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Friday, 21 August 2020
Wednesday, 8 July 2020
..कोविड तो बहाना है, तानाशाही लाना है..------ चंद्रशेखर जोशी
45 mins ·( 08-07-2020 )
संविधान का भार खत्म
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सीबीएसई ने बच्चों के दिमाग से संविधान को हटाने की औपचारिक घोषणा कर दी है। 22 भागों में लिखे संविधान की मूल बातें अब पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रहेंगी।
...सीबीएसई ने जूनियर कक्षाओं के पाठ्यक्रम से धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, नागरिकता, लोकतांत्रिक अधिकार संबंधी पाठों को हटा दिया है। बोर्ड ने तर्क दिया है कि कोरोना वायरस संकट के बीच विद्यार्थियों पर पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के लिए यह फैसला लिया गया है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने शैक्षणिक सत्र 2020-21 के लिए कक्षा नौवीं से 12वीं के लिए 30 प्रतिशत पाठ्यक्रम को घटाते हुए नया पाठ्यक्रम अधिसूचित किया।
...इसके मुताबिक, 10वीं कक्षा के पाठ्यक्रम से लोकतंत्र एवं विविधता, लिंग, जाति व धर्म, लोकप्रिय संघर्ष एवं आंदोलन और लोकतंत्र के लिए चुनौतियां जैसे विषय अब छात्रों को नहीं पढ़ाए जाएंगे। 11वीं कक्षा के छात्रों को संघवाद, नागरिकता, राष्टï्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और भारत में स्थानीय सरकारों के विकास से संबंधित पाठ भी नहीं पढ़ाए जाएंगे।
...इसी तरह, 12वीं कक्षा के छात्रों को भारत के अपने पड़ोसियों पाकिस्तान, म्यामां, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के साथ संबंध, भारत के आर्थिक विकास की बदलती प्रकृति, भारत में सामाजिक आंदोलन जैसे पाठों को भी हटा दिया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एएचआरडी) के अधिकारियों के मुताबिक पाठ्यक्रम को विद्यार्थियों का बोझ कम करने के लिए घटाया गया है।
...असल में सम्प्रभुता, समाजवाद, पन्थनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गणराज्य और भारतीय समाज की विविधताएं भारत के संविधान का प्रमुख हिस्सा थीं। राजशाही, उपनिवेश और इसके खिलाफ संघर्षों को भी बच्चों को पढ़ाया जाता था।
...आजादी के बाद शिक्षाविदों ने तय किया कि भारत का हर बच्चा अपने समाज को समझे और समाज का निर्माण करने लायक बने। भारतीय संविधान के चौथे भाग में उल्लिखित नीति निर्देशक तत्वों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। इसमें कहा गया है कि प्राथमिक स्तर तक के सभी बच्चों को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाय। 1948 में डा. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही भारत में शिक्षा-प्रणाली को व्यवस्थित किया गया। 1952 में लक्ष्मणस्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग और 1964 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में गठित शिक्षा आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर 1968 में शिक्षा नीति पर प्रस्ताव प्रकाशित किया गया। इसमें राष्ट्रीय विकास के प्रति वचनबद्ध, चरित्रवान तथा कार्यकुशल युवक-युवतियों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया।
...संभव तो यह भी है कि गणित, विज्ञान को भी पाठ्यक्रम से हटा दिया जाएगा। यही हाल रहे तो लोकतंत्र के ज्ञान और इतिहास, विज्ञान की तर्क बुद्धि से कटे मर्यादाविहीन बच्चे अपना जीवन नरक बनाएंगे और देश को गर्त में धकेलेंगे।
..कोविड तो बहाना है, तानाशाही लाना है..
साभार :
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=937451653433153&id=100015049811954&__cft__[0]=AZVkryHP34gBwf-pUou9Cfxx0M7DPSUcSRzNzHQaScbddae7m7EsLWvES_sMgK-VY75eYf71ZDDJ9latpjGKXkGOmH-MO6DQb1ZIZJo2LTCKvUtZoL5JPAOgwlQRu_UxRzg2N3yfAbdWBrTaZBRD9kTx&__tn__=%2CO%2CP-R
Thursday, 14 May 2020
ये मानवता के दुश्मन ------
कुछ दिनों पहले हमारे देश में भी ट्विटर पर एक मुहिम शुरू हुई थी कि कोरोना संकट के कारण मोदी जी को कम से कम 10 साल के लिए प्रधानमंत्री बना दिया जाए। ..........
