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Thursday, 13 October 2016

फासीवाद के खिलाफ हम सब ------ राकेश (इप्टा )

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Arvind Raj Swarup Cpi added 4 new photos.
Lucknow 13th October 2016.
A few Photos of Protest at Lucknow against the attack of Sanghis on IPTA conference participants at Indore (MP)on 4th October 2016.

















लखनऊ , 13 अक्तूबर 2016 :
आज साँय जी पी ओ पार्क, हजरतगंज स्थित गांधी प्रतिमा पर इंदौर ( म . प्र .) में 'इप्टा  ' के राष्ट्रीय सम्मेलन पर 04 अक्तूबर 2016 को फासिस्टी गुंडों के हमले के खिलाफ विरोध स्वरूप एक धरना - प्रदर्शन का आयोजन किया गया । इसका संचालन इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने किया और इसमें प्रलेस, जलेस, जसम,साझी दुनिया, नीपा रंगमन्डली, अलग दुनिया, कलम सांस्कृतिक मंच, कलम विचार मंच , सेंटर फार आबजेक़टिव रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट, राही मासूम रज़ा एकेडमी, पी यू सी एल, अमित, दस्तक, डी वाई एफ वाई, नौजवानसभा, एस एफ आई, आल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, लखनऊ कलेक्टिव आदि संस्थाओं का प्रतिनिधित्व रहा। 

राकेश ने सविस्तार इप्टा के राष्ट्रीय कन्वेन्शन में घटित हादसे का उल्लेख करते हुये कलाकारों और प्रतिनिधियों के संयम व साहस की सराहना की। 


 इप्टा के कलाकारों ने गीतों के माध्यम से फासीवादी ताकतों के विरुद्ध  संघर्ष व जनता की एकजुटता का आह्वान किया। 


इस धरने में बड़ी संख्या में लखनऊ के लेखक कलाकार व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुये जिनमें वेदा राकेश, अरविंद राज स्वरूप, वीरेंद्र यादव, रूप रेखा वर्मा, ताहिरा हसन, आनंद रमन तिवारी, फूलचंद यादव, सुभाष राय, ओ पी सिन्हा, के के शुक्ल, मोहम्मद ख़ालिक़, मोहम्मद अकरम, विजय राजबली माथुर, मोहम्मद शोएब, मधु गर्ग, कान्ति मिश्रा, आशा मिश्रा, बिपिन मिश्रा, रमेश दीक्षित  आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।  
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आगरा, 13 अक्तूबर 2016  : 


Jyotsna Raghuvanshi


आगरा इप्टा प्रतिरोध दिवस 13अक्तूबर 2016....अभिव्यक्ति की आजादी ...बाधक हो तूफान बवंडर नाटक नहीं रुकेगा...






 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Thursday, 6 October 2016

लड़ना आसान होता है; ज़रूरत शांति के प्रयास की है - एम एस सथ्यु




 लड़ना आसान होता है; ज़रूरत शांति के प्रयास की है - एम एस सथ्यु

भारतीय जन नाट्य संघ के तीन दिवसीय 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का शुभारंभ ‘गर्म हवा’ जैसी कालजयी फिल्म के निर्देशक श्री एम एस सथ्यु द्वारा इप्टा के ध्वज वंदना से हुई। ध्वजारोहण में उनके साथ थे कॉमरेड पेरीन दाजी, प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन और इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश। ध्वजारोहण के बाद इप्टा अशोक नगर ईकाई, म.प्र और बिहार इकाई ने मिलकर शैलेंद्र द्वारा लिखित मशहूर जनगीत ‘तू ज़िंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर’ प्रस्तुत किया। इस मौके पर कॉमरेड पेरीन दाजी ने एम एस सथ्यु का स्वागत किया। इंदौर में उनकी उपस्थिति को गौरवपूर्ण बताया। ध्वज वंदना के बाद पुस्तक एवं पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन अंजन श्रीवास्तव ने किया।

2 अक्टूबर से 4 अक्टूबर तक चलनेवाले भारतीय जन नाट्य संघ के इस तीन दिवसीय 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव का विधिवत उद्घाटन आनंद मोहन माथुर सभागार में एम एस सथ्यु की अध्यक्षता में हुआ। मंच पर उपस्थित कलाकारों, लेखकों एवं रंगकर्मियों में थे ख्यात डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणवीर सिंह, उपाध्यक्ष अंजन श्रीवास्तव, राजेन्द्र राजन, राकेश, कॉमरेड पेरीन दाजी, नरहरि पटेल, वसंत शिंत्रे और मध्य प्रदेश इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया। मंच में उपस्थित लोगों के अतिरिक्त सभागार में देश के 25 राज्यों के लगभग 800 सौ रंगकर्मियों-संस्कृति कर्मियों के अलावा सैकड़ों की संख्या में लेखक, पत्रकार, कलाकार एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित थे।

