Showing posts with label कश्मीर. Show all posts
Showing posts with label कश्मीर. Show all posts

Thursday, 20 February 2020

बी जे पी के साथ सरकार बनाना मुफ्ती मोहम्मद सईद का गलत फैसला ------ इल्तिजा मुफ्ती

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 14 August 2019

कश्मीर में आखिरकार पराजित हुआ लोकतंत्र ------ अनिल सिन्हा

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 

Anil Sinha
1 hr ( 14-08-2019 )
अगस्त, 1947 में जब पूरा भारतीय उपमहाद्वीप सांप्रदायिक नफरत की आग में जल रहा था, महात्मा गांधी कश्मीर गए तो उन्हें वहां रोशनी दिखाई पड़ी। 
लोगों की राय लिए बगैर विशेष तो क्या आम राज्य का दर्जा भी छीन लेना उनके अधिकारों पर आघात है। 
भारतीय लोकतंत्र की पराजय है, साथ ही उन कश्मीरियों की भी पराजय है जिन्हें लोकतंत्र में भरोसा रहा है।

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा अब इतिहास का हिस्सा हो चुका है। अनुच्छेद 370 को कमजोर करने और 35-ए को समाप्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर बाकी राज्यों से दर्जे में हर तरह से छोटा हो गया है। उसे केंद्र शासित राज्य बना कर सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि जम्मू-कश्मीर को भारत के एक सामान्य प्रदेश की हैसियत पाने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ेगा। सवाल है कि यह राजनीतिक घटना किसकी जीत और किसकी हार बताती है/ अगर निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो साफ हो जाएगा कि यह

कश्मीर का भारत में विलय धर्म आधारित द्वि-राष्ट्रवाद का नकार है। यह मुस्लिम लीग का सिद्धांत था और कांग्रेस ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। हिंदू और मुसलमान अलग कौमें हैं और मजहब राष्ट्र का आधार है, यह मान्यता हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों की थी। कश्मीरियों ने मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा, दोनों की बातों को खारिज कर दिया। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में चलने वाली मुस्लिम कांफ्रेंस तीस के उत्तरार्ध में नेशनल कांफ्रेंस में बदल गई थी। वह मुस्लिम लीग तथा हिंदू महासभा की सांप्रदायिक राजनीति के विपरीत सेक्युलर राजनीति को आगे बढ़ाने लगी। उसके आदर्श महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू थे। अगस्त, 1947 में जब पूरा भारतीय उपमहाद्वीप सांप्रदायिक नफरत की आग में जल रहा था, महात्मा गांधी कश्मीर गए तो उन्हें वहां रोशनी दिखाई दे रही थी। उनके प्रयासों से ही महाराजा हरि सिंह भारत से अपने संबंध मजबूत करने पर राजी हुए।

महाराजा हरि सिंह अंत-अंत तक जम्मू-कश्मीर को आजाद मुल्क बनाने के प्रयासों में लगे थे। वह भारत और पाकिस्तान दोनों से यथास्थिति बनाए रखने का समझौता करना चाहते थे। पाकिस्तान ने तो उनसे समझौता कर लिया लेकिन पंडित नेहरू ने ऐसा करने से मना कर दिया। भारत में विलय का फैसला महाराजा ने पाकिस्तान की ओर से कबायलियों के हमले के बाद ही किया। महाराजा के कारण ही कश्मीर का विलय बाकी रियासतों की तरह नहीं हो पाया और अनुच्छेद 370 जैसा प्रावधान इसमें जोड़ना पड़ा। अपने राज्य को स्वायत्तता मिले, इसके पक्ष में शेख अब्दुल्ला भी थे। सवाल उठता है कि सांप्रदायिक राजनीति से दूर रहने और एक सच्ची सेक्युलर संस्कृति होने के बावजूद कश्मीर की घाटी एक ऐसे दुष्चक्र में कैसे फंस गई कि वह उपमहाद्वीप का सबसे अशांत इलाका बन गई/ सच पूछा जाए तो यह भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास की दास्तान है।

कश्मीर में शेख अब्दुल्ला लोकतांत्रिक और सेक्युलर राजनीति के प्रतीक थे तो महाराजा हरि सिंह सामंती और सांप्रदायिक राजनीति के पोषक थे। उन्हें राज्य की महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति का लाभ मिला और पाकिस्तान की ओर जाने का भय दिखा कर वह बाकी रियासतों के मुकाबले अधिक अधिकार पाने में सफल रहे। उनके उत्तराधिकारी कर्ण सिंह कश्मीर के सदर-ए-रियासत बन गए। उन्हें सिर्फ कुछ मामलों में भारत सरकार के आदेशों का पालन करना होता था। राजपरिवार अपने अधिकारों के लिए भारत सरकार और कश्मीर सरकार, दोनों से सदैव सौदेबाजी करता रहा। कर्ण सिंह ने सदर-ए-रियासत का पद आजीवन अपने पास रखने के लिए भी कहा था। उन्होंने यह मांग भी रखी थी कि यह रायशुमारी हो जाए कि लोग डोगरा शासन चाहते हैं या नहीं।