हंगरी में क्या हुआ है यह बता रहे है वाचस्पति शर्मा
'हंगरी का कोरोना संकट - और सबक'
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हंगरी में कोरोना संकट के समय वहां की सरकार के मुखिया विक्टर ओरबान ने आपातकाल लागू करवा दिया है।
विक्टर ओरबान अकेला और पहला ऐसा राजनीतिज्ञ है जिसने इस महामारी का फायदा अपनी सत्ता के लिए उठा लिया है।
हंगरी का संकट क्या है इसपर थोड़ी देर में आतें है , लेकिन पहले कुछ बेसिक बातें याद कर लेते है।
कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दुनिया का हर राजनीतिज्ञ देश में आपदा आने की स्तिथि में सबसे पहले ये सोचता है की उससे कैसे फायदा उठाया जाए।
फिलहाल भारत में कोरोना के बहाने लाखो करोड़ के घोटाले अंजाम दिए जा रहें हैं , धन्ना सेठ शेयर बाजार को कैसे लूटा जाए ये सोच रहें हैं , तो दूसरी तरफ तेल की कीमतें धड़ाम होने की स्तिथि में भी तेल कंपनियों ने लूट मचा रखी है. आप मुसलमान सब्ज़ी वालो को प्रताड़ित कर रहे हो , और उधर सरकार ने आपकी तमाम बचत योजनाओ में ब्याज दर में कटौती कर डाली है। रिजर्व बैंक से पैसा उड़ाने और जनता पर नए सेस टैक्स लगाने की जुगत भिड़ायीं जा रहीं है
और इस पूरे ईको सिस्टम को हांकने के लिए पूंजीपति लॉबी ने जिस सरकार को चुन रखा है वो भी इस महामारी से " राजनितिक" फायदा उठाने के फिराक में नित नए हथकंडे अपना रही है ,,या माहौल बनाने की कोशिश में है। पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद और देशभक्ति का काल चल रहा है। हंगरी में में जो हुआ उससे हम पूरी तरह अंदाजा लगा सकतें है की कल को ये हमारे देश और दुनिया के कई देशो में आराम से हो सकता है।
अब हंगरी पर आतें है।
हंगरी में सत्तासीन पार्टी के मुखिया विक्टर ओरबान ने कोरोना सकंट के चलते एक नया कानून पास करके वर्तमान सत्तासीन पार्टी (यानी खुद को ) को अविश्वसनीय राजनितिक और कानूनी अधिकार दे दिए हैं। ये अधिकार किसी भी डिक्टेटरशिप शाशन के समकक्ष ही नहीं बल्कि उससे भी कहीं अधिक हैं।
विक्टर ओरबान 2010 से हंगरी का प्रधानमंत्री है , ये 1998 से 2002 तक भी सत्ता में थे , और आठ साल बाद दोबारा राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर वापिस सत्ता में आये और अब तक टिके हुए हैं।
आज संसद में ये अपनी पार्टी के साथ पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में हैं।
कोरोना संकट के आते ही हंगरी सबसे पहले देशो में था जिसने लॉक डाउन किया था , जो आज की तारीख तक जारी है। स्पष्ट है की बिजनेस, स्कूल और सरकारी कामकाज सब ठप्प है।
कोरोना प्रभाव हंगरी में आज लगभग स्थिर हैं , लेकिन विक्टर ओरबान ने लगभग एक महीने पहले ही इस महामारी की वजह से देश में आपातकाल लागू करवा दिया।
आपात काल के साथ साथ उन्होंने विशेष कानून भी पास करवा दिया , जिसे हम "रूल बाय डिक्री" कहतें हैं ( अधिक जानकारी के लिए Rule By Decree गूगल कीजिये ).
संक्षेप में समझे तो ये कानून ऐसा है की जिसमे कोई भी नया ऐक्ट , कानून , या नया राजनितिक फैसला लेने के लिए संसद , न्याययालय या किसी भी संस्था की इज़ाज़त लेने , बहस चर्चा करने की कोई जरुरत नहीं है। मतलब जो प्रधानमंत्री चाहेंगे वही कानून नियम लागू करवा देंगे।
दूसरी बात जो इस कानून को और खतरनाक बनाने का इशारा देती है वो ये की इस कानून की पास करते समय इसमें इसका कोई भी समयकाल निर्धारित नहीं किया है। मतलब ये आपातकाल अब तभी ख़तम होगा जब विक्टर ओरबान चाहेंगे। ये लगभग एक प्रकार का अप्रत्यक्ष एकतरफा राजनितिक तख्ता पलट है।
विक्टर ओरबान ने ये काण्ड एक दिन या एक साल में ही नहीं किया। इन्होने सत्ता पाने और उसे एक तानाशाही में परिवर्तित करने के लिए जो रास्ता अपनाया वो कुछ यूँ था।
# सबसे पहले ये तत्कालीन सरकारों को कोस कोस कर और राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करके पूर्ण बहुमत से सत्ता में आये .