अपने स्वागत भाषण में राकेश ने कहा इप्टा मोहब्बत की बात करती है। चार्ली चैप्लिन ने कहा था कि कला, कलाकार द्वारा जनता को लिखा गया प्रेमपत्र है। हम इसमें यह जोड़ते हैं कि इप्टा समय आने पर जनता की ओर से शासकों को अभियोग पत्र भी भेजती है। इप्टा के 75 साल पूरे हो रहे हैं। इसका नामकरण मशहूर वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था। हम युद्ध के विरोध में तब भी थे और आज भी हैं। हम शांति के पक्षधर हैं। राकेश ने एम एम कलबुर्गी समेत दिवंगत अन्य विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इप्टा बेगूसराय के पुराने साथी कन्हैया कुमार सहित सभी संघर्षशील साथियों के प्रति समर्थन व्यक्त किया। विभिन्न संगठनों एवं साथियों द्वारा प्राप्त ग्रीटिंग तथा शुभकामना संदेशों का उल्लेख किय़ा।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे एम एस सथ्यु ने मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य और हमारी चुनौतियाँ विषय पर अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा यह तय करना मुश्किल होता है कि किस भाषा में बात करें। मैं कन्नड़ हूँ यहाँ भारत के सभी भाषा भाषी लोग मौजूद हैं। अपने आत्मीय लहजे में सथ्यु ने दक्षिण भारतीय भाषाओं समेत हिंदी और अंग्रेज़ी में सभी का अभिवादन किया। उन्होंने कहा मै अनेक रंग संगठनों से होता हुआ 1965 में इप्टा में शामिल हुआ। लड़ना बहुत आसान होता है। लोगों से शांतिपूर्ण व्यवहार करना कठिन होता है। तकनीकि प्रगति इतनी हो चुकी है कि घर बैठे बम फेंके जा सकते हैं लेकिन शांति के प्रयास काफ़ी कठिन हैं। युद्ध के मौके पिछली सरकारों के पास भी थे। लेकिन उन्होंने हमले नहीं किये। लेकिन यह सरकार युद्ध कर रही है। आज की सरकार कम्युनल है। राहुल गांधी मोदी का युद्ध के विषय में समर्थन कर बचकानी बात कर रहे हैं। यह कांग्रेस का पक्ष नहीं राहुल गांधी की अपरिपक्वता है। मेरे विचार से सर्जिकल ऑपरेशन भारत के लिए शर्मनाक है। भारत का भरोसा आक्रमण पर नहीं होना चाहिए। कलाकार के रूप में हमें सांप्रदायिकता, चरमपंथ आदि से मुकाबला करना है। हमारे लिए धर्म, जाति और द्रोणाचार्य सभी गैरज़रूरी हैं। लाल, क्रांति का रंग है। हमे प्रिय है। हम लोकतंत्र के पक्षकार हैं। हमें आज द्रोणाचार्य नहीं चाहिए। हम लोकतांत्रिक उम्मीद के लोग हैं। रंगमंच दुमिया नहीं बदल सकता। वह लोगों को उत्प्रेरित कर उन्हें एक्टिव बनाता है। स्वीकार और निर्णय तक पहुँचाता है। मैं खुद को कलाकार मानता हूँ। मुझे बहुत खुशी होगी अगर मैं अगली बार अपना नाटक लेकर आऊँ।

प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी 20 रुपये प्रतिदिन से कम कमाती है। हमारा देश वित्तीय पूँजी का गुलाम हो चुका है। दूसरी दुनिया बनाने की लड़ाई अब तक बाकी है। भारतीय लोकतंत्र और विचारों की स्वतंत्रता खतरे में है। लेखकों को गुमराह किया जा रहा है उन्हें तोड़ा जा रहा है लेकिन हम टूटने भटकनेवाले नहीं निदान करनेवाले लोग हैं।

राजेन्द्र राजन के वक्तव्य के बाद इप्टा अशोक नगर के कलाकारों ने बामिक जौनपुरी का लिखा जनगीत ‘रात के समंदर में गम की नाव चलती है’ प्रस्तुत किया।

