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Sunday, 26 June 2016
Thursday, 16 June 2016
समस्या ड्रग्स नहीं, बेरोजगारी है ------ हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू
किसानी से पलायन की प्रक्रिया ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें कृषक समुदाय लगातार खेती का काम छोड़ता जा रहा है, और अब तक ऐसे बहुत थोड़े से कृषक मजदूर अपने लिए दिहाड़ी का काम जुटा पाए हैं। ज्यादातर कृषक जातियां व समूह अब भी दैनिक मजदूरी के अनिच्छुक हैं, और गैर-कृषि क्षेत्र में उन्हें कोई काम मिल नहीं पा रहा है। लेकिन यह अकेले पंजाब की समस्या नहीं है।
पंजाब में भले ही इसका एक विकृत नतीजा देखने को मिल रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि पूरे देश के कृषक जाति-वर्ग के लिए अपने नौजवानों को कृषि-कर्म से जोड़े रखना मुश्किल हो रहा है। बदल रही आर्थिक स्थिति और रोजगार के अवसरों की कमी अराजकता के हालात की ओर बढ़ रही है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अभियान इसी के उदाहरण हैं। हरियाणा में जाटों, गुजरात में पटेलों और महाराष्ट्र में मराठों की सरकारी नौकरियों में कोटा की मांग दरअसल कृषि क्षेत्र में घटते मुनाफे और रोजगार के सिमटते अवसरों को ही प्रतिबिंबित करती हैं। इनमें से ज्यादातर राज्य गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के मौके पैदा करने में नाकाम हैं, बावजूद इसके कि इनकी आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी जारी है।
यह एक बहुत बड़ी समस्या है, और अर्थव्यवस्था पिछले दो दशकों से इसका सामना कर रही है।
समस्या ड्रग्स नहीं, बेरोजगारी है
हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू First Published:15-06-2016 10:12:10 PMLast Updated:15-06-2016 10:12:10 PM
पंजाब इन दिनों गलत वजहों से सुर्खियों में है। कभी हरित क्रांति का अगुवा रहा यह सूबा आज ड्रग्स की समस्या के कारण चर्चा में है। संभव है कि ड्रग्स की लत के शिकार नौजवानों की संख्या को लेकर अलग-अलग राय हो, मगर इस बात से सभी राजी होंगे कि यह तादाद बहुत बड़ी है और हालात अब संकट के बिंदु तक पहुंच गए हैं। इसीलिए मसला ड्रग्स की लत का दायरा नहीं, बल्कि यह है कि आखिर क्यों पंजाब में नौजवान इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं? इस झुकाव को लेकर कई तरह की सांस्कृतिक व सामाजिक दलीलें दी जाती रही हैं, मगर हकीकत यह है कि वहां की एक के बाद दूसरी सरकार ने इस समस्या को नजरअंदाज किया, बल्कि बहुत मुमकिन है कि सीधे या प्रकारांतर से इसको बढ़ाया ही। फिर भी, यह सिर्फ शासन की विफलता का मसला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण इलाकों की एक बड़ी समस्या का लक्षण भी है। और वह असली समस्या है बेरोजगारी, पंजाब के नौजवानों के लिए आजीविका के विकल्पों का अभाव।
http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1--problem-is-not-drugs-problem-is-unemployment-539559.html
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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
पंजाब में भले ही इसका एक विकृत नतीजा देखने को मिल रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि पूरे देश के कृषक जाति-वर्ग के लिए अपने नौजवानों को कृषि-कर्म से जोड़े रखना मुश्किल हो रहा है। बदल रही आर्थिक स्थिति और रोजगार के अवसरों की कमी अराजकता के हालात की ओर बढ़ रही है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अभियान इसी के उदाहरण हैं। हरियाणा में जाटों, गुजरात में पटेलों और महाराष्ट्र में मराठों की सरकारी नौकरियों में कोटा की मांग दरअसल कृषि क्षेत्र में घटते मुनाफे और रोजगार के सिमटते अवसरों को ही प्रतिबिंबित करती हैं। इनमें से ज्यादातर राज्य गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के मौके पैदा करने में नाकाम हैं, बावजूद इसके कि इनकी आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी जारी है।