# इनका काम करने का तरीका सॉफ्ट तानाशाही वाला है। कोई भी व्यक्ति या संस्था को ये अपना विरोध करने पर हाशिये पर धकेल देतें हैं।
# इन्होने कई ऐसे कानून बनाये जो दिखने में तो साधारण लगते हैं लेकिन धरातल पर लागू करने में बहुत खतरनाक हो जातें है। (नागरिकता कानून याद कीजिये --लगभग वैसे ही).
# इन्होने सत्ता सम्हाले बाद पूरा संविधान ही बदल डाला और अब तक सात सालों में तमाम बार अपने हिसाब से उसमे अमेंडमेंट कर चुकें है।
# फिर इन्होने धीरे धीरे सारी संस्थाओ ( न्यायपालिका, पुलिस फ़ौज , नौकरशाही आदि ) में अपने पप्पेट बिठाने शुरू कर दिए।
# फिर इन्होने धीरे धीरे सारे मीडिया हाउस को अपने या अपने निकटवर्ती व्यावसायिक घरानो को खरीदवा दिए।
# फिर इन्होने सीरिया और मध्य पूर्व के देशो में युद्ध के बाद शरणार्थी संकट का सबसे पहले विरोध किया , और बहुत ही उत्तेजक भाषणों से शरणार्थियों के घुसने का विरोध किया।
# इन्होने देश के कई बॉर्डर्स में फेंसिंग तक करवा डाली।
# गलत इन्फॉर्मेशन फैलाने पर सख्त सजाओ का क़ानून बनाया - लेकिन इसका इस्तेमाल इन्होने अपनी आलोचना करने वाले नागरिको, बुद्धिजीवियों और मीडिया के लोगो के खिलाफ करना शुरू कर दिया। जो आज भी जारी है।
स्पष्ट है की इन्हे जर्मनी फ्रांस और अमेरिका के धुर दक्षिणपंथी पार्टियों का समर्थन किया है , जो की खुद राष्ट्रवाद के नाम पर शरणार्थियों के विरोध और देशी-विदेशी पूंजीपतियों के इशारों पर सत्ता में आने के लिए बैचैन रहतें हैं। यही हाल विक्टर ओरबान का है जो की हंगरी, पश्चिमी यूरोप और अमेरिकी पूंजीपतियों के नाम पर खेलते हुए एक अप्रत्यक्ष तानाशाही शाशन स्थापित करके और देशो के लिए भी एक नज़ीर स्थापित कर चुकें हैं।
इस प्रकार कोरोना संकट में आपातकाल लागू करने के पश्चात ओरबान पूरी सत्ता का इस्तेमाल किस किस शोषण और जनता को लूटने की कैसी कैसी आर्थिक नीतियां बनवाने में करेंगे कोई नहीं जानता। अगर ये चालु रहा तो हमें तानाशाही स्टेट का वो पूरा चक्र देखने को मिलेगा जिसमे कई सालों तक हंगरी में इनका रूल होगा - फिर विरोधियों को दबाया कुचला जाएंगे - खून खराबा होगा - कई साल गृहयुद्ध और अंततः हंगरी एक हताश बीमार गरीब और अपने अस्तित्व जूझता देश बन जाएगा। सब अमीर और सत्ता से सम्बंधित लोग देश छोड़ भाग जाएंगे , और अंत में आंसू बहाने और रोने को रह जाएगा हंगरी का गरीब मध्यमवर्ग।
व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है की भारत जैसे विशाल देश में ऐसा संभव नहीं है , मैं ये नहीं बोलूंगा की भारत में कोरोना संकट की आड़ में क्या क्या राजनितिक गुल खिलाएं जाएंगे।
लेकिन उपरोक्त हंगरी के संकट को समझ कर यदि आप अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकें तो सोचियेगा जरूर की इस संकट को किस किस दुर्दांत राजनितिक दुर्र-महत्वाकांक्षाओं और जनता की लूट के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
https://www.theguardian.com/commentisfree/2020/apr/01/viktor-orban-pandemic-power-grab-hungary
Girish Malviya
२८-०४-२०२०
हिटलर कालीन जर्मनी से मोदी कालीन भारत की समानता देख मैं कभी कभी बेहद आश्चर्य में पड़ जाता हूँ ......आज की ही बात लीजिए आज सुबह से न्यूज़ चैनलों पर उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के BJP विधायक का मुसलमानों से सब्जी नहीं खरीदने की अपील का एक वीडियो दिखाया जा रहा है.......जब विधायक से इसके बारे में जवाब तलब किया गया तो उन्होंने सीना चौड़ा करते हुए कहा 'जनता मुझसे पूछ रही है कि क्या किया जाए तो विधायक क्या बोले? यही उनके हाथ में है कि उनसे सब्जी मत लो इसमें कुछ गलत कहा क्या मैंने?'...........मित्र Arvind Shekhar की वाल पर यह पोस्ट थी, यह जानकर मुझे भी बेहद आश्चर्य हुआ कि आज जैसे कोरोना का ख़ौफ़ है वैसे जर्मनी में भी उन दिनों टायफस महामारी का ख़ौफ़ था ओर जैसे आज मुसलमानो को कोरोना का कैरियर बतला दिया जाता है वैसे ही यहूदियों को हिटलर कालीन जर्मनी मे टायफस महामारी का कैरियर बताया जाता था.........