राजपरिवार के संरक्षण में चलने वाले हिंदुत्ववादी संगठन प्रजा परिषद ने पाकिस्तान के साथ यथास्थिति के समझौते का समर्थन किया था। राजपरिवार को हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन हासिल था। नेशनल कांफ्रेंस की लोकतांत्रिक राजनीति से इस राजनीति का सीधा टकराव था। नेशनल कांफ्रेंस उपमहाद्वीप में हद दर्जे की प्रगतिशील राजनीति कर रही थी। धारा 370 से मिली स्वायत्तता के बल पर उसने जमींदारी उन्मूलन किया। कश्मीर ही भारत का अकेला राज्य है जहां हर किसान भूमि का मालिक है और कोई भूमिहीन नहीं है। अनुच्छेद 35-ए भी सरदार पटेल के प्रयास से अमल में आया ताकि कश्मीरी पाकिस्तान पलायन का रास्ता न अपनाएं और उनकी जमीन कोई और न ले सके।

लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति को आगे बढ़ाने में न तो भारत सरकार सफल हो पाई, न ही नेशनल कांफ्रेंस इसमें कामयाब रही। अपनी राजनीतिक आकांक्षाएं पूरी न होते देख कश्मीरी भारत में विलय को संदेह से देखने लगे। पार्टी तथा जनता के दबावों के सामने शेख के पास भी स्वायत्तता की मांग को समर्थन देने के सिवा कोई चारा नहीं था। नेहरू ने इस स्थिति का सामना लोकतांत्रिक राजनीति से करने के बजाय केंद्रीकरण और सरकारी दमन का सहारा लिया। शेख गिरफ्तार किए गए और फिर वहां एक के बाद एक ऐसी सरकारें बिठाई गईं जिन्हें जन-समर्थन नहीं प्राप्त था। वहां लंबे समय तक निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए। नतीजा यह हुआ कि प्रदेश की राजनीति में लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने और आतंकवाद तथा इस्लामिक कट्टरपंथ की ओर जा रहे युवाओं को रोकने की ताकत नहीं बची।


कश्मीरियत की सबसे बड़ी पराजय 1990 में हुई जब कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया और उन्हें अपने घर छोड़ने पड़े। मुद्दे का राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिकीकरण हुआ और इसका इस्तेमाल कश्मीरी मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए किया गया। कश्मीर की समस्या अनुच्छेद 370 और 35-ए नहीं थी। एक अर्से से वहां सरकारें रहीं पर कोई संवाद नहीं रहा। इन कानूनों को खारिज करने का काम भी बिना बातचीत के हुआ है। असल में इनमें परिवर्तन की इजाजत संवैधानिक प्रक्रिया में नहीं है। भारतीय संविधान पर कश्मीर के लोगों का भरोसा तभी वापस लाया जा सकता है जब देश में सांप्रदायिक सौहार्द का माहौल हो, कश्मीरियों के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल हों और उनकी राय को वजन दिया जाए।

https://www.facebook.com/anil.sinha.503/posts/10220197901043746



 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 7 August 2019

संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार गंवा कर अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे ------ हेमंत झा

Hemant Kumar Jha
इस देश के 18 से 35 वर्ष के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है? क्या कश्मीर? या राम मंदिर? या पाकिस्तान...?
या...उच्च शिक्षा में वंचित समुदाय के युवाओं के लिये घटते अवसर? रोजगार के घटते अवसर? अंध निजीकरण? श्रमिक अधिकारों पर लगातार हो रहे सुनियोजित हमले?

जाहिर है, सैद्धांतिक जवाब तो यही होगा कि शिक्षा और रोजगार युवाओं के लिये सबसे बड़ी समस्या हैं जो हाल के दिनों में और गम्भीर हुई हैं।

लेकिन...गौर करने वाली बात यह है कि इस देश की सरकार ही नहीं, स्वयं युवा वर्ग इन समस्याओं को लेकर कितने संवेदनशील हैं।

बीते एकाध महीने में कई मुद्दे सतह पर आए हैं। नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित प्रारूप, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, तीन तलाक, रेलवे का निजीकरण, कश्मीर में धारा 370...आदि।

अपने आप में हर मुद्दा अहमियत रखता है। लेकिन, मायने यह रखता है कि किस मुद्दे पर लोगों की कैसी प्रतिक्रिया रही। किस मुद्दे पर बहस कोलाहल में बदल गया और किस मुद्दे की कोई खास चर्चा तक नहीं हुई?