यह एक बहुत बड़ी समस्या है, और अर्थव्यवस्था पिछले दो दशकों से इसका सामना कर रही है।
समस्या ड्रग्स नहीं, बेरोजगारी है
हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू First Published:15-06-2016 10:12:10 PMLast Updated:15-06-2016 10:12:10 PM
पंजाब इन दिनों गलत वजहों से सुर्खियों में है। कभी हरित क्रांति का अगुवा रहा यह सूबा आज ड्रग्स की समस्या के कारण चर्चा में है। संभव है कि ड्रग्स की लत के शिकार नौजवानों की संख्या को लेकर अलग-अलग राय हो, मगर इस बात से सभी राजी होंगे कि यह तादाद बहुत बड़ी है और हालात अब संकट के बिंदु तक पहुंच गए हैं। इसीलिए मसला ड्रग्स की लत का दायरा नहीं, बल्कि यह है कि आखिर क्यों पंजाब में नौजवान इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं? इस झुकाव को लेकर कई तरह की सांस्कृतिक व सामाजिक दलीलें दी जाती रही हैं, मगर हकीकत यह है कि वहां की एक के बाद दूसरी सरकार ने इस समस्या को नजरअंदाज किया, बल्कि बहुत मुमकिन है कि सीधे या प्रकारांतर से इसको बढ़ाया ही। फिर भी, यह सिर्फ शासन की विफलता का मसला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण इलाकों की एक बड़ी समस्या का लक्षण भी है। और वह असली समस्या है बेरोजगारी, पंजाब के नौजवानों के लिए आजीविका के विकल्पों का अभाव।
यह वही पंजाब है, जो कभी अपने उद्यमी किसानों के लिए सराहा जाता था, जिसने 1960 और 70 के दशक के आरंभिक वर्षों में हरित क्रांति की कामयाबी की शुरुआती कहानियां रचीं। 1980 के दशक के बाद पंजाब देश के सबसे अधिक प्रति-व्यक्ति आय वाले सूबों में शामिल रहा। लेकिन पिछले दो दशकों में यह कृषि विकास दर के मामले में ज्यादातर राज्यों से पिछड़़ता गया है। न सिर्फ तमाम मुख्य फसलों की पैदावार और उत्पादन थम-सा गया है, बल्कि जोत का रकबा कम होने से मुनाफा भी घटता चला गया है। फिर प्राकृतिक संसाधनों की बिगड़ती स्थिति ने भी नौजवानों को किसानी के काम से विमुख किया है। मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता और गिरते भूजल-स्तर के कारण खेती करना अब काफी महंगा कार्य हो गया है, और इसके मशीनीकरण के साथ हालात चरम पर पहुंच गए हैं। यंत्रों के कारण मजदूरों का इस्तेमाल काफी कम हो गया है, ऐसे में अब तक कृषि कार्य से रोजगार पा रहे कामगार बेकार हो रहे हैं। पंजाब में कृषि क्षेत्र की बदतर हालत किसानों की खुदकुशी से भी जाहिर होती है।
हालांकि अभी उनकी संख्या कम है, मगर यह एक ऐसा तथ्य है, जिसके बारे में 1990 के दशक के पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। पंजाब एक ऐसे राज्य की विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है, जो शानदार कृषि विकास और उत्पादकता के बावजूद गैर-कृषि क्षेत्र में अपनी तरक्की के नए रास्ते न तलाश सका। इसकी एक वजह यह भी रही कि लुधियाना और दूसरे शहरों के स्थानीय उद्योग खुली व उदार भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ सामंजस्य बिठाने में नाकाम रहे, बल्कि राज्य की सरकारों ने भी गैर-कृषि उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहित करने में उदासीनता बरती। कृषि क्षेत्र पर हद से ज्यादा ध्यान देने की वजह से ही राज्य सरकार ने दूसरे क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाओं को नजरअंदाज किया। वह किसानों को मुफ्त बिजली देने और अन्य प्रोत्साहनों में सब्सिडी देने पर धन खर्च करती रही।