मित्र arvind shekhar बताते है.........
'जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन की बाल रोग विशेषज्ञ और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. नाओमी बॉमस्लैग की 2005 में प्रकाशित किताब है- मर्डरस मेडिसिन (नाजी डॉक्टर्स ह्यूमन एक्सपैरिंमेंटेशन एंड टायफस) । यह किताब नाजी डॉक्टरों और फार्मा कंपिनयों द्वारा यहूदियों के नसंहार को आगे बढ़ाने में टायफस महामारी के इस्तेमाल के बारे में बताती है। जर्मनी में हिटलर और उसकी नाजी पार्टी अपने घृणा के कारोबार को मजबूत करने के लिए सिर्फ और सिर्फ यहूदियों को टायफस महामारी का कैरियर बताते थे। किताब बताती है कि किस तरह जर्मन जनता को इस तर्क से सहमत कर लिया गया कि महामारी के लिए सिर्फ यहूदी ही जिम्मेदार हैं सो उन्हें अलग रखना जरूरी है। 1938 तक जर्मनी में यहूदी डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे। बहुत से नाजी डॉक्टरों का सहारा ले यहूदियों को बाकी समाज के अलग रखने (क्वैरैंटाइन करने) , उन्हें एक जगह रखने, उव्हें संक्रमण रहित करने के नाम पर उनकी बस्तियों को सील कर देने का काम किया गया। संक्रमण खत्म करने के नाम पर उन्हें गैस चैंबर में भी डाला गया। अस्वास्थ्यकर गंदे हालात में छोटे से स्थान पर एक साथ ठुंसे से हुए यहूदी टायफस से मरे भी और महामारी के फैलने में और मददगार भी साबित हुए।...........
( यह फोटो मित्र प्रकाश के रे की वाल से साभार लिया गया है नाज़ी पार्टी के सदस्य एक इज़रायली दुकान के सामने बैनर लेकर खड़े हैं. इन बैनरों पर लिखा है- जर्मनीवाले अपनी रक्षा करें. यहूदियों से ख़रीदारी न करें.)
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=3186148708083422&set=a.206052816093041&type=3
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Girish Malviya
28-04-2020 at 11:38 AM
एक ओर भविष्यवाणी कर रहा हूँ..... 'कोरोना का वैक्सीन अक्टूबर-नवम्बर 2021 तक आएगा, उससे पहले कोरोना का प्रकोप पूरे विश्व मे कम-ज्यादा होकर चलता रहेगा, वैक्सीन लाने वाले होंगे बिल गेट्स ओर उस वैक्सीन के निर्माण में भारत की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी, उसके परीक्षण भारत मे ही किये जाएंगे संभवतः बिहार में'बिल गेट्स ने कल जो ‘द इकाेनाॅमिस्ट’ में आर्टिकल लिखा है उसे ठीक से पढ़ा जाना चाहिए उसमे भविष्य की बेहद महत्वपूर्ण प्रस्थापनाए छुपी हुई है वे इस लेख में कहते है .......