सड़कों, चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक तीन तलाक पर जितनी बहसें हुईं, पाकिस्तान पर जितनी बातें होती हैं, अभी धारा 370 पर जितनी बहसें हो रही हैं, उनकी तुलना में नई शिक्षा नीति, नेशनल मेडिकल कमीशन, निजीकरण आदि पर कितनी बहसें हुईं?

अभी, जब लोग कश्मीर मुद्दे को लेकर इस तरह उछल रहे हैं जैसे कोई जीत मिली हो ठीक उसी वक्त सूचनाएं आ रही हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2 लाख नौकरियां खत्म हो गई हैं, रेलवे के निजीकरण वाया निगमीकरण के विरोध में रेलवे कर्मचारियों के संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल में ग्रामीण क्षत्रों को झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे करने की बातें हो रही हैं, मेडिकल शिक्षा को निम्न आय वर्ग तो क्या, मध्य वर्ग के प्रतिभाशाली युवाओं से दूर किया जा रहा है।

लेकिन, जीवन से जुड़े मुद्दों की कहीं कोई खास चर्चा नहीं।

जब अपने कॅरिअर, अपने भविष्य को लेकर युवा ही संवेदनशील नहीं हैं तो व्यवस्था क्यों संवेदनशील हो? सत्ता के लिये युवा वर्ग ही सबसे बड़ी चुनौती होता है इसलिये इस वर्ग को दिग्भ्रमित बनाए रखने के लिये सत्ता-संरचना हर सम्भव कोशिश करती है।

अंध निजीकरण युवाओं के भविष्य पर सबसे बड़ा आघात है। उच्च शिक्षा का कारपोरेटीकरण निम्न आय वर्ग के युवाओं के भविष्य को अंधेरों में धकेल देगा, इकोनॉमिक स्लोडाउन के कारण नौकरियां तो खत्म हो ही रही हैं, नई नौकरियों का सृजन भी नहीं हो रहा। इस आर्थिक दुर्व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार युवा वर्ग ही है।

वास्तविकता यह है कि रोजगार के क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मची हुई है।

लेकिन, आश्चर्य है कि इन मुद्दों को लेकर कहीं बहस नहीं, जबकि कोलाहल होना चाहिये था, आंदोलन होना चाहिये था।

फिलहाल, कश्मीर का झुनझुना है। पहले मंदिर झुनझुना था। ऐसे ही कई तरह के झुनझुने हैं। झुनझुने बदलते रहते हैं लेकिन उनकी आवाज वैसी ही रहती है। ऐसी आवाज...जिसमें अजीब सा नशा है। ऐसा नशा...जिसमें न अपना जीवन सूझता है, न अपना भविष्य सूझता है, न बाल बच्चों का भविष्य सूझता है।

इन संदर्भों में हम बीते सौ वर्षों की सबसे अभिशप्त पीढ़ी हैं...जो अपने बाप-दादों के अथक संघर्षों और बलिदानों से अर्जित अधिकार तो गंवाते जा ही रहे हैं, अपने बच्चों के लिये भी अंधेरों का साम्राज्य रच रहे हैं।
साभार : 
https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2290223617752205

Monday, 2 July 2018

अमरीका भारत के बुरे वक़्त में काम कभी नहीं आया ------ शेष नारायण सिंह

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 

आज भारत के जिन इलाकों में भी अशांति है , वह सब अमरीकी दखलंदाजी की वजह से ही है . कश्मीर में जो कुछ भी पाकिस्तान कर रहा है उसके पीछे पूरी तरह से अमरीका का पैसा लगा है . पंजाब में भी आतंकवाद पाकिस्तानी फौज की कृपा से ही शुरू हुआ था . पूर्वोत्तर भारत में जो आतंकवादी पाकिस्तान की कृपा से सक्रिय हैं , उन सबको को पाकिस्तान उसी पैसे से मदद करता था जो उसे अमरीका से अफगानिस्तान में काम करने के लिए मिलता था  :: 
Shesh Narain Singh
02-07-2018 






साभार : 
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1756971584389244&id=100002292570804

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 25 April 2018

कश्मीर का कठुआ कांड और वकील दीपिका सिंह राजावत

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )  