हाल के वर्षों में विदेश जाने की रफ्तार भी धीमी पड़ी है और राज्य में रोजगार के वैकल्पिक अवसरों के अभाव में बेरोजगारी की समस्या बद से बदतर होती गई है। आज ऐसे किस्सों व अध्ययनों की भरमार है, जो पंजाब में कृषि क्षेत्र के संकट और नौजवानों में उससे जुड़े रोजगार की समस्या की बात करते हैं। किसानी से पलायन की प्रक्रिया ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें कृषक समुदाय लगातार खेती का काम छोड़ता जा रहा है, और अब तक ऐसे बहुत थोड़े से कृषक मजदूर अपने लिए दिहाड़ी का काम जुटा पाए हैं। ज्यादातर कृषक जातियां व समूह अब भी दैनिक मजदूरी के अनिच्छुक हैं, और गैर-कृषि क्षेत्र में उन्हें कोई काम मिल नहीं पा रहा है। लेकिन यह अकेले पंजाब की समस्या नहीं है।
पंजाब में भले ही इसका एक विकृत नतीजा देखने को मिल रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि पूरे देश के कृषक जाति-वर्ग के लिए अपने नौजवानों को कृषि-कर्म से जोड़े रखना मुश्किल हो रहा है। बदल रही आर्थिक स्थिति और रोजगार के अवसरों की कमी अराजकता के हालात की ओर बढ़ रही है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अभियान इसी के उदाहरण हैं। हरियाणा में जाटों, गुजरात में पटेलों और महाराष्ट्र में मराठों की सरकारी नौकरियों में कोटा की मांग दरअसल कृषि क्षेत्र में घटते मुनाफे और रोजगार के सिमटते अवसरों को ही प्रतिबिंबित करती हैं। इनमें से ज्यादातर राज्य गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के मौके पैदा करने में नाकाम हैं, बावजूद इसके कि इनकी आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी जारी है।
यह एक बहुत बड़ी समस्या है, और अर्थव्यवस्था पिछले दो दशकों से इसका सामना कर रही है। सच्चाई यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था साल 2004-05 से 2011-12 के बीच हर वर्ष सिर्फ 20 लाख नौकरियां पैदा कर सकी, जबकि यह अवधि उच्च विकास दर वाली रही है। जाहिर है, श्रम बल में शामिल हो रही आबादी के आगे यह संख्या काफी कम है। तब तो और, जब इसी अवधि में साढ़े तीन करोड़ की श्रम शक्ति खेती-किसानी छोड़कर श्रम बाजार में दाखिल हुई हो। रोजगार के अवसरों का सृजन भविष्य में भी अर्थव्यवस्था के आगे एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के एक आकलन के मुताबिक, अगले सात साल में लगभग ढाई करोड़ लोग खेती छोड़कर नए रोजगार की होड़ में शामिल होंगे। सरकार को इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए हर वर्ष कम से कम 20 लाख नौकरियां पैदा करनी होंगी। लेकिन इसके उलट स्थिति यह है कि पिछले दो साल में हमारी अर्थव्यवस्था महज सात लाख अवसर ही पैदा कर सकी है, और उनमें से भी आधे मौके अकेले वस्त्र उद्योग के क्षेत्र के हैं।
पंजाब में ड्रग्स की समस्या कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है। मौजूदा सरकार की नाकामी ने यकीनन इस समस्या को और गंभीर बनाया है, पर यह मसला आर्थिक है। यह मुद्दा एक ऐसी रणनीति पर गंभीर बहस की जरूरत बता रहा है, जो न सिर्फ खेती छोड़ने वाले नौजवानों को लाभकारी रोजगार मुहैया कराने में समर्थ हो, बल्कि श्रम-बल का हिस्सा बनने वाले नए युवा-युवतियों की अपेक्षाओं को भी पूरा करती हो।
ड्रग्स की लत का खतरा तो हमारी आर्थिक नीति के गंभीर रोग का लक्षण मात्र है, जो रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करने में नाकाम रही है। पंजाब जैसी बेचैनी दूसरे सूबों में भी दिखने लगी है और यही वक्त है कि केंद्र सरकार बेरोजगारी की समस्या से निपटने को लेकर एक ठोस रणनीति बनाए। लेकिन अफसोस, समस्या के हल की बात तो दूर, इसकी गंभीरता ही नहीं समझी जा रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
साभार :
http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1--problem-is-not-drugs-problem-is-unemployment-539559.html
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संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
Tuesday, 7 June 2016
जो हल जोतै खेती वाकी, और नहीं तो जाकी ताकी ------- घाघ कविराय द्वारा ध्रुव गुप्त
Dhruv Gupt
07 जून 2016
एक थे जनकवि घाघ !