-'जब इतिहासकार कोविड-19 महामारी पर किताब लिखेंगे तो जो हम अब तक जीते रहे हैं, वह एक तिहाई के आसपास ही होगा। कहानी का बड़ा हिस्सा उस पर होगा, जो आगे होना है' ( अभी इस बीमारी का 2 तिहाई हिस्सा बचा हुआ है )
- 'अधिकतर जनता को कोरोना वैक्सीन लगाए बिना जिंदगी सामान्य ढर्रे पर नहीं लौटेगी
-'दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन बनाए गए हमे अब वैसे संगठन बनाने होंगे
इस लेख से पहले ही वह संकेत दे चुके है कि कोरोना वायरस इस ग्रह से जाने के लिए नही आया है यह अब यही रहेगा हमारे साथ ही रहेगा बिल गेट्स ने ही एक मेडिकल पत्रिका के अपने लेख में लिखा – एसिम्प्टमैटिक ट्रांसमिशन की हकीकत का अर्थ है कि दुनिया में फैलाव रोक सकना वैसे संभव ही नहीं है, जैसे पिछले वायरसों याकि सार्स (SARS) आदि को रोका जा सका था। क्योंकि पिछले वायरस तो सिम्प्टमैटिक, लक्षणात्मक, रोगकारी लोगों से ट्रांसमिट हुए थे।..….बिल गेट्स एक विशुद्ध पूंजीपति व्यक्ति है जहाँ दुनिया के तमाम तमाम राजनेता अवसर में कठिनाई देख रहे वही अकेले बिल गेट्स कठिनाई में अवसर देख रहे हैं क्यो की वह पहले से प्रिपेयर है........
पिछली कड़ी से ही शुरू करते हैं
जैसा कि आपको बता चुका हूँ कि अक्टूबर 2019 में, न्यूयॉर्क का जॉन्स हॉपकिन्स सेंटर फॉर हेल्थ सिक्योरिटी एक इवेंट 201 नाम के एक सिमुलेशन एक्सरसाइज की मेजबानी करता है जिसमें पार्टनर बनाया जाता है वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन को.........
इस इवेंट में एक काल्पनिक कोरोना वायरससे उपजी महामारी का मॉडल तैयार किया जाता है और अनुमान लगाए जाते हैं है एक ग्लोबल महामारी में वित्तीय बाजार क्या प्रतिक्रिया देगा हेल्थ सेक्टर किस तरह से रिस्पांस करेगा कितने लोगों की जान जा सकती है.......महामारी के प्रारंभिक महीनों के दौरान, मरीजो की संख्या वहां भी तेजी से बढ़ जाती है, हर हफ्ते दोगुनी हो जाती है। और जैसे-जैसे मामले और मौतें बढ़ती जा रही हैं, आर्थिक और सामाजिक परिणाम तेजी से गंभीर होते जाते हैं। ''
इस सिमुलेशन एक्सरसाइज में महामारी का अंत तब होता है जब महामारी का वैक्सीन सामने आता है महामारी शुरू होने के ठीक 18 महीने बाद........ तब तक विश्व में इस महामारी के कारण 65 मिलियन मौतें होती हैं।
बिल गेट्स एक ऐसे अकेले उद्योगपति है जो वैक्सीन निर्माण के लिए डेस्परेट नजर आ रहे हैं बिल गेट्स ने कुछ ही दिन पहले कहा कि हम कोरोना वायरस के लिए 7 वैक्सीन तैयार कर रही सभी फैक्ट्रियों को फंड दे रहे हैं। ये सातों वैक्सीन एक ही समय पर अलग-अलग जगह तैयार की जा रही हैं ताकि समय की बचत हो सके, इनमें से दो सबसे अच्छी वैक्सीन्स को चुनकर उनका ट्रायल किया जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार एक वैक्सीन बनाने में मिनिमम 12 से 18 महीनों का समय लग सकता है।..........
कुछ लोगो को यह थ्योरी कांस्पिरेसी थ्योरी लगती है वे कहते हैं कि बिल गेट्स का फाउंडेशन तो स्वास्थ्य के क्षेत्र अपनी परोपकारी गतिविधियों को बहुत पहले से चला रहा है, सही बात है गेट्स एंड मिलिंडा फाउंडेशन की वेबसाइट पर जाकर आप देखे तो आप पाएंगे कि 2010 से ही बिल गेट्स इस क्षेत्र में सक्रिय है पर उसकी रूचि का मुख्य विषय है वैक्सीन निर्माण,...... मेलिंडा गेट्स ने कहा, "टीके एक चमत्कार हैं - बस कुछ खुराक के साथ, वे जीवन भर के लिए घातक बीमारियों को रोक सकते हैं।"......
बिल गेट्स ने कहा, "हमें इसे टीकाकरण का दशक बनाना चाहते है।" यानी 2010 से 2020 के दस साल ( अभी 2020 समाप्त नही हुआ है )
https://www.facebook.com/girish.malviya.16/posts/3185828644782095
Girish Malviya
२९-०४-२०२०
समय आ गया है जब कोविड 19 के संक्रमण की पहली लहर गुजरने के बाद की परिस्थितियों पर चर्चा की जानी शुरू कर दी जाए,...........इस संक्रामक बीमारी के चलते समूचा विश्व परिदृश्य अब तेजी से बदलने वाला है दुनिया अब एक नए तरह के पासपोर्ट की तरफ देख रही है और वो है 'इम्युनिटी पासपोर्ट'.........यह बात अब बहुत से देश कहने लगे हैं कि जिन लोगों में वायरस से मुक़ाबला करने वाले एंटीबॉडीज़ बन गए हैं उन्हें ‘ख़तरे से मुक्त होने का प्रमाण-पत्र’ दिया जा सकता है यानि उन्हें ‘इन्यूनिटी पासपोर्ट’ दिया जा सकता है.
लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ कह रहा है 'ऐसे कोई सबूत नहीं है कि जो लोग कोविड-19 के संक्रमण से एक बार स्वस्थ हो गए हैं, उन्हें ये संक्रमण फिर से नहीं होगा'
यह तो हुई विश्व की बात, भारत मे तो एक राज्य से दूसरे राज्य में, एक जिले से दूसरे जिले में अभी आए लोगों को शक की नजरो से देखा जा रहा है, तो एक तरह के इम्युनिटी पासपोर्ट तो यहाँ भी चाहिए........
गतांक से आगे..........
बिल गेट्स एक दूरदर्शी व्यक्ति है उन्होंने सबसे पहले इस बात के संकेत दिए हैं कोविड 19 का वैक्सीन को इम्युनिटी पासपोर्ट के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा उनका एक वीडियो जो 2015 का है वो वायरल है इसमें बिल गेट्स ये कहते नजर आ रहे हैं कि इंसानियत पर सबसे बड़ा खतरा न्यूक्लियर वॉर नहीं, बल्कि इंफेक्शस डिजीज हैं. कोरोना भी इसी कैटिगरी में आता है. यह वीडियो 2015 का है और आज हम 2020 में है यह जानना बहुत दिलचस्प है कि इन 5 सालो में बिल गेट्स ने क्या किया है.......
महामारियों में अपनी रुचि के चलते बिल गेट्स इस क्षेत्र में अरबों रुपये की फंडिंग की ओर एक विशेष संगठन की स्थापना की ओर अपना ध्यान लगाया जिसका नाम है CEPI यानी 'कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस' इनोवेशन नाम से बहुत कुछ स्पष्ट है इसका हेडक्वार्टर नॉर्वे में बनाया गया सीईपीआई एक गैर-लाभकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 2016 में हुई थी। “यह एक पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप” है, जिसका उद्देश्य टीका विकास प्रक्रिया को तेज गति से आगे बढ़ाकर महामारी पर अंकुश लगाना है।
यह संगठन मौजूदा दौर की खतरनाक बीमारियों के लिए तेजी से वैक्सीन तैयार करता है......
CEPI के गठन के समय पश्चिम अफ्रीका में जानलेवा इबोला कहर बरपा रहा था। इस संस्था ने जैव तकनीकी शोधों के लिए वैज्ञानिकों पर बेइंतिहा पैसे खर्च किए थे। संस्था ने कारगर इलाज तलाशने के लिए लाखों डॉलर खर्च करके दुनियाभर में चार परियोजनाओं पर पैसे लगाए थे, ताकि टीके विकसित किए जा सकें।......लेकिन इबोला को इतनी प्रसिद्धि हासिल नही हुई जितनी इस कोविड 19 को मिली
31 जनवरी 2020 में डब्ल्यूएचओ ने कोरोना को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी की आधिकारिक घोषणा की लगभग उसी वक्त CEPI ने जर्मन-आधारित बायोफार्मास्युटिकल कंपनी CureVac AG के साथ अपनी साझेदारी की घोषणा की। कुछ दिनों बाद, फरवरी की शुरुआत में, सीईपीआई ने घोषणा की कि प्रमुख वैक्सीन निर्माता जीएसके अपने मालिकाना सहायक-यौगिकों की अनुमति देगा जो वैक्सीन की प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं -सीईपीआई ने कुछ दिन पहले ही यह घोषणा भी की थी कि वह कोरोना वायरस के टीके बनाने के लिये यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और अमेरिका – बेस्ड बायोटेक कंपनी मोडेर्ना को फंड उपलब्ध करा रहा है,
यह तो हुई CEPI की बात इसके साथ ही इसी क्षेत्र में एक ओर संगठन है जिसकी स्थापना 2000 में हुई थी जो बिल गेट्स के साथ लंबे समय से सहयोगी रहा है वो है 'ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्यूनाइजेशन' यानी GAVI यह एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसका उद्देश्य नए और कम इस्तेमाल में लाए जा रहे टीकों को दुनिया के सबसे गरीब देशों में रहने वाले बच्चों तक पहुंचाना है ।
जीएवीआई भी कोरोना के बारे में बयान देता है कि “जीएवीआई आने वाले दिनों में इस महामारी की निगरानी करना जारी रखेगा ताकि यह समझा जा सके कि कैसे सबसे कमजोर लोगों को सस्ते टीके देने में गठबंधन की विशेषज्ञता का लाभ उठाया जाए।”
यानी अभी तक आपने तीन संगठन के बारे में जाना.... CEPI , बिल गेट्स मेलिंडा फाउंडेशन ओर GAVI अब एक ओर संगठन के बारे में जानिए जिसका नाम है ID2020
ID2020 के संस्थापक साझेदार माइक्रोसॉफ्ट, रॉकफेलर फाउंडेशन और ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्यूनाइजेशन (जीएवीआई) हैं।