कॉमरेड शमीम फैज़ी ने कॉमरेड एबी बर्धन को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा वर्धन कल्चर, आर्ट, राजनीति और आंदोलनों से समान रूप से जुड़े थे। उनकी लिखी किताब फाइनांस कैपिटल आज टेक्स्ट बुक की तरह है। वे आयडियोलाग की तरह थे।

इस अवसर पर आनंद पटवर्धन की कॉमरेड ए बी वर्धन के अयोध्या भाषण पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गयी। इप्टा के पूर्व राष्ट्रीय महा सचिव कवि-कथाकार-रंगकर्मी जितेंद्र रघुवंशी पर आधारित एक फिल्म ‘सीप का मोती’ का प्रदर्शन भी किया गया। कवि और अनुवादक उत्पल बैनर्जी ने फैज़ की नज़्म 'लाजिम है कि हम भी देखेंगे' सुनायी। महाराष्ट्र के अंध विश्वास निर्मूलन समिति के कलाकारों ने सुकरात, तुकाराम और नरेन्द्र दाभोलकर एवं गोविंद पानसरे पर केन्द्रित नाटक की प्रस्तुति दी।

अंत में कॉमरेड विनीत तिवारी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा कि रोहित वेमुला की हत्या सांस्थानिक थी। एम एम कलबुर्गी की हत्या से हम अब तक नहीं उबरे है। कलबुर्गी कन्नड़ के 1400 साल के इतिहास में सबसे विपुल लेखन करनेवाले साथी रहे हैं। उन्हें याद करने के साथ साथ हम अपनी लड़ाइयों और एकता के लिए प्रतिबद्ध हैं। सत्र का संचालन अरविंद पोरवाल ने किया।