बिहार और उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक लोकप्रिय जनकवियों में कवि घाघ का नाम सर्वोपरि है। सम्राट अकबर के समकालीन घाघ एक अनुभवी किसान और व्यावहारिक कृषि वैज्ञानिक थे। सदियों पहले जब टीवी या रेडियो नहीं हुआ करते थे और न सरकारी मौसम विभाग, तब किसान-कवि घाघ की कहावतें खेतिहर समाज का पथप्रदर्शन करती थी। खेती को उत्तम पेशा मानने वाले घाघ की यह कहावत देखिए - 'उत्तम खेती मध्यम बान, नीच चाकरी, भीख निदान।' घाघ के गहन कृषि-ज्ञान का परिचय उनकी कहावतों से मिलता है। माना जाता है कि खेती और मौसम के बारे में कृषि वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियां झूठी साबित हो सकती है, घाघ की कहावतें नहीं। कन्नौज के पास चौधरीसराय नामक ग्राम के रहने वाले घाघ के ज्ञान से प्रसन्न होकर सम्राट अकबर ने उन्हें सरायघाघ बसाने की आज्ञा दी थी। यह जगह कन्नौज से एक मील दक्षिण स्थित है। घाघ की लिखी कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी वाणी कहावतों के रूप में लोक में बिखरी हुई है। उनकी कहावतों को अनेक लोगों ने संग्रहित किया है। इनमें हिंदुस्तानी एकेडेमी द्वारा 1931 में प्रकाशित रामनरेश त्रिपाठी का 'घाघ और भड्डरी' अत्यंत महत्वपूर्ण संकलन है। घाघ की कुछ कहावतों की बानगी देखिए !
० दिन में गरमी रात में ओस
कहे घाघ बरखा सौ कोस !
० खेती करै बनिज को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै।
० खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।
० उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो संग रहा।
० जो हल जोतै खेती वाकी, और नहीं तो जाकी ताकी।
० गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै।
० सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।
० गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।
० वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा।
० छोड़ै खाद जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई।
० सौ की जोत पचासै जोतै, ऊँच के बाँधै बारी
जो पचास का सौ न तुलै, देव घाघ को गारी।
० सावन मास बहे पुरवइया
बछवा बेच लेहु धेनु गइया।
० रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय
कहै घाघ सुन घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।
० पुरुवा रोपे पूर किसान
आधा खखड़ी आधा धान।
० पूस मास दसमी अंधियारी
बदली घोर होय अधिकारी।
० सावन बदि दसमी के दिवसे
भरे मेघ चारो दिसि बरसे।
० पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज
मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।
०सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात
बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।
० रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय
कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।
० भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।
साभार :
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1065123706897560&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3
Sunday, 8 May 2016
किसान और देश को बचाने के लिए है किसान जागरण यात्रा ------ इम्तियाज़ बेग / राजेन्द्र यादव
******
भाइयों,बहनों
आइये इस किसान जागरण यात्रा में आप अपना सक्रिय सहयोग और समर्थन दें। आज़ादी के बाद कुटिल राजनीतिक चालाकियों के कारण हाशिये पर डाल दिये गाँव और किसान को संगठित कर इस देश की मुख्य राजीनीतिक और आर्थिक धारा में शामिल करने के इस महाभियान में आप सक्रिय हिस्सेदारी निभाएँ जो आज़ादी के सिपाहियों और शहीदों का एक मात्र सपना रहा है।
भारतीय किसान एक निर्मम षणयंत्र के तहत लूटे जा रहे हैं। किसान विरोधी देशी-परदेसी सरकारी नीतियाँ तो उसे लूट ही रही हैं,साथ में असमय वर्षा,बाढ़,सूखा,ओलावृष्टि और कीट हमले से प्रकृति भी लूट रही है। मौसम विज्ञान इसे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बता रहे हैं, किन्तु सबसे बड़ा सवाल है कि किसान कहाँ जाये?आज इस देश में सबकी आवाज़ सुनी जाती है,किसान संगठित नहीं है,इसलिए सरकारी नीतियाँ उसे पीट-पीट कर अधमरा करती जा रही हैं। अधमरे लोगों में कमजोर दिल वाले आत्महत्या कर रहे हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों (क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) के अनुसार पिछले 15 वर्षों से आठ लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा मं दसों किसान बेचारगी में आत्महत्या कर रहे हैं,और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी रोजाना चार-पाँच किसान आत्महत्या कर रहे हैं। शराब कारोबारी विजय माल्या जहाँ एक ओर सरकारी बैंकों का हजारों-हजार करोड़ रूपये दिनदहाड़े लूट कर चला गया,वहीं कृषि आय के बहाने बेईमान पूंजीपति और कारोबारी बीस हजार लाख करोड़ रूपये का कालाधन इसी देश में दबा कर रखे हुए हैं और किसान नकली बीज-खाद और कीटनाशक ऊंचे दामों पर इस बेईमान सरकारी तंत्र के चलते खरीदने के लिए विवश है। सरकारी तंत्र (जिलाधिकारी,एस.पी.) न तो टैक्स चोरों-मिलावटखोरों को पकड़ पा रहा है और न तो डकैती और सांप्रदायिकता भड़काने वाले राजनीतिक गुंडों पर कोई लगाम लगा पा रहा है। विजया माल्या जैसे टैक्स चोर,काले कारोबारी जेल के बजाय राज्य सभा में सांसद चुन कर भेजे जा रहे हैं, वहीं प्राकृतिक आपदा और बढ़ते खेती की लागत के कारण समय पर मामूली ऋण जमा न कर पाने वाले किसान को बेरहमी से उसके खेत और घर से घसीट कर हवालात में बंद कर दिया जाता है तथा हवालात का भी खर्च उसी से जबरदस्ती वसूला जा रहा है।
स्थिति खतरनाक मोड़ ले चुकी है। किसान अपने दलहन-तिलहन,गेहूं-धान गन्ना का दाम नहीं तय कर सकता है। अब स्टाक मार्केट के अरबपति-खरबपति दलाल और बाजार के मुनाफाखोर खिलाड़ी इसका दाम तय कर रहे हैं। यही पूंजी का कमाल खेती-किसानी का दुर्दिन है। कारण साफ है किसान संगठित नहीं है। वेतन आयोग ने हाल ही में सरकारी कर्मचारी का न्यूनतम मासिक वेतन रु. 18,0000.00 मासिक तथा अधिकतम रु.2.50 लाख मासिक तय कर दिया है किन्तु साथ सत्तर सालों तक खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों,खेत मजदूरों का कोई पुरसा हाल नहीं है न तो उनके न्यूनतम आय की कोई गारंटी है। इसीलिए गांवों से प्रतिवर्ष 9% की दर से सालान पलायन हो रहा है और खेती का रकबा भूमि अधिग्रहण कानून और अंधे विकासवाद की नीतियों के चलते लगातार घटता जा रहा है।
कृषि लागत दर और महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है,इसे हर हाल में रोकना होगा और इसे रोकने के लिए संगठित और धारदार किसान आंदोलन की जरूरत आज सबसे ज्यादा है। खेती को बचना है तो गाँव को भी बचना होगा,गाँव बचेगा तभी खेती और किसानी बचेगी। खेती और गाँव बचाकर ही हम किसान और देश को बचा सकते हैं यही सच्ची देश भक्ति और राष्ट्रवाद है।
इन्हीं सच्चाइयों को ध्यान में रख कर उत्तर-प्रदेश किसान सभा ने पूरे प्रदेश में 11 अप्रैल 2016 से किसान जागरण यात्रा प्रारम्भ की है। देश के किसानों के सर्वमान्य नेता,स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी स्वामी सहजानन्द के जन्म स्थल गाजीपुर से यह अभियान शुरू किया गया है जो 20 मई को लखनऊ में विशाल किसान महापंचायत में तब्दील हो जायेगा और इस महापंचायत में उत्तर प्रदेश के सभी प्रभावी किसान संगठनों के नेतृत्व के अतिरिक्त अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और साथी अतुल कुमार अनजान की उल्लेखनीय उपस्थिति रहेगी।
यह अभियान नई सोच और किसानोन्मुखी राजनीति पैदा करने का है। किसानों,मजदूरों,दस्तकारों को संगठित कर देश एवं प्रदेश की राजनीति को किसानोन्मुखी बनाने की दिशा में यह सशक्त हस्तक्षेप है ताकि देश की दौलत का मुंसिफ़ाना तस्कीम हो सके और देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों,शेयर बाजार के सट्टेबाज खिलाड़ियों,भ्रष्ट राजनेताओं,कुटिल अफसरशाहों-ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त हो सके।
प्रमुख मांगें
1. राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) की संस्तुतियों को केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल लागू करें।
2. 60 वर्ष के सभी स्त्री-पुरुष किसानों,खेत मजदूरों,ग्रामीण दस्तकारों को 10,000 रु. ( दस हजार रुपया) मासिक पेंशन केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर देना सुनिश्चित करें।
3. किसानों के सहकारी-सरकारी कर्ज़ माफ किये जायें एवं उन्हें रबी-खरीफ पर ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाये।
4. कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य (लागत पर पचास फीसदी जोड़ कर) दिया जाय।
5. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तत्काल वापस लिया जाय।
6. केरल राजयकी भांति किसान कर्ज़ एवं आपदा राहत ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाय।
7. खेती किसानी के लिए बिजली की बढ़ी दरों को वापस लिया जाय, साथ ही सस्ती एवं अबाध बिजली 18 घंटे उपलब्ध कराई जाय।
8. नहरों की टेल तक वास्तविक सफाई कराकर पानी खेतों में पहुँचने का पुख्ता प्रबंध किया जाय।
9. प्रदेश के किसानो के निजी नलकूपों को अन्य राज्यों की तरह मुफ्त बिजली की व्यवस्था की जाय।
10. नंदगंज,रसड़ा,छाता,देवरिया,औरैया,शाहगंज चीनी मिलों को चालू किया जाय।
11. शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था को सरकार अपने हाथ में ले।
12. गन्ने का सामान्य मूल्य 450 रु. किया जाय एवं गन्ने का बकाया भुगतान किया जाय।
13. प्रदेश में रबी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद केंद्र व प्रदेश की सरकारें क्षतिपूर्ति देने का वादा करें या अब तक लगभग 33%किसान लाभान्वित हुए हैं शेष किसानों को तत्काल क्षतिपूर्ति दी जाय।
भाइयों,बहनों
आइये इस किसान जागरण यात्रा में आप अपना सक्रिय सहयोग और समर्थन दें। आज़ादी के बाद कुटिल राजनीतिक चालाकियों के कारण हाशिये पर डाल दिये गाँव और किसान को संगठित कर इस देश की मुख्य राजीनीतिक और आर्थिक धारा में शामिल करने के इस महाभियान में आप सक्रिय हिस्सेदारी निभाएँ जो आज़ादी के सिपाहियों और शहीदों का एक मात्र सपना रहा है।
भारतीय किसान एक निर्मम षणयंत्र के तहत लूटे जा रहे हैं। किसान विरोधी देशी-परदेसी सरकारी नीतियाँ तो उसे लूट ही रही हैं,साथ में असमय वर्षा,बाढ़,सूखा,ओलावृष्टि और कीट हमले से प्रकृति भी लूट रही है। मौसम विज्ञान इसे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बता रहे हैं, किन्तु सबसे बड़ा सवाल है कि किसान कहाँ जाये?आज इस देश में सबकी आवाज़ सुनी जाती है,किसान संगठित नहीं है,इसलिए सरकारी नीतियाँ उसे पीट-पीट कर अधमरा करती जा रही हैं। अधमरे लोगों में कमजोर दिल वाले आत्महत्या कर रहे हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों (क्राइम रिकार्ड ब्यूरो) के अनुसार पिछले 15 वर्षों से आठ लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा मं दसों किसान बेचारगी में आत्महत्या कर रहे हैं,और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में भी रोजाना चार-पाँच किसान आत्महत्या कर रहे हैं। शराब कारोबारी विजय माल्या जहाँ एक ओर सरकारी बैंकों का हजारों-हजार करोड़ रूपये दिनदहाड़े लूट कर चला गया,वहीं कृषि आय के बहाने बेईमान पूंजीपति और कारोबारी बीस हजार लाख करोड़ रूपये का कालाधन इसी देश में दबा कर रखे हुए हैं और किसान नकली बीज-खाद और कीटनाशक ऊंचे दामों पर इस बेईमान सरकारी तंत्र के चलते खरीदने के लिए विवश है। सरकारी तंत्र (जिलाधिकारी,एस.पी.) न तो टैक्स चोरों-मिलावटखोरों को पकड़ पा रहा है और न तो डकैती और सांप्रदायिकता भड़काने वाले राजनीतिक गुंडों पर कोई लगाम लगा पा रहा है। विजया माल्या जैसे टैक्स चोर,काले कारोबारी जेल के बजाय राज्य सभा में सांसद चुन कर भेजे जा रहे हैं, वहीं प्राकृतिक आपदा और बढ़ते खेती की लागत के कारण समय पर मामूली ऋण जमा न कर पाने वाले किसान को बेरहमी से उसके खेत और घर से घसीट कर हवालात में बंद कर दिया जाता है तथा हवालात का भी खर्च उसी से जबरदस्ती वसूला जा रहा है।
स्थिति खतरनाक मोड़ ले चुकी है। किसान अपने दलहन-तिलहन,गेहूं-धान गन्ना का दाम नहीं तय कर सकता है। अब स्टाक मार्केट के अरबपति-खरबपति दलाल और बाजार के मुनाफाखोर खिलाड़ी इसका दाम तय कर रहे हैं। यही पूंजी का कमाल खेती-किसानी का दुर्दिन है। कारण साफ है किसान संगठित नहीं है। वेतन आयोग ने हाल ही में सरकारी कर्मचारी का न्यूनतम मासिक वेतन रु. 18,0000.00 मासिक तथा अधिकतम रु.2.50 लाख मासिक तय कर दिया है किन्तु साथ सत्तर सालों तक खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों,खेत मजदूरों का कोई पुरसा हाल नहीं है न तो उनके न्यूनतम आय की कोई गारंटी है। इसीलिए गांवों से प्रतिवर्ष 9% की दर से सालान पलायन हो रहा है और खेती का रकबा भूमि अधिग्रहण कानून और अंधे विकासवाद की नीतियों के चलते लगातार घटता जा रहा है।
कृषि लागत दर और महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है,इसे हर हाल में रोकना होगा और इसे रोकने के लिए संगठित और धारदार किसान आंदोलन की जरूरत आज सबसे ज्यादा है। खेती को बचना है तो गाँव को भी बचना होगा,गाँव बचेगा तभी खेती और किसानी बचेगी। खेती और गाँव बचाकर ही हम किसान और देश को बचा सकते हैं यही सच्ची देश भक्ति और राष्ट्रवाद है।
इन्हीं सच्चाइयों को ध्यान में रख कर उत्तर-प्रदेश किसान सभा ने पूरे प्रदेश में 11 अप्रैल 2016 से किसान जागरण यात्रा प्रारम्भ की है। देश के किसानों के सर्वमान्य नेता,स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी स्वामी सहजानन्द के जन्म स्थल गाजीपुर से यह अभियान शुरू किया गया है जो 20 मई को लखनऊ में विशाल किसान महापंचायत में तब्दील हो जायेगा और इस महापंचायत में उत्तर प्रदेश के सभी प्रभावी किसान संगठनों के नेतृत्व के अतिरिक्त अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और साथी अतुल कुमार अनजान की उल्लेखनीय उपस्थिति रहेगी।
यह अभियान नई सोच और किसानोन्मुखी राजनीति पैदा करने का है। किसानों,मजदूरों,दस्तकारों को संगठित कर देश एवं प्रदेश की राजनीति को किसानोन्मुखी बनाने की दिशा में यह सशक्त हस्तक्षेप है ताकि देश की दौलत का मुंसिफ़ाना तस्कीम हो सके और देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों,शेयर बाजार के सट्टेबाज खिलाड़ियों,भ्रष्ट राजनेताओं,कुटिल अफसरशाहों-ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त हो सके।
प्रमुख मांगें
1. राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) की संस्तुतियों को केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल लागू करें।
2. 60 वर्ष के सभी स्त्री-पुरुष किसानों,खेत मजदूरों,ग्रामीण दस्तकारों को 10,000 रु. ( दस हजार रुपया) मासिक पेंशन केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर देना सुनिश्चित करें।
3. किसानों के सहकारी-सरकारी कर्ज़ माफ किये जायें एवं उन्हें रबी-खरीफ पर ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाये।
4. कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य (लागत पर पचास फीसदी जोड़ कर) दिया जाय।
5. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तत्काल वापस लिया जाय।
6. केरल राजयकी भांति किसान कर्ज़ एवं आपदा राहत ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाय।
7. खेती किसानी के लिए बिजली की बढ़ी दरों को वापस लिया जाय, साथ ही सस्ती एवं अबाध बिजली 18 घंटे उपलब्ध कराई जाय।
8. नहरों की टेल तक वास्तविक सफाई कराकर पानी खेतों में पहुँचने का पुख्ता प्रबंध किया जाय।
9. प्रदेश के किसानो के निजी नलकूपों को अन्य राज्यों की तरह मुफ्त बिजली की व्यवस्था की जाय।
10. नंदगंज,रसड़ा,छाता,देवरिया,औरैया,शाहगंज चीनी मिलों को चालू किया जाय।
11. शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था को सरकार अपने हाथ में ले।
12. गन्ने का सामान्य मूल्य 450 रु. किया जाय एवं गन्ने का बकाया भुगतान किया जाय।
13. प्रदेश में रबी व खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद केंद्र व प्रदेश की सरकारें क्षतिपूर्ति देने का वादा करें या अब तक लगभग 33%किसान लाभान्वित हुए हैं शेष किसानों को तत्काल क्षतिपूर्ति दी जाय।
Tuesday, 7 February 2012
कम्युनिस्टों ने नही भुलाया गांवों को
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पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी साहब ने गवों की उपेक्षा की बात उठाई है। सी पी आई ने अपने घोषणा पत्र मे स्पष्ट रूप से 15 मुद्दों को केवल 'खेती और किसानों के लिए' ही रखा है। यदि बुद्धिजीवी गाँव वालों को समझा कर जाति- वाद से परे हट कर कम्युनिस्ट प्रत्याशियों को जितवाने मे मदद करें तो गाँव वालों को भी खुशी नसीब हो सकती है।
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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| HINDUSTAN--07/02/2012 |
संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर
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