ID2020 इलेक्ट्रॉनिक आईडी प्रोग्राम है जो डिजिटल पहचान के लिए एक प्लेटफॉर्म के रूप में जनरल वेक्सिनाइजेशन का उपयोग करता है".......यह प्रोग्राम नवजात शिशुओं को पोर्टेबल और लगातार बायोमेट्रिक रूप से जुड़े डिजिटल पहचान प्रदान करने के लिए मौजूदा जन्म पंजीकरण और टीकाकरण संचालन का उपयोग करता है"
सितंबर 2019 में में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गयी जिसमें यह जिक्र है कि ID2020 ने GAVI के साथ मिलकर बांग्लादेश सरकार को अपने टीकाकरण रिकॉर्ड की सलाह दी है बांग्लादेश ने भी यह घोषणा की है सरकार अपने माता-पिता की बायोमेट्रिक जानकारी से जुड़े बच्चों के टीकाकरण का एक डेटाबेस बनाएगी..........
यानी अब हमारे पास एक वैश्विक महामारी है, दुनिया का सबसे बड़ा उद्योगपति है, वेक्सिनाइजेशन पर सालो से काम करते हुए बहुत बड़े वैश्विक संगठन है जिसकी हर देश मे तगड़ी पकड़ है, टीकाकरण को डिजिटल ID से जोड़ते हुए प्रोग्राम है, ओर हा WHO भी है उसे हम कैसे भूल सकते हैं........ओर इम्युनिटी पासपोर्ट की परिकल्पना भी है
कही जाइयेगा नही!........ पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त..........
https://www.facebook.com/girish.malviya.16/posts/3188293064535653
संकलन-विजय माथुर
Wednesday, 28 February 2018
Saturday, 14 October 2017
' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति को नहीं समझ कर विपक्ष अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चला रहा है ------ विजय राजबली माथुर
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
Arvind Raj Swarup Cpi
“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।
“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!
“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!
“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।
“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।
“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।
“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।
“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!
“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1984164238468371
वरुण गांधी (भाजपा सांसद ), हरिशंकर व्यास ( जिनका लेख अरविंद राज स्वरूप CPI के वरिष्ठ नेता द्वारा उद्धृत किया गया है ) और हज़ारे साहब के साक्षात्कार पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि , संघ की पसंद के पी एम मोदी की सरकार के विरुद्ध अभियान में भी अग्रणी संघ के नेता और विचारक ही हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघन सिन्हा आदि नेताओं व विचारकों के कदम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। विपक्ष के जो नेता या विचारक मुखर होते हैं उनके विरुद्ध क्रिमिनल व सिविल केस चलाये जाते हैं या उनकी हत्या करा दी जाती है। यह है ' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति जिसे वर्तमान विपक्ष के नेता और दल नहीं समझ रहे हैं जो कि, भारतीय राजनीति से उनके सफाये की योजना है।
संघ ने सत्ता ( शासन और प्रशासन दोनों ) पर मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब विपक्ष पर भी पकड़ बनाना शुरू कर दिया है जिससे मोदी सरकार के पतन की दशा में बनने वाली सरकार में भी संघ की मजबूत पकड़ बरकरार रहे।
यदि वर्तमान विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस + CPM समेत सम्पूर्ण वामपंथ + ममता बनर्जी समेत समस्त क्षेत्रीय दलों ने एक साथ न लड़ कर अलग - अलग लड़ा या आ आ पा (AAP) को अपने साथ जोड़ा तो तय है कि, बनने वाली सरकार पर भी संघ का ही नियंत्रण रहेगा।
------ विजय राजबली माथुर
Arvind Raj Swarup Cpi
16 hrs (13-10-2017 )
हिंदू राष्ट्रवादी सम्पादक हरिशंकर व्यास ने अपने अख़बार ‘नया इंडिया’ में आज लिखा है -“ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है, उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक-बैठक कराते रहते हैं।
“आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है - वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है। तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं!
“अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है!
“आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।
“सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए।
“यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।
“आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं।
“जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता है, उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई।
“इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली!
“और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है। ...”
https://www.facebook.com/arvindrajswarup.cpi/posts/1984164238468371
वरुण गांधी (भाजपा सांसद ), हरिशंकर व्यास ( जिनका लेख अरविंद राज स्वरूप CPI के वरिष्ठ नेता द्वारा उद्धृत किया गया है ) और हज़ारे साहब के साक्षात्कार पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि , संघ की पसंद के पी एम मोदी की सरकार के विरुद्ध अभियान में भी अग्रणी संघ के नेता और विचारक ही हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और शत्रुघन सिन्हा आदि नेताओं व विचारकों के कदम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। विपक्ष के जो नेता या विचारक मुखर होते हैं उनके विरुद्ध क्रिमिनल व सिविल केस चलाये जाते हैं या उनकी हत्या करा दी जाती है। यह है ' चित भी मेरी : पट भी मेरी ' संघी नीति जिसे वर्तमान विपक्ष के नेता और दल नहीं समझ रहे हैं जो कि, भारतीय राजनीति से उनके सफाये की योजना है।
संघ ने सत्ता ( शासन और प्रशासन दोनों ) पर मजबूत पकड़ बनाने के बाद अब विपक्ष पर भी पकड़ बनाना शुरू कर दिया है जिससे मोदी सरकार के पतन की दशा में बनने वाली सरकार में भी संघ की मजबूत पकड़ बरकरार रहे।
यदि वर्तमान विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव कांग्रेस + CPM समेत सम्पूर्ण वामपंथ + ममता बनर्जी समेत समस्त क्षेत्रीय दलों ने एक साथ न लड़ कर अलग - अलग लड़ा या आ आ पा (AAP) को अपने साथ जोड़ा तो तय है कि, बनने वाली सरकार पर भी संघ का ही नियंत्रण रहेगा।
------ विजय राजबली माथुर
Tuesday, 6 May 2014
मोदी संप्रदाय तानाशाही का पक्का रास्ता है ---रामचन्द्र गुहा
स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )
डॉ अंबेडकर के निर्वाण दिवस 06 दिसंबर को बाबरी विध्वंस करने वाली भाजपा ने साम्राज्यवादी हितों के मद्देनजर 'तानाशाह' मनोवृति के मोदी को पी एम के लिए इसीलिए प्रोजेक्ट किया था क्योंकि वह डॉ अंबेडकर के योगदान से निर्मित संविधान को ध्वस्त करना चाहती है। इस तरह की घोषणा ही असंवैधानिक है क्योंकि संविधान के अनुसार लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता प्रधानमंत्री होता है। चुनाव पूर्व पी एम का ऐलान करके ही भाजपा ने अपने संविधान विरोधी रुख को उजागर कर दिया था। देश में दंगे कराके अव्यवस्था फैलाना व सौहार्द को नष्ट करना ही मोदी का अभीष्ट है अतः लोकतन्त्र समर्थकों तथा संविधान के हितैषियों का परम कर्तव्य है कि मोदी और उनकी भाजपा की हार सुनिश्चित करें। इसके लिए केजरीवाल और उनकी आ आ पा के झांसे से बचना होगा जो मोदी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
डॉ अंबेडकर के निर्वाण दिवस 06 दिसंबर को बाबरी विध्वंस करने वाली भाजपा ने साम्राज्यवादी हितों के मद्देनजर 'तानाशाह' मनोवृति के मोदी को पी एम के लिए इसीलिए प्रोजेक्ट किया था क्योंकि वह डॉ अंबेडकर के योगदान से निर्मित संविधान को ध्वस्त करना चाहती है। इस तरह की घोषणा ही असंवैधानिक है क्योंकि संविधान के अनुसार लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता प्रधानमंत्री होता है। चुनाव पूर्व पी एम का ऐलान करके ही भाजपा ने अपने संविधान विरोधी रुख को उजागर कर दिया था। देश में दंगे कराके अव्यवस्था फैलाना व सौहार्द को नष्ट करना ही मोदी का अभीष्ट है अतः लोकतन्त्र समर्थकों तथा संविधान के हितैषियों का परम कर्तव्य है कि मोदी और उनकी भाजपा की हार सुनिश्चित करें। इसके लिए केजरीवाल और उनकी आ आ पा के झांसे से बचना होगा जो मोदी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
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