साभार :
https://www.facebook.com/shashi.bhooshan.35/posts/1467367616612963

Thursday, 29 October 2015

सही वक्त पर एंट्री और एग्ज़िट करते थे जुगल किशोर --- - वीर विनोद छाबड़ा

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Vir Vinod Chhabra.
28-10-2015  at 11:01am · 
ज़िंदगी के मंच से रांग एग्ज़िट मार गए जुगल किशोर! 
- वीर विनोद छाबड़ा 
२५ अक्टूबर की शाम बहुत ग़मगीन थी। दिवंगत साथी जुगल किशोर को याद करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लखनऊ के तमाम सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और साहित्यकार और उनसे सरोकार रखने वाले भारतेंदु नाट्य अकादेमी में जुटे थे। जुगल के अकस्मात् चले से जाने से हर शख़्स शोक में डूबा था। 
संचालन करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महसचिव राकेश भी आंसू नहीं रोक पा रहे थे। आज वो व्यवस्थित नहीं थे। वो बता रहे थे - कल तक जो सामने था आज नेपथ्य में चला गया है। पिछले ४० साल में मैंने उसमें एक बहुत अच्छे अभिनेता, निर्देशक, प्रशिक्षक, लेखक और इंसान के रूप में देखा। 
जुगल को नाटक का ककहरा पढ़ाने वाले सुप्रसिद्ध वरिष्ठ प्रशिक्षक और रंगकर्मी राज बिसारिया ने कहा - वो मेरा बच्चा था। महबूब था। बरसों पहले इंटर पास एक दुबले-पतले नौजवान के रूप में भरपूर स्प्रिट के साथ आया था। उसकी स्प्रिट को सलाम। उसकी मसखरी का पात्र हमेशा मैं रहा। जो जितना दूर जाता है उतना ही पास रहता है। दुःख-दर्द बहुत गहरा होता है। उसकी ज़ुबान नहीं होती। आज का दिन रोने का नहीं, जश्न मनाने है। उसकी याद में खुद को मज़बूत करने का है। नाटक करो। यह ज़िंदगी का आईना है। अपने दौर में जुगल जितना कर गया, उसे मैं सलाम करता हूं। अपने फ़न से वो सबको हराता रहा, लेकिन खुद मौत से हार गया। जुगल हमारी सांसो में रहेगा। 
सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव की नज़र में रंगकर्म समाज का आईना है और जुगल ने इस सरोकार से सदैव रिश्ता बनाये रखा। इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जीवंत रिश्ता रखा। साहित्य से बहुत गहरा जुड़ाव रहा उनका। सदैव संभावना खोजा करते थे कि अमूक साहित्यिक कृति का नाट्य रूपांतरण कैसे तैयार किया जाये। खुद को समृद्ध करने के लिए साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मौजूद रहते। सिनेमा में जाने के बावजूद वो रंगमंच से प्रतिबद्ध रहे। संस्कृति के लिए आज का समय बहुत ख़राब है। ऐसे में एक बहुत अच्छे साथी का चले जाना बहुत ही कष्टप्रद है। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने कहा - अभी तक सुना था कि मौत बहुत बेरहम होती है। चुपके से आती है। लेकिन आज देख भी लिया। सुबह उसने संगीत नाटक अकादमी का ईनाम मिलने की मुबारक़बाद दी और शाम को रुला दिया। जुगल का जाना रंगमंच की क्षति है, समाज की भी क्षति है। उसके साथ कई नाटकों में काम किया। हंसी मज़ाक और गप्पें मारना बहुत अच्छा लगता था। यह संयोग है कि वो नाटकों में मौत का बहुत शानदार अभिनय करता रहा। उसका जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। मैंने एक दोस्त खोया है। 
वरिष्ठ रंगकर्मी आतमजीत सिंह ने बताया - जुगल का जाना एक दर्दभरी घटना है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई गंभीर रंगमंच चल रहा है। वो बड़ा स्तंभ था। उनका स्थान किसी के लिए लेना मुश्किल है। जुगल को याद करने का तरीका यही होगा कि नाटक चलता रहे। 
सुप्रसिद्ध लेखक-कवि नलिन रंजन सिंह ने बताया कि बहुत नज़दीकी रिश्ता था जुगल से। एक हंसता हुआ चेहरा। ज़िंदादिल इंसान थे वो। जब भी मिले, नए लोगों को रंगमंच से जोड़ने की संभावनाएं हमेशा तलाशते हुए। चिंतित रहते थे कि नई पीढ़ी रंगमंच के दायित्व का कैसे निर्वहन करेगी। ज़रुरत है कि उनकी चेतना से जुड़ कर या वैचारिक रूप से या लेखन के माध्यम से आगे बढ़ाया जाये। 
अलग दुनिया के केके वत्स ने बताया - सिनेमा से जुड़ने के बावजूद जुगल ने लखनऊ नहीं छोड़ा। याद नहीं आता कि उनका किसी से कोई मतभेद रहा हो। जुगल की याद में प्रत्येक वर्ष २५ हज़ार का एक पुरुस्कार मंच पर सामने या नेपथ्य में शानदार काम करने केलिए दिया जाएगा। इसकी शुरुआत उनके जन्मदिन २५ फरवरी से होगी। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ अभिनेता अरुण त्रिवेदी का कहना था - मेरा जुगल से पिछले ३५-३६ साल से दिन-रात का साथ रहा। हम भारतेंदु नाट्य अकादमी में लगभग एकसाथ आये। रंगमंच से जुड़ी अनेक व्याधियों और कष्टों को एकजुटता से झेला। स्टेज ही नहीं बाहर भी हम एकसाथ रहे। प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद हमने अकादमी की प्रस्तुतियों पर कोई आंच नहीं आने दी, उसकी शान को कभी धूमिल नहीं होने दिया। जुगल अपनी स्टाईल में बिना बताये और बिना किसी से सेवा कराये, चुपके से बहुत दूर चले गए। 
तरुण राज ने कहा - जो रोज़ मिलते हैं, वो दिल में समा जाते हैं। पिछले हफ़ते ही जुगल ने कहा था, बहुत साल हो चुके हैं अब बैठकें नहीं होतीं। इस सिलसिले को फिर से क़ायम किया जाये। 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी वेदा राकेश ने कहा - बहुत पुराना साथ है जुगल से। उन दिनों रंगमंच के काम से जब भी कहीं जाना होता था तो जुगल अपनी साईकिल लिये हाज़िर मिलते। वो हीरो हुआ करते हम लोगों के। बहुत चंचल और शैतान थे। अपने साथियों का बहुत ख्याल रखते थे वो। यह गुण उनकी आदतों में शामिल थे। मैं उनकी मुस्कान, उसके खुशनुमा चेहरे और बोलती आंखों को याद करते रहना चाहूंगी। 
वरिष्ठ रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज ने कहा - मुश्किल ही नहीं बहुत मुश्किल है जुगल के बारे में बात करना। वो बहुत अच्छा नहीं, बहुत ख़राब एक्टर था। बिना बताये चला गया। जिस तरीके से गया, वो तो बहुत ही ख़राब था। गज़ब का परफेक्शनिस्ट एक्टर था वो। अपने से बहुत प्यार करता था। शायद इसलिये भी बहुत अच्छा एक्टर था। जितनी देर काम करता था अपने पर बहुत ध्यान देता रहा। हर एक्ट के बाद पूछता था, कैसा रहा? हमें जब भी किसी कार्यक्रम में जाना होता था तो जुगल को फ़ोन करते थे कि पहुंच रहे हो न। लेकिन आज तो उसी की याद में आना था। कोई फ़ोन नहीं कर पाये। 
वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप घोष ने बताया - मैं पिछले ४० साल से जानता था जुगल को। बंदे में बहुत दम था। उसकी सोच बहुत बड़ी थी। मैंने उसे बहुत अच्छी एक्टिंग करते हुए देखा है। बहुत कम होते ऐसे एक्टर। 
युवा रंगकर्मी और समाजसेवी दीपक कबीर ने बताया - बहुत कुछ सीखा है मैंने जुगलजी से। नाटक को लेकर बहुत चिंतित देखा है उनको। सेलेब्रटी होने के बावजूद उनमें ईगो नहीं था। कहीं भी बैठ जाते। सादगी की मिसाल थे वो। सामजिक कार्यकर्ता भी थे वो। इसीलिए कार्यक्रमों में उनको अक्सर बुलाया जाता था। लेकिन वो बोलने के इच्छुक कतई नहीं रहे। एक दिन बोले, आजकल हम कंडोलेंस बहुत करते हैं। क्या यही करते रहेंगे ज़िंदगी भर? 
सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना ने बताया - जुगल बहुत पुराने साथी थे उनके। ज़बरदस्त पोटेंशियल था उनमें। जब पहली बार देखा तो हम तभी समझ गए थे कि लंबी रेस का घोड़ा हैं जुगल। परकाया में घुस कर एक्टिंग करते थे वो। वो अक्सर कहा करते थे कि लोग एक्टिंग करना चाहते हैं, पढ़ना नहीं चाहते हैं। मैंने उनके हाथ में हमेशा कोई न कोई किताब देखी। वो किसी भी विषय से संबंधित होती थी। उनकी टाईमिंग गज़ब की थी, लेकिन यह आख़िरी वाली टाईमिंग बिलकुल पसंद नहीं आई। 
वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल सिन्हा ने बताया - जुगल अक्सर फ़ोन करते थे। बहुत लंबी लंबी बातें होती थीं। साथ-साथ उठना-बैठना बहुत रहा। लेकिन हमने नाटक साथ-साथ नहीं किया था। एक दिन फ़ोन आया कि एक रोल है। मैं सकुचाया। जुगल ज़बरदस्त ही एक्टर ही नहीं, प्रशिक्षक भी थे। मेरी अपनी सीमायें थीं। डर लगाकि मैं उन्हें संतुष्ट नहीं करा पाया तो? खुद को जुगल के सामने एक्सपोज़ नहीं करना चाहता था। लेकिन जुगल ने मुझे सहज कर दिया। पिछले दो-तीन महीने से मैं जुगल के संपर्क में नहीं था। मुझे इसका ताउम्र मलाल रहेगा। 
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी चित्रा मोहन ने कहा - जुगल की ढेर यादें हैं। जब वो अंदर ही अंदर बहुत भर जाते थे तो एकदम से फट पड़ते थे। घंटा-डेढ़ घंटा लगातार बोलते रहते। ऐसी-वैसी ढेर बातें कर जाते। बहुत पसेज़िव थे वो। मंच पर हमेशा सही वक्त पर एंट्री और एग्ज़िट करते थे। लेकिन ज़िंदगी के मंच पर रांग एग्ज़िट कर गए।
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२८-१०-२०१५
https://www.facebook.com/virvinod.chhabra/posts/1689171241316498?pnref=story