कठुआ कांड की मासूम पीड़िता का केस हालांकि, मानवीय आधार पर एडवोकेट दीपिका थुस्सू ( दीपिका सिंह राजावत ) ने तमाम धमकियों के बाद भी अपने हाथ में लिया है किन्तु यह राष्ट्रीय एकता के मार्ग में भी मील का पत्थर सिद्ध होगा। एडवोकेट दीपिका का विरोध सिर्फ कट्टर सांप्रदायिक तत्वों का विरोध नहीं है बल्कि इसके पीछे वहाँ के आदिवासियों की खुशहाली छीनने वाली उस लाबी का हाथ है जो अपने नाजायज आर्थिक लाभ के लिए जम्मू वन क्षेत्र से बंजारा समुदाय को खदेड़ देना चाहता है और नन्ही मासूम के साथ जघन्य अपराध इसी उद्देश्य से किया गया है। जब दीपिका जी उस मासूम को न्याय दिलाने के लिए कोर्ट में केस लड़ेंगी तो स्व्भाविक रूप से समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई को भी बल मिलेगा। भारत की एकता व अखंडता में विश्वास रखने वाले प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि, वह एडवोकेट दीपिका के सद्प्रयासों का समर्थन करके अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र को विफल करे। 



संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 17 February 2018

ज़ोजिला का प्लेटिनम और अनुच्छेद 370 ------ विजय राजबली माथुर

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )



1981  में एक रात मुझे भी डल झील में 'शिकारा ' में गुजरना पड़ा , उस वक्त किराया रु 15/- था। शिकारा मालिक का व्यवहार वाकई काफी अच्छा था। 
कश्मीर वस्तुतः ' पर्यटन उद्योग ' पर निर्भर है इसलिए वहाँ के लोग मूलतः शान्तिप्रिय हैं। यू एस ए से प्रभावित जो अंतर्राष्ट्रीय शक्तियाँ वहाँ अशांति के लिए जिम्मेदार हैं उनका उद्देश्य कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र - द्रास में 'ज़ोजिला ' दर्रा में दबे हुये ' प्लेटिनम ' पर है। प्लेटिनम से यूरेनियम प्राप्त किया जाता है जो परमाणु ऊर्जा का स्त्रोत है। वैसे भी प्लेटिनम धातु स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान है। इसीलिए पाकिस्तान के माध्यम से कश्मीर को हड़पने की कोशिश की गई थी। यदि संविधान में अनुच्छेद 370 का प्राविधान न होता तो विदेशी शक्तियाँ उस क्षेत्र में भूमि क्रय कर इस प्लेटिनम को ले जातीं। श्रीनगर से लेह जाने वाले मार्ग में सुरंग - टनेल बनाने का प्रस्ताव प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पास आया था । यदि यह सुरंग बन जाती तो एक ही दिन में सफर तय हो जाता। अभी रात्रि विश्राम कर्गिल में करना पड़ता है क्योंकि पर्यटकों को रात्रि में सेना सफर नहीं करने देती है। कनाडाई फार्म नाम - मात्र के शुल्क और जर्मन फार्म बिलकुल मुफ्त में टनेल बनाने को तैयार थीं। शर्त यह थी कि, ज़ोजिला की सुरंग खुदाई में निकलने वाला मलवा वे ले जाएँगे जिससे प्लेटिनम हासिल किया जा सके । किन्तु इन्दिरा गांधी मालवा देने को तैयार नहीं थीं बल्कि  पूरा खर्च देने को तैयार थीं। बिना मलवा हासिल किए वे फर्म्स काम करने को तैयार नहीं हुईं । 

जो लोग संविधान में संशोधन करके अनुच्छेद 370 को हटाना चाहते हैं वे वस्तुतः विदेशी शक्तियों को लाभ पहुंचाना चाहते हैं। देशहित को ध्यान में रखते हुये ही सरदार वल्लभ भाई पटेल और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 का प्रविधान करवाया था वरना महाराजा हरी सिंह तो यू एस ए / ब्रिटेन की चाल में फंस कर अलग रहने का ऐलान कर ही चुके थे। उनको हटा कर उनके पुत्र युवराज कर्ण सिंह को सदर - ए - रियासत बनाया गया था।
विदेशी शक्तियों की चालों को विफल करने हेतु भारत और पाकिस्तान में मित्रता व शांति परमावश्यक है जिससे कश्मीर में भी शांति बहाल होकर यहाँ के पर्यटन उद्योग को विस्तार व जनता को खुशहाली मिल सके। 

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 20 July 2016

इंटेलिजेंस ब्यूरो के तौर तरीके हैं कश्मीर अशांति के पीछे ------ विभूति नारायण राय,Retd IPS

स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं ) 





    संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश