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Sunday, 12 August 2018

फासिस्ट आतंक से टकराती छात्र नेत्री : पूजा शुक्ला

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Wednesday, 7 December 2016

लेदर -फुटवियर इंडस्ट्री सरकार की नोटबंदी से बर्बाद : मौजूदा लेदर उद्योग का स्थान बड़ी कारपोरेट पूंजी को ------ चंद्र प्रकाश झा / जगदीश्वर चतुर्वेदी

लाखों लोगों को अपनी रोजी-रोटी का संकट : 

Jagadishwar Chaturvedi

Chandra Prakash Jha की वॉल से साभार -
नोट बन्दी तथ्यपत्रक 10
( Via Vivekanand Tripathi )
लेदर -फुटवियर इंडस्ट्री सरकार की नोटबंदी से बर्बाद
नोट बंदी की वजह से पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाला आगरा लेदर व फुटवियर इंडस्ट्री पर बहुत ही बुरा असर हुआ है। गौरतलब है कि चीन के बाद भारत लेदर उद्योग व निर्यात में दूसरे स्थान पर है और सालाना कारोबार लगभग 30 हजार करोड़ का है जिसमें अकेले आगरा का शेयर 10 हजार करोड़ है। 2013-14 में कुल निर्यात अरब अमेरिकी डालर था। पूरे इस उद्योग में 25 लाख लोग लगे हैं। अकेले आगरा में प्रतिदिन डेढ़ लाख पेयर शूज का उत्पादन होता है। जिसमें 60 बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान, 3000 छोटे प्रतिष्ठान और 30 हजार काॅटेज/हाउस होल्ड यूनिट काम कर रही हैं और आगरा शहर की लगभग एक तिहाई लेदर-फुटवियर उद्योग पर निर्भर है जिसमें लगभग 5 लाख मजदूरों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। अभी आगरा का लेदर-फुटवियर उद्योग निर्यात में 35 फीसदी व घरेलू बाजार में 65 फीसदी योगदान करता है। वर्कर्स फ्रंट की टीम ने 2 दिसम्बर को आगरा में लेदर-फुटवियर के औद्योगिक प्रतिष्ठानों व घरेलू उत्पादन इकाईयों को मौके पर जाकर देखा। नोट बंदी के बाद बड़े प्रतिष्ठानों में 80 फीसदी से ज्यादा ठेका/दिहाड़ी मजदूरों ने काम छोड़ कर चले गये हैं और उत्पादन एक तिहाई से भी कम हो गया है। इसी तरह घरेलू उत्पादन में हालात् और ज्यादा खराब हो गये हैं जहां स्टाक के कच्चे माल से कुछ उत्पादन तो जारी है लेकिन सप्लाई एकदम ठप है जिससे नया कच्चा माल खरीदने के लिए पैसा ही नहीं है और अगले कुछ दिनों में इन स्माल स्केल यूनिटों में भारी असर होगा। अभी भी न केंद्र और न ही राज्य सरकार की तरफ से कोई भी ठोस उपाय नहीं किये जा रहे हैं जिससे भविष्य में इस पूरे उद्योग पर भारी संकट आ सकता है जिससे न सिर्फ आगरा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भारी असर होगा। जानकार बताते हैं कि अपने देश में 2000 पेयर शूज का उत्पादन करने की क्षमता से बड़ी यूनिटे नहीं है जबकि चीन में 40 हजार पेयर शूज प्रतिदिन उत्पादन की यूनिट है। यहां पर भी बड़े कारपोरेट घराने इस क्षेत्र में अपनी पूंजी लगाना चाहते हैं जिसके लिए स्माल स्केल व मध्यम दर्जे की औद्योगिक इकाईयों को बर्बाद होना तय है। नोट बंदी से वे परिस्तियां पैदा हो सकती हैं जिससे भविष्य मौजूदा लेदर उद्योग का स्थान बड़ी कारपोरेट पूंजी ले ले। जो भी हो इससे भारी पैमाने पर मजूदरों की छटंनी हो सकती है र परोक्ष रोजगार में भारी कमी होगी। इसी तरह बनारस का बुनकर उद्योग, अलीगढ़ का ताला उद्योग सहित विभिन्न विभिन्न लघु-कुटीर उद्योग जो पहले ही सरकार की नीतियों से बर्बाद हो रहे हैं नोट बंदी से और ज्यादा संकटग्रस्त हो गया है और लाखों लोगों को अपनी रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है।
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फेसबूक कमेंट्स : 
07-12-2016 

Monday, 9 November 2015

मोदी : अशांति का नायक ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी

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हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य-
जो लोग फेसबुक से लेकर मोदी की रैलियों तक मोदी-मोदी का नारा लगाते रहते हैं वे सोचें कि मोदी में नारे के अलावा क्या है ,वह जब बोलता है तो स्कूली बच्चों की तरह बोलता है,कपड़े पहनता है फैशन डिजायनरों के मॉडल की तरह, दावे करता है तो भोंदुओं की तरह, इतिहास पर बोलता है तो इतिहासअज्ञानी की तरह ।
मोदी में अभी तक पीएम के सामान्य लक्षणों ,संस्कारों, आदतों और भाषण की भाषा का बोध पैदा नहीं हुआ है। मसलन् पीएम को दिल्ली मेट्रो में सैर करने की क्या जरुरत थी ? वे क्या मेट्रो से कहीं रैली में जा रहे थे ?मेट्रो सफर करने का साधन है, सैर-सपाटे का नहीं।
मोदी सरकार के लिए भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपराएं बेकार की चीज है। असल है देश की महानता का नकली नशा। उसके लिए शांति,सद्भाव महत्वपूर्ण नहीं है ,उसके लिए तो विकास महत्वपूर्ण है, वह मानती है शांति खोकर,सामाजिक तानेबाने को नष्ट करके भी विकास को पैदा किया जाय। जाहिर है इससे अशांति फैलेगी और यही चीज मोदी को अशांति का नायक बनाती है।
मोदी की समझ है स्वतंत्रता महत्वपूर्ण नहीं है, विकास महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता और उससे जुड़े सभी पैरामीटरों को मोदी सरकार एकसिरे से ठुकरा रही है और यही वह बिंदु है जहां से उसके अंदर मौजूद फासिज्म की पोल खुलती है।
फासिस्ट विचारकों की तरह संघियों का मानना है नागरिकों को अपनी आत्मा को स्वतंत्रता और नागरिकचेतना के हवाले नहीं करना चाहिए, बल्कि कुटुम्ब,राज्य और ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए. संघी लोग नागरिकचेतना और लोकतंत्र की शक्ति में विश्वास नहीं करते बल्कि थोथी नैतिकता और लाठी की ताकत में विश्वास करते हैं।
पीएम मोदी की अधिनायकवादी खूबी है- तर्कवितर्क नहीं आज्ञा पालन करो। इस मनोदशा के कारण समूचे मंत्रीमंडल और सांसदों को भेड़-बकरी की तरह आज्ञापालन करने की दिशा में ठेल दिया गया है, क्रमशःमोदीभक्तों और संघियों में यह भावना पैदा कर दी गयी है कि मोदी जो कहता है सही कहता है, आंख बंद करके मानो। तर्क-वितर्क मत करो। लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं विकास में बाधक है,तेजगति से काम करने में बाधक हैं,अतः उनको मत मानो। सोचो मत काम करो। धर्मनिरपेक्ष दलों-व्यक्तियों की अनदेखी करो, उन पर हो रहे हमलों की अनदेखी करो।राफेल डील से लेकर लैंड बिल तक मोदी का यह नजरिया साफतौर पर दिखाई दे रहा है।
हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य -

-1- पूर्व शासकों को कलंकित करो, 2.स्वाधीनता आंदोलन की विरासत को करप्ट बनाओ,3.हमेशा अतिरंजित बोलो,4. विज्ञान की बजाय पोंगापंथियों के ज्ञान को प्रतिष्ठित करो,5. भ्रष्टाचार में लिप्त अफसरों को संरक्षण दो, 6.सार्वजनिकतंत्र का तेजी से निजीकरण करो,7. विपक्ष को नेस्तनाबूद करो,8.विपक्ष के बारे में का हमेशा बाजार गर्म रखो,9.अल्पसंख्यकों पर वैचारिक-राजनीतिक -आर्थिक और सांस्कृतिक हमले तेज करो,10.मतदान को मखौल बनाओ. 11.युवाओं को उन्मादी नारों में मशगूल रखो,12. खबरों और सूचनाओं को आरोपों-प्रत्यारोपों के जरिए अपदस्थ करो,13.भ्रमित करने के लिए रंग-बिरंगी भीड़ जमा रखो,लेकिन मूल लक्ष्य सामने रखो,बार-बार कहो हिन्दुत्व महान है,जो इसका विरोध करे उस पर कानूनी -राजनीतिक-सामाजिक और नेट हमले तेज करो,14.धनवानों से चंदे वसूलो,व्यापारियों को मुनाफाखोरी की खुली छूट दो।15.पालतू न्यायपालिका का निर्माण करो।

https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/1157953267566712


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Tuesday, 26 May 2015

'ज्योतिष' विरोधियों एवं एथीस्टों द्वारा ढोंग-पाखंड को बढ़ावा --- विजय राजबली माथुर

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ढ़ोंगी पोंगापंथी और एथीस्ट एक समान
http://communistvijai.blogspot.in/2015/01/blog-post_30.html




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 7 May 2015

यह समाजसेवा नहीं है यह समाज मेनीपुलेशन है--- जगदीश्वर चतुर्वेदी

सलमान,मध्यवर्गीय लंपटता और समाजसेवा:

 

     सलमान के कवरेज ने एकबार फिर से हमें मध्यवर्ग के अपराधी मनोभावों पर सोचने के लिए विवश किया है। भारत का महान मध्यवर्ग का व्यापक अंश मूल्यों की दृष्टि से महान मूल्यों की ओर नहीं जा रहा,बल्कि अ-सामाजिक मूल्यों की ओर इसका स्वाभाविक रुझान देखने में आ रहा है। मध्यवर्ग के इस बड़े समूह की सामान्य विशेषता है अ-सामाजिक मूल्यों को वैधता प्रदान करना,उनका महिमा मंडन करना और उनके लिए सामाजिक समूहों और दवाब ग्रुपों का निर्माण करना ।इसे हम लंपट मध्यवर्ग कहें तो बेहतर होगा।
     स्वभाव से लंपट मध्यवर्ग अविवेकवादी और कानूनभंजक है।  यह हाशिए के लोगों से नफरत करता है,उनको कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं समझता, गायक अभिजीत का कल सलमान प्रसंग में आया बयान इस वर्ग में हाशिए के लोगों के प्रति व्याप्त घृणा का आदर्श नमूना है।
    मीडिया में बार-बार सलमान समर्थक लोग सलमान के सुधार कार्यों का उल्लेख करके मानवीय आबोहवा पैदा कर रहे थे, लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसे समाजसुधार और मानवीय कार्यों का कोई स्वस्थ लक्ष्य नहीं है जो निहित स्वार्थ और सामाजिक जन समर्थन जुटाने के लिए किया जाय।  
     लंपट मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग के  कानूनभंजकों में माफिया और फंडामेंटलिस्ट भी आते हैं और वे लोग तमाम किस्म के असामाजिक,लोकतंत्रविरोधी,न्यायविरोधी कामों के साथ-साथ समाजसुधार के काम भी करते हैं । उनकी समाजसेवा का लक्ष्य है गुनाहों पर परदा डालना। वे चाहते हैं आम जनता उनके गुनाहों की अनदेखी करे और उनके लिए सामाजिक आधार का काम करे।
     लोकतांत्रिक समाज में समाजसुधार का मतलब है न्याय और समानता के भाव का कड़ाई से पालन। मानवाधिकारों के पक्ष में निष्ठा के साथ खड़े रहने की भावना। सलमान के मामले में ये सारी चीजें एकसिरे से नदारत हैं,उलटे सलमान पतंगबाजी के बहाने मानवाधिकार भंजकों के नायक के प्रचारक की भूमिका अदा करते नजर आए हैं।
    समाजसुधार का अर्थ किसी का ऑपरेशन कराना या पैसे देना या आर्थिक मदद कर देना मात्र नहीं है बल्कि इस मदद के साथ दानदाता किस तरह के मूल्यों का आचरण करता है यह भी देखना चाहिए। सामान्य सी बात है कि समाजसुधार का दावा करने वाला दारु पीकर ,बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाता है तो वह कानून तोड़ता है, गाड़ी से कुचलते हुए चला जाता है, लेकिन पीड़ितों को अस्पताल नहीं ले जाता, उनको आर्थिक मदद नहीं देता,बल्कि अदालत में सौदेबाजी करता है,सामाजिक सुधार को मानने का अर्थ है दण्ड को नतमस्तक होकर स्वीकार करना, न कि पैसे के बल पर,तिकड़मों के जरिए अपने पक्ष में करना। 
  सलमान टाइप चैरिटी या दान-पुण्य-मदद का लक्ष्य है अपने लिए जनाधार और जन-समर्थन तैयार करना, इसका लक्ष्य समाजसेवा नहीं है। इसका लक्ष्य है अपने लिए प्रशंसकों की भीड़ जुगाड़ करना, इसका लक्ष्य है सलमान के अमानवीय और कानूनभंजक रुप पर पर्दा डालना। इस तरह की समाजसेवा को लंपट समाज सेवा कहते हैं। जो लोग समाज सेवा करते हैं वे उसके जरिए जन-समर्थन या निजी स्वार्थों की पूर्ति नहीं करते। समाज सेवा का मतलब है कि सेवा करने वाला बदले में अपने लिए कुछनहीं चाहता, लेकिन सलमान के समाजसेवा कार्यों में खर्च हुए 42करोड़ रुपयों का बार-बार हवाला देकर यह मांग की जा रही है कि उसे कानून बरी कर दे, वह मानवीय है ,हत्यारा नहीं है । उसके समाजसेवा के तमगों के नाम पर यह भी कहा जा रहा है कि उसने कितने लोगों के हृदय के ऑपरेशन में मदद की ,कितने जरुरतमंदों के काम आया। यानी सलमान के लिए समाजसेवा का मतलब आम जनता को अपने पीछे गोलबंद करना है और यही वह बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए कि इस तरह की समाजसेवा क्या सच में समाजसेवा है या निजीसेवा है ?
     सलमान मार्का चैरिटी का सारा धंधा या इसी तरह की समाजसेवा करने वाले संगठन जब बदले में वोट मांगते हैं या राजनीतिक तौर पर साथ रहने की मांग करते हैं तो समाजसेवा को कलंकित करके उसे निहितस्वार्थ सेवा में तब्दील कर देते हैं। हमारे देश में अनेक संगठन हैं जो समाजसेवा के नाम पर शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं,साम्प्रदायिक विभाजन और घृणा का काम कर रहे हैं, लेकिन बदले में वोट की राजनीति भी कर रहे हैं या साम्प्रदायिक या फंडामेंटलिस्ट राजनीति कर रहे हैं। देश का सबसे बड़ा संगठन आरएसएस समाजसेवा ही कर रहा है।साथ में अन्य राजनीतिक लक्ष्यों में लगा है। यह समाजसेवा नहीं है यह समाज मेनीपुलेशन है।
     कहने का आशय यह है कि समाजसेवा को तब ही समाजसेवा कहते हैं जब आप अन्य की मदद करें और भूल जाएं,बदले में उससे कुछ न चाहें, समाजसेवा का ढोल बजाकर जिक्र न करें। मसलन् ,समाजसेवा का रामकृष्ण परमहंस मिशन का तरीका देखें तो यह बात सहज ही समझ में आ जाएगी। वह समाजसेवा किसी काम की नहीं है जो बदले में निहितस्वार्थों की पूर्ति की मांग करे, राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति की मांग करे।
      समाजसेवक न्यायप्रिय और सभ्य होता है। सलमान और उनके जैसे सामाजिक संगठन या समाजसेवक इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे न तो न्यायप्रिय हैं और न सभ्य ही हैं। बल्कि स्थिति यह है कि वे लंपटता और मीडियाप्रेशर के जरिए सामाजिक माहौल को अपने अनुकूल बनाने की घृणिततम कोशिश कर रहे हैं. इन लोगों ने बड़े पैमाने पर लंपट मध्यवर्ग को अपने साथ गोलबंद कर लिया है। यह लंपट मध्यवर्ग आए दिन उन सभी नेताओं और अभिनेताओं के पीछे गोलबंद नजर आता है जिनकी नागरिक समाज में कोई आस्था नहीं है,जिनकी भारत के कानून में कोई आस्था नहीं है, वे समूह या भीड़ के दवाब के जरिए कानून से लेकर सरकार तक सबको प्रभावित करना जानते हैं। मीडिया को वे अपने प्रौपेगैण्डा अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।  

Wednesday, 11 June 2014

जिसके मन में अन्य के लिए जगह नहीं है वह सभ्य नहीं हो सकता---जगदीश्वर चतुर्वेदी

सभ्यता से डरे हम लोग

June 11, 2014 at 8:46am
       हमारे देश में लोग बदमाश से नहीं डरते ।बल्कि बदमाशों के साथ रहते हैं। दंगाई से नफरत नहीं करते बल्कि उसको वोट देते हैं और पूजा करते हैं। हमारे देश में पत्थर की मूर्तियों से दूर नहीं रहते बल्कि उनकी रोज पूजा करते हैं। उनको घर में रखते हैं।सम्मान करते हैं। हमारे देश में लोग जिस चीज से डरते हैं वह है सभ्यता।
   सभ्यता और सभ्य आदमी से लोग डरते हैं। सभ्य को मित्र नहीं बनाते असभ्य को मित्र बनाते हैं। ईमानदार से दूर रहते हैं,धूर्त-चालाक और बेईमान के साथ गलबहियां देकर रहते हैं। औरत के साथ विवाह करते हैं,बेटी की तरह पैदा करते हैं,माँ की तरह मानते हैं, लेकिन औरतों के साथ सबसे ज्यादा हिंसाचार करते हैं। हिंसा और असभ्यता के माहौल को हमारे देखकर यही महसूस होता है कि हमारे देश में सभ्य होना गाली है !  
     सवाल यह है  सभ्य से हम क्यों दामन छुडाना चाहते हैं ? सभ्य होना क्या बुरी बात है ? सभ्य क्या सक्षम नहीं होते ? फेसबुक और सामाजिक जीवन में असभ्यता का जो वैभव दिखाई देता है वह बार बार यही संदेश देता है कि सभ्य होना सही नहीं है! असभ्य रहो,मजे में रहो!
     सभ्यता की मांग है कि विवेकवाद अर्जित करें। हमारे यहां उल्टी हवा चल रही है। इरेशनल या विवेकहीन बातों को तवज्जह दी जाती है। नॉनशेंस की पूजा की जाती है। इरेशनल से बड़ा असभ्यता का कोई रुप नहीं है। हम भारतवासी जितनी ऊर्जा नॉनसेंस चीजों पर खर्च करते हैं उसका आधा वक्त भी विवेकवादी और सभ्य चीजों पर खर्च करें तो भारत सोने की चिडिया हो जाय।
     फिलहाल स्थिति यह है किभारत में चिडियाएं भी रहना पसंद नहीं करतीं, वे भी कम हो रही हैं। मौसम बिगडा हुआ है। हम हैं कि विवेक से काम लेने की बजायभगवान की कृपा का इंतजार कर रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध बनाएं तो चीजें सुधर सकती हैं। हमने प्रकृति और पर्यावरण के साथ विवेकपूर्ण संबंध नहीं बनाया है बल्कि केजुअल संबंध बनाया है। उपभोग का संबंध बनाया है।
     हम कितने सभ्य हैं और कितने असभ्य हैं ? इसका कोई सटीक मानक बनाना तो संभव नहीं है लेकिन यह तय है कि सभ्यता वंशानुगत नहीं होती,उसे अर्जित करना पड़ताहै। हमारी मानसिकता यह है कि हम अर्जित करने के लिए श्रम नहीं करना चाहते। हम चाहते हैं कि कोई ऐसा फार्मूला हो जो हमें घर बैठे सभ्य बना दे। हमें यह भी सिखाया गया है कि फलां-फलां वस्तुएं घर में हों तो सभ्यता घर में दाखिल हो जाती है। वस्तुएं के जरिए सभ्य कहलाने की आशा मृगतृष्णा है।
    वस्तुएं सभ्य नहीं बनातीं। सभ्य बनने के लिए पहली शर्त है कि हम यह मानें कि निज को बदलेंगे और सचेत रुप से बदलेंगे। सभ्य वह है जो निज को और अन्य को प्यार करना जानता है।जिसके मन में अन्य के लिए जगह नहीं है वह सभ्य नहीं हो सकता। जब तक आप निजी जंजालों में फंसे रहेंगे सभ्य नहीं बन सकते। निजी जंजालों के बाहर निकलकर सामाजिक होने, अन्य के प्रति निजी सरोकारों को व्यक्त करने से सभ्यता का विकास होता है।अपने लिए न पढ़कर,देश के लिए पढ़ना, अपने लिए न लिखकर अन्य के मसलों और जीवन की समस्याओं पर लिखना, हर क्षण अन्य की चिन्ताओं को अपनी चिन्ताएं बनाने से सभ्यता का विकास होता है।
      सभ्य बनने के लिए अपने से बाहर निकलकर झांकने की कला विकसित करनी चाहिए। निहित-स्वार्थों में डूबे रहना और अनालोचनात्मक ढ़ंग से चीजों, वस्तुओं,व्यक्तियों और विचारों को देखने से सभ्यता का विकास बाधित होता है।
     सभ्यता के विकास के लिए जरुरी है कि हम चीजों को व्यापक फलक पर रखकर देखने का  नजरिया विकसित करें। सभ्य वह है जिसके पास व्यापक फलक में रखकर देखने का नजरिया है। आप जितना व्यापक फलक रखकर देखेंगे वस्तुएं,घटनाएं आदि उतनी ही साफ नजर आएंगी। हम बौने क्यों हो गए क्योंकि हमने दुनिया को देखने का फलक छोटा कर लिया। हम अनुदार क्यों हुए क्यों कि हमारी समझ निजी दृष्टि से आगे बढ़ नहीं पायी। हमें निजी दृष्टिकोण की नहीं विश्वदृष्टिकोण की जरुरत है।सभ्यता हमें विश्व दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है। विश्व दृष्टिकोण के आधार पर देखने के कारण हम अनेक किस्म की सीमाओं और कट्टरताओं से सहज ही मुक्त हो सकते हैं।   

https://www.facebook.com/notes/683952164973531/

Friday, 7 February 2014

जनता की बात जनता के लिए:मोहम्मद गनी----अशोक बंसल


मोहम्मद गनी-- दिहाड़ी मज़दूर से फिल्मकार बनने का सफर -

मोहम्मद गनी

February 7, 2014 at 8:41am


एक बेलदार से फोटोग्राफर और फिल्मकार का सफर तय करने वाले अड़तीस साल के मोहम्मद गनी मथुरा के ऐसे अकेले फ़िल्मकार हैं जिन्होंने अपने श्रम और लगन से बड़े परदे की एक फ़िल्म का निर्माण कर मथुरा ही नहीं दूसरे शहरों के सांस्कृतिक कमिर्यों को हैरत में डाल दिया है। कहानीकार ज्ञानप्रकाश की कहानी ''कैद '' पर आधारित यह फ़िल्म कोई बम्बइया शैली की तर्ज़ पर न होकर विशुध्द कलात्मक और मकसदशुदा फ़िल्म है । फ़िल्म 'कैद' का प्रदर्शन आजकल मथुरा में जगह जगह किया जा रहा है. इसके साथ ही गाणी इस फ़िल्म को फ़िल्म फेस्टिवल में भी भेजने की तैयारी में जुटे हैं. यह फ़िल्म एक बच्चे के साथ स्कूल और घर पर की गई उपेक्षा से उपजे दर्द की ददर्नाक कहानी है ।
मोहम्मद गनी के पिता नाज़र अली ने सपने में भी न सोचा था कि उनका अनपढ़ बेटा ईंट-गारे की कैद से मुक्त होकर पढ़े लिखों की जमात में शरीक होकर मुक्त गगन में विचरण करेगा । आर्ट फ़िल्म संसार में कुछ कर गुजरने की हसरत रखने वाले गनी ने बताया कि मुफलिसी का जीवन जीने वाले उनके पिता नाज़र अली एटा जनपद के गाँव दोर्रा से मथुरा में काम की तलाश में आये थे। तब मथुरा में श्री कृष्ण जन्म भूमि पर भागवत मंदिर का निर्माण चल रहा था। मज़दूरों की जरूरत थी सो फ़ौरन खप गए। परिवार में पत्नी के अलावा चार बच्चे थे । निर्माण स्थल पर ही अधबने मंदिर में एक मुस्लिम परिवार ने डेरा डालने में तनिक भी संकोच नहीं किया। नाज़र अली को चंग बजाकर आल्हा गाने में महारत हासिल थी । शाम को थके हारे परिवार में आते तो आल्हा गाकर थकान मिटाते। बच्चे पिता के कंठ से निकली स्वर लहरी में बह जाते । पूरा परिवार पेट में अन्न पहुंचाकर ही संतुष्ट था। गनी के स्कूल जाने का सवाल तो दूर' अ ब स' या 'अलिफ़ वे पे' से वाकिफ होने का अवसर न मिला । गनी के हाथो में ताकत आई तो वह भी अपने भाई हनीफ और सनीफ के साथ मेहनत -मजूरी करने लगा। धीरे धीरे मंदिर बन गया तो नाज़र परिवार को मंदिर परिसर से अपनी रिहाइश हटानी पड़ी । सभी लोग यमुना पार की गरीबों की बस्ती में जा बसे । पड़ौस में घनश्याम दरजी की दूकान थी ,पिता ने गनी को दर्जी की मिन्नतें कर कपडा सिलाई का काम सीखने में लगा दिया । तब गनी की उम्र १५ साल रही होगी .गनी ने बताया कि कपडे पर कैंची चलाना तो आ गया पर हर वक्त उसकी इच्छा कैमरे को छूने की होती थी। १९९० में वह स्वतन्त्र दरजी हो गया। पैसा बचाने लगा एक कैमरा खरीदने के लिए । हिंदी पढ़ना सीख लिया। पत्रिकाओं में बड़े बड़े फोटोग्राफरों के बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुई । इसी वक्त गनी को अशोक मेहता ,बाबा आजमी ,लारेंस डिसूजा जैसे नामी गिरामी फोटोग्राफरों के बारे में जानने का अवसर मिला । गनी ने पढ़ा कि बाबा आजमी (कैफी आजमी के बेटे और शबाना आजमी के भाई ) ''इप्टा '' में काम करते हैं । मथुरा में ''इप्टा'' की शाखा थी । गनी ने इसके पदाधिकारिओं से संपर्क साधा और सदस्य बन गया। वह राम मंदिर आंदोलन का दौ.र था। मथुरा में गुरुशरण सिंह के नाटक ''अपहरण भाईचारे का'' मंचन हुआ। गनी को इस नाटक में काम करने का मौका मिला। गनी को उसकी अभिनय प्रतिभा देख सुशील कुमार सिंह के नाटक ''सिंहासन खाली करो ''में काम दिया गया लेकिन दरजी की दूकान में आमंदनी कम होने लगी । गनी को इप्टा वालों से मिलने शहर आना पड़ता था .अत; घर में ही ''प्रेरक थिएटर '' बना डाला । दिनभर काम और फिर बचे वक्त में गरीब बस्ती के बच्चों के साथ किसी नाटक का रिहर्सल। .गनी की संस्था में गति आ गई। गनी की समझ का विस्तार होने लगा। प्रगतिशील लोगों के संगठन ''जन सांस्कृतिक मंच ''ने गनी को हाथों हाथ लिया। गनी का जुड़ाव देश के वामपंथी आंदोलन से हुआ । वह एक आयोजन में दिल्ली जाकर कैफी आजमी ,फारूख शेख ,मुद्रा राक्षस ,शबाना आजमी ,हबीब तनबीर आदि से मिला। उसकी संस्था' प्रेरक' ने मलिन वस्तिओ में और ज्यादा शिद्दत से काम करना शुरू कर दिया।
पूरे परिवार ने मेहनत मशकत से जमा की कुछ रकम से जमीन का एक टुकड़ा ख़रीदा और बच्चों का स्कूल खोल दिया । गनी का पूरा परिवार स्कूल के काम में जुट गया . गनी ने बच्चों के अंदर नाट्य प्रतिभा को जगाना प्रारम् किया । परिसर में प्रेमचंद की कहानी'' कफ़न '' पर नाटक तैयार किया गया । हरिशंकर परसाई के कई व्यंग पर आधारित नाटक खेले गए। गनी ने दर्जीगिरी का काम फिर भी न छोड़ा ,पैसा इकठ्ठा जो करना था कैमरा खरीदने के लिए ।लगभग ५ वर्ष पूर्व गनी का वर्षों पुराना सपना पूरा हुआ। वह एक हैंडीकैम कैमरा खरीद लाया । शम्भूनाथ सिंह की एक कहानी पर इस छोटे कैमरे से ६ मिनट की फ़िल्म बना डाली । स्कूल चल निकला। आमंदनी होने लगी । सन २०१० में दूसरा कैमरा ख़रीदा और ज्ञान प्रकाश विवेक की अनुमति के बाद उनकी कहानी ''कैद'' का नाट्य रूपांतरण कर उसे फिल्माया गया । फ़िल्म में कई पात्रों का अ•िानय स्कूल के छात्र और शिक्षकों ने किया है । इस फ़िल्म में ''पान सिंह तोमर '' में अभिनय करने वाले अभिनेता व् निदेशक संदीपन विमलकांत(पटकथा लेखिका अचला नागर के बेटे ) ने भी काम किया है। गनी के इस बड़े व् प्रथम प्रयास को मथुरा --आगरा में सराहा जा रहा है।
गनी के सपनों में अब पंख लग गए हैं । उसे धन दौलत की दुनिया से परहेज है । वह जनता के दर्द को व्यक्त करने वाले साहित्य को अपनी फिल्मों में स्थान देना चाहता है । गनी ने बताया कि प्रसिध्द अभिनेता अमोल गुप्त ने उससे कहा है कि अगला सिनेमा छोटी छोटी जगहों -कस्बों से पैदा होगा ,जनता की बात जनता के लिए। गनी ने अपनी दूसरी फ़िल्म की तैयारी शुरू कर दी है . कहानीकार शुशांत सुप्रिय की कहानी ''मेरा जुर्म क्या है '' की पटकथा लेखन में जुट गए हैं --गनी और उसके भाई हनीफ ।
गनी और उसके परिवार का .नाटक और अच्छी फिल्मों के प्रति एक ईमानदार समर्पण देख मथुरा का साहित्यिक -सांस्कृतिक समुदाय उनके प्रति श्रद्धानत है।


साभार जगदीश्वर चतुर्वेदी जी :
https://www.facebook.com/notes/jagadishwar-chaturvedi/