 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Saturday, 1 August 2015

इप्टा व प्रलेस द्वारा प्रेमचंद का स्मरण

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 कल दिनांक 31 जुलाई 2015 को क़ैसर बाग, लखनऊ स्थित उमानाथ बली प्रेक्षागृह में इप्टा व प्रलेस द्वारा कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी  का स्मरण उनकी दो कहानियों के नाट्य मंचन द्वारा किया गया।  समारोह संचालन राकेश जी द्वारा किया गया जिन्होने प्रेमचंद जी की आज की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला  जबकि 'पंच परमेश्वर' का निर्देशन ओ पी अवस्थी जी द्वारा तथा 'शूद्र' का प्रदीप घोष साहब द्वारा किया गया। समारोह निर्धारित समय से प्रारम्भ हुआ जिसमें  आरंभ में सुमन श्रीवास्तव जी के निर्देशन में मलिन बस्तियों की नन्ही-नन्ही बालिकाओं द्वारा सुंदर व मनमोहक गीत प्रस्तुति की गई। 

'शूद्र' नाटक को दर्शकों की विशेष वाहवाही मिली। हाल खचाखच भरा होने के कारण खड़े होकर भी लोगों ने अति-उत्साह से अवलोकन किया व प्रस्तुति को सराहा। 

राकेश जी ने घोषणा की कि शीघ्र ही इप्टा द्वारा जन-जागरण का अभियान प्रारम्भ किया जाएगा उसमें लोगों से सहयोग की उन्होने अपेक्षा भी की। उन्होने यह भी घोषणा की कि 08 अगस्त 2015 को इसी प्रांगण के 'जयशंकर प्रसाद ' सभागार में 'भीष्म साहनी' जी की जन्मशती के सिलसिले में दिन के साढ़े चार बजे एक गोष्ठी होने जा रही है जिसमें सभी जनों की उपस्थिती आमंत्रित है।
 
(चित्र में गौरा के रूप में किरण सिंह व शेफाली के वेश में ऊषा राय तथा मंगरू की भूमिका में राजीव भटनागर )

(चित्र में गौरा के रूप में किरण सिंह व शेफाली के वेश में ऊषा राय )




 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Monday, 13 July 2015

पाठकों को उत्प्रेरित करने वाला लेखन हो : गिरीश चंद्र श्रीवास्तव

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 फोटो कटिंग्स जनसंदेश  टाईम्स , लखनऊ  दिनांक : 13 जूलाई 2015 से साभार ---


 लखनऊ के क़ैसर बाग स्थित 'जय शंकर प्रसाद सभागार', में  इप्टा द्वारा आयोजित गोष्ठी के दूसरे सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में 'निष्कर्ष' के संपादक गिरीश चंद्र श्रीवास्तव साहब  ने उन तथ्यों पर प्रकाश डाला जिनके जरिये पाठकों की मनोदशा को वांछनीय दिशा में मोड़ा जा सकता है। उन्होने मुख्य रूप से मोहन राकेश की कहानियों की चर्चा की और कृष्णा सोबती की रचना कला का भी वर्णन किया। उनका दृष्टिकोण था कि केवल 'यथार्थ' को लक्ष्य करके हम पाठकों की मनोदशा को नहीं बदल सकते हैं। समय और परिस्थितियों के अनुकूल लेखन द्वारा पाठकों को सही दिशा में उत्प्रेरित करने का कार्य किया जाना चाहिए अन्यथा आज का लेखन आने वाले कल में 'अप्रासांगिक' हो जाएगा। इस संबंध में उन्होने मुंशी प्रेमचंद जी का उदाहरण दिया कि उनका लेखन आज भी उतना ही प्रासांगिक है जितना उनके काल में था और उससे आज भी प्रेरणा मिलती है। 

गोष्ठी के अंत में राकेश जी द्वारा सूचना दी गई कि 'इप्टा' व 'प्रलेस' के संयुक्त तत्वावधान में 31 जूलाई -'प्रेमचंद जयंती' पर 'राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह' में संक्षिप्त गोष्ठी के उपरांत प्रेमचंद जी की दो कहानियों का नाट्य मंचन किया जाएगा। धन्यवाद ज्ञापन प्रदीप घोष ने किया।
( संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश)

Friday, 27 March 2015

इस ऑडिटोरियम के बिना अधूरी रहेगी थिएटर की कहानी....रंगमंच हमारी जिद है

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 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश

Friday, 7 February 2014

जनता की बात जनता के लिए:मोहम्मद गनी----अशोक बंसल


मोहम्मद गनी-- दिहाड़ी मज़दूर से फिल्मकार बनने का सफर -

मोहम्मद गनी

February 7, 2014 at 8:41am


एक बेलदार से फोटोग्राफर और फिल्मकार का सफर तय करने वाले अड़तीस साल के मोहम्मद गनी मथुरा के ऐसे अकेले फ़िल्मकार हैं जिन्होंने अपने श्रम और लगन से बड़े परदे की एक फ़िल्म का निर्माण कर मथुरा ही नहीं दूसरे शहरों के सांस्कृतिक कमिर्यों को हैरत में डाल दिया है। कहानीकार ज्ञानप्रकाश की कहानी ''कैद '' पर आधारित यह फ़िल्म कोई बम्बइया शैली की तर्ज़ पर न होकर विशुध्द कलात्मक और मकसदशुदा फ़िल्म है । फ़िल्म 'कैद' का प्रदर्शन आजकल मथुरा में जगह जगह किया जा रहा है. इसके साथ ही गाणी इस फ़िल्म को फ़िल्म फेस्टिवल में भी भेजने की तैयारी में जुटे हैं. यह फ़िल्म एक बच्चे के साथ स्कूल और घर पर की गई उपेक्षा से उपजे दर्द की ददर्नाक कहानी है ।
मोहम्मद गनी के पिता नाज़र अली ने सपने में भी न सोचा था कि उनका अनपढ़ बेटा ईंट-गारे की कैद से मुक्त होकर पढ़े लिखों की जमात में शरीक होकर मुक्त गगन में विचरण करेगा । आर्ट फ़िल्म संसार में कुछ कर गुजरने की हसरत रखने वाले गनी ने बताया कि मुफलिसी का जीवन जीने वाले उनके पिता नाज़र अली एटा जनपद के गाँव दोर्रा से मथुरा में काम की तलाश में आये थे। तब मथुरा में श्री कृष्ण जन्म भूमि पर भागवत मंदिर का निर्माण चल रहा था। मज़दूरों की जरूरत थी सो फ़ौरन खप गए। परिवार में पत्नी के अलावा चार बच्चे थे । निर्माण स्थल पर ही अधबने मंदिर में एक मुस्लिम परिवार ने डेरा डालने में तनिक भी संकोच नहीं किया। नाज़र अली को चंग बजाकर आल्हा गाने में महारत हासिल थी । शाम को थके हारे परिवार में आते तो आल्हा गाकर थकान मिटाते। बच्चे पिता के कंठ से निकली स्वर लहरी में बह जाते । पूरा परिवार पेट में अन्न पहुंचाकर ही संतुष्ट था। गनी के स्कूल जाने का सवाल तो दूर' अ ब स' या 'अलिफ़ वे पे' से वाकिफ होने का अवसर न मिला । गनी के हाथो में ताकत आई तो वह भी अपने भाई हनीफ और सनीफ के साथ मेहनत -मजूरी करने लगा। धीरे धीरे मंदिर बन गया तो नाज़र परिवार को मंदिर परिसर से अपनी रिहाइश हटानी पड़ी । सभी लोग यमुना पार की गरीबों की बस्ती में जा बसे । पड़ौस में घनश्याम दरजी की दूकान थी ,पिता ने गनी को दर्जी की मिन्नतें कर कपडा सिलाई का काम सीखने में लगा दिया । तब गनी की उम्र १५ साल रही होगी .गनी ने बताया कि कपडे पर कैंची चलाना तो आ गया पर हर वक्त उसकी इच्छा कैमरे को छूने की होती थी। १९९० में वह स्वतन्त्र दरजी हो गया। पैसा बचाने लगा एक कैमरा खरीदने के लिए । हिंदी पढ़ना सीख लिया। पत्रिकाओं में बड़े बड़े फोटोग्राफरों के बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुई । इसी वक्त गनी को अशोक मेहता ,बाबा आजमी ,लारेंस डिसूजा जैसे नामी गिरामी फोटोग्राफरों के बारे में जानने का अवसर मिला । गनी ने पढ़ा कि बाबा आजमी (कैफी आजमी के बेटे और शबाना आजमी के भाई ) ''इप्टा '' में काम करते हैं । मथुरा में ''इप्टा'' की शाखा थी । गनी ने इसके पदाधिकारिओं से संपर्क साधा और सदस्य बन गया। वह राम मंदिर आंदोलन का दौ.र था। मथुरा में गुरुशरण सिंह के नाटक ''अपहरण भाईचारे का'' मंचन हुआ। गनी को इस नाटक में काम करने का मौका मिला। गनी को उसकी अभिनय प्रतिभा देख सुशील कुमार सिंह के नाटक ''सिंहासन खाली करो ''में काम दिया गया लेकिन दरजी की दूकान में आमंदनी कम होने लगी । गनी को इप्टा वालों से मिलने शहर आना पड़ता था .अत; घर में ही ''प्रेरक थिएटर '' बना डाला । दिनभर काम और फिर बचे वक्त में गरीब बस्ती के बच्चों के साथ किसी नाटक का रिहर्सल। .गनी की संस्था में गति आ गई। गनी की समझ का विस्तार होने लगा। प्रगतिशील लोगों के संगठन ''जन सांस्कृतिक मंच ''ने गनी को हाथों हाथ लिया। गनी का जुड़ाव देश के वामपंथी आंदोलन से हुआ । वह एक आयोजन में दिल्ली जाकर कैफी आजमी ,फारूख शेख ,मुद्रा राक्षस ,शबाना आजमी ,हबीब तनबीर आदि से मिला। उसकी संस्था' प्रेरक' ने मलिन वस्तिओ में और ज्यादा शिद्दत से काम करना शुरू कर दिया।
पूरे परिवार ने मेहनत मशकत से जमा की कुछ रकम से जमीन का एक टुकड़ा ख़रीदा और बच्चों का स्कूल खोल दिया । गनी का पूरा परिवार स्कूल के काम में जुट गया . गनी ने बच्चों के अंदर नाट्य प्रतिभा को जगाना प्रारम् किया । परिसर में प्रेमचंद की कहानी'' कफ़न '' पर नाटक तैयार किया गया । हरिशंकर परसाई के कई व्यंग पर आधारित नाटक खेले गए। गनी ने दर्जीगिरी का काम फिर भी न छोड़ा ,पैसा इकठ्ठा जो करना था कैमरा खरीदने के लिए ।लगभग ५ वर्ष पूर्व गनी का वर्षों पुराना सपना पूरा हुआ। वह एक हैंडीकैम कैमरा खरीद लाया । शम्भूनाथ सिंह की एक कहानी पर इस छोटे कैमरे से ६ मिनट की फ़िल्म बना डाली । स्कूल चल निकला। आमंदनी होने लगी । सन २०१० में दूसरा कैमरा ख़रीदा और ज्ञान प्रकाश विवेक की अनुमति के बाद उनकी कहानी ''कैद'' का नाट्य रूपांतरण कर उसे फिल्माया गया । फ़िल्म में कई पात्रों का अ•िानय स्कूल के छात्र और शिक्षकों ने किया है । इस फ़िल्म में ''पान सिंह तोमर '' में अभिनय करने वाले अभिनेता व् निदेशक संदीपन विमलकांत(पटकथा लेखिका अचला नागर के बेटे ) ने भी काम किया है। गनी के इस बड़े व् प्रथम प्रयास को मथुरा --आगरा में सराहा जा रहा है।
गनी के सपनों में अब पंख लग गए हैं । उसे धन दौलत की दुनिया से परहेज है । वह जनता के दर्द को व्यक्त करने वाले साहित्य को अपनी फिल्मों में स्थान देना चाहता है । गनी ने बताया कि प्रसिध्द अभिनेता अमोल गुप्त ने उससे कहा है कि अगला सिनेमा छोटी छोटी जगहों -कस्बों से पैदा होगा ,जनता की बात जनता के लिए। गनी ने अपनी दूसरी फ़िल्म की तैयारी शुरू कर दी है . कहानीकार शुशांत सुप्रिय की कहानी ''मेरा जुर्म क्या है '' की पटकथा लेखन में जुट गए हैं --गनी और उसके भाई हनीफ ।
गनी और उसके परिवार का .नाटक और अच्छी फिल्मों के प्रति एक ईमानदार समर्पण देख मथुरा का साहित्यिक -सांस्कृतिक समुदाय उनके प्रति श्रद्धानत है।


साभार जगदीश्वर चतुर्वेदी जी :
https://www.facebook.com/notes/jagadishwar-chaturvedi/

Friday, 31 May 2013

लखनऊ में मकड़जाल




आज 25 मई 2013 को साँय 6 बजे क़ैसर बाग ,लखनऊ स्थित कार्यालय पर इप्टा के 70 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक विचार गोष्ठी एवं नाटक का प्रदर्शन सम्पन्न हुआ।
गोष्ठी में अन्य वक्ताओं के अतिरिक्त वीरेंद्र यादव जी व शकील सिद्दीकी साहब प्रमुख थे जिन्हों ने इप्टा के क्रिया-कलापों पर प्रकाश डाला तथा इसके महत्व को रेखांकित किया। गोष्ठी के उपरांत खुले प्रांगण में राकेश जी द्वारा लिखित एवं निर्देशित एक नुक्काड नाटक का मंचन किया गया। कलाकारों ने बहुत सुंदर ढंग से नाट्य प्रस्तुति द्वारा,FDI,बाजारीकरण,सेन्सेक्स,विकास आदि की विद्रूपताओं को उद्घाटित किया। इसके विरोध में जनता के जागरूक होकर संघर्ष करने पर शासन तंत्र शोषक मुनाफाखोरों को लाभ पहुंचाने के लिए किस प्रकार जातिवाद व धार्मिक वैमनस्य का खूनी खेल खेलता है इसे नाटक द्वारा बखूबी समझाया गया।
भाकपा,उत्तर प्रदेश के सचिव कामरेड डॉ गिरीश ,ज़िला काउंसिल लखनऊ के सह सचिव कामरेड ओ पी अवस्थी के अलावा कामरेड विजय माथुर भी उपस्थित रहे।


 संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त माथुर