ़ गयी। मीडिया द्वारा वितरित इस फिल्म को फॉलो करने वालों और इस पर बोलने वालों की संख्या बढ़ गयी। (यह लिखकर मैं भी इसमें शामिल हो गयी) इसी बीच भीमा कोरेगांव साजिश केस में कबीर कलामंच के तीन कलाकारों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें एक ज्योति जगताप को पुलिस ने पीछा करते हुए पकड़ा है, लेकिन यह सुशांत-रिया की फिल्म में कहीं दब गया। हवाई अड्डे बिक गये, शिक्षा को बरबाद और लोगों को अशिक्षित करने वाली शिक्षा नीति आ गयी, रेलवे बेंच दिया गया, एलआईसी बेंचने की तैयारी है, श्रम कानून खतम हो गये। लाखों लोग एक झटके में सड़क पर आ गये, अर्थव्यवस्था डूब चुकी है, लेकिन इन सब पर बातों और चर्चा की जगह सुशांत-रिया की इस सरकारी फिल्म ने ले लिया है। सुशांत-रिया इस समाज का हिस्सा हैं, इसलिए उन पर बात होनी चाहिए। लेकिन ऐसे समय में ये चुनाव का मुद्दा बन जाय, तो इसे कोई बड़ी साजिश ही कही जा सकती है। काला जादू रिया ने सुशांत पर नहीं सरकार ने मीडिया के माध्यम से हम पर किया है, जिसके कारण हम सच्चाई देखना भूल गये हैं। रिया-सुशांत की कहानी इस शोषणकारी डूबती अर्थव्यवस्था की कहानी है। यह बॉलीबुड के चमक-धमक के पीछे बहते गन्दे गटर की कहानी है। राजदीप सरदेसाई को दिये गये रिया के इण्टरव्यू में दरअसल उसके सही होने की बात से ज्यादा इसी गटर की कहानी है। जहां इफरात पैसा है, और यह पैसा सिर्फ फिल्म की कमाई का पैसा नहीं है। जहां नशे का बड़ा व्यापार है, जिसमें इण्डस्ट्री के ज्यादातर लोग किसी न किसी रूप में शामिल हैं। जहां पैसे से पैसे को खींचने के लिए कम्पनियां (सुशांत रिया और शौविक ने आर्टिफीशिएल इंटेलिजेंस कम्पनी का रजिस्ट्रेशन कराया) और एनजीओ खोलते जाने का धन्धा है। जहां सफल लोगों के कदमों में हर सुख-सुविधा है, लेकिन उनका जीवन कई मनोचिकित्सकों के भरोसे और नींद किसी नशे के भरोसे है। जहां बेइन्तहां पैसा खर्चकर लोग विदेश जाते हैं कि वहां वे सड़क पर घूमेंगे, लेकिन किसी अनजाने डर से खुद को कमरे में बन्द कर लेते हैं। ये किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, इस ग्लैमर की दुनिया के पीछे का सच है, जो समय-समय पर किसी न किसी के माध्यम से बाहर आता रहता है। कभी परवीन बॉबी, कभी संजय दत्त तो कभी सुशांत या रिया। जहां महिलाओं के शारीरिक शोषण की खबरें भी आती रहती हैं और ये यहां के लिए आम बात मानी जाती है। रिया भले ही अपनी लड़ाई को पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई कह रही हैं, लेकिन अपने इण्टरव्यू में पितृसत्तात्मक लम्पटई के खिलाफ खड़े हुए ‘मी टू’ आन्दोलन के प्रति उनका नजरिया सकारात्मक नहीं लगता। ‘मी टू’ आन्दोलन के समय भी फिल्म इण्डस्ट्री के इस गटर की बदबू सामने आई थी, जिसे खुशबू छिड़ककर दूर करने की कोशिश की गयी। रिया सुशान्त की कहानी को इस समाज की इस ‘एलीट’ संस्था के एक नमूने के तौर पर ही देखना चाहिए। यह ऐसी संस्था है, जो हो सकता है अपने अन्दर की इस कहानी पर ही जल्द ही फिल्म बनाकर कमाई कर डाले। पूरे देश की अर्थव्यवस्था डूबने का असर फिल्म इण्डस्ट्री पर भी हुआ है, लॉकडाउन ने इस कहर को और बढ़ाया है, बहुत सारे कलाकारों के अवसाद में जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। हो सकता है सुशांत की मौत भी उसका हिस्सा हो। जो भी हो, मीडिया में धारावाहिक के रूप में प्रसारित हो रही इस फिल्म ने क्योंकि सरकार की नाकामी की बहस को पीछे छोड़ने का काम किया है, क्योंकि यह इस समय में बिहार चुनाव और महाराष्ट्र की राजनीति का केन्द्रीय मुद्दा बन गया है, जब रोजगार का सवाल एक बड़ा सवाल है। क्योंकि यह दो-तीन हिन्दुत्ववादी राजनीति पार्टियों का फुटबाल मैच हो गयी है, क्योंकि हम इसके कारण अपने हालात भूल बैठे हैं इसलिए इसपर सवाल तो उठता ही है कि यह मुद्दा था या सरकार हम पर काला जादू करने के लिए इस धारावाहिक फिल्म का प्रसारण कर रही है। इस काला जादू से जितनी जल्दी निकल जायं, उतना अच्छा है। सीमा आज़ाद https://www.facebook.com/seema.azad.33/posts/3311991402359720?__cft__[0]=AZVoALPdggpTSjPvAEOidGGTZ1XnnuAHwtfrUYCdUobep-6eoTi7ybOptV1S2L9hsj-RpLHBLRfslTW1wT-WfG1OaDx_SJgeMHTPrFNzCXo1bo9JLLo_1FGiZdxtlJjHpctOXzpWhglJRYRCclA6QXRt&__tn__=%2CO%2CP-R
कांगेसी संघियों ने कांग्रेस की दीवारों की ईंटों से बीजेपी का महल बना दिया...... इस पर बात करने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना होगा..... 1925 में ब्राह्मणवादी विचारधारा के पुरोधा केशव राव बलीराम हेडगेवार ने आरएसएस की स्थापना की ......कांग्रेस तब तक इतने बड़े किले में परिवर्तित हो चुकी थी कि हेडगेवार उसको हिला भी नहीं सकते थे.... एक बात गौरतलब है कि कांग्रेस भले एक पार्टी है लेकिन शुरू से ही वो कई विचारधाराओं का संगम रहा है...इसलिए कांग्रेस में इनकी दाल उस तरह से गल नहीँ रही थीं जैसा कि वे चाहते थें..... वैसे इसी समय ब्राह्मणवादी विचारों को पोषित करने वाली हिन्दू महासभा भी थी ....लेकिन अन्य लोगों को वो जोड़ नहीं पा रही थीं.... तब आरएसएस राजनीति के शतरंज के बिसात पर एक नई चाल चलती है कि जनसंघ नामक अपना एक स्थायी आवास बनाओ ( जो कि बाद में बीजेपी नामक्रम में परिवर्तित हो गई ) और जब तक ये घर बन नही जाता है...तब तक कांग्रेस में रह कर उसकी जड़े खोदो... हुआ भी यही.... संघी कांग्रेस में शामिल होकर कांग्रेस के किले की ईंटें ले जाकर आरएसएस (जनसंघ ) को मज़बूत करते रहें यही कारण है कि कुछ लोग कांग्रेस को आरएसएस की जननी तक कह देते हैं.... ये कांग्रेस से जोंक की तरह चिपककर उसका खून पीकर आरएसएस को रक्तदान करते रहें... 1980 में मण्डल कमिशन की शिफारिशों को कुँए में डलवाने वाला कांग्रेस का यही धड़ा था....क्योंकि इसमे भूखे पिछडो के लिए कुछ निवाला था जो कि ब्राह्मणवादियों की थाली से जाने वाला था.... सोंचिए 1980 में इसे लागू न करने देने से पिछडो का कितना नुकसान हुआ... 1984 में दिल्ली में सिखों के ख़िलाफ़ तांडव भी इन्ही संघियों ने किया था... इन पर नेहरू जी का नियंत्रण इंद्रा पर आकर कमज़ोर हुआ .....और...राजीव तक आते - आते खत्म हो गया.... इसलिए 1987 का हाशिमपुरा नरंसहार और 1989 का भागलपुर दंगा प्रायोजित किया जाता है.....कुछ लोग कहते हैं कि कांग्रेस को मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगा करवाने से उसका खुद का ही नुकसान होगा फिर वो ऐसा क्यों करेगी......क्योंकि ऐसा करवाने वाले समाजवादी कांग्रेसी नहीं बल्कि संघी कांग्रेसी होते थें.....जिनको कांग्रेस को खोखला कर बीजेपी की रीढ़ मज़बूत करना था....यही संघी धड़ा राजीव गांधी से मस्ज़िद का ताला खुलवाता है.... 1998 में संघी आवास की इमारत का ढाँचा तो बन गया लेकिन मुकम्मल घर 2014 मे जाकर तैयार हुआ... अब आप कहेंगे....जब संघियों का स्थायी आवास बीजेपी ( आरएसएस ) बन गया है तो सारे संघी कांग्रेस को छोड़कर वहाँ चले क्यों नही जाते हैं...?? पहली बात ...एक घर मे शामिल होने की एक सीमा भी तो होती है.... दूसरी बात ....ये गोलवलकर की संतानें बहुत चालाक होते है...हमेशा अपने लिए एक विकल्प बनाए रखते हैं... तीसरी बात ...अगर सारे वहाँ चले जाएँगे तो मोदी विरोध के प्लेटफार्म पर बहुजनों का कब्ज़ा हो जाएगा....फिर ये बहुजन एससी , एसटी ,ओबीसी और अल्पसख्यकों के हक़ की बात उठाने लगेंगे....तो इससे ब्राह्मणवाद का नुकसान होगा न....और बीजेपी भी यही चाहती है कि उसके विरोध के प्लेटफार्म पर भी कांग्रेसी संघी ही काबिज रहें.... इसलिए ये मोदी को गरियाते हुए आपको उन्ही मुद्दों में उलझाए रखते हैं जिससे ब्राह्मणवादी हितों का नुकसान न हो तभी तो कोरोना पर ये भले 100 बातें कर देंगे लेकिन न्यायपालिका में आरक्षण , मण्डल कमीशन , एससी- एसटी एक्ट 1989 , सच्चर कमेटी, रंगनाथ मिश्रा आयोग, कुंडू कमेटी.......अनुच्छेद 341 जैसे विषयों पर दो शब्द भी खर्च करना ज़रूरी नहीं समझेंगे....क्योंकि ये सारे विषय इनके ब्राह्मणवादी शहद में कड़वाहट डाल देते हैं.... साभार : https://www.facebook.com/shakeeb.rahman.786/posts/345550383279126?__cft__[0]=AZW5axvrRl0j5oZ07kzz9Hby979zAXQ3b6gA2iwxm4-JjMqgWw5JUWxQAzgT1X2tLPZn1inc6p7EIIW5oMTYZvTh8FC20pzAzj9zpBL2oNEov2Jh1qqDA_fvr_F-fO9Wk560l3O_oMFJg6pP2l0Rhfzj&__tn__=%2CO%2CP-R
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) यह लाकडाउन वस्तुतः बड़े व्यापारियों और उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। इससे साधारण जनता, किसान, मजदूर, छोटा व्यापारी, निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारी सभी त्रस्त हो रहे हैं । सरकारी आदेश है 50% कर्मचारियों को ही ड्यूटी पर बुलाने का अतः प्रतिष्ठानों के मालिक कर्मचारियों को अधिकतम आधा ही पारिश्रमिक भुगतान कर रहे हैं। जो लोग दूसरे शहरों में कार्यरत हैं उनको मकान के किराये समेत सभी भुगतान पूरे करने हैं, सभी चीजें मेंहगी है और वेतन आधा मिल रहा है उनका ख्याल न केंद्र सरकार को है न प्रदेश सरकार को। छोटे दुकानदार, फेरी वाले सभी की आमदनी कम हो गई है उनका जीवन दूभर हो रहा है। मस्त- मौला लोग लाकडाउन बढ़ते जाने की कवायद करते हैं और सरकार उनकी ख्वाहिश पूरा करके जनता का दमन तेज करती जा रही है।
विपक्षी दलों के नेतागण भी महामारी के धोखे का शिकार हैं फिर जनता का ख्याल कौन करे ? ------
यह लाकडाउन अवैध कार्य करने वालों के लिए स्वर्णिम अवसर भी लेकर आया है। प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग से संबंधित कुछ प्राचार्य / अधिकारी जो पहले से ही अपने पद का दुरुपयोग करके कार्यस्थल क्षेत्र के खेत खरीद कर प्रापर्टी डीलिंग में संलग्न थे लाकडाउन काल में तेजी से निर्माण कराने में भी सफल रहे। इनके विरुद्ध किसी कारवाई के बजाए सत्ता का वरद - हस्त होने से यह लोगों को भयभीत करके मन - मुराद पूरी करने के लिए लाकडाउन को मुफीद पाते हैं और ऐसे ही सारे लोग मिल कर सरकार से बार - बार लाकडाउन बढ़वा लेते हैं। महामारी के भय के आगे जनता तो बेबस है ही विपक्षी दलों द्वारा भी कर्तव्य पालन नहीं किया जाना जनता की बर्बादी का हेतु बन रहा है। संकलन-विजय माथुर,
फौर्मैटिंग-यशवन्